Friday, 16 October 2026

सवाल से बचने का नहीं, जवाब खोजने का समय है ------ Kumar Sandeep's Post




पिछली पोस्ट — “नेहा बोरा नई कन्हैया कुमार?” — को जिस तरह का रिस्पॉन्स मिला, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। एक सामान्य लिखित टेक्स्ट पोस्ट को अब तक लगभग 57 हजार लोगों ने देखा है। यह संख्या सिर्फ एक पोस्ट की पहुँच नहीं बताती, बल्कि यह भी दिखाती है कि छात्र राजनीति, वामपंथी आंदोलन और उससे निकलने वाले नेतृत्व के भविष्य को लेकर लोगों के भीतर गंभीर सवाल मौजूद हैं।

इसी सिलसिले में आज एक बड़ा सवाल उठाना जरूरी है—

क्या भारत की वामपंथी पार्टियाँ धीरे-धीरे कांग्रेस के लिए एक तरह की “कैडर फैक्ट्री” बनती जा रही हैं?

भारतीय छात्र राजनीति का इतिहास देखें तो विश्वविद्यालयों और छात्र संगठनों से बड़ी संख्या में युवा राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता निकले हैं। इनमें से कई ने वामपंथी छात्र संगठनों से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, संघर्ष किया, संगठन में काम किया और अपनी पहचान बनाई। लेकिन सवाल यह है कि उनमें से कितने लोग अंततः अपने मूल संगठन को मजबूत करने के बजाय कांग्रेस या दूसरे बड़े राजनीतिक दलों में चले गए?

कन्हैया कुमार इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं।

एक समय AISF और जेएनयू छात्रसंघ की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे कन्हैया कुमार आज कांग्रेस में महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभा रहे हैं।

यहाँ सवाल कन्हैया कुमार के कांग्रेस में जाने का अकेले नहीं है।

सवाल यह है कि वामपंथी छात्र आंदोलन लगातार ऐसे राजनीतिक नेतृत्व को पैदा क्यों करता है, जिसे बाद में कोई दूसरा बड़ा राजनीतिक दल अपने साथ जोड़ लेता है?

क्या यह केवल उन नेताओं की व्यक्तिगत पसंद है?

या फिर इसके पीछे हमारे संगठनों की अपनी कोई संरचनात्मक कमजोरी भी है?

वामपंथी पार्टियों को इस सवाल से बचने के बजाय इसका सामना करना चाहिए।

हमें सोचना होगा—

क्या हम अपने छात्र और युवा नेताओं को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस दे रहे हैं?

क्या हम युवाओं को केवल आंदोलन, नारे और प्रदर्शन तक सीमित रखते हैं, या उन्हें संगठनात्मक और राजनीतिक निर्णय लेने की वास्तविक जिम्मेदारी भी देते हैं?

क्या पार्टी के भीतर नए नेतृत्व के विकास के लिए पर्याप्त अवसर हैं?

क्या व्यक्तिवाद, गुटबाजी और “हीरोइज्म” सामूहिक नेतृत्व के विकास को कमजोर कर रहे हैं?

राजनीति में व्यक्ति महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी भी विचारधारा की वास्तविक ताकत व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार, संगठन और मजबूत राजनीतिक कैडर होता है।

यदि कोई युवा नेता वर्षों तक संघर्ष करने के बाद भी अपने संगठन के भीतर अपना राजनीतिक भविष्य नहीं देख पाता, उसे जिम्मेदारी और नेतृत्व का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो निश्चित रूप से बड़े राजनीतिक दल उसके सामने एक आकर्षक राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं।

और कांग्रेस ने छात्र एवं युवा राजनीति से आने वाली प्रतिभाओं को अपने राजनीतिक विस्तार में जगह देने की कोशिश पहले भी की है।

इसलिए सवाल केवल कांग्रेस से नहीं है।

सवाल हमसे है।

हम अपने बनाए हुए नेतृत्व को अपने संगठन में रोक क्यों नहीं पा रहे हैं?

हम उन्हें आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर क्यों नहीं दे पा रहे हैं?

हमारे संगठन से निकला युवा नेता दूसरे दल के लिए अधिक उपयोगी और हमारे अपने संगठन के लिए कम उपयोगी क्यों हो जाता है?

वामपंथी आंदोलन को अगर भविष्य में मजबूत होना है तो उसे व्यक्तिवाद से ऊपर विचार, व्यक्ति से ऊपर संगठन और पुराने नेतृत्व से ऊपर नए नेतृत्व के निर्माण को प्राथमिकता देनी होगी।

छात्र आंदोलन से निकला हर प्रतिभाशाली युवा किसी दूसरे राजनीतिक दल की राजनीतिक पूंजी बनने के बजाय अपने विचार और अपने संगठन को मजबूत करे—इसके लिए केवल युवाओं को दोष देना पर्याप्त नहीं है।

संगठनों को भी अपने भीतर ऐसा लोकतांत्रिक और राजनीतिक वातावरण बनाना होगा, जहाँ युवाओं को सम्मान, जिम्मेदारी, निर्णय लेने की शक्ति और आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले।

वरना स्थिति यही बनी रहेगी—

वामपंथी संगठन पौधे तैयार करेंगे,

संघर्ष से उन्हें सींचेंगे,

राजनीतिक प्रशिक्षण देंगे,

और जब वे फल देने लगेंगे,

तो कोई बड़ा राजनीतिक दल उन्हें अपने बगीचे में ले जाएगा।

यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है।

यह पूरे वामपंथी आंदोलन के लिए आत्ममंथन का विषय है।

छात्र और युवा आंदोलनों से कांग्रेस की मुख्यधारा की राजनीति में गए कुछ चर्चित नामों की सूची इस प्रकार है—

• कन्हैया कुमार — अखिल भारतीय छात्र महासंघ (AISF) के पूर्व नेता और जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष (2015–16), बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।

• सैयद नसीर हुसैन — स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1999–2000) रहे। बाद में युवा कांग्रेस से जुड़े और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद तथा पार्टी महासचिव बने।

• शकील अहमद खान — SFI से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1992) रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और बिहार विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे।

• बत्ती लाल बैरवा — SFI से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1996) रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।

• संदीप सिंह — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2007–08) रहे। बाद में प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीतिक टीम से जुड़े।

• अकबर चौधरी — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2013–14) रहे। बाद में कांग्रेस से जुड़े।

• मोहित पांडेय — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2016–17) रहे। बाद में कांग्रेस से जुड़े राजनीतिक कार्यों में सक्रिय रहे।

• प्रसनजीत बोस — SFI से जुड़े वामपंथी कार्यकर्ता रहे और बाद में कांग्रेस के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

डी. पी. त्रिपाठी: एसएफआई के नेता और जेएनयूएसयू के अध्यक्ष (1975–76)। बाद में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का दामन थामा और वर्ष 1999 में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए।

इन नामों की सूची किसी व्यक्ति के राजनीतिक निर्णय पर व्यक्तिगत हमला करने के लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति पर बहस शुरू करने के लिए है।

सवाल सीधा है—

क्या वामपंथी पार्टियाँ देश के लिए वैकल्पिक राजनीति का मजबूत नेतृत्व तैयार कर रही हैं, या अनजाने में ऐसे नेताओं को तैयार कर रही हैं जिनका अंतिम राजनीतिक ठिकाना कोई दूसरा बड़ा दल बन जाता है?

