Thursday 5 March 2020

उसने प्रेम खर्च किया और बदले में प्रेम पाया : कन्हैया कुमार ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी

Jagadishwar Chaturvedi
9 hrs
नरेन्द्र मोदी और कन्हैया कुमार में अंतर है !

नरेन्द्र मोदी हम जानते हैं आप फेसबुक शौकीन हो,यहां जो लिखा जा रहा है,उसको पढ़ते हो।हमने सबसे पहले आगाह किया था और कहा था यह कंस की तरह काम मत करो।सच सामने है जनता पर हमले हो रहे हैं। अंतत: तुमने कन्हैया कुमार आदि पर मुकदमा चलवा ही दिया! अब आएगा मजा! कन्हैया के भाषणों से आप बहुत आहत हैं! इसी प्रसंग में धूमिल की ये पंक्तियां पढ़ो ," मैं तीन बार संसद कहूँगा/ और चार बार संविधानः/हिन्दुस्तानी लुकमें की आदती जुबान/दाँतों की दलबंदी तोड़कर बाहर आ जाएगी।"
क्या राजनीतिक साख रह गयी तुम्हारी। पहली बार जब कन्हैया बोल रहा था तुम घर में बैठे उसके एक एक अक्षर को सुन रहे थे,तुम्हारे मंत्री सुन रहे थे,बटुक सुन रहे थे।यही ताकत है कन्हैया की कि उसने तुमको तुम्हारे ड्राईंगरूम में जाकर घेर लिया,तुम उसे सुन रहे थे और बड़बड़ा रहे थे,यही ताकत है मार्क्सवादी नेता की कि उसकी विचारधारात्मक मार सीधे दुश्मन के हृदय पर चोट करती है,हम जानते हैं कन्हैया ने तुमको बुरी तरह घायल किया है।
हिन्दी के बागी कवि हैं धूमिल उन्होंने भारत के बारे में लिखा है,"न कोई प्रजा है/न कोई तंत्र है/यह आदमी के खिलाफ/आदमी का खुलासा /षडयंत्र है।"

कन्हैया सामान्य नागरिक है,वह तुम्हारी तरह प्रायोजित नायक नहीं है।वह रीयलसेंस में छात्रों का नायक है।नरेन्द्र मोदी जान लो भारत में लोकतंत्र है,तुम इसे भडुआतंत्र बनाने में लगे हो,भडुआतंत्र प्रायोजित तंत्र है,तुम उसके वैध नायक हो,जबकि कन्हैया तो इस तंत्र के खिलाफ लड़कर ही बड़ा हुआ है,वह छात्र है,आज उसके साथ देश का सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय खड़ा है,सारा देश उसे सुन रहा है,सारे चैनल उसे दिखा रहे हैं,इसके लिए उसने एक पैसा खर्च नहीं किया,बिना पैसा खर्च किए इतना विशाल कवरेज,इतनी प्रशंसा और लाखों छात्रों का नायक बनने में उसने क्या खर्च किया ? उसने प्रेम खर्च किया और बदले में प्रेम पाया।तुमको तो प्रेम से ही चिढ़ है।
संघी लोग उसके खिलाफ हीनताग्रंथी से ग्रस्त राग अलाप रहे हैं।संघियो कन्हैया के सामने रखकर देखो अपने को।सच कहो हीनताग्रंथी के शिकार हो या नहीं? सच कहो रात में ठीक से नींद आती है या सपने में भी कन्हैया कन्हैया जपते हो! 
नरेन्द्र मोदी यह जान लो जेएनयू के हाथों जो नेता पिटता है उसको स्वर्ग-नरक कहीं पर जगह नहीं मिलती,आज तुम त्रिशंकु हो! जेएनयू के भावबोध को धूमिल ने सही व्यक्त किया है,लिखा है-" मेरा जानना/और तुम्हारा नकारना/हमें इस काबिल बनाते हैं/ कि हम/ चेहरे को चेहरा और चाकू को चाकू कह सकें।"

मोदी के ज़रिए जो लोग आधुनिक भारत का सपना देख रहे थे उनके सपनों पर मोदी ने सीएए-एनआरसी-नोटबंदी नामक तेज़ाब फेंक दिया है। इससे मोदी का आधुनिक नहीं मध्यकालीन रुप सामने आया है ।

धूमिल ने कहा है- "पेट और प्रजातंत्र के बीच का संबंध/ उसके पाठ्यक्रम में नहीं है।"

