Saturday, 12 March 2016

राष्ट्रवाद देशभक्ति का गला दबाने की स्थिति में ------ विजय शंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार


स्वामी विवेकानंद ने कहा था- जब तक लाखों लोग भूखे और अशिक्षित हैं तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूं जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उनकी ओर ध्यान नहीं देता.


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पहले देशभक्ति और राष्ट्रवाद में फर्क़ तो समझ लीजिए!

By: विजय शंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार | Last Updated:Friday, 11 March 2016 9:28 PM



गुरुवार 10 मार्च, 2016 की शाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की कैम्पस में ही घुसकर ज़ुबान ख़ामोश करने की कोशिश की गई. थप्पड़ मारने का प्रयास करने वाले शख़्स विकास चौधरी का कहना था कि वह कन्हैया को सबक़ सिखाना चाहता था. इससे पहले कथित पूर्वांचल सेना के अध्यक्ष आदर्श शर्मा ने कन्हैया की जान लेने के लिए 11 लाख का ईनाम घोषित किया था. उससे भी पहले भारतीय जनता युवा मोर्चा के नौनिहाल कुलदीप वार्ष्णेय कन्हैया की ज़बान काटने वाले को 5 लाख का ईनाम घोषित कर चुके हैं. उससे पहले के पहले कुछ युवा वकीलों ने अदालत परिसर में कन्हैया को पीटने का तमग़ा अपनी छाती में जड़ा था.

गौर करने की बात यह है कि ये सभी कथित देशभक्त युवा हैं और कन्हैया को पहले से ही देशद्रोही मानकर उसे सबक़ सिखाना चाहते हैं जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा कर रखा है. उन्हें देश की न्याय व्यवस्था पर रंचमात्र यकीन नहीं है जबकि कन्हैया ने हज़ारहा कहा है कि वह इस महान देश के संविधान और न्यायपालिका पर पूरी आस्था रखता है. भारत विरोधी नारे लगाने से साफ इंकार करने के बाद उसने इतना ज़रूर कहा था कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की समाज को बांटने वाली नीतियों का विरोध करता है. क्या आज इस देश में सरकार का विरोध करना इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि लोगों को देशद्रोही करार दे दिया जाए!

आख़िर कन्हैया इन सबका दुश्मन कैसे बन गया? जबकि इसी देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो उसे अपनी आंखों का तारा मानने लगे हैं. वजह यह है कि जमानत पर रिहा होने के बाद कन्हैया ने कैम्पस में जो भाषण दिया वह करोड़ों दिलों की आवाज़ थी. यह आवाज़ जिन लोगों को पसंद नहीं आई वे कौन लोग हैं? क्या ये वही लोग नहीं हैं जो एक षड़यंत्रकारी योजना के तहत इस देश की ‘अनेकता में एकता’ पसंद करने वाली जनता को कई दशकों से मोनोलिथ बनाना चाहते हैं? क्या ये हमलावर लोग देशभक्त हैं? कतई नहीं, ये राष्ट्रवादी हैं. देशभक्त होने तथा राष्ट्रवादी होने में फर्क़ होता है. क्या है ये फर्क़, ज़रा महापुरुषों की ज़बानी सुन लीजिए:

अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था- राष्ट्रवाद एक बचकाना बीमारी है, यह मानव जाति का चेचक है.

देशभक्ति और राष्ट्रवाद के उपर्युक्त उद्धरणों से तो यह शीशे की तरह साफ हो जाता है कि देशभक्त कौन है और राष्ट्रवादी कौन. यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कन्हैया को मारने की कोशिश करने वाले और उनके पीछे की शक्तियां राष्ट्रवादी हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि राष्ट्रवाद को भारत जैसी विविधता वाले देश में प्रश्रय क्यों मिलना चाहिए? हर देशवासी को देशभक्ति की जगह राष्ट्रवाद की घुट्टी क्यों पिलाई जानी चाहिए?

सच्चाई यह है कि राष्ट्रवाद इस देश के सभी नागरिकों को देशभक्त नहीं मानता. वह अपनी विचारधारा से असहमति जताने वाले को देशद्रोही का प्रमाणपत्र जारी कर देता है. यहां तक कि उसकी जान लेने की कोशिश करता है और कई बार कामयाब भी हो जाता है. वह युवकों का ब्रेनवॉश करके अपनी विचारधारा का उन्माद भरता है और उनसे देशविरोधी गतिविधियां करवाता है. राष्ट्रवाद देशवासियों की भूख और शिक्षा पर ध्यान न देकर शिक्षा के केंद्रों को ही निशाना बनाता है जबकि देशभक्ति खेतों और सीमा पर संघर्ष करती है.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था- जब तक लाखों लोग भूखे और अशिक्षित हैं तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूं जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उनकी ओर ध्यान नहीं देता.

राष्ट्रवाद भी इसकी तरफ ध्यान नहीं देता बल्कि वह इस पर ध्यान देता है कि भूख और अशिक्षा के ख़िलाफ जो आवाज़ उठे उसे हर तरह के ‘छल-छद्म’ से ख़ामोश करा दो. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर भी इस राष्ट्रवाद के खिलाफ़ थे. वह भारत ही नहीं जापान और अमेरिका के राष्ट्रवाद के भी खिलाफ़ थे. सन 1916-17 के दौरान जब वह अमेरिका प्रवास पर थे तो उन्होंने चेतावनी दी थी कि राष्ट्रवाद एक बहुत बड़ा ख़तरा है. उनका कहना था कि भारत इतना विशाल और वैविध्यपूर्ण देश है कि मानो अनेक देश एक भौगोलिक इकाई में समा गए हों. उनका यह भी मानना था कि राष्ट्रवाद भारत में कई समस्याओं की जड़ है.

आज स्थिति यह है कि राष्ट्रवाद देशभक्ति का गला दबाने की स्थिति में पहुंच गया है. राष्ट्रवाद का स्वरूप यह है कि वह एक राजनैतिक सिद्धांत है. इसे स्वीकार करने पर किसी पार्टी विशेष का सदस्य बनना पड़ता है जबकि देशभक्त व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सदस्यता नहीं लेनी पड़ती. उसका नागरिक होना ही पर्याप्त है. राष्ट्रवाद को चिल्ला-चिल्ला कर सबको बताना पड़ता है कि वह राष्ट्र से प्रेम करता है जबकि देशभक्त को इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती. देश का मजदूर, किसान, व्यापारी, नौकरीपेशा यानी कोई भी देशभक्त हो सकता है जबकि राष्ट्रवाद इस सिद्धांत को नहीं मानता.

