Sunday, 9 February 2020

मनुष्यता के संघर्ष की मशाल आने वाली पीढियां ही थामेंगी ------ हेमंत कुमार झा

Hemant Kumar Jha
09-02-2020


 यह कैसा वैचारिक द्वैध या विभ्रम है जिसमें भारत का मध्य वर्ग उसी व्यवस्था को अपने कंधे पर उठाए है जो एक-एक कर उसका बहुत कुछ छीनती जा रही है और तय है कि ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन इंसान होने का उसका हक भी छीन लिया जाएगा।

पारंपरिक अवधारणाओं के अनुसार मध्य वर्ग की जो छवि उकेरी जाती रही है उसमें इतना भी झोल नहीं है जैसा अब का मध्य वर्ग नजर आ रहा है। समाजशास्त्र की किताबों में इसे अपने हितों के प्रति सचेत वर्ग बताया गया है लेकिन इस दौर की अंधी गतिशीलता में अब इस अवधारणा पर गहरे सवाल उठ रहे हैं। यह उदारीकरण की कोख से उपजा मध्य वर्ग है जिनमें से बहुतों ने समृद्धि और सुविधाओं के अकल्पित स्तरों को छुआ है। उदारवादी-उपभोक्तावादी संस्कृति ने उन्हें पहले से अधिक खुदगर्ज बनाया है। इतना कि उनकी सचेतनता प्रभावित हुई है। इसलिये, अब 'सचेत' शब्द की जगह खुदगर्ज और आत्महंता कहना अधिक उपयुक्त लगता है।

इसमें संदेह नहीं कि आने वाली पीढियां भी इस पीढ़ी को अपराधी ठहराएंगी क्योंकि इतिहास उन्हें बताएगा कि किस दौर में इंसानियत से क्या-क्या छीना गया और प्रतिरोध के बदले उनके बाप-दादे उसी लुटेरी व्यवस्था की न सिर्फ जय जय कार करते रहे बल्कि उसके सबसे मजबूत समर्थक आधार भी बने रहे।

यह भी विश्लेषण का विषय होगा कि आखिर ऐसा क्या था कि नई सदी का दूसरा दशक बीतते-बीतते जब दुनिया के अनेक जागरूक देशों में मध्य वर्ग नवउदारवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होने लगा था तो भारतीय जन मानस में ऐसी कोई सुगबुगाहट भी नहीं थी। यह भी रेखांकित किया जाएगा कि व्यवस्था की दुरभिसंधियों के खिलाफ सचेत करने वाली बातों को बौद्धिक प्रलाप की संज्ञा देने में अगर कोई सबसे आगे था तो वह मध्य वर्ग ही था।

इसका कोई मतलब नहीं है कि रेलवे के निजीकरण के खिलाफ ट्रैक जाम करते बाबू लोगों की तस्वीरें आने वाली पीढ़ियों के सामने होंगी या क्वालिटी एडुकेशन को कुछ खास वर्गों तक सीमित करने की साजिशों के खिलाफ नारे लगाते छात्रों के कुछ समूहों के वीडियो उपलब्ध होंगे। इतिहास बताएगा कि ऐसे तमाम आंदोलन इसलिये असरहीन साबित हुए क्योंकि तस्वीरों में नजर आ रहे इन आंदोलित समूहों के पास ऐसा चरित्र बल ही नहीं था जो उनके आंदोलनों को धार दे सकता। यह महज़ एक रस्मी चीख-पुकार भर थी जो सुविधाओं से महरूम किये जाते वक्त की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी।

बीते महीनों में जमाने ने देखा कि एयरपोर्ट कर्मी धरती पर लोट रहे हैं और रेल कर्मी चलती ट्रेन के आगे कटने को तैयार हैं क्योंकि उनके संस्थानों को बेचा जा रहा है। इधर, पुलिस की लाठियां खा कर अपनी कमर सहलाते बिजली इंजीनियरों की तस्वीरें अखबारों में नजर आई तो सरकारी आयुध निर्माण संस्थानों के कर्मचारियों के धरना-प्रदर्शन से तमाम निर्माण इकाइयों में काम ठप रहा। नाराज बैंक कर्मियों के साथ ही विनिवेश की आहट सुन कर अब तो एलआईसी का बाबू वर्ग भी सदमें में है।

लेकिन...इनमें से किसी भी आंदोलन में ऐसी प्रभावी शक्ति नहीं है जो सरकार को थोड़ी भी चिंता में डाल सके। आखिर, आंदोलनकारियों के चरित्र बल से ही आंदोलन का चरित्र निर्धारित होता है जो उसे प्रभावी या निष्प्रभावी बनाता है। नियामकों को पता है कि दिन में सड़कों पर व्यवस्था विरोधी नारे लगाते इन तमाम बाबुओं में अधिकतर ऐसे ही हैं जो रात में टीवी पर प्राइम टाइम में विशिष्ट किस्म के राष्ट्रवाद की मनोवैज्ञानिक खुराक लेते हैं और यह देख सुन कर मुदित होते हैं कि पाकिस्तान औकात में आ रहा है...कि देश में रहने वाले देश के गद्दारों को सबक सिखाने का असल वक्त आ गया है...कि पाकिस्तान और देश के गद्दारों को सबक सिखाने वाली सरकार की जयजयकार होनी ही चाहिये।

यही वह वर्ग है जो इतिहास को विकृत कर राष्ट्रवाद की प्रायोजित लहर पैदा करने वाली फूहड़ फिल्मों को देखने मल्टीप्लेक्स में भीड़ लगा देता है और अनपढ़ जमातों में भी इतिहास के प्रति एक बेहद गलत नजरिया विकसित करने के लिये टुच्चे फिल्मकारों को प्रोत्साहित करता है।

इक्कीसवीं सदी का राष्ट्रवाद मूलतः कारपोरेट संपोषित राजनीति के छल-छद्म का आवरण है और ऐसी लुटेरी व्यवस्था का संवाहक है जो तमाम संसाधनों और संस्थानों पर कुछ खास शक्तियों के आधिपत्य की साजिशें रचती है। राजनीति की इस धारा को मध्यवर्ग का समर्थन उसे आत्महंता रास्तों पर धकेल रहा है और यही वह मनोविज्ञान है जिसकी पड़ताल भावी इतिहास करेगा।

जिनसे पेंशन छीन लिया गया, जिनकी सेवाओं के स्थायित्व पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे, जिनकी सेवा शर्त्तों से मानवीयता का लोप होने लगा...वे इन विसंगतियों से आंखें मूंद व्यवस्था के प्रायोजित प्रहसनों में उत्साह और समर्थन के साथ भाग लेते रहे। पढ़े-लिखे आदमियों का समूह मनोवैज्ञानिक स्तरों पर कैसे भेड़ों के समूह में बदला जा सकता है, यह दौर इसका नायाब उदाहरण प्रस्तुत करता है।

