भारतीय वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र
क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?
प्रिय वामपंथी नेतृत्व,
यह पत्र किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं है।
यह CPI, CPI(M), CPI(ML) या किसी एक धारा को कटघरे में खड़ा करने के लिए भी नहीं है।
यह सवाल पूरे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से है।
क्योंकि इतिहास का एक अजीब मोड़ हमारे सामने है—
हम सभी शोषण के खिलाफ लड़ने की बात करते हैं,
मजदूर-किसान की एकता की बात करते हैं,
साम्राज्यवाद और पूंजीवादी वर्चस्व का विरोध करते हैं,
सामाजिक न्याय और मेहनतकश जनता के अधिकारों की बात करते हैं।
लेकिन जब सवाल आता है—
“क्या भारतीय वाम की बिखरी हुई ताकतों को व्यापक संघर्ष के लिए एक साथ लाया जा सकता है?”
तो हमारी सारी क्रांतिकारी भाषा अचानक संगठनात्मक सीमाओं से टकराने लगती है।
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एक असहज सवाल से शुरुआत कीजिए
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन कोई नया विषय नहीं है।
1960 के दशक में कार्यक्रम और रणनीति को लेकर गंभीर मतभेदों ने CPI के विभाजन और CPI(M) के गठन का रास्ता बनाया। बाद में विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धाराएँ भी अलग-अलग रास्तों पर चलीं।
इन विभाजनों के पीछे ऐतिहासिक, वैचारिक और रणनीतिक कारण रहे हैं।
इसलिए हर मतभेद को “सत्ता की लड़ाई” कह देना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन आज सवाल यह है—
क्या पुराने मतभेदों को हमेशा के लिए राजनीतिक दीवार बना देना आवश्यक है?
क्या अलग-अलग वैचारिक धाराएँ अपने मतभेद बनाए रखते हुए भी जनता के साझा सवालों पर एक साथ संघर्ष नहीं कर सकतीं?
और अगर कर सकती हैं—
तो हम उतना भी क्यों नहीं कर पा रहे?
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नेतृत्व से मेरा सीधा सवाल है
आप दशकों से जनता को त्याग का पाठ पढ़ाते हैं।
आप कहते हैं—
व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है।
आप कहते हैं—
पार्टी जनता के लिए है।
आप कहते हैं—
नेतृत्व वर्ग-संघर्ष का औजार है।
तो फिर एक दिन यह सवाल अपने ऊपर भी लागू कीजिए—
अगर मेरे पद से हटने से व्यापक वाम एकता मजबूत होती है, तो क्या मैं हटने के लिए तैयार हूँ?
अगर उत्तर “हाँ” है—
तो रास्ता खोलिए।
अगर उत्तर “नहीं” है—
तो कम-से-कम ईमानदारी से यह स्वीकार कीजिए कि समस्या केवल वैचारिक मतभेद की नहीं, संगठनात्मक सत्ता की भी है।
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क्या महासचिव का पद क्रांति से बड़ा है?
यह सवाल कठोर है।
लेकिन शायद अब कठोर सवालों से बचने का समय नहीं है।
महासचिव कौन बनेगा?
राज्य सचिव कौन बनेगा?
केंद्रीय समिति में किसका कितना प्रतिनिधित्व होगा?
किस पार्टी का झंडा आगे रहेगा?
किसका नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा?
किसके पास अंतिम राजनीतिक निर्णय का अधिकार होगा?
ये सवाल संगठन के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
लेकिन जनता के लिए?
एक बेरोजगार युवा के लिए महासचिव की कुर्सी का क्या अर्थ है?
एक मजदूर के लिए केंद्रीय समिति की सीट का क्या अर्थ है?
एक खेत-मजदूर के लिए आपकी संगठनात्मक प्रतिष्ठा का क्या अर्थ है?
वह सिर्फ यह देखता है—
जब उसका जीवन संकट में था, तब कौन उसके साथ खड़ा था?