देशभक्ति अपने आप बढ़ने वाली भावना है उसे खुद को बढ़ाने के लिए कसरत नहीं करनी पड़ती. एक भिखारी भी देशभक्त हो सकता है लेकिन राष्ट्रवाद का ग़रीबों से आंतरिक विरोध होता है. अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए पूंजीवादी और राष्ट्रवादी हरदम चोर-चोर मौसेरे भाई बनने को तैयार रहते हैं. किसी गरीब से पूछिए कि वह राष्ट्रवादी है या देशभक्त, तो छूटते ही वह खुद को देशभक्त बताएगा क्योंकि राष्ट्रवाद के बारे में वह कुछ नहीं जानता. राष्ट्रवाद पढ़ाना पड़ता है, इसके लिए स्कूल होते हैं जबकि देशभक्ति के लिए किसी स्कूल की ज़रूरत नहीं होती. भारत में पैदा हुआ हर नागरिक देशभक्त होता है, देशद्रोही या छद्म होने का तमग़ा उसे राष्ट्रवाद देता है.

आजकल देश में यही कवायद चल रही है. कन्हैया कुमार तो एक प्रतीक है. कन्हैया के बहाने देशभक्तों को डराया-धमकाया जा रहा है. उसने देश में रहकर देश से आज़ादी मांगी, अन्याय-शोषण व आर्थिक विषमता से आज़ादी मांगी तो वह देशद्रोही हो गया और विजय माल्या को राष्ट्रवादी लोगों ने देशवासियों का पैसा बोरों में भरकर फुर्र हो जाने दिया तो वे देशप्रेमी हो गए! इस पर भी राष्ट्रवादी यही कहेगा कि कुछ भी होता रहे उसके देश में सब ठीक चल रहा है क्योंकि इस वक़्त देश में उसकी सरकार है. दरअसल राष्ट्रवाद एक धर्म है जो विद्वेष, हिंसा, तिरस्कार, हिंसा, आक्रामकता और शत्रुता की बुनियाद पर खड़ा होता है; इसलिए उसका मंत्र होता है- ‘राष्ट्रवादी हिंसा हिंसा न भवति’.

