Saturday, 12 August 2017

हिंसा का प्रतिरोध हिंसा से क्यों ? ------ मीनाक्षी देहलवी

यदि सत्ता या समाज की संरचना में हिंसा का तत्व निहित हो तो उसका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियों के लिए भी हिंसा या बल प्रयोग एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है।
Meenakshy Dehlvi
12-08-2017 
समाज में परिवर्तन लाकर उसे बेहतर बनाने के लिए जी जान से जुटे लोगों के रूप में हमें अक्सर समाज में सराहना मिलती है परन्तु हमारे कई मानवतावादी शुभचिन्तक और सहयोगी पूर्वाग्रह के चलते सामाजिक परिवर्तन में हिंसा की जरूरत से कतई सहमत नहीं होते। क्रान्तिकारियों पर यह आरोप बहुधा लगता ही रहा है कि वे हिंसा की अनिवार्यता पर गैरजरूरी जोर देते हैं। विचारवान वामपंथी और प्रगतिशील खेमे की ओर से भी इस प्रश्न पर या तो षडयंत्रकारी चुप्पी रखी जाती है या हिंसा की अनिवार्यता को मौजूदा दौर में अप्रासंगिक बनाने के लिए सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं। स्वयं इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि कोई भी आमूलगामी व्यवस्थागत या आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन हिंसा या बलप्रयोग के बिना संभव नहीं हुआ है। फ्रांसीसी क्रान्ति जैसी पूंजीवादी जनवादी क्रान्तियां या विभिन्न देशों के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष जो पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में सम्पन्न हुए थे, उसमें भी हिंसा या हिंसा का तथ्य मौजूद था। भारत का मुक्ति संघर्ष भी ब्रिटिश शासकों के हृदय परिवर्तन से नहीं बल्कि बल प्रयोग के जरिये हासिल हुआ था। दबाव बनाकर और अहिंसात्मक दिखने वाली सामूहिक कार्रवाइयों की बदौलत यदि शासन करनेवालों को अपने पक्ष में सहमति के लिए बाध्‍य कर दिया जाता है तो वह हिंसा या बलप्रयोग ही होता है। इस रूप में धरना, आन्दोलन, जुलूस, भूख-हड़ताल इन सभी दबाव बनाने वाले तरीकों का गांधी ने राष्‍ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान भरपूर इस्तेमाल किया था। गोलमेज जैसी वार्ताओं की पृष्ठभूमि कभी तैयार ही न हो पाती यदि जनता की संगठित कार्रवाइयों के रूप में बलप्रयोग नहीं किया गया होता। यथास्थिति के परिवर्तन में हमेशा ही बलप्रयोग होता रहा है। यह वैज्ञानिक सूत्रीकरण है। और मार्क्सवाद भी एक क्रान्तिकारी सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है, जो शासक वर्ग के संगठित बलप्रयोग के केन्द्रीय उपकरण के रूप में मूर्त राज्यसत्ता के खिलाफ प्रतिरोधी क्रान्तिकारी संगठित हिंसा के राजनीतिक संगठन की अनिवार्यता के सिद्धान्त को सूत्रबद्ध करता है। भारत की पूंजीवादी राज्यसत्ता द्वारा आम जनता के न्यायपूर्ण आन्दोलनों, जायज मांगों को लेकर किये गये प्रदर्शनों धरनों को किस प्रकार पुलिस फौज की लाठी गोली से कुचल दिया जाता है, सैनिकों द्वारा जनसंघर्षों पर बलप्रयोग के लिए किसप्रकार विशेषाधिकार कानून बनाये जाते हैं, यह साफ देखा जा सकता है। यह समझना बहुत कठिन नहीं कि यदि सत्ता या समाज की संरचना में हिंसा का तत्व निहित हो तो उसका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियों के लिए भी हिंसा या बल प्रयोग एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है। परन्तु मार्क्सवादी क्रान्तिकारियों पर हिंसा की अनिवार्यता पर बल देने का आरोप इस प्रकार मढ़ दिया जाता है मानो वे हिंसा को ग्लोारिफाई करना चाहते हों।

साभार: 
https://www.facebook.com/meenakshy.dehlvi/posts/1407080076047643

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Monday, 24 July 2017

समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव ------ Meenakshy Dehlvi


 क्रान्तियों की कार्बन कॉपी या नकल नहीं होती। आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रांतियाँ चीन की नवजनवादी क्रांति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रांतियां होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्‍त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रांतियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्‍मक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा।
Meenakshy Dehlvi shared October Revolution Centenary Committee's post
24-07-2017

समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव' पर व्‍याख्‍यान की प्रेस विज्ञप्ति और कुछ तस्‍वीरें

लखनऊ, 23 जुलाई। आज पूँजीवाद और साम्राज्‍यवाद पूरे विश्‍व में आक्रामक हैं लेकिन जगह-जगह इनके प्रतिरोध के आन्‍दोलन ज़ोर पकड़ रहे हैं जिन्‍हें सही दिशा की तलाश है। आने वाला समय पूँजीवाद-साम्राज्‍यवाद विरोधी नयी समाजवादी क्रान्तियों का होगा। मार्क्‍सवादी चिन्‍तक और ऐक्टिविस्‍ट शशि प्रकाश ने आज यहाँ 'समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव' विषय पर अपने व्‍याख्‍यान में ये बाते कहीं।