इस सवाल से बचने का नहीं, इसका जवाब खोजने का समय है।

विचार बचेगा तो संगठन बचेगा,

संगठन बचेगा तो आंदोलन बचेगा,

और आंदोलन बचेगा तो नेतृत्व भी बचेगा।

Thursday, 8 October 2026

राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा का जश्न ------ Kavita Krishnapallavi's Post

 


जब रोम जल रहा था, नीरो सुख और चैन की बाँसुरी बजा रहा था!
भाजपाई अश्लीलता का ताज़ातरीन प्रदर्शन : जनता सड़कों पर विरोध कर रही है और प्रधानसेवक 25 साल के "उपलब्धियों" के जश्न में मशगूल हैं। 
रोम के क्रूर तानाशाह के बारे में प्रचलित यह कहावत आज हमारे देश के हालात पर बिल्कुल सटीक बैठती है। पूरे देश में आम जनता जब अपनी बुनियादी माँगों और अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर है, तब फ़ासीवादी शासक कभी अपना जन्मदिन मनाने में व्यस्त है, कभी भजन गाने में तल्लीन है, तो कभी अपने (कु)शासन की खुशियाँ मनाने में। सत्ताधारी महामानव के 25 साल के कार्यकाल पूरे होने के मौके पर केन्द्रीय कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित किया। इसके तहत देशभर में भाजपा नरेन्द्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक करियर का जश्न मनाने के लिये कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। 'सेवा संकल्प अभियान' के नाम से शुरू किये गये इन कार्यक्रमों में लोगों को "ईश्वरीय अवतार" के उपलब्धियों से परिचित कराने की पुरज़ोर कोशिश की जायेगी! एक बार फ़िर इसके लिए सरकारी आयोजन किये जायेंगे, जनता का हज़ारों करोड़ रुपये महामानव की छवि को बचाने की कोशिश में बहाया जायेगा। ख़ैर! इससे पहले कि हम भाजपा द्वारा आयोजित किये जा रहे इन कार्यक्रमों की मंशा पर सवाल करें, हमें फ़ासीवादी तानाशाह की "विराट छवि" को गढ़ने वाली उनकी उपलब्धियों को याद कर लेना चाहिए।
"हिन्दू हृदय सम्राट" के पिछले 25 साल की "अद्वितीय प्रतिभा" के कुछ चुनिन्दा उदाहरण :
गुजरात नरसंहार 2002 
मुज्ज़फरनगर दंगे 2014
दिल्ली दंगे 2020 
नोटबन्दी घोटाला
अनियोजित कोविड लॉकडाउन
पीएनबी घोटाला
पीएम केयर्स फण्ड का घोटाला
राफेल घोटाला
राम मन्दिर चन्दा चोरी घोटाला
सीबीएसई घोटाला
रिकॉर्डतोड़ परीक्षा घोटाला
पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस व अन्य ज़रूरी उत्पादों की क़ीमत को आसमान तक ले जाना!
देश की लगभग आधी आबादी को बेरोज़गारी, अर्द्धबेरोज़गारी या प्रच्छन्न बेरोज़गारी की स्थिति में पहुँचाने की कला!
चार लेबर कोड लाकर मज़दूरों के शोषण और लूट को क़ानूनी जामा पहनाने में भरपूर योगदान!
वैश्विक भूखमरी और ग़रीबी सूचकांक में भारत को अव्वल स्थान पर लेकर जाना!
महिला असुरक्षा के मामले में भारत को सर्वोच्य स्थान दिलाना!
प्रेस स्वतन्त्रता के मामले में लगातार भारत का नीचे लुढ़कते जाना!
छात्रों युवाओं पर लठियाँ, गोलियाँ और पैलेट गन चलवाना!
साम्प्रदायिक हिंसा में अभूतपूर्व बढ़ोतरी का श्रेय!
इलेक्शन कमीशन से लेकर ईडी, सीबीआई व न्यायपालिका तक में फ़ासीवादी घुसपैठ के ज़रिये उनकी बर्बादी में योगदान!
SIR के ज़रिये चुनावी घपलेबाज़ी का कलात्मक प्रदर्शन 
उपरोक्त चन्द घोटालो, घपलों, भाजपाई तरक्की और विकास का पूरा-पूरा श्रेय मोदी जी के महान नेतृत्व को जाता है। आम जनता को लाइनों में लगवाकर, उनके बचे-खुचे अधिकारों को छीनकर, देश को भूखमरी, बेरोज़गारी, ग़रीबी, महिला असुरक्षा में सबसे आगे पहुँचाकर उत्सव मनाने की जो नायाब कला है, उसकी प्रथम वाहवाही का हक़दार फ़ासिस्ट गिरोह के सरदार के अलावा भला और कौन हो सकता है! इसलिए, राजनीति में उसके 25 साल के नग्ण और बेशर्म प्रदर्शन पर यह संघी जश्न लाज़मी है। कोई भी आम इन्सान अगर इन कार्यक्रमों की ज़रूरत पर दो मिनट रुक कर सोचेगा, तो इसके पीछे की सच्चाई भी समझते देर नहीं लगेगी।
नरेन्द्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक करियर में आम आवाम को क्या हासिल हुआ? "नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमन्त्री" के सिर्फ़ और सिर्फ़ 12 साल के कार्यकाल को भी देखें और तमाम चुनावी वायदों को याद करें तो शायद ही आप कोई ऐसा वायदा पूरा होते हुए ढूँढ पाये जो मेहनतकश जनता के हितों का साधन करता हो। आज जब एक बड़ी आबादी कमरतोड़ महँगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी की मार झेल रही है, छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, देश के अल्पसंख्यक विशेष तौर पर मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और फ़ासीवादी हिंसा के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के 25 सालों पर मनाएँ जाने वाले ये उत्सवी कार्यक्रम जनता के दुख-तकलीफ़ों के साथ एक क्रूर मज़ाक है। भाजपा,आरएसएस के तमाम नेता इस मौक़े पर ख़ुद को परमभक्त साबित करने की प्रतिस्पर्द्धा में कहीं कीर्तन, कहीं जागरण करवा रहें हैं, तो कहीं नये सिरे से साम्प्रदायिकता के ज़हर को घोलने के काम में लग गये हैं। यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए ताकि छात्र-युवा आन्दोलन के दौरान पूरी दुनिया में महामानव कि चूर-चूर हो चुकी छवि को फ़िर से जोड़ा और चमकाया जा सके। याद हो की परीक्षाओं में धाँधली के ख़िलाफ़ दो महीने पहले हुए छात्रों के आन्दोलन ने प्रधानसेवक की गढ़ी गयी छवि को अर्श से फर्श पर ला खड़ा किया था। इस नुक़सान की भरपाई के लिये अब नये सिरे से भव्य कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू किया जा रहा है।
फ़ासीवादी राजनीति कि यह विशेषता होती है की वह अपने शीर्ष नेता यानी "फ़्यूहरर" को शुद्ध रूप से तैयार किये गये विचारधारात्मक समुदाय के अकेले प्रवक्ता, एकमात्र नेता और हृदय सम्राट के रूप में स्थापित करता है और इसके लिए वह इन तमाम तरीकों का इस्तेमाल करता है, जिसका जनजीवन के असल सवालों से कोई लेना-देना नहीं होता। फ़ासीवादी नेता का कद इस कदर बड़ा बना दिया जाता है कि उसका विरोध असम्भव प्रतीत होने लगे, यहाँ तक कि उससे सवाल करना भी देश और राष्ट्रद्रोह की गिनती में ले आया जाता है। यही आज हमारे देश में मोदी नीत भाजपा सरकार के फ़ासीवादी शासन में हो रहा है।
25 साल सत्ता में रहना कोई उपलब्धि है या नहीं यह इस देश कि आम जनता तय करेगी और इस वक़्त भाजपा सरकार के प्रति जो असंतोष और गुस्सा लोगों में है वह सड़कों पर अभिव्यक्त हो रहा है। फ़ासीवादी तानाशाहों के लम्बे से लम्बे कार्यकाल को जनता ने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है, इसका इतिहास गवाह है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता। फ़ासीवादी प्रधानसेवक की चकनाचूर छवि को बचाने के लिए भाजपा-आरएसएस द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न इनके राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा है और आम जनता की समस्याओं को नज़रअन्दाज़ करने का बेशर्म उदाहरण भी है।