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Tuesday, 8 March 2016

विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ------ राजेंद्र शर्मा


जेएनयू में छात्रों के एक ग्रुप के 9 फरवरी के जिस आयोजन के नाम पर, मोदी सरकार और संघ परिवार ने अपने सभी विरोधियों और सबसे बढ़कर वामपंथ को देशद्रोही दिखाने की जबर्दस्त मुहिम छेड़ी है, उस आयोजन को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। बेशक, इस क्रम में अफजल गुरु की फांसी की सजा के विरोध को जिस तरह देशद्रोह बनाने की कोशिश की गई है, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी भी प्रकार के नारे लगाने भर को राजद्रोह नहीं माना जा सकता है। वास्तव में इस संबंध में तो देश का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्टï राय दे चुका है और बाकायदा हिंसा के लिए फौरी उकसावे की शर्त लगा चुका है। फिर भी, उक्त आयोजन को लेकर सरकार समेत संघ परिवार की ''देशद्रोह के नमूनेÓÓ की निर्मिति खुद गंभीर संदेहों के घेरे में है। इन संदेहों के दो-तीन तत्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पहला, तथ्य जो खासतौर पर दिल्ली सरकार द्वारा कराई गई पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जांच से सामने आया है, यह है कि उक्त आयोजन के लिए दो टेलीविजन चैनलों के कैमरों को विशेष रूप से और निजी तौर पर बुलाया गया था। इनमें से एक चैनल को तो बाद में उक्त कार्यक्रम की रिकार्डिंग के साथ छेड़छाड़ कर के कन्हैया के मुंह से नारे लगवाने वाला फर्जी वीडियो बनाने के लिए, रंगे हाथों पकड़ा भी गया है। यह दूसरी बात है कि भाजपा सरकार के आशीर्वाद से इसके बावजूद, इस चैनल को कोई नोटिस तक नहीं मिला है, फिर दूसरों को वीडियो के साथ फर्जीवाड़ा न करने का सबक देने वाली कोई सजा दिए जाने का तो सवाल ही कहां उठता है। विश्वविद्यालय सिक्युरिटी के परिसर में प्रवेश के रिकार्ड के अनुसार, इन चैनलों को प्रस्तावित आयोजन से काफी पहले और जेएनयू के एबीवीपी नेताओं द्वारा बुलाया गया था।
इससे कम से कम एक बात तो निर्विवाद रूप से साबित हो ही जाती है। 9 फरवरी को जेएनयू में जो कुछ हुआ, स्वत:स्फूर्त नहीं था। उसके लिए कम से कम उन लोगों की तरफ से पूरी तैयारी थी, जिन्होंने बाद में इसे जेएनयू के खिलाफ हमले का हथियार बनाया। क्या टेलीविजन चैनल इस पूर्व-नियोजित टकराव को, संघ-एबीवीपी के पक्ष से दर्ज करने के लिए ही बुलाए गए थे? आखिरकार, 'देशभक्तों बनाम देशद्रोहियों के युद्घÓ के भोंडे रूपक के प्रचार के जरिए,  इस रिकार्डिंग का जेएनयू के छात्र आंदोलन को बदनाम करने में तो उपयोग किया ही जा सकता था। पहले पुणे फिल्म तथा टेलीविजन इंस्टीट्यूट, फिर मद्रास आईआईटी पेरियार-आंबेडकर स्टडी सर्किल, फिर गैर-नैट छात्रवृत्ति बंद किए जाने के खिलाफ आक्यूपाई यूजीसी और अंतत: रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या, हरेक मामले में मोदी सरकार और उसकी शिक्षा मंत्री के कदमों के खिलाफ संघर्ष के अगले मोर्चे पर रहे जेएनयू के वामपंथी छात्र आंदोलन पर अंकुश लगाना जरूरी था।
लेकिन, लगता है कि खेल शायद इससे भी बड़ा था। एबीवीपी के बुलाए वफादार चैनलों की रिकार्डिंग के माध्यम से सत्तापक्ष तथा उसके द्वारा नियंत्रित शासन-प्रशासन के पास, 9 फरवरी को जो कुछ हुआ था, उसकी साक्ष्यों समेत पूरी जानकारी शुरु से ही थी, जिसमें आपत्तिजनक नारे लगाने वालों से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। इसके बावजूद, पहले एबीवीपी व भाजपा सांसद की शिकायत के माध्यम से सिर्फ आपत्तिजनक नारों को उछाला गया और उनके लिए छात्रसंघ के अध्यक्ष व महासचिव समेत, वामपंथी छात्र नेताओं के मुंह में ये नारे रखने की कोशिश की गई। इनका झूठ अब बाकायदा पकड़ा जा चुका है।  लेकिन, कन्हैया की गिरफ्तारी से लेकर अब जमानत पर रिहाई तक, पिछले इतने घटनापूर्ण करीब चार हफ्तों में पुलिस, न सिर्फ उक्त नकाबपोशों को पकड़ नहीं पाई है बल्कि उनकी किसी तरह से पहचान तक नहीं कर पाई है। वास्तव में पुलिस इस सच्चाई को देखकर भी नहीं देखना चाहती है कि कोई बाहरी नकाबपोश थे, जिन्होंने उक्त आपत्तिजनक नारे लगाए थे।
इसका सबसे उदार अर्थ तो यही हो सकता है कि सरकार की और इसलिए उसकी पुलिस की भी दिलचस्पी, वास्तव में न तो उक्त राष्टï्रविरोधी नारों में थी और न उक्त नारे लगाने वालों को देश के कानून के तहत बनने वाली सजा दिलाने में। उनकी दिलचस्पी तो जेएनयू छात्र आंदोलन, जेएनयू और उसके बहाने से विपक्ष तथा विशेष रूप से वामपंथ को देशविरोधी प्रचारित करने में थी और यह उद्देश्य पूरा हो चुका है। लेकिन, इससे एक और गंभीर आशंका भी पैदा होती है। कहीं मौके पर संघ के वफादार टेलीविजन कैमरों की ही तरह, देश तोडऩे के नारे लगाने वाले नकाबपोशों की उपस्थिति भी प्रायोजित और इसलिए एक बड़े षडय़ंत्र का हिस्सा तो नहीं थी? बेशक, नवउदारवाद के इस जमाने में बार-बार कहकर 'षडय़ंत्र सिद्घांतÓ को इतना बदनाम कर दिया गया है कि ऐसे षडय़ंत्र की ओर इशारा करते हुए भी हिचक होती है। लेकिन, सच्चाई यह है कि दुनिया भर में सत्ताधारी ताकतेें, एजेंट प्रोवेकेटियरों का ऐसा उपयोग करती आई हैं और आज भी कर रही हैं।
वास्तव में इसी बीच सामने आई इशरत जहां प्रकरण को नया रंग देने की सारी कोशिशों के बावजूद, पूर्व-गृह सचिव जीके पिल्लै ने चिदंबरम तथा कांग्रेस को मुश्किल में डालने की कोशिश करते हुए भी, इस पूरे प्रकरण के खुफिया ब्यूरो का एक ''कंट्रोल्ड आपरेशनÓÓ होने की बात मानी है। सुरक्षातंत्र की भाषा के जानकारों के अनुसार, इस मामले में कंट्रोल्ड ऑपरेशन का संक्षिप्त अर्थ है—बहकाकर बुलाना और खत्म कर देना! हालांकि यह सोचकर दहशत होती है, फिर भी सच यही है कि जो खुफिया एजेंसियां एक कॉलेज छात्रा समेत चार लोगों को, उनकी पृष्ठïभूमि कुछ भी हो, फंसाकर षडय़ंत्रपूर्वक मौत के घाट उतार सकती हैं और इससे सत्ताधारी नेताओं की हत्या के षडय़ंत्र को विफल करना प्रचारित कर सकती हैं, क्या एक कार्यक्रम में अपने 'मनचाहेÓ नारे लगवाने के लिए तीन नकाबपोश खड़े नहीं कर सकती हैं? क्या पुलिस इसीलिए उन्हें बचा रही है? मुद्दा नारों के देशद्रोहात्मक या राजद्रोहात्मक होने न होने का नहीं है। मुद्दा इस मुद्दे को इतना तूल देने के बावजूद, ये नारे लगाने वालों की सही पहचान करने से शासनतंत्र के कतराने का है। जब तक उक्त नकाबपोशों की पक्की पहचान नहीं की जाती है और इसी के हिस्से के तौर पर छात्रसंघ के पदाधिकारियों समेत वामपंथी छात्र नेताओं को उक्त नारों से अलग नहीं किया जाता है, तब तक यह संदेह बना ही रहेगा और समय गुजरने के साथ और गहरा होता जाएगा कि कहीं यह भी छात्र आंंदोलन तथा आम तौर पर विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ऑपरेशन उनके लिए अंतत: फायदे का सौदा होगा या घाटे का, यह एक अलग विषय है।

http://www.deshbandhu.co.in/article/5758/10/330#.Vt0ab30rK1s

Sunday, 6 March 2016

The beauty of sedition : eloquence of Kanhaiya's language ------ Tunku Varadarajan

N.d. Pancholi

"The first (speech) catapulted him to fame, incurring as it did the wrath of an obtuse Home Minister; of a dopey — but pernicious — Police Commissioner of Delhi; and of a tinpot-nationalist news anchor who disregarded the truth in a peerless display of hysteria. Together, they sucked young Kanhaiya into a vortex of political and judicial thuggery that would have made Gandhi and Ambedkar weep."
JNUSU President Kanhaiya Kumar


Reverse swing: The beauty of sedition
Let us hail Kanhaiya. If not for his politics, then certainly for the eloquence of his language.

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An anthology of the greatest political speeches of Independent India would make for a scrawny volume. Indian politicians aren’t strong on oratory, in large part because they’re uncultured, and have contempt for the Indian electorate.

Nehru was elegant, of course, though his speeches in English were not understood by a majority of Indians. Vajpayee was a master-speaker, his Hindi (and his sarcasm) being of the rarest poise. Annadurai electrified the Tamil people in a language that has, perhaps, only Bengali as its equal in its political prosody and spoken rhythms.

