Friday, 1 December 2017

संगठन कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का किया गया या कि सर्वहारा का ! ------ Virendra Kumar

जो पार्टियाँ या कार्यकर्ता यह मानते हैं कि उनकी पार्टी को सत्ता प्राप्त करना है चाहे वह बुलेट से चाहते हों या बैलॉट से, वह क्रांतिकारी या मार्क्सवादी नहीं हो सकते हैं.

Virendra Kumar
कम्युनिस्ट या सर्वहारा! : 
कम्युनिस्ट पार्टियाँ एवं उनके नेता एवं कार्यकर्ता मुगालते में हैं कि वह कम्युनिस्ट क्रांति का कार्य कर रहे हैं. जो पार्टियाँ या कार्यकर्ता यह मानते हैं कि उनकी पार्टी को सत्ता प्राप्त करना है चाहे वह बुलेट से चाहते हों या बैलॉट से, वह क्रांतिकारी या मार्क्सवादी नहीं हो सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति का एक ही कार्य होता है जिसे किसी ने नहीं किया और जो कर रहे थे उन्होंने छोड़ दिया. वह कार्य था सर्वहारा आंदोलन (सर्वहारा के संघर्ष) को आगे ले जाना.
अगर वो ऐसा करते तो सर्वहारा लगातार बड़ी से बड़ी संख्या में संगठित होती जाती और संगठन एवं संघर्षों (वर्ग-हित के संघर्षों) के कारण उनमें राजनीतिक चेतना का विकास होता जाता और वर्गीय चेतना के कारण वह एक विशाल वर्ग में तब्दील हो जाते. तब वह चुनावों में जीत कर अपनी सत्ता कायम करते और अपने को शासक वर्ग के रूप में तब्दील कर देते. जो नहीं हो सका. जैसा मैने समझा है मार्क्सवाद के मुताबिक क्रांति का सारांश लोगों को सर्वहारा के वर्ग-हित के आधार पर संगठित करने में निहित है.
सारे के सारे कम्युनिस्ट भूल गये कि कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में राज्य के बारे में क्या लिखा है. वहाँ सर्वहारा के प्रतिनिधि के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता नहीं लिखा है बल्कि लिखा है - 'शासक वर्ग के रूप में संगठित सर्वहारा'. मार्क्सवाद तो मानता है कि प्रतिनिधियों की सत्ता, चाहे जिस किसी रूप में हो, उसका चरित्र बुर्जुआ ही होता है. सर्वहारा क्रांति के बाद, बुर्जुआ से छीन कर, उत्पादन के सारे साधन राज्य यानि संगठित सर्वहारा के हाथों में केंद्रित करना है न कि राज्य यानि सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में.
अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा? कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो के मुताबिक वर्गों एवं वर्ग शत्रुता वाले पुराने बुर्जुआ समाज की जगह होगा - एक अशोसिएशन जिसमें सबों के विकास की शर्त होगी प्रत्येक का विकास.
आप सभी जानते हैं कि ऐसा हुआ या नहीं या क्या हुआ, सत्ता कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथों गई या सर्वहारा के हाथों में, संगठन कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का किया गया या कि सर्वहारा का. मेरी आलोचना तीखी है, बहुतों को बुरा लग सकता है. किंतु मैंने उनकी नियत पर चोट नहीं किया है. वह काफ़ी अच्छे लोग हैं. उनमें सच्चाई (भूल) स्वीकार करने का साहस होना चाहिए.
Excerpts from Communist Manifesto:
… … …
“We have seen above, that the first step in the revolution by the working class is to raise the proletariat to the position of ruling class to win the battle of democracy.”
“The proletariat will use its political supremacy to wrest, by degree, all capital from the bourgeoisie, to centralise all instruments of production in the hands of the State, i.e., of the proletariat organised as the ruling class; and to increase the total productive forces as rapidly as possible.”
… … …
“When, in the course of development, class distinctions have disappeared, and all production has been concentrated in the hands of a vast association of the whole nation, the public power will lose its political character. Political power, properly so called, is merely the organised power of one class for oppressing another. If the proletariat during its contest with the bourgeoisie is compelled, by the force of circumstances, to organise itself as a class, if, by means of a revolution, it makes itself the ruling class, and, as such, sweeps away by force the old conditions of production, then it will, along with these 
conditions, have swept away the conditions for the existence of class antagonisms and of classes generally, and will thereby have abolished its own supremacy as a class.”
“In place of the old bourgeois society, with its classes and class antagonisms, we shall have an association, in which the free development of each is the condition for the free development of all.”

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Thursday, 30 November 2017

किसान मुक्ति संसद : खेत, किसान और देश को बचाने का संकल्प





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Virendra Kumar
प्रत्येक वर्ष देश के एक बड़े हिस्से में पीने के पानी की कमी होती है, उससे बड़े हिस्से में सुखाड़ होता है और उससे भी बड़े हिस्से में बाढ़ की समस्या होती है. इससे भारी मात्रा में संपत्ति का नुकसान होता है और बड़ी संख्या में लोग मरते हैं. अगर बाढ़ के पानी को नियंत्रित कर, उस पानी को सुखाड़ एवं पानी की कमी वाले क्षेत्र में भेजने की व्यवस्था कर बाढ़ की समस्या का समाधान किया जाता, तो बाकी दोनों समस्याओं का स्वतः निदान हो जाता. बड़े-बड़े अंडरग्राउंड एवं ओवरहेड स्टोरेज का तथा रेलवे ट्रैक के बगल में चौड़े नहरों का निर्माण कर यह आसानी से किया जा सकता था. किंतु हमारी सरकारों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया, क्योंकि सरकार एवं प्रशासन को अपने ग़लत लाभ के लिए राहत बाँटने में ज़्यादा रूचि है. इससे स्पष्ट होता है कि सरकार, चाहे वह किसी पार्टी की हो, लोगों के प्रति कितना संवेदनशील है.
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Wednesday, 29 November 2017

communist parties world over became victim of losing direction ------ Virendra Kumar


farmers lacked consciousness for socialism.

PROLETARIAT NEVER BECAME THE RULING CLASS IN RUSSIA  :
After revolution in Russia, Lenin committed several mistakes. One was nationalization of total land in one stroke. It was neither possible to take control of the whole of the land at once, nor to use them at once for new mode of production. There is suggestion, in the Communist Manifesto, for gradual take over. This step of Lenin filled insecurity in the mind of farmers and their support could not be secured. Till then farmers lacked consciousness for socialism.
Another big mistake was to hold election of the constituent assembly and after election, dissolution of the same within two days of its sittings and thereafter in the period of Lenin, neither election was held again not any constitution was framed and the rule was carried out through decree instead of law. People’s participation in state matters never occurred. There, dictatorship was established not of the proletariat but of the communist party.
After the revolution, the first task before Lenin was to organize the proletariat/people and to make the proletariat the ruling class, only thereafter, establishing socialism should have begun and could have begun. But the reverse was done there. Due to absence of consciousness, its effect started growing adverse to the revolution. Full democracy, which would have been established due to the proletariat becoming the ruling class, which would have been more democratic than the bourgeois democracy, was never established in Russia. Proletariat never became the ruling class, that’s why socialism was never established there and there was no question of that kind of state system becoming sustainable.
The dictatorial system of Russia created fear in the mind of European people that after the socialist revolution, they will have to lose freedoms that they had already got; for which they were not ready. And the Russian revolution, instead of proving to be a signal for the world revolution, became a check-post for the world revolution. And communist parties world over, instead of taking lessons from those mistakes, remained praising and became victim of losing direction.


