Monday, 18 June 2018

आ आ पा ( AAP ) को समर्थन देने वाले मोदी और भाजपा को मजबूत कर रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर







समाजशास्त्र (सोशियोलाजी ) में ज़िक्र आता है कि, प्राचीन समाजों के इतिहास का अध्यन  करने हेतु प्रतीकों  का अवलोकन करके निष्कर्ष निकाला जाता है। हालांकि, आधिकारिक  रूप से पुष्टि तो इसकी भी नहीं की जा सकती है। बी ए के कोर्स की पुस्तक में दो उदाहरण देकर इसे सिद्ध किया गया है।
 ( 1 ) जंगल में धुआँ  देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, आग लगी है। 
( 2 ) किसी गर्भिणी को देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, संभोग हुआ है। 
जबकि आधिकारिक रूप से कहने के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है किन्तु ये अनुमान बिलकुल सटीक होते हैं। 
 साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के स्वार्थ लोलुप लोग आसानी से आर एस एस की चाल का शिकार खुद - ब - खुद बन चुके हैं । ऐसे लोग न घर के होते हैं न घाट के।
 सन 2011 में जब राष्ट्रपति चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी  और मनमोहन सिंह जी को राष्ट्रपति बना कर प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाने की कवायद शुरू हुई तब जापान की यात्रा से लौटते में विमान में सिंह साहब ने पत्रकारों से कहा था कि , वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि , तीसरी बार भी पी एम बनने के लिए प्रस्तुत है। जब सोनिया जी इलाज के वास्ते विदेश गईं तब सिंह साहब की प्रेरणा से हज़ारे / रामदेव आदि ने कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण में जनलोकपाल आंदोलन खड़ा कर दिया जिसका उद्देश्य संघ / भाजपा / कारपोरेट जगत को लाभ पहुंचाना था। आज की एन डी ए  सरकार के गठन में सौ से भी अधिक भाजपाई बने कांग्रेसियों का प्रबल योगदान है। 
जनसंघ युग में ब्रिटेन व यू एस ए की तरह दो पार्टी शासन की वकालत उनका उद्देश्य था। उस पर अमल करने का मौका उनको अब मिला है जब भाजपा केंद्र की सत्ता में और आ आ पा उसके विरोध की मुखर पार्टी के रूप में सामने है। 
आ आ पा का उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी,अंबेडकरवादी आदि समेत सम्पूर्ण विपक्ष को ध्वस्त कर खुद को स्थापित करना है। भाजपा के विपक्ष में आ आ पा और आ आ पा के विपक्ष में भाजपा को दिखाना आर एस एस की रणनीति है। बनारस में मोदी साहब को आसान जीत दिलाने के लिए केजरीवाल साहब ने वहाँ पहुँच कर भाजपा विरोधियों को ध्वस्त कर दिया था और पुरस्कार स्वरूप दिल्ली में थमपिंग मेजारिटी से उनकी सरकार का गठन हो गया तथा कांग्रेस समेत सम्पूर्ण विपक्ष ध्वस्त हो गया। 
अभी भी जो लोग आ आ पा में विश्वास बनाए रखते हैं वे वस्तुतः अप्रत्यक्ष रूप से मोदी और भाजपा को ही मजबूत बनाने में लगे हुये हैं। 
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Friday, 15 June 2018

जनता की सहानुभूति व समर्थन पाने में विफल क्यों कम्यूनिज़्म ? ------ विजय राजबली माथुर

वर्ष 1978 - 79 में सहारनपुर के 'नया जमाना'के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1951  - 52 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व.लिमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्युनिस्टों  और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।
प्रोफेसर निष्ठा के विचार उसी तथ्य की ओर इंगित कर रहे लगते हैं। 
छात्रों-नौजवानों को देश के सामने आई विकट समस्याओं पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि भविष्य मे फासिस्ट तानाशाही से उन्हें ही टकराना पड़ेगा। अतः आज ही कल के बारे मे भी निर्णय कर लेना देश और जनता के हित मे उत्तम रहेगा।
ब्राह्मणवादी, ढ़ोंगी-पाखंडी तो कहते ही हैं दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि, वामपंथी, साम्यवादी औरे एथीस्ट भी 'हिन्दू ' को  'धर्म ' ही  मानते हैं। जबकि वस्तुतः 'हिन्दू ' शब्द सर्वप्रथम बौद्ध ग्रन्थों में हिंसक गतिविधियों में संलिप्त लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ था। फिर फारसी या ईरानी आक्रांताओं ने एक गंदी व भद्दी गाली के रूप में भारतवासियों के लिए 'हिन्दू ' शब्द का प्रयोग प्रारम्भ किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने ' हिन्दू ' एक राजनीति का शब्द माना है कोई ' धर्म ' नहीं। परंतु सरकारी कागजों में, ब्राह्मण वादियों के प्रचार में व वामपंथी, साम्यवादी के साथ साथ एथीस्ट संप्रदाय भी 'हिन्दू ' को 'धर्म ' की संज्ञा दे रहा है।
क्यों नहीं जनता को 'धर्म ' का वास्तविक ' मर्म ' समझाया जाता ? क्यों नहीं जनता को बताया जाता कि, हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत,सिख,पारसी आदि कोई धर्म नहीं हैं ? जब तक आप जनता को अध्यात्म, भगवान,धर्म,ईश्वर की सही व्याख्या नहीं बताएँगे जनता आपकी बातें सुनने को तैयार ही नहीं होगी। भारत में सशस्त्र क्रांति संभव होती तो 1857 में ही सफल हो जाती तब गांधी जी को  ' सत्य व अहिंसा ' को हथियार न बनाना पड़ता। सम्पूर्ण मार्क्स वाद सही होते हुये भी भारत में मार्क्स और लेनिन / स्टालिन के बताए मार्ग से प्रस्तुत न किए जाने के कारण भारत की जनता की सहानुभूति व समर्थन पाने में विफल है। आपको जनता के बीच समझाना होगा कि , धर्म का नाम लेने वाले खुद ही अधार्मिक हैं क्योंकि , :
समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है ? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है। 
* धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
* भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
* चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।
 * इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
* ईश्वर = जो ऐश्वर्यशाली हो अर्थात आज की इस दुनिया में कोई भी नहीं। 
* अध्यात्म = अध्ययन + आत्मा अर्थात अपनी आत्मा का अध्ययन न कि ढोंगियों  का आडंबर। 
* ' सन्त ' = संतुलित हो जीवन जिसका वह सन्त है।
* 'साधू ' = साध लिया हो अपना जीवन जिसने ( who have balanced his / her life ) साधू होता है।
लेकिन समाज में इन शब्दों के मर्म को न समझ कर गलत अर्थ में लिया जाता है तभी समाज व राष्ट्र को दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं।









Wednesday, 13 June 2018

Indian Democracy Under Attack : Atul Kumar Anjaan



biju mohan
Published on May 1, 2018
Com.Atul Kumar Anjaan is a senior CPI leader and national secretary of the Communist Party of India. He talks about the growing fascist politics and its impact on democracy.