Of those in office today, Narendra Modi is India’s orator-in-chief, in spite of a tendency toward self-congratulation. He can mesmerise a crowd, his words a mixture of promise and menace. His granite face and bearing add to the effect of authority. Lalu Prasad is a favourite: not for his message, which is provincial and bogus, but for his jaunty folksiness, his devil-may-care phrasing, and his obvious glee in playing the bumpkin who steals a march on city-folk. And then there’s Shashi Tharoor — an old friend — who stands apart as an Indian politician who can actually debate. (In truth, he’s not a politician at all, which is his strength and — it could be said — also his weakness.)
Which brings me back to my anthology. Why confine it to elected politicians? In my view, no compendium of Indian political speeches would be complete now without an entry for Kanhaiya Kumar, the young PhD student from JNU who has arrested India’s imagination and ensured that the word “sedition” is part of the vocabulary of every citizen.

Like others with access to a computer, I have heard repeatedly the two speeches that Kanhaiya made most recently. The first catapulted him to fame, incurring as it did the wrath of an obtuse Home Minister; of a dopey — but pernicious — Police Commissioner of Delhi; and of a tinpot-nationalist news anchor who disregarded the truth in a peerless display of hysteria. Together, they sucked young Kanhaiya into a vortex of political and judicial thuggery that would have made Gandhi and Ambedkar weep.

If Kanhaiya’s first speech was impressive, his second, after his release on bail, was pure protest-poetry. One doesn’t have to share his politics to find pleasure in his language. I certainly don’t want “freedom from capitalism” — in fact, I want much more of it; and yet I found his revolutionary fervour endearing. Here is a young man with a serious rhetorical gift, and a mastery over the Hindi language that is a joy in this ugly age of “Hinglish”. His cadences and tempo are made all the more sweet by his Bihari lilt and his self-deprecating purabiya manner. This is Hindi as it should be declaimed—Hindi as a political rasmalai.

One needs to hear the speech, not read it, to appreciate fully the theatre of Kanhaiya’s delivery; his sawaal-jawaab —call-and-response — with the avid and idealistic crowd; the pregnant pauses, so essential in feats of rhetoric; the cutting humour of the occasion; and the verbal up-yours he delivered to those who would jail him for his views. All the while, another young man waved the Indian flag behind him. This was not sedition. This was the heaven of college life.

After this speech, the case for the prosecution is stone cold dead. The judge who released him said that Kanhaiya suffered from an anti-national virus, an “infection”. That virus, in truth, lives in those who would lock him up — those who have, by their own bigotry, sent this young Indian spirit soaring.


http://indianexpress.com/article/opinion/columns/reverse-swing-the-beauty-of-sedition-jnu-jnu-row-kanhaiya-kumar/

कन्हैया कुमार ने वाम राजनीति को जमीनी यथार्थ की शक्ति से परिचित करा दिया है ------ वीरेंद्र यादव


सच तो यही है कि ' A spectre is haunting the saffron , the spectre of KANHAIYA'
कन्हैया कुमार ने अपनी वक्तृता से वाम राजनीति को नये मुहावरे, शैली , संवाद और जमीनी यथार्थ की शक्ति से परिचित करा दिया है. पहले भी वाम राजनीति से सम्बद्ध कई लोग जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने जाते रहे हैं. उनमें प्रकाश करात,सीताराम येचुरी तो आज की वाम राजनीति के कर्णधार ही हैं. लेकिन ये अंग्रेजीदां अभिजात पृष्ठभूमि के हैं. कन्हैया की पूर्व नेतृत्व से भिन्नता महज उनकी ग्रामीण पृष्टभूमि और गैर -अंग्रेजीदां संवाद शैली नही है ,बल्कि उसका कंटेंट भी है. कन्हैया सही अर्थों में ग्राम्सी के 'आर्गेनिक इंटलेक्चुअल' की भूमिका में हैं. कन्हैया के भाषणों में वर्ग-चेतना और सामाजिक न्याय की अंतर्धारा जिस विश्वसनीयता के साथ अभिव्यक्त होती है ,लम्बे समय से वाम आन्दोलन में उसकी दरकार रही है. नीले और लाल यानि अम्बेडकरवाद और वाम विचारधारा का सहमेल कन्हैया जिस तरह से पेश कर रहे हैं वह वाम राजनीति का नया पैराडाइम शिफ्ट है. यह पहली बार है कि वाम राजनीति की जमीन पर खड़ा हुआ एक वक्ता अपने भाषण का समापन 'जय भीम' और 'लाल सलाम' दोनों नारों को एकसाथ लगाते हुए करता है. उल्लेखनीय यह भी है कि कन्हैया इन नारों को लगाते हुए दलित और पिछड़े सामाजिक सोपान पर न खड़े होकर उस 'डिकास्ट' धरातल पर खड़े है जो किसी भी वाम विचारधारा के व्यक्ति से अपेक्षित है और डी-क्लास तो वह अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति के चलते है ही.जब वह 'मनुवाद से आज़ादी' का नारा लगाते हैं तो वह अपनी सोशल लोकेशन का क्रिटीक करते हैं इसीलिये वे वंचित वर्गों के आरक्षण की पक्षधरता करते हुए अधिक विश्वसनीय लगते हैं. यह भी कि कन्हैया पार्टियों के पारम्परिक स्ट्रेटजेकेट से ऊपर उठकर वृहत्तर वैचारिक एकता की प्रस्तावना करते हुए वाम को वृहत्तर जनतांत्रिक अर्थों में विस्तृत भी करते हैं. यहाँ सेना बनाम छात्र का द्विविभाजन न होकर ,दलित ,आदिवासी किसान ,अल्पसंख्यक ,महिला और सभी उत्पीडित वर्गों की एकता का संकल्प है. 'राष्ट्रभक्त' बनाम 'राष्ट्रद्रोह' का द्विभाजन यहाँ 'राष्ट्र जनता का या शासक पार्टी का ?' के सवाल से स्वयमेव ख़ारिज हो जाता है. यहाँ आंबेडकर को अधिग्रहीत करने की भगवा राजनीति अम्बेडकरवाद और वामवैचारिकी के स्वाभाविक सहमेल की अनिवार्य परिणति से स्वयमेव तिरोहित हो जाती है. नीले और लाल की एकता का यह सशक्त विकल्प भगवा ताकतों को अस्थिर करने की जो सामर्थ्य रखता है वही भगवा ब्रिगेड का दुस्वप्न है. कन्हैया होने के यही वे निहितार्थ हैं जिससे घबराकर कोई जीभ काटने का दम भर रहा है तो कोई गोली मारने का. किसी को उसमें जिन्ना का जिन्न दिखाई दे रहा है तो किसी को उसमें नेतागिरी की'बू' आ रही है. सच तो यही है कि ' A spectre is haunting the saffron , the spectre of KANHAIYA'
साभार :

