साम्राज्यवादी युद्धोन्मादी अमेरिका और जियानवादी हिंसक इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये अवांच्छित और विध्वंसकारी युद्ध की विभीषिका पर कालजयी शायर साहिर लुधियानवी की मशहूर नज्म आज और भी प्रासंगिक बन पड़ी है। युद्ध के बारे में लिखी गयी इस नज्म का यद्यपि एक एक हरूफ़ सार्थक और सोद्देश्य है लेकिन ये चार पंक्तियाँ ही युद्ध की समूची फिलास्फी को तार- तार कर देती हैं-
जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
आग और ख़ून आज वख्शेगी
भूख और एहतियाज कल देगी
अमेरिका और इजरायल ईरान पर थोपे गये इस युद्ध को उचित ठहराने के जो कारण गिनाते रहे हैं वे तर्क की कसौटी पर कहीं भी खरे नहीं उतरते। वे कहते रहे हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने जा रहा है। तो फिर सवाल उठता है कि आप कौन होते हैं उसे रोकने वाले। आप दोनों तो ख़ुद ही परमाणु हथियारों का भारी जखीरा लिये बैठे हैं। इजरायल ईरान का दसवां भाग भी नहीं है, लेकिन उसके गोदामों में भारी मात्रा में परमाणु अस्त्र- शस्त्र भरे पड़े हैं। वे प्रचारित करते हैं कि ईरानी परमाणु बम इजरायल और अमेरिका को बर्वाद करने को लक्षित हैं, तो फिर आप भी जबाव दीजिये कि आपके हथियार क्या शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिये हैं? क्या हथियारों के बल पर दुनियाँ में कहीं कोई शान्ति स्थापित हुयी है? दुनियाँ के किसी भी कोने में इतिहास में कोई एक भी उदाहरण मिलता हो तो बताइये जरूर।
फिर गत वर्ष भी आपने परमाणु हथियारों को विनष्ट करने का बहाना लेकर ईरान के संभावित परमाणु केन्द्रों पर B-2 जैसे घातक बमवर्षकों से हमला बोल दिया था और दावा किया था कि नाभिकीय ठिकानो, नाभिकीय ईधन और हथियारों को नष्ट कर दिया गया है। तो जबाव दीजिये कि दुनियाँ से आप तब झूठ बोल रहे थे या अब? क्या इससे साबित नहीं होता कि आप अपनी सनक, अपनी हनक, अपनी अर्थव्यवस्था-- जो कच्चे- पक्के तेल और विनाशक हथियारों की तिजारत से फलफूल रही है की वासना के वशीभूत हो कर ही दुनियाँ के कोने कोने में युद्ध थोपते हैं और वहां लूटपाट कर निकल लेते हैं।
आपका दूसरा तर्क भी टिकाऊ नहीं है। दुनियाँ में लोकतन्त्र के स्वयंभू रक्षक बनने की हसरत पाले बैठे आपने दावा किया था कि आप ईरान की इस्लामिक तानाशाही को समाप्त कर वहां लोकतन्त्र स्थापित करना चाहते हैं। आपने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये पहले सत्ताविरोधी आंदोलन भड़काया जिसमें आपको असफलता हाथ लगी। फिर आपने शांति वार्ता का नाटक रचा और वार्ता के दरम्यान ही छलपूर्वक हमला कर सुप्रीमो अयातुल्लाह खोमेनी को उनके 44 साथियों सहित मार डाला। आपको लगा कि ईरान नेत्रत्वविहीन होगया और अब लोग सड़कों पर उतर आयेंगे। तब आप ईरान में अपनी कठपुतली सरकार बैठा देंगे। आपने ईरान को वेनेज्वेला समझने की भूल की और आपका यह सपना भी धरे का धरा रह गया।
आर्थिक- साम्राज्यवादी शोषण से संचित अपार धन संपदा आपके पास है, और दुनियाँ के सोने का बड़ा हिस्सा आपके गोदामों में भरा है। कहावत है कि ‘सर्व गुणा: कांचनम् आश्रयन्ति’ अर्थात सारे गुण सोने ( धन सम्पदा ) में निहित हैं। उसके बल पर आपने विध्वंसकारी हथियार जुटाये हैं और पिट्ठू इजरायल के साथ मिल कर आपने ईरान के कोने कोने को ध्वस्त कर दिया। आप निरंतर जीत के ख्याली दावे कर रहे हैं । फिर यह विनाशक जंग क्यों जारी है आप जबाव नहीं दे पा रहे हैं। साफ है आपके पास हमले के लिये कोई वाजिब कारण था ही नहीं और अब जब इस महायुद्ध में गर्दन तक फंस गये हैं , उससे बाहर निकलने और नाक बचाने को आपको कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। जो दुर्गति आपने अफगानिस्तान में झेली वही आप ईरान में झेलने जा रहे हैं। अब तो आप समझ ही गये होंगे कि हजारों साल पुरानी सभ्यतायें चन्द बमों से नष्ट नहीं की जा सकतीं।
आप और आपका देश मानवाधिकारों का पहरुआ बनने की कोशिशें करता रहा है। लेकिन इजरायल द्वारा गाजा में किये जा रहे नरसंहार को आपका निर्लज्ज समर्थन हासिल है। इस बीच आपको शांतिदूत बन कर नोबेल शान्ति पुरुष्कार पाने की सनक सवार है। एक उधार का नोबेल आप अपने गले में लटकाये घूम रहे हैं। आपके भारतीय मित्र भी इजरायल जाकर एक ऐसा ही फर्जी तमगा गले में डलवा कर आत्म संतुष्ट हैं। लेकिन 28 फरबरी को आपने एक बालिका विद्यालय पर थोड़े अंतराल से दो बार बमबारी कराई ,जिसमें 168 निर्दोष बच्चियाँ और 14 अध्यापिकाएं शहीद हो गईं। आपको इस जघन्य अपराध के लिये क्षमा मांगनी चाहिये थी, लेकिन ढीढ़ता की सारी हदें पार करते हुये, आपने ईरान पर ही इसका आरोप जड़ दिया।