India Today Social
Published on May 26, 2018
CPI नेता अतुल अंजान पहुँचे पंचायत आजतक पर, Sweta Singh के साथ बातचीत में उन्होंने शायराना अंदाज में मोदी सरकार पर बोला हमला.

Friday, 1 June 2018

सिनेमा में समाजवादी नजरिये को स्थापित किया ख्वाजा अहमद अब्बास ने ------ इकबाल रिजवी






* अपनी ही एक कहानी पर उन्होंने 1946 में इप्टा के लिये ‘धरती के लाल’ बनायी। यह भारत की पहली नवयथार्थवादी फिल्म मानी जाती है। 1951 में ख्वाजा ने अपनी मर्जी की फिल्में बनाने के लिये नया संसार नाम से एक फिल्म कंपनी खड़ी की जिसके बैनर तले उन्होंने अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ (1970) सहित 13 फिल्में बनायीं।
** हिंदी सिनेमा जगत को कई बेहद सार्थक फिल्में देने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास को भुला दिया गया 
*** सबसे पहले ख्वाजा ने ‘मुन्ना’ नाम से एक बिना गीतों वाली फिल्म बना कर सबको चौंका दिया था।
**** अपने निर्देशन की फिल्मों में उन्होंने गरीबी, अकाल, छुआ-छूत, सांप्रदायिकता और समाजिक असमानता जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। हर फिल्म जो उन्होंने बनायी उसके पीछे एक मकसद हुआ करता  था।
***** राजकपूर के साथ मिल कर ख्वाजा ने हिंदी सिनेमा को नयी दृष्टि दी, लेकिन इसका सारा श्रेय राजकपूर को ही दिया जाता है।






ख्वाजा अहमद अब्बास ने कई बेहद सार्थक और शानदार फिल्में बनायीं जो न सिर्फ भारतीय फिल्मों के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गयीं, बल्कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी सराहना मिली। लेकिन आज एक फिल्मकार के रूप में उनको यानी ख्वाजा अहमद अब्बास को भुला सा दिया गया है।ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 1914 में पानीपत में हुआ था। 1934 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही वे दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘नेशनल सेल’ और अलीगढ़ से निकलने वाले समाचारपत्र ‘अलीगढ़ ओपीनियन’ में कॉलम लिखने लगे। फिर उन्होंने ‘बॉम्बे क्रानिकल’ में लिखना शुरू किया, जहां उन्हें फिल्मों की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इससे फिल्मी क्षेत्र में उनका नाम चर्चित होने लगा।
शुरूआती दौर में फिल्म समीक्षाओं के लिये ख्वाजा ने करीब 300 देशी विदेशी फिल्में देखीं। उनका समीक्षा लिखने का अपना अंदाज, था जो बहुतों को चुभता था। वी शांता राम की फिल्म ‘आदमी’ की रिलीज डेट कई बार टाली जा रही थी। इस पर उन्होंने लिखा कि शायद शांताराम का आदमी पूना से पैदल चल कर बम्बई आ रहा है और ऐसा लगता है कि राह में थक कर किसी पेड़ के नीचे सो गया है। इस टिप्पणी से शांताराम खासे नाराज हुये। इसीलिये जब ‘आदमी’ रिलीज हुई तो फिल्म समीक्षक होने की हैसियत से ख्वाजा को फिल्म का पास नहीं भेजा गया। लेकिन अब्बास ने अपने पैसे खर्च कर ये फिल्म 18 बार देखी और फिल्म की तारीफ में 7 कॉलम का लंबा चौड़ा लेख लिखा।
लेकिन इसके बावजूद उनकी बेबाक फिल्म समीक्षाओं से तिलमिलाए कई फिल्मकार तंज कसा करते थे कि फिल्म समीक्षा लिखना आसान होता है लेकिन फिल्म बनाना बहुत मुशकिल। ख्वाजा ने इसे चुनौती की तरह लिया और एक कहानी लिखी। बॉम्बे टॉकीज ने इस कहानी पर ‘नया संसार ( 1941)’ नाम से एक फिल्म बनायी। इसमें अशोक कुमार और रेणुका देवी ने अभिनय किया था। फिल्म ने रजत जयंती मनायी। फिर ख्वाजा ने तीन और फिल्मों की कहानियां लिखीं, लेकिन जब ये फिल्में रिलीज हुईं तो ख्वाजा को यह देख कर हैरत हुई कि जो कहानी उन्होंने लिखी थी, उसके कुछ अंशों को छोड़ कहानी पूरी तरह बदल दी गयी थी। उन्होंने इसकी शिकायत निर्देशकों से की तो उन्हें जवाब मिला की अपनी लिखी कहानी पर हू ब हू वैसी ही फिल्म देखना चाहते हो तो फिल्म का निर्देशन खुद कर लो।
ख्वाजा ने इस चुनौती को भी स्वीकार किया। अपनी ही एक कहानी पर उन्होंने 1946 में इप्टा के लिये ‘धरती के लाल’ बनायी। यह भारत की पहली नवयथार्थवादी फिल्म मानी जाती है। 1951 में ख्वाजा ने अपनी मर्जी की फिल्में बनाने के लिये नया संसार नाम से एक फिल्म कंपनी खड़ी की जिसके बैनर तले उन्होंने अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ (1970) सहित 13 फिल्में बनायीं।
ख्वाजा ने पत्रकारिता की हो, साहित्य रचा हो या फिर फिल्में बनायीं हों, उन्होंने बुरे से बुरे हालात में भी सामाजिक प्रतिबद्धता से मुंह नहीं मोड़ा। अपने निर्देशन की फिल्मों में उन्होंने गरीबी, अकाल, छुआ-छूत, सांप्रदायिकता और समाजिक असमानता जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। हर फिल्म जो उन्होंने बनायी उसके पीछे एक मकसद हुआ करता था।
फिल्म ‘राही’ में ख्वाजा ने चाय बागानों के मजदूरों के हालात को दिखाया तो ‘ग्यारह हज़ार लड़कियां’ (1962) में कामकाजी महिलाओं की परेशानियों को उजागर किया। ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जिंदगी बिताने वालों की समस्याओं का वर्णन है और ‘बम्बई रात की बाहों में’ (1967) बना कर महानगरों में रात में चलने वाले गैर कानूनी धंधों का चित्रण किया। इसी क्रम में उन्होंने नक्सल समस्या पर ‘दी नक्सलाइट’ (1980) बनायी। बिना गीतों के हिंदी फिल्मों की कल्पना भी नहीं की जी सकती है, लेकिन सबसे पहले ख्वाजा ने ‘मुन्ना’ नाम से एक बिना गीतों वाली फिल्म बना कर सबको चौंका दिया था।
ख्वाजा अहमद अब्बास ने करीब 40 फिल्मों की कहानियां और स्क्रीन प्ले लिखे। अपने बैनर के अलावा उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में अपने प्रशंसक राजकपूर के लिये लिखीं। राजकपूर ने उनसे 1951 में पहली फिल्म ‘आवारा’ लिखवायी। यहीं से ख्वाजा और राजकपूर की दोस्ती शुरू हुई जो ‘श्री 420’ (1955), ‘जागते रहो’ (1956) से होती हुई राजकपूर की मौत तक कायम रही। इस बीच ख्वाजा ने राजकपूर के लिये एक मात्र मसालेदार फिल्म ‘बॉबी’ (1973) लिखी, लेकिन इसमें भी वो समाजवादी नजरिये को स्थापित करने में सफल रहे।
राजकपूर के साथ मिल कर ख्वाजा ने हिंदी सिनेमा को नयी दृष्टि दी, लेकिन इसका सारा श्रेय राजकपूर को ही दिया जाता है। 1 जून 1987 को इस दुनिया को अलविदा कहने से ठीक पहले तक बीमारी से जूझ रहे ख्वाजा अपनी फिल्म ‘एक आदमी’ की डबिंग का काम पूरा करने में जुटे थे। ये फिल्म उनके निधन के बाद रिलीज हुई। फिल्मी दुनिया के अधिकांश दिग्गज और बुद्धिजीवी सिने समीक्षक उनकी फिल्मों को साधरण डाक्यूमेंट्री ही मानते रहे। उनकी फिल्मों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा। इस फिल्मकार को फिल्म जगत ने वो सम्मान कभी नहीं दिया जिसके वो असल हकदार थे।