जैसे पेंशन खत्म होना ही काफी नहीं था, सेवा के स्थायित्व पर सवालिया निशान ही काफी नहीं थे, सेवा शर्त्तों में मानवीयता का ह्रास ही काफी नहीं था...भविष्य की सुरक्षा के लिये मध्य वर्ग की प्रिय बचत योजनाओं को हतोत्साहित करने के कदम भी उठाए जाने लगे। हालिया बजट में आयकर से बचत योजनाओं को अलग करने की घोषणा इसी कड़ी में एक निर्णायक कदम है।

दरअसल, लंबे समय से कारपोरेट प्रभुओं की यह मंशा रही है कि बैंकों की ब्याज दरों को न्यूनतम स्तरों पर लाया जाए ताकि उन्हें अति सस्ती दरों पर कर्ज मिल सकें और वे अपना व्यापार बढ़ा सकें। इसमें दोहरा फायदा यह होगा कि आम लोग भी कम ब्याज दरों के कारण बैंकों में पैसा रखने से कतराएंगे जिससे उनमें खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। बाजार को यही तो चाहिये। आप अपनी जमा राशि निकाल कर कूलर और फ्रिज खरीद लें तो बाजार भी खुश, ठंडी हवा पा कर आप भी खुश और टैक्स पा कर सरकार भी खुश। भविष्य की सुरक्षा, जो मध्यवर्ग की पहली और सबसे बड़ी चिंता है, उससे वह महरूम हो जाए तो उसकी बला से।

तभी...बजट के बाद वित्त मंत्री ने साफ लहजों में बता दिया कि समय के साथ आयकर से बचत संबंधी तमाम योजनाओं को अलग कर दिया जाएगा। जाहिर है, आय कर बचाने की गरज से पेट काट कर विभिन्न योजनाओं में बचत के नाम पर पैसा जमा करने वाला वर्ग हतोत्साहित होगा। यह उसके भविष्य की सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर डालने वाला होगा।

यह तब है, जब वर्त्तमान में आयकर की दरें आनुपातिक रूप से उच्चतम स्तरों पर हैं, जब अन्य टैक्सों की दरें उच्चतम स्तरों पर हैं। इतनी...कि अर्थशास्त्रियों को ही नहीं, देश के मुख्य न्यायाधीश को भी टैक्स के दुर्वह बोझ पर टिप्पणी करनी पड़ी।

मध्यवर्ग के आर्थिक सम्बल के रूप में जारी बचत योजनाओं को हतोत्साहित करने का कदम एक अलग त्रासदी बन कर सामने आने वाला है।

कामगारों को पेंशन तो नहीं ही मिलेगा, उनके पब्लिक प्रोविडेंट फंड, इम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड, फिक्स डिपॉजिट, सुकन्या समृद्धि योजना आदि बचत की लोकप्रिय योजनाओं में भी ब्याज दरों को कम किया जाएगा। यह सब इसलिये ताकि बैंक जमा पर कम ब्याज देंगे तो कर्ज पर भी कम ब्याज लेंगे और इसके असल लाभार्थी बनेंगे कारपोरेट प्रभु। वे तो हजारों करोड़ रुपये ऋण लेते हैं और कम ब्याज दर उनके लिये मौजां ही मौजां का माहौल बनाएगा। पब्लिक को भी कम ब्याज पर उपभोक्ता ऋण मिलेंगे जो बाजार को गतिशील बनाएंगे और अंततः कारपोरेट के हितों का ही संवर्द्धन करेंगे।

यह पूरी प्रक्रिया अंततः मध्य वर्ग को आर्थिक रूप से खोखला कर देने वाली होगी और उनका भविष्य निरन्तर अनिश्चितताओं के भंवर में गोते लगाता रहेगा।

लेकिन...जब मन, बुद्धि और आंखों पर तरह-तरह के आवरण ओढ़ाए जाते रहेंगे और इन आवरणों के पार सत्य कहीं अंधेरे में खोया रहेगा तो नजर तो कुछ आएगा ही नहीं। अगर कुछ नजर आएगा भी तो वह कृत्रिम आवरणों पर उकेरी भ्रामक छवियां ही होंगी...जो सिवाय भ्रम के, और कुछ अहसास नहीं होने देंगी।

तभी तो, जब बहस इस पर होनी चाहिये कि शेयरों के लाभांश पर जो कर कंपनियां देती थीं उससे उन्हें मुक्त कर उन करों को आम शेयर धारकों पर क्यों मढ़ दिया गया, तो बहसें इस पर हो रही हैं कि शाहीन बाग में बिरयानी की फंडिंग कौन कर रहा है।

अजीब है यह दौर...जब मनुष्य से मनुष्यता के नैसर्गिक अधिकार तक छीने जाने की साजिशें परवान चढ़ती जा रही हैं और जिन्हें प्रतिरोध की मुद्रा में होना चाहिये था वे जयकारे लगा रहे हैं।

चाहे रेलवे के बाबू हों या एयरपोर्ट के, बैंक के साहेबान हों या इंश्योरेंस कंपनियों के... या चाहे किसी भी पब्लिक सेक्टर कम्पनी के हाकिम-कर्मचारी हों, उन्हें यह मान कर चलना चाहिये कि जिस व्यवस्था में विश्वविद्यालयों और अस्पतालों तक के निजीकरण की नीतियों पर काम हो रहा हो, उस अंध निजीकरण की आंधी में उनके संस्थानों की तो तिनके की तरह उड़ जाना ही नियति है।

सबने अपनी नियति स्वयं निर्धारित की है। ऊंची पगार के बल पर अपनी औसत प्रतिभा वाली संतानों को महंगी शिक्षा दिला कर सेट कर देने की जुगत में जिन्होंने शिक्षा के निजीकरण से आंखें मोड़ ली, मेडिकल बीमा के बल पर महंगे निजी अस्पतालों में इलाज करवा लेने की निश्चिंतता पा कर जिन्होंने सार्वजनिक चिकित्सा तंत्र को बदतर हो जाने दिया, व्यवस्था आज उनकी कुर्सियों के नीचे पटाखों की लड़ियों में माचिस सुलगा रही है तो उछलने से कुछ हासिल होने वाला नहीं।