'अक्‍टूबर क्रान्ति शतवार्षिकी समिति' और 'अरविन्‍द स्‍मृति न्‍यास' की ओर से जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता गिरि विकास अध्‍ययन संस्‍थान के निदेशक प्रो. सुरिन्‍दर कुमार को करनी थी लेकिन अचानक अस्‍वस्‍थ हो जाने के कारण वे आज आ नहीं सके। व्‍याख्‍यान के बाद इस विषय के विभिन्‍न पहलुओं पर सवाल-जवाब का भी दौर चला।

शशि प्रकाश ने कहा कि 1917 में हुई अक्टूबर क्रान्ति ने बीसवीं सदी को एक नयी शक्ल दी। पूरी दुनिया में शोषण और अन्‍याय के विरुद्ध संघर्ष को इसने प्रेरणा और दिशा दी। भारत में 1917 से 1930 के बीच हिन्‍दी और अन्‍य भाषाओं की पत्रिकाओं में लेनिन और सोवियत क्रान्ति, सोवियत संघ में स्त्रियों की स्थिति, कृषि के सामूहिकीकरण, पंचवर्षीय योजनाओं आदि के बारे में सैकड़ों लेख, कविताएँ आदि छपे। भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नाम रखते हुए मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर सर्वहारा वर्ग की पार्टी बनाने की घोषणा की।

उन्‍होंने कहा कि अक्‍टूबर क्रान्ति के बाद पहली बार ऐसी राजसत्‍ता कायम हुई जिसमें निजी स्‍वामित्‍व की व्‍यवस्‍था पर चोट की। उत्‍पादन के साधनों का समाजीकरण किया गया और कुछ ही वर्षों में करोड़ों लोगों के जीवनस्‍तर को कई गुना ऊपर उठाया गया। 1918 की विवाह और परिवार संहिता में पहली बार स्त्रियों को बराबर के अधिकार दिए गए। जीवन के हर क्षेत्र में उन्‍हें न केवल काम करने का अधिकार दिया गया बल्कि चूल्हे चौखट से उन्‍हें मुक्त करने के लिए सामूहिक भोजनालयों से लेकर बड़े स्तर पर शिशु शालाओं का निर्माण भी किया गया। वेश्यावृति, नशाखोरी, बेरोज़गारी, भीख आदि क्रान्ति के कुछ वर्षों बाद समाज से समाप्‍त हो गये। अक्टूबर क्रान्ति केवल 500 वर्ष के पूँजीवाद के विरुद्ध क्रान्ति नहीं थी, वह 5000 वर्षों के पूरे वर्ग समाज के विरुद्ध एक सतत क्रान्ति की शुरआत का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी।

समाजवाद की समस्‍याओं की चर्चा करते हुए शशि प्रकाश ने कहा कि हर मौलिक क्रान्ति की तरह इस पहली समाजवादी क्रान्ति की भी कुछ समस्‍याएँ थीं। क्रान्ति के बाद निजी मालिकाने का काफी हद खात्मा तो हो गया लेकिन समाज में मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच, कृषि और उद्योग के बीच, शहर और गाँव के बीच के अन्तर जैसी असमानताएँ बनी हुई थीं। मूल्‍य का नियम और मज़दूरी की व्‍यवस्‍था बने हुए थे। लोगों की सोच, संस्‍कार और आदतों में पूँजीवादी मूल्‍य-मान्‍यताएँ रातों-रात नहीं खत्‍म होते। निश्‍चय ही मार्क्‍सवाद के सिद्धान्‍तों पर अमल में व्‍यावहारिक ग़लतियाँ भी हुईं। पूँजीवाद की पुनर्स्थापना का प्रयास करने वाले तत्‍वों को इस ज़मीन पर अपनी ताक़त बढ़ाने का अवसर मिला और 1956 में सोवियत संघ में समाजवाद के लेबल के तहत पूँजीवाद की बहाली हो गयी तथा 1989 में लेबल भी हटाकर खुला पूँजीवाद आ गया।

उन्‍होंने कहा कि चीन में 1949 में होने वाली नवजनवादी क्रान्ति के बाद वहाँ इन समस्याओं पर लम्‍बा वाद-विवाद चला और 1966-67 में शुरू हुई सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के द्वारा पूँजीवाद की वापसी रोकने का एक रास्‍ता प्रस्‍तुत किया गया। इसमें कहा गया कि समाजवादी व्‍यवस्‍था कायम होने के बाद ऊपरी संरचना में सतत क्रान्ति जारी रखनी होगी और एक नया मानव बनाने का काम सर्वोपरि हो जायेगा। हालाँकि उस समय चीन में भी वर्ग शक्ति संतुलन पूँजीवादी पथगामियों के पक्ष में झुक गया था और 1976 के बाद से वहाँ भी बाजार समाजवाद के नाम पर पूँजीवाद की पुनर्स्थापना की शुरुआत हो चुकी थी।

आज के समय की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि क्रान्तियों की कार्बन कॉपी या नकल नहीं होती। आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रांतियाँ चीन की नवजनवादी क्रांति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रांतियां होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्‍त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रांतियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्‍मक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा।

कार्यक्रम में शहर के अनेक गणमान्‍य लेखक, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता शोधार्थी और छात्र-युवा उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सत्‍यम ने किया।
https://www.facebook.com/octoberrevolution/posts/840658872767821

Friday, 14 July 2017

समाजवादियों की शक्ति से ओतप्रोत काँग्रेस और एकीकृत वामपंथी दल का साझा मोर्चा वक्त की ज़रुरत ------ पंकज श्रीवास्तव

संसदीय रास्ते पर चल रहीं बाक़ी कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता समय की स्वाभाविक माँग है !