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रूस में सर्वहारा कभी भी शासक वर्ग नहीं बना
रूस में क्रांति के बाद लेनिन ने कई गल्ति किए. एक था पूरे ज़मीन का एकबारगी राष्ट्रीयकरण. न तो एकबारगी पूरे ज़मीन को नियंत्रण में लेना संभव था और नाहीं उनका उपयोग एकबारगी नये ढंग के उत्पादन के लिए ही संभव था. कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में सूझाव भी है धीरे-धीरे राष्ट्रीयकरण का. लेनिन के इस कदम से किसानों में असुरक्षा का भाव घर कर गया और उन्हें उनका समर्थन नहीं प्राप्त हुआ. किसानों में तब तक समाजवाद के लिए जागरूकता की कमी थी.
एक और बड़ी गल्ति थी संविधान सभा का चुनाव कराना और चुनाव के बाद बैठक शुरू होने के बाद दो दिनों में ही संविधान सभा को भंग कर देना और फिर पूरे लेनिन काल में कभी न तो चुनाव कराया गया और न कोई संविधान बना और शासन क़ानून की जगह डिक्री के माध्यम से चलाया गया. शासन में लोगों की भागीदारी नहीं बनी. वहाँ तानाशाही सर्वहारा की नहीं बनी बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी की बनी.
क्रांति के बाद लेनिन का पहला कार्य-भार था सर्वहारा/लोगों को संगठित कर सर्वहारा को शासक वर्ग बनाना. उसके बाद ही समाजवाद का निर्माण शुरू करना था और किया जा सकता था. बल्कि वहाँ उल्टा किया गया. जागरूकता के अभाव में उसका असर क्रांति के खिलाफ बनता गया. और सर्वहारा वर्ग के शासक वर्ग बनने से जो पूर्ण जनवाद बनता, जो निश्चित रूप से बुर्जुआ लोकतंत्र से ज़्यादा लोकतांत्रिक होता, रूस में कभी नहीं बन सका. सर्वहारा कभी भी शासक वर्ग नहीं बना, इसलिए वहाँ कभी भी समाजवाद का निर्माण नहीं हो सका और वैसी व्यवस्था के स्थायी होने का प्रश्न ही नहीं था.
रूस की उस तानाशाही व्यवस्था का यूरोप के लोगों पर यह असर हुआ कि वह भयभीत हो गये कि जो स्वतंत्रता उन्हे प्राप्त था, वह उन्हे समाजवादी क्रांति के बाद खोना पड़ेगा, जिसके लिए वह तैयार नहीं थे. और रूस की क्रांति विश्व क्रांति का संकेत साबित होने के बदले विश्व क्रांति का चेक-पोस्ट बन गया. और विश्व भर में तमाम कम्युनिस्ट पार्टियाँ, बजाय उन गल्तियों से सबक लेने के बजाय गुणगान करते रहे और दिशाहीनता के शिकार हो गये.
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Tuesday, 28 November 2017

वाद-विवाद की विशेष क्षमता के वाहक होमी दाजी ------ मसऊद अख्तर , जनचौक

 होमी दाजी   (05-09-1926--- 14-05-2009)

                                                        



एक मालिक जिसने चुना मजदूरों का पक्ष
हमारे नायक , , रविवार , 26-11-2017
****** मसऊद अख्तर 
                                                           होमी दाजी

                                                         (1926-2009)

कॉमरेड होमी दाजी का जन्म एक पारसी परिवार में 5 सितम्बर, 1926 को तत्कालीन बम्बई में हुआ था। उनके जन्म के समय उनके पिता के पास एक कॉटन गिनिंग मिल थी। परन्तु जब 1930 के दशक की मंदी ने भारत में अपना असर दिखाया तो दाजी का परिवार भी इसकी चपेट में आ गया और आर्थिक रूप से तबाह हो गया। इस पूंजीवादी संकट ने दाजी के बचपन में ही उनके परिवार को आर्थिक विपन्नता में ला दिया।

कुछ दिनों बाद होमी दाजी का परिवार बम्बई से इंदौर आ गया और होमी ने सेंट राफेल स्कूल में अपनी शिक्षा आरम्भ की, जो इंदौर का सर्वोत्तम स्कूल में गिना जाता था। उन्होंने मैट्रिक परीक्षा की तैयारी अपने दोस्तों से पुस्तकें उधार मांग कर की। कॉलेज में भी जब यह समस्या बरकरार रही तो होमी दाजी ने एक किताब की दुकान से करार किया कि वे दुकान के लिए पाठ्य पुस्तकों के आर्डर लायेंगे और पुस्तकें ग्राहकों के सुपुर्द करने का भी काम करेंगे और इसके बदले में उन्हें उस पुस्तक की दुकान में बैठकर उन्हें पुस्तकें पढ़ने की अनुमति दी जायेगी। यह उनका असाधारण अध्यवसाय ही था जिसके कारण होमी दाजी इतिहास की स्नातकोत्तर डिग्री प्रथम श्रेणी में (आगरा विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान) प्राप्त किया और इसके बाद उन्होंने कानून की डिग्री भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 

होमी का प्रारम्भिक जीवन बहुत हद तक उनकी माता से प्रभावित था। वह बहुत साहसी महिला थीं। सभी कठिनाइयों के बावजूद उन्हें विश्वास था कि होमी की शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपेक्षा की थी कि उनका प्रतिभाशाली पुत्र परिवार में आर्थिक सुख समृद्धि वापस लाएगा, परन्तु जब होमी ने व्यवस्था में बदलाव करने के जीवनपर्यंत संघर्ष को अपनाया तो उन्होंने इसे भी ख़ुशी से स्वीकार कर लिया और हर संभव सहायता भी प्रदान किया।

होमी का राजनीतिक कैरियर बहुत ही कम उम्र में ही शुरू हो गया। 16 वर्ष की अल्प आयु में उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के अंतर्गत इंदौर में आयोजित प्रदर्शन में भाग लिया। वे पुलिस द्वारा एक बार बहुत बुरी तरह पीटे भी गए। 1943 में वह अखिल भारतीय छात्र परिसंघ में शामिल हो गए। जब 1945 में कांग्रेस, छात्र परिसंघ से बाहर चली गयी तो कॉमरेड दाजी साम्यवादी वर्ग के साथ हो गए। 1 मई 1946 को कॉमरेड दाजी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और उन्हें श्रमिक वर्ग के आन्दोलन का प्रभारी बनाया गया।

इंदौर एक महत्वपूर्ण कपड़ा केंद्र था। शहर में सात संयुक्त कॉटन मिलें थीं, जिनमें लगभग 30,000 श्रमिक काम करते थे। जब दाजी पार्टी में शामिल हुए ठीक उसी समय कपड़ा मिलों में 12 दिनों की हड़ताल हुई। वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी हुई और दाजी को इस आन्दोलन का चार्ज लेना पड़ा। उन्होंने श्रमिक वर्ग की कॉलोनियों और मिलों के दरवाजों पर अनेक सभाओं को संबोधित किया। होमी बहुत ही सशक्त वक्ता थे और शीघ्र ही मिल श्रमिकों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए।
कलकत्ता में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी दूसरी बैठक (28 फरवरी – 6 मार्च, 1948) में एक उग्रपंथी राजनीतिक अभिधारणा अपनाई। परिणामस्वरूप अनेक प्रांतीय सरकारों ने पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस पर इंदौर में भी होलकर सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इसके अनेक नेता भूमिगत हो गए। यह प्रतिबन्ध गणतंत्र दिवस के दिन 26 जनवरी 1950 को हटाया गया। उसी वर्ष कॉमरेड दाजी को मई दिवस समारोह में भाग लेने के लिए एटक के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में मास्को भेजा गया।

1950 के दशक में दो छात्र आंदोलनों से दाजी निकटता से जुड़े थे। ग्वालियर में छात्रों नें 1950 में आन्दोलन किया और वहां गोलिया चलीं। कॉमरेड दाजी ने जांच आयोग के समक्ष छात्रों की ओर से मामले पर बहस की। पुनः 1954 इंदौर में छात्र आन्दोलन हुआ और इस बार फिर पुलिस ने गोली चलाई और निर्दोष छात्र मारे गए। इस माले की जांच करने के लिए वांचू आयोग का गठन किया गया। दाजी ने इस मामले में भी छात्रों की जोरदार पैरवी की।