मध्य वर्ग की यह पीढ़ी तो अपनी लड़ाई लड़ने के पहले ही हार चुकी है क्योंकि अपनी हार की पटकथा इसने स्वयं लिखी है। उम्मीद अगर है तो आने वाली पीढ़ियों से ही है जिन्हें विरासत में अमानुषिक व्यवस्था मिलने वाली है। अमानुषिकता के खिलाफ मनुष्यता के संघर्ष की मशाल आने वाली पीढियां ही थामेंगी, क्योंकि मनुष्य बन कर जीने के लिये इसके सिवा और कोई रास्ता भी नहीं रह जाएगा उनके पास।

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Friday, 24 January 2020

वाराणसी के एस एस पी आईपीएस - आचार संहिता का उल्लंघन कर आकाओं की भाषा बोल रहे हैं ------ डॉ गिरीश

वाराणसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा वामपंथी दलों पर लगाए बचकाने आरोप की भाकपा एवं माकपा ने निन्दा की

कहा- आकाओं की भाषा बोल रहे हैं एसएसपी



लखनऊ- 24 जनबरी 2019, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा॰ गिरीश एवं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी के राज्य सचिव डा॰ हीरालाल यादव ने वाराणसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के एक अंग्रेजी दैनिक ( इंडियन एक्सप्रेस )  में प्रकाशित उस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है जिसमें उन्होने कल वाराणसी के बेनियाबाग में हुये महिलाओं के धरने को वामदलों एवं कांग्रेस द्वारा आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया है। दोनों नेताओं ने कहाकि इस बयान से वे बेहद खिन्न हैं और हमारे लाखों लाख कार्यकर्ताओं को भारी कष्ट हुआ है।

यहां जारी एक प्रेस बयान में दोनों वाम नेताओं ने कहाकि वामपंथी दल जो भी आंदोलन करते हैं, जनवादी तरीके से, खुले तौर पर अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बलबूते करते हैं, इसके लिए किसीको धन नहीं देते। आम और गरीब जनता तथा शोषितों पीड़ितों के हितों के लिये समर्पित और पूंजीवाद का खुला विरोध करने वाले वामपंथियों को खुद ही अपनी गतिविधियों के लिये जरूरी धन जनता से जुटाना पड़ता है, यह शायद उक्त विद्वान अधिकारी भली भांति जानते होंगे। फिर बिना जांच पड़ताल के उन्होने वामपंथियों पर ऐसा आरोप लगाया यह आश्चर्यजनक ही नहीं निंदनीय भी है। यदि उनके पास किसी वामदल द्वारा ऐसा करने की सूचना है तो वे उसका नाम उजागर कर सकते हैं।  देश की दोनों प्रमुख वामपंथी पार्टियां- भाकपा और माकपा उनके इस इस बचकाने आरोप का खुला खंडन करती हैं।

दोनों वाम नेताओं ने कहाकि भाजपा सरकार की जनविरोधी, विभाजनकारी और दमनकारी कार्यवाहियों से देश भर में भारी आक्रोश है। प्रतिक्रिया स्वरूप देश भर में सैकड़ों आंदोलन खड़े होगये हैं और करोड़ों स्त्री पुरुष, छात्र नौजवान, किसान मजदूर और बुध्दिजीवी सड़कों पर उतर रहे हैं। उससे बौखला कर भाजपा नेत्रत्व वामपंथी दलों और अन्य विपक्षी दलों पर नित्य अनर्गल आरोप लगा रहे हैं। वाराणसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अपने शासकों को प्रशन्न करने को उनकी ही भाषा बोल रहे हैं। पर बिना जांच पड़ताल के राष्ट्रीय दलों पर आरोप लगाना, आईपीएस की आचार संहिता का उल्लंघन और राजनीति से प्रेरित है।

दोनों नेताओं ने वाराणसी, इटावा और रायबरेली में बलपूर्वक महिलाओं के आंदोलन को कुचलने की कार्यवाही की भी कड़े शब्दों में निन्दा की है। एक ओर भाजपा/ सरकार प्रायोजित रेलियों में धन देकर भीड़ जुटाई जारही है वहीं दूसरी ओर आक्रोशित लोग स्वतःस्फूर्त रूप से सड़कों पर उतर रहे हैं। इन स्वतःस्फूर्त आंदोलनों को कुचला जा रहा है। शासन प्रशासन में कोई इस दोगलेपन पर मुंह खोलने को तैयार नहीं है। लोकतन्त्र में तानाशाही लंबे समय तक चल नहीं सकती, मोदीजी, शाह और योगीजी को समझना चाहिए।

जारी द्वारा-

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

Thursday, 23 January 2020

पुलिस कार्यवाहियों की न्यायिक जांच कराने की मांग ------ अरविन्द राज स्वरूप


लखनऊ
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती।
फोटो में (बाएं से दाएं )डॉ एस पी कश्यप सीपीएम के वरिष्ठ नेता , श्री सुरेंद्र नाथ द्विवेदी राष्ट्रीय लोक दल के प्रांतीय प्रवक्ता, श्री अशोक सिंह राष्ट्रीय जनता दल के प्रांतीय अध्यक्ष, डॉ गिरीश राज्य सचिव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (अध्यक्षता करते हुए), डॉ हीरा लाल यादव राज्य सचिव ,भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), श्री जुबेर अहमद प्रांतीय अध्यक्ष लोकतांत्रिक जनता दल , कामरेड अरविंद राज स्वरूप सहायक सचिव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सभा का संचालन करते हुए।)

