Monday, 19 February 2018

पूंजी की तानाशाही का दौर चल रहा है ------ दिनकर कपूर

Dinkar Kapoor
18-02-2018  at 5:23pm
अनपरा, सोनभद्र, 18 फरवरी 2018
 आज पूंजी की तानाशाही का दौर चल रहा है। चौतरफा इस तानाशाही को स्थापित करने में मोदी और योगी की सरकारें लगी हुई है। सीधे तौर पर हमारे देश के संविधान, संस्थाओं, सार्वजनिक उद्योगों, प्राकृतिक संसाधनों और आम आदमी के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला किया जा रहा है। जनता के बीच नफरत और विभाजन की राजनीति को पैदा किया जा रहा है। हाल ही में संसद में पेश बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जीवन के लिए जरूरी मदों में बड़ी कटौती की गयी है। बड़े पूंजी घरानों को जहां करों में भारी छूट दी गयी है वहीं जनता पर करों का बोझ लाद दिया गया है। इस हमले की सबसे बुरी मार कर्मचारियों, मेहनतकशों विशेषकर ठेका मजदूरों पर पड़ रही है। श्रम सुधारों के नाम पर कानूनों द्वारा उन्हें मिले अधिकारों और सुविधाओं को खत्म किया जा रहा है। पूंजी की तानाशाही के विरूद्ध पूरे क्षेत्र में कानून के राज की स्थापना करने के लिए मजदूरों, किसानों, छोटे-मझोले व्यापारियों व उद्योग धन्धों वालों और कर्मचारियों व मध्य वर्ग की संयुक्त ताकत का निर्माण करने में ठेका मजदूरों का यह सम्मेलन मदद करेगा। यह बातें आज अनपरा में आयोजित ठेका मजदूर यूनियन के पंद्रहवें जिला सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहीं। 
उन्होंनें कहा कि अनपरा और ओबरा तापीय परियोजनाओं को बड़े पूंजी घरानों के लाभ के लिए बर्बाद करने में खुद सरकार ही लगी हुई है। ओबरा की ज्यादातर इकाईयां बंद की जा चुकी है और सबसे सस्ती और कभी तो सौ प्रतिशत से ज्यादा पीएलएफ देने वाली अनपरा परियोजना में थर्मल बैकिंग करायी जा रही है। अनुरक्षण और रूटीन मैनटीनेंस के कार्यो में आवंटित बजट में लगातार कटौती की जा रही है। पिछले दो सालों में करीब एक अरब रूपए से ज्यादा इन परियोजनाओं में हुए कामों का बकाया सरकार पर है, जिसका भुगतान नहीं किया गया। परिणामस्वरूप मजदूरों की छटंनी हो रही है, मजदूरी भुगतान कानून और ठेका मजदूर कानून में माह की हर सात तारीख तक वेतन भुगतान करने के नियमों के बावजूद पांच-पांच माह से और कुछ जगहों पर तों सालभर से मजदूरों के वेतन का भुगतान नहीं किया गया है। मजदूरों से काम कराकर वेतन का भुगतान न करना बंधुआ मजदूरी है और संविधान में प्रदत्त जीने के मूल अधिकार का हनन है।
उन्होंने अखबारों के हवाले से लैकों तापीय परियोजना के बंद होने की आयी खबरों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदेश सरकार को तत्काल इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लैंकों पर आए संकट से यह स्पष्ट है कि सरकार का निजीकरण का प्रयोग विफल साबित हुआ है इसलिए सरकार को लैंकों के बंद होने की स्थितियों में इसे अधिग्रहित करना चाहिए और इसमें कार्यरत कर्मचारियों व संविदा श्रमिकों के रोजगार की सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए।
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Thursday, 15 February 2018