Pankaj Srivastava
13-07-2017 at 5:56pm
बात बरख़ास्त-3
काँग्रेस+समाजवादी+वामपंथी- रामचंद्र गुहा की 'फैंटेसी' में छिपा भविष्य का रास्ता !
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के नीम अंधेर कमरे में पहली बार यह शब्द-पद कान में पड़ा था- अमूर्त प्रत्यय !
वह बीए प्रथम वर्ष की कोई शुरुआती कक्षा थी। विज्ञान के विषयों से इंटरमीडिएट करके आने वाले मेरे जैसे छात्र के लिए इसका ठीक अर्थ समझने में कई साल लग गए। और जब थोड़ा- बहुत समझ आया तो पाया कि यह अपने किसी काम का नहीं है। बदलाव के लिए अमूर्त नहीं, ठोस समझ और कार्रवाइयों की ज़रूरत होती है।
एनडीटीवी पर कल शाम इतिहासकार रामचंद्र गुहा से सुनी उनकी 'फैंटेसी' दिमाग़ में घर कर गई है। गुहा ने मौजूदा राजनीतिक हालात के मद्देनज़र सलाह दी कि नेता विहीन काँग्रेस और पार्टी विहीन नीतीश कुमार को साथ आ जाना चाहिए (ज़ाहिर है, राहुल गाँधी के बारे में उनकी राय अच्छी नहीं है।)
हाँलाकि गुहा ने इसे अपनी 'फैंटेसी' बताकर साफ़ कर दिया कि इस संभावना के हक़ीक़त में बदलने की कोई उम्मीद उन्हें भी नहीं है, लेकिन फिर भी इस टिप्पणी के ज़रिए एक गंभीर सूत्र तो वे दे ही गए। राष्ट्रीय परिदृश्य पर नज़र डालें तो कभी ग़ैरकाँग्रेसवाद के पुरोधा रहे तमाम समाजवादियों और काँग्रेस के बीच कोई वैचारिक अंतर नहीं रह गया है। ऐसे में अगर देश सचमुच फ़ासीवादी ख़तरे के मुहाने पर है (या उसमें फँस गया है) तो फिर समाजवादियों की काँग्रेस में वापसी में हर्ज़ ही क्या है।
कभी काँग्रेस समाजवादी पार्टी (सीएसपी) काँग्रेस के अंदर ही समाजवादियों का मंच था। डॉ.लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज इसी के ज़रिए काँग्रेस को समाजवादी रंग में रँगना चाहते थे। नेहरू और सुभाषचंद्र बोस काँग्रेस ही नहीं, समाजवादी नेता बतौर भी दुनिया भर में जाने गए थे। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के 1931 के कराची अधिवेशन में 'समाजवादी ढर्रे के विकास' को भविष्य के भारत का लक्ष्य घोषित किया था।
लेकिन काँग्रेस के अंदर मौजूद दक्षिणपंथियों के दबाव की वजह से तमाम समाजवादियों ने 1948 में काँग्रेस छोड़ दी (यह दोहरी सदस्यता पर सवाल का पहला मामला था)। लेकिन समाजवादियों का दबाव ही था कि 1955 में काँग्रेस के अवाडी अधिवेशन में देश को समाजवादी ढर्रे पर ले जाने का प्रस्ताव फिर पारित हुआ जिसे बाद में भारतीय संसद ने नीति के बतौर स्वीकार किया।
बहरहाल, काँग्रेस के हाहाहूती प्रभाव के दौर में समाजवादियों ने एक प्रतिपक्ष गढ़ने की ज़रूरी कोशिश की लेकिन इसके ज़रिए गाँधी के हत्यारों के रूप में चिन्हित राजनीतिक धारा को भी पैर ज़माने का मौक़ा मिल गया। आज उस धारा से बहकर आया ज़हर, तमाम विविधिताओं को गूँथकर एक राष्ट्र बनाने की 'हिंदुस्तान' नाम की अनोखी परियोजना की हत्या पर उतारू है।
काँग्रेस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार में शामिल है। समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ चुकी है। ऐसे में मौजूदा फ़ासीवादी ख़तरे को देखते हुए अगर तमाम समाजवादी काँग्रेस में लौट आएँ तो यह कोई फैंटेसी नहीं है, इतिहास से सबक लेना भी होगा । अतीत में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ ऐसी मोर्चेबंदी हो चुकी है।