Friday, 2 October 2026

वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र ------ राम या वाम 's Post

 


भारतीय वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र

क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?

प्रिय वामपंथी नेतृत्व,

यह पत्र किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं है।

यह CPI, CPI(M), CPI(ML) या किसी एक धारा को कटघरे में खड़ा करने के लिए भी नहीं है।

यह सवाल पूरे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से है।

क्योंकि इतिहास का एक अजीब मोड़ हमारे सामने है—

हम सभी शोषण के खिलाफ लड़ने की बात करते हैं,

मजदूर-किसान की एकता की बात करते हैं,

साम्राज्यवाद और पूंजीवादी वर्चस्व का विरोध करते हैं,

सामाजिक न्याय और मेहनतकश जनता के अधिकारों की बात करते हैं।

लेकिन जब सवाल आता है—

“क्या भारतीय वाम की बिखरी हुई ताकतों को व्यापक संघर्ष के लिए एक साथ लाया जा सकता है?”

तो हमारी सारी क्रांतिकारी भाषा अचानक संगठनात्मक सीमाओं से टकराने लगती है।

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एक असहज सवाल से शुरुआत कीजिए

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन कोई नया विषय नहीं है।

1960 के दशक में कार्यक्रम और रणनीति को लेकर गंभीर मतभेदों ने CPI के विभाजन और CPI(M) के गठन का रास्ता बनाया। बाद में विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धाराएँ भी अलग-अलग रास्तों पर चलीं।

इन विभाजनों के पीछे ऐतिहासिक, वैचारिक और रणनीतिक कारण रहे हैं।

इसलिए हर मतभेद को “सत्ता की लड़ाई” कह देना भी उचित नहीं होगा।

लेकिन आज सवाल यह है—

क्या पुराने मतभेदों को हमेशा के लिए राजनीतिक दीवार बना देना आवश्यक है?

क्या अलग-अलग वैचारिक धाराएँ अपने मतभेद बनाए रखते हुए भी जनता के साझा सवालों पर एक साथ संघर्ष नहीं कर सकतीं?

और अगर कर सकती हैं—

तो हम उतना भी क्यों नहीं कर पा रहे?

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नेतृत्व से मेरा सीधा सवाल है

आप दशकों से जनता को त्याग का पाठ पढ़ाते हैं।

आप कहते हैं—

व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है।

आप कहते हैं—

पार्टी जनता के लिए है।

आप कहते हैं—

नेतृत्व वर्ग-संघर्ष का औजार है।

तो फिर एक दिन यह सवाल अपने ऊपर भी लागू कीजिए—

अगर मेरे पद से हटने से व्यापक वाम एकता मजबूत होती है, तो क्या मैं हटने के लिए तैयार हूँ?

अगर उत्तर “हाँ” है—

तो रास्ता खोलिए।

अगर उत्तर “नहीं” है—

तो कम-से-कम ईमानदारी से यह स्वीकार कीजिए कि समस्या केवल वैचारिक मतभेद की नहीं, संगठनात्मक सत्ता की भी है।

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क्या महासचिव का पद क्रांति से बड़ा है?

यह सवाल कठोर है।

लेकिन शायद अब कठोर सवालों से बचने का समय नहीं है।

महासचिव कौन बनेगा?

राज्य सचिव कौन बनेगा?

केंद्रीय समिति में किसका कितना प्रतिनिधित्व होगा?

किस पार्टी का झंडा आगे रहेगा?

किसका नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा?

किसके पास अंतिम राजनीतिक निर्णय का अधिकार होगा?

ये सवाल संगठन के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

लेकिन जनता के लिए?

एक बेरोजगार युवा के लिए महासचिव की कुर्सी का क्या अर्थ है?

एक मजदूर के लिए केंद्रीय समिति की सीट का क्या अर्थ है?

एक खेत-मजदूर के लिए आपकी संगठनात्मक प्रतिष्ठा का क्या अर्थ है?

वह सिर्फ यह देखता है—

जब उसका जीवन संकट में था, तब कौन उसके साथ खड़ा था?

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आपके अपने दस्तावेज आपको आईना दिखाते हैं

यह आलोचना बाहर से थोपी हुई नहीं है।

CPI अपने संविधान में “unity in action”, आंतरिक बहस और असहमति के सम्मान की बात करती है।

CPI(M) के दस्तावेज Left unity को संयुक्त कार्रवाई और साझा अभियानों के आधार पर मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।

CPI(ML) Liberation का 2023 का कार्यक्रम तो और आगे जाकर सभी भारतीय कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक एकीकरण की दिशा में बात करता है और Left forces की unity in action को महत्वपूर्ण मानता है।

तो सवाल यह नहीं कि—

एकता की बात कौन करता है?

सवाल यह है—

एकता की दिशा में व्यवहारिक कदम कितने उठाए जाते हैं?