https://www.navjivanindia.com/cinema/khwaza-ahmad-abbas-was-in-favor-of-socialism-in-cinema?utm_source=one-signal&utm_medium=push-notification




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Wednesday, 23 May 2018

‘‘पोल खोल-हल्ला बोल’’ ------ प्रेमनाथ राय / अरविंद राज स्वरूप

फोटो सौजन्य से अरविंद राज स्वरूप 
 दोनों फोटो सौजन्य से प्रदीप शर्मा 



Arvind Raj Swarup Cpi
23-05-2018 
जन एकता! जन अधिकार!! जन प्रतिरोध!!!
जन एकता, जन अधिकार आंदोलन, उत्तर प्रदेश
(जन संगठनों, वर्गीय संगठनों, सामाजिक संगठनों, आंदोलनों सहित प्रगतिशील
समूहों व व्यक्तियों का मंच)
लखनऊ
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भाजपा की केन्द्र सरकार के चार साल पूरा होने पर
प्रदेश के सभी जिलों समेत राजधानी लखनऊ में ‘‘पोल खोल-हल्ला बोल’’ के तहत
किया गया प्रदर्शन
लखनऊ 23 मई। केन्द्र में भाजपा की सरकार के चार साल पूरा होने पर सौ से
ज्यादा संगठन मिलकर ‘‘पोल खोल-हल्ला बोल’’ अभियान के तहत आज 23 मई को
प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों सहित प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जोरदार
विरोध प्रदर्शन किया गया।
राज्य केन्द्र पर प्राप्त सूचना के अनुसार प्रदेश के 30 से ज्यादा जिलों
में धरना प्रदर्शन किया गया। बलिया, गाजीपुर, इलाहाबाद, कानपुर, फैजाबाद,
जौनपुर, हाथरस,वाराणसी, मुरादाबाद, बुलंदशहर, इटावा, लखीमपुर, मऊ, आजमगढ़,
मथुरा, कासगंज आदि जिलों में सैकड़ों की तादाद में लोग सड़कों पर उतरे और
विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए।
इसी क्रम में आज लखनऊ में जन एकता जन अधिकार आंदोलन बैनर तले 30 से
ज्यादा संगठनों के कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन
किया। प्रदर्शन से पूर्व इप्टा के कार्यालय 22 कैसरबाग में ‘‘हवालात’’
नुक्कड़ नाटक का मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से जनविरोधी मोदी सरकार का
पर्दाफाश किया गया। नाटक के बाद प्रदर्शनकारी बारादरी, परिवर्तन चौक,
बी0एस0एन0एल0 कार्यालय चौराहा होते हुए जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे।
इस अवसर पर हुई सभा को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि केन्द्र की
मोदी सरकार ने ‘‘अच्छे दिन’’ और ‘‘सबका साथ-सबका विकास’’ का नारा दिया
था। यह भी कहा था कि विदेश से काला धन वापस आयेगा और सभी के खाते में 15
लाख रूपये आयेंगे। मोदी सरकार ने अपने किये गये वायदों में से किसी को भी
पूरा नहीं किया। यही नहीं सरकार आने के बाद योजना आयोग को भंग कर नीति
आयोग बना दिया गया है। इन चार वर्षों में मजदूरों, किसानों, छात्रों,
नौजवानों, महिलाओं, दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हुए हैं। महंगाई
में बेतहाशा वृद्धि हुई है। डीजल और पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं।
आम जनता की क्रय शक्ति में भारी कमी आयी है। श्रम सुधारों के नाम पर
मजदूरों के अधिकारों में कटौती की गयी है। सरकार जिलों में धरना/प्रदर्शन
करने के लोकतांत्रिक अधिकार पर हमला इस रूप में कर रही है कि अब
जिलाधिकारी कार्यालयों/कचेहरी पर परम्परागत धरना प्रदर्शन स्थल पर रोक
लगायी जा रही है।
वक्ताओं ने कहा कि इस दौर में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है।
कानून व्यवस्था में भारी गिरावट आयी है। बेरोजगारी में वृद्धि हुई है।
केन्द्र और राज्य सरकार के विभागों में लाखों पद रिक्त पड़े हैं, उन पर नई
नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। पदों को समाप्त करने की कोशिश हो रही है।
सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं-आंगनवाड़ी, मनरेगा आदि के बजट में लगातार कटौती
की जा रही है।
जिलाधिकारी कार्यालय पर सभा हुई। जिसकी अध्यक्षता अरविंद राज स्वरूप व
संचालन प्रवीन पाण्डेय ने किया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के नाम
ज्ञापन जिलाधिकारी को दिया। सभा को प्रेमनाथ राय, रमेश सिंह, आशा मिश्रा,
महराजदीन चौधरी, उदय सिंह, सीमा राना, अनुपम यादव, फूलचंद यादव, परमानंद
द्विवेदी, एस0पी0 विश्वास आदि ने सम्बोधित किया।
उक्त जानकारी जन एकता-जन अधिकार आंदोलन की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति
में प्रेमनाथ राय ने दी।
साभार : 
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/2108954685989325

Tuesday, 22 May 2018

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तावित लोकार्पण कार्यक्रमों और आम सभाओं को प्रतिबंधित करें ------ डॉ गिरीश


कैराना लोकसभा और नूरपुर विधान सभा क्षेत्रों का प्रचार थमने और मतदान से पहले होने जारही मोदी की बागपत रैली और लोकार्पण कार्यक्रम पर रोक लगाये निर्वाचन आयोग