संविधान, लोकतन्त्र एवं धर्मनिरपेक्षता की रक्षा हेतु वामपंथी लोकतान्त्रिक दलों का अभियान आज से शुरू 
गणतन्त्र दिवस और महात्मा गांधी की शहादत दिवस पर भी होंगे कार्यक्रम
लखनऊ- 23 जनबरी 2020, उत्तर प्रदेश के वामपंथी एवं लोकतान्त्रिक दलों के संयुक्त तत्वावधान में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस पर एक सार्थक और सामयिक समारोह का आयोजन आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य कार्यालय पर किया गया। समारोह की अध्यक्षता भाकपा के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने की। 
इस अवसर पर मौजूद वामपंथी एवं लोकतान्त्रिक दलों के नेताओं ने आज़ादी के आंदोलन में नेताजी के योगदान पर गहन चर्चा की, संविधान, लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा का संकल्प लिया। संविधान की उद्देशिका का सामूहिक वाचन कर उसके संदेश को जन जन तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता जाहिर की। 
समारोह को संबोधित करते हुये भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहाकि आरएसएस नियंत्रित केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार हर तरह से विफल होजाने के बाद अपने प्रति उभर रहे जनाक्रोश को दबाने के लिये हर घ्रणित हथकंडा अपना रही है। एक ओर वह लोगों को तरह तरह से विभाजित करने को तमाम साजिशें रच रही है तो दूसरी ओर जनता को लाठी, गोली के बल पर दबा रही है। कश्मीर और राममन्दिर के बाद अब वे सीएए, एनपीआर और एनआरसी थोप रहे हैं वहीं तमाम लोकतान्त्रिक गतिविधियों को बेशर्मी से बाधित कर रहे हैं। पुलिस की गोली से गत दिनों 24 आंदोलनकारियों की जानें चली गईं, अनेक घायल हुये और सैकड़ों जेलों में बंद हैं। कानून व्यवस्था रोकने में असफल हुयी सरकार आंदोलन में हुयी हानि की भरपाई के नाम पर तमाम गरीबों का उत्पीड़न कर रही है। सरकार की जल्लादी कार्यवाहियों ने अँग्रेजी हुकूमत और हिटलर के अत्याचारों को पीछे छोड़ दिया है।
लेकिन अब जनता उनके कुक्रत्यों के खिलाफ सड़कों पर उतर आयी है। हर वर्ग उद्वेलित है। छात्रों, महिलाओं, किसानों, कामगारों की व्यापक कार्यवाहियों से सरकार स्तब्ध है। पर इससे सबक लेकर भूल सुधारने के बजाय वह वामपंथी दलों और विपक्ष पर भड़ास निकाल रही है। दमन की सारी सीमाएं लांघ कर इटावा में आंदोलनकारी महिलाओं पर पुरुष पुलिस ने बहशियाना ढंग से लाठियाँ चलाईं और उन्हें खदेड़ दिया। लखनऊ के घंटाघर पर जमी महिलाओं को शर्मनाक तरीके से प्रताड़ित किया जारहा है। आजादी के बाद यह पहली सरकार है जिसने अपनी ही जनता के खिलाफ अन्यायपूर्ण युध्द छेड़ दिया है। पर जनता ने भी मन बना लिया है की अब या तो सीएए, एनपीआर और एनआरसी ही रहेंगे या ये सरकार ही रहेगी। 
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी के राज्य सचिव डा॰ हीरालाल ने कहाकि ये सरकारें संविधान, लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता की हत्या करने पर उतारू हैं। पर हम ऐसा कदापि नहीं होने देंगे। केन्द्रीय स्तर पर 20 विपक्षी दलों ने “संविधान बचाओ, और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करो अभियान का आह्वान किया था। उत्तर प्रदेश में आज उसकी शुरुआत होचुकी है। 26 जनवरी गणतन्त्र दिवस और 30 जनबरी महात्मा गांधी की शहादत के दिन आयोजन कर संविधान की रक्षा की शपथ ली जाएगी और संविधान की उद्देशिका का सामूहिक वाचन किया जायेगा। उन्होने सभी दलों के कार्यकर्ताओं से गाँव मोहल्लों और कस्बों में जाकर भाजपा सरकारों के काले कारनामों को उजागर करने और संविधान रक्षा के संकल्प को विस्तारित करने का आह्वान किया। पूरे सप्ताह सघन अभियान चलाने की अपील की। 
लोकतान्त्रिक जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष श्री जुबेर अहमद ने कहाकि यह एक ऐसी सरकार और पार्टी है जिसका हर व्यक्ति दिन भर झूठ बोलता है। ये अपना छिपा एजेंडा लागू करना चाहते हैं। इस साजिश को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। 
राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष श्री अशोक सिंह ने कहाकि ये दिखाबे के लिये मुसलमानों और पाकिस्तान की बात करते हैं, वास्तव में ये गरीबों को कुचलना चाहते हैं। गरीबों को आज पहले से अधिक संगठित होने की जरूरत है। 
समारोह में राष्ट्रीय लोकदल के प्रवक्ता श्री सुरेन्द्र नाथ द्विवेदी, फारबर्ड ब्लाक के नेता कामरेड उदयनाथ सिंह, माकपा के वरिष्ठ नेता एसपी कश्यप, श्रमिक नेता डी॰ के॰ यादव, महिला फेडरेशन की नेता कान्ति मिश्रा के अतिरिक्त कांग्रेस व एनसीपी के स्थानीय नेताओं ने भी संबोधित किया। संचालन भाकपा के राज्य सहसचिव का॰ अरविंदराज स्वरूप ने किया। 
एक प्रस्ताव पारित कर इटावा में सीएए के विरूध्द आंदोलन कर रही महिलाओं पर भीषण लाठी चार्ज की निन्दा की गयी और दोषी पुलिस अधिकारियों को हटाने की मांग की गयी। जगह जगह चल रहे आंदोलनों पर चलाये जारहे दमनचक्र की निन्दा की गयी। सीएए लागू किए जाने के बाद से ही पुलिस कार्यवाहियों की न्यायिक जांच कराने की मांग की गयी। यह भी रेखांकित किया गया की शासक दल धड़ल्ले से रेलियाँ आयोजित कर रहा है और वामपंथी लोकतान्त्रिक दलों की जनता के पक्ष में आवाज उठाने की कार्यवाहियों को धारा 144 और अन्य तानशाह तरीकों से रोका जारहा है। उत्तर प्रदेश भर से धारा 144 हटाने की मांग भी की गयी। 
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश

Thursday, 7 November 2019

uncompromising champion of people’s rights : Comrade Gurudas Dasgupta ------ D. Raja

Gurudas Dasgupta fought for the rights of working people throughout his life
The passing of Gurudas Dasgupta is not merely a loss for the CPI. It is a loss for the communist parties as a whole and all the other socialist and progressive forces. It is a loss for India.



Comrade Gurudas Dasgupta, who passed away on October 31, remained a fighter for the causes of the working class till the end of his days. From the beginning of his active political life as a student, to his leadership of both organised and unorganised labour, his career as a preeminent parliamentarian, and in the leadership of the Communist Party of India (CPI), he remained an uncompromising champion of people’s rights.

Dasgupta made his mark in politics in 1957, when he became the general secretary of the students’ union of the Asutosh College in Calcutta. Thereafter, he continued to be associated with student and youth politics for some time. He served as general secretary of the All India Students’ Federation (AISF), the students wing of the CPI, and was one of the party’s most prominent youth leaders in West Bengal. From the 1970s onwards, he was known on the national stage.