1957 में दाजी को मध्य प्रदेश विधान सभा में चुन लिया गया। श्रमिकों को बिना किसी स्पष्टीकरण मांगे नौकरी से बर्खास्त करने व उत्पीड़न के खिलाफ दाजी ने भोपाल में सरकार के सामने आन्दोलन की अगुवाई की जिसमें 200 – 300 तक मजदूरों की एक साइकिल रैली इंदौर से भोपाल तक आयोजित की गयी। 1958 में दाजी को टेक्सटाइल मिल वर्कर्स यूनियन का सचिव चुन लिया गया। ट्रेड यूनियन के मोर्चे पर कम्युनिस्ट नेतृत्व की गतिशीलता ने सरकार को हतोत्साहित कर दिया। वर्ष 1960 में मध्य प्रदेश औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम पारित किया गया। यह अधिनियम बम्बई औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम, 1946 के पैटर्न पर बनाया गया था। इस अधिनियम के अनुसार केवल प्रतिनिधि यूनियन को ही यह अधिकार था कि वह मजदूरों की ओर से प्रबंधन के साथ वार्ता कर सकें। इंटक को कपड़ा मिलों का प्रतिनिधि यूनियन बनाया गया और प्रबंधन के साथ सीधी बातचीत करने के लिए एटक की संभावना ही समाप्त कर दी गयी। परन्तु यह सरकारी बाधा एटक की स्थिति को कम करने में बाधक बनने में सफल न हो सकी। हालांकि मजदूरों ने इंटक की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की, परन्तु उनकी मांगों को एटक द्वारा भी उठाया गया। एटक द्वारा बड़ी हड़तालों की योजना बनायी गई और बहुत बार प्रबंधन को इंटक के प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले गैर-आधिकारिक रूप से एटक के साथ भी समझौता करना पड़ा। कॉमरेड दाजी के नेतृत्व में कपड़ा मिल के मजदूरों द्वारा किये गए कुछ प्रमुख आन्दोलन निम्न हैं; 

1. कताई विभाग में एक वर्कर को दो करघों का चार्ज दिया गया था। 1964 में हुकुमचंद मिल ने निर्णय लिया कि एक वर्कर को 4 करघों का चार्ज देकर वर्कलोड को बढ़ाया जाए। इसका अर्थ था कि आधी जनशक्ति की छंटनी की जाएगी और शेष आधी जनशक्ति पर अनुचित रूप से कार्यभार बढ़ा दिया जाएगा। इसके खिलाफ कॉमरेड दाजी और वर्कर 14 दिन की भूख हड़ताल पर गए।

2. 1972 में राज्य में सभी कपड़ा मिलों में हड़ताल का आह्वान किया गया। इंदौर में दस दिन की एक सफल हड़ताल की गई, जिसमें मजदूरों की मांग मान ली गयी। कपड़ा मजदूरों के लिए सात दिन की आकस्मिक छुट्टी स्वीकृत की गई। मजदूरों को मूल्य सूचकांक के साथ जुड़े महंगाई भत्ते को मान लिया गया।

3. 1979 में कपड़ा मिलों में 32 दिन की एक सफल हड़ताल की गयी जिसमें वेतन संशोधन की मांग की गयी थी।

4. 1984 में होप टेक्सटाइल मिल ने एक गैर कानूनी तालाबंदी की घोषणा की। कॉमरेड दाजी द्वारा 8 घंटे की एक भूख हड़ताल की गई। प्रबंधन को न केवल मिल खोलने के लिए ही बाध्य नहीं किया गया बल्कि मजदूरों की भविष्य निधि भी सार्वजनिक भविष्य निधि लेखा में शामिल की गयी।
1960 से लघु उद्योग इकाइयां इंदौर के पोलो ग्राउंड औद्योगिक क्षेत्र में आ गईं। एटक ने इस नए औद्योगिक क्षेत्र में अपने संगठनात्मक कार्यों को फैलाया। 100 से कम मजदूरों वाली लघु उद्योग इकाइयों में प्रतिनिधि यूनियन का उपबंध लागू नहीं था जिसने ट्रेड यूनियन की गतिविधियों के लिए अच्छा दायरा प्रदान किया। 

एटक की इंदौर इकाई को वर्कर-प्रबंधन वार्ता के मुकाबले एक बड़े क्षेत्र में ट्रेड यूनियन की गतिविधियां फैलाने का श्रेय जाता है। इस दिशा में कॉमरेड दाजी का योगदान बहुत अधिक था। एक नागरिक समिति गठित की गयी। यूनियन के सदस्यों को स्थानीय चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने और श्रमिक हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। नगर निगम में यूनियन सदस्यों की उपस्थिति म्युनिसिपल शासन को प्रभावित करने के लिए एक बड़ी शक्ति बन गई। 1958 में यूनियन से संबद्ध कॉर्पोरेटरों ने सफलतापूर्वक साइकिलों पर म्युनिसिपल टैक्स और गन्दी बस्तियों पर म्युनिसिपल हाउस टैक्स समाप्त कर दिया। इससे दाजी को बहुत ख्याति मिली और उन्हें ‘साइकिल कर समाप्त करने वाला’ कहा जाने लगा। 

1958 में दाजी ने इंदौर के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान दिया। होलकर के महल के बाहर का स्क्वायर राजबाड़ा के नाम से जाना जाता था, जिसे दाजी ने लोगों को समर्पित करने पर जोर दिया और कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सबकुछ है और उसका नाम जनता चौक कर दिया गया।

1974 में दाजी ने महंगाई के खिलाफ एक बहुत प्रभावशाली नागरिक आन्दोलन आयोजित किया। बड़ी संख्या में मिल मजदूरों ने इसमें भाग लिया और गिरफ्तारियां दीं। उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि मिलों में रूटीन उत्पादन चलाना भी असंभव हो गया। मिलों को बंद करना पड़ा। इस आन्दोलन ने जब गति पकड़ी तो प्रशासन को मजबूरन शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा। 

1962 में दाजी संसद के लिए चुने गए। दाजी के स्पष्ट दृष्टिकोण और वाद-विवाद की उनकी विशेष क्षमता का अवलोकन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी किया और यही वजह थी कि चीन के आक्रमण के बाद कॉमरेड दाजी को उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया जो गुट निरपेक्ष देशों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात करने के लिए कोलम्बो गया था। इस प्रतिनिधिमंडल को भारत-चीन विवाद के भारतीय पक्ष को स्पष्ट करने के लिए भेजा गया था। 1972 में दाजी एक बार फिर मध्य प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए।

यह बात विशेषरूप से ध्यान देने योग्य है कि विधान सभा व संसद में अपने कार्यकाल के दौरान दाजी ने अपनी ट्रेड यूनियन की जिम्मेदारियों को किसी और पर नहीं छोड़ा। बल्कि वे उसी तरह जिम्मेदारी के साथ बढ़चढ़कर भाग लेते रहे।

1964 में कॉमरेड दाजी को एटक की मध्य प्रदेश इकाई का महासचिव बनाया गया और 1980 में उन्हें एटक का अखिल भारतीय महासचिव चुना गया। 1974 से 1978 तक वह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिवालय के सदस्य थे। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर भारत के बाहर पार्टी और एटक का प्रतिनिधित्व किया।

कॉमरेड दाजी का राजनैतिक कैरियर उस समय अचानक धीमा पड़ा जब 1992 में उन्हें ब्रेन हैमरेज हो गया और इस कारण उन्हें लकवा मार गया। उन्हें इससे ठीक होने में एक लंबा समय लगा और तब भी वो आंशिक रूप से ही ठीक हो सके। 

