Saturday 2 April 2016

भारत में साम्यवाद की संभावनाएं ------ विजय राजबली माथुर

1992 में जब निम्नांकित लेख लिखा था और जो उम्मीद तब ज़ाहिर की थी वह पूर्ण नहीं हुई है क्योंकि सभी प्रकार के साम्यवादी/वामपंथी दल 'एथीज़्म' : 'नास्तिकता " के भ्रमजाल में फंसे होने के कारण जीवन व समाज की वास्तविक व यथार्थ आवश्यकताओं की उपेक्षा करके मात्र आर्थिक आधार पर वर्गीय एकता बना कर सफलता की कपोल-कल्पना किए  सोये हुये बैठे हैं। मार्क्स साहब के अनुसार पूर्ण औद्योगीकरण के बाद साम्यवादी क्रान्ति होनी थी किन्तु 1917 व 1949 की रूसी व चीनी साम्यवादी क्रांतियाँ कृषी- प्रधान देशों में हुईं थीं फिर उनका औद्योगीकरण किया गया तथा वास्तविक 'धर्म' के 'मर्म' को न मानने के कारण उसका पालन नहीं किया गया। परिणाम स्वरूप रूस में साम्यवाद उखड़ गया तो चीन में STATE-CAPITALISM में परिवर्तित हो गया है। इन सबका सबक हमारे देश के किसी भी साम्यवादी दल ने नहीं लिया है और आज भी लकीर के फकीर बन कर चल रहे हैं। फलतः पहले चरण में 1998 से 2004 तक सांप्रदायिक शक्तियों के नेतृत्व में सत्ता चली गई थी और दूसरे चरण में 2014 में आ गई है जो नित्य नए-नए फासिस्टी तरीकों से जकड़ती जा रही है। 24 वर्ष बाद फिर से उस पुराने लेख को प्रकाशित करने का उद्देश्य यही है कि, इस वक्त जिस परिवर्तन की बात छात्र नेता कामरेड कन्हैया कुमार ने उठाई है उसकी 80 प्रतिशत बातों का उल्लेख इस लेख में भी समाहित है। 20 प्रतिशत 'धर्म' संबंधी दृष्टिकोण पर कामरेड कन्हैया भी लकीर के फकीर वाली 'नास्तिकता' की डगर पर चल रहे हैं। सभी साम्यवादी व जन -वादी तत्व जब तक वास्तविक 'धर्म' का 'मर्म' जनता के समक्ष नहीं रखते तब तक साप्रदायिक/ फासिस्ट शक्तियों को ही मजबूत करते जाएँगे और ऐसा होगा उनके ब्राह्मण वादी नेतृत्व की असली मानसिकता के कारण। 


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आज जब विश्व के प्रथम साम्यवादी राष्ट्र का विघटन हो चुका है और वहाँ पूर्णतय : साम्यवाद को नकार दिया गया है, प्रस्तुत शीर्षक कुछ लोगों को हास्यास्पद प्रतीत हो सकता है। विगत पाँच -छह वर्षों से जबसे  कि, श्री मिखाईल गोर्बाचोव  ने ग्लासनास्त और पेरेस्त्रोईका के नाम पर सोवियत रूस से साम्यवाद की जड़ें छांटना प्रारम्भ की थीं भारत के हम साम्यवादियों में  से अधिकांश को निराशा ही हुई थी और यहाँ अपना भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगा था । पुनः 1989 और 1991 के चुनावों में भाजपा की सांप्रदायिक बढ़त से हम सहसा हताश होते हुये लोगों को पाते हैं।

परंतु इस संबंध में व्यक्तिगत रूप से मेरा दूसरा ही दृष्टिकोण है। मैं समझता हूँ कि, भारत में अब हमारे लिए अपने विस्तार के लिए परिस्थितियाँ और अधिक अनुकूल हैं । एक तो अब हमें परमुखापेक्षी नहीं रहना है अब हमारी पार्टी की नीतियाँ विशुद्ध रूप से भारतीय वांगमय के मद्दे नज़र बनेंगी और दूसरे भाजपा रूपी सांप्रदायिक एवं विघटनकारी शक्तियों ( जो कि, निश्चित रूप से साम्राज्यवादियों के हाथों में खेल रही हैं ) से टक्कर लेने के लिए समान विचारों वाली जनवादी शक्तियों से मिलकर कार्य करने से हमें अपने विस्तार हेतु क्षेत्र स्वतः ही मिलते जाएँगे।