लखनऊ भाकपा का 23 वां ज़िला सम्मेलन सम्पन्न

लखनऊ,15 फरवरी 2018 
आज भाकपा, लखनऊ का 23 वां ज़िला सम्मेलन 22, क़ैसर बाग स्थित पार्टी कार्यालय पर सम्पन्न हुआ। सम्मेलन का संचालन कामरेड ओ पी अवस्थी तथा अध्यक्षता कामरेड फूलचंद यादव,कामरेड आशा मिश्रा, कामरेड अशोक सेठ  आदि के एक अध्यक्ष मण्डल ने की। कामरेड अशोक मिश्रा,कामरेड डॉ गिरीश, कामरेड अरविंद राज स्वरूप की मंच पर विशेष उपस्थिती थी। 
जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ द्वारा तीन वर्षीय रिपोर्ट को सर्व - सम्मति से पारित किया गया। उनके द्वारा प्रस्तुत 21 सदस्यीय ज़िला काउंसिल,दो उम्मीदवार सदस्यों व पाँच विशेष आमंत्रित सदस्यों के पेनल को भी सर्व - सम्मति से स्वीकार किया गया। 
नव - निर्वाचित ज़िला काउंसिल की पहली बैठक कामरेड परमानंद की अध्यक्षता मे सम्पन्न हुई। इस बैठक में निवर्तमान ज़िला मन्त्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ ने नए जिलमंत्री के रूप में कामरेड परमानंद दिवेदी का नाम प्रस्तावित किया जिसे करतल ध्वनि के साथ सर्व - सम्मति से स्वीकार किया गया। कामरेड ख़ालिक़ के प्रस्ताव पर सहायक सचिव के रूप में कामरेड रामपाल गौतम व कामरेड राम इकबाल उपाध्याय, कार्यालय सचिव पद पर कामरेड ओ पी अवस्थी  एवं कोषाध्यक्ष पद पर कामरेड परमानंद को सर्व -  सम्मति से  निर्वाचित किया गया। 
नए जिलामंत्री कामरेड पी एन दिवेदी ने निवर्तमान जिला मंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ के सफल कार्यकाल की चर्चा की और कामरेड ख़ालिक़ ने अपने अनुभवों का उनको सहयोग देते रहने का आश्वासन दिया। दोनों सह - सचिवों ने भी कामरेड दिवेदी को पूर्ण सहयोग करने का आश्वासन दिया।
कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ के प्रस्ताव पर मुझे भी ज़िला काउंसिल में स्थान दिया गया है। मैंने जो अनुभव किया वह यह है कि, 21 सदस्यीय ज़िला काउंसिल में कम से कम 7 सदस्य ब्राह्मण हैं अर्थात 33 प्रतिशत और पदाधिकारियों में पाँच में से चार पदाधिकारी अर्थात 80 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। सम्मेलन में पार्टी को जनता तक फैलाने के विचार प्रदेश सचिव डॉ गिरीश ने दिये थे किन्तु संगठन के ब्राह्मण वादी स्वरूप से जनता तक पार्टी की नीतियों के पहुँचने के आसार न के बराबर हैं। यदि प्रदेश व केंद्र में भी पार्टी नेतृत्व पर ब्राह्मण वादी वर्चस्व बना रहता है तब इसके जनता के बीच पकड़ बनाने की संभावनाओं को धक्का लगेगा। 1925 में स्थापित सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के कारण ( राहुल गांधी वाली कांग्रेस का गठन 1969 में उनकी दादी इन्दिरा गांधी ने किया था जबकि, 1885 में स्थापित कांग्रेस 1977 में जनता पार्टी में विलीन हो चुकी है ) भाकपा को जो प्रथम आम चुनावों में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी और केरल में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से सत्तारूढ़ रह चुकी है लोकप्रिय होने के लिए ब्राह्मण वाद के लबादे को उतार फेंकने की नितांत आवश्यकता है। अन्यथा जनता का विश्वास हासिल करना पार्टी के लिए टेढ़ी खीर रहेगा। कामरेड अरविंद राज स्वरूप द्वारा सम्मेलन में व्यक्त यह दृढ़ विश्वास कि, आगामी लोकसभा चुनावों में फासिस्ट भाजपा सरकार का पतन सुनिश्चित है तो ज़रूर सफल होगा परंतु उसका लाभ ब्राह्मण वाद की छाया से ग्रसित पार्टी को भी मिल सकेगा अथवा नहीं यह अनिश्चित है।  

Friday, 9 February 2018

क्या कम्यूनिष्ट पार्टीयो का एकमात्र कार्ये जन्तर मन्तर पर प्रदर्शन करना रह गया है ? ------ Ameer Haider

संत कबीर आदि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद आदि महा पुरुषों ने धर्म की विकृतियों तथा पाखंड का जो पर्दाफ़ाश किया है उनका सहारा लेकर भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं -भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है.   







Saturday, May 14, 2011

वैदिक मत के अनुसार मानव कौन ?