भाकपा ने की मांग


लखनऊ- 22 मई, 2018—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने केन्द्रीय निर्वाचन आयोग से मांग की है कि वह उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर प्रचार थमने के बाद से मतदान संपन्न होने के दरम्यान उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तावित लोकार्पण कार्यक्रमों और आम सभाओं को प्रतिबंधित करें.
ज्ञातव्य हो कि उपर्युक्त दोनों सीटों पर 26 मई को सायंकाल प्रचार कार्य थम जायेगा और 28 मई की शाम पांच बजे तक मतदान होगा.
भाजपा और प्रधानमंत्री ने इस प्रचारबन्दी और मतदान की अवधि में बड़ी चतुराई से 27 मई को समीपस्थ जिले बागपत के मवीकलां में ईस्टर्न पेरिफेरल हाईवे का उद्घाटन करने और खेकडा में आमसभा करने का कार्यक्रम निर्धारित कर लिया है. इस कार्यक्रम में अपने खर्च पर और बड़े पैमाने पर  भाजपा दोनों चुनाव क्षेत्रों से जनता और मतदाताओं को लेजाने में जुटी है. साथ ही समूची कार्यवाही और लोकलुभावन घोषणाओं को टीवी चैनलों एवं अन्य समाचार माध्यमों के जरिये फैला कर मतदाताओं को प्रभावित किया जायेगा.
गत लोक सभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों के दरम्यान भी भाजपा और श्री मोदी ने किसी एरिया विशेष में मतदान के दिन किसी अन्य क्षेत्र में रैली, आमसभा अथवा रोडशो आयोजित कर संचार माध्यमों के जरिये मतदाताओं को प्रभावित करने का षडयंत्र किया था. यही कहानी वे 27 मई को दोहराने जारहे हैं. जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 31 मई तक इस हाईवे के लोकार्पण की छूट देरखी है तो यह कार्यक्रम 28 मई के बाद की किसी तिथि पर आयोजित किया जासकता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय को भी संज्ञान लेना चाहिये कि उनके आदेश की आड़ में राजनैतिक खेल तो नहीं खेला जारहा है.
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने भाजपा की इस कार्यवाही को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन और नियम विरुध्द बताते हुये इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है.

डा. गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश


Saturday, 5 May 2018

‘‘सवाल दुनिया को बदलने का है’’ : मार्क्स ------ सीमा आज़ाद

5 मई 1818


Seema Azad
0- 05 - 2018 
मार्क्स की 200वीं जयन्ती [ 5 मई २०१८]

‘‘सवाल दुनिया को बदलने का है’’

‘अब तक दार्शनिकों ने समाज की व्याख्या की है, लेकिन सवाल इसे बदलने का है।’’ 
दुनिया को समझने ही नहीं, बल्कि इसे बदलने का दर्शन समाज को देने वाले कार्ल मार्क्स 200 साल के हो रहे हैं। 5 मई 2018 को दुनिया उनके जन्म की 200वीं जयन्ती मनायेगी। दुनिया को अब तक जिस दर्शन ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, वह हैं कार्ल मार्क्स। जिसे मार्क्सवाद के नाम से पूरी दुनिया में जाना गया। यह वह दर्शन है, जिसने सदियों से चली आ रही धर्म की सत्ता का वैज्ञानिक आधार पर खण्डन किया। हलांकि ऐसा नहीं है कि मार्क्स के पहले धर्म की सत्ता को स्थापित करने वाले अवैज्ञानिक-अतार्किक और भाववादी दर्शन के बरख़्श कोई वैज्ञानिक विचार था ही नहीं। पूरे विश्व और भारत में भी भाववादी दर्शन को चुनौती देने वाली विचारधारा हमेशा विद्यमान रही है, जो अपने समय के सापेक्ष विकसित और वैज्ञानिक विचारधारा रही है, बल्कि इसी की नींव पर मार्क्स ने अब तक के सबसे वैज्ञानिक और विकसित दर्शन की इमारत खड़ी की है। यह मार्क्स की ही दर्शन दृष्टि है, जिससे हम चीजों को उसकी निरन्तरता में देख पा रहे हैं। मार्क्स का दर्शन कहता है-‘‘प्रत्येक वस्तु सतत गतिमान व परिवर्तन की निरन्तर नवीकरण व विकास की अवस्था में रहती है, जिसमें सदैव कुछ उदित व विकसित होता रहता है तथा कुछ का हृास व विलोप होता रहता है।’’ जाहिर है यह प्रक्रिया दर्शन के क्षेत्र में भी होती है। एक ज्ञान की नींव पर दूसरे ज्ञान की इमारत तैयार होती है। 
यह महत्वपूर्ण है कि मार्क्स के दर्शन ने न सिर्फ प्रकृति के साथ समाज को भी समझने की दृष्टि प्रदान की, बल्कि समाज के सचेत बदलाव का दर्शन भी दुनिया को प्रदान किया। यानि इस दर्शन ने दुनिया के इतिहास को देखने की दृष्टि प्रदान की, जिससे हम बेहतर भविष्य के लिए वर्तमान में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित कर सके। इस रूप में कार्ल मार्क्स ने अपना जीवन न सिर्फ दुनिया को समझने में लगाया, बल्कि उसे बदलने के काम में भी उतनी ही लगन से लगे रहे। याद रखें कि यह कार्ल मार्क्स की 200वीं जयन्ती है, मार्क्सवादी दर्शन की उम्र इससे भी कम है, लेकिन इतने कम समय में इस दर्शन ने दुनिया भर में बदलाव की ऐसी बयार बहा दी, कि दुनिया भर के शोषक-शासकों के कार्यों का सबसे बड़ा हिस्सा, शक्ति, समय और धन इस दर्शन से लैस और प्रेरित आन्दोलनों को रोकने में खर्च हो रहा है। 
5 मई 1818 को जर्मनी (तत्कालीन प्रशा के राहन क्षेत्र में) में जन्मे कार्ल मार्क्स का समाज के लिए किये गये योगदानों की चर्चा की जाये, तो इस पर कई पुस्तक लिखी जा सकती है, क्योंकि मार्क्स के विचारों ने पूरी दुनिया में प्राकृतिक विज्ञान, समाज विज्ञान के साथ-साथ कला, संस्कृति, साहित्य आदि को भी गहरे तक प्रभावित किया है। मार्क्स के योगदानों को एक छोटे से लेख में बयान करना मुश्किल है, लेकिन दुनिया भर के शोषितों उत्पीड़ितों को लड़ने की दृष्टि देने वाले और दुनिया भर के शासकों और मुनाफाखोरों को डराने वाले इस दर्शन पर संक्षिप्त चर्चा मार्क्स की 200 वीं जयन्ती पर आवश्यक है, ताकि इस वैचारिक हथियार को हम शोषित एक बार फिर से याद कर इसका इस्तेमाल तेज कर सकें। लेकिन उसके पहले यह कहना आवश्यक है कि आज हम जिसे मार्क्सवादी दर्शन कहते हैं, वह मार्क्स और एंगेल्स का साझा काम है। दोनों जिगरी दोस्त थे और दुनिया को समझने और बदलने में दोनों की दोस्ती भरी साझेदारी ऐसी थी, कि मार्क्स के साथ हमेशा एंगेल्स का नाम आ ही जाता है। दोनों अपने दर्शन के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी दोस्ती के लिए भी हमेशा याद किये जायेंगे। इसके साथ ही मार्क्स की पत्नी जेनी उनके हर लिखे की पहली पाठक और सुझावदाता थीं। 
जैसा कि पहले कहा गया है कि मार्क्स का दर्शन या विचार कोई जड़ दर्शन नहीं है। इस दर्शन की मूल बात यही है कि मार्क्सवाद ने दुनिया को देखने का वह नजरिया उपलब्ध करा दिया, जिसके माध्यम से हर समय को, हर समाज की परिस्थिति को समझा जा सकता है। मार्क्स ने अपने समय तक पूंजी का जो रूप देखा, उसके आधार पर उन्होंने ‘पूंजी’ के तीन खण्ड लिख कर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में शोषण की व्यवस्था को इतने अकाट्य तरीके से बयान किया, कि इसका खण्डन आज तक कोई भी अर्थशास्त्री या दार्शनिक नहीं कर सका है। लेकिन मार्क्स ने पूंजी के साम्राज्यवादी और एकाधिकारी स्वरूप को अपने समय में नहीं देखा, जिसे बाद में ब्लादिमीर लेनिन ने देखा समझा और इसे लिखकर मार्क्सवादी दर्शन को समृद्ध किया। लेनिन के बाद माओत्से तुंग ने चीन जैसे उन देशों में साम्राज्यवादी पूंजी के आगमन के प्रभाव को देखा और समझा, जहां अभी पूंजीवाद नहीं आया था, बल्कि यह समाज सामंती व्यवस्था से निकलने की प्रक्रिया में ही था। उन्होंने ऐसे समाजों की अर्थव्यवस्था को ‘अर्द्धसामन्ती-अर्द्धऔपनिवेशिक’ के रूप में व्याख्यायित कर इन देशों में बदलाव का नया रास्ता दिखाया, जिसे ‘समाजवादी क्रांति’ नहीं, बल्कि ‘नवजनवादी क्रांति’ कहा। माओ का यह योगदान भी मार्क्सवादी विचारधारा का संवर्धन थी। माओ ने दर्शन के स्तर पर भी, खास तौर से प्रकृति विज्ञान और समाज विज्ञान में अन्तर्विरोधों को समझने में मार्क्सवादी ज्ञान दर्शन में अमूल्य इजाफा किया। आज जब हम अपने देश में बदलाव के लिए मार्क्सवादी दर्शन से रोशनी ग्रहण करते हैं तो मार्क्स के साथ लेनिन और माओ के विचारों के साथ ही करते हैं। इन्हें छोड़कर हमारा मार्क्सवाद का ज्ञान अधूरा रह जायेगा।