यहीं दस्तावेज और व्यवहार के बीच की दूरी पर बहस होनी चाहिए।

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आत्मालोचना दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए

किसी दूसरे संगठन को संशोधनवादी कहना आसान है।

किसी को अवसरवादी कहना आसान है।

किसी को संसदीय भटकाव का शिकार कहना आसान है।

किसी को अतिवामपंथी कहना आसान है।

लेकिन क्या हम अपने संगठन से पूछ सकते हैं—

जनता हमारे साथ क्यों नहीं बढ़ रही?

युवा हमारे साथ स्थायी रूप से क्यों नहीं जुड़ रहे?

मजदूर बस्तियों में हमारी राजनीतिक उपस्थिति क्यों कमजोर है?

किसानों के बीच हमारा प्रभाव अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुँच रहा?

नई पीढ़ी नेतृत्व में क्यों नहीं आ रही?

महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित तबकों को निर्णायक नेतृत्वकारी भूमिका कितनी मिली?

और सबसे कठिन सवाल—

अगर हमारी लाइन इतनी सही है, तो उसका सामाजिक प्रभाव हमारी अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं है?

यह सवाल दूसरे संगठन के खिलाफ हथियार नहीं होना चाहिए।

यह अपने संगठन के सामने रखा हुआ आईना होना चाहिए।

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छोटी-छोटी लाल दीवारों के भीतर बड़ा लाल आंदोलन कैसे बनेगा?

आज वाम आंदोलन के सामने एक विचित्र तस्वीर है।

अलग-अलग कार्यालय।

अलग-अलग सम्मेलन।

अलग-अलग पत्रिकाएँ।

अलग-अलग संगठन।

अलग-अलग नेतृत्व।

अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ।

और कभी-कभी—

एक-दूसरे के खिलाफ सबसे तीखी राजनीतिक भाषा।

लेकिन जनता?

वह इन दीवारों के बाहर खड़ी है।

क्या इन संगठनों को तुरंत एक पार्टी बन जाना चाहिए?

जरूरी नहीं।

क्या सभी वैचारिक मतभेद समाप्त किए जा सकते हैं?

शायद नहीं।

लेकिन क्या साझा मुद्दों पर संयुक्त संघर्ष, संयुक्त अभियान, संयुक्त जनमंच और व्यापक वाम एकता के नए प्रयोग हो सकते हैं?

इस सवाल का जवाब “हाँ” होना चाहिए—यदि जनता का संघर्ष सचमुच सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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एकता का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं

यह भी साफ होना चाहिए।

वाम एकता का मतलब यह नहीं कि कोई संगठन अपनी विचारधारा छोड़ दे।

न इसका अर्थ यह है कि सभी ऐतिहासिक मतभेद मिटा दिए जाएँ।

न यह कि हर पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान समाप्त कर दे।

एकता का पहला चरण शायद इतना ही हो सकता है—

जहाँ संघर्ष साझा है, वहाँ संघर्ष भी साझा हो।

मजदूरों का सवाल—साझा संघर्ष।

किसानों का सवाल—साझा संघर्ष।

बेरोजगारी—साझा अभियान।

निजीकरण—साझा प्रतिरोध।

शिक्षा और स्वास्थ्य—साझा जनअभियान।

लोकतांत्रिक अधिकार—साझा मोर्चा।

इसके बाद राजनीतिक विश्वास पैदा होगा।

और शायद उसी से आगे की एकता की जमीन भी तैयार होगी।

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नेतृत्व की अगली परीक्षा

आज के नेतृत्व के सामने शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसने कितने सम्मेलन किए।

न यह कि कितने प्रस्ताव पारित किए।

न यह कि कितनी बार मंच से क्रांति शब्द बोला।

असली परीक्षा यह है—

क्या वह अपने बाद की पीढ़ी तैयार कर रहा है?

क्या वह युवाओं को केवल पोस्टर उठाने और नारे लगाने तक सीमित रखेगा?

या उन्हें निर्णय लेने की जगह देगा?

क्या पुराने नेता जीवन भर पद पर बने रहेंगे?

या एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति बनाएँगे जिसमें नेतृत्व का हस्तांतरण स्वाभाविक प्रक्रिया हो?

क्योंकि जो आंदोलन नई पीढ़ी को नेतृत्व नहीं देता, वह अंततः अपने अतीत का संग्रहालय बन सकता है।

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सबसे कठिन त्याग

त्याग का अर्थ केवल जेल जाना नहीं।

त्याग का अर्थ केवल गिरफ्तारी देना नहीं।

त्याग का अर्थ केवल लाठी खाना नहीं।

कभी-कभी—

सबसे कठिन त्याग अपनी कुर्सी छोड़ना होता है।

किसी पद से हटकर दूसरे को आगे बढ़ाना।

अपने संगठन की सीमा स्वीकार करना।

दूसरे संगठन की अच्छाई स्वीकार करना।

अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मानना।

और कभी-कभी यह कहना—

“मेरे रहते अगर एकता नहीं बन रही, तो मैं पीछे हटने को तैयार हूँ।”

यही वाक्य किसी भी नेता की वैचारिक प्रतिबद्धता की बड़ी परीक्षा हो सकता है।

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इतिहास आपसे एक दिन यह सवाल पूछेगा

जब मजदूर बिखरा था—आपने क्या किया?

जब किसान अकेला था—आपने क्या किया?

जब युवा बेरोजगार था—आपने क्या किया?

जब जनता महंगाई से जूझ रही थी—आपने क्या किया?

जब वाम की ताकत अलग-अलग दिशाओं में बंटी थी—आपने दीवार ऊँची की या पुल बनाया?

और जब इतिहास ने अवसर दिया—

क्या आपने अपनी कुर्सी बचाई या आंदोलन को बड़ा किया?

यह फैसला आज नहीं तो कल इतिहास करेगा।

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इसलिए यह खुला पत्र है

भारतीय वाम नेतृत्व से मेरी अपील है—

एक-दूसरे को हराने की राजनीति से ऊपर उठिए।

पहले संयुक्त संघर्ष की शुरुआत कीजिए।

फिर साझा कार्यक्रम बनाइए।

फिर व्यापक जनसंगठनों को जोड़िए।

फिर युवाओं और नई पीढ़ी को नेतृत्व में जगह दीजिए।

और अंततः उस राजनीतिक एकता पर बहस कीजिए जिसकी जरूरत आज जनता महसूस कर रही है।

किस पार्टी का झंडा ऊपर होगा—यह बाद का सवाल है।

पहला सवाल यह है कि जनता का झंडा कितना ऊपर उठेगा।

कौन महासचिव बनेगा—यह बाद का सवाल है।

पहला सवाल यह है कि मजदूर-किसान का नेतृत्व कौन मजबूत करेगा।

कौन सही मार्क्सवादी है—यह बहस चलती रहेगी।

लेकिन उससे पहले यह तय कीजिए—

क्या हम जनता के संघर्ष में एक साथ खड़े हो सकते हैं?