कॉमरेड दाजी के व्यक्तिगत जीवन में बड़े उतार चढ़ाव रहे हैं। उन्होंने अपने छोटे भाई को भी कम उम्र में ही खो दिया था। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को भी उस समय खो दिया था जब वह अपने कैरियर के उच्च शिखर पर थे। उनके पुत्र वकील थे और पुत्री डॉक्टर थीं। उनके दोनों बच्चों न केवल विचारधारात्मक रूप से अपने पिता के पदचिन्हों को अपनाया बल्कि उन्होंने अपने जीवन को भी उसी दिशा में मोड़ दिया था। दोनों बच्चों का असामयिक निधन वास्तव में दाजी परिवार के लिए एक बहुत बड़ा आघात था। 

1992 के पक्षाघात के बाद उनके आन्दोलनों में गंभीर बाधाएं आ गईं। वे इसके बावजूद मानसिक रूप से सक्रिय रहते थे और जहां तक संभव था शारीरिक रूप से भी। उन्होंने जीवन के प्रति अपना उत्साह बरकरार रखा। 

2 मई 2009 को उनको निमोनिया और फेफड़ों के संक्रमण के चलते गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। दाजी पिछले कई साल से लकवा, मधुमेह और हृदय रोग से भी जूझ रहे थे। यहीं पर इलाज के दौरान 14 मई 2009 को उनकी मृत्यु हो गयी। 

मसऊद अख्तर
   साभार :   
 जनचौक
Tuesday , 28 नवम्बर 2017

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/homi-daji-worker-mill-labour-owner/1533

Tuesday, 21 November 2017

कम्युनिस्ट शक्तियाँ दीवार पर लिखे को पढ़ें और यथार्थ को समझें तो अभी भी शोषक-उत्पीड़क-सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त किया जा सकता है ------ विजय राजबली माथुर



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प्रस्तुत लेख में वास्तविक स्थितियों का उल्लेख न कर सतही सोच के आधार पर मार्क्स वाद और धर्म की व्याख्या की गई है। सूरज सांयकाल ढलता है तो प्रातः काल उगता भी तो है। वैसे सच यह है कि न सूरज उगता है और न ढलता ही है। यह तो मात्र हमारी अपनी दृश्यता व अदृश्यता है। सूरज ब्रह्मांड में अवस्थित होकर परिभ्रमण कर रहा है और हमारी पृथ्वी भी। पृथ्वी के जिस भाग में हम सूर्य को नहीं देख पाते तो सूर्य का अस्त होना कह देते हैं और जहां देख पाते हैं वहाँ उदय मान लिया जाता है। वामपंथ और साम्यवाद मूलतः भारतीय अवधारणा है किन्तु अन्य विज्ञानों की भांति ही यह  विज्ञान भी हमें विदेश से परावर्तित होकर उपलब्ध हुआ है। एक लंबे समय की गुलामी के कारण लोगों की सोच गुलामों वाली हो चुकी है जो कि राजनीतिक आज़ादी के लगभग 70  वर्ष बाद भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। साम्यवाद अथवा वामपंथ के पुरोधा यह मानने को तैयार नहीं हैं कि यह मूलतः भारतीय अवधारणा है और वे विदेशी नक्शे-कदम चल कर इसे भारत में लागू करने की घोषणा तो करते हैं किन्तु खुद ही उन सिद्धांतों का पालन नहीं करते जिंनका उल्लेख अपने प्रवचनों में करते हैं। इसी वजह से जनता को प्रभावित करने में असमर्थ हैं और जिस दिन जाग जाएँगे और सही दिशा में चलने लगेंगे जनता छ्ल-छ्द्यम वालों को रसातल में पहुंचा कर उनके पीछे चलने लगेगी। लेकिन सबसे पहले साम्यवाद व वामपंथ के ध्वजावाहकों को अपनी सोच को 'सम्यक' बनाना होगा।

'एकला चलो रे' की तर्ज़ पर मैं अपना फर्ज़ निबाहता रहता हूँ और मैंने आज की परिस्थितियों का आंकलन अपने एक  ब्लाग पर पहले ही  दिया था जिसे हू-ब-हू पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ: :
http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post_18.html

Sunday, September 18, 2011

बामपंथी कैसे सांप्रदायिकता का संहार करेंगे ? :
लगभग 12 (अब  32)  वर्ष पूर्व सहारनपुर के 'नया जमाना'के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1952 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व .लिंमये के साथ अपनी  1951 की वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्यूनिस्टों और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।

आज संघ और उसके सहायक संगठनों ने सड़कों पर लड़ाई का बिगुल बजा दिया है,बामपंथी अभी तक कागजी तोपें दाग कर सांप्रदायिकता का मुक़ाबला कर रहे हैं;व्यापक जन-समर्थन और प्रचार के बगैर क्या वे संघियों के सांप्रदायिक राक्षस का संहार कर सकेंगे?

भारत विविधता मे एकता वाला एक अनुपम राष्ट्र है। विभिन्न भाषाओं,पोशाकों,आचार-व्यवहार आदि के उपरांत भी भारत अनादी  काल से एक ऐसा राष्ट्र रहा है जहां आने के बाद अनेक आक्रांता यहीं के होकर रह गए और भारत ने उन्हें आत्मसात कर लिया। यहाँ का प्राचीन आर्ष धर्म हमें "अहिंसा परमों धर्मा : "और "वसुधेव कुटुम्बकम" का पाठ पढ़ाता रहा है। नौवीं सदी के आते-आते भारत के व्यापक और सहिष्णू स्वरूप को आघात लग चुका था। यह वह समय था जब इस देश की धरती पर बनियों और ब्राह्मणों के दंगे हो रहे थे। ब्राह्मणों ने धर्म को संकुचित कर घोंघावादी बना दिया था । सिंधु-प्रदेश के ब्राह्मण आजीविका निर्वहन के लिए समुद्री डाकुओं के रूप मे बनियों के जहाजों को लूटते थे। ऐसे मे धोखे से अरब व्यापारियों को लूट लेने के कारण सिंधु प्रदेश पर गजनी के शासक महमूद गजनवी ने बदले की  लूट के उद्देश्य से अनेकों आक्रमण किए और सोमनाथ को सत्रह बार लूटा। महमूद अपने व्यापारियों की लूट का बदला जम कर लेना चाहता था और भारत मे उस समय बैंकों के आभाव मे मंदिरों मे जवाहरात के रूप मे धन जमा किया जाता था। प्रो नूरुल हसन ने महमूद को कोरा लुटेरा बताते हुये लिखा है कि,"महमूद वाज ए डेविल इन कार्नेट फार दी इंडियन प्यूपिल बट एन एंजिल फार हिज गजनी सबजेक्ट्स"। महमूद गजनवी न तो इस्लाम का प्रचारक था और न ही भारत को अपना उपनिवेश बनाना चाहता था ,उसने ब्राह्मण लुटेरों से बदला लेने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र मे व्यापक लूट-पाट की । परंतु जब अपनी फूट परस्ती के चलते यहीं के शासकों ने गोर के शासक मोहम्मद गोरी को आमंत्रित किया तो वह यहीं जम गया और उसी के साथ भारत मे इस्लाम का आगमन हुआ।