विज्ञान और दर्शन में मार्क्सवाद का योगदान : 

दुनिया को समझने के लिए अब तक तीन तरह के दर्शन रहे है। पहला है आध्यात्मवादी या भाववादी दर्शन- जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड की प्रत्येक घटना या गति के लिए कोई अदृश्य शक्ति जिम्मेदार है। इस अदृश्य शक्ति को ही ईश्वर माना गया। यह दुनिया का सबसे पहला दर्शन है, जो कि अज्ञान से उपजा था, लेकिन ब्रह्माण्ड की अनेक गतियों और घटनाओं का ज्ञान होते जाने के बाद भी यह दर्शन आज भी समाज में न सिर्फ मौजूद है, बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से को जकड़े हुए है आज के समय में यह शोषकों का दर्शन है। 
ज्ञान का स्तर आगे बढ़ने पर जो दूसरा दर्शन आया वह है भौतिकवादी दर्शन- जिसके अनुसार हर चीज का कारण इसी जगत में है, कोई अदृश्य कारण नहीं। यह ज्ञान के स्तर पर एक छलांग थी, लेकिन यह गतियों और घटनाओं के कारणों को सम्पूर्णता में देख पाने में अक्षम था, क्योंकि यह वस्तुओं की आन्तरिक गति तक नहीं पहुंच सका था, तथा गतियों और घटनाओं के केवल बाहरी कारणों के आधार पर उन्हें समझने की असफल कोशिश करता है।
मार्क्स ने इस दर्शन परम्परा में जोड़ा कि ‘हर गति का कारण इसी दुनिया में मौजूद है, साथ ही हर गति या विकास का कारण द्वन्द है, यह जगत और इसका हर पदार्थ द्वंदात्मक गति के कारण आगे बढ़ रहा है।’ ‘द्वंदात्मक गति’ का मतलब है एक बाहरी गति तथा दूसरी आन्तरिक गति, जिसमें आंतरिक गति प्रधान होती है। इन दोनों गतियों का परिणाम है ब्रह्माण्ड और समाज की कोई भी गति और विकास। इसी कारण मार्क्स के दर्शन को ‘‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’’ कहा जाता है। 
यह दर्शन ज्ञान के क्षेत्र में ऐसी छलांग थी, जिसने प्रकृति विज्ञान और समाज विज्ञान की एक बड़ी गुत्थी को सुलझा दिया। द्वंदात्मक भौतिकवाद संसार को देखने का ऐसा नजरिया था, जिसने अब तक ज्ञात बातों को समझने और अज्ञात बातों तक पहुंचने का सूत्र पकड़ा दिया। यही वजह है कि दुनिया में मार्क्सवाद यानि द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन के आने के बाद विज्ञान के क्षेत्र में सालों तक एक से बढ़कर एक बड़ी सैद्धांतिक खोजें होती रहीं। 19 सदी के मध्य में ही एंगेल्स ने ‘प्रकृति में द्वंदात्मक गति’ नामक आलेख के माध्यम से खगोल विज्ञान यानि अन्तरिक्ष के रहस्यों को समझने का प्राथमिक सूत्र थमा दिया था। ब्रह्माण्ड को समझने के लिए आइंस्टीन के ‘सापेक्षिकता के सिद्धांत’ जैसी बड़ी खोज का मुख्य आधार यह दर्शन है। यह दर्शन चूंकि संसार के हर अज्ञात कारणों को जानने का साहस देता है, इसलिए पूंजीवादी अराजकता के आज के दौर में इसे कुंद करने की फिर से साजिश रची जा रही है, जैसे तथाकथित ‘गॉड पार्टिकल’ की खोज का ढोंग, जिसमें अरबों रूपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। गॉड पार्टिकल’ की खोज करने के दर्शन का आधार दरअसल पुराना भाववादी और आध्यात्मिक दर्शन ही है, जो मानता है कि कोई अदृश्य शक्ति दुनिया को संचालित कर रही है। ऐसा नहीं है कि इस अन्तिम पार्टिकल का नामकरण ‘गॉड’ या ‘ईश्वर’ के नाम पर यूं ही कर दिया गया, बल्कि इसके पीछे की सोच भी विज्ञान से दूर लेकर जाती है और चुपके से धार्मिक दर्शन की गोद में बिठा देती है। ‘गॉड पार्टिकल’ की खोज उस काल्पनिक सबसे छोटे अणु की खोज करना है, जिसका विखण्डन न हो सके। अर्थात ये ऐसा पार्टिकल होगा, जो शाश्वत है, यानि जो हमेशा से था और रहेगा। इस खोज के पीछे की सोच है कि ब्रह्माण्ड में एक अन्तिम अणु है जिसे किसी अदृश्य शक्ति ने बनाया है, जिसका नाम ईश्वर है। इसके आगे ज्ञान की धारा पर विराम लग जाता है। यदि इस प्रयोग से ऐसा साबित हो भी गया कि सबसे छोटा पार्टिकल यह है, तो भी इस अणु के आगे न देख पाना इस समय की सीमा है, न कि विज्ञान की। 
मार्क्सवादी दर्शन यह बताता है अणुओं के विखण्डन की कोई सीमा नहीं, हर अणु विखण्डनीय है, इसलिए अन्तिम या प्रारम्भिक अणु या किसी अदृश्य शक्ति द्वारा तैयार ‘गाड पार्टिकल’ जैसे किसी अणु का अस्तित्व नहीं हो सकता। हर पदार्थ अपना रूप बदलता है। अणुओं के संघनित और विरल होते जाने से पदार्थ का रूप बदलता जायेगा।
दुनिया में मार्क्सवादी दर्शन को लागू करने वाली सामाजिक व्यवस्था क्योंकि इस समय पूरी दुनिया में नहीं है, इस कारण इस समय विज्ञान का दार्शनिक और सैद्धांतिक विकास भी ठहरा हुआ है, आज जिस विकास को हम देख रहे हैं, वह दरअसल तकनीकी विकास है, जो कि पूंजीवादी शोषण को तेज करने का ही काम कर रहा है।