In 1985, Dasgupta was elected to the Rajya Sabha, where he served three terms. He was also elected to the Lok Sabha twice. In his time in Parliament, Dasgupta was a ferocious debator. He was outspoken on critical issues, holding the governments of the day to account. Using his considerable oratorical skill, he championed the rights of labour, farmers and the people of India as a whole. His work on multiple parliamentary committees earned him the respect of his colleagues across the political spectrum. He was a member of the parliamentary committee on finance as well as the Joint Parliamentary Committee on the securities scam. The latter involved investigating the infamous criminal manipulations of Harshad Mehta. Dasgupta’s role in the committee, his vociferous and comprehensive questioning of witnesses was appreciated far and wide. He even received awards for his work in the JPC, but gave away the proceeds to organisations like the Punjab Stree Sabha.

Comrade Dasgupta also served as general secretary of the All India Trade Union Congress (AITUC). The AITUC, a premier Indian trade union, has worked for the welfare of the working classes since 1920, when the communists stood against imperialist rule. Stalwarts such as Indrajit Gupta and A B Bardhan have also served as its past general secretaries. It is a bitter-sweet irony that on the day of Dasgupta’s passing, the centenary commemorations of the AITUC have commenced.

Dasgupta served as the deputy general secretary of the CPI, a position he held till the last party Congress in 2018, in Kollam, Kerala. I have had the pleasure of serving with him both in Parliament and as a colleague in the CPI leadership. His commitment to egalitarian principles remained steadfast in every forum.

When the Congress government in the 1990s introduced the neoliberal economic agenda and implemented it through policy and law, Dasgupta was uncompromising in his opposition. Inside the House, he passionately argued against moves that would go against the peasantry, labour and other sections of society who have suffered as a result. But Dasgupta’s inspiring presence was not limited to Parliament. As a trade union leader, he organised numerous agitations of the working class. Throughout his long life of political and public service, Dasgupta stood against corporate forces and those that further ideas and policies of exclusion and religious bigotry. He had the unique ability to organise and mobilise, as well as motivate the people to fight the status quo, and recognise the fact that such a battle was in their own interest as well as for the benefit of the nation as a whole.

India, today, faces grave challenges. There is a disturbing economic slowdown, which is putting question marks on the fundamentals of the economy. Under the current ruling dispensation, the country is facing an onslaught of communal forces. At a time when we all must stand against these phenomena and those who have unleashed them, we have lost a comrade who has been at the forefront of such battles.

The passing of Gurudas Dasgupta is not merely a loss for the CPI. It is a loss for the communist parties as a whole and all the other socialist and progressive forces. It is a loss for India.

(This article first appeared in the print edition on November 1, 2019 under the title ‘The uncompromising comrade’. The writer is general secretary of the Communist Party of India ) 


https://indianexpress.com/article/opinion/columns/gurudas-dasgupta-cpi-death-the-uncompromising-comrade-6096871/

Thursday, 17 October 2019

वामदलों का विरोध प्रदर्शन, लखनऊ में

फोटो सौजन्य से कामरेड प्रदीप शर्मा 


लखनऊ, में कल दिनांक  16 अकूबर को 5  वामपंथी दलों ( भाकपा, माकपा , भाकपा - माले, फारवर्ड ब्लाक और आर एस पी ) ने पक्का पुल ( लाल पुल ) से घंटाघर तक प्रदर्शन जुलूस निकाल कर एक सभा की जिस के द्वारा  नौजवानों, किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों, व्यापारियों और आर्थिक मंदी से पीड़ित अन्य तबकों की समस्याओं के समाधान की मांग के साथ - साथ दलितों व महिलाओं के उत्पीड़न को भी समाप्त करने की मांग को जोरदार ढंग से उठाया गया। 
सभी दलों के वक्ताओं ने अमीरों को सुविधाएं दिये जाने व रोजगार के अवसर समाप्त किए जाने, होमगार्ड्स  की छटनी किए जाने आदि की  कड़ी आलोचना की। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने13 अक्तूबर 2019 एक बयान में खुलासा किया  था कि " विद्युत विभाग द्वारा उपभोक्ताओं को नोटिस भेज कर वित्त वर्ष 2019- 20 के लिये अतिरिक्त “सीक्यौरिटी राशि” की मांग की जारही। जनता की निगाहों से ओझल किन्ही मनमाने नियमों के तहत यह राशि उपभोक्ताओं द्वारा गत वर्ष उपभोग की गयी बिजली की औसत 45 दिन की कीमत के बरावर मांगी जारही है।

यदि किसी उपभोता का गत वर्ष 45 दिनों का औसत बिल 10,000 रुपये था तो उसे इस अग्रिम सीक्यौरिटी की मद में 10,000 रुपये जमा करने होंगे। इसी तरह यदि यह राशि 5, 4, 2 अथवा 1 हजार रही होगी तो इतनी ही राशि अब जमा करनी होगी। यदि किसी उपभोक्ता का गत वर्ष 45 दिन का औसत बिल 15, 20 अथवा 25 हजार रहा होगा तो उसे इतनी राशि इस मद में जमा करनी होगी। यह धनराशि नोटिस जारी होने के 30 दिनों के भीतर जमा कर विद्युत विभाग को लिखित रूप में अवगत कराना होगा। ऐसा न करने पर बिजली कनेक्सन काट दिया जायेगा।

अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की मार से व्यथित लोगों पर जब विद्युत विभाग के ये नोटिस पहुँचने शुरू हुये तो उनके होश उड़ गए। उन्हें अपनी दीवाली अंधेरी नजर आने लगी। मध्यमवर्ग और गरीब वर्ग इस पेनल्टी की कल्पना मात्र से सिहर उठा है। उसे अपने पुश्तेनी कनेक्सन पर अलग से यह भारी राशि जमा करने का कोई औचित्य नजर नहीं आरहा। वह इसे सरकार द्वारा जनता की खुली लूट मान रहा है।

 अभी अभी लागू हुयी महंगी दरों से ही उपभोक्ता हलकान हैं और अब इस अतिरिक्त भार की मार को वे सहन नहीं कर पाएंगे। जैसे जैसे ये नोटिस उपभोक्ताओं पर पहुँच रहे हैं उनकी बेचैनी बढ़ती जारही है। कभी भी यह बेचैनी आक्रोश का रूप ले सकती है।" 

कल की इस जनसभा में जनहित के इन सभी मुद्दों पर चर्चा किए जाने तथा मोदी / योगी सरकार की जन - विरोधी नीतियों की आलोचना किए जाने से क्षुब्ध पुलिस अधिकारियों द्वारा सभा व प्रदर्शन को बाधित भी किया गया किन्तु कार्यकर्ताओं के जोश के आगे उनको यह स्पष्टीकरण भी देना पड़ा कि ' हम आपके साथ हैं ' लेकिन नौकरी भी करनी है। 

