पिछली पोस्ट — “नेहा बोरा नई कन्हैया कुमार?” — को जिस तरह का रिस्पॉन्स मिला, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। एक सामान्य लिखित टेक्स्ट पोस्ट को अब तक लगभग 57 हजार लोगों ने देखा है। यह संख्या सिर्फ एक पोस्ट की पहुँच नहीं बताती, बल्कि यह भी दिखाती है कि छात्र राजनीति, वामपंथी आंदोलन और उससे निकलने वाले नेतृत्व के भविष्य को लेकर लोगों के भीतर गंभीर सवाल मौजूद हैं।
इसी सिलसिले में आज एक बड़ा सवाल उठाना जरूरी है—
क्या भारत की वामपंथी पार्टियाँ धीरे-धीरे कांग्रेस के लिए एक तरह की “कैडर फैक्ट्री” बनती जा रही हैं?
भारतीय छात्र राजनीति का इतिहास देखें तो विश्वविद्यालयों और छात्र संगठनों से बड़ी संख्या में युवा राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता निकले हैं। इनमें से कई ने वामपंथी छात्र संगठनों से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, संघर्ष किया, संगठन में काम किया और अपनी पहचान बनाई। लेकिन सवाल यह है कि उनमें से कितने लोग अंततः अपने मूल संगठन को मजबूत करने के बजाय कांग्रेस या दूसरे बड़े राजनीतिक दलों में चले गए?
कन्हैया कुमार इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं।
एक समय AISF और जेएनयू छात्रसंघ की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे कन्हैया कुमार आज कांग्रेस में महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभा रहे हैं।
यहाँ सवाल कन्हैया कुमार के कांग्रेस में जाने का अकेले नहीं है।
सवाल यह है कि वामपंथी छात्र आंदोलन लगातार ऐसे राजनीतिक नेतृत्व को पैदा क्यों करता है, जिसे बाद में कोई दूसरा बड़ा राजनीतिक दल अपने साथ जोड़ लेता है?
क्या यह केवल उन नेताओं की व्यक्तिगत पसंद है?
या फिर इसके पीछे हमारे संगठनों की अपनी कोई संरचनात्मक कमजोरी भी है?
वामपंथी पार्टियों को इस सवाल से बचने के बजाय इसका सामना करना चाहिए।
हमें सोचना होगा—
क्या हम अपने छात्र और युवा नेताओं को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस दे रहे हैं?
क्या हम युवाओं को केवल आंदोलन, नारे और प्रदर्शन तक सीमित रखते हैं, या उन्हें संगठनात्मक और राजनीतिक निर्णय लेने की वास्तविक जिम्मेदारी भी देते हैं?
क्या पार्टी के भीतर नए नेतृत्व के विकास के लिए पर्याप्त अवसर हैं?
क्या व्यक्तिवाद, गुटबाजी और “हीरोइज्म” सामूहिक नेतृत्व के विकास को कमजोर कर रहे हैं?
राजनीति में व्यक्ति महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी भी विचारधारा की वास्तविक ताकत व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार, संगठन और मजबूत राजनीतिक कैडर होता है।
यदि कोई युवा नेता वर्षों तक संघर्ष करने के बाद भी अपने संगठन के भीतर अपना राजनीतिक भविष्य नहीं देख पाता, उसे जिम्मेदारी और नेतृत्व का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो निश्चित रूप से बड़े राजनीतिक दल उसके सामने एक आकर्षक राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं।
और कांग्रेस ने छात्र एवं युवा राजनीति से आने वाली प्रतिभाओं को अपने राजनीतिक विस्तार में जगह देने की कोशिश पहले भी की है।
इसलिए सवाल केवल कांग्रेस से नहीं है।
सवाल हमसे है।
हम अपने बनाए हुए नेतृत्व को अपने संगठन में रोक क्यों नहीं पा रहे हैं?
हम उन्हें आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर क्यों नहीं दे पा रहे हैं?
हमारे संगठन से निकला युवा नेता दूसरे दल के लिए अधिक उपयोगी और हमारे अपने संगठन के लिए कम उपयोगी क्यों हो जाता है?
वामपंथी आंदोलन को अगर भविष्य में मजबूत होना है तो उसे व्यक्तिवाद से ऊपर विचार, व्यक्ति से ऊपर संगठन और पुराने नेतृत्व से ऊपर नए नेतृत्व के निर्माण को प्राथमिकता देनी होगी।
छात्र आंदोलन से निकला हर प्रतिभाशाली युवा किसी दूसरे राजनीतिक दल की राजनीतिक पूंजी बनने के बजाय अपने विचार और अपने संगठन को मजबूत करे—इसके लिए केवल युवाओं को दोष देना पर्याप्त नहीं है।
संगठनों को भी अपने भीतर ऐसा लोकतांत्रिक और राजनीतिक वातावरण बनाना होगा, जहाँ युवाओं को सम्मान, जिम्मेदारी, निर्णय लेने की शक्ति और आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले।
वरना स्थिति यही बनी रहेगी—
वामपंथी संगठन पौधे तैयार करेंगे,
संघर्ष से उन्हें सींचेंगे,
राजनीतिक प्रशिक्षण देंगे,
और जब वे फल देने लगेंगे,
तो कोई बड़ा राजनीतिक दल उन्हें अपने बगीचे में ले जाएगा।
यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है।
यह पूरे वामपंथी आंदोलन के लिए आत्ममंथन का विषय है।
छात्र और युवा आंदोलनों से कांग्रेस की मुख्यधारा की राजनीति में गए कुछ चर्चित नामों की सूची इस प्रकार है—
• कन्हैया कुमार — अखिल भारतीय छात्र महासंघ (AISF) के पूर्व नेता और जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष (2015–16), बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।
• सैयद नसीर हुसैन — स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1999–2000) रहे। बाद में युवा कांग्रेस से जुड़े और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद तथा पार्टी महासचिव बने।
• शकील अहमद खान — SFI से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1992) रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और बिहार विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे।
• बत्ती लाल बैरवा — SFI से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1996) रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।
• संदीप सिंह — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2007–08) रहे। बाद में प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीतिक टीम से जुड़े।
• अकबर चौधरी — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2013–14) रहे। बाद में कांग्रेस से जुड़े।
• मोहित पांडेय — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2016–17) रहे। बाद में कांग्रेस से जुड़े राजनीतिक कार्यों में सक्रिय रहे।
• प्रसनजीत बोस — SFI से जुड़े वामपंथी कार्यकर्ता रहे और बाद में कांग्रेस के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।
डी. पी. त्रिपाठी: एसएफआई के नेता और जेएनयूएसयू के अध्यक्ष (1975–76)। बाद में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का दामन थामा और वर्ष 1999 में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए।
इन नामों की सूची किसी व्यक्ति के राजनीतिक निर्णय पर व्यक्तिगत हमला करने के लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति पर बहस शुरू करने के लिए है।
सवाल सीधा है—
क्या वामपंथी पार्टियाँ देश के लिए वैकल्पिक राजनीति का मजबूत नेतृत्व तैयार कर रही हैं, या अनजाने में ऐसे नेताओं को तैयार कर रही हैं जिनका अंतिम राजनीतिक ठिकाना कोई दूसरा बड़ा दल बन जाता है?
इस सवाल से बचने का नहीं, इसका जवाब खोजने का समय है।
विचार बचेगा तो संगठन बचेगा,
संगठन बचेगा तो आंदोलन बचेगा,
और आंदोलन बचेगा तो नेतृत्व भी बचेगा।