क्योंकि अगर नहीं—

तो हमें दूसरों को क्रांति का पाठ पढ़ाने से पहले अपने भीतर एक छोटी-सी क्रांति करनी होगी।

सत्ता की नहीं।

कुर्सी की नहीं।

दूसरे संगठन के खिलाफ नहीं।

अपने अहंकार के खिलाफ।

और शायद—

यही आज भारतीय वाम आंदोलन की पहली क्रांति होनी चाहिए।

क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?

अब जवाब भाषण से नहीं,

व्यवहार से देना होगा।

Tuesday, 29 September 2026

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, को धिक्कारना ही होगा ------ Hemant Kumar Jha's Post

 मोदी नाम का सितारा तेजी से अस्त होने की ओर बढ़ चला है, उनकी रोशनी से रोशन होता शाह नाम का सितारा स्वयं निस्तेज हो जाएगा। यह देश के बरोजगारों, कामगारों और गरीबों के लिए अच्छी खबर है।

    नरेंद्र मोदी के पास बेरोजगारों के लिए कोई सार्थक और प्रभावी विजन नहीं था। लप्पेबाजी और नारेबाजी विजन की जगह नहीं ले सकते, इसलिए मोदी राज में देश में बेरोजगारी की दर पिछले पचास वर्षों में सबसे अधिक हो गई।

  मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां मूलतः कॉर्पोरेट हितैषी और कामगार विरोधी रहीं। इसलिए उनके राज के पिछले दस बारह वर्षों में कॉर्पोरेट का मुनाफा जिस रफ्तार से बढ़ा उसकी आधी क्या, चौथाई भी कामगार की पगार बढ़ने की रफ्तार नहीं रही। मोदी सरकार का जाना इस देश के कामगारों के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए।

 मोदी सरकार के पास गरीबों के लिए कुछ भी सार्थक नहीं था, सिवाय कुछ किलो फ्री अनाज या फौरी तौर पर कुछ नकद अनुदान के। इन सबसे गरीबी कम नहीं होती। भारत की लगभग 150 करोड़ आबादी में नीचे के 100 करोड़ लोगों की क्रय शक्ति नगण्य है और इस नगण्यता ने देश के बाजार की गतिशीलता पर जो नकारात्मक प्रभाव डाला है उसकी विवेचना आजकल हर आर्थिक विशेषज्ञ कर रहा है।

   सवाल उठता है कि फिर मोदी आखिर करते क्या रहे इन बारह सालों में...???

   वे राज करते रहे और वह भी पूरी ठसक के साथ। यह ठसक मिडिल क्लास की नकारात्मक साम्प्रदायिक सोच में उभार लाकर उन्होंने हासिल की, हिन्दी पट्टी के सवर्णों के राजनीतिक समर्थन, जो कालांतर में बेशर्म समर्थन में बदलता गया, से उन्होंने हासिल की और सबसे महत्वपूर्ण, भ्रष्टाचार, निजी महत्वाकांक्षा और जातिवाद के आरोपों से सने, लिथड़े उत्तर भारत के कतिपय क्षेत्रीय दलों की निस्तेज विपक्षी राजनीति से हासिल की, कांग्रेस की उस गतिहीन राजनीति से हासिल की जिसे मोदी नीत भाजपा से चुनावी मैदान में पराजित होने के बाद अगले एक दशक तक यह समझ में ही नहीं आया कि आखिर उसकी राजनीति और चुनावी नीति का आधार क्या हो, आखिर किस पिच पर वह चुनावी बैटिंग करे। कांग्रेस आज भी इस संदर्भ में बहुत क्लियर नहीं है। उसे राहुल की निरंतर बढ़ती जा रही राजनीतिक तेजस्विता का सहारा है और बस, इसी से उम्मीद भी है जो मोदी के बरक्स सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आए हैं।

    मोदी की सत्ता की ठसक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका उन रीढ़विहीन लोगों की रही जो लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में स्थापित संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे। चाहे भय के कारण हो, लोभ के कारण हो या अन्य अज्ञात कारण हों, उनमें से अनेक ने इस देश की जनता के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों के पालन में कोताही की और मोदी सत्ता को सहलाने वाले कार्य करते रहे। उनमें से एक, चुनाव आयोग की फजीहत आज देश ही नहीं, दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। देश की न्यायपालिका ने भी इस दौरान अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई नहीं, बल्कि आमलोगों की उसके प्रति आस्था में गिरावट ही आई है और यह इस दौर की सबसे दुखद सच्चाई है। बाकी, सीबीआई, ईडी आदि की तो बिसात ही क्या। राजनीति के मोहरे के रूप में उसकी घटिया छवि कांग्रेस के राज में ही स्थापित हो चुकी थी, मोदी राज में उस छवि में और गहरी कालिख पुती। 

  मीडिया की तो बात ही क्या करनी। अगर सोशल मीडिया और सिटीजन जर्नलिज्म का जमाना न आया होता तो इस देश के मीडिया ने जितना अंधेरा फैलाया है, लोग समझ भी नहीं पाते और मुख्यधारा के मीडिया को धिक्कार भी नहीं पाते।

 सब कुछ के बावजूद, अगर मोदी के दौर के किसी तंत्र को धिक्कारने की बात हो तो सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिसे नेशनल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या मुख्यधारा का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहने का प्रचलन है, को ही धिक्कारने का मन होगा। धिक्कार है उन चैनलों को, उनके एंकरों को, जो पत्रकार की शक्ल में दलाल थे या हैं।

    मोदी के दौर ने हमें यह भी बताया कि इस देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग नैतिक और बौद्धिक रूप से कितना पतित हो सकता है। उनके पतन की गाथा कांग्रेस राज के इतिहास में भी दर्ज हुई, लेकिन, मोदी के दौर में उसके हर्फ़ मोटे होते गए, जिन्हें देखना समझना अधिक आसान था, जिन्हें देख समझ कर आम लोगों को भी शर्म आने लगी कि ये हमारे देश के बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल हैं।

    मोदी जी अभी सत्ता में हैं, शाह जी भी पॉवर में ही हैं। लेकिन कुछ है ऐसा कि लगता है अब वह इकबाल नहीं रहा। जब उनका दौर बाकायदा खत्म होगा, तब जो इस दौर की कुछ सच्चाइयाँ सामने आ सकती हैं, वे हमें बताएंगी कि नैरेटिव पर आधारित राजनीति की सफलता के पीछे कितनी गहरी धुंध होती है। इंतजार करना होगा।


Sunday, 26 July 2026

नेहा बोरा: जो आंदोलन की आत्मा बनी ------- Ashish Saini

 




नेहा बोरा:  जो आंदोलन की आत्मा बनी!