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आपके अपने दस्तावेज आपको आईना दिखाते हैं
यह आलोचना बाहर से थोपी हुई नहीं है।
CPI अपने संविधान में “unity in action”, आंतरिक बहस और असहमति के सम्मान की बात करती है।
CPI(M) के दस्तावेज Left unity को संयुक्त कार्रवाई और साझा अभियानों के आधार पर मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।
CPI(ML) Liberation का 2023 का कार्यक्रम तो और आगे जाकर सभी भारतीय कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक एकीकरण की दिशा में बात करता है और Left forces की unity in action को महत्वपूर्ण मानता है।
तो सवाल यह नहीं कि—
एकता की बात कौन करता है?
सवाल यह है—
एकता की दिशा में व्यवहारिक कदम कितने उठाए जाते हैं?
यहीं दस्तावेज और व्यवहार के बीच की दूरी पर बहस होनी चाहिए।
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आत्मालोचना दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए
किसी दूसरे संगठन को संशोधनवादी कहना आसान है।
किसी को अवसरवादी कहना आसान है।
किसी को संसदीय भटकाव का शिकार कहना आसान है।
किसी को अतिवामपंथी कहना आसान है।
लेकिन क्या हम अपने संगठन से पूछ सकते हैं—
जनता हमारे साथ क्यों नहीं बढ़ रही?
युवा हमारे साथ स्थायी रूप से क्यों नहीं जुड़ रहे?
मजदूर बस्तियों में हमारी राजनीतिक उपस्थिति क्यों कमजोर है?
किसानों के बीच हमारा प्रभाव अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुँच रहा?
नई पीढ़ी नेतृत्व में क्यों नहीं आ रही?
महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित तबकों को निर्णायक नेतृत्वकारी भूमिका कितनी मिली?
और सबसे कठिन सवाल—
अगर हमारी लाइन इतनी सही है, तो उसका सामाजिक प्रभाव हमारी अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं है?
यह सवाल दूसरे संगठन के खिलाफ हथियार नहीं होना चाहिए।
यह अपने संगठन के सामने रखा हुआ आईना होना चाहिए।
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छोटी-छोटी लाल दीवारों के भीतर बड़ा लाल आंदोलन कैसे बनेगा?
आज वाम आंदोलन के सामने एक विचित्र तस्वीर है।
अलग-अलग कार्यालय।
अलग-अलग सम्मेलन।
अलग-अलग पत्रिकाएँ।
अलग-अलग संगठन।
अलग-अलग नेतृत्व।
अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ।
और कभी-कभी—
एक-दूसरे के खिलाफ सबसे तीखी राजनीतिक भाषा।
लेकिन जनता?
वह इन दीवारों के बाहर खड़ी है।
क्या इन संगठनों को तुरंत एक पार्टी बन जाना चाहिए?
जरूरी नहीं।
क्या सभी वैचारिक मतभेद समाप्त किए जा सकते हैं?
शायद नहीं।
लेकिन क्या साझा मुद्दों पर संयुक्त संघर्ष, संयुक्त अभियान, संयुक्त जनमंच और व्यापक वाम एकता के नए प्रयोग हो सकते हैं?
इस सवाल का जवाब “हाँ” होना चाहिए—यदि जनता का संघर्ष सचमुच सर्वोच्च प्राथमिकता है।
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एकता का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं
यह भी साफ होना चाहिए।
वाम एकता का मतलब यह नहीं कि कोई संगठन अपनी विचारधारा छोड़ दे।
न इसका अर्थ यह है कि सभी ऐतिहासिक मतभेद मिटा दिए जाएँ।
न यह कि हर पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान समाप्त कर दे।
एकता का पहला चरण शायद इतना ही हो सकता है—
जहाँ संघर्ष साझा है, वहाँ संघर्ष भी साझा हो।
मजदूरों का सवाल—साझा संघर्ष।
किसानों का सवाल—साझा संघर्ष।
बेरोजगारी—साझा अभियान।
निजीकरण—साझा प्रतिरोध।
शिक्षा और स्वास्थ्य—साझा जनअभियान।
लोकतांत्रिक अधिकार—साझा मोर्चा।
इसके बाद राजनीतिक विश्वास पैदा होगा।
और शायद उसी से आगे की एकता की जमीन भी तैयार होगी।
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नेतृत्व की अगली परीक्षा
आज के नेतृत्व के सामने शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसने कितने सम्मेलन किए।
न यह कि कितने प्रस्ताव पारित किए।
न यह कि कितनी बार मंच से क्रांति शब्द बोला।
असली परीक्षा यह है—
क्या वह अपने बाद की पीढ़ी तैयार कर रहा है?