त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,
भद्र भावना-भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन'है.
होता व्यय नित-प्रति पर -हित में,जिसका शुची संचित 'धन'है,
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है.



इसी को आधार मान कर महर्षि कार्ल मार्क्स द्वारा  साम्यवाद का वह सिद्धान्त प्रतिपादित  किया गया जिसमें मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने का मन्त्र बताया गया है. वस्तुतः मैक्स मूलर सा : हमारे देश से जो संस्कृत की मूल -पांडुलिपियाँ ले गए थे और उनके जर्मन अनुवाद में जिनका जिक्र था महर्षि कार्ल मार्क्स ने उनके गहन अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाले थे उन्हें 'दास कैपिटल' में लिपिबद्ध किया था और यही ग्रन्थ सम्पूर्ण विश्व में कम्यूनिज्म  का आधिकारिक स्त्रोत है.स्वंय मार्क्स महोदय ने इन सिद्धांतों को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार लागू करने की बात कही है ;परन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें लागू करते समय इस देश की परिस्थितियों को नजर-अंदाज कर दिया गया जिसका यह दुष्परिणाम है कि हमारे देश में कम्यूनिज्म को विदेशी अवधारणा मान कर उसके सम्बन्ध में दुष्प्रचार किया गया और धर्म-भीरु जनता के बीच इसे धर्म-विरोधी सिद्ध किया जाता है.जबकि धर्म के तथा-कथित ठेकेदार खुद ही अधार्मिक हैं परन्तु हमारे कम्यूनिस्ट साथी इस बात को कहते एवं बताते नहीं हैं.नतीजतन जनता गुमराह होती एवं भटकती रहती है तथा अधार्मिक एवं शोषक-उत्पीडक लोग कामयाब हो जाते हैं.आजादी के ६३ वर्ष एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन की स्थापना के ८६ वर्ष बाद भी सही एवं वास्तविक स्थिति जनता के समक्ष न आ सकी है.मैंने अपने इस ब्लॉग 'क्रान्तिस्वर' के माध्यम से ढोंग,पाखण्ड एवं अधार्मिकता का पर्दाफ़ाश  करने का अभियान चला रखा है जिस पर आर.एस.एस.से सम्बंधित लोग तीखा प्रहार करते हैं परन्तु एक भी बामपंथी या कम्यूनिस्ट साथी ने उसका समर्थन करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है.'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता'  परन्तु कवीन्द्र रवीन्द्र के 'एक्ला चलो रे ' के तहत मैं लगातार लोगों के समक्ष सच्चाई लाने का प्रयास कर रहा हूँ -'दंतेवाडा त्रासदी समाधान क्या है?','क्रांतिकारी राम','रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','सीता की कूटनीति का कमाल','सर्वे भवन्तु सुखिनः','पं.बंगाल के बंधुओं से एक बे पर की उड़ान','समाजवाद और वैदिक मत','पूजा क्या?क्यों?कैसे?','प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है -यह दुनिया अनूठी है' ,समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स,१८५७ की प्रथम क्रान्ति आदि अनेक लेख मैंने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित अभिमत के अनुसार प्रस्तुत किये हैं जो संतों एवं अनुभवी विद्वानों के वचनों पर आधारित हैं.

मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.कविवर नन्द लाल जी यही कहते हैं :-

जिस नर में आत्मिक शक्ति है ,वह शीश झुकाना क्या जाने?
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है वह पाप कमाना क्या जाने?
माँ -बाप की सेवा करते हैं ,उनके दुखों को हरते हैं.
वह मथुरा,काशी,हरिद्वार,वृन्दावन जाना क्या जाने?
दो काल करें संध्या व हवन,नित सत्संग में जो जाते हैं.
भगवान् का है विशवास जिन्हें दुःख में घबराना क्या जानें?
जो खेला है तलवारों से और अग्नि के अंगारों से .
रण- भूमि में पीछे जा के वह कदम हटाना क्या जानें?
हो कर्मवीर और धर्मवीर वेदों का पढने वाला हो .
वह निर्बल दुखिया बच्चों पर तलवार चलाना क्या जाने?
मन मंदिर में भगवान् बसा जो उसकी पूजा करता है.
मंदिर के देवता पर जाकर वह फूल चढ़ाना क्या जानें?
जिसका अच्छा आचार नहीं और धर्म से जिसको प्यार नहीं.
जिसका सच्चा व्यवहार नहीं 'नन्दलाल' का गाना क्या जानें?