यही बात वामपंथियों पर भी लागू होती है। ज़ाहिर है, वे कम्युनिस्ट पार्टियाँ काँग्रेस के समानांतर आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहीं और वर्गीय प्रश्न को केंद्रीय बनाने का प्रयास करती रही, काँग्रेस से उनका वैसा रिश्ता नहीं रहा जैसा समाजवादियों का था। क्रांति की लाइन या भारतीय समाज की समझ को लेकर उनमें कई विभाजन हुए, लेकिन आज उनके एक ना हो पाने की कोई वजह नहीं रह गई है। अगर माओवादियों को छोड़ दें (जो आज भी हथियारबंद गुरिल्ला युद्ध के ज़रिए दिल्ली पर कब्ज़ा करने का अर्थहीन सपना देख रहे हैं और बचे-खुचे सघनवन क्षेत्रों में सिमटे हैं) तो संसदीय रास्ते पर चल रहीं बाक़ी कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता समय की स्वाभाविक माँग है !
इस बात में कोई संदेह नहीं कि समाजवादियों की शक्ति से ओतप्रोत काँग्रेस और एकीकृत वामपंथी दल का साझा मोर्चा मोदी-शाह चुनौती से निपटने का कारगर फार्मूला हो सकता है।
यह सिर्फ़ चुनावी चुनौती से निपटने का मामला नहीं है..साँप्रदायिक फुफकार से धरती को बंजर करने वालों के ख़िलाफ़ 'सद्भाव की नहरें खोदने का राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करना होगा।
आर्थिक नीतियाँ...? प्रश्न महत्वपूर्ण है, लेकिन किसके पास कोई वैकल्पिक मॉडल है ? पूँजीनिवेश का रास्ता खोलने वाली काँग्रेस, उसी पर एक्सप्रेस वे बनाने वाले समाजवादी और टाटा के लिए गोली चलवा बैठे वामपंथियों के पास कौन सा वैकल्पिक मॉडल है, देश जानना चाहता है !
स्वदेशी के नारे को दफ़ना कर कॉरपोरेट के दुलरुआ बनने वाले संघियों के पास ही कौन सा वैकल्पिक मॉडल है ?
लेकिन आर्थिक नीतियों के लगभग समान होने के बावजूद तीन साल के अंदर हम जान गए हैं कि काँग्रेस और बीजेपी एक नहीं है। दोनों एक हैं- इस पर अकादमिक पर्चे लिखे जा सकते हैं, लेकिन गली-गली शिकार हो रहे अल्पसंख्यक समुदाय के बेगुनाह लोगों की जान नहीं बचाई जा सकती।
इतिहास में कुछ ऐसे दौर आते हैं जब पुरानी मान्यताओं से चिपके रहने या पोलिटकिली करेक्ट होने की मजबूरी से बाहर आकर वह बोलना ज़रूरी हो जाता है, जो महसूस होता है। इस बात का कोई मतलब नहीं कि चुनाव में पर्चे छपवाकर कहा जाए कि देश बचाने के लिए किसको हराना ज़रूरी है। किसे जिताया जाए--अगर यह बता पाने का सामर्थ्य नहीं है तो फिर राजनीति में दिमाग़ लगाना बंद कर देना चाहिए।
'भारत' नाम की अनोखी और मानव सभ्यता को नई ऊँचाई पर ले जाने वाली 'परियोजना' को बचाने और सँवारने के लिए युद्ध अवश्यम्भावी हो गया है जिसके लिए संयुक्त मोर्चा ज़रूरी है।
हैरान ना हों कॉमरेड... मुझे पता है कि आप भी मन ही मन काँग्रेस या बीजेपी विरोधी दलों की जीत पर ख़ुश होते हैं। मैं भी पागल नहीं हूँ..बस मुझे 'अमूर्त प्रत्यय' आज भी समझ नहीं आता है।
https://www.facebook.com/pankaj.srivastava.1023/posts/1475440085851213