Thursday, 3 March 2016

सबसे कमजोर, बेबस और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले गृहमंत्री ------ मुकेश कुमार

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राज नाथ जी! आप अब तक के सबसे कमजोर, बेबस व अगंभीर गृहमंत्री हैं

राज नाथ सिंह जी आप देश के अब तक के सबसे कमजोर, बेबस और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश  करने वाले  गृहमंत्री के रूप में पहचान बना चुके हैं. आप देश और सरकार की भारी किरकिरी करा चुके हैं. अब बस भी कीजिए.rajnathsingh-intolerance
(मुकेश कुमार)
तथ्य नम्बर एक
14 फरवरी 2016 को राजनाथ सिंह जी ने कहा था कि “JNU की जो घटना हुई है,उसे लश्कर-ए-तैयबा के चीफ हाफिज सईद का भी समर्थन प्राप्त है. देश को इस हकीकत को भी समझना चाहिए.” राजनाथसिंह के इस कथन का आधार एक ट्विट था.
@HafeezSaeedJUD के हैंडल से एक ट्विट किया गया था जिसमें यह कहा गया था “हम अपने पाकिस्तानी भाइयों से गुजारिश करते हैं कि वो हमारे पाकिस्तान समर्थक JNU के भाइयों के लिए #SupportJUN को ट्रेंड करें. यह कितनी शर्मनाक बात है कि देश का गृहमंत्री कथित तौर पर एक फर्जी ट्विटर हैंडल के आधार पर किसी घटना में विदेशी शक्तियों का हाथ बताते हैं और जब इस पर आप से सुबूत मांगा जाता है तो आप साक्ष्यों को न्यायालय में प्रस्तुत नहीं कर पाते हैं.
अगर आप सचे हैं  और इस आरोप को गलत साबित करने के लिए  कोई रिपोर्ट आपके पास है तो अब तक क्यों नहीं प्रस्तुत किया गया है. क्या इस घटना को सियासी रंग देने की एक चाल के रूप में नहीं देखा जा रहा है ? और अगर यह आरोप सही है तो यह बड़ी संगीन बात है.
राजनाथ सिंह को इसका साक्ष्य देना होगा. जिसमें देश का गृह मंत्री बिना किसी ठोस सबूतों के किसी संस्था पर देशद्रोह को बढ़ावा देने के लिए दोष आरोपित कर देते हैं. दूसरी तरफ लश्कर-ए-तैयबा चीफ हाफिज सईद ने वीडियो रिलीज कर कहा कि JNU के पीछे उसका हाथ नहीं है.उसने कोई ट्विट नहीं किया. जिस ट्विटर खाते से ट्विट किया गया, वो फर्जी है.  एक अन्य ट्विट में हाफिज सईद को यह कहते हुए पढा गया कि भारत की सरकार अपने ही नागरिकों को मेरे फेक अकाउंट से मूर्ख बना रही है.
राजनाथसिंह किसी पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर यह नहीं कह रहे हैं बल्कि यह देश के गृहमंत्री के तौर पर कह रहे हैं,अगर साक्ष्य है तो प्रस्तुत करे नहीं तो देश को गुमराह करने के लिए माफ़ी मांगें.
तथ्य नम्बर दो
राजनाथ सिंह जी, आप देश के कैसे गृहमंत्री हैं जिनको यह भी पता नहीं होता कि पठानकोट में आतंकी हमला खत्म हुआ या जारी है. यह आप ही थे जिन्होंने आनन-फानन में शाम 6.50 बजे ट्वीट कर घोषणा की कि पठनाकोट में सारे आतंकवादी मार गिराये गये. आप ही ने घोषणा की कि ‘देश को अपने सुरक्षा बलों पर गर्व है जो हमेशा वक्त पर तैयार रहते हैं.मैं पठानकोट में सफल कार्रवाई के लिए सुरक्षा बलों को सलाम करता हूं.’ जबकि यह अभियान लगातार पांच दिनों तक चलता रहा.आप कैसे गृहमंत्री हैं जिनको अपने देश के सैन्य अभियान के बारे में भी सही जानकारी नहीं मिलती है.
तथ्य नम्बर तीन- लाचारी
आपकी लाचारी और कमजोरी तब और दिखाई देती है जब आपके पसंदीदा नाम अजित लाल को दरकिनार करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय ने संयुक्त ख़ुफ़िया कमिटी के मुखिया आर.एन. रवि को नगा शांति वार्ता हेतु नया वार्ताकार नियुक्त किया. इससे पहले प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के कारण  आप अपने पसंदीदा व्यक्ति को निजी सचिव नहीं बना पाए.
तथ्य नम्बर चार- अज्ञानता
गृहमंत्री जी आप लाचार और अज्ञानी तब भी दिखते हैं जब एक संवाददाता सम्मलेन में यह पूछा जाता है कि ‘क्या गृह मंत्रालय हाफिज सईद के संगठन ‘जमात-उ-दावा’ को आतंकवादी संगठन मानता है.’ और आप  अपनी बेबसी छुपाने के लिए हंसते हुए गलत जवाब देते हैं. सूत्रों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि JNU मामले को जिस तरह से हैंडल किया गया उसको लेकर अरुण जेटली से मतभेद था. जिस तरह से इस मामले को तूल दिया गया इस प्रकरण से अरुण जेटली असहमत थे. इससे अरुण जेटली और आपके बीच मतभेदों का भी पता चलता है.
तथ्य नम्बर पांच
शर्मिंदगी का एक और नमूना
पटियाला हाउस दिल्ली में कन्हैया पर हमला करने वाला विक्रम चौहान की आपके साथ की तस्वीर आपको कमजोर और शर्मिंदा करने के लिए काफी है. कन्हैया पर आक्रमण करके भी खुले घूम रहे थे और दिल्ली पुलिस ने तबतक गिरफ्तार नहीं किया जब तक कि एक टीवी स्टिंग में खुलासा नहीं हुआ. यह दिखाता है कि किस तरह आपकी पकड़ दिल्ली पुलिस पर है. यह आपको कमजोर और बेहद कमजोर बनाता है.
तथ्य नम्बर छह- कमजोर गृहमंत्री
राजन नाथ सिंह जी, पंकज सिंह मामले में आप के पर कतरे जा चूके है जो आप को और कमजोर बनाता है. जिस पद को आपने सुशोभित किया है कभी उसको लौह पुरुष सरदार पटेल ने भी धारण किया था.जिन्होंने भारत को मजबूत किया था.आप अपनी कमजोरी, अज्ञानता और अगंभीरता से देश और पद की गरिमा को काफी नुकसान पहुंचा चुके हैं. या तो अब बस कीजिए और खुद ही यह जिम्मेदारी किसी मजबूत कांधों को सौंप दीजिए.

