Wednesday, 22 July 2026

आंदोलन मर गया है ------ सुनिधि

 ------


स्पेशल एपिसोड | जनता नहीं मरी है, आंदोलन मर गया है!

जब संघर्ष असली होता है, तब सत्ता भी झुकती है और जनता भी उठ खड़ी होती है।

नमस्कार साथियों,

मैं हूँ सुनिधि और आप देख रहे हैं "राम या वाम"।

साथियों, आज का यह एपिसोड सिर्फ एक राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि वामपंथ और जन आंदोलनों के सामने खड़े सबसे बड़े सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है।

कल दिल्ली की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसने वर्षों से फैलाए जा रहे एक बड़े राजनीतिक झूठ को बेनकाब कर दिया।

हमें लगातार बताया गया कि आज का युवा सिर्फ धर्म, राष्ट्रवाद और प्रचार की राजनीति में उलझ चुका है। कहा गया कि अब युवा सड़क पर नहीं उतरता, उसे केवल सोशल मीडिया की राजनीति पसंद है।

लेकिन कल दिल्ली ने इस झूठ की धज्जियाँ उड़ा दीं।

हजारों युवा सड़कों पर थे।

लाठी चली...

आँसू गैस चली...

पानी की बौछारें चलीं...

लेकिन युवा पीछे नहीं हटे।

इसका मतलब साफ़ है।

युवा मरा नहीं है।

उसका गुस्सा मरा नहीं है।

उसकी लड़ने की इच्छा मरी नहीं है।

मर गई है तो केवल वह राजनीति, जिसने संघर्ष करना छोड़ दिया है।

ध्यान से देखिए...

शुरुआत में इस आंदोलन में भीड़ नहीं थी।

लेकिन जैसे-जैसे लोगों को भरोसा हुआ कि यह केवल फोटो खिंचवाने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि अंत तक लड़ने वाला संघर्ष है, वैसे-वैसे जनता भी जुड़ती चली गई।

जनता भाषण नहीं देखती...

जनता प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं देखती...

जनता यह देखती है कि नेता उसके साथ लाठी खाता है या नहीं।

जेल जाता है या नहीं।

अनशन करता है या नहीं।

अंत तक डटा रहता है या नहीं।

यही भरोसा आंदोलन की सबसे बड़ी पूँजी होता है।

अब मैं वामपंथ से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ।

जिस संगठन की पूरे देश में मजबूत संरचना भी नहीं है, जो अभी शुरुआती दौर में है, यदि वह लगातार संघर्ष करके हजारों युवाओं को सड़क पर ला सकता है...

तो फिर सौ साल पुराना वामपंथ जनता को क्यों नहीं जगा पा रहा है?

क्या जनता खत्म हो गई?

नहीं।

क्या मुद्दे खत्म हो गए?

नहीं।

महँगाई है।

बेरोज़गारी है।

निजीकरण है।

चार श्रम संहिताएँ हैं।

आउटसोर्सिंग है।

मजदूरों पर हमले हैं।

किसानों की बदहाली है।

संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस है।

यानी मुद्दों का पहाड़ खड़ा है।

फिर भी आंदोलन क्यों नहीं खड़े हो रहे?

क्योंकि संघर्ष की राजनीति की जगह कार्यक्रमों की राजनीति ने ले ली है।

एक दिन धरना...

एक दिन प्रदर्शन...

एक ज्ञापन...

एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस...

फिर सब अपने-अपने घर।

क्या ऐसे सत्ता बदलती है?

क्या ऐसे इतिहास लिखा जाता है?

बिल्कुल नहीं।

इतिहास हमेशा उन्हीं लोगों ने लिखा है जिन्होंने आख़िरी साँस तक लड़ाई लड़ी।

अन्ना आंदोलन...

किसान आंदोलन...

देश के तमाम बड़े जन आंदोलन...