Monday, 10 July 2017

हमारी आपसी एकता पर नफरत की राजनीति का हमला ------ प्रो . उमा राग



Uma Raag
*_नफरत और हिंसा से नाता तोड़ो – इंसानियत और एकता से रिश्ता जोड़ो !!_*
*_देश के संविधान के साथ जन-संकल्प अभियान !!_*
(दिल्ली के विभिन्न इलाकों में 15 जुलाई से 15 अगस्त तक)
*_आंदोलनकारी मज़दूरों-किसानों और छात्रों-नौजवानों का साथ दो!_*
*_फूट डालो और राज करो की राजनीति को ख़त्म करो !_*
आज देश में हालत ये है कि एक तरफ सरकार अडानी-अम्बानी को टैक्स और क़र्ज़ माफ़ कर रही है, दूसरी तरफ हर दिन किसान क़र्ज़ में लदकर आत्महत्या कर रहे हैं, क़र्ज़ माफ़ी मांग रहे किसानों पर सरकार गोलियां चला रही है; मजदूरों के हक-अधिकार उनसे छीने जा रहे हैं, न्यूनतम मजदूरी पूरे देश में कही भी ढंग से लागू नहीं है. चारों तरफ महंगे स्कूलों की मार है, देश के अच्छे व सस्ते विश्वविद्यालयों पर हमला जारी है, छात्रों का वजीफा बंद किया जा रहा है व उच्च शिक्षा से बेदखली जारी है. GST ने महंगाई की मार को और तेज़ कर दिया है. एक तरफ पूरे देश में बेरोजगारी तेज़ी से बढ़ी है, दूसरी तरफ पक्की नौकरियां ख़त्म की जा रही है.
लेकिन सत्ता में बैठी सरकार को शिक्षा-रोज़गार के सवालों पर, किसानों और मज़दूरों के अधिकारों के लिए, महंगाई और GST के खिलाफ उभरते जन आंदोलनों से डर लगता है. इन आंदोलनों को तोड़ने की मंशा से शासक शक्तियां उसी 'फूट डालो और राज करो' के हथकंडे का इस्तेमाल कर रही हैं जिन्हें आज़ादी के आंदोलन के खिलाफ अंग्रेज़ शासकों ने किया था. हम किस धर्म को मानते हैं; क्या पर्व मनाते हैं; कैसे कपड़े पहनते हैं; क्या खाते हैं; किनसे शादी करते हैं - इन सब बातों में नफ़रत घोला जा रहा है. नफरत का ये कारोबार सत्ता में बैठे नेता और सरकार सिर्फ अपनी नाकामी और वादाखिलाफी को छुपाने के लिए कर रहे हैं.
हमारे देश और समाज में नफरत और हिंसा का माहौल बढ़ रहा है। कई तरह की अफवाहों को फैलाकर उन्मादी भीड़ की हिंसा को अंजाम दिया जा रहा है। इस तरह की उन्मादी भीड़ की हिंसा का शिकार हमारे देश के कमज़ोर तबकों के आम नागरिक हो रहे हैं और समाज के भीतर धार्मिक व जातीय नफ़रत की खाई बढ़ रही है।
गौरतलब है कि इन हिंसाओं में जिनकी जाने जा रही हैं वो भी आम नागरिक है और इन हिंसाओं को अंजाम देने के लिए जिन लोगों को भड़काया जा रहा है, जिनके अन्दर नफरत भरी जा रही है वे भी आम नागरिक हैं।
हाल में दिल्ली के नज़दीक, बल्लभगढ़ में 15 वर्षीय जुनैद की ट्रेन में नफ़रत से प्रेरित उन्मादी भीड़ द्वारा हत्या की गई. देश में कई जगहों पर गाय के बहाने इंसान का खून बहाया जा रहा है. अख़लाक़, पहलू आदि की हत्याएं हुई हैं और 12-वर्षीय इम्तियाज़ को हत्यारी भीड़ ने पेड़ से टांग कर फांसी दे दी. झारखण्ड में बच्चा चोरी के अफ़वाहों के उकसावे में भीड़ ने शेख सज्जू, शेख सिराज, शेख हलीम, नईम, गौतम वर्मा, विकास वर्मा और गंगेश गुप्ता की हत्या की. राजस्थान में स्‍वच्‍छ भारत अभियान के नाम पर महिलाओं की फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करने से रोकने पर भाकपा(माले) कार्यकर्ता जफर हुसैन की नगर पालिका कमिश्‍नर के उकसावे पर पालिका कर्मियों ने पीट पीट कर हत्‍या कर दी.
नफ़रत-प्रेरित इन हत्याओं के निशाने पर ज्यादातर अल्पसंख्यक और दलित समुदाय के लोग हैं. पर नफ़रत की आग दावानल की तरह है - पडोसी के घर को जला डालने की मंशा से लगायी गई आग किसी के घर को नहीं बक्शेगी. नफ़रत की आग में हमारे पूरे देश को झोंक देने की कोशिश की जा रही है और हमारी एकता, हमारे साझे आन्दोलनों में हमारी साझी ताकत को कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है.
ऐसे माहौल में हमे उन्मादी भीड़ की हिंसा की किसी भी तरह की कार्यवाही के खिलाफ खड़े होने की ज़रूरत है। हम लोगों को अफ़वाह और नफ़रत फ़ैलाने वाली ताकतों से सावधान रहने की ज़रूरत है।
इसी मकसद से हमने भारत के संविधान के साथ एक जन-संकल्प अभियान शुरू किया है. भारत के संविधान की प्रस्तावना समता, स्वन्त्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिधांतो को सामने रखते हुए देश के हर नागरिक को अपनी सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक विचार, विश्वास व अभियक्ति की स्वन्त्रता का अधिकार देता है. जबकि आज हमारी आपसी एकता पर नफरत की राजनीति का हमला है और हमारे विचार, विश्वास और अभिव्यक्ति को कुचलने की कोशिश की जा रही है. इस माहौल में जन-संकल्प अभियान की तरफ से आपसे अपील करते हैं कि अपने देश के संविधान को हाथ में लेकर हम संकल्प लें-
 *हम किसी भी बहाने सांप्रदायिक व जातीय हिंसा का हिस्सा नहीं बनेंगे।*
 *हम अफ़वाह और नफ़रत फ़ैलाने की किसी भी तरह की कोशिश के खिलाफ़ खड़े होंगे।*
 *हम देश में समता, स्वतंत्रता, एकता और भाईचारा का सन्देश फैलायेंगे।*
*_साथ ही हम किसी भी जातीय व सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सख्त कार्यवाही और कानून की मांग करते हैं._*
*_नफरत और हिंसा मिटाओ_* –
*_अधिकार आन्दोलनों से एकता बनाओ_*
यह जन संकल्प अभियान दिल्ली एन सी आर के विभिन्न इलाकों में 15 जुलाई से 15 अगस्त तक चलेगा, जिसमें नुक्कड़ सभा, जन-सम्मलेन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा. आप समस्त नागरिकों से अपील है कि इस संकल्प अभियान के साथ जुड़े और अन्य लोगों को जोड़ने में सहयोग करें.
निवेदक- *भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले), आइसा, ऐक्टू, AIPF, NTUI, बिल्डिंग वर्कर्स यूनियन, ऐपवा, दिल्ली नागरिक मंच*

https://www.facebook.com/umaip/posts/1351902268192053

Monday, 3 July 2017

जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेंकने का काम सिर्फ छात्र-नौजवान ही कर सकते हैं ------ नितिन राज