23 दिन से उसने अन्न का एक दाना नहीं खाया था। शरीर का वजन साढ़े सात किलो घट चुका था। रक्त में शर्करा खतरनाक स्तर पर पहुँच गई थी। डॉक्टर चेतावनी दे रहे थे कि शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं। फिर भी नेहा बोरा जब जंतर-मंतर के मंच पर पहुँचीं, तो उनकी आवाज़ में कमजोरी नहीं थी।

उन्होंने घायल विद्यार्थियों की ओर देखकर कहा,

“हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”

लगभग 29 वर्ष की नेहा मूल रूप से उत्तराखंड से आती हैं। उनके बचपन का एक हिस्सा सिलीगुड़ी में बीता जहाँ उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, सिलीगुड़ी से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। स्कूल के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आईं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक किया। समाजशास्त्र की पढ़ाई ने उन्हें जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता, सामाजिक सत्ता और संस्थागत भेदभाव जैसे प्रश्नों से जोड़ा।

नेहा ने आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। आंबेडकर विश्वविद्यालय ने सामाजिक विज्ञान, संस्कृति, मानवीय अध्ययन और आलोचनात्मक चिंतन पर केंद्रित शिक्षा के लिए अपनी अलग पहचान बनाई है। यहीं उनके सामाजिक सरोकारों, रंगमंच और सार्वजनिक सक्रियता को अधिक स्पष्ट दिशा मिली।

नेहा रंगमंच से जुड़ी हैं। रंगमंच ने उनकी भाषा, मंच पर उपस्थिति और लोगों से सीधे संवाद करने की क्षमता को मजबूत किया। उनके भाषण में किसी तैयार राजनीतिक पर्चे की भाषा नहीं सुनाई देती। वे सामने खड़े लोगों से बात करती हैं। उनके वाक्य छोटे होते हैं और चोट सीधे करते हैं।

इस समय नेहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पीएचडी के तीसरे वर्ष की शोधार्थी हैं। यह केंद्र सिनेमा, रंगमंच, प्रदर्शन, दृश्य संस्कृति और कला के सामाजिक अर्थों का अध्ययन करता है। 

यही उनकी पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। वे केवल नारे लगाने वाली छात्र नेता नहीं हैं। वे समाजशास्त्र की विद्यार्थी, कला और प्रदर्शन की शोधार्थी तथा रंगमंच से जुड़ी कार्यकर्ता हैं। कक्षा, पुस्तकालय, रंगमंच और आंदोलन उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के चार आधार हैं।

जेएनयू में पढ़ाई के दौरान नेहा छात्र राजनीति में सक्रिय हुईं। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन, आइसा से जुड़ीं और बाद में इसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गईं। शिक्षा का निजीकरण, विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि, छात्रावास, छात्रवृत्ति, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की सुरक्षा और लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार उनके प्रमुख मुद्दे बने।

वे मॉब लिंचिंग के विरुद्ध बोलीं। उन्होंने बिलकिस बानो के लिए न्याय की माँग उठाई। उन्होंने गाजा में मारे जा रहे नागरिकों, महिलाओं और बच्चों के पक्ष में आवाज़ उठाई। वे दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के समान अधिकार की बात करती रही हैं। उनका मानना है कि शिक्षा केवल उन परिवारों का विशेषाधिकार नहीं बन सकती, जिनके पास महँगी फीस और निजी कोचिंग के लिए पैसा है।

जंतर-मंतर का आंदोलन पेपर लीक, परीक्षाओं में गड़बड़ियों, बेरोजगारी और विद्यार्थियों की आत्महत्याओं के प्रश्न पर खड़ा हुआ। सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी” के व्यंग्यात्मक नाम से शुरू हुई मुहिम जल्द ही सड़कों पर उतर आई। देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी दिल्ली पहुँचे। उनकी प्रमुख माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी तय करना थी।

नेहा बोरा ने अपने साथियों मनीष कुमार और आमीन अमितोज के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। सोनम वांगचुक भी उनके साथ अनशन पर बैठे। दिन बीतते गए। सरकार की ओर से कोई निर्णायक बातचीत नहीं हुई। नेहा का शरीर लगातार कमजोर होता गया। फिर भी वे वहीं बैठी रहीं।

21वें दिन पुलिस सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई। नेहा ने उसी समय कहा,

“एक ओर सरकार ने 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों और सोनम वांगचुक की कोई सुध नहीं ली। दूसरी ओर हमारे अनशनकारियों को जबरन उठाकर अस्पताल में भर्ती कराने की कोशिश की जा रही है।”

उन्होंने लोगों से जंतर-मंतर पहुँचने की अपील की और कहा,

“यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक समाप्त नहीं होगा।”

संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई ने नेहा को भीतर तक झकझोर दिया। जंतर-मंतर के मंच पर लौटकर उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहे विद्यार्थियों पर लाठियाँ चलाई गईं, आँसू गैस छोड़ी गई और महिला प्रदर्शनकारियों के शरीर के निजी हिस्सों पर बैटन से वार किए गए।

उन्होंने कहा,

“संसद तक अपनी माँगें लेकर पहुँचे, तो हमारे सिर फोड़ दिए गए। इसे याद रखा जाएगा।”

उन्होंने कहा,

“हमारे इस आंदोलन के बाद जितनी जान बाकी छोड़ी है, वह गवाही देगी। हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”

नेहा ने मंच से सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को याद किया। उन्होंने उन स्त्रियों का नाम लिया जिन्होंने गालियाँ, अपमान और हमले सहकर लड़कियों तथा वंचित बच्चों के लिए शिक्षा के द्वार खोले थे। नेहा ने आज की शिक्षा की लड़ाई को उसी परंपरा से जोड़ा। उनका संदेश साफ था कि शिक्षा बचाना केवल वर्तमान विद्यार्थियों का प्रश्न नहीं, आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है।

वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने बाद में अपने कार्यक्रम सेंट्रल हॉल में नेहा बोरा, आमीन अमितोज और आंदोलन में शामिल अनुष्का घोष से बातचीत की। बातचीत का विषय छात्र आंदोलन, नीट, पेपर लीक, शिक्षा सुधार और लोकतांत्रिक अधिकार था।

नेहा ने कपिल सिब्बल से कहा कि युवाओं का गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ है। वर्षों की तैयारी के बाद पेपर लीक हो जाता है। परीक्षा रद्द हो जाती है। नई तारीख महीनों नहीं आती। परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। विद्यार्थी अपना सबसे अच्छा समय कोचिंग और परीक्षा केंद्रों के बीच बिता देते हैं। इसके बाद भी उन्हें निष्पक्ष अवसर नहीं मिलता।

उन्होंने साफ किया कि यह आंदोलन अब किसी एक नेता या व्यक्ति का आंदोलन नहीं है। यह उन लाखों विद्यार्थियों का आंदोलन है जिनकी मेहनत को कमजोर परीक्षा व्यवस्था ने अनिश्चितता में डाल दिया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा उनके लिए एक जवाबदेही की माँग है।