इन सबने साबित किया कि जनता तभी जुड़ती है जब उसे विश्वास होता है कि नेतृत्व बिकेगा नहीं, झुकेगा नहीं और भागेगा नहीं।

यही वह जगह है जहाँ, मेरी राय में, आज वामपंथ का एक हिस्सा सबसे बड़ी भूल कर रहा है।

ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के लिए संघर्ष से ज़्यादा महत्वपूर्ण कुर्सी हो गई है।

उन्हें डर रहता है कि बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ तो नए कार्यकर्ता उभरेंगे, नया नेतृत्व सामने आएगा और वर्षों से जमी हुई राजनीति को चुनौती मिलेगी।

इसलिए आंदोलन को बड़ा होने से पहले ही सीमित कर दिया जाता है।

और ये ऐलसोनवादी नेतृत्व जिन्हें न तो आंदोलन से मतलब है ना जनता के दर्द से मतलब है यह सिर्फ और सिर्फ किसी तरह पद पर बना रहना है ताकि समय पर सौदेबाजी कर अपने लिए उचित लाभ प्राप्त कर सके, उन्होंने आंदोलन करना सिर्फ छोड़ ही नहीं दिया है बल्कि उन्हें आंदोलन से विश्वास उठ गया है उन्हें पता है बड़े आंदोलन में 9 केवल सरकारी होती है बल्कि बहुत सारे नेतृत्वकारी साथी सामने आ जाते हैं और जैसे किसी भी साधु की तपस्या से इंद्र डर जाता है उसका अपना इंद्रासन खतरे में दिखाई देने लगता है ठीक उसी तरह से बड़े आंदोलन से यह तथाकथित वामपंथी नेता डर जाते हैं उन्हें अपनी कुर्सी खतरे में दिखाई देने लगती है और इसलिए वह ऐसा नहीं होने देना चाहते इसलिए आंदोलन मर रहा है बाम आज भी समाज में अपना स्थान रखता है लोगों के बीच उसके मुद्दे उसके तौर तरीके महत्व रखते हैं या आज भी अप्रांसगिक नहीं हुआ है लेकिन एक षड्यंत्र के तहत इसके वर्तमान नेतृत्व इसे असफल बनाने का प्रयास करता रहा है

धरना हो...

लेकिन लंबा नहीं।

संघर्ष हो...

लेकिन निर्णायक नहीं।

भीड़ आए...

लेकिन नेतृत्व न बदले।

यही सोच आंदोलन को मार रही है।

याद रखिए...

वामपंथ नहीं मरा है।

वामपंथ का विचार नहीं मरा है।

मरा है तो संघर्ष का साहस।

जिस दिन वामपंथ फिर से जनता के बीच जाएगा...

जिस दिन मजदूर, किसान, छात्र और नौजवान के सवालों पर महीनों तक डटकर लड़ना शुरू करेगा...

उसी दिन लाखों लोग फिर लाल झंडे के नीचे दिखाई देंगे।

क्योंकि जनता आज भी न्याय चाहती है।

जनता आज भी बराबरी चाहती है।

जनता आज भी संघर्ष करने वालों का सम्मान करती है।

इसलिए मैं एक बार फिर कहता हूँ—

जनता नहीं मरी है...

आंदोलन मर गया है...

और जिस दिन आंदोलन फिर ज़िंदा होगा...

उसी दिन इतिहास फिर करवट लेगा।

लाल सलाम!

इंकलाब ज़िंदाबाद!

शुद्धिकरण अभियान समिति ज़िंदाबाद! 


संदर्भ =====  https://www.facebook.com/reel/1747155269800555/?__cft__[0]=AZaVxDFNlwnAHM0qpX8Miz5BqFNBgMdGxx9WAZD0Vllg2HQ6aFCoywq4z_8Xls-W7ITfJdmrakOhbcSr1si3jF1uhTa_-_0lxkjsbWoWjyT_4VeBEX4sZLxuHRx2OxxrfoOIQJDqozOtS4rQlbPsS7VzPz4LJzMHqGfijRCcq0s_XQV4p8XX7-YQSknFH13ylac&__tn__=%2CO%2CP-y-R

No comments:

Post a Comment