हमारे विपक्षी हमारी सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर करते हैं कि, साम्यवाद के प्रणेता रूस ने ही क्रांतिकारी योद्धाओं का लेनिन, का स्टालिन आदि की मूर्तियाँ ही नहीं उखाड़ फेंकीं उनकी प्रेरक विचार धारा को ही रसातल में समाविष्ट कर दिया तो हम किस आधार पर भारत में साम्यवाद की सफलता की बात करते हैं? और जबकि यहाँ पिछले दो निर्वाचनों ने सांप्रदायिक शक्तियों को ही बल प्रदान किया है।

मेरी राय में हम अपने आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब कुछ इस प्रकार से दे सकते हैं कि, उनका आधार ही समाप्त हो जाये। हमें यह कहना होगा कि, साम्यवाद मूलतः भारतीय विचार धारा है । भारतीय चिंतकों ने समय-समय पर मानव कल्याण और मानव द्वारा मानव के शोषण समाप्ति हेतु जो मन्तव्य व्यक्त किए और जिनका कि, उल्लेख हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों में आज भी उपलब्ध है । महान दार्शनिक मैक्समूलर सा : भारत में 30 वर्ष रह कर इन ग्रन्थों का मनन और अनुवाद कर जब जर्मन वापिस लौटे तो भारतीय संस्कृति से साम्यवादी विचार भी ले गए। महर्षि कार्ल मार्क्स ने समस्त दर्शनों का गहन अध्यन करने के बाद साम्यवादी सिद्धांतों को मानव- कल्याण के उपयुक्त पाया और उन्होने देश - काल की परिस्थितियों के अनुरूप जो दर्शन प्रस्तुत किया और जिसे उनके ही नाम पर हम आज मार्क्सवादी दर्शन कहते हैं वह वस्तुतः मौलिक रूप से भारतीय अवधारणा ही है। हमारी संस्कृति में व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि पर बल दिया गया है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने " वसुधेव कुटुंबकम " का उद्घोष किया जो हमारे आज के " दुनिया के मजदूरों एक हो " के ही अनुरूप है। हमारे प्राचीन ऋषि समस्त मानवता , सम्पूर्ण विश्व को एक समाज इकाई के रूप में मान कर सबके कल्याण की बात करते हैं और यही बात मार्क्स सा : भी कहते हैं कि, विश्व- व्यापी साम्यवादी व्यवस्था में ही मानव- कल्याण संभव है।

आज सोवियत रूस समेत पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का जो पराभव प्रतीत होता है वह वास्तव में साम्यवाद के मूलभूत तत्वों का यथार्थ पालन न हो पाने के कारण है। हम भारत में योगीराज श्री कृष्ण का दृष्टांत प्रस्तुत कर सकते हैं जिन्होंने महाभारत समर के समय अर्जुन को यह उपदेश देते हुये कहा था कि, " अर्जुनस्य द्वै प्रतिज्ञे, न दैन्यम, न पलायनम " अर्थात कि, हे अर्जुन यह दो प्रतिज्ञाए याद रखो कि, न तो कभी दीनता दिखाना और न ही पलायन करना तभी विजय संभव है। हम देखते हैं कि,  श्री मिखाईल गोर्बाचोव सतत पलायन करते हुये साम्राज्यवादियों  के समक्ष दैन्यवश घुटने टेकते चले गए इसी लिए पराजित हुये।