संत कबीर आदि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद आदि महा पुरुषों ने धर्म की विकृतियों तथा पाखंड का जो पर्दाफ़ाश किया है उनका सहारा लेकर भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं -भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है.  

http://krantiswar.blogspot.in/2011/05/blog-post_14.html

   

Sunday, 28 January 2018

यह बाजार है.......... मुक्त बाजार...जो ही अनेक अर्थों में वास्तविक जंगल राज है .......... ------ हेमंत कुमार झा

 ऐसे दौर में, जब बाजार की शक्तियां ही नियामक की भूमिका में हों, प्रतिभाओं और परिश्रम का शोषण स्वाभाविक नियति है।
Hemant Kumar Jha
वे कहते हैं कि इस देश के 75 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्नातक नौकरी पाने के काबिल नहीं। 
ऐसा कह कर वे पहले बेरोजगार इंजीनियरों का मनोबल तोड़ते हैं, फिर उन्हें समाज की नजरों में शर्मसार करते हैं और परिवार के प्रति उनके मन में अपराध बोध पैदा करते हैं।
उसके बाद वे अपनी कंपनियों के लिये विज्ञापन जारी करते हैं।
इंटरव्यू में ऐसे पेश आते हैं जैसे वे स्पेसक्राफ्ट बनाने के लिए भर्त्ती कर रहे हों। पहले से ही शर्मसार और टूटे मनोबल वाले बहुत सारे अभ्यर्थी हकलाने लगते हैं, बिखरने लगते हैं। 
वे अभ्यर्थियों की इस बेचारगी का फायदा उठाते हैं। उन्हें इतने कम वेतन का ऑफर देते हैं कि नौकरी के लिये विकल व्यक्ति भी सन्न रह जाता है। लेकिन, उसके पास और कोई चारा नहीं होता। वह 10 हजार, 12 हजार प्रतिमास पर भी तैयार हो जाता है।
उसके बाद शुरू होता है अंतहीन शोषण का सिलसिला। बेहद कम वेतन, बहुत अधिक काम। 
इंजीनियरों की मेहनत से कंपनियां फलती हैं, फूलती हैं। मुनाफा बढ़ता जाता है, लेकिन, बढ़ते मुनाफे के अनुपात में वेतन बढ़ने का कोई सवाल नहीं। कोई प्रतिरोध नहीं कर सकता। 
मुक्त बाजार में भारत के सामान्य इंजीनियरिंग स्नातकों की यही नियति है।
कोई इंजीनियर या तो नौकरी के लायक है या फिर नहीं है। अगर नहीं है तो आप उसे नौकरी मत दो। लेकिन, यह कैसे हो सकता है कि कोई इंजीनियर 10-12-15 हजार के वेतन के लायक समझा जाए? आखिर, इनकी मेहनत की भी बड़ी भूमिका है कि कंपनी का उत्पादन बढ़ता गया, व्यापार बढ़ता गया, मुनाफा बढ़ता गया।
लेकिन, यह बाजार है। मुक्त बाजार...जो ही अनेक अर्थों में वास्तविक जंगल राज है। 
जितने इंजीनियर्स की मांग है, उससे बहुत अधिक की आपूर्त्ति होती रही। तय मानकों की परवाह किये बिना प्राइवेट संस्थान खुलते गए। अधिकांश के शिक्षण में गुणवत्ता का नितांत अभाव।
स्नातकों की भीड़ बढ़ती गई। बेरोजगारी का आलम पसरता गया।
इंजीनियरिंग जैसा प्रतिष्ठित कोर्स समाज में सम्मान खोता गया। आखिर, हर कोई आईआईटी में तो जा नहीं सकता। इनकी संख्या कम है, सीटें सीमित हैं। कुछ खास प्राइवेट संस्थान भी गुणवत्ता के मानकों पर खरे उतरते हैं। बाकी तो...क्या सरकारी, क्या प्राइवेट, गुणवत्ता से दूर दूर तक मतलब नहीं। सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों की बदहाली के अपने कारण हैं। नियमित शिक्षकों की नितांत कमी और आधारभूत संरचना का अभाव उनके छात्रों की पढ़ाई पर बेहद बुरा असर डालता है। जैसे तैसे डिग्री लेकर निकले इनके अधिकांश स्नातक रोजगार की प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं।
किसी का मनोबल तोड़ना है तो योजनाबद्ध तरीके से उसका सम्मान छीनो। भविष्य के प्रति असुरक्षा का भाव पैदा करो उसमें। वह टूटेगा...फिर वह तुम्हारे कदमों पर गिरेगा...तुम्हारी ही शर्त्तों पर। उद्योगपतियों का यह आजमाया फार्मूला है।
एसोचैम अपने सम्मेलनों में जोर-शोर से यह प्रचारित करता है कि भारत के तीन चौथाई से भी अधिक इंजीनियरिंग स्नातक किसी लायक नहीं। 
'एसोचैम'...यानी "Associated Chambers of Commerce and Industry" (ASSOCHAM), यानी "भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल"। भारत की एक लाख से अधिक कम्पनियां इसकी सदस्य हैं।
इन्हीं कंपनियों का राज है देश में। इन्हें कोई यह नहीं पूछता कि जिन्हें आपने नियुक्त किया है वे अगर अयोग्य थे तो उन्हें रखा ही क्यों। अगर रखा है तो अपने काम के लायक ही समझ कर रखा। तो फिर, जिन्हें इंजीनियर माना, जिन्हें काम पर रखा, उन्हें इतना अल्प वेतन क्यों?
यह मुनाफा का शास्त्र है। इस शास्त्र में शोषण सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। शोषण का चक्र चलाते रहने के लिये मनोवैज्ञानिक असर डालना होता है, ताकि लोग इसके साथ जीने के लिये तैयार हों।
दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार इंजीनियर भारत में हैं। इस देश के आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ इसके शिक्षा तंत्र का कोई तालमेल नहीं। लचर तंत्र प्रतिभाओं की कत्लगाह साबित होता है, और, अपमानित, शोषित होते हैं वे, जिन्हें सही पढ़ाई मिलती तो किसी से कम नहीं रहते। 
ये किसानों के बेटे/बेटियां हैं, जिनके पिता ने उनकी पढ़ाई के लिये जमीन बेची, ये निम्न मध्यवर्गीय नौकरीपेशा वालों के बेटे/बेटियां हैं, जिन्होंने उनकी पढ़ाई के लिये लोन लिये, अपने सपने त्यागे और बच्चों के भविष्य के लिये अपनी हैसियत दांव पर लगा दी। 
मुक्त बाजार में अगर नियामक तंत्र प्रभावी नहीं हो तो बाजार की शक्तियां शोषण के कीर्त्तिमान स्थापित करती हैं। 10-12 हजार पर इंजीनियरों से काम लेना ऐसा ही कीर्त्तिमान है, जिसकी मिसाल दुनिया में अन्य किसी देश में शायद ही मिले।
लेकिन, ऐसे दौर में, जब बाजार की शक्तियां ही नियामक की भूमिका में हों, प्रतिभाओं और परिश्रम का शोषण स्वाभाविक नियति है।