समाज विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्स का योगदान : 

मार्क्सवादी दर्शन द्वंदात्मक भौतिकवाद की यह विशेषता है कि इससे केवल प्रकृति विज्ञान ही नहीं बल्कि समाज विज्ञान की गति को भी साफ-साफ समझा जा सकता है। मार्क्स और एंगेल्स ने द्वंदात्मक भौतिकवाद के दर्शन को समाज पर लागू कर समाज की गति की व्याख्या की, तो उसे ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ कहा गया। इसके पहले इतिहास को दो शासकों के यु़द्धों या विशेष राज में उस समय के प्रशासनिक खूबियों या कमियों के रूप में ही बयान किया जाता रहा। लेकिन मार्क्सवाद के ‘ऐतिहासिक भौतिकवादी’ दर्शन ने समाज विकास का कारण ‘वर्ग संघर्ष’ बताया। यानि इतिहास सिर्फ दो राजाओं के बीच परस्पर युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह शासक और शोषितों के बीच के अन्तर्विरोध और उससे उत्पन्न ‘वर्ग संघर्षों’ का विज्ञान है, जिससे समाज आगे बढ़ता है तथा निरन्तर विकास की नयी मन्जिल की ओर बढ़ता रहता है। हर समाज व्यवस्था में शासक और शोषकों के बीच का अन्तर्विरोध उस समय में मौजूद उनके बीच के उत्पादन सम्बन्धों को तोड़ कर आगे बढ़ने, (जो कि शोषित करता है) और उसे बनाये रखकर शोषण जारी रखने, (जो कि शोषक करता है) का होता है। इस सम्बन्ध को तोड़कर आगे बढ़ने के लिए तत्पर वर्ग अपने समय का प्रगतिशील और क्रांतिकारी वर्ग होता है और उसे रोक कर रखने वाला वर्ग पिछड़ा और प्रतिक्रियावादी वर्ग होता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के इसी सूत्र पर अब तक समाज दास युग, सामंती युग से होता हुआ पूंजीवादी और साम्राज्यवादी युग तक पहुुुंचा है, तथा इसी वैज्ञानिक नियम के आधार पर यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि इसकी अगली मंजिल समाजवाद और साम्यवाद होगी। भारत के सन्दर्भ में यह नवजनवाद से होकर समाजवाद के रास्ते पर बढेगा। भारत में अपने सामंती उत्पीड़कों के खिलाफ किसान, दलित, आदिवासी, और साम्राज्यवाद के खिलाफ मजदूर वर्ग आज का प्रगतिशील क्रांतिकारी तबका है, क्योंकि यही उस पुराने उत्पादन सम्बन्धों को तोड़ने की दिशा में बढ़ रहा है, जिसे मनुवादी सामंती सत्ता और साम्राज्यवादी कॉरपोरेटी घराने शोषक वर्ग के रूप में, बनाये रखने का प्रयास कर रहे हैं। 
कुल मिलाकर यह कि आध्यात्मिक और भाववादी दर्शन समाज व्यवस्था के बारे में यह बताता है कि दुनिया में अमीर और गरीब शोषक और शोषित बनाने वाला भगवान है, और वह इंसान के पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर अमीर और गरीब बनाता है, या अपने दुखों में खुश रहना उसे स्वीकार करना ईश्वर को खुश करने जैसा है, जिसका परिणाम इंसान को मरने के बाद मिलेगा। पूंजीवादी भौतिकवादी दर्शन अब यह बताता है, कि ‘जो जितना मेहनत करता है उतना अमीर होता जाता है’, और यह कि ‘अमीर आदमी दिमागी मेहनत करके अमीर बनता है’, जो कि गरीब नहीं कर सकता, क्यांेकि उसके पास दिमाग कम है। वहीं ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ बताता है कि समाज आज जैसा भी है, वह यहां मौजूद दो वर्गों के अन्तर्विरोधों के आधार पर है, और इसी के कारण वह बदलेगा। इतिहास की गति, जो कि शोषित वर्ग की चेतना का निर्धारण भी करती है, इसी चेतना से वह अपनी भौतिक स्थितियों यानि पुराने उत्पादन सम्बन्धों को बदलने का काम करता है। जैसे पूंजीवाद में उत्पादन की पद्धति का सामूहिकीकरण, लेकिन उत्पादन के साधनों पर निजी मिल्कियत, यह ऐसा अन्तर्विरोध है, जिसकी स्वाभाविक मांग समाजवादी अर्थव्यवस्था है। उत्पादन में सख्त अनुशासन और बाजार में अराजकता यह सब भौतिक परिस्थितियां मिलकर पूंजीवाद के प्रगतिशील वर्ग मजदूर की उस चेतना का निर्धारण करती है, जो इस पुराने उत्पादन सम्बन्धों को बदलने की ओर उसे प्रेरित करती है। 
क्योंकि समाज में दो वर्ग हैं इसलिए समाज में व्याप्त अराजकता को देखने का दो दर्शन भी मौजूद रहता है। सही-गलत दर्शन को चुनने के सन्दर्भ में मार्क्स का कहना है ‘‘जब हम ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे प्रगतिशील वर्ग का दृष्टिकोण अपनाते हैं, केवल तभी हम सत्य के और अधिक निकट पहुंचने में समर्थ हो सकते हैं।’’

अर्थशास्त्र को मार्क्स का योगदान : 