कपिल सिब्बल से बातचीत में उन्होंने कहा कि इतिहास में बड़े परिवर्तन युवाओं ने ही किए हैं। नेहा ने  आंदोलन का मूल भाव रखा। विद्यार्थी सरकार से बात चाहते हैं, सहानुभूति नहीं। वे ठोस कार्रवाई चाहते हैं, आश्वासन नहीं। वे साफ और सुरक्षित परीक्षा चाहते हैं। वे अपने भविष्य पर भरोसा चाहते हैं।

नेहा बोरा की कहानी अभी लिखी जा रही है। सिलीगुड़ी की छात्रा से दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की विद्यार्थी, आंबेडकर विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर छात्रा, रंगकर्मी, जेएनयू की शोधार्थी और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष तक की उनकी यात्रा लंबी है।

जंतर-मंतर ने उन्हें राष्ट्रीय चेहरा बना दिया है। उनकी माँगें सीधी हैं। पेपर लीक बंद हों। परीक्षाएँ निष्पक्ष हों। दोषियों को सजा मिले। शिक्षा सस्ती हो। सरकार विद्यार्थियों से बात करे। राजनीतिक जवाबदेही तय हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग न हो।

23 दिनों तक भूखी रही वह शोधार्थी आज देश से यही पूछ रही है कि पढ़ने वाला युवा न्याय माँगने कहाँ जाए?

उसका नाम नेहा बोरा है।

और अब उसकी आवाज़ अनसुनी नहीं है।

Wednesday, 22 July 2026

आंदोलन मर गया है ------ सुनिधि

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स्पेशल एपिसोड | जनता नहीं मरी है, आंदोलन मर गया है!

जब संघर्ष असली होता है, तब सत्ता भी झुकती है और जनता भी उठ खड़ी होती है।

नमस्कार साथियों,

मैं हूँ सुनिधि और आप देख रहे हैं "राम या वाम"।

साथियों, आज का यह एपिसोड सिर्फ एक राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि वामपंथ और जन आंदोलनों के सामने खड़े सबसे बड़े सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है।

कल दिल्ली की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसने वर्षों से फैलाए जा रहे एक बड़े राजनीतिक झूठ को बेनकाब कर दिया।

हमें लगातार बताया गया कि आज का युवा सिर्फ धर्म, राष्ट्रवाद और प्रचार की राजनीति में उलझ चुका है। कहा गया कि अब युवा सड़क पर नहीं उतरता, उसे केवल सोशल मीडिया की राजनीति पसंद है।

लेकिन कल दिल्ली ने इस झूठ की धज्जियाँ उड़ा दीं।

हजारों युवा सड़कों पर थे।

लाठी चली...

आँसू गैस चली...

पानी की बौछारें चलीं...

लेकिन युवा पीछे नहीं हटे।

इसका मतलब साफ़ है।

युवा मरा नहीं है।

उसका गुस्सा मरा नहीं है।

उसकी लड़ने की इच्छा मरी नहीं है।

मर गई है तो केवल वह राजनीति, जिसने संघर्ष करना छोड़ दिया है।

ध्यान से देखिए...

शुरुआत में इस आंदोलन में भीड़ नहीं थी।

लेकिन जैसे-जैसे लोगों को भरोसा हुआ कि यह केवल फोटो खिंचवाने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि अंत तक लड़ने वाला संघर्ष है, वैसे-वैसे जनता भी जुड़ती चली गई।

जनता भाषण नहीं देखती...

जनता प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं देखती...

जनता यह देखती है कि नेता उसके साथ लाठी खाता है या नहीं।

जेल जाता है या नहीं।

अनशन करता है या नहीं।

अंत तक डटा रहता है या नहीं।

यही भरोसा आंदोलन की सबसे बड़ी पूँजी होता है।

अब मैं वामपंथ से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ।

जिस संगठन की पूरे देश में मजबूत संरचना भी नहीं है, जो अभी शुरुआती दौर में है, यदि वह लगातार संघर्ष करके हजारों युवाओं को सड़क पर ला सकता है...

तो फिर सौ साल पुराना वामपंथ जनता को क्यों नहीं जगा पा रहा है?

क्या जनता खत्म हो गई?

नहीं।

क्या मुद्दे खत्म हो गए?

नहीं।

महँगाई है।

बेरोज़गारी है।

निजीकरण है।

चार श्रम संहिताएँ हैं।

आउटसोर्सिंग है।

मजदूरों पर हमले हैं।

किसानों की बदहाली है।

संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस है।

यानी मुद्दों का पहाड़ खड़ा है।

फिर भी आंदोलन क्यों नहीं खड़े हो रहे?

क्योंकि संघर्ष की राजनीति की जगह कार्यक्रमों की राजनीति ने ले ली है।

एक दिन धरना...

एक दिन प्रदर्शन...

एक ज्ञापन...

एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस...

फिर सब अपने-अपने घर।

क्या ऐसे सत्ता बदलती है?

क्या ऐसे इतिहास लिखा जाता है?

बिल्कुल नहीं।

इतिहास हमेशा उन्हीं लोगों ने लिखा है जिन्होंने आख़िरी साँस तक लड़ाई लड़ी।

अन्ना आंदोलन...

किसान आंदोलन...

देश के तमाम बड़े जन आंदोलन...

इन सबने साबित किया कि जनता तभी जुड़ती है जब उसे विश्वास होता है कि नेतृत्व बिकेगा नहीं, झुकेगा नहीं और भागेगा नहीं।

यही वह जगह है जहाँ, मेरी राय में, आज वामपंथ का एक हिस्सा सबसे बड़ी भूल कर रहा है।

ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के लिए संघर्ष से ज़्यादा महत्वपूर्ण कुर्सी हो गई है।

उन्हें डर रहता है कि बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ तो नए कार्यकर्ता उभरेंगे, नया नेतृत्व सामने आएगा और वर्षों से जमी हुई राजनीति को चुनौती मिलेगी।

इसलिए आंदोलन को बड़ा होने से पहले ही सीमित कर दिया जाता है।

और ये ऐलसोनवादी नेतृत्व जिन्हें न तो आंदोलन से मतलब है ना जनता के दर्द से मतलब है यह सिर्फ और सिर्फ किसी तरह पद पर बना रहना है ताकि समय पर सौदेबाजी कर अपने लिए उचित लाभ प्राप्त कर सके, उन्होंने आंदोलन करना सिर्फ छोड़ ही नहीं दिया है बल्कि उन्हें आंदोलन से विश्वास उठ गया है उन्हें पता है बड़े आंदोलन में 9 केवल सरकारी होती है बल्कि बहुत सारे नेतृत्वकारी साथी सामने आ जाते हैं और जैसे किसी भी साधु की तपस्या से इंद्र डर जाता है उसका अपना इंद्रासन खतरे में दिखाई देने लगता है ठीक उसी तरह से बड़े आंदोलन से यह तथाकथित वामपंथी नेता डर जाते हैं उन्हें अपनी कुर्सी खतरे में दिखाई देने लगती है और इसलिए वह ऐसा नहीं होने देना चाहते इसलिए आंदोलन मर रहा है बाम आज भी समाज में अपना स्थान रखता है लोगों के बीच उसके मुद्दे उसके तौर तरीके महत्व रखते हैं या आज भी अप्रांसगिक नहीं हुआ है लेकिन एक षड्यंत्र के तहत इसके वर्तमान नेतृत्व इसे असफल बनाने का प्रयास करता रहा है

धरना हो...

