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Wednesday, 22 February 2017
Wednesday, 9 November 2016
ऐतिहासिक रैली में सांप्रदायिकता रूपी अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोकने का संकल्प
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| फोटो सौजन्य से डॉ प्रदीप शर्मा |
लखनऊ ,9 नवंबर 2016 :
आज लक्ष्मण मेला मैदान छह वामपंथी दलों - भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्स वादी ), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्स वादी - लेनिनवादी ), आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी एवं सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर आफ इंडिया ( कम्युनिस्ट ) की एक संयुक्त रैली का गवाह बना । पूरे प्रदेश के कोने कोने से आए कार्यकर्ताओं में अपार जोश देखने को मिला और वरिष्ठ नेताओं ने भी अपने भाषणों के जरिये यह संदेश देने में कोई कोताही नहीं बरती कि, 2017 का चुनाव सभी वामपंथी दल मिल कर जनता को एक वैकल्पिक व्यवस्था देने के लिए लड़ने के प्रति कटिबद्ध हैं।
सभा का सफल संचालन भाकपा उत्तर प्रदेश के सह - सचिव कामरेड अरविंद राज स्वरूप ने किया । मंचासीन लोगों में आशा मिश्रा, ताहिरा हसन, डॉ गिरीश चंद्र शर्मा, शिव नारायण चौहान, डॉ हीरा लाल यादव आदि एवं राष्ट्रीय नेता गण सर्व कामरेड डी राजा , सीताराम येचूरी, सुभाषिनि अली, दीपंकर भट्टाचार्य, अरुण कुमार सिंह, देब ब्रत बिस्वास के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
प्रादेशिक नेताओं द्वारा अपने विचार रखने के बाद राष्ट्रीय नेताओं में भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी राजा ने मोदी सरकार द्वारा अपने ही वायदों को तोड़े जाने के दृष्टांत प्रस्तुत किए । जनता से उन्होने अङ्ग्रेज़ी में संबोधित करने की बात हिन्दी में कही और शेष भाषण अङ्ग्रेज़ी में दिया जिसका हिन्दी अनुवाद इप्टा के राष्ट्रीय सचिव राकेश ने प्रस्तुत किया।
भाकपा माले के दीपंकर भट्टाचार्य ने भू अधिग्रहण द्वारा किसानों को लूटे जाने को विशेष चुनावी मुद्दा बनाए जाने पर ज़ोर दिया। जन समस्याओं के लिए संयुक्त संघर्ष करने पर अन्य नेताओं ने भी बल दिया।
माकपा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सीताराम येचूरी ने 'राम ' के नाम का दुरुपयोग करने वाली मोदी सरकार द्वारा 'सांप्रदायिकता के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े ' को उसी प्रकार रोके जाने की आशा व्यक्त की जिस प्रकार स्वम्य 'राम ' के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को 'लव ' - ' कुश ' नामक जुड़वां भाइयों द्वारा रोक दिया गया था। कामरेड येचूरी ने आज के जुड़वां भाइयों 'लव ' - ' कुश ' का परिचय 'हंसिया ' और 'हथौड़ा ' के रूप में दिया। उनका कहना था कि, जिस दिन ' किसान ' और 'मजदूर ' जुड़वां भाइयों द्वारा सांप्रदायिकता के रथ को रोक दिया जाएगा तभी शोषण कारी सांप्रदायिक शक्तियों का पराभव हो जाएगा और वह दिन अब दूर नहीं है।
रैली में एक प्रस्ताव पारित करके प्रमुख मांगो को जोरदार तरीके से उठाया गया जो इस प्रकार हैं :
Tuesday, 13 September 2016
यू पी में वाम का संकट : मध्य वर्ग से दूर रहा व मजदूर - किसान को अपना बना न सका ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी
****** हाल ही में मथुरा में वामदलों का एक दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन हुआ ......... वामदलों को मीडिया में चल रही बहसें प्रभावित नहीं करतीं।यह वामदलों की सबसे बड़ी कमजोरी है। ******
Madhuvandutt Chaturvedi
छह वामदलों के मथुरा क्षेत्रीय सम्मलेन में कल सीपीआई राज्य सचिव का. (डॉ) गिरीश शर्मा को सुना । प्रतिनिधि सम्मलेन की बजाय चुनाव सभा में दिया जा रहा भाषण लगा । सपा बसपा कांग्रेस और बीजेपी को समानरूप से लांछित कर रहे थे । आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जनता को कोई स्पष्ट सन्देश मैं नहीं सुन सका । राज्य में वामपंथी दलों की चुनाव में स्वतंत्र भागीदारी के लिए बस्तुगत आधारों का कोई मार्क्सवादी विश्लेषण नहीं था । कुल मिलाकर निराशा हुई । लेकिन इस बात की ख़ुशी हुई कि क्षेत्र के तमाम साथी एक जगह इकठ्ठा हुए और उत्साह के साथ एकदूसरे से मिले ।
https://www.facebook.com/madhuvandutt/posts/1006440102802056
यूपी में वाम का संकट-3-
वाम को यूपी में विकास करना है तो अपने पुराने वस्त्रों को छोड़ना पड़ेगा। विभिन्न किस्म की संकीर्णताएं, कठमुल्लापन और वामपंथी रोमैंटिशिज्म को छोड़ना होगा।वाम को सबसे ज्यादा क्षति इन चीजों ने पहुँचायी है।एक खास किस्म के पुराने आचार-व्यवहार ,जीवनशैली को बनाए रखकर वाम के जनाधार का विकास संभव नहीं है।यूपी में बहुत बड़ा हिस्सा है जो आपसी पंगों के कारण वामदलों से निकाल दिया गया। वाम के अंदर सामान्य सी भी सहिष्णुता और उदारता नहीं है,वामनेता और कार्यकर्ता बहुत ही जल्दी फतबे देने लगते हैं,तंज कसने लगते हैं,सामान्य भाषा में कहें तो डाह और कुतर्क या अविवेकवाद इस तरह के कॉमरेडों की सबसे बड़ी पूंजी है।अपनी घटिया समझ के आधार पर वे विभिन्न वर्गों और समुदायों के बारे में राय बनाए रखते हैं,इसके चलते उनके मन और आचरण में कम्युनिस्ट पार्टी के करीब आने के बाद भी कोई बदलाव नहीं आता।विभिन्न पेशेवर तबकों और कामों के प्रति सम्मान का भाव एकसिरे से गायब है।खासकर मध्यवर्गीय तबके के लोग जिन पेशों में काम करते हैं उनके प्रति अवैज्ञानिक समझ इनमें कूट-कूटकर भरी हुई है।वे हर मध्यवर्गीय व्यक्ति को ´लंपट किसान´ की नजर से देखते हैं,औचकभाव से देखते हैं।उनमें मध्यवर्गीय यथार्थ को जानने और समझ बनाने की बुद्धि अभी तक विकसित नहीं हो पायी है।
