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Wednesday, 15 August 2018

मजदूर हितैषी मार्क्स का विरोध कर इस पराजय की पटकथा आपने ही लिखी है ------ हेमंत कुमार झा




Hemant Kumar Jha
12 -08-2018 


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Friday, 15 June 2018

जनता की सहानुभूति व समर्थन पाने में विफल क्यों कम्यूनिज़्म ? ------ विजय राजबली माथुर

वर्ष 1978 - 79 में सहारनपुर के 'नया जमाना'के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1951  - 52 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व.लिमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्युनिस्टों  और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।
प्रोफेसर निष्ठा के विचार उसी तथ्य की ओर इंगित कर रहे लगते हैं। 
छात्रों-नौजवानों को देश के सामने आई विकट समस्याओं पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि भविष्य मे फासिस्ट तानाशाही से उन्हें ही टकराना पड़ेगा। अतः आज ही कल के बारे मे भी निर्णय कर लेना देश और जनता के हित मे उत्तम रहेगा।
ब्राह्मणवादी, ढ़ोंगी-पाखंडी तो कहते ही हैं दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि, वामपंथी, साम्यवादी औरे एथीस्ट भी 'हिन्दू ' को  'धर्म ' ही  मानते हैं। जबकि वस्तुतः 'हिन्दू ' शब्द सर्वप्रथम बौद्ध ग्रन्थों में हिंसक गतिविधियों में संलिप्त लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ था। फिर फारसी या ईरानी आक्रांताओं ने एक गंदी व भद्दी गाली के रूप में भारतवासियों के लिए 'हिन्दू ' शब्द का प्रयोग प्रारम्भ किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने ' हिन्दू ' एक राजनीति का शब्द माना है कोई ' धर्म ' नहीं। परंतु सरकारी कागजों में, ब्राह्मण वादियों के प्रचार में व वामपंथी, साम्यवादी के साथ साथ एथीस्ट संप्रदाय भी 'हिन्दू ' को 'धर्म ' की संज्ञा दे रहा है।
क्यों नहीं जनता को 'धर्म ' का वास्तविक ' मर्म ' समझाया जाता ? क्यों नहीं जनता को बताया जाता कि, हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत,सिख,पारसी आदि कोई धर्म नहीं हैं ? जब तक आप जनता को अध्यात्म, भगवान,धर्म,ईश्वर की सही व्याख्या नहीं बताएँगे जनता आपकी बातें सुनने को तैयार ही नहीं होगी। भारत में सशस्त्र क्रांति संभव होती तो 1857 में ही सफल हो जाती तब गांधी जी को  ' सत्य व अहिंसा ' को हथियार न बनाना पड़ता। सम्पूर्ण मार्क्स वाद सही होते हुये भी भारत में मार्क्स और लेनिन / स्टालिन के बताए मार्ग से प्रस्तुत न किए जाने के कारण भारत की जनता की सहानुभूति व समर्थन पाने में विफल है। आपको जनता के बीच समझाना होगा कि , धर्म का नाम लेने वाले खुद ही अधार्मिक हैं क्योंकि , :
समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है ? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है। 
* धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
* भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
* चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।
 * इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
* ईश्वर = जो ऐश्वर्यशाली हो अर्थात आज की इस दुनिया में कोई भी नहीं। 
* अध्यात्म = अध्ययन + आत्मा अर्थात अपनी आत्मा का अध्ययन न कि ढोंगियों  का आडंबर। 
* ' सन्त ' = संतुलित हो जीवन जिसका वह सन्त है।
* 'साधू ' = साध लिया हो अपना जीवन जिसने ( who have balanced his / her life ) साधू होता है।
लेकिन समाज में इन शब्दों के मर्म को न समझ कर गलत अर्थ में लिया जाता है तभी समाज व राष्ट्र को दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं।









Wednesday, 23 March 2016

कन्हैया के विरुद्ध बाजरवादी वामपंथियों का प्रहार किसको लाभ पहुंचाने के लिए ? ------ विजय राजबली माथुर