लेकिन लंबा नहीं।

संघर्ष हो...

लेकिन निर्णायक नहीं।

भीड़ आए...

लेकिन नेतृत्व न बदले।

यही सोच आंदोलन को मार रही है।

याद रखिए...

वामपंथ नहीं मरा है।

वामपंथ का विचार नहीं मरा है।

मरा है तो संघर्ष का साहस।

जिस दिन वामपंथ फिर से जनता के बीच जाएगा...

जिस दिन मजदूर, किसान, छात्र और नौजवान के सवालों पर महीनों तक डटकर लड़ना शुरू करेगा...

उसी दिन लाखों लोग फिर लाल झंडे के नीचे दिखाई देंगे।

क्योंकि जनता आज भी न्याय चाहती है।

जनता आज भी बराबरी चाहती है।

जनता आज भी संघर्ष करने वालों का सम्मान करती है।

इसलिए मैं एक बार फिर कहता हूँ—

जनता नहीं मरी है...

आंदोलन मर गया है...

और जिस दिन आंदोलन फिर ज़िंदा होगा...

उसी दिन इतिहास फिर करवट लेगा।

लाल सलाम!

इंकलाब ज़िंदाबाद!

शुद्धिकरण अभियान समिति ज़िंदाबाद! 


संदर्भ =====  https://www.facebook.com/reel/1747155269800555/?__cft__[0]=AZaVxDFNlwnAHM0qpX8Miz5BqFNBgMdGxx9WAZD0Vllg2HQ6aFCoywq4z_8Xls-W7ITfJdmrakOhbcSr1si3jF1uhTa_-_0lxkjsbWoWjyT_4VeBEX4sZLxuHRx2OxxrfoOIQJDqozOtS4rQlbPsS7VzPz4LJzMHqGfijRCcq0s_XQV4p8XX7-YQSknFH13ylac&__tn__=%2CO%2CP-y-R

Wednesday, 15 July 2026

क्या संगठन की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होनी चाहिए? ------ सुनिधि

 गंभीर आरोपों पर चुप्पी क्यों? CPI (बिहार) में पारदर्शिता और जवाबदेही का बड़ा सवाल"

लाल सलाम साथियों!

मैं हूँ सुनिधि, और आप देख रहे हैं "राम या वाम"। यहाँ हम सत्ता से नहीं, सवालों से डरते हैं; व्यक्तियों से नहीं, तथ्यों से बात करते हैं। आज का सवाल है—क्या किसी भी संगठन की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?

आखिर सी पी आई, बिहार के राज्य सचिव कामरेड रामनरेश पांडेय का कौन सा गुप्त रहस्य मधुबनी जिला मंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य कामरेड मिथिलेश झा और एक अन्य विवादास्पद महिला नेतृ कामरेड राजश्री किरण के पास है जिस आधार पर ये दोनों राज्य सचिव को आपने दबाव में ले रहे हैं?

कामरेड मिथिलेश झा और राजश्री किरण के खिलाफ ठगी,गबन और धोखाधड़ी के आरोप लगातार लग रहे हैं और साथ हीं साथ कईआडियो और एक साथी द्वारा शपथ-पत्र भी दिया गया जिसकी कापी राम या वाम पर भी उपलब्ध है । 2018 में मधुबनी में संपन्न पार्टी के राज्य सम्मेलन के अवसर पर कईयों व्यावसायी से लाखो रुपए रूपए का उधार लेकर न चुकाने के आरोप भी मिथिलेश झा पर आज भी लग रहे हैं।जिसका एक उदाहरण है उदय किराना स्टोर ,जिसके मालिक ने हाल ही लगभग दो महीना पूर्व राज्य सचिव को एक लाख सोलह हजार रुपए मिथिलेश झा द्वारा न चुकाए जाने की शिकायत , पत्र द्वारा की। जिसकी एक कापी शुद्धिकरण अभियान समिति के पास भी है । लेकिन राज्य सचिव उसे भी फाईल में दबाकर बैठे हैं जबकि मधुबनी राज्य सम्मेलन के एक आयोजनकर्ता खुद राज्य सचिव ही थे।इसलिए पार्टी की हो रही बदनामी से वह अपने को अलग नही कर सकते।

सबसे चिंताजनक पहलू यह कि मधुबनी जिला में बड़े पैमाने पर फर्जी पार्टी सदस्यता और पार्टी फंड की हेराफेरी का मामला प्रकाश में आ रहा है।इससे बड़ा फंड हेराफेरी का उदाहरण क्या होगा कि जिला पार्टी का बैंक एकाउंट नही होने की बात कही जा रही है।फर्जी पार्टी सदस्यता का आंखे खोल देने वाला उदाहरण ही है राज्य और केन्द्र की नवीकरण मद का लाखो रुपए की बकाया राशि।अगर नवीकरण सही हुआ है तो बकाया राशि कैसे?

पार्टी साथियों का आरोप है कि मिथिलेश झा लगभग ग्यारह वर्षों से मधुबनी जिला पार्टी के सचिव हैं।इस अवधि में नवीकरण में 40 प्रतिशत राशि जो जिला और निचली इकाई का हिस्सा है,मिथिलेश झा ने उस राशि का कभी हिसाब नही दिया।अगर सभी को जोड़ा जाए तो यह राशि 30 से 40 लाख रुपए होती है।अगर यह आरोप सच है तो फर्जी सदस्यता का यह भी एक अकाट्य उदाहरण है।

सामान्य परिस्थिति में एक कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ऐसे आरोपों के लगने के बाद बिना विलंब किए संबद्ध व्यक्ति का पार्टी से निष्कासन एक मात्र सजा है।लेकिन उल्टे कामरेड रामनरेश पांडेय और उनके कुछ गुर्गे मिथिलेश झा और राजश्री किरण के बचाव में बेतुका तर्क देते नजर आ रहे हैं।इसमें कथित बिहार पार्टी प्रभारी कामरेड गिरीश चन्द्र शर्मा भी शामिल हैं जो मिथिलेश झा के निर्दोष होने पर तर्क देते घूम रहे हैं।इसी से लगता है कि मिथिलेश झा और राजश्री किरण के हाथों कामरेड रामनरेश पांडेय ब्लैकमेल हो रहे हैं जो पार्टी के लिए अत्यधिक चिंताजनक है।

लाल सलाम

कम्यूनिस्ट पार्टी जिंदाबाद

शुद्धिकरण अभियान समिति जिंदाबाद