About The Author

लेखक पंजाब विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो हैं.

http://naukarshahi.com/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%AA-%E0%A4%85%E0%A4%AC-%E0%A4%A4%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%95/

03 मार्च,2016 


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सतीश वर्मा इशरत जहां मामले में गुजरात हाईकोर्ट की ओर से बनार्इ गई एसआईटी के सदस्‍य ------
इशरत जहां मुठभेड़ मामले में सीबीआई जांच में शामिल आईपीएस सतीश वर्मा ने चुप्‍पी तोड़ते हुए बुधवार को कहा कि उसकी मौत पूर्वनियोजित हत्‍या थी। उन्होंने इंडियन एक्‍सप्रेस से कहा, ‘हमारी जांच में पता चला है कि एनकाउंटर से कुछ दिन पहले आईबी अधिकारियों ने इशरत जहां और उसके तीन साथियों को उठा लिया था। गौर करने वाली बात ये है कि उस वक्त भी आईबी के पास इस बात के सबूत या संकेत नहीं थे कि एक महिला आतंकियों के साथ मिली हुई है। इन लोगों को गैर कानूनी रूप से कस्टडी में रखा गया और फिर मार डाला गया।’ वर्मा गुजरात हाईकोर्ट की ओर से बनार्इ गई एसआईटी के सदस्‍य थे।
वर्तमान में वर्मा शिलॉन्‍ग में नेपको में मुख्‍य सतर्कता अधिकारी के रूप में पदस्‍थ हैं। उन्‍होंने कहा,’ अब ऐसा हो रहा है राष्‍ट्रवाद और सुरक्षा के नाम पर एक गरीब और मासूम लड़की का नाम खराब किया जा रहा है जिससे कि इस अपराध में शामिल लोगों के माकूल माहौल बनाया जा सके।’ उन्‍होंने इशरत के लश्‍कर ए तैयबा आतंकी और आत्‍मघाती हमलावर होने का भी खंडन किया। वर्मा ने कहा कि जावेद शेख के संपर्क में आने के बाद वह अपने घर और परिवार से केवल 10 दिन दूर रही। एक आत्‍मघाती हमलावर और लश्‍कर का आतंकी बनाने के लिए लंबा समय लगता है। 303 राइफल को भी सही तरीके से चलाने के लिए 15 दिन का समय लगता है। जितने समय तक वह बाहर रही उसमें उसे फिदायीन नहीं बनाया जा सकता।

वर्मा ने पूर्व अंडर सेक्रेटरी आरवीएस मणि के आरोपों का भी खंडन किया। उन्‍होंने कहा कि पिल्‍लई इंटेलिजेंस अधिकारी नहीं है। सतीश वर्मा ने कहा कि मणि को मामले की सीधी जानकारी नहीं थी। मणि की ओर से लगाए गए आरोप पुराने हैं। बता दें कि मणि ने आरोप लगाया था कि उन्‍हें इस मामले में प्रताडि़त किया गया। सतीश वर्मा ने उन्‍हें सिगरेट से दागा।


http://www.jansatta.com/national/sit-officer-satish-varma-breaks-silence-ishrat-killing-was-premeditated-murder/73636/?utm_source=JansattaHP&utm_medium=referral&utm_campaign=national_story

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तो क्या यह ABVP, Zee News और ANI की मिलीजुली साज़िश है?

March 2, 2016March 2, 2016 admin आयोजन, टीवी, पड़ताल, परिसर, ख़ास ख़बर


ज़ी न्यूज़ और एएनआइ को पहले से पता था कि 9 फरवरी की शाम जेएनयू में देशविरोधी नारे लगने वाले हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एबीवीपी के छात्र नेता सौरभ शर्मा को पता था कि वहां देशविरोधी नारे लगने वाले हैं। ये दोनों बातें इसलिए सही हैं क्योंकि ज़ी और एएनआइ के संवाददाता सौरभ शर्मा के संपर्क से जेएनयू में कार्यक्रम कवर करने गए थे। indiaresists.com ने 9 फरवरी को जेएनयू के मुख्य द्वार के प्रवेश रजिस्टर का वह पन्ना प्रकाशित किया है जिसमें ज़ी और एएनआइ के प्रवेश की एंट्री दर्ज है। दोनों के ही संवाददाताओं ने जिस मुलाकाती का नाम लिखा है, वह एबीवीपी के नेता सौरभ शर्मा हैं।

सवाल उठता है कि सौरभ शर्मा को पहले से कैसे पता था कि वहां उस शाम देशविरोधी नारा लगने वाला है। सवाल यह भी है कि अगर मीडिया को बुलाना ही था तो उन्होंने बाकी मीडिया को क्यों नहीं बुलाया। आखिरी बात ये है कि कार्यक्रम कवर करने के लिए आए पत्रकारों ने मुलाकाती/संपर्क के कॉलम में सौरभ शर्मा का नाम क्यों डाला जबकि परंपरा जेएनयू के रजिस्ट्रार का नाम लिखने की रही है।

(साभार: इंडिया रेसिस्ट्स )

Tagged 9 February ANI Anti-national India Resists jnu Register Sedition Slogan Zee

http://webcache.googleusercontent.com/search?q=cache:0l17W30E8KcJ:mediavigil.com/2016/03/02/%25E0%25A4%25A4%25E0%25A5%258B-%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE-%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25B9-abvp-zee-news-%25E0%25A4%2594%25E0%25A4%25B0-ani-%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2580-%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B2%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%259C%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%25B2/+&cd=1&hl=en&ct=clnk&gl=in