23 मार्च 2016 को  हैदराबाद में रोहित वेमुला की माँ से AISF महासचिव के साथ कन्हैया कुमार 


******JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार AISF महासचिव सैयद वलीउल्लाह खादरी के साथ हैदराबाद यूनिवर्सिटी के दिवंगत छात्र रोहित वेमुला की माँ व परिवारीजनों से मिलने गए। उनको वहाँ यूनिवर्सिटी में जा कर आज सभा को संबोधित करना था किन्तु कल ही छात्रों पर पुलिस द्वारा बर्बर लाठी चार्ज के बाद 28 तारीख तक के लिए यूनिवर्सिटी को बंद कर दिया गया था। 
कन्हैया और साथियों ने जे एन यू में रोहित को न्याय दिलाने के लिए मुहिम चला रखी है। अपनी गिरफ्तारी से पूर्व व पश्चात भी कई बार कन्हैया ने वामपंथ (लाल ) व आंबेडकर पंथ ( नीला ) के सहयोग तथा समन्वय से साम्राज्यवादी/संप्रदायवादी शक्तियों से आज़ादी की बात उठाई है। इसीलिए उनके भाषण के वीडियोज़ में ओवरलेपिंग करके उनको झूठे आरोपों पर गिरफ्तार कराया गया व उन पर शारीरिक हमले कराये गए। उनकी हत्या के लिए इनाम घोषित कराये गए। उन पर सेना को बदनाम करने के मन गढ़ंत आरोप लगाए गए। जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट एवं रेलमंत्री को ट्वीट किए गए समाचारों से कन्हैया द्वारा व्यक्त तथ्यों की पुष्टि ही होती है। फिर भी उनका चरित्र हनन अभियान जारी है। 
ऐसे में प्रश्न उठता है कि अति वामपंथ अथवा क्रांति के नाम पर कन्हैया विरोधी अभियान चलाने वाले आखिर किसका भला कर रहे हैं। इसे समझने के लिए 1964 के सी पी आई के विभाजन को याद करना होगा। तब पार्टी में दलित व पिछड़ा वर्ग के लोग प्रभावी होने की स्थिति में आ रहे थे अतः ब्राह्मण वादियों ने सिद्धांतों का जामा पहना कर सी पी एम का गठन करके पार्टी को विभाजित कर दिया जिससे दोनों दलों में ब्राह्मण वर्चस्व बना रहा। सी पी एम से अनेक और विभाजन हुये परिणाम स्वरूप वामपंथ जनता से और दूर हो गया। केंद्र में दक्षिण पंथी तानाशाही चाहने वाला दल सत्ता में आ गया जो पुलिस,सेना,प्रशासन और न्यायपालिका तक को प्रभावित करने को प्रयत्नशील है।   इन परिस्थितियों की भयावत: के बीच उन कन्हैया  पर सोशल मीडिया के माध्यम से प्रहार किया जा रहा है जो दक्षिण पंथ विरोधी व्यापक एकता की बात की पहल कर रहे हैं। तब मतलब साफ है कि यह एक ब्राह्मण वादी साजिश है जो दक्षिण पंथ की ही सहायता का अभियान है। 

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फेसबुक पर प्राप्त  टिप्पणी ::

वस्तुतः आज भी मार्क्स की जय बोलते हुये मास्को/पेकिंग रिटर्ण्ड ब्राह्मण वादी कामरेड्स सामंतवादी/साम्राज्य वादी/सांप्रदायिक मानसिकता से ग्रस्त हैं परंतु विभिन्न दलों में ये ही नियंत्रक बने हुये हैं। अन्य लोगों को दबा/कुचल कर रखना इनका शगल है और विभिन्न विभाजनों के लिए ये ही जिम्मेदार हैं। इनका कहना है ओ बी सी व दलित से काम तो लो लेकिन उनको पद न दो । यह व्यवहार खुद में शोषण-उत्पीड़न ही है। कन्हैया ने सबको समान महत्व देने की बात उठाई है इसलिए दक्षिण पंथी और वामपंथी ब्राह्मण एक साथ उनका विरोध कर रहे हैं। 
हालांकि 'नौजवान भारत सभा' के कार्यालय पर भी रात को छापा डाला गया है। किन्तु दलित छात्रों जिनमें डॉ आंबेडकर के पौत्र भी शामिल हैं देशद्रोही बताया जा रहा है। 