नरेन्द्र मोदी सोचो तुम आज कन्हैया के सामने बौने क्यों लग रहे हो? मोदी ,तुमने छात्रों की ललकार और प्रतिवाद को नहीं देखा !तुम हमेशा चाटुकारों में रहे,चाटुकार विचारधारा का आनंद लिया,तुम क्या जानो भारत क्या है ? भारत के छात्र का दर्द क्या है? तुमको तो कभी ठीक से किसान- मजदूर से बात करते हुए भी नहीं देखा किसी ने ! तुमने वही बोला जो सत्ता के लुटेरों ने बुलवाया,तुमने कभी भारत के मन को जानने का प्रयास नहीं किया।तुम सत्ता,अमीर और विज्ञापन कंपनियों की बैसाखियों पर सवार होकर पीएम बने हो,तुम क्या जानो आम आदमी का दर्द !देखो कन्हैया कहां से खड़े होकर देश को देख रहा है और तुम कहां से खड़े होकर देख रहो !तुम्हारी जमीन और कन्हैया की जमीन अलग है,तुम्हारे सपनों का भारत और कन्हैया के सपनों का भारत अलग है,तुम्हारे राजनीतिक सरोकार और कन्हैया के सामाजिक सरोकार अलग हैं,तुम्हारी भाषा और उसकी भाषा अलग है,तुम्हारी घृणा और उसकी घृणा अलग है,तुम्हारे दोस्त और कन्हैया के दोस्त अलग हैं,तुम्हारा देशप्रेम और कन्हैया का देशप्रेम अलग है।कन्हैया में देश बोल रहा है तुममें संघी बोल रहा है,तुम सारे देश में उन्माद के नायक बनकर आए लेकिन कन्हैया देशप्रेम और संघर्ष का नायक बनकर उभरा है।यही वजह है नरेन्द्र मोदी तुम कन्हैया के सामने बौने लग रहे हो।

धूमिल ने लिखा- "यौवन एक ऐसा सिक्का है/जिसके एक ओर प्यार/और दूसरी ओर गुस्सा छपा है।"

नरेन्द्र मोदी तुम भय और सत्ता का आतंक पैदा करके बुद्धिजीवियों और जनता को चुप कराना चाहते थे,लेकिन तुम्हारी सारी रणनीति जेएनयूवालों ने पंक्चर कर दी है।अब आगे सोचो क्या करोगे? बुद्धिजीवियों पर धूमिल ने लिखा है- "वह एक दुधमुँही दिलचस्पी है/कुलबुल जिज्ञासा है/जिसे मारने के लिए इस पृथ्वी पर/ अभी कोई गोली नहीं बनी।"

असल में भाड़े के टट्टुओं के बल पर राजनीति करने वाले और जनबल के आधार पर राजनीति करने वाले का फर्क देखना हो तो नरेन्द्र मोदी और कन्हैया में अंतर देखो,मोदी ने अरबों रूपये खर्च करके जितनी जनप्रियता हासिल की उससे कहीं ज्यादा जनप्रियता कन्हैया ने फूटी कौड़ी खर्च किए बिना हासिल कर ली ।
जिस समय कहा जा रहा था वाम का अंत हो गया ठीक उसी समय जेएनयू की राख से कन्हैया का जन्म हुआ और आज यह वाम का नायक हर शिक्षित की जुबान पर है।मीडिया की सुर्खियों में है,इसे कहते हैं धूल का फूल। कन्हैया का मार्ग वह है जिसका 
धूमिल ने जिक्र किया है, लिखा, "आज की भूख से भूख के अगले पड़ाव तक/लिख दें/यह रास्ता लोकतंत्र को जाता है।"
पीएम मोदी की बड़ी उपलब्धि है कि उनके सत्तारूढ होते ही भाजपा हेट स्पीच पार्टी में रूपान्तरित हो गयी ।मीडिया इन घृणा प्रचारकों की भक्ति में डूबा है।

कन्हैया को मोदी की तरह किसी विज्ञापन एजेंसी ने प्रमोट नहीं किया,कन्हैया को किसी अदानी-अम्बानी ने मुखौटे के रूप में खड़ा नहीं किया,कन्हैया तो विलोम है पूंजीवादी शोषण का।आज कन्हैया करोडो़ं भारतीयों के घर में पहुंच गया है,प्रत्येक छात्र उसका नाम जानता है,हर बुद्धिजीवी उसे सुन रहा है,उसके बारे में पढ़ रहा है,वह संसद से साइबर तक आम भारतीय का कण्ठहार बन गया है ,जानते हो ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि कन्हैया सच्चा देशप्रेमी है।सच्चा कम्युनिस्ट है।कम्युनिस्ट सारी दुनिया में अपने विचारों और आदर्शों के कारण जनप्रिय रहे हैं,कन्हैया की जनप्रियता और देशप्रेम की धुरी है उसका मार्क्सवादी नजरिया।

धूमिल ने लिखा है-" मैं ...ज...हूँ...ज/और तुम ...न ...हो/ हम दोनों मिलकर "जन" बनाते हैं/तुम मुझे कहीं भी देख सकते हो।"

कन्हैया ने अपने लाइव टीवी प्रसारणों के जरिए "आजादी" और इंकलाब के नारे को भारत की जनता का जनप्रिय नारा बना दिया ।आज आज़ादी और इंकलाब एक विचार हैं, जनांदोलन हैं। अंत में

धूमिल के ही शब्दों में "न मैं पेट हूँ/न दीवार हूँ/न पीठ हूँ/अब मैं विचार हूँ।"

साभार : 

https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/3235359559826062

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