भारत मे इस्लाम एक शासक के धर्म के रूप मे आया जबकि भारतीय धर्म आत्मसात करने की क्षमता त्याग कर संकीर्ण घोंघावादी हो चुका था। अतः इस्लाम और अनेक मत-मतांतरों मे विभक्त और अपने प्राचीन गौरव से भटके हुये यहाँ प्रचलित धर्म मे मेल-मिलाप न हो सका। शासकों ने भारतीय जनता का समर्थन प्राप्त कर अपनी सत्ता को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए इस्लाम का ठीक वैसे ही प्रचार किया जिस प्रकार अमीन सायानी सेरोडान की टिकिया का प्रचार करते रहे हैं। जनता के भोलेपन का लाभ उठाते हुये भारत मे इस्लाम के शासकीय प्रचारकों ने कहानियाँ फैलाईं कि,हमारे पैगंबर मोहम्मद साहब इतने शक्तिशाली थे कि,उन्होने चाँद के दो टुकड़े कर दिये थे। तत्कालीन धर्म और  समाज मे तिरस्कृत और उपेक्षित क्षुद्र व पिछड़े वर्ग के लोग धड़ाधड़ इस्लाम ग्रहण करते गए और सवर्णों के प्रति राजकीय संरक्षण मे बदले की कारवाइया करने लगे। अब यहाँ प्रचलित कुधर्म मे भी हरीश भीमानी जैसे तत्कालीन प्रचारकों ने कहानियाँ गढ़नी शुरू कीं और कहा गया कि,मोहम्मद साहब ने चाँद  के दो टुकड़े करके क्या कमाल किया?देखो तो हमारे हनुमान लला पाँच वर्ष की उम्र मे सम्पूर्ण सूर्य को रसगुल्ला समझ कर निगल गए थे---

"बाल समय रवि भक्षि लियौ तब तींन्हू लोक भयो अंधियारों।
............................ तब छाणि दियो रवि कष्ट निवारों। "
(सेरीडान  की तर्ज पर डाबर की सरबाइना जैसा सायानी को हरीश  भीमानी जैसा जवाब था यह कथन)

इस्लामी प्रचारकों ने एक और अफवाह फैलाई कि,मोहम्मद साहब ने आधी रोटी मे छह भूखों का पेट भर दिया था। जवाबी अफवाह मे यहाँ के धर्म के ठेकेदारों ने कहा तो क्या हुआ?हमारे श्री कृष्ण ने डेढ़ चावल मे दुर्वासा ऋषि और उनके साठ हजार शिष्यों को तृप्त कर दिया था। 'तर्क' कहीं नहीं था कुतर्क के जवाब मे कुतर्क चल रहे थे।

अभिप्राय यह कि,शासक और शासित के अंतर्विरोधों से ग्रसित इस्लाम और यहाँ के धर्म को जिसे इस्लाम वालों ने 'हिन्दू' धर्म नाम दिया के परस्पर उखाड़-पछाड़ भारत -भू पर करते रहे और ब्रिटेन के व्यापारियों की गुलामी मे भारत-राष्ट्र को सहजता से जकड़ जाने दिया। यूरोपीय व्यापारियों की गुलामी मे भारत के इस्लाम और हिन्दू दोनों के अनुयायी समान रूप से ही उत्पीड़ित हुये बल्कि मुसलमानों से राजसत्ता छीनने के कारण शुरू मे अंग्रेजों ने मुसलमानों को ही ज्यादा कुचला और कंगाल बना दिया।

ब्रिटिश दासता :


साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने भारत की धरती और जन-शक्ति का भरपूर शोषण और उत्पीड़न किया। भारत के कुटीर उदद्योग -धंधे को चौपट कर यहाँ का कच्चा माल विदेश भेजा जाने लगा और तैयार माल लाकर भारत मे खपाया  जाने लगा। ढाका की मलमल का स्थान लंकाशायर और मेंनचेस्टर की मिलों ने ले लिया और बंगाल (अब बांग्ला देश)के मुसलमान कारीगर बेकार हो गए। इसी प्रकार दक्षिण भारत का वस्त्र उदद्योग तहस-नहस हो गया।

आरकाट जिले के कलेक्टर ने लार्ड विलियम बेंटिक को लिखा था-"विश्व के आर्थिक इतिहास मे ऐसी गरीबी मुश्किल से ढूँढे मिलेगी,बुनकरों की हड्डियों से भारत के मैदान सफ़ेद हो रहे हैं। "

सन सत्तावन की क्रान्ति: : 

लगभग सौ सालों की ब्रिटिश गुलामी ने भारत के इस्लाम और हिन्दू धर्म के अनुयायीओ को एक कर दिया और आजादी के लिए बाबर के वंशज बहादुर शाह जफर के नेतृत्व मे हरा झण्डा लेकर समस्त भारतीयों ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति कर दी। परंतु दुर्भाग्य से भोपाल की बेगम ,ग्वालियर के सिंधिया,नेपाल के राणा और पंजाब के सिक्खों ने क्रान्ति को कुचलने मे साम्राज्यवादी अंग्रेजों का साथ दिया।

अंग्रेजों द्वारा अवध की बेगमों पर निर्मम अत्याचार किए गए जिनकी गूंज हाउस आफ लार्ड्स मे भी हुयी। बहादुर शाह जफर कैद कर लिया गया और मांडले मे उसका निर्वासित के रूप मे निधन हुआ। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई वीर गति को प्राप्त हुयी। सिंधिया को अंग्रेजों से इनाम मिला। असंख्य भारतीयों की कुर्बानी बेकार गई।

वर्तमान सांप्रदायिकता का उदय : 

सन 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों को बता दिया कि भारत के मुसलमानों और हिंदुओं को लड़ा कर ही ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित  रखा जा सकता है। लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य का सेफ़्टी वाल्व कांग्रेस राष्ट्र वादियों  के कब्जे मे जाने लगी थी। बाल गंगाधर 'तिलक'का प्रभाव बढ़ रहा था और लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल के सहयोग से वह ब्रिटिश शासकों को लोहे के चने चबवाने लगे थे। अतः 1905 ई मे हिन्दू और मुसलमान के आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया गया । हालांकि बंग-भंग आंदोलन के दबाव मे 1911 ई मे पुनः बंगाल को एक करना पड़ा परंतु इसी दौरान 1906 ई मे ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को फुसला कर मुस्लिम लीग नामक सांप्रदायिक संगठन की स्थापना करा दी गई और इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप 1920 ई मे हिन्दू महा सभा नामक दूसरा सांप्रदायिक संगठन भी सामने आ गया। 1932 ई मे मैक्डोनल्ड एवार्ड के तहत हिंदुओं,मुसलमानों,हरिजन और सिक्खों के लिए प्रथक निर्वाचन की घोषणा की गई। महात्मा गांधी के प्रयास से सिक्ख और हरिजन हिन्दू वर्ग मे ही रहे और 1935 ई मे सम्पन्न चुनावों मे बंगाल,पंजाब आदि कई प्रान्तों मे लीगी सरकारें बनी और व्यापक हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैलते चले गए।


बामपंथ का आगमन : 


1917 ई मे हुयी रूस मे लेनिन की क्रान्ति से प्रेरित होकर भारत के राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर मे 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी'की स्थापना करके पूर्ण स्व-राज्य के लिए क्रांतिकारी आंदोलन शुरू कर दिया और सांप्रदायिकता को देश की एकता के लिए घातक बता कर उसका विरोध किया। कम्यूनिस्टों से राष्ट्रवादिता मे पिछड्ता पा कर 1929 मे लाहौर अधिवेन्शन मे जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस का लक्ष्य भी पूर्ण स्वाधीनता घोषित करा दिया। अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग,हिन्दू महासभा के सैन्य संगठन आर एस एस (जो कम्यूनिस्टों का मुकाबिला करने के लिए 1925 मे ही अस्तित्व मे आया) और कांग्रेस के नेहरू गुट को प्रोत्साहित किया एवं कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया । सरदार भगत सिंह जो कम्यूनिस्टों के युवा संगठन 'भारत नौजवान सभा'के संस्थापकों मे थे भारत मे समता पर आधारित एक वर्ग विहीन और शोषण विहीन समाज की स्थापना को लेकर अशफाक़ उल्ला खाँ व राम प्रसाद 'बिस्मिल'सरीखे साथियों के साथ साम्राज्यवादियों से संघर्ष करते हुये शहीद हुये सदैव सांप्रदायिक अलगाव वादियों की भर्तस्ना करते रहे।