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सोच समझकर हुआ था इशरत का मर्डर, झूठ बोल रहे हैं मणिः सतीश वर्मा
Posted on: March 03, 2016 10:59 AM IST | Updated on: March 03, 2016 12:23 PM IST

नई दिल्ली। इशरत जहां मामले में हर रोज एक नया पेंच सामने आ रहा है। सीबीआई जांच में सहयोग करने वाले और पूर्व एसआईटी चीफ सतीश वर्मा ने सामने आकर गृह मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी रहे आरवीएस मणि के आरोपों को निराधार बताया है। आईबी को फंसाने के लिए मणि को सिगरेट से दागने के उनके आरोप पर सतीश वर्मा ने कहा कि मणि झूठ बोल रहे हैं।
अदालत द्वारा इशरत जहां हत्या मामले में नियुक्त एक एसआईटी टीम के सदस्य रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सतीश वर्मा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि साल 2004 में गुजरात में हुआ ये एनकाउंटर इशरत जहां की पूर्व नियोजित हत्या थी। इस सिलसिले में उन्होंने पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम के उन पर दबाव बनाए जाने के आरोपों को खारिज कर दिया।
सतीश वर्मा ने कहा कि हमारी जांच में पता चला कि एनकाउंटर से कुछ दिन पहले आईबी अधिकारियों ने इशरत जहां और उसके तीन साथियों को उठा लिया था। इन लोगों को गैर कानूनी रूप से हिरासत में रखा गया और फिर मार डाला गया। सतीश वर्मा मामले की जांच के लिए गुजरात हाई कोर्ट की ओर से बनाई गई स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (SIT) के सदस्य भी थे।
महाराष्ट्र के मुंब्रा की रहने वाली इशरत जहां को उसके तीन अन्य साथियों के साथ अहमदाबाद के बाहरी इलाके में 15 जून 2004 को मार डाला गया था। आरोप लगाया गया था कि ये सभी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य थे। बीते सप्ताह पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने कहा था कि लश्कर के इस समूह को 2004 में आईबी ने ही गुजरात आने का लालच दिया था।
आईपीएस अधिकारी और एसआईटी सदस्य सतीश वर्मा ने आरवीएस मणि के आरोप को भी खारिज कर दिया. मणि ने आरोप लगाया था कि उन्हें सिगरेट के टुकड़ों से जला कर प्रताड़ित किया गया। मणि ने गुजरात हाई कोर्ट में केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से मामला दायर किया था। उन्होंने एक हिंदी टीवी चैनल से कहा कि 19 वर्षीय एक लड़की की जान-बूझकर हत्या को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर बचाव नहीं किया जा सकता।
पूर्व एसआईटी चीफ वर्मा ने कहा कि सीबीआई जांच के दौरान ऐसी चीज कभी नहीं हो सकती। मान लीजिए ऐसा मैंने ऐसा किया है, अगर ऐसा है तो यह एक कसूर और अपराध है। मणि को पता होना चाहिए कि अगर ऐसा था तो वह मेरे खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून का सहारा भी ले सकते है।
वर्मा ने मणि के सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया। वर्मा ने कहा कि मणि का उद्देश्य कुछ और है। वह केस को कमजोर करना चाहते हैं। पुलिस जांच में गवाहों के निवेदन रिकॉर्ड किए जाते हैं, गवाहों के हस्ताक्षर नहीं लिए जाते हैं। मणि भी इस मामले में गवाह थे। उनका जो भी बयान देना था उसपर हस्ताक्षर नहीं होता है इसलिए इसके लिए दबाव का प्रश्न ही नहीं है।

http://khabar.ibnlive.com/news/desh/former-sit-chief-satish-verma-terms-all-allegations-levelled-by-former-under-secretary-rvs-mani-on-him-as-baseless-457240.html
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 एकाधिकारवादी दमन के और तीव्र होने की प्रबल संभावनाएं :

03-03-2016 
तमाम सरकारी एजेंसियों की झूठ को सही सिद्ध करने में विफलता के बावजूद संकीर्ण घोंघावादी लोग धड़ल्ले से JNUSU और इसके छात्रों तथा छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गुनहगार लिखते जा रहे हैं, इन लोगों द्वारा जनता को गुमराह करने हेतु कारपोरेट के सहयोग से लगातार अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन फिर भी जनता अब सच को पहचानने लगी है।
कल कन्हैया की रिहाई के समाचार के बाद मेरी श्रीमती जी ने कुछ ऐसे बच्चों से बात की जिनकी कोई भी राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। वे सब बच्चे विभिन्न समाचार माध्यमों से JNU के घटनाक्रम पर नज़र रखे हुये थे। उन सब का साफ-साफ कहना है कि, सरकार अपने झूठे चुनावी वायदों को तो पूरा कर ही नहीं सकी बल्कि खाद्यान्न के दाम अनाप-शनाप बढ़ा दिये , नौकरियों में छटनी कर दी, नए पास करने वाले बच्चों को नई नौकरियाँ देने को हैं नहीं इसलिए सरकार ने जान-बूझ कर बच्चों का भविष्य चौपट करने के लिए कालेजों, यूनिवर्सिटियों पर हमला बोला था। सरकार पढ़ाई का साल बर्बाद कर देना चाहती है इसलिए कन्हैया को झूठा फंसाया गया है।
भावी कर्णधार बच्चों में फैल रही यह अवधारणा सरकार के लिए खतरे की घंटी है अतः सरकारी एकाधिकारवादी दमन के और तीव्र होने की प्रबल संभावनाएं नज़र आ रही हैं।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1029591317102844&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3
:
( विजय राजबली माथुर )

Wednesday, 2 March 2016

देश मे कैसे आग लगाई जा सकती है ? क्या- क्या करके देश को तोड़ने का प्रयास हुआ है ??

Shilpi Tewari



Tuesday, March 1st, 2016
Smriti Irani’s former aide allegedly doctored Kanhaiya video, deletes twitter account
A forensic report has revealed that one of Smriti Irani’s former aides had ‘doctored’ videos that accused the JNU students’ leader Kanhaiya Kumar of making anti-India slogans.

India Today reported that the ‘Forensic Audio, Video, Authentication Report’ found two files to be ‘problematic.’

The first video was named as Q1 and titled as ‘Kanhaiya caught shouting anti-India slogans.’ This clip reportedly came from YouTue and was later used by several news channels.