जैसा आलोकतांत्रिक वातावरण व्याप्त हो रहा है उसमें सभी लोकतान्त्रिक लोगों को एकजुट होने की ज़रूरत है और यही प्रयास कन्हैया का है। जब लोकतन्त्र ही नहीं रहेगा तब जनता तो बस गुलाम ही होगी। इसलिए वामपंथ में घुसे आलोकतांत्रिक लोगों से सतर्क रहने की प्रबल आवश्यकता है। 

Tuesday, 8 September 2015

: वाम असफल क्यो ? कौन दोषी है ? कहाँ चूक हुई ?,कमजोरियाँ किधर है ? ---विजय राजबली माथुर

07-09-2015 

ढ़ोंगी पोंगापंथी और एथीस्ट एक समान :

वेदों में निहित हैं साम्यवाद के सिद्धान्त :
 जिस प्रकार किसी भी संगठन या संस्था  के निर्माण के पूर्व उसके संचालन के लिए 'नियम' बनाए जाते हैं उसी प्रकार इस धरती के निर्माण के बाद जब 'मननशील प्राणी' = 'मनुष्य' की उत्पत्ति अब से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व  हुई तो इस नई सृष्टि के संचालन हेतु भी कुछ नियमों का निर्धारण किया गया । इन नियमों का संकलन 'वेदों' में है जो  श्रेष्ठ=आर्ष= आर्य  विद्वानों द्वारा संग्रहित किए गए थे। कालांतर में ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों द्वारा जिस हिंसक 'हिन्दू' संप्रदाय/मजहब/रिलीजन को खड़ा किया गया उसने वैदिक ज्ञान-विज्ञान को ध्वस्त करके पौराणिक कपोलकल्पित कहानियों की रचना की जो 'गर्व से हिन्दू' कहलाने वालों का आदर्श बनी हुई हैं। ये पौराणिक हिन्दू वैदिक ज्ञान को परिदृश्य में धकेलने हेतु उनको वेद-सम्मत बताते हैं और एथीस्ट उनके कथन को ब्रह्म-वाक्य मान कर चलते हैं। उपरोक्त फोटो टिप्पणियाँ ऐसे ही दो एथीस्टों द्वारा व्यक्त हैं जो उत्तर-प्रदेश भाकपा के कर्णधार भी हैं । ऐसी ही कारगुजारियों के कारण देश की जनता कम्यूनिज़्म को हिकारत की नज़र से देखती है।

 ये कर्णधार सवर्णवाद/ब्रहमनवाद से भी बुरी तरह से ग्रस्त हैं जिसका ज्वलंत उदाहरण यह टिप्पणी है ;



अभी हाल ही में भाकपा से लखनऊ की दो विधानसभा क्षेत्रों से पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी रहे( एक पिछड़े वर्ग से व दूसरे दलित वर्ग से संबन्धित ) पार्टी छोड़ कर एक ऐसी पार्टी में शामिल हुये हैं जो फासिस्ट संगठन की ही सहायक है। उन दोनों को धनिक होने के कारण पार्टी में शामिल करके प्रत्याशी बनाया गया था लेकिन उनके प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। उनको हारने पर संकेत दे दिया गया था कि अगले चुनावों में उनको प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा अतः गैर-कम्युनिस्ट प्रवृति के वे लोग उखड़ गए। कर्णधारों का यह व्यवहार उपरोक्त टिप्पणियों पर अवलंबित रहा है। 

ढोंगियों को जवाब देने या उनसे जवाब मांगने की क्या ज़रूरत ?:

एथीस्ट वादी भी ढोंगियों-पाखंडियों-आडंबरकारियों की ही तरह 'अधर्म' को धर्म कहते हैं व सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे भी उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ रहे हैं। इसी कारण खुद को उग्र क्रांतिकारी कहने वाले एथीस्टों ने चुनाव बहिष्कार करके अथवा 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थक दलों का विरोध करके केंद्र में सांप्रदायिकता के रुझान वाली सरकार गठित करवा दी है जिसका खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना होगा। 

धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।



अध्यात्म =अध्यन+ आत्मा = अपनी आत्मा का अध्यन। 
देवता= जो देता है और लेता नहीं है ,जैसे-नदी,वृक्ष,पर्वत,आकाश,अन्तरिक्ष,अग्नि,जल,वायु आदि न कि जड़ मूर्तियाँ/चित्र आदि। 

भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी)+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I (अनल-अग्नि )+न (नीर-जल )। 

खुदा = चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी भी प्राणी ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 

GOD = G (जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय )। उत्पत्ति,पालन व संहार करने के कारण ही इनको GOD भी कहते हैं। 
देखिये कैसे?:
वायु +अन्तरिक्ष =  वात 

अग्नि  =पित्त

 भूमि + जल = कफ 

इन तीनों का समन्वय ही शरीर को धारण करता है 

वात +पित्त + कफ =भगवान=खुदा=GOD 

शरीर को धारण करने व समाज को धारण करने हेतु
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। 

क्या महर्षि कार्ल मार्क्स अथवा शहीद भगत सिंह जी ने कहीं कहा है कि साम्यवाद के अनुयाइयों को झूठ बोलना चाहिये,हिंसा ही करनी चाहिए,चोरी करना चाहिए,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा करना चाहिए और अनियंत्रित सेक्स करना चाहिए। यदि इन विद्वानों ने  ऐसा नहीं कहा है तो इनका नाम बदनाम करने के लिए 'एथीस्ट वादी' ही जिम्मेदार हैं। और इसी कारण रूस से भी साम्यवाद उखड़ा है। 

"येभ्यो माता ................................................................आदित्यां अनुमदा स्वस्तये " (ऋग्वेद मंडल १० /सूक्त ६३ में वर्णित इस मन्त्र के भवानी दयाल सन्यासी जी द्वारा किये काव्यानुवाद  पंक्ति:

ऋतू अनुकूल मेंह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे.
सुजला सुफला मातृ भूमि हो,मधुमय क्षीर पिलावे..

अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है. दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है.जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है.

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यग्य रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं.

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न  इन्द्रावरुणा रातहव्या। 
शमिन्द्रासोमा सुविताय शं यो :शं न  इन्द्रा पूष्णा वाजसतौ । ।

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की.

सर्वे भवन्तु सुखिन: ,सर्वे सन्तु निरामय :। 
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुखभाग भवेत॥ 
ऋग्वेद के अंतिम सूक्त के पांचवें इस  श्लोक  का काव्यानुवाद यह है---
सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान । 
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण । । 
हे ईश सब सुखी हों कोई न हो  दुखारी। 
सब हों निरोग भगवन धनधान्य के भण्डारी। । 
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों। 
दुखिया न कोई होवे सृष्टि में प्राणधारी । । 

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव  ही नहीं जीव-निर्जीव सभी सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं। 
यदि हम जनता के समक्ष इन सच्चाईयों को लेकर जाएँ तो जनता हमारा न केवल स्वागत व समर्थन करेगी बल्कि संसद से ढ़ोंगी-साम्राज्यवादी/संप्रदायवादी  लोगों को भी उखाड़ फेंकेगी।





धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।



अध्यात्म =अध्यन+ आत्मा = अपनी आत्मा का अध्यन। 

देवता= जो देता है और लेता नहीं है ,जैसे-नदी,वृक्ष,पर्वत,आकाश,अन्तरिक्ष,अग्नि,जल,वायु आदि न कि जड़ मूर्तियाँ/चित्र आदि। 

भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी)+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I (अनल-अग्नि )+न (नीर-जल )। 

खुदा = चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी भी प्राणी ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 

GOD = G (जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय )। उत्पत्ति,पालन व संहार करने के कारण ही इनको GOD भी कहते हैं। 
देखिये कैसे?:
वायु +अन्तरिक्ष =  वात 
अग्नि  =पित्त
 भूमि + जल = कफ 
इन तीनों का समन्वय ही शरीर को धारण करता है 