Sunday, 1 September 2019

भाकपा महासचिव डी. राजा द्वारा साम्प्रदायिक एजेंडे के खिलाफ संघर्ष के लिए एकजुटता का आह्वान ------ डॉ गिरीश



Girish CPI

7:09 PM (6 minutes ago)

लखनऊ 1 सितम्बर। भाकपा राज्य मुख्यालय पर आज प्रेस प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए भाकपा के नव निर्वाचित महासचिव डी. राजा, सांसद ने जम्मू एवं कश्मीर के बारे में बोलते हुए कहा कि उन्होंने दो बार राज्य का दौरा करने का प्रयास किया परन्तु दोनों बार भाजपा सरकार और राज्यपाल ने उन्हें हवाई अड्डे से बाहर नहीं जाने दिया और उन्हें हिरासत में लेकर वापस लौटने को मजबूर किया। हवाई जहाज में यात्रा कर रहे चन्द स्थानीय यात्रियों ने उन्हें बताया कि पूरे राज्य में हालात बहुत खराब है जबकि सरकार परिस्थितियों के सामान्य होने का दावा कर रही है। सह यात्रियों के अनुसार जीवन रक्षक दवाईयां, चिकित्सा सुविधायें तक आम नागरिकों को नहीं मिल रही है। तनाव के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि अगर स्थितियां सामान्य हैं तो उस राज्य के राजनैतिक नेताओं को रिहा क्यों नहीं किया जा रहा है और वहां पर आम नागरिकों का जीवन सामान्य क्यों नहीं किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का कृत्य असंवैधानिक और गैर प्रजातांत्रिक है। संसद के बजट सत्र को लम्बा खीच कर सरकार ने 30 बिलों को बिना चर्चा किये और नियमों के खिलाफ जाकर अपने संख्या बल के आधार पर पारित करा लिया। यहां तक कि उस राज्य का केवल एक भाजपाई सांसद ही संदन में उपस्थित था और बाकी को पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था। इस तरह संसद जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं का वजूद समाप्त करने और उन्हें बेमतलब कर देने के प्रयास चल रहे हैं। इस तरह प्रजातंत्र पर खतरा मंडरा रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर के विशेष प्राविधान केवल जम्मू एवं कश्मीर राज्य की जनता को ही नहीं प्राप्त हैं बल्कि देश के अन्य तमाम राज्यों को भी संविधान के अनुसार प्राप्त हैं। उसके दुष्परिणाम और बेचैनी देश के दूसरे भागों में भी दिखने लगी हैं। भारत राज्यों का एक गणतंत्र है और उस ढ़ाचे को ही समाप्त करने की साजिश चल रही है। सरकार ने कश्मीर की जनता, वहां के राजनैतिक नेताओं को विश्वास में लेने का प्रयास क्यों नहीं कर रही है और मानवीय मूल्यों की बर्बर हत्या कर रही है।

उन्होंने बसपा सुप्रीमों मायावती पर कश्मीर मामले में संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. अम्बेडकर को गलत तरीके से उद्घृत करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि डा. अम्बेडकर की सहमति से ही अनुच्छेद 370 संविधान में शामिल किया गया था। मूलतः डा. अम्बेडकर ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी और आरएसएस तथा हिन्दू महासभा की भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग को ठुकरा दिया था और उन्होंने भारत को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणतंत्र बनाने का समर्थन किया था।

भाकपा महासचिव डी. राजा ने आसाम के एनआरसी का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे तरीकों से भाजपा और आरएसएस पूरे देश के माहौल को साम्प्रदायिक कर अपने पक्ष में ध्रुवीकरण के प्रयास कर रहे हैं। एनआरसी के प्रकाशन से कई तरह के सवाल पैदा हो गये हैं और सरकार उनके हल के कोई प्रयास नहीं करना चाहती। क्या होगा, यह अभी तक अनिश्चित है। सरकार को इस मामले पर भी राजनैतिक दलों के नेताओं को विश्वास में लेना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि आरएसएस प्रमुख आरक्षण पर बहस की मांग कर रहे हैं। पहले उन्होंने इस समाप्त करने की मांग की थी। आरएसएस शुरूआती दौर से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों तथा महिलाओं को समाजिक न्याय का विरोध करती रही है। बहस का उनका मंतव्य मूलतः आरक्षण को समाप्त करवा देने का है। हालात यह है कि सरकारी नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं, भर्ती नहीं की जा रही है और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण कर उनमें भी आरक्षण समाप्त किया जा रहा है। उन्होंने प्रश्न खड़ा किया कि कितने लोगों को आरक्षण का लाभ इस समय मिल पा रहा है? इस प्रकार मोदी सरकार आरएसएस के दिशानिर्देशन में उसकी हिन्दू राष्ट्र और पूजीपतियों के हितों को पूरा करने की दिशा में ही आगे बढ़ रही है।

भाकपा महासचिव ने कहा कि नोट बंदी और जीएसटी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फंस चुकी है। इन कदमों से अनौपचारिक क्षेत्र और छोटे एवं मध्य उद्योग पहले ही बर्बाद हो चुके थे। मोदी ने सत्ता में आने पर हर साल दो करोड़ रोजगार सृजित करने का वायदा किया था परन्तु वास्तविकता है कि साढ़े पांच साल के शासन में उन्होंने बेरोजगारी की दर को आजादी के बाद पहली बार चरम पर पहुंचा दिया है। कृषि पहले से ही घाटे का सौदा बन चुकी है। अर्थव्यवस्था को संभालने के बजाय सरकारी खर्चे के लिए सरकारी सम्पदाओं तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को निजी पूंजी के हाथों बेच रही है और भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व को भी खाली कर दिया गया है। सरकारी बैंकों के विलय की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वीकार किया कि आर्थिक मंदी के हालात हैं और भारतीय रूपया विश्व बाजार में अपनीे कीमत खोते हुए इस स्तर पर आ गया है कि 1 अमरीकी डालर को खरीदने के लिए आपको 72 से ज्यादा भारतीय रूपये खर्च करने पड़ रहे हैं। वे वादा करती हैं कि इससे निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा लेकिन आयात की कीमत हमें कितनी ज्यादा देने होगी, उसका जिक्र नहीं करती है।

बेपरवाह (reckless) विनिवेश की प्रक्रिया चल रही है और सकल उत्पादन जीडीपी भी अपने न्यूनतम स्तर पर है। औद्योगिक उत्पादन तो ऋणात्मक हो चुका है। अगर सरकार के आकड़ों को सही मान लिया जाये तो औद्योगिक उत्पादन की दर आधा प्रतिशत रह गयी है।