This, the channels had said provided clinching proof of Kanhaiya’s involvement in anti-national? sloganeering.

Second video, named as Q2, according to India Today, was picked up from a URL address ‘shilpitewari.’

Shilpi Tewari, an active twitter user in flying the flag for Sangh ideology on twitter and known for trolling anybody critical of Prime Minister Narendra Modi and his government, was a campaign manager of Irani during Lok Sabha election in Amethi.

Tiwari has since then deleted her twitter account and gone underground.

Such is Tewari’s proximity to Irani that social media has been abuzz with allegations that HRD Ministry had relaxed the rules to employ Tiwari as a consultant ‘at a fee of Rs 35,000 per month.’ (See the meeting note below).

The meeting note below is now being widely shared on twitter in the wake of new revelation of Tewari’s alleged involvement in doctoring Kanhaiya video.

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In its conclusion, the forensic report has said that ‘abrupt changes were found in the pitch and the intensity contours….indicating that the recording is not authentic.”

However, Indian Express reported that three out of the seven video clips of the alleged ‘anti-national’ sloganeering in Jawaharlal Nehru University (JNU) on 9 February, examined by the Delhi government, had been found to be ‘doctored.

The video samples were sent by the Delhi government to Truth Lab in Hyderabad. On 13 February, the Aam Aadmi Party government in Delhi had ordered the District Magistrate in the capital to file a factual report about the incident, following conflicting claims of different parties shouting allegedly anti-national slogans on the JNU campus.


http://www.jantakareporter.com/india/smriti-iranis-former-aide-doctored-kanhaiya-video/39260


https://www.facebook.com/mohd.zahid.92/posts/963660677022464

Tuesday, 1 March 2016

देशभक्त बेटे को देशद्रोही कहा जा रहा है ------ मुचकुंद कुमार

***** पर कन्हैया के परिवारजनों, शुभचिंतकों, मित्रों के अंदर यह सवाल तो उठ ही रहा है(जो बिल्कुल जायज भी है) कि राष्ट्रपिता के हत्यारे की जयजयकार संसद परिसर में खुलेआम करने वाले देशद्रोही नहीं होते पर देश सेवा के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं करने वाला उनका कन्हैया, भगत सिंह को अपना आदर्श बताने वाला कन्हैया देशद्रोही है! *****



February 23
12:29201

  देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद कन्हैया कुमार के लकवाग्रस्त 60 वर्षीय पिता जयशंकर सिंह एवं आंगनबाड़ी सेविका के रूप में महज साढ़े तीन हजार रुपये के मानदेय पर काम करने वाली मां मीना देवी ने यह समझाने की पूरी कोशिश की थी कि देश सेवा और समाज सेवा के साथ करियर भी जरूरी चीज है। इतना पढ़-लिख गए हो तो कोई नौकरी पकड़ लो ताकि दूसरे परिवार की तरह हमारे परिवार की स्थिति भी सुधरे। पर कन्हैया ने कहा कि करियर बने न बने, मुझे देश के लिए काम करना है। गरीबों, मजलूमों व असहायों के लिए जीना है। उसे मैं नहीं छोड़ सकता। जयशंकर सिंह ने भी ज्यादा दबाव नहीं दिया क्योंकि ये संस्कार तो उन्होंने ही अपने बेटे को दिए थे। पर देश के लिए काम करने का जज्बा अपने मन में पालने वाले जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया का आज देशद्रोह के आरोप में जेल जाना जयशंकर सिंह के लिए किसी सदमेे से कम नहीं है। सदमा इस बात के लिए नहीं कि बेटा जेल चला गया। सदमा इस बात के लिए कि उनके देशभक्त बेटे को देशद्रोही कहा जा रहा है। सचमुच यह बहुत सारे लोगों के लिए विस्मय का विषय ही है कि जिस कन्हैया को उन्होंने कबीरा खड़ा बाजार में, कुमति नगर का किस्सा जैसे नाटकों में रंगमंच पर अभिनय करते हुए देखा। जिस कन्हैया को बचपन से ही गरीबों, मजलूमों के पक्ष में खड़ा होते हुए देखा वह आज देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद है। बेगूसराय बीहट के मसनदपुर टोले में बेहद साधारण परिवार में कन्हैया का जन्म हुआ। पिता जीप चालक के रूप में किसी तरह रोजी-रोटी की व्यवस्था करते थे। सरकारी विद्यालय से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कर जेएनयू पहुंचना कन्हैया जैसे छात्रों के लिए आश्चर्य की बात थी पर अदम्य इच्छा शक्ति, जज्बा एवं प्रतिभा ने ही यह मुमकिन किया कि वह जेएनयू का छात्र बन पाया। कन्हैया के मित्रों एवं परिजनों के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल है कि जो कन्हैया हमेशा अपने सहकर्मियों को भगत सिंह की विचारधारा से रू-ब-रू करवाते रहता था। पत्र-पत्रिकाओं समेत विभिन्न तरह की किताबों से दोस्ती करने के लिए प्रेरित करते रहता था वह आखिर देशद्रोही कैसे हो सकता है!
विगत विधानसभा चुनाव में कन्हैया बेगूसराय आया था और अपने पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में सैकड़ों सभाएं की थी। जिन लोगों ने भी उसे बोलते हुए सुना वे सब उसके प्रशंसक बन गए। आज उनसबके लिए भी यह अकल्पनीय ही है कि कैसे वह ऐसा हो सकता है? निश्चित रूप से कोई गहरी साजिश है, यह भी कुछ लोग मान रहे हैं। पर जो भी हो फिलहाल वह सींखचो के अंदर है और बाहर घमासान मचा है। पर कन्हैया के परिवारजनों, शुभचिंतकों, मित्रों के अंदर यह सवाल तो उठ ही रहा है(जो बिल्कुल जायज भी है) कि राष्ट्रपिता के हत्यारे की जयजयकार संसद परिसर में खुलेआम करने वाले देशद्रोही नहीं होते पर देश सेवा के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं करने वाला उनका कन्हैया, भगत सिंह को अपना आदर्श बताने वाला कन्हैया देशद्रोही है!

सूरज में लगे धब्बे फितरत के करिश्मे हैं।
मुचकुंद कुमार (लेखक शिक्षाविद् हैं)।

http://www.begusaraimedia.com/?p=5759