वर्तमान  सांप्रदायिकता  :

1980 मे संघ के सहयोग से सत्तासीन होने के बाद इंदिरा गांधी ने सांप्रदायिकता को बड़ी बेशर्मी से उभाड़ा। 1980 मे ही जरनैल सिंह भिंडरावाला के नेतृत्व मे बब्बर खालसा नामक घोर सांप्रदायिक संगठन खड़ा हुआ जिसे इंदिरा जी का आशीर्वाद पहुंचाने खुद संजय गांधी और ज्ञानी जैल सिंह पहुंचे थे। 1980 मे ही संघ ने नारा दिया-भारत मे रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा जिसके जवाब मे काश्मीर मे प्रति-सांप्रदायिकता उभरी कि,काश्मीर मे रहना होगा तो अल्लाह -अल्लाह कहना होगा। और तभी से असम मे विदेशियों को निकालने की मांग लेकर हिंसक आंदोलन उभरा।

पंजाब मे खालिस्तान की मांग उठी तो काश्मीर को अलग करने के लिए धारा 370 को हटाने की मांग उठी और सारे देश मे एकात्मकता यज्ञ के नाम पर यात्राएं आयोजित करके सांप्रदायिक दंगे भड़काए। माँ की गद्दी पर बैठे राजीव गांधी ने अपने शासन की विफलताओं और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने हेतु संघ की प्रेरणा से अयोध्या मे विवादित रामजन्म भूमि/बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर हिन्दू सांप्रदायिकता एवं मुस्लिम वृध्दा शाहबानों को न्याय से वंचित करने के लिए संविधान मे संशोधन करके मुस्लिम सांप्रदायिकता को नया बल प्रदान किया।
बामपंथी कोशिश: : 

भारतीय कम्यूनिस्ट,मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट,क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी और फारवर्ड ब्लाक के 'बामपंथी मोर्चा'ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध व्यापक जन-अभियान चलाया । बुद्धिजीवी और विवेकशील  राष्ट्र वादी  सांप्रदायिक सौहार्द के प्रबल पक्षधर हैं,परंतु ये सब संख्या की दृष्टि से अल्पमत मे हैं,साधनों की दृष्टि से विप्पन  हैं और प्रचार की दृष्टि से बहौत पिछड़े हुये हैं। पूंजीवादी प्रेस बामपंथी सौहार्द के अभियान को वरीयता दे भी कैसे सकता है?उसका ध्येय तो व्यापारिक हितों की पूर्ती के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को सबल बनाना है। अपने आदर्शों और सिद्धांतों के बावजूद बामपंथी अभियान अभी तक बहुमत का समर्थन नहीं प्राप्त कर सका है जबकि,सांप्रदायिक शक्तियाँ ,धन और साधनों की संपन्नता के कारण अलगाव वादी प्रवृतियों को फैलाने मे सफल रही हैं।

सड़कों पर दंगे  :

अब सांप्रदायिक शक्तियाँ खुल कर सड़कों पर वैमनस्य फैला कर संघर्ष कराने मे कामयाब हो रही हैं। इससे सम्पूर्ण विकास कार्य ठप्प हो गया है,देश के सामने भीषण आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है । मंहगाई सुरसा की तरह बढ़ कर सांप्रदायिकता के पोषक पूंजीपति वर्ग का हित-साधन कर रही है। जमाखोरों,सटोरियों और कालाबाजारियों की पांचों उँगलियाँ घी मे हैं। अभी तक बामपंथी अभियान नक्कार खाने मे तूती की आवाज की तरह चल रहा है। बामपंथियों ने सड़कों पर निपटने के लिए कोई 'सांप्रदायिकता विरोधी दस्ता' गठित नहीं किया है। अधिकांश जनता अशिक्षित और पिछड़ी होने के कारण बामपंथियों के आदर्शवाद के मर्म को समझने मे असमर्थ है और उसे सांप्रदायिक शक्तियाँ उल्टे उस्तरे से मूंढ रही हैं।

दक्षिण पंथी तानाशाही का भय : 

वर्तमान (1991 ) सांप्रदायिक दंगों मे जिस प्रकार सरकारी मशीनरी ने एक सांप्रदायिकता का पक्ष लिया है उससे अब संघ की दक्षिण पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित होने का भय व्याप्त हो गया है। 1977 के सूचना व प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी ने आकाशवाणी व दूर दर्शन मे संघ की कैसी घुसपैठ की है उसका हृदय विदारक उल्लेख सांसद पत्रकार संतोष भारतीय ने वी पी सरकार के पतन के संदर्भ मे किया है। आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया ताज़ी घटना है।

पुलिस और ज़िला प्रशासन मजदूर के रोजी-रोटी के हक को कुचलने के लिए जिस प्रकार पूंजीपति वर्ग का दास बन गया है उससे संघी तानाशाही आने की ही बू मिलती है।

बामपंथी असमर्थ  : 

वर्तमान परिस्थितियों का मुक़ाबला करने मे सम्पूर्ण बामपंथ पूरी तरह असमर्थ है। धन-शक्ति और जन-शक्ति दोनों ही का उसके पास आभाव है। यदि अविलंब सघन प्रचार और संपर्क के माध्यम से बामपंथ जन-शक्ति को अपने पीछे न खड़ा कर सका तो दिल्ली की सड़कों पर होने वाले निर्णायक युद्ध मे संघ से हार जाएगा जो देश और जनता के लिए दुखद होगा।

परंतु बक़ौल स्वामी विवेकानंद -'संख्या बल प्रभावी नहीं होता ,यदि मुट्ठी भर लोग मनसा- वाचा-कर्मणा संगठित हों तो सारे संसार को उखाड़ फेंक सकते हैं। 'आदर्शों को कर्म मे उतार कर बामपंथी संघ का मुक़ाबला कर सकते हैं यदि चाहें तो !वक्त अभी निकला नहीं है।
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(उपयुर्क्त लेख 'सप्तदिवा ,आगरा' ने 1991 मे छापने से इंकार कर दिया था जिसके बाद से उनसे संपर्क तोड़ लिया था। अभी अन्ना हज़ारे के तानाशाहीपूर्ण देशद्रोही /आतंकवादी आक्रमण जो अमेरिकी प्रशासन के समर्थन एवं उनकी कारपोरेट कंपनियों के दान से चला है  और उसमे प्रधानमंत्री महोदय की दिलचस्पी देख(पी एम साहब ने राष्ट्र ध्वज का अपमान करने वाले,संविधान और संसद को चुनौती देने वाले,रात्रि मे राष्ट्र ध्वज फहराने वाले को गुलदस्ता भेज कर तथा पी एम ओ के पूर्व मंत्री और अब महाराष्ट्र के सी एम से कमांडोज़ दिला कर महिमा मंडित किया है ) कर इस ब्लाग पर प्रकाशित कर रहा हूँ क्योंकि परिस्थितियाँ आज भी वही हैं जो 20 वर्ष पूर्व  थीं।बल्कि और भी खतरनाक हो गई हैं क्योंकि अब रक्षक (शासक) जनता का नहीं भक्षक का हितैषी हो गया है। जिसे राष्ट्रद्रोह मे सजा मिलनी चाहिए उसे पुरस्कृत किया जा रहा है।