वात +पित्त + कफ =भगवान=खुदा=GOD 

शरीर को धारण करने व समाज को धारण करने हेतु
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। 

क्या महर्षि कार्ल मार्क्स अथवा शहीद भगत सिंह जी ने कहीं कहा है कि साम्यवाद के अनुयाइयों को झूठ बोलना चाहिये,हिंसा ही करनी चाहिए,चोरी करना चाहिए,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा करना चाहिए और अनियंत्रित सेक्स करना चाहिए। यदि इन विद्वानों से ऐसा नहीं कहा है तो इनका नाम बदनाम करने के लिए 'एथीस्ट वादी' ही जिम्मेदार हैं। और इसी कारण रूस से भी साम्यवाद उखड़ा है। 

एथीस्ट वादी भी ढोंगियों-पाखंडियों-आडमबरकारियों की ही तरह 'अधर्म' को धर्म कहते हैं व सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे भी उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ रहे हैं। इसी कारण खुद को उग्र क्रांतिकारी कहने वाले एथीस्टों ने चुनाव बहिष्कार करके अथवा 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थक दलों का विरोध करके केंद्र में सांप्रदायिकता के रुझान वाली सरकार गठित करवा दी है जिसका खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना होगा। 

ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी और एथीस्ट दोनों का ही हित तानाशाही में है दोनों की ही आस्था लोकतन्त्र में नहीं है और दोनों ही परस्पर अन्योनाश्रित हैं । एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही संभव नहीं है। दोनों ही 'सत्य ' उद्घाटित नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि अज्ञान ही उनका संबल है जागरूक जनता को वे दोनों ही उल्टे उस्तरे से मूढ़ नहीं सकेंगे। 
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Sunday, 13 October 2013

साम्यवाद का चोला ओढ़ कर 'मार्क्स' को बदनाम करना और इस प्रकार 'साम्राज्यवाद को' मजबूत करना बंद करें---विजय राजबली माथुर

साम्राज्यवाद को मजबूत करने मे 'साम्यवाद 'का कितना योगदान?

"MAN HAS CREATED THE GOD FOR HIS MENTAL SECURITY ONLY"---
                                                                                                               KARL  MARX

अर्थात कार्ल मार्क्स का कथन है कि,"मनुष्य ने अपनी दिमागी सुरक्षा के लिए भगवान की उत्पत्ति  की है"।


महर्षि कार्ल मार्क्स ने  किस संदर्भ और परिस्थितियों मे यह लिखा इसे समझे बगैर एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर उदभट्ट विद्वान 'धर्म' की चर्चा को भटकाने वाला तथ्य कहते हैं और उनमे से कुछ यह भी घोषणा करते हैं कि,;हिन्दू','इस्लाम','ईसाई'आदि ही धर्म हैं एवं धर्म की अन्य कोई परिभाषा मान्य नहीं है। इसका सीधा-सादा अर्थ है कि 'तर्क'और ज्ञान के आभाव मे ये विद्वान ढोंग-पाखंड-आडंबर जिसे साम्राज्यवादी धर्म बताते हैं उसी को धर्म स्वीकारते हैं और तभी धर्म पर प्रहार करके जनता से कटे रहते हैं। हालांकि कुछ प्रगतिशील और जागरूक साम्यवादी नेता तो धर्म को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ कर जनता से संवाद करने लगे हैं और वे लोकप्रिय भी हैं।मुस्लिम वर्ग के एक कामरेड तो श्री कृष्ण को 'साम्यवाद ' का प्रयोग करने वाला बताते हैं और उनका जनता पर अनुकूल प्रभाव भी पड़ता है।  किन्तु बुद्धिजीवी विद्वान अभी भी 18वीं सदी की सोच से साम्यवाद लाने के नाम पर नित्य ही साम्राज्यवाद के हाथ मजबूत कर रहे हैं  फेसबुक पर अपने थोथे  बयानों से।और तो और मजदूर नेता एवं विद्वान कामरेड ने तो तब हद ही कर दी जब RSS की वकालत वाला एक लेख ही शेयर कर डाला। देखें-
Shriram Tiwari shared a link.
www.pravakta.com
साम्यवाद की विचारधारा क्या भारतीय संस्कृति के अनुकूल है? या साम्यवाद का भारतीय संस्कृति, धर्म और इतिहास से भी कोई संबंध है? यदि इन जैसे प्रश्नों के उत्तर खोजे जाऐं तो ज्ञात होता है कि वास्तविक साम्यवाद भारतीय संस्कृति में ही है। संसार का कम्युनिस्ट समाज भारतीय साम्यवाद को समझ नहीं पाया है और ना ही स...
· · · 2 hours ago ·