Uma Raag



Uma Raag
०३-०७-२०१७ 
(उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पिछली 7 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आइसा समेत कई संगठनों के छात्रों ने विरोध-प्रदर्शन किया था। इस मौके पर एक दर्जन से ज्यादा छात्रों और उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद इन सब पर गंभीर आपराधिक धाराएं लगा दी गयी थीं। निचली अदालत से जमानत खारिज होने के बाद तकरीबन तीन हफ्ते बाद इन नेताओं को ऊपरी अदालत से जमानत मिल पायी। लेकिन अभी भी आइसा के एक नेता नितिन राज को जमानत नहीं मिल सकी है। बताया जा रहा है कि इसके पीछे वजह पुलिस द्वारा मांगी गई घूस का न दिया जाना है। बाकी साथियों की रिहाई के बाद जेल में अकेले बंद नितिन राज ने एक पत्र जारी किया है। पेश है नितिन का पत्र।)

आज शायद भारतीय छात्र आन्दोलन अपने इतिहास के सबसे दमनात्मक दौर से गुजर रहा है, जहाँ छात्रों को अपनी लोकतान्त्रिक माँगों को लेकर की गई छात्र आन्दोलन की सामान्य कार्यवाही के लिए भी राजसत्ता के इशारे पर महीनों के लिए जेल में डाल दिया जा रहा है। छात्र आन्दोलन से घबराई योगी सरकार, जो कि इसे किसी भी शर्त पर कुचल देना चाहती है, हमें इतने दिनों तक जेल में रख कर हमारे मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन हम क्रान्तिकारी परम्परा के वाहक हैं हमारे आदर्श भगतसिंह और चंदू हैं, सावरकर नहीं, जो जेल के भय से माफ़ीनामा लिखकर छूटे और अंग्रेजों की दलाली में लग गए। हमें अगर और दिनों तक जेल में रहना पड़ा तब भी हम कमजोर पड़ने वाले नहीं हैं।
कल जब हमारे साथ के सभी आन्दोलनकारी साथियों की रिहाई हो गई और मेरी नहीं हुई तो पहले कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब से पता चला कि मेरी रिहाई BKT थाने में हमारे साथियों द्वारा रिश्वत देने से इंकार करने के चलते रुकी है तब मुझे जानकर ख़ुशी हुई। यदि रिश्वत देकर मेरी रिहाई कल हो गई होती तो मैं छूट तो जाता परन्तु वो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन, जिसके चलते मैं जेल में आया, शायद हार जाता। जो कि इस आन्दोलन की मुख्य अंतर्वस्तु को ही भटका देता। मुझे गर्व है कि मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ सही मायने में लड़ रहा हूँ और अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा हूँ भले ही मुझे इसके लिए अधिक दिनों तक जेल में क्यों न रहना पड़ रहा हो। जेल में मैं बस हमारे प्रिय छात्रनेता चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) के शब्दों में “ यह मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है कि मैं चे ग्वेरा की तरह जियूँ और भगतसिंह की तरह मरूं”, को याद करके खुद को राजसत्ता के दमन से ज्यादा मजबूत पाता हूँ और लड़ने की एक नई ऊर्जा प्राप्त करता हूँ।
आज पूरे देश में जिस तरीके से कार्पोरेट फासीवादी ताकतों की सत्ता स्थापित है उसमें लगातार दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं व अन्य वंचित तबकों पर हमले बढ़ रहे हैं। पूरे देश में एक ऐसी भीड़ पैदा की जा रही है जो सिर्फ अफवाह के चलते किसी की भी हत्या कर दे रही है। हमारे किसान जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें गोली से उड़ा दिया जा रहा है। अगर छात्र-नौजवान शिक्षा और रोजगार की बात करता है तो उसे जेल में ठूंस दिया जा रहा है, जो भी सरकार पर सवाल उठाता है उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है। इस भयानक दौर में मैं देश के सभी छात्र नौजवानों से अपील करता हूँ कि भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा लेते हुए समाज के सभी उत्पीड़ित तबकों को गोलबंद कर इन जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेंकने की जिम्मेदारी लें। ये काम सिर्फ छात्र-नौजवान ही कर सकते हैं।
अंत में मैं फिर इन सरकारों से कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा कोई भी दमन और तुम्हारे भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती।
इंकलाब जिंदाबाद !!
नितिन राज
नेता, आइसा
जिला कारागार, लखनऊ
दिनांक-02.07.2017
https://www.facebook.com/umaip/posts/1345179175531029



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Sunday, 21 May 2017

व्यवस्था की सड़न समाज को बर्बरता के रास्ते प्रकृति को नष्ट कर पूरे जीवन को ही खतरे में डाल रही है ------ मुकेश त्यागी