क्या वह युवाओं को केवल पोस्टर उठाने और नारे लगाने तक सीमित रखेगा?
या उन्हें निर्णय लेने की जगह देगा?
क्या पुराने नेता जीवन भर पद पर बने रहेंगे?
या एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति बनाएँगे जिसमें नेतृत्व का हस्तांतरण स्वाभाविक प्रक्रिया हो?
क्योंकि जो आंदोलन नई पीढ़ी को नेतृत्व नहीं देता, वह अंततः अपने अतीत का संग्रहालय बन सकता है।
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सबसे कठिन त्याग
त्याग का अर्थ केवल जेल जाना नहीं।
त्याग का अर्थ केवल गिरफ्तारी देना नहीं।
त्याग का अर्थ केवल लाठी खाना नहीं।
कभी-कभी—
सबसे कठिन त्याग अपनी कुर्सी छोड़ना होता है।
किसी पद से हटकर दूसरे को आगे बढ़ाना।
अपने संगठन की सीमा स्वीकार करना।
दूसरे संगठन की अच्छाई स्वीकार करना।
अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मानना।
और कभी-कभी यह कहना—
“मेरे रहते अगर एकता नहीं बन रही, तो मैं पीछे हटने को तैयार हूँ।”
यही वाक्य किसी भी नेता की वैचारिक प्रतिबद्धता की बड़ी परीक्षा हो सकता है।
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इतिहास आपसे एक दिन यह सवाल पूछेगा
जब मजदूर बिखरा था—आपने क्या किया?
जब किसान अकेला था—आपने क्या किया?
जब युवा बेरोजगार था—आपने क्या किया?
जब जनता महंगाई से जूझ रही थी—आपने क्या किया?
जब वाम की ताकत अलग-अलग दिशाओं में बंटी थी—आपने दीवार ऊँची की या पुल बनाया?
और जब इतिहास ने अवसर दिया—
क्या आपने अपनी कुर्सी बचाई या आंदोलन को बड़ा किया?
यह फैसला आज नहीं तो कल इतिहास करेगा।
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इसलिए यह खुला पत्र है
भारतीय वाम नेतृत्व से मेरी अपील है—
एक-दूसरे को हराने की राजनीति से ऊपर उठिए।
पहले संयुक्त संघर्ष की शुरुआत कीजिए।
फिर साझा कार्यक्रम बनाइए।
फिर व्यापक जनसंगठनों को जोड़िए।
फिर युवाओं और नई पीढ़ी को नेतृत्व में जगह दीजिए।
और अंततः उस राजनीतिक एकता पर बहस कीजिए जिसकी जरूरत आज जनता महसूस कर रही है।
किस पार्टी का झंडा ऊपर होगा—यह बाद का सवाल है।
पहला सवाल यह है कि जनता का झंडा कितना ऊपर उठेगा।
कौन महासचिव बनेगा—यह बाद का सवाल है।
पहला सवाल यह है कि मजदूर-किसान का नेतृत्व कौन मजबूत करेगा।
कौन सही मार्क्सवादी है—यह बहस चलती रहेगी।
लेकिन उससे पहले यह तय कीजिए—
क्या हम जनता के संघर्ष में एक साथ खड़े हो सकते हैं?
क्योंकि अगर नहीं—
तो हमें दूसरों को क्रांति का पाठ पढ़ाने से पहले अपने भीतर एक छोटी-सी क्रांति करनी होगी।
सत्ता की नहीं।
कुर्सी की नहीं।
दूसरे संगठन के खिलाफ नहीं।
अपने अहंकार के खिलाफ।
और शायद—
यही आज भारतीय वाम आंदोलन की पहली क्रांति होनी चाहिए।
क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?
अब जवाब भाषण से नहीं,
व्यवहार से देना होगा।