हलांकि सम्पूर्णता में देखने पर समाज विज्ञान से अर्थशास्त्र को अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन चूंकि मार्क्स ने अपने समय में अदृश्य शोषण की एक ऐसी गुत्थी को सुलझा ली थी, जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के शोषण को उजागर कर देती है, इसलिए उनके इस योगदान को अर्थशास्त्र का हिस्सा माना जाता है। मार्क्स का समाज को यह ऐसा योगदान है कि पूंजीवादी अर्थशास्त्री आज तक मार्क्स के इस काम पर मौन साधे हुए हैं। 
सामंतवादी उत्पादन सम्बन्धों को तोड़कर जब यूरोप में पूंजीवाद आया, तो उसने यह दावा किया कि उसने श्रम को मुक्त कर दिया है, हर किसी को उसके किये का दाम यानि फल मिलेगा और किसी का शोषण नहीं होगा। लेकिन उसने इस दावे की आड़ में श्रम के जिस शोषण को अपनाया, उससे श्रम बेचने के लिए मुक्त और वस्तुओं के उत्पादन करने में लगे मजदूर की स्थिति में तो कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि मजदूरों के श्रम से माल उत्पादन में लगे पूंजीपति अमीर से अमीर होते गये। पूंजीपति का यह दावा था कि वह तो मजदूर को पूरी मजदूरी दे रहा है, उसका मुनाफा उसकी अपनी पूंजी और दिमाग के कारण हो रहा है, जो कि मजदूरों के पास नहीं है। मार्क्स ने इसी गुत्थी को सुलझाने में सालों लगाये उन्होंने तीन खण्डों में ‘पूंजी’ लिख कर पूंजी के चरित्र को तो दुनिया के सामने रखा ही, साथ ही उन्होंने मजदूरों के श्रम का गबन करने वाली पूंजीपतियों की नीति को भी समझाया जिसे ‘अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत’ कहते हैं। उन्होंने बताया कि पूंजीपति अपना मुनाफा अपने दिमाग या कारोबार में लगाई गयी पूंजी से नहीं कमाता है, बल्कि वह अपना मुनाफा मजदूरों के श्रम की चोरी से ही कमाता है। संक्षेप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पूंजीवाद के आने के बाद नित नयी विकसित तकनीक वाली मशीनों के रूप में मनुष्य का श्रम पहले ही लग चुका होता है। मशीनें मनुष्य के श्रम का ही विकसित रूप है और कुछ नहीं। यानि यदि मनुष्य पहले यदि 8 घण्टे में 10 जोड़ी जूते बना लेता था, और आठ घण्टे का उस 200 रूपये मिलता था (जो कि हम फिलहाल मान लेते हैं, कि उसके पुनरूत्पादन पर लगने के लिए पर्याप्त हैं। अब नयी विकसित मशीनें, जो कि मजदूरों के श्रम का ही विकसित रूप है, के आ जाने पर वह 10 जोड़ी जूते 4 घण्टे में ही बना लेता है, लेकिन पूंजीपति अब भी उससे 8 घण्टे ही काम ले रहा है, और मजदूरी उतनी ही दे रहा है, या वो एक मजदूरी में दो मजदूर का काम करा रहा है। यानि श्रम के विकसित रूप में मशीनों के इस्तेमाल से एक मजदूर पहले 4 घण्टे में ही खुद को मिलने वाले मूल्य का श्रम कर ले रहा है, उसके आगे के 4 घण्टे जो वह श्रम कर रहा है, वह पूंजीपति द्वारा उसके श्रम की चोरी है और यही उसके मुनाफे का आधार है, न कि पूंजीपति की पूंजी। 
दुनिया में हर पूंजी का आधार श्रम ही है और कुछ नहीं। इस रूप में दुनिया की मुख्य पूंजी प्रकृति के बाद श्रम है, एक पर कब्जा कर और दूसरे की चोरी कर पूंजीपति अपना मुनाफा बढ़ाता जाता है। इसे ही ‘अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत’ कहते हैं। यह मुनाफाखोर पूंजी समाज में अराजकता पैदा करता है, शोषण को बढ़ाती है। इसी कारण मंदी का बार-बार आना तय है, इसका कारण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ही निहित है। पूंजीवाद के खात्मे के साथ ही यह मंदी खत्म होगी, क्योंकि तब अर्थव्यवस्था मुनाफे पर नहीं, इंसान की जरूरत पर टिकी होगी। साथ ही मशीनों के रूप में श्रम का संग्रहण मनुष्य के श्रम को वास्तव में मुक्त करेगी, ताकि वह उसका इस्तेमाल ढेरों रचनात्मक कार्यों और इंसानियत की बेहतरी के लिए कर सके। 
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के ऐसे राज को खोलने वाली पुस्तक ‘पूंजी’ मार्क्स का समाज विज्ञान और अर्थशास्त्र के लिए बहुमूल्य योगदान है।

कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र : 

मार्क्स के महत्वपूर्ण योगदानों में यह भी उनका एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो इसका गवाह है कि ‘दुनिया को समझने का दावा तो बहुत लोग कर चुके सवाल इसे बदलने का है।’ कम्युनिष्ट घोषणा पत्र इसी बात की घोषणा है, कि यह समाज आज जैसा है वैसा नहीं रहेगा और इसका आधार मात्र भावना नहीं, बल्कि विज्ञान है। आने वाला समाज कैसा होगा इसकी भी घोषणा है यह दस्तावेज, जिसे मार्क्स ने एंगेल्स और जेनी से सलाह मशविरे के साथ 1848 में लिखा था, जो आज तक समाज बदलने वालों का महत्वपूर्ण औजार है, और जो आज भी दुनिया भर में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों की सूची में है। जिसके आधार पर 1871 में मार्क्स के ही समय में फ्रांस में पेरिस कम्यून के रूप में समाजवाद के विचार को पहली बार धरती पर उतारा भी गया। इस ऐतिहासिक घटना के बारे में भी मार्क्स ने लिखा, तथा इस घटना की समीक्षा की।

मार्क्सवाद और महिलाओं की मुक्ति : 