 निजी संपत्ति की समाप्ति और सामाजिक उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व में सामूहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन के लिए विज्ञान-तकनीक का भरपूर प्रयोग ही ना सिर्फ सबको रोजगार दे सकता है बल्कि अमानवीय श्रम से मुक्ति भी......................लेकिन यह खुद ब खुद होगा नहीं, करना पड़ेगा, नहीं तो इस व्यवस्था की सड़न अब समाज को बर्बरता के रास्ते पर ले जा रही है और प्रकृति को नष्ट कर पूरे जीवन को ही खतरे में डाल रही है ।  
Mukesh Tyagi
विकल्प का अर्थ क्या है? बेरोज़गारी के समाधान के लिए क्या वर्तमान व्यवस्था में कुछ तात्कालिक सुधार जैसे पब्लिक सेक्टर को मजबूत करना, सरकारी खर्च बढ़ाना, पूँजीपति मालिकों पर कुछ रोकथाम करना, छँटनी पर रोक लगाना, सरकार द्वारा पूँजी केंद्रित के बजाय श्रम केंद्रित अर्थात आधुनिक तकनीक के बजाय पुरानी तकनीक पर आधारित उद्योगों में निवेश करना, आदि वास्तव में विकल्प हैं? आर्थिक ग़ैरबराबरी के लिए क्या आयकर की ऊँची दर, सम्पत्ति कर, विरासत पर कर, कर्मचारियों का वेतन, मजदूरी बढ़ाना, किसानों को फसल की ऊँची कीमतें देना क्या वास्तव में आज विकल्प है? सामाजिक-जनवाद या संसदीय वाम धारा की नजर में यह विकल्प है, लेकिन क्या यह वास्तविकता में एक विकल्प है? समझने के लिए हमें उपरोक्त नीति किस ऐतिहासिक परिस्थिति में लागू की गई, यह जानना जरुरी है| 
जॉन मेनार्ड कींस के कल्याणकारी राज्य और उसके साथ जुड़े ब्रेटन वुड्स के आर्थिक ढाँचे की नीति निम्न विशेषताओं वाले वक़्त में आई थी-
1. द्वितीय विश्व युद्ध में विकसित पूँजीवादी और अन्य देशों में उत्पादक शक्तियों का भारी विनाश और पुनर्निर्माण का दौर 
2. युद्ध द्वारा यूरोप/जापान के उत्पादक उम्र के करोड़ों श्रमिकों की हत्या और अपंग किया जाना
3. दुनिया भर के अविकसित देशों में पूँजीवादी बाज़ार के विस्तार की अपार सम्भावना
4. दुनिया भर में जुझारू मजदूर आंदोलनों के उभार और समाजवादी खेमे की शक्ति का भय
इस विशेष परिस्थिति में एक तो तात्कालिक तौर पर उत्पादन का विस्तार मुमकिन था, बेरोजगारों की बड़ी फ़ौज मौजूद नहीं थी, अविकसित देशों के शोषण से प्राप्त मुनाफ़े से विकसित देशों के मजदूरों को एक हिस्सा देना मुमकिन था और साथ में, उनको जुझारू मजदूर आंदोलन के रास्ते जाने रोककर वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे में ही सौदेबाज़ी के जरिये अपनी स्थिति में सुधार का भ्रम पैदा करना भी जरुरी था| इस स्थिति में कल्याणकारी राज्य और ऊपर दी गई नीतियों को लागू किया गया| 
भारत में भी 1930 के दशक में ही स्पष्ट हो गया था कि देश को आजाद होना ही है और कांग्रेस उसके बाद के लिए एक राष्ट्रीय योजना समिति बना चुकी थी| 1942 के जनांदोलनों ने पूँजीपतियों को बुरी तरह डरा दिया था कि यह निजी संपत्ति के खिलाफ आंदोलन में बदल सकता है| उस वक्त के एक बड़े उद्योगपति लाला श्रीराम (DCM) ने दूसरे पुरुषोत्तम ठाकुरदास को लिखा था 'यह तोड़फोड़ निजी संपत्ति के खिलाफ भी जा सकती है| एक बार ये गुंडे ('आजादी के योद्धा!') यह समझे तो हुकूमत इन्हें बाँध नहीं पायेगी| आज तो महात्मा गाँधी इन्हें रोक पा रहे हैं, पर मुमकिन है आगे न रोक पायें|'
साथ ही पूँजीपति वर्ग को अपनी पूँजी और मुक्त बाज़ार की सीमाओं का भी पता था| उन्हें अपने विकास के लिए सत्ता के समर्थन की जरुरत महसूस हो रही थी| ऐसे में 8 उद्योगपतियों-प्रबंधकों ने कांग्रेस को जनवरी 1944 में बॉम्बे प्लान (A Brief Memorandum Outlining a Plan of Economic Development for India)  * नामक योजना दी जिसका दूसरा संस्करण 1945 में बना| इसके लेखक थे जेआरडी टाटा, घनश्यामदास बिड़ला, लाला श्रीराम, पी ठाकुरदास, कस्तूरभाई लालभाई, एड़ी श्रॉफ, अर्देशिर दलाल और जॉन मथाई| इनमें से श्रॉफ ब्रेटन वुड्स की बैठक में भी शामिल होकर आये थे और विश्व पूँजीवादी व्यवस्था की दिशा से भी परिचित थे| इन्होने आजादी के बाद पहले 15 वर्ष की आर्थिक नीतियों के लिए क्या सुझाव दिए?
1. बाजार और पूँजी का सरकार द्वारा नियमन और विनियोजन
2. पब्लिक सेक्टर में भारी, पूँजी केंद्रित उद्योगों की स्थापना
3. घाटे के बजट द्वारा सरकारी खर्च को बढ़ाना 
4. विदेशी प्रतियोगिता से देशी उद्योगों की सुरक्षा 
5. समानता और न्यायपूर्ण विकास की योजना