https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/1533889100052331

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31-01-2018 

Friday, 19 January 2018

मानवता की रक्षा के लिए साम्राज्यवादी कुचक्र को विफल करना होगा ------ अतुल अंजान


वामपंथी दलों की ओर से इज़राईली प्रधानमंत्री के आगमन पर जोरदार विरोध किया गया जिसमें बोलते हुये भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान ने विश्व में फैलते साम्राज्यवाद के खतरों के प्रति आगाह किया। उन्होने बताया कि, सम्पूर्ण विश्व में लोकतन्त्र व मानवता की समर्थक शक्तियाँ साम्राज्यवाद से सतत संघर्ष कर रही हैं और यह विरोध भी उसी कड़ी में है।

कुछ लोग और विशेषकर भारत में सत्तारूढ़ भाजपा समर्थक कम्यूनिज़्म का मज़ाक उड़ाते हुये इसे खत्म हुआ बताते हैं। पोलिटिकल साईन्स के प्रोफेसर तैमुर रहमान साहब द्वारा ऐसे लोगों की आशंका को निर्मूल सिद्ध किया है ------


Thursday, 4 January 2018

विकास इंसान और इंसानियत के विकास के लिए नहीं : बाज़ार का विकास ------ Sunita B Moodee

Sunita B Moodee