सदियों से पितृसत्ता की मार झेलती महिलाओं की मुक्ति के रास्ते को मार्क्सवाद ने ही सबसे वैज्ञानिक तरीके से बताया है। जिसकी घोषणा कम्युनिस्ट घोषणापत्र में तो है ही, एंगेल्स ने अपनी पुस्तक ‘परिवार निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में वैज्ञानिक तरीके से महिलाओं के शोषण और उनकी दोयम दर्जे की स्थिति को समझाया है। एंगेल्स ने बताया है कि वह निजी सम्पत्ति की व्यवस्था है, जिसने मातृप्रधान समाज को पितृसत्ता में तब्दील कर दिया और महिलाओं को पुरूषों के अधीन कर दिया। यह स्थिति हमेशा बनी रहे इसके लिए इस अधीनता को धर्म का आवरण पहना दिया गया। एंगेल्स ने मातृप्रधान समाज के पितृसत्तात्मक समाज में बदल जाने को दुनिया और समाज का पहला वर्ग विभाजन कहा है, जिसमें महिला पुरूष की दासी बन गयी। इस इतिहास को ध्यान में रख कर मार्क्सवाद यह बताता है कि महिलाओं की पूरी मुक्ति निजी सम्पत्ति के खात्मे वाली व्यवस्था के साथ ही संभव है। यह एक अलग लेख का विषय है, लेकिन यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि मार्क्सवाद को जमीन पर उतारने वाले देश सोवियत संघ में ही पहली बार महिलाओं को वोट डालने सहित ऐसे तमाम अधिकार सुनिश्चित किये गये, जिनसे समाज में स्त्री पुरूष के बीच बराबरी आ सके। मार्क्सवाद बताता है कि पूंजीवाद महिला पुरूष की गैर बराबरी की स्थिति से अपना मुनाफा बढ़ाता है, क्योंकि वह महिला के घरेलू श्रम का विनिमय मूल्य नहीं बनने देता। और जहां पूंजी के साथ सामन्ती शोषण भी मिला हो, वहां तो उनकी स्थिति और भी बुरी होगी, जैसे कि भारत में। माओ ने इस दर्शन को विकसित करते हुए कहा है कि अर्द्धसामन्ती-अर्द्ध औपनिवेशिक देशों के शोषितों पर तीन तरह का पहाड़ है, लेकिन इन देशों की महिलाओं पर यह पहाड़ चार तरीके का है, चौथा पहाड़ पितृसत्ता का है।

कला-साहित्य-संस्कृति में मार्क्सवाद का प्रभाव : 

मार्क्सवादी दर्शन जब दुनिया में आया, तो इसने न सिर्फ प्रकृति विज्ञान, समाज विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र को गहराई से प्रभावित किया, बल्कि कला साहित्य और संस्कृति की दुनिया को भी गहराई के साथ प्रभावित किया। मार्क्सवादी दर्शन यह कहता है कि जैसे शासक और शोषित वर्ग का दो अलग-अलग जीवन दर्शन होता है, उसी तरह हर साहित्य व कला भी किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। समाज के अगुवा तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाला साहित्य ही श्रेष्ठ साहित्य है। दरअसल समाज को देखने समझने की वैज्ञानिक समझ से लैस होने के वाले जनवादी साहित्य ने साहित्य के मानदण्डों को ही बदल दिया। साहित्य सिर्फ अच्छी कला प्रदर्शन का नमूना भर नहीं, बल्कि समाज बदलाव का सचेत धारदार हथियार भी बन गया। कला को सिर्फ कला के लिए नहीं, प्रगतिशील विचाारों के वाहक के रूप में देखना मार्क्सवादी दर्शन की ही देन है आज भी साहित्य में यह बहस जिन्दा है, लेकिन पूरी दुनिया में वही साहित्य सराहा गया है, जो सिर्फ यथार्थ का आइना नहीं, बल्कि जिसमें पुराने को तोड़ नये मूल्यों, विचाारों के आने की आहट भी होती है। साहित्य के साथ कला के अन्य रूप भी सिर्फ यथार्थ को चित्रित करने का एकतरफा माध्यम नहीं, बल्कि समाज को समझने आगे ले जाने का सचेत जरिया भी बनने लगा। मार्क्सवादी रंगकर्मी जर्मनी के बर्तोल्त ब्रेख्त का प्रसिद्ध कथन है कि ‘‘कला ऐसा कोई आइना नहीं है, जिसमें यथार्थ कैद किया जाता है, बल्कि कला वह हथौड़ा है, जिससे यथार्थ का रूप बदला जाता है।’’ आगे चलकर माओ ने मार्क्सवादी कला साहित्य के दर्शन को रेखांकित करते हुए कहा कि क्रांति के लिए दो फौज का होना जरूरी है। पहला बन्दूक की फौज, दूसरा कलम की फौज। कला और संस्कृति के बगैर सेना मन्दबुद्धि सेना है।’’ 
कुल मिलाकर मार्क्सवादी दर्शन ने पूरी दुनिया में खलबली पैदा कर दी। मार्क्स के विचार को, उनके दर्शन को दुनिया से खतम कर देने की कोशिशें लगातार जारी है, शोषक वर्ग की ओर से भी, खुद को मार्क्सवादी बताने वालों की ओर से भी। पिछले दो दशकों से विचारधारा का अन्त और विचारधारात्मक आन्दोलनों के युग का अन्त जैसे प्रतिक्रियावादी सिद्धांत शासक वर्ग की ओर से फैलाये जा रहे हैं। दूसरी ओर पुराने उत्पादन सम्बन्धों को ध्वस्त कर नये विकसित समाज में कदम रखने के मार्क्सवादी दर्शन को धूमिल कर उत्पादन सम्बन्धों में सुधार करने का गैर क्रांतिकारी विचार भी हमलावर है, ऐसा इसलिए भी है कि मार्क्सवाद को जमीन पर उतारने वाले देश खुद मार्क्सवादी दर्शन का विचार त्याग कर चुके हैं। लेकिन इससे यह साबित नहीं हो जाता कि मार्क्सवादी दर्शन अप्रासंगिक हो गया है, मार्क्सवाद मात्र विचार नहीं, यह दुनिया को देखने और उसे बदलने का दर्शन है, दुनिया में समाजवाद भले ही न हो दुनिया को देखने का यह दर्शन हमेशा लोगों को सही दृष्टि देता रहेगा। दूसरी बात यह कि मार्क्सवादी इतिहास ही यह बताता है कि एक समाज व्यवस्था से दूसरी समाज व्यवस्था में जाने में हर समाज को कई साल लगे। और अभी तो मार्क्सवाद को आये ही 150 साल हुए है इतिहास की दृष्टि से यह समय काल काफी छोटा है। लेकिन इस छोटी सी समय अवधि में ही दुनिया के कई देशों में इसे उतार कर दिखा भी दिया गया और कई देश इसे जमीन पर उतारने की प्रक्रिया में है। लेकिन शोषकों के वर्ग को पता चल गया है कि मार्क्सवादी दर्शन ही तीर है जिससे वे मारे जा सकते हैं, इसलिए अपने इस दुश्मन के प्रति वे ज्यादा सचेत और आक्रामक भी हैं। चाहे देश के अन्दर की बात हो या देश के बाहर हर जगह मार्क्सवादी दर्शन को जमीन पर उतारने का संघर्ष करने वाले लोग सत्ता के निशाने पर हैं। यही इस बात का प्रमाण है कि इस दर्शन से ही शोषण करनेवाला वर्ग सबसे अधिक डरता है और यही मार्क्सवाद के सटीक दर्शन होने की पुष्टि करता है। दुनिया को समझने के लिए ही नहीं इसे बदलने के लिए भी मार्क्स का दर्शन हमेशा पढ़ा जाता रहेगा, और इसे जमीन पर उतारने के आन्दोलन हमेशा जिंदा रहेंगे।

 ------ सीमा आजाद

दस्तक मई-जून २०१८ अंक में प्रकाशित लेख

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