मार्क्सवाद को जानने का अर्थ है और भी विनम्र बनना है,लेकिन यूपी में उलटा है
यूपी में वाम का संकट-5-
समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार में अहंकार और दम्भ बहुत बड़ी समस्या है।मैंने जब आरंभ में मार्क्सवाद पढ़ा और मथुरा में जन सांस्कृतिक मंच के मित्रों में काम करता था तो अमूमन समाजवाद,मार्क्सवाद के अहंकार और श्रेष्ठताबोध से भरी बातें किया करता था,हमेशा पार्टी लाइन की श्रेष्ठता हर मंच पर हर गोष्ठी में सिद्ध करता रहता था,लेकिन कुछ दूसरे मित्र भी थे जिनमें एकदम अहंकार नहीं था,वे कभी पार्टी लाइन की श्रेष्ठता की वकालत नहीं करते थे।मैंने बाद में उनसे विनम्रता सीखी,अहंकार को त्यागकर अपनी बात कहने की कला सीखी।
पार्टी लाइन सही है,पार्टी कभी गलत नहीं हो सकती,इसके आदर्श पुरूष थे सव्यसाची जिनसे हम बहुत प्रभावित थे,बाद में अनुभव से पता चला कि मामला इतना सरल नहीं है।अनेक मामलों में,विषयों में पार्टी की कोई लाइन नहीं है,अथवा जो लाइन है वह सुसंगत नहीं है।
मार्क्सवाद को जानने का अर्थ है और भी विनम्र बनना है,लेकिन यूपी में उलटा है,हो सकता है अन्यत्र भी यही समस्या हो। प्रगतिशील लेखकों के एक वर्ग में यह समस्या आज भी है। दंभ और अहंकार के कंधे पर सवार होकर जब मार्क्सवाद आएगा तो बेहद खतरनाक होगा।जेएनयू में जाने के बाद अहंकार एकदम चूर-चूर हो गया,वहां जाकर पता चला कि मार्क्सवाद के बारे में ,कम्युनिस्ट आंदोलन के बारे में कितना कम जानता था और पहलीबार यह लगा कि मार्क्स अपूर्ण हैं। अनेक मामलों में गलत भी। जेएनयू जाने के बाद महसूस हुआ कि कुछ और चाहिए जो मार्क्सवाद के बाहर है उसे खोजो,कुछ और चाहिए जो पार्टी लाइन के बाहर है उसे खोजो। पार्टीलाइन के बाहर ज्ञान खोजे बिना न तो पार्टी सुधर सकती है और न कॉमरेड सुधर सकते हैं। सवाल यह है हम मार्क्सवाद क्यों पढ़ते हैं ॽ हम क्या जानना चाहते हैं ॽ जो जानना चाहते हैं उसका क्या करना चाहते हैं ॽ
https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1376155512413152
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कहने को तो भाकपा और माकपा 'जनवाद' पर आधारित दल हैं सैद्धान्तिक रूप से ,किन्तु व्यावहारिकता में ऐसा है नहीं किसी न किसी व्यक्ति - विशेष का ही नियंत्रण पूरी प्रादेशिक पार्टी पर रहता आया है। भाकपा में इसे AAP परिवार कह सकते हैं। अतः जैसा कि, मधुवन दत्त चतुर्वेदी साहब ने लिखा है ---" सीपीआई राज्य सचिव का. (डॉ) गिरीश शर्मा को सुना । प्रतिनिधि सम्मलेन की बजाय चुनाव सभा में दिया जा रहा भाषण लगा । सपा बसपा कांग्रेस और बीजेपी को समानरूप से लांछित कर रहे थे । ............................ राज्य में वामपंथी दलों की चुनाव में स्वतंत्र भागीदारी के लिए बस्तुगत आधारों का कोई मार्क्सवादी विश्लेषण नहीं था । कुल मिलाकर निराशा हुई ............................" इसे पूर्णत : डॉ गिरीश का व्यक्तिगत दृष्टिकोण नहीं मानना चाहिए क्योंकि, नियंता AAP परिवार के नायक का कहना है कि, गिरीश तभी तक पद पर हैं जब तक उनका हाथ उनकी पीठ पर है। उनके अनुसार जिस दिन कामरेड्स को पता चलेगा कि, अब उनका हाथ गिरीश की पीठ पर नहीं है उसी दिन उनको पद से हटना पड़ेगा। एक राष्ट्रीय सचिव से उन्होने डॉ गिरीश को भिड़वा दिया है और उनको फोन पर विकल्प के रूप में जिन कामरेड का हवाला दिया था इस विशेषण के साथ कि, " वह भी कोई अच्छे नहीं हैं " और इसे सही सिद्ध करने के लिए उनसे भी उन राष्ट्रीय सचिव के विरुद्ध सोशल मीडिया पर लिखवा चुके हैं। वह नायक कामरेड, उनकी पत्नी और उनके दत्तक पुत्र (A A P) ही यू पी में पार्टी की दिशा तय करते हैं। उन नायक कामरेड ने गिरीश जी को स्पष्ट निर्देश दिया हुआ है कि, obc व sc कामरेड्स से सिर्फ काम ही लेना है उनको कोई पद व ज़िम्मेदारी नहीं देना है और इसी का परिणाम था भाकपा प्रत्याशी रहे obc व sc कामरेड्स अपने दल-बल सहित भाकपा को अलविदा कह गए। मित्रसेन यादव जी को भी अपने दल - बल सहित तब भाकपा को अलविदा कहना पड़ गया जबकि वह प्रदेश सचिव थे। जो भी प्रदेश सचिव होता है वह सिर्फ वैधानिक (डियूरे ) होता है जबकि वास्तविक नियंता (डिफेकटो) यही नायक कामरेड रहते हैं जिस कारण मित्रसेन जी को उस पार्टी को छोडना पड़ा जिसके लिए संघर्ष करते हुये वह बूढ़े हुये थे। चाहे भीखा लाल जी रहे हों चाहे ऊदल जी अथवा विश्वनाथ शास्त्री जी दिशा निर्धारण स्वतंत्र रूप से करने में असमर्थ महसूस करते रहे।