उन्होंने कहा कि बैंकों में बड़े पूजीवादी घरानों के ऋण एनपीए होते चले जा रहे हैं, लोगों को देश छोड़ कर भागने दिया गया। उन्होंने 10 सरकारी बैंकों का विलय कर 4 बैंक कर देने की भी निन्दा की कि इससे अंततः बेरोजगारी की गति और बढ़ेगी। उन्होंने सरकारी दावों पर प्रहार करते हुए कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ऋण देने की क्षमता बढ़ाने का क्या उद्देश्य है? यह केवल बड़े पूंजीपतियों को और ऋण देने तथा पुराने एनपीए को बट्टे खाते डालने की साजिश के तौर पर किया गया है। इससे किसानों और छोटे व्यापारियों को तो सुविधायें नहीं बढ़ेंगी बल्कि शाखाओं के बंद होने के कारण और बेरोजगारी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि सरकार इस बात को याद रखने की कोशिश नहीं कर रही है कि 2008 की वैश्विक मंदी से भारत अगर बचा रहा था तो उसका एकमात्र कारण भारत का मतबूत सरकारी वित्तीय क्षेत्र था जिसे गर्त की ओर ढकेला जा रहा है।

भाकपा महासचिव डी. राजा ने सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक शक्तियों का आवाहन किया कि वे आरएसएस/भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडे के खिलाफ संघर्ष के लिए एकजुट हों।

उत्तर प्रदेश के राजनैतिक परिदृश्य पर बोलते हुए भाकपा महासचिव डी. राजा ने कहा कि उत्तर प्रदेश में घोर साम्प्रदायिक और अपराधियों को संरक्षण देने वाली नीतियों को लागू किये हुए जिसका परिणाम मॉब लिंचिंग, दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते अत्याचार और बलात्कार के बाद हत्या की घटनाएं अपनी ऐतिहासिक ऊंचाईयों को छू चुकी है। पूरे प्रदेश में अराजकता का माहौल है। उन्होंने रविदास मंदिर, सोनभद्र, उन्नाव जैसी तमाम घटनाओं का उल्लेख किया।

एक प्रश्न के जवाब में होने कहा कि भाकपा उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में 7-8 जगहों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। एक दूसरे प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि नरेश अग्रवाल का विधायक पुत्र पार्टी बदल कर भाजपा में चला गया परन्तु न तो अखिलेश यादव ने विधान सभा अध्यक्ष को उसकी सदस्यता रद्द करने का पत्र भेजा और न ही विधान सभा अध्यक्ष ने इस बात का संज्ञान लिया। इसी तरह भाजपा के उन्नाव के विधायक की गिरफ्तारी पर उसे भाजपा से निष्कासित कर दिया परन्तु उसकी भी सदस्यता अभी तक समाप्त नहीं की गयी है।

भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पेट्रोल और डीजल पर वैट बढाने, बिजली दरों में प्रस्तावित बढ़ोतरी तथा गैस सिलेण्डरों की कीमत बढ़ाये जाने के खिलाफ भाकपा उत्तर प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर 11 सितम्बर को धरने और प्रदर्शन आयोजित करेगी।
(डा. गिरीश)

राज्य सचिव

Friday, 23 August 2019

कल्पना दत्त: लड़के के भेष में अग्रेजों से लड़ने वाली क्रांतिकारी महिला! -खुर्शीद आलम

Nisha Siddhu Jaipur

*आओ याद करें कुर्बानी *****
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेत्री 
कल्पना दत्त: लड़के के भेष में अग्रेजों से लड़ने वाली क्रांतिकारी महिला!
-खुर्शीद आलम 
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों में हर किसी वर्ग और समुदाय ने अपना योगदान दिया. एक तरफ जहां पुरुष क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से लोहा लिया वहीं महिलाओं ने भी आंदोलनों में कूद कर ईट से ईट बजा दी थी.

उन्हीं महिला क्रांतिकारियों में एक नाम कल्पना दत्त का है, जिन्होंने अंग्रेजों से बड़ी निडरता और साहस के साथ जमकर लोहा लिया था.

इनकी निडरता और वीरता को देखने के बाद ही कल्पना को ‘वीर महिला’ के ख़िताब से नवाज़ा गया था. आज़ादी की लड़ाई में इनके योगदान को देखते हुए इन पर उपन्यास सहित फ़िल्में भी बनाई गईं हैं.

ऐसे में इस क्रांतिकारी महिला के बारे में जानना दिलचस्प होगा…

जब हुई सूर्य सेन से मुलाकात!
कल्पना दत्त का जन्म 27 जुलाई 1913 को चटगांव के श्रीपुर गांव में हुआ था, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है. ये एक मध्यम वर्गीय परिवार से थीं. इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चटगांव से हासिल किया.

1929 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद कलकत्ता चलीं गईं. वहां पर विज्ञान में स्नातक के लिए बेथ्यून कॉलेज में दाखिला ले लिया. इस बीच कल्पना मशहूर क्रांतिकारियों की जीवनियाँ भी पढ़ने लगी थीं.

आगे, जल्द ही छात्र संघ से जुड़ गईं और क्रांतिकारी गतिविधियों में रूचि लेनी लगी. इसी महिला छात्र संघ में बीना दास और प्रीतिलता वड्डेदार जैसी क्रांतिकारी महिलाएं भी सक्रिय भूमिका निभा रही थीं.

तभी इनकी मुलाकात स्वतंत्रता सेनानी सूर्य सेन से हुई, जिन्हें ‘मास्टर दा’ के नाम से भी जाना जाता है.

कल्पना इनके विचारों से बहुत प्रभावित हुईं और सूर्य सेन के संगठन ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ में शामिल हो गईं. इसके बाद कल्पना खुलकर अंग्रेजों के खिलाफ अपनी मुहिम छेड़ चुकी थीं.

भेष बदलकर धमाका करने की बनाई योजना!
1930 में जब इस संगठन ने ‘चटगांव शास्त्रानगर लूट’ को अंजाम दिया, तो कल्पना अंग्रेजों की नज़र में चढ़ गई थीं. ऐसे में इन्हें कलकत्ता से पढ़ाई छोड़कर वापस चटगांव आना पड़ा.

हालांकि इन्होंने संगठन का साथ नहीं छोड़ा और लगातार सूर्य सेन के संपर्क में बनी रहीं. इस हमले के बाद कई क्रांतिकारी नेता गिरफ्तार किये गए थे, जो अपने ट्रायल का इन्तेज़ार कर रहे थे. वहीं कल्पना को कलकत्ता से विस्फोटक सामग्री सुरक्षित ले जाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. कल्पना चटगांव में गुप्तरूप से संगठन के लोगों को हथियार पहुँचाने लगीं.