    • Vijai RajBali Mathur लेख मे मुद्दो की बात उठाते-उठाते अंततः RSS का समर्थन करके गुमराह किया गया है। 1857 की क्रांति मे भाग ले चुके महर्षि दयानन्द को अंग्रेज़-REVOLUTIONARY SAINT कहते थे और उनके संगठन को क्षति पहुँचने के उद्देश्य से RSS की स्थापना कराई थी जो आज आर्यसमाज को ही नियंत्रित करता प्रतीत होता है।

तो आइये सबसे पहले आर एस एस क्यों बनवाया गया इसे जानें फिर समझें कि 'साम्यवाद है ही भारतीय अवधारणा'। 'महाभारत काल'के बाद भारत का सांस्कृतिक पतन तीव्र गति से हुआ और आंतरिक फूट के कारण यह विदेशियों का गुलाम बना । विदेशी सत्ता ने यहाँ के तत्कालीन विद्वानों को अपनी ओर मिलाकर ऐतिहासिक संदर्भों को संदेहास्पद बनाने हेतु 'पुराणों' की रचना करवाई। आम जनता ने इन विद्वानों से गुमराह होकर पुराणों को धार्मिक ग्रंथ मान लिया और आज तक वही विभ्रम पूजा जा रहा है। हमारे साम्यवादी विद्वान भी इन ग्रन्थों को ही धार्मिक ग्रंथ की संज्ञा देते हैं जो उनकी ज़िद्द और जड़ता का प्रतीक है।हवाला तो ये मार्क्स का देते हैं किन्तु ये सब महर्षि कार्ल मार्क्स के पैर के अंगूठे के नाखून की नोक के बराबर भी नहीं ठहरते ज्ञान के मामले मे।

सर्वप्रथम बौद्धों पर अत्याचार करने वाले लोगों यथा उनके मठों को उजाड़ने,विहारों और उनके ग्रन्थों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण 'हिन्दू' की संज्ञा दी गई थी। उसके बाद फारसियों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा। यहाँ के लोगों ने अपने तत्कालीन पुरोहितो,पुजारियों और विदेशी सत्ता के लालच मे फंसे विद्वानों की बातों को सिर -माथे पर लिया और खुद को 'हिन्दू' कहलाने लगे।

अब चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता 'मुस्लिम शासकों' से छीनी थी इसलिए उसने इन हिंदुओं को बढ़ावा देकर मुसलमानों को कुचला जिससे वे शिक्षा और रोजगार मे पिछड़ गए। कंपनी शासन ने मुस्लिमों और हिंदुओं मे खाई गहराने हेतु 'बाबरी मस्जिद' प्रकरण खड़ा कराया।

ब्रिटिश अत्याचारों और शोषण से त्रस्त होकर मुगल शासक 'बहादुर शाह जफर' के नेतृत्व मे 1857 मे तथाकथित हिंदुओं और मुसलमानों ने मिल कर क्रांति कर दी जो आंतरिक फूट के कारण निर्ममता से कुचल दी गई। पंजाब के सिखों,ग्वालियर के सिंधिया,भोपाल की बेगम,नेपाल के राणा ने 'आज़ादी की प्रथम क्रान्ति'को कुचलने मे अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया और बहादुर शाह जफर को मांडले मे कैद करके भारत से निर्वासित कर दिया गया। इस क्रांति के बाद मुसलमानों का और भी दमन किया गया क्योंकि मुगल शासक ने इसका नेतृत्व किया था।