जैसा कि, जगदीश्वर चतुर्वेदी जी लिखते हैं --- " यह एक वास्तविकता है कि वाम के पास यूपी के मध्यवर्ग को आकर्षित करने का कभी भी कोई ब्लू प्रिंट नहीं रहा "। भाकपा के AAP परिवार के नायक सरीखे कामरेड्स पार्टी का विस्तार और वृद्धि चाहते ही नहीं हैं अन्यथा उनका निजी 'साम्राज्य ' जो ध्वस्त हो जाएगा।
इन परिस्थितियों में यू पी के 2017 के चुनावों में छह वामपंथी दलों के अलग से खड़ा होना अप्रत्यक्ष रूप से फासिस्ट शक्तियों के लिए ही मददगार रहेगा।
( विजय राजबली माथुर )
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फेसबुक कमेंट्स :
| मथुरा में वामपंथी दलों के संयुक्त सम्मेलन को संबोधित करते हुए भाकपा उत्तर प्रदेश के सचिव डा. गिरीश |
Madhuvandutt Chaturvedi
https://www.facebook.com/madhuvandutt/posts/1006440102802056
वामदलों को मीडिया में चल रही बहसें प्रभावित नहीं करतीं।यह वामदलों की सबसे बड़ी कमजोरी है
यूपी में वाम का संकट-1-
यूपी में वाम का संकट-1-
हाल ही में मथुरा में वामदलों का एक दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन हुआ।इस सम्मेलन में किस तरह की बहस हुई और किन आधारों पर बहस हुई इस पर कोई ठोस जानकारी मेरे पास नहीं है। लेकिन कुछ खरी-खोटी सच्चाईयां हैं जिनको बहस के केन्द्र में रखना जरूरी है।हमें मालूम है वामदलों को मीडिया में चल रही बहसें प्रभावित नहीं करतीं।यह वामदलों की सबसे बड़ी कमजोरी है।
यूपी में वाम बेहद कमजोर अवस्था में है।वाम की इस कमजोरी का प्रधान कारण है वामनेताओं और वामदलों की यूनिटों का गैर-क्रांतिकारी और अ-लोकतांत्रिक चरित्र।इसके कारण बार-बार इकाईयां बनती-बिगड़ती रहती हैं।इसके अलावा वामदलों खासकर भाकपा-माकपा-माले में वे सभी वैचारिक कमजोरियां हैं जो इस क्षेत्र के गैर-वामनेताओं में हैं। इसके अलावा तीनों कम्युनिस्ट दलों में मार्क्सवादी साहित्य,ज्ञान-विज्ञान आदि के साहित्य के पठन-पाठन का अभाव है।इन इलाकों में भाकपा-माकपा-माले के अधिकांश सदस्य और नेतागण विश्व मार्क्सवादी साहित्य को पढ़ते- पढ़ाते नहीं हैं।अधिक से अधिक पार्टी की प्रचार सामग्री ही उनका ज्ञान स्रोत है।मार्क्सवादी साहित्य के ज्ञान के बिना कम्युनिस्ट कभी भी प्रभावित नहीं करते,बल्कि बे-सुरे से लगते हैं।इसके अलावा इन दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के पास यूपी में सांगठनिक विकास की कोई सुनियोजित योजना नहीं है।वे धार्मिक कर्मकांड की तरह किसी तरह लस्टम-पस्टम करके पार्टी यूनिटों को चलाने को ही क्रांति मानते हैं।
जो लोग सालों से इन दलों में हैं उनकी चेतना और वैचारिक समझ में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।मैं निजी तौर पर अनेक कम्युनिस्टों को जानता हूँ।मैंने स्वयं मथुरा में कई साल माकपा सदस्य के रूप में काम भी किया है। इन इलाकों में जो कम्युनिस्ट जितना ज्यादा जड़ है वह उतना ही बड़ा क्रांतिकारी है।पढ़े-लिखे को तो ये फुली-फालतू समझते हैं।सर्जनात्मकता और नई वैचारिक बहसों में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती।ऐसी स्थिति में यूपी में वाम के भविष्य की सहज कल्पना कर सकते हैं कि आने वाले चुनाव में वे क्या करेंगे ! हमारा मानना है यूपी के कम्युनिस्टों के वैचारिक तंत्र और आंतरिक सांगठनिक ढ़ाँचे को खोलना चाहिए।उस पर खुली बहस होनी चाहिए।
वाम का उदीयमान मध्यवर्ग से अलगाव
यूपी में वाम का संकट-2-
यूपी में वाम के विकास में सबसे बड़ी बाधा है वाम का उदीयमान मध्यवर्ग से अलगाव।यूपी में यह सच है जातिवाद और सामंती सामजिक संरचनाएं बहुत बड़ी बाधाएं हैं।लेकिन वाम आजादी के बाद यूपी में पैदा हुए मध्यवर्ग की प्रकृति और उसकी राजनीतिक-बौद्धिक-पेशेवर क्षमताओं को समझने और उसके अनुकूल अपने क्रांतिकारी औजारों को निर्मित करने में वाम पूरी तरह असमर्थ रहा है। यूपी में बसपा-सपा-भाजपा का नया उभार इसलिए संभव हुआ क्योंकि इन दलों ने सही ढ़ंग से मध्यवर्ग को पकड़ा।मध्यवर्ग को बसपा-सपा-भाजपा सम्बोधित करते हैं उस तरह वाम सम्बोधित नहीं कर सकता। बुर्जुआदलों का जो लक्ष्य है वह लक्ष्य वामदलों का नहीं हो सकता।लेकिन यह एक वास्तविकता है कि वाम के पास यूपी के मध्यवर्ग को आकर्षित करने का कभी भी कोई ब्लू प्रिंट नहीं रहा।
यूपी में मध्यवर्ग को अपनी ओर खींचने के लिए जिस तरह की व्यापक सांस्कृतिक-सामाजिक समझ चाहिए वह भी कम्युनिस्ट नेतृत्व विकसित नहीं कर पाए,इसके विपरीत यह देखा गया कि कम्युनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं में मध्यवर्ग के प्रति,खाते-पीते लोगों के प्रति एक खास किस्म की मन ही मन नफरत है। इसे बनाए रखने में वामनेताओं और उनके आचरण ने नकरात्मक भूमिका निभायी है।
हम यह भूल जाएं कि साठ और सत्तर के दशक में वामदलों का किस तरह का जलवा था! उस दौर में सारे देश में भिन्न किस्म का राजनीतिक परिवेश था।वाम का बुनियादी संकट यह है कि मध्यवर्ग से वह दूर रहा और मजदूर-किसान को अपना बना न सका।फलतःउसकी स्थिति ठन ठन गोपाल जैसी होकर रह गयी !