फिर, कल्पना ने इन क्रांतिकारियों को आज़ाद कराने का फैसला लिया. इसके लिए इन्होंने जेल की अदालत को बम से उड़ाने की योजना बनाई. इनकी इस योजना में प्रीतिलता जैसी क्रांतिकारी महिला भी शामिल थीं.

इसके लिए इनको हथियार प्रशिक्षण की भी ज़रुरत थी. इसीलिए ये रात के सन्नाटे में सूर्यसेन के गांव जातीं और प्रीतिलता के साथ रिवाल्वर शूटिंग में नियमित अभ्यास करने लगी थीं.

सितम्बर 1931 को कल्पना और प्रीतिलता ने चटगांव के यूरोपीयन क्लब पर हमला करने का फैसला किया. जिसके लिए इन्होंने अपना हुलिया बदल रखा था.

कल्पना एक लड़के के भेष में इस काम को अंजाम देने वाली थीं, मगर पुलिस को इनकी इस योजना के बारे में पता चल चुका था. इसीलिए, अपने मिशन को अंजाम देने से पहले ही कल्पना को गिरफ्तार कर लिया गया.

दोबारा हुईं गिरफ्तार और मिली उम्र कैद की सजा!
बाद में अभियोग सिद्ध न होने पर उनको रिहा कर दिया गया था. जेल से रिहा होने के बाद भी पुलिस उन पर पैनी नज़र रखे हुई थी. यहां तक की उनके घर पर भी पुलिस का पहरा लगा दिया गया था.

परन्तु, कल्पना पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहीं और घर से भागकर सूर्य सेन से जा मिलीं.

इसके बाद ये दो साल तक अंडरग्राउंड हो गईं और गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों में हिस्सा लेती रहीं. दो साल बीत जाने के बाद पुलिस सूर्य सेन का ठिकाना पता लगाने में सफल रही.

17 फ़रवरी 1933 को पुलिस ने सूर्य सेन को गिरफ्तार कर लिया, जबकि कल्पना अपने साथी मानिन्द्र दत्ता के साथ भागने में कामयाब रहीं. कुछ महीनों तक ये इधर उधर छुपती रहीं, मगर मई 1933 को ही कल्पना को पुलिस ने घेर लिया था.

कुछ देर तक चली इस मुठभेड़ के बाद कल्पना और उनके साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया. जब इन क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाया गया. तब 1934 में सूर्य सेन और उनके साथी तारकेश्वर दस्तीकार को फांसी की सजा सुनाई गई.

जबकि, कल्पना दत्त को उम्र कैद की सजा हुई.

मिली आज़ादी तो, राजनीति में भी अजमाया हाथ!
21 वर्षीय कल्पना को आजीवन करावास की सजा मुकर्र हो चुकी थी. अब वो किसी भी क्रांतिकारी आंदोलनों का हिस्सा नहीं बनने वाली थीं, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था. 1937 में पहली बार प्रदेशों में मंत्रिमंडल बनाये गए.

तब महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि नेताओं ने क्रांतिकारियों को छुड़ाने की मुहीम छेड़ दी थी. जिसके बाद अंग्रेजों को बंगाल के कुछ क्रांतिकारियों को छोड़ना पड़ा था. उन्हीं क्रांतिकारियों में कल्पना दत्त भी शामिल थीं.

खैर, 1939 में कल्पना जेल से रिहा हुईं.

आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए कल्पना ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में दाख़िला ले लिया. स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद कल्पना भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गईं. कल्पना जेल के अंदर ही कई कम्युनिस्ट नेताओं के संपर्क में रहीं और उनके विचारों से प्रभावित भी हुई थीं. उस दौरान इन्होंने ने मार्क्सवादी जैसे विचारों को पढ़ना भी शुरू कर दिया था.

1943 में कल्पना भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पूरन चंद जोशी से विवाह के बंधन में बंध गईं. इस तरह कल्पना दत्त अब कल्पना जोशी बन चुकी थीं. यह वही दौर था, जब बंगाल की स्थिति आकाल और विभाजन के चलते गंभीर थी.

कल्पना ने इस समय बंगाल के लोगों के साथ हमदर्दी बांटी और राहत कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया था. इसके बाद कल्पना देश की आज़ादी के साथ ही भारतीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाने लगी.

इन पर आधारित हैं कई उपन्यास और बॉलीवुड फ़िल्में!
इस दौरान इन्होंने चटगांव लूट केस पर आधारित अपनी आत्मकथा भी लिखी थी. कम्युनिस्ट पार्टी का साथ छोड़ने के बाद कल्पना एक सांख्यिकी संस्थान में कार्य करने लगी, जहां पहले भी वो कुछ दिनों तक काम किया था.

बाद में कल्पना बंगाल से दिल्ली आ गईं और इंडो सोवियत सांस्कृतिक सोसायटी का हिस्सा बनीं. 1979 में कलपना जोशी को इनके कामों को देखते हुए ‘वीर महिला’ की उपाधि से नवाज़ा गया था.

8 फ़रवरी 1995 को कल्पना दिल्ली में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. खैर, कल्पना ने दो बच्चों को जन्म दिया था. जिनका नाम चांद जोशी और सूरज जोशी था. चाँद जोशी एक बहुत बड़े पत्रकार रह चुके हैं. जिनकी पत्नी मानिनी ने इनके ऊपर एक उपन्यास ‘डू एंड डाई: चटग्राम विद्रोह’ लिखा था.

इसी कड़ी में दिलचस्प बात यह है कि 2010 में भारतीय सिनेमा जगत ने भी इन पर आधारित एक फिल्म बनाई थी. इस फिल्म का नाम ‘खेलें हम जी जान से’ जो आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन में बनी थीं.

इस मूवी की कहानी मानिनी के उपन्यास से ही ली गई थीं. इसमें अभिषेक बच्चन और दीपिका पादुकोण ने मुख्य किरदार की भूमिका निभाई है. इस फिल्म में चटगांव विद्रोह को बखूबी दिखाया गया, जिसमें लगभग सभी रियल पात्रों को भी दर्शाया गया था.

जिस निडरता और साहस के बल पर कल्पना दत्त जोशी ने देश के लिए खुद को समर्पित कर दिया, वह आज भी देश के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है.

साभार : 
https://www.facebook.com/nishasiddhu.jaipur/posts/1372672646222010