धनबल और शस्त्रबल में ईरान आपके सामने कहीं नहीं ठहरता, लेकिन जिस बहादुरी से वह इजरायल और अमेरिकी अड्डों को तवाह कर रहा है, वह इतिहास के स्वर्णिम दस्तावेजों में दर्ज हो रहा है। इससे न केवल आपकी बौखलाहट बढ़ी है, अपितु हताशा में आपने एक बार फिर ईरानी नेत्रत्व का संहार शुरू कर दिया। सामंतवादी युग में भी युद्ध के कुछ नियम थे लेकिन आधुनिकता और लोकतन्त्र का परचम लहराने का नाटक करते हुये आपने सारे संसार पर जंगल के कानून थोप दिये।
बक़ौल आपके आपने यह युद्ध आप द्वारा ख़ुद गड़े गये मुद्दों के हल के लिये शुरू किया था, लेकिन इसने आज अनेक मुद्दे खड़े कर दिये हैं।
किसी भी देश के भीतर सत्ता में बदलाव उस देश का निजी मामला होता है। उस देश की जनता का अधिकार है कि वह लोकतान्त्रिक तरीके से अपनी सरकार चुने। पर आपने तो सारी दुनियाँ में दखलंदाजी का ठेका ले रखा है। आपकी साजिशों में सहभागी इजरायल फिलिस्तीन, गाजा, लेबनान और ईरान में वही सब कर रहा है। आपने वेनेज्वेला में कमांडो आपरेशन चला कर प्रेसीडेंट मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर उन पर अभियोग चलाया है। लेकिन एक संप्रभु देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर वहाँ के राष्ट्राध्यक्ष के अपहरण का मुकदमा तो आप पर चलना चाहिए।
इराक, लीबिया और अब ईरान के नेत्रत्व को आपने जिस तरह बलात हलाक किया है, क्या इससे यौद्धिक हिंसा की नयी परंपरा कायम नहीं होगयी? यदि यही परंपरा दूसरे शक्तिशाली देश भी शुरू कर दिये तो बची खुची विश्व व्यवस्था भी तहस नहस हो जाएगी। आपकी मनमानी से संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतराष्ट्रीय न्याय प्रणाली अंतिम साँसे गिन रहे हैं और बढ़ा प्रश्न खड़ा हो गया है कि अमेरिका- इजरायल को कौन युद्ध अपराधी घोषित करेगा? कौन उन्हें दंडित करेगा? आप सारी दुनियाँ को ईरान के खिलाफ बरगला कर विश्वयुद्ध भड़काना चाहते हैं। आप उन देशों का आह्वान कर रहे हैं कि वे अपनी सेनाएँ होरमुज भेजें जिनके कि जहाज वहाँ फंसे हैं।
आपके इस मनमाने कदम से विश्व अर्थव्यवस्था आज चरमरा कर रह गयी है। शिपिंग का खर्च 5 गुना बढ़ गया है। अकेले भारत का ही 12000 करोड़ का माल समुद्र में फंसा है। कच्चे तेल की कीमतें काबू के बाहर जा चुकी हैं। रसोई गैस की महंगाई और अनुपलब्धता ने घर और बाजार की व्यवस्था पर गहरी चोट की है। शेयर बाजार धड़ाम हो गये है। डालर के मुक़ाबले रुपया 92 के ऊपर हो गया है। आयात निर्यात में भारी गिरावट है। पेट्रोलियम पदार्थ आधारित उद्योग ठप पद चुके हैं। इसका प्रभाव अन्य उद्योगों पर साफ दिख रहा है। बेरोजगारी मेन बेपनाह बढ़ोत्तरी हुयी है। प्राक्रतिक और मानव निर्मित संपदाओं की बड़े पैमाने पर बरवादी हो रही है। पर्यावरण को अकल्पनीय क्षति पहुंची है। आप इन समूचे हालातों पर संवेदनशील और तार्किक रुख अपनाने के बजाए निरंतर उकसावे और विनाशकारी कारगुजारियों में जुटे हैं।
जंग खत्म करने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की अनुपस्थिति में ईरान ने ही आगे बढ़ कर जंग खत्म करने की सशर्त पेशकश की है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने साफ कहा है कि अगर क्षेत्र में जारी तनाव और जंग को खत्म करना है तो पहले ईरान के अधिकारों को स्वीकार करना होगा। उन्होने कहा कि हालिया हमलों से हुये नुकसान की भरपाई की जाये और भविष्य में ईरान पर किसे तरह के हमले न हों, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गारंटी दी जाये। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि इन शर्तों के बिना स्थाई शांति संभव नहीं है।
विश्व जनमत को ईरान की इस पुकार को सुनना चाहिये और जंग जल्द से जल्द खत्म हो और प्रथ्वी इवान मानवता का भविष्य सुरक्षित हो सके। युद्ध किसी समस्या का समाधान न कभी हुआ है न होगा- साहिर की पंक्तियाँ
इसलिए ए शरीफ इन्सानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है।
डा॰ गिरीश।
18.3.2026.