दिलचस्प बात यह यह है वाम का अधिकाँश नेतृत्व मध्यवर्ग से आता है लेकिन मध्यवर्ग को आकर्षित करना नहीं जानता। मध्यवर्ग को आकर्षित करने की कला वाम में क्यों नहीं विकसित कर पाया ॽ क्यों मध्यवर्ग के प्रति सामंती घृणा घर किए रही ॽमध्यवर्ग के अभाव में गतिशील कम्युनिस्ट पार्टी बनाना संभव नहीं है।केरल-पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के विकास में मध्यवर्ग की बहुत बड़ी भूमिका रही है।इन दिनों बंगाल में वाम के सामने जो संकट है उसमें मध्यवर्ग के सचेत हिस्सों का वाम को छोड़कर टीएमसी के साथ चले जाना है,सबसे बड़ी समस्या है।वाम के पास वोट है,जनता है,लेकिन मध्यवर्ग भाग खड़ा हुआ है।
वाम को यह बात समझनी होगी कि यूपी में वाम का विस्तार करना है तो मध्यवर्ग को आकर्षित करने की क्षमता सांगठनिक तौर पर विकसित करनी होगी।मध्यवर्ग के बिना संगठन को गतिशील नहीं बना सकते।दूसरी बात यह कि जो लोग मध्यवर्ग से आते हैं और वाम के सदस्य हैं उनकी वैचारिक छानबीन करने की जरूरत है।
मेरा मानना है फिलहाल वाम के पास जो मध्यवर्गीय कॉमरेड हैं इनमें अधिकतर वे हैं जो एकदम सर्जनाहीन हैं,यानी वाम के पास जो मध्यवर्ग के लोग आए हैं ये वे लोग हैं जिनकी मध्यवर्ग में कोई साख नहीं है,सर्जनात्मक –वैचारिक पहचान नहीं है।रद्दी किस्म के मध्यवर्गीय लोगों को लेकर आकर्षित करने की क्षमता पैदा नहीं की जा सकती।
संकीर्णताएं, कठमुल्लापन और वामपंथी रोमैंटिशिज्म को छोड़ना होगायूपी में वाम का संकट-3-
वाम को यूपी में विकास करना है तो अपने पुराने वस्त्रों को छोड़ना पड़ेगा। विभिन्न किस्म की संकीर्णताएं, कठमुल्लापन और वामपंथी रोमैंटिशिज्म को छोड़ना होगा।वाम को सबसे ज्यादा क्षति इन चीजों ने पहुँचायी है।एक खास किस्म के पुराने आचार-व्यवहार ,जीवनशैली को बनाए रखकर वाम के जनाधार का विकास संभव नहीं है।यूपी में बहुत बड़ा हिस्सा है जो आपसी पंगों के कारण वामदलों से निकाल दिया गया। वाम के अंदर सामान्य सी भी सहिष्णुता और उदारता नहीं है,वामनेता और कार्यकर्ता बहुत ही जल्दी फतबे देने लगते हैं,तंज कसने लगते हैं,सामान्य भाषा में कहें तो डाह और कुतर्क या अविवेकवाद इस तरह के कॉमरेडों की सबसे बड़ी पूंजी है।अपनी घटिया समझ के आधार पर वे विभिन्न वर्गों और समुदायों के बारे में राय बनाए रखते हैं,इसके चलते उनके मन और आचरण में कम्युनिस्ट पार्टी के करीब आने के बाद भी कोई बदलाव नहीं आता।विभिन्न पेशेवर तबकों और कामों के प्रति सम्मान का भाव एकसिरे से गायब है।खासकर मध्यवर्गीय तबके के लोग जिन पेशों में काम करते हैं उनके प्रति अवैज्ञानिक समझ इनमें कूट-कूटकर भरी हुई है।वे हर मध्यवर्गीय व्यक्ति को ´लंपट किसान´ की नजर से देखते हैं,औचकभाव से देखते हैं।उनमें मध्यवर्गीय यथार्थ को जानने और समझ बनाने की बुद्धि अभी तक विकसित नहीं हो पायी है।
वर्तमान की नब्ज जिसके हाथ में नहीं है
यूपी में वाम का संकट-4-
यूपी में वाम का संकट-4-
यूपी और दूसरे हिन्दीभाषी राज्यों में वामकर्मियों में स्वतंत्रता की भावना सबसे गरम रूप में नजर आती है।हर समय वे क्रांति,समाजवाद आदि को लेकर गरमागरम बातें करते हैं।सबको धिक्कारते हैं,पूंजीवाद की भयावह तस्वीर पेश करते हैं और अपनी श्रेष्ठता का जाप करते हैं।इनमें सबमें गरम आग मिलेगी।लेकिन मुश्किल यह है कि समाज में कहीं आग नहीं है।यह असल में ऐसे व्यक्ति की आग है जिसने समाज से वैराग्य ग्रहण कर लिय़ा है,जो सामाजिक यथार्थ से भागा हुआ है,वर्तमान की नब्ज जिसके हाथ में नहीं है।मुक्तिबोध की भाषा में कहें यह अस्थायी सन्यासी है।सुनने में इस तरह का सन्यास भाव अच्छा लगता है।लेकिन यथार्थ में यह दमघोंटू है।इसे हम यथार्थरहित स्वतंत्रता कहें तो समीचीन होगा।कम्युनिस्टों में यथार्थरहित स्वतंत्रता कब और कैसे आई इसके बारे में ठीक से बताना मुश्किल है।यह ऐसा कॉमरेड है जिसने सही ढ़ंग से न तो जनतंत्र को देखा है और न उसके विस्तार को महसूस ही किया है उसके लिए तो जनतंत्र आज भी बोगस है,बेकार है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से वह लोकतंत्र में दिलचस्पी नहीं लेता।आए दिन लोकतंत्र पर हमले करता है,लोकतंत्र में शामिल दलों को निशाना बनाता है।उसके लिए सपा बुरा दल है,बसपा गुण्डों का दल है,कॉग्रेस बिकी हुई पार्टी है।भाजपा चोर है।यदि कोई ईमानदार हैं तो बस कम्युनिस्ट! इस तरह का ज्ञान कितना अज्ञान से भरा है इसे बताने की जरूरत नहीं है।इन इलाकों के कॉमरेड लोकतंत्र में नहीं शब्दतंत्र में जिंदा रहता है।लोकतंत्र से विमुख रहकर शब्दों की जुगाली करना समाजवाद नहीं है और न यह एक अच्छे कम्युनिस्ट का ही लक्षण है। एक अच्छा कम्युनिस्ट वह है जो लोकतंत्र को जाने,यथार्थ को जाने,उसे व्यक्त करना जाने।