6. कृषि आधारित से उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था में संक्रमण 
कहने की जरुरत नहीं कि ठीक यही पूँजीवादी सुझाव नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने समाजवादी विकास के नाम पर अपनाये और पहली तीनों पँचवर्षीय योजनायें पूरी तरह इस बॉम्बे प्लान पर ही आधारित थीं और इसके परिणामस्वरूप देशी पूँजीपतियों की पूँजी में तेजी से वृद्धि हुई| साथ ही मजदूर वर्ग के संगठित अभिजात हिस्से को भी कुशल तकनीकी श्रमिकों की माँग के कारण शेष जनता की तुलना में बेहतर सुविधायें प्राप्त हुईं| 
पर पूँजीवादी विकास और वृद्धि का यह दौर अस्थाई सिद्ध हुआ| दुनिया और भारत में 1965 के बाद ही इसके नतीजे में संकट की स्थिति पैदा होने लगी, असंतोष फ़ैलने लगा| सबसे बुरी बात यह कि इस दौर में कम्युनिस्ट पार्टियों और ट्रेड यूनियनों ने संशोधनवादी धारा हावी हुई जिसने मजदूर वर्ग को इस अस्थाई दौर की वास्तविकता बताने के बजाय इसे पूँजीवाद के चरित्र में बदलाव बताया और सिखाया कि अब पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने, क्रांति करने की जरुरत ख़त्म; कल्याणकारी पूँजीवाद में संगठित सौदेबाजी के द्वारा ही शांति से मज़दूर अपनी स्थिति में सुधार कर सकते हैं| विकास के दौर में तो यह शांति की बात बड़ी अच्छी लगी, यूनियनें भी बढ़ीं, संसद में सीटें भी मिलीं, कम्युनिस्ट मंत्री बनकर पूँजीवादी सरकार भी चलाने लगे| लेकिन पूँजीपति हमेशा अधिक वर्ग सचेत होता है| संकट का दौर आते ही और कम्युनिस्ट आंदोलन की वैचारिक कमजोरी को भाँपते ही उसने कल्याणकारी राज्य का विध्वंस और नव-उदारवाद नीतियों को लागू करना शुरू कर दिया, मजदुरी कम होने लगी, सरकारी खर्च में कटौती चालू, कल्याण कार्यक्रम कम, पब्लिक सेक्टर का निजीकरण, युनियनों पर दमन और छँटनी जारी हुई| गलत शिक्षा दे चुका संसदीय वाम अब मजदूरों को सचेत कैसे करता, वे उसको छोड़कर सत्ता के करीबी कांग्रेस, समाजवादी और फिर संघ की यूनियनों में जाने लगे| यही विभ्रम का दौर संसदीय वाम को आज की हताशा की स्थिति तक ले आया है|
मार्क्सवाद के क्रांतिकारी विचार को छोड़ चुका और लेनिनवाद को अप्रासंगिक मान चुका संसदीय वाम फिर भी एक निश्चित दौर की पूँजीवादी शासक वर्ग की नीति को ही अपनी नीति माने बैठा है, पूँजीवाद के अंदर ही पब्लिक सेक्टर और सरकारी नियमन-योजना के द्वारा पूँजीवाद में सुधार को ही अपना रास्ता माने हुए है अर्थात क्रांति का रास्ता अब उसका रास्ता नहीं है|
आज जब पूरा विश्व पूँजीवाद ही एक अनंत आर्थिक संकट में है, एक संकट से निकलने का यत्न उसे और गहरे संकट में ले जाता है, बाज़ार के विस्तार की और कोई सम्भवनायें समाप्त हैं, तकनीक के द्वारा अधिक पूँजी निवेश और श्रम शक्ति के कम प्रयोग के रास्ते ही मुनाफे को बढ़ाने प्रयास कर रहा है, उस स्थिति में वह कल्याणकारी राज्य के दौर में वापस नहीं जा सकता बल्कि हर देश में इन सब कल्याण योजनाओं को बंद कर खुली लूट की नीति पर जा रहा है और इससे पैदा असंतोष के मुकाबले के लिए कमोबेश फासीवादी प्रवृत्तियों को ही आगे बढ़ा रहा है| 
इस स्थिति में अब निजी संपत्ति की समाप्ति और सामाजिक उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व में सामूहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन के लिए विज्ञान-तकनीक का भरपूर प्रयोग ही ना सिर्फ सबको रोजगार दे सकता है बल्कि अमानवीय श्रम से मुक्ति भी| ऊपर ज़िक्र किये गए कोई भी सुझाव द्वारा निजी संपत्ति से श्रमिकों की श्रम शक्ति की खरीद द्वारा अधिकतम मुनाफे अर्जित करने के लिए वर्तमान पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के दायरे में इन समस्याओं का समाधान मुमकिन नहीं, सिर्फ तात्कालिक भ्रम पैदा ही पैदा कर सकते हैं|
यही एकमात्र विकल्प है| लेकिन यह खुद ब खुद होगा नहीं, करना पड़ेगा, नहीं तो इस व्यवस्था की सड़न अब समाज को बर्बरता के रास्ते पर ले जा रही है और प्रकृति को नष्ट कर पूरे जीवन को ही खतरे में डाल रही है|
https://www.facebook.com/MukeshK.Tyagi/posts/1785861101440363
 Mukesh Tyagi बॉम्बे प्लान के विस्तृत विवरण के लिए लिंक https://nzsac.files.wordpress.com/.../bombayplanfornzsac.pdf

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