अपनी युवावस्था मे महर्षि दयानंद 'सरस्वती'ने भी इस क्रांति मे भाग लिया था और रानी लक्ष्मी बाई से भी उनका संपर्क था। 'क्रांति' के दमन की क्रूरता को देख कर दयानन्द ने ईस्वी सन 1875 की चैत्र प्रतिपदा को (क्रांति के 18 वर्ष बाद),'आर्यसमाज'का गठन किया जिसका उद्देश्य जनता को जागरूक करके देश को आज़ादी दिलाना था। प्रारम्भ मे जितने भी आर्यसमाज स्थापित हुये ब्रिटिश छावनी वाले नगरों मे ही हुये थे। ब्रिटिश सरकार ने उन पर कई मुकदमे भी चलवाये उनको REVOLUTIONARY SAINT कहा गया। महर्षि दयानंद 'सरस्वती' ने विदेशियों द्वारा प्रदत्त  'हिन्दू' संज्ञा का प्रबल विरोध किया। उन्होने देशवासियों को 'सनातन आर्यत्व' पर लौटने का आहवाहन किया।

दयानन्द के प्रचार से भयभीत होकर ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन हयूम की मदद से वोमेश चंद्र बेनर्जी (जो ईसाई थे)की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कारवाई जो सम्पूर्ण आज़ादी नही केवल 'डोमिनियन स्टेट' चाहती थी। अतः दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी इस कांग्रेस के सदस्य बन गए और उन लोगों के प्रयास से कांग्रेस को 'सम्पूर्ण' आज़ादी को ध्येय बनाना पड़ा।डॉ पट्टाभि सीता रमय्या ने 'कांग्रेस का इतिहास' मे लिखा है कि स्वतन्त्रता आंदोलन मे भाग लेने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।

अतः अब इस कांग्रेस को कमजोर बनाने हेतु मुसलमानों का सहारा लिया गया और ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन के माध्यम से 1906 मे  'मुस्लिम लीग'की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने करवाई दूसरी ओर 'मुस्लिम सांप्रदायिकता' के जवाब मे मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व मे 1920 मे 'हिन्दू महासभा' का गठन करवाया गया। अभी तक महर्षि दयानन्द   के बाद भी उनका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ था अतः आर्यसमाजियों के प्रभाव से हिंदूमहासभा 'हिन्दू सांप्रदायिकता' को उभाड़ने मे विफल रही। लेकिन कांग्रेस मे सांप्रदायिक आधार पर धड़ेबंदी शुरू हो गई। इन परिस्थितियों मे 'राष्ट्र्वादी कांग्रेसियों' ने 25/26 दिसंबर 1925 को कानपुर मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। स्वामी सहजानन्द 'सरस्वती',क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित और महा पंडित राहुल सांस्कृत्यायन सरीखे आर्यसमाजियों ने कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत बनाने मे अपना अमित योगदान दिया।

आर्यसमजी और कम्युनिस्ट मिल कर कहीं ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ न फेंके इस लिए पूर्व क्रांतिकारी सावरकर साहब जो खुद को नास्तिक कहते थे के माध्यम से RSS का गठन करवाया गया। शासकों के साथ दुरभि संधि के तहत इस संगठन को नाजी हिटलर के 'स्टार्म फोर्स' की भांति रखा गया जिससे जनता को गुमराह किया जा सके क्योंकि हिटलर शुद्ध आर्य होने का दावा करता था और उसका वारिस यह संगठन भारत मे खुद को घोषित करने लगा। इससे यह शक नहीं पैदा हो सका कि इसके पीछे ब्रिटिश सरकार का हाथ है जबकि यह उसी के मंसूबे पूरे करने हेतु ही गठित हुआ था। RSS की जूते से टोपी तक पोशाक और परेड की गतिविधियां जर्मनी के 'स्टार्म फोर्स' की तर्ज पर रखी गईं। यह नस्लवादी तौर पर मुस्लिमों के विरुद्ध घृणा फैलाता था । मुस्लिम लीग -RSS के प्रयासों से देश 'हिन्दू-मुस्लिम दंगों'की आग मे झुलसा दिया गया और अंततः 'पाकिस्तान' एवं 'भारत' दो देशों मे बाँट दिया गया। यह साम्राज्यवाद के नए मसीहा अमेरिका की नीतियों और योजनाओं का परिणाम था।