मसलन्,इन दिनों हम सब फेसबुक पर हैं,यूपी के तमाम नेता और कॉमरेड भी फेसबुक पर हैं,पता करो ये लोग सारे दिन क्या करते हैं ,ये अपने विचारों का प्रचार क्यों नहीं करते,किसने रोका है यहां पर,फेसबुक पर तो पूरी आजादी है,कुछ भी लिख सकते हैं.लेकिन वे नहीं लिखेंगे।वे सामान्य सा मेल-मिलाप ,संचार भी नहीं करते फेसबुक पर।इससे पता चलता है ये लोग नए ज्ञान को ग्रहण करने और उसके अनुकूल आचरण करने से डरते हैं।नए के प्रति भय,संकोच और कुंठाएं इस कदर भरी पड़ी हैं कि वे नए विचार व्यक्त करने वाले साथियों को तत्काल वर्ग शत्रु घोषित कर देते हैं,बिका हुआ घोषित कर देते हैं।
मार्क्सवाद को जानने का अर्थ है और भी विनम्र बनना है,लेकिन यूपी में उलटा है
यूपी में वाम का संकट-5-
समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार में अहंकार और दम्भ बहुत बड़ी समस्या है।मैंने जब आरंभ में मार्क्सवाद पढ़ा और मथुरा में जन सांस्कृतिक मंच के मित्रों में काम करता था तो अमूमन समाजवाद,मार्क्सवाद के अहंकार और श्रेष्ठताबोध से भरी बातें किया करता था,हमेशा पार्टी लाइन की श्रेष्ठता हर मंच पर हर गोष्ठी में सिद्ध करता रहता था,लेकिन कुछ दूसरे मित्र भी थे जिनमें एकदम अहंकार नहीं था,वे कभी पार्टी लाइन की श्रेष्ठता की वकालत नहीं करते थे।मैंने बाद में उनसे विनम्रता सीखी,अहंकार को त्यागकर अपनी बात कहने की कला सीखी।
पार्टी लाइन सही है,पार्टी कभी गलत नहीं हो सकती,इसके आदर्श पुरूष थे सव्यसाची जिनसे हम बहुत प्रभावित थे,बाद में अनुभव से पता चला कि मामला इतना सरल नहीं है।अनेक मामलों में,विषयों में पार्टी की कोई लाइन नहीं है,अथवा जो लाइन है वह सुसंगत नहीं है।
मार्क्सवाद को जानने का अर्थ है और भी विनम्र बनना है,लेकिन यूपी में उलटा है,हो सकता है अन्यत्र भी यही समस्या हो। प्रगतिशील लेखकों के एक वर्ग में यह समस्या आज भी है। दंभ और अहंकार के कंधे पर सवार होकर जब मार्क्सवाद आएगा तो बेहद खतरनाक होगा।जेएनयू में जाने के बाद अहंकार एकदम चूर-चूर हो गया,वहां जाकर पता चला कि मार्क्सवाद के बारे में ,कम्युनिस्ट आंदोलन के बारे में कितना कम जानता था और पहलीबार यह लगा कि मार्क्स अपूर्ण हैं। अनेक मामलों में गलत भी। जेएनयू जाने के बाद महसूस हुआ कि कुछ और चाहिए जो मार्क्सवाद के बाहर है उसे खोजो,कुछ और चाहिए जो पार्टी लाइन के बाहर है उसे खोजो। पार्टीलाइन के बाहर ज्ञान खोजे बिना न तो पार्टी सुधर सकती है और न कॉमरेड सुधर सकते हैं। सवाल यह है हम मार्क्सवाद क्यों पढ़ते हैं ॽ हम क्या जानना चाहते हैं ॽ जो जानना चाहते हैं उसका क्या करना चाहते हैं ॽ
https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1376155512413152
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कहने को तो भाकपा और माकपा 'जनवाद' पर आधारित दल हैं सैद्धान्तिक रूप से ,किन्तु व्यावहारिकता में ऐसा है नहीं किसी न किसी व्यक्ति - विशेष का ही नियंत्रण पूरी प्रादेशिक पार्टी पर रहता आया है। भाकपा में इसे AAP परिवार कह सकते हैं। अतः जैसा कि, मधुवन दत्त चतुर्वेदी साहब ने लिखा है ---" सीपीआई राज्य सचिव का. (डॉ) गिरीश शर्मा को सुना । प्रतिनिधि सम्मलेन की बजाय चुनाव सभा में दिया जा रहा भाषण लगा । सपा बसपा कांग्रेस और बीजेपी को समानरूप से लांछित कर रहे थे । ............................ राज्य में वामपंथी दलों की चुनाव में स्वतंत्र भागीदारी के लिए बस्तुगत आधारों का कोई मार्क्सवादी विश्लेषण नहीं था । कुल मिलाकर निराशा हुई ............................" इसे पूर्णत : डॉ गिरीश का व्यक्तिगत दृष्टिकोण नहीं मानना चाहिए क्योंकि, नियंता AAP परिवार के नायक का कहना है कि, गिरीश तभी तक पद पर हैं जब तक उनका हाथ उनकी पीठ पर है। उनके अनुसार जिस दिन कामरेड्स को पता चलेगा कि, अब उनका हाथ गिरीश की पीठ पर नहीं है उसी दिन उनको पद से हटना पड़ेगा। एक राष्ट्रीय सचिव से उन्होने डॉ गिरीश को भिड़वा दिया है और उनको फोन पर विकल्प के रूप में जिन कामरेड का हवाला दिया था इस विशेषण के साथ कि, " वह भी कोई अच्छे नहीं हैं " और इसे सही सिद्ध करने के लिए उनसे भी उन राष्ट्रीय सचिव के विरुद्ध सोशल मीडिया पर लिखवा चुके हैं। वह नायक कामरेड, उनकी पत्नी और उनके दत्तक पुत्र (A A P) ही यू पी में पार्टी की दिशा तय करते हैं। उन नायक कामरेड ने गिरीश जी को स्पष्ट निर्देश दिया हुआ है कि, obc व sc कामरेड्स से सिर्फ काम ही लेना है उनको कोई पद व ज़िम्मेदारी नहीं देना है और इसी का परिणाम था भाकपा प्रत्याशी रहे obc व sc कामरेड्स अपने दल-बल सहित भाकपा को अलविदा कह गए। मित्रसेन यादव जी को भी अपने दल - बल सहित तब भाकपा को अलविदा कहना पड़ गया जबकि वह प्रदेश सचिव थे। जो भी प्रदेश सचिव होता है वह सिर्फ वैधानिक (डियूरे ) होता है जबकि वास्तविक नियंता (डिफेकटो) यही नायक कामरेड रहते हैं जिस कारण मित्रसेन जी को उस पार्टी को छोडना पड़ा जिसके लिए संघर्ष करते हुये वह बूढ़े हुये थे। चाहे भीखा लाल जी रहे हों चाहे ऊदल जी अथवा विश्वनाथ शास्त्री जी दिशा निर्धारण स्वतंत्र रूप से करने में असमर्थ महसूस करते रहे।
जैसा कि, जगदीश्वर चतुर्वेदी जी लिखते हैं --- " यह एक वास्तविकता है कि वाम के पास यूपी के मध्यवर्ग को आकर्षित करने का कभी भी कोई ब्लू प्रिंट नहीं रहा "। भाकपा के AAP परिवार के नायक सरीखे कामरेड्स पार्टी का विस्तार और वृद्धि चाहते ही नहीं हैं अन्यथा उनका निजी 'साम्राज्य ' जो ध्वस्त हो जाएगा।
इन परिस्थितियों में यू पी के 2017 के चुनावों में छह वामपंथी दलों के अलग से खड़ा होना अप्रत्यक्ष रूप से फासिस्ट शक्तियों के लिए ही मददगार रहेगा।
( विजय राजबली माथुर )
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Tuesday, 21 June 2016
मैं मार्क्सवाद से बाहर नही हो पाया हूँ. ------ वीरेंद्र यादव
Virendra Yadav
21 june 2016 ·रवीश ने जगमाति सांगवान से कहा कि आपसे बातचीत करके "'लग रहा है कि आप सीपीएम से नहीं बल्कि सीपीएम आपसे बाहर निकल गयी है."
हाँ ,होता है बिलकुल यही होता है आप जो हैं वही रहते हैं लेकिन पार्टी आपसे बाहर हो जाती है. आज वह सब शिद्दत से याद आ रहा है जब ठीक तीस साल पहले मुझसे भी पार्टी बाहर हो गयी थी. हुआ यह था कि अप्रैल 1986 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का स्वर्ण जयन्ती समारोह उत्सवी वातावरण में अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित किया गया था. मैं इसके आयोजकों में से एक था. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के हस्तक्षेप के चलते कुछ ऐसा घटनाक्रम हुआ कि हम कुछ साथी खिन्न हुए .मैंने इस समूचे प्रकरण पर 'हंस' पत्रिका (जनवरी,1987) में 'प्रगतिशील लेखन आन्दोलन -दशा और दिशा ' शीर्षक से लेख लिख दिया ,जिस पर कई अंकों तक लम्बी बहस चली..सीपीआई उ.प्र. के तत्कालीन महासचिव कामरेड सरजू पांडे ने मुझे लेख लिखने पर कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया . मैंने उन्हें लम्बा-चौड़ा सैद्धांतिक जवाब दे दिया. कामरेड पांडे अच्छे व्यक्ति थे उन्होंने मुझसे हँसते हुए कहा कि ' तुमने तो जवाब के बजाय मुझसे ही इतने सवाल पूछ कर मेरा ही एक्क्सप्लेनेशन काल कर लिया है. अब इसका जवाब कौन देगा !.' बहरहाल अंततः हुआ यह कि का.पांडे ने चार लाईन का पत्र लिखकर मुझे यह सलाह दी कि .'बाहर की पत्र- पत्रिकाओं' में मैं पार्टी से जुड़े मसलों को सार्वजानिक न करूं. लेखकीय स्वतंत्रता और दलीय अनुशासन के बीच मैंने लेखकीय स्वतंत्रता का वरण करते हुए अपनी पार्टी की सदयस्ता का नवीनीकरण नही कराया और पार्टी ने भी मुझे ड्राप कर दिया. इस तरह पार्टी से मेरी सोलह वर्ष सदस्यता का रिश्ता विछिन्न हुआ और पार्टी मुझसे बाहर हो गयी . लेकिन अभी भी मैं मार्क्सवाद से बाहर नही हो पाया हूँ. आज जगमति सांगवान की रवीश से बातचीत सुनते हुए वह समूचा घटनाक्रम याद आ गया .