आगामी  28 सितंबर को शहीदे आजम सरदार भगत सिंह का जन्मदिन होता है और उनकी नौजवान सभा ए आई एस एफ के साथ छात्रों-नौजवानों की शिक्षा-रोजगार आदि की समस्याओं को लेकर उस दिन  प्रदेश-व्यापी धरना-प्रदर्शन कर रही है। छात्रों-नौजवानों को देश के सामने आई विकट समस्याओं पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि भविष्य मे फासिस्ट तानाशाही से उन्हें ही टकराना पड़ेगा। अतः आज ही कल के बारे मे भी निर्णय कर लेना देश और जनता के हित मे उत्तम रहेगा।*********************
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जैसा 2014 के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि 1991 में किया मेरा आंकलन कितना सटीक बैठा है क्योंकि कम्युनिस्टों ने अपने अहम में मेरे दिये सुझावों पर विचार करना मुनासिब ही नहीं समझा बल्कि उत्तर-प्रदेश CPI के एक बड़े पदाधिकारी जो हैं तो पोंगापंथी किन्तु खुद को कट्टर 'एथीस्ट कम्युनिस्ट' कहते हैं और यह भी कि सीतापुर जेल में वह पार्टी संस्थापकों में से एक श्रीपाद अमृत डांगे साहब को भोजन पहुंचाया करते थे और कि पूर्व सांसद कामरेड गुरुदास दासगुप्ता जी को हिन्दी सिखाने वाले उनके वह गुरु हैं जो पूर्व राष्ट्रीय महासचिव बर्द्धन जी तथा एक राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान के कटु विरोधी हैं तो उनकी निगाह में मेरे लेख कूड़ा-कर्कट के अलावा कुछ नहीं हैं। 

मेरा आज भी सुदृढ़ अभिमत है कि यदि कम्युनिस्ट -वामपंथी जनता को 'धर्म' का मर्म समझाएँ और बताएं कि जिसे धर्म कहा जा रहा है वह तो वास्तव में अधर्म है,ढोंग,पाखंड,आडंबर है जिसका उद्देश्य साधारण जनता का शोषण व उत्पीड़न करना है तो कोई कारण नहीं है कि जनता वस्तु-स्थिति को न समझे।लेकिन जब ब्राह्मणवादी-पोंगापंथी जकड़न से खुद कम्युनिस्ट-वामपंथी निकलें तभी तो जनता को समझा सकते हैं ? वरना धर्म का विरोध करके व एथीस्ट होने का स्वांग करके उसी पाखंड-आडम्बर-ढोंगवाद को अपनाते रह   कर तो जनता को अपने पीछे लामबंद नहीं किया जा सकता है। 

धर्म=जो मानव जीवन व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हैं जैसे;'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 

अध्यात्म=अपनी 'आत्मा' का अध्यन-अपने कृत कर्मों का विश्लेषण न कि खुराफात का अनुगमन।  

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। 
और चूंकि प्रकृति के ये तत्व खुद ही बने हैं और इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही खुदा हैं। 

इन तत्वों का कार्य मानव समेत समस्त प्राणियों व वनस्पतियों की उत्पत्ति,पालन,संहार -G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय)=GOD भी यही हैं। 

परमात्मा  या प्रकृति के लिए सभी प्राणी व मनुष्य समान हैं और उसकी ओर से  सभी को जीवन धारण हेतु समान रूप से वनस्पतियाँ,औषद्धियाँ,अन्न,खनिज आदि-आदि बिना किसी भेद-भाव के  निशुल्क उपलब्ध हैं। अतः इस जगत में एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण करना परमात्मा व प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है और इसी बात को उठाने वाले दृष्टिकोण को समष्टिवाद-साम्यवाद-कम्यूनिज़्म कहा जाता है और यह पूर्णता: भारतीय अवधारणा है। आधुनिक युग में जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने इस दृष्टिकोण को पूर्ण वैज्ञानिक ढंग से पुनः प्रस्तुत किया है। 'कृणवन्तो विश्वमार्यम ' का अभिप्राय है कि समस्त विश्व को आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ बनाना है और यह तभी हो सकता है जब प्रकृति के नियमानुसार आचरण हो। कम्युनिस्ट प्रकृति के इस आदि नियम को लागू करके समाज में व्याप्त मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने हेतु 'उत्पादन' व 'वितरण' के साधनों पर समाज का अधिकार स्थापित करना चाहते हैं। इस आर्ष व्यवस्था का विरोध शासक,व्यापारी और पुजारी वर्ग मिल कर करते हैं वे अल्पमत में होते हुये भी इसलिए कामयाब हैं कि शोषित-उत्पीड़ित वर्ग पारस्परिक फूट में उलझ कर शोषकों की चालों को समझ नहीं पाता है। उसे समझाये कौन ? कम्युनिस्ट तो खुद को 'एथीस्ट' और धर्म-विरोधी सिद्ध करने में लगे रहते हैं। 

काश सभी बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्तियाँ  दीवार पर लिखे को पढ़ें और  यथार्थ को समझें और जनता को समझाएँ तो अभी भी शोषक-उत्पीड़क-सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। लेकिन जब धर्म को मानेंगे नहीं अर्थात 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन नहीं करेंगे 'एथीस्ट वाद' की जय बोलते हुये ढोंग-पाखंड-आडंबर को प्रोत्साहित करते रहेंगे अपने उच्च सवर्णवाद के कारण तब तो कम्यूनिज़्म को पाकर भी रूस की तरह खो देंगे या चीन की तरह स्टेट-कम्यूनिज़्म में बदल डालेंगे।

Wednesday, 8 November 2017

वामपंथी पार्टियों द्वारा घोर जनविरोधी नोटबंदी की बरसी पर धरना ------ विजय राजबली माथुर







लखनऊ, 08 नवंबर 2017 : वामपंथी पार्टियों के देशव्यापी आह्वान पर मोदी सरकार द्वारा लागू की गई घोर जनविरोधी नोटबंदी की बरसी पर Cpi cpim ,cpiml , fb , suci की ओर से एक संयुक्त धरना विरोध दिवस के रूप में गांधी प्रतिमा , जी पी ओ , हज़रतगंज , लखनऊ पर  दोपहर 3 बजे से आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़, जिलामंत्री भाकपा ने की। 
cpiml की ओर से कामरेड रमेश सेंगर व cpim की ओर से कामरेड प्रेम कुमार तथा अन्य वक्ताओं ने गत वर्ष की गई नोटबंदी से जनता, छोटे व्यापारियों, किसानों, मजदूरो, महिलाओं को होने वाले कष्टों पर विस्तृत चर्चा की। पंद्रह लाख लोगों की नौकरियाँ छूटने व सौ से अधिक लोगों की बैंकों की लाईनो में मौत की निंदा की गई। 
 Cpi के कामरेड विजय माथुर ने ज़िक्र किया कि, जर्मनी की चांसलर ने यू एस ए की ही प्रेस के हवाले से यह रहस्योद्घाटन किया था कि, भारत में की गई नोटबंदी अमेरिकी दबाव में की गई थी। वस्तुतः ओबामा साहब रिटायर होने वाले थे और यू एस ए में आठ नवंबर 2016 को अगले राष्ट्रपति चुनाव हेतु मतदान चल रहा था जिस दिन भारत में नोटबंदी का ऐलान किया गया। यू एस ए में डिजिटल कंपनियों का व्यापार चौपट हो चुका था और उनके बंद होने की नौबत आ रही थी लेकिन भारत की नोटबंदी ने उनका अस्तित्व बचा लिया क्योंकि यहाँ कैशलेस और डिजिटल लेन - देन के लिया जनता को बाध्य कर दिया गया था। पुराने बड़े नोट बैंकों में जमा हो चुके थे और नई करेंसी बाज़ार में आई नहीं थी।  उनका कहना था कि, जहां नोटबंदी से गरीब जनता कराह रही थी वहीं  बड़े कारपोरेट घराने मस्ती में अपना धंधा कर रहे थे।उनका दृष्टिकोण था कि नोटबंदी मोदी सरकार का देशद्रोही कदम था। इस सरकार के विरुद्ध जनता और व्यापारियों से टैक्स का भुगतान रोकने का आव्हान करना चाहिए तभी इस देशद्रोही सरकार को जनता की बात सुनने के लिए बाध्य किया जा सकेगा। 
अपने अध्यक्षीय भाषण में कामरेड ख़ालिक़ ने साथियों का आभार व्यक्त किया कि, उन्होने भारी संख्या में पहुँच कर कार्यक्रम को सम्पन्न करवाया जबकि पुलिस प्राशन निकाय चुनावों की आचार संहिता के नाम पर सभा ही नहीं होने देना चाहता था। उन्होने प्रिंट और एलेक्ट्रानिक मीडिया का भी धरने की रिपोर्टिंग करने व कवरेज के लिए धन्यवाद दिया। 