प्रसंगवश यहाँ यह बताना गलत न होगा कि, हमारी प्राचीन संस्कृति का दुरुपयोग तथाकथित धर्म के ठेकेदारों द्वारा सतत रूप से किया जाता रहा है और हम भारतीय साम्यवादी  खुद को "धर्म" विरोधी घोषित करने के कारण उस पर मौन रहे हैं। वास्तव में वे धर्म के अलमबरदार धर्म का आशय ही नहीं जानते और हमने कभी उनका पर्दाफाश ही नहीं किया । योगीराज श्री कृष्ण ने भी जिसे माना था वह धर्म है - सत्य, अहिंसा(मनसा-वाचा-कर्मणा ),  अस्तेय , अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का समुच्य। इस संदर्भ में हम देखते हैं कि, भाजपा आदि तथाकथित धर्म के ठेकेदार ही इस धर्म का उल्लंघन करने के दोषी हैं।
(1 ) कारण कि, वे इस 'सत्य ' को ही स्वीकारने को प्रस्तुत नहीं हैं कि, भारतीय संस्कृति समष्टिवाद पर आधारित है न कि, व्यष्टिवाद जो कि पूंजीवाद का पर्याय है।   
(2 ) निजी लाभ के लिए वे ही दलित और दमित जन के लिए 'हिंसा' का प्रयोग करते हैं और मनसा-वाचा-कर्मणा समग्र रूप में ।
(3 ) वे धर्म के अलमबरदार कहलाने वाले ही 'कर-वंचना' करते हैं अर्थात 'अस्तेय' का पालन नहीं करते हैं।, और
(4 ) जमाखोरी तो उनके जीवन की धारा ही है जिसके द्वारा आभाव उत्पन्न कर वे जन-जन का शोषण करते हैं।
(5 ) ब्रह्मचर्य का पालन कितना करते हैं यह बात उनके नाईट क्लबों (इंडियन क्लब सरीखे ) से ही पता चल जाएगी।

स्वामी विवेकानंद जिन्हे वे अपने संकीर्ण दायरे में रख कर प्रचारित करते हैं, स्वम्य गरीबों और दुखियों के पक्षधर थे और सांप्रदायिक विद्वेष के विरुद्ध थे। एक मुसलमान का हुक्का गुड़गुड़ाने पर उन्हें जो प्रताड़णा मिली उसी से प्रेरित होकर वह घर-परिवार छोड़ कर समष्टि के कल्याण हेतु निकल पड़े। स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट कहा था कि, जब तक भारत में निर्धन की झोंपड़ी में खुशी का दीपक नहीं जलता भारत प्रगति नहीं कर सकता। यह एक वाक्य ही साम्यवादी दर्शन की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है। आवश्यकता है तो इस बात की कि, हम भारतीय संस्कृति से समष्टिवादी सिद्धांतों और तर्कों को ढूंढ कर भारतीय मनीषियों द्वारा व्यक्त विचारों से पुष्ट करते हुये जनता को अपने स्तर से जाग्रत करें तभी हम सांप्रदायिक शक्तियों भाजपा आदि को शिकस्त दे सकते हैं।

आज श्री राम के नाम पर उन्होने बवंडर उठाया हुआ है । हम जन-जन को समझा सकते हैं कि, श्री राम ने तत्कालीन साम्राज्यवाद के सरगना रावण को नष्ट करके भारत की जनता को शोषण और उत्पीड़न से बचाया था। लेकिन आज साम्राज्यवादियों की सहायक लुटेरी शक्तियाँ उनके नाम का सर्वथा दुरुपयोग कर रही हैं।
(रावण - वध एक पूर्व निर्धारित योजना --- http://krantiswar.blogspot.in/2015/10/blog-post_5.html
जब श्री राम ने स्वम्य भारत में एकाधिकारवादी राज्य की स्थापना की ओर कदम बढ़ाया तो तत्कालीन राजनीति के मनीषियों की प्रेरणा पर सीता ने राजमहल से विद्रोह कर दिया और वाल्मीकि मुनि के आश्रम में आश्रय लेकर अपने पुत्रों लव- कुश को राम के जन- विरोधी राज्य के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी। लव-कुश ने जन -सहयोग से मध्य भारत में जनवादी पंचायती राज्य की स्थापना कर डाली और उस पर आक्रमण करके श्री राम को परास्त होना पड़ा। राम जन - शक्ति के आगे झुके और भविष्य में अपने राज्य को जनवादी सिद्धांतों पर चलाने को राज़ी हुये।
(1 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/02/blog-post_19.html
(2 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_27.html
(3 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_12.html 
(4 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_30.html
यदि हम भारतीय संस्कृति से दृष्टांत ले कर जन - कल्याणकारी साम्यवादी सिद्धांतों का प्रचार करें और सांप्रदायिक शक्तियों पर प्रहार करें तो सफलता निश्चित ही हमारे चरण चूम लेगी। मुझे ऐसी आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास भी है और इसी कारण मैं भारत में साम्यवाद की उज्ज्वल संभावनाओं की उम्मीद करता हूँ। बस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित  सभी वांम - दलों को भारतीय संदर्भों पर विशेष बल देने की ही आवश्यकता है। मार्ग स्वतः ही सुगम होता जाएगा।

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