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Monday, 20 July 2015
लखनऊ में भ्रष्टाचार और अपराधी पुलिस राज के खिलाफ मार्च
लखनऊ, 20 जुलाई 2015 --- आज पूर्वान्ह 22, क़ैसर बाग से कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ , जिलामंत्री, भाकपा के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं, किसानों, मजदूरों का एक जुलूस परिवर्तन चौक पर अन्य वामपंथी साथियों के साथ संयुक्त होकर लाल बाग, महापालिका कार्यालय, दारुलशफा होते हुये जी पी ओ स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा पर धरना, सभा में परिवर्तित हो गया।
सभाध्यक्ष सर्व-सम्मति से भाकपा जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ को चुना गया और संचालन किया माकपा के जिलमंत्री डॉ शर्मा ने। सभा को संबोधित करते हुये वरिष्ठ माकपा नेता डॉ श्री प्रकाश कश्यप ने आज के इस आंदोलन व धरने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। NFIW की आशा मिश्रा, AIDWA की मधु गर्ग, AIPWA की ताहिरा हसन, AIFB के रवि शंकर और भाकपा के वरिष्ठ नेता फूल चंद यादव आदि अन्य वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया और मोदी व अखिलेश सरकार के घोटालों -भ्रष्टाचार पर व्यापक प्रकाश डाला तथा कार्यकर्ताओं व जनता से संघर्ष के लिए आगे आने का आह्वान किया।
कामरेड फूल चंद यादव ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के माध्यम से किसानों की ज़मीन छीन कर उद्योगपतियों को मुफ्त बराबर कीमत पर सौपने के षड्यंत्र की विस्तृत चर्चा करते हुये आंकड़े देकर बताया कि तमाम खाली पड़ी ज़मीन को कृषि योग्य घोषित करके गरीब भूमिहीन किसानों को बांटे जाने की बेहद ज़रूरत है न कि किसानों की ज़मीन छीनने की।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में भाकपा के जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ ने कार्यकर्ताओं और जनता का संघर्ष में शामिल होने के लिए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होने साथ-साथ यह भी आह्वान किया कि और बड़े आंदोलन भी चलाने पड़ सकते हैं अतः उनमें प्रत्येक कार्यकर्ता अपने साथ अधिक से अधिक जनता को भी साथ लाये।
प्रदर्शन व सभा में भाकपा की ओर से सर्व कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़, फूल चंद यादव, कल्पना पांडे, कान्ति मिश्रा , आशा मिश्रा, परमानंद दिवेदी, विजय माथुर आदि शामिल थे। जसम के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर तथा रिहाई मंच के राजीव यादव आदि भी समर्थन देने हेतु उपस्थित थे।
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सभाध्यक्ष सर्व-सम्मति से भाकपा जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ को चुना गया और संचालन किया माकपा के जिलमंत्री डॉ शर्मा ने। सभा को संबोधित करते हुये वरिष्ठ माकपा नेता डॉ श्री प्रकाश कश्यप ने आज के इस आंदोलन व धरने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। NFIW की आशा मिश्रा, AIDWA की मधु गर्ग, AIPWA की ताहिरा हसन, AIFB के रवि शंकर और भाकपा के वरिष्ठ नेता फूल चंद यादव आदि अन्य वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया और मोदी व अखिलेश सरकार के घोटालों -भ्रष्टाचार पर व्यापक प्रकाश डाला तथा कार्यकर्ताओं व जनता से संघर्ष के लिए आगे आने का आह्वान किया।
कामरेड फूल चंद यादव ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के माध्यम से किसानों की ज़मीन छीन कर उद्योगपतियों को मुफ्त बराबर कीमत पर सौपने के षड्यंत्र की विस्तृत चर्चा करते हुये आंकड़े देकर बताया कि तमाम खाली पड़ी ज़मीन को कृषि योग्य घोषित करके गरीब भूमिहीन किसानों को बांटे जाने की बेहद ज़रूरत है न कि किसानों की ज़मीन छीनने की।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में भाकपा के जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ ने कार्यकर्ताओं और जनता का संघर्ष में शामिल होने के लिए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होने साथ-साथ यह भी आह्वान किया कि और बड़े आंदोलन भी चलाने पड़ सकते हैं अतः उनमें प्रत्येक कार्यकर्ता अपने साथ अधिक से अधिक जनता को भी साथ लाये।
प्रदर्शन व सभा में भाकपा की ओर से सर्व कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़, फूल चंद यादव, कल्पना पांडे, कान्ति मिश्रा , आशा मिश्रा, परमानंद दिवेदी, विजय माथुर आदि शामिल थे। जसम के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर तथा रिहाई मंच के राजीव यादव आदि भी समर्थन देने हेतु उपस्थित थे।
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Thursday, 16 April 2015
क्रान्तिकारी : 'स्व' से संघर्ष -----कविता कृष्णपल्लवी
- क्रान्ति का निश्चय ही एक काव्यात्मक पहलू होता है, लेकिन क्रान्ति कभी भी पूरीतरह कविता नहीं होती। वह जिन्दगी का सघन-सान्द्र रूप होती है। कभी वह सपाट पठारों की तो कभी बीहड़ पर्वतों-घाटियों की यात्रा जैसी होती है। क्रान्तिकारी जीवन में रोज़ तूफानी उड़ानों का रोमांच नहीं होता। ऐसे तूफानों की लम्बी तैयारी एक लम्बे श्रमसाध्य कालखण्ड की माँग करती है, काफी हद तक मज़दूरों की जिन्दगी जैसी। क्रान्तिकारी जीवन में ठहराव, मंथर गति और विफलता का भी बार-बार सामना करना पड़ता है।