Tuesday, 7 November 2017

क्या कम्युनिस्टों की अदूरदर्शिता ने मोदी को पी एम बनाया ? ------ विजय राजबली माथुर













 हज़ारे को अगुआ बना कर अरविंद केजरीवाल एक लंबे समय से शोषकों -उतपीडकों का बचाव करने हेतु भ्रष्टाचार का राग आलापते  रहे है। पढे-लिखे मूरखों को अपना पिछलग्गू बनाने मे मिली कामयाबी के आधार पर वह फूले नहीं समा रहे हैं और जोश मे होश खो बैठे हैं। उन्होने अपने विभाग से हड़पे नौ लाख रुपए प्रधानमंत्री कार्यालय को लौटाए थे जो उनकी और तत्कालीन  प्रधानमंत्री  की अंतरंगता का ज्वलंत प्रतीक है। हज़ारे  साहब को निजी अस्पताल मे पी एम साहब ने पुष्प गुच्छ भिजवा कर उनके आंदोलन को अपना मूक समर्थन प्रदान किया था।

हज़ारे आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन गुट/आर एस एस/देशी-विदेशी NGOs का भरपूर समर्थन था । रामदेव का आंदोलन  केवल आर एस एस /विदेशी समर्थन पर आधारित था। इसीलिए  रामदेव के आंदोलन पर हज़ारे आंदोलन  बढ़त कायम कर सका। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही था भारत मे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करके 'अर्द्ध सैनिक तानाशाही' स्थापित करना।

1974 मे चिम्मन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध मे लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन मे पहली बार नानाजी देशमुख की अगुआई मे आर एस एस ने घुसपैठ की थी और अपार सफलता प्राप्त  थी।1977 की जनता पार्टी सरकार मे अटल बिहारी बाजपाई ने विदेश विभाग मे तथा एल के आडवाणी ने सूचना एवं प्रसारण विभाग मे आर एस एस के लोगो की घुसपैठ करा दी थी। 1980 मे आर एस एस के सहयोग से इंदिरा गांधी की कांग्रेस पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकी थी। यह आर एस एस की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वी पी सिंह के 'बोफोर्स कमीशन विरोधी आंदोलन' मे घुस कर आर एस एस ने संतुलंनकारी भूमिका निभा कर अपनी शक्ति मे अपार वृद्धि कर ली थी और 'राम मंदिर आंदोलन' की आड़ मे पिछड़े वर्ग के हित मे लागू 'मण्डल कमीशन' रिपोर्ट की धज्जिये उड़ा दी थी। देश को साम्राज्यवादियों के अस्त्र 'सांप्रदायिकता' से दंगो मे फंसा कर अपार जन-धन की क्षति की गई थी।

1998  -2004 के राजग शासन काल मे गृह मंत्रालय और विशेष कर खुफिया विभागो मे आर एस एस की ज़बरदस्त पैठ बना दी गई। इनही तत्वो ने रामदेव को सहानुभूति दिलाने हेतु राम लीला मैदान कांड अंजाम दिलाया। लेकिन रामदेव की मूर्खताओ के कारण जनता मे उनकी कलई खुल गई। अतः  हज़ारे को आगे खड़ा किया गया। जो कुछ हुआ और हो रहा है सब की आँखों के सामने है। जो लोग व्यापारियों,उद्योगपतियों,ब्यूक्रेट्स के शोषण -उत्पीड़न को ढकने हेतु भ्रष्टाचार का जाप कर रहे थे और जनता को उल्टा भड़का रहे थे उनके मास्टर माइंड हीरो अरविंद केजरीवाल 'मतदान' ही नहीं करना चाहते थे और वह मतदाता तक न बने थे जो उनके 'लोकतन्त्र विरोधी' होने और 'तानाशाही समर्थक' होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। 

तत्कालीन  मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीरप्पा मोइली ने खुलासा किया था  कि मनमोहन सिंह ने हड़बड़ी मे 'उदारवाद' अर्थात आर्थिक सुधार लागू किए थे जिनसे 'भ्रष्टाचार' मे अपार वृद्धि हुई है। 

तो यह वजह है कि मनमोहन सिंह जी ने आर एस एस को ताकत पहुंचाने हेतु  हज़ारे के आंदोलन को बल प्रदान किया था। सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही भ्रष्टाचार को अनंत काल तक संरक्षण प्रदान कर सकती है और इसी लिए इन आंदोलनकारियों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति नफरत भर कर ये लोग जनता को लोकतन्त्र से दूर करना चाहते हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से स्तीफ़ा देकर बनारस में मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने का उद्देश्य 2014 में सिर्फ यह था कि, मोदी विरोधी वोटों को केजरीवाल समेट लें और मोदी को आसान जीत दिला दें। ऐसा करके बदले में दिल्ली चुनावों में आर एस एस के प्रचंड समर्थन से  भाजपा को हराकर केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बन गए। 
आगामी चुनावों में भाजपा की मदद के लिए केजरीवाल आ आ पा को गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल,राजस्थान सभी जगह चुनाव लड़ाएँगे जिससे भाजपा विरोधी वोट बाँट कर उसे आसान जीत उपलब्ध करवा  सकें। आर एस एस सत्ता पक्ष भाजपा के माध्यम से कब्जा चुका है अब विरोध पक्ष को आ आ पा के माध्यम से कबजाना चाहता है। परंतु 
दुखद तथ्य यह है कि, प्रगतिशील माने जाने वाले विद्वान और दल केजरीवाल और उनके AAP को मोदी / भाजपा विरोधी मानते हुये जनता को गुमराह कर रहे हैं। 

1952 के प्रथम आम चुनाव में  भाकपा लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल थी और 1957 में केरल में संसदीय चुनावों के जरिये सत्ता में आ चुकी थी तब  ' यह आज़ादी अधूरी है ....'  का नारा लगा कर संसदीय भटकाव का राग अलापते हुये और खुद को एथीस्ट घोषित करते हुये जनता से अलग - थलग करने की ज़रूरत क्या थी ? सिर्फ  ब्राह्मण वाद की रक्षा हेतु ही 1964 में पार्टी में विभाजन हुआ और विभक्त हुई पार्टी से 1967 और उसके बाद विभाजन का सिलसिला ही शुरू हो गया। आज केवल आर्थिक संघर्षों के जरिये देश की सत्ता नहीं प्राप्त की जा सकती है जब तक कि, ब्राह्मण वाद की देन  सामाजिक विषमता अर्थात जाति - व्यवस्था पर प्रहार नहीं किया जाता। क्या सभी साम्यवादी दल  / वामपंथ जिन पर ब्राह्मण वादी वर्चस्व है ऐसा होने देंगे ? जब तक ब्राह्मण वाद के विरुद्ध कम्युनिस्ट नहीं खड़े होंगे भारत वर्ष में सफल भी नहीं हो सकेंगे। इस तथ्य को आज सर्वहारा क्रांति की शताब्दी मनाते हुये ध्यान में रख कर आगे बढ़ेंगे तो सफलता चरण चूम लेगी। 
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