अतिशय रूमानियत से भरे युवा क्रान्तिकारी जीवन से कविता जैसे ''निष्कलुष'' ''स्वर्गीय'' सुंदरता और सतत आवेग की अपेक्षा पालकर आते हैं। उनकी आँखों के सामने क्रान्तिकारियों और क्रांतिकारी कहानियों-उपन्यासों के नायकों के जीवन के रूमानी और नायकत्व वाले पहलू नाचते रहते हैं। उनकी चयनात्मक दृष्टि मनोगतवादी होती है। ऐसे युवा विज्ञान को आत्मसात करने के बजाय नायकों की आराधना करने लगते हैं। उनके अवचेतन में स्वयं वैसा ही नायक बनने की आकांक्षा छिपी रहती है। प्राय: ऐसे युवक और युवती क्रान्तिकारी जीवन में अपनी 'जेनी', 'क्रुप्स्काया', या अपने 'मार्क्स', 'लेनिन' की भी तलाश करते रहते हैं और विफल होने पर निराश हो जाते हैं। क्रान्ति से उनका मन उचट जाता है। मध्यवर्गीय रुमानियत के शिकार लोग एक झोंक में कठिन जीवन भी बिता लेते हैं और शहादत के जज़्बे के साथ कुछ साहसिक कामों को भी अंजाम दे डालते हैं, लेकिन अन्ततोगत्वा वे थकान, अवसाद, बोरियत और निराशा के शिकार हो जाते हैं। ऐसी रुमानियत अक्सर पुराने अराजकतावादी मध्यवर्गीय क्रान्तिकारियों के जीवन-दर्शन का अंग हुआ करती थी, लेकिन सर्वहारा क्रान्तिकारी के जीवन-दर्शन में इसका कोई स्थान नहीं हो सकता।
सर्वहारा क्रान्तिकारी वही हो सकता है, जो सर्वहारा वर्ग के जीवन, मुक्ति के लक्ष्य और संघर्ष को पूरी तरह से आत्मसात कर ले, क्रान्ति को तौरे-जिन्दगी बना ले, क्रान्ति में भागीदारी की उसके मन में कोई पूर्वशर्त या पूर्वापेक्षा न हो। क्रान्तिकारी के लिए 'स्व' से संघर्ष युद्ध का एक बेहद कठिन मोर्चा है। अपने नायकों के सिद्धान्तों को जानना-समझना हमारे लिए सर्वोपरि महत्व रखता है। बेशक उनके जीवन के प्रेरणादायी पहलुओं से हम प्रेरणा भी लेते हैं, पर हमारे लिए लेनिन की पालतू बिल्ली, स्तालिन की पाइप, माओ की चेन-स्मोकिंग या चे के सिगार का कोई महत्व नहीं हो सकता। उनके निजी जीवन के हर पहलू से मोहाविष्ट होना ज़रूरी नहीं। वे अवतार नहीं, हाड़-मांस से बने मनुष्य थे जो देश-काल विशेष में रहते थे और जिनकी कुछ विशिष्ट निजी आदतें भी थीं। हम सभी मनुष्य हैं और हमारी भी अपनी कुछ निजी मौलिक आदतें हो सकती हैं। पर नकल हर मायने में फूहड़ चीज़ होती है। न तो किसी 'कल्ट' का अनुसरण करना चाहिए, न ही 'कल्ट' का निर्माण किया जाना चाहिए।
--कविता कृष्णपल्लवी - Arvind Raj Swarup Cpi क्रांति कारी जीवन में ठहराव......आदि आदि।
फिर तो वामपंथियो के अलग अलग होने का कोई तर्क भी नहीं।
आप भी सोचिये।
- Kavita Krishnapallavi आप बात का मर्म नहीं पकड़ पाये और कहाँ की बात कहाँ लेकर चले गये। क्रांतिकारी जीवन के तर्क को पार्टियों पर यूँ लागू मत कीजिए। पार्टियों के बीच फूट और अलगाव के कारण मूलत: विचारधारा और कार्यक्रम से जुड़े होते हैं। ''वामपंथ'' का कम्युनिस्ट 'जेनेरिक टर्म' की तरह इस्तेमाल नहीं करते। कोई अपने को वामपंथी कह सकता है, पर दूसरे की नज़र में संशोधनवादी हो सकता है। संशोधनवाद, यानी लेनिन के अनुसार, समाजवाद की खोल में बुर्जुआ अन्तर्वस्तु। बोल्शेविक-मेंशेविक विभाजन, दूसरे इण्टरनेशनल की फूट, सोवियत पार्टी-चीनी पार्टी अलगाव ('महान बहस' 1963-64 के दस्तावेज देखें) आदि के कारण विचारधारात्मक थे। भाकपा-माकपा में फूट यूँ तो विचारधारात्मक (ख्रुश्चोवी संशोधनवाद के प्रश्न पर) दीखती थी, लेकिन माकपा की मध्यमार्गी पोजीशन भी वस्तुत: संशोधनवादी ही थी तथा दोनों के कार्यक्रम में थोड़ा अन्तर था। कालांतर में माकपा भी पूरी तरह ख्रुश्चोवी संशोधनवाद पर पहुँच गयी। आज दोनों ही पार्टियों का ढाँचा-खाँचा लेनिनवादी न होकर यूरोप की काउत्स्कीपंथी सामाजिक जनवादी पार्टियों जैसा है। संसदीय चुनावों को दोनों ही पार्टियाँ साठ व पचास वर्षों से 'टैक्टिक्स' के बजाय 'स्ट्रैटेजी' की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। (वैसे देखें तो इन्हें तो एक हो ही जाना चाहिए, लेकिन ये नहीं होंगी और बुर्जुआ संसदीय पार्टियों की तरह प्रतिस्पर्द्धा और सहयोग का खेल खेलती रहेंगी) दूसरी ओर बहुतेरे मा-ले ग्रुप भी संशोधनवादी भटकाव के शिकार हैं, जबकि एक बड़ा धड़ा ''वाम'' दुस्साहसवाद की राह पर है। विचारधारात्मक महत्व के प्रश्नों को तिलांजलि देकर व्यापक वाम एकता की दुहाई देने वाले लोग मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धान्तों को भी नहीं जानते-समझते। अरविन्द राज जी, आप सिद्धान्त और इतिहास का अध्ययन करके कुछ सोचिये-समझिये, निपट व्यवहारवाद और गलदश्रु भावुकता भरी वाम एकता की दुहाइयों से अबतक न कुछ हासिल हुआ है, न ही आगे होगा।
- Arvind Raj Swarup Cpi कॉम मैने आपकी पोस्ट को पढ़ा।आपके विचारो को मै वामपंथी ही मानता हूँ जेनेरिक टर्म ही सही।वाम पंथ की विशाल सोच में मै आप सरीखे ग्रुप्स को सहयात्री अवश्य मानता हूँ।
क्या आपके ग्रुप का कोई लिखित" कार्यक्रम" है?
Kavita Krishnapallavi सारा साहित्य आपको लखनऊ में ही साथियों से मिल जायेगा।
साभार :
https://www.facebook.com/notes/kavita-krishnapallavi/
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