पूंजीवाद के समर्थक नेहरू जी ने बड़ी ही चालाकी से रूस से मित्रता करके भारतीय कम्युनिस्टों को प्रभाव हींन कर दिया।  आज कम्युनिस्ट आंदोलन कई पार्टियों मे विभक्त होकर पूरी तरह बिखर गया है। कांग्रेस जहां कमजोर पड़ती है वहाँ RSS समर्थित भाजपा को आगे बढ़ा देती है। दोनों साम्राज्यवादी अमेरिका समर्थक पार्टियां हैं। ऐसे मे साम्यवाद के मजबूत होकर उभरने की आवश्यकता है परंतु सबसे बड़ी बाधा वे 'साम्यवादी विद्वान और नेता' खड़ी करते हैं जो आज भी अनावश्यक और निराधार ज़िद्द पर अड़े हुये हैं कि 'मार्क्स' ने धर्म को अफीम कह कर विरोध किया है अतः साम्यवाद धर्म विरोधी  है।

'एकला चलो रे ' की नीति पर चलते हुये इस ब्लाग के माध्यम से मैं सतत 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बताने का प्रयास करता रहता हूँ जो वस्तुतः 'नक्कारखाने मे तूती की आवाज़' की तरह है। फिर भी एक बार और-

'धर्म'=जो शरीर को धरण करने के लिए आवश्यक है जैसे-'सत्य','अहिंसा','अस्तेय','अपरिग्रह'और 'ब्रह्मचर्य'।
(क्या मार्क्स ने इन सद्गुणों को अफीम बताया है?जी नहीं मार्क्स ने उस समय यूरोप मे प्रचलित 'ईसाई पाखंडवाद'को अफीम कह कर उसका विरोध किया था। पाखंडवाद चाहे ईसाइयत का हो,इस्लाम का हो या तथाकथित हिन्दुत्व का उन सब का प्रबल विरोध करना ही चाहिए परंतु 'विकल्प' भी तो देते चलिये। )

'भगवान'=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) का समन्वय।

'खुदा'=चूंकि ये पाँच तत्व खुद ही बने हैं इन्हे किसी ने बनाया नहीं है इसलिए इन्हे खुदा भी कहते हैं।

GOD=G(जेनेरेट)+O(आपरेट)+D(देसट्राय)। 'भगवान' या 'खुदा' सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन,पालन और 'संहार' भी करते हैं इसलिए इन्हें GOD भी कहा जाता है।

क्या मार्क्स ने प्रकृति के इन पाँच तत्वों को अफीम कहा था?'साम्यवाद' को संकुचित करने वाले वीर-विद्वान क्या जवाब देंगे?  


देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष ,नदी,समुद्र,वायु,अग्नि,आकाश,ग्रह-नक्षत्र आदि न कि कोई व्यक्ति विशेष। क्या मार्क्स ने प्रकृति प्रदत्त इन उपादानों का कहीं भी विरोध किया है?'साम्यवाद' के नाम पर साम्यवाद का अवमूल्यन करने वाले दिग्गज विद्वान क्या जवाब देंगे?

जनता को सही राह दिखाना किस प्रकार 'भटकाव' है?जो भटकाव करते हैं उनको तो धर्म कह कर ये विद्वान सिर पर चढ़ाते हैं और उसी प्रकार मार्क्स को बदनाम करने की कोशिश करते हैं जिस प्रकार साम्राज्यवादियों के पिट्ठू विद्वान राम को बदनाम करने का साहित्य सृजन करते हैं। राम ने नौ लाख वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी रावण को परास्त किया और उसका साम्राज्य ध्वस्त किया था। लेकिन साम्यवाद के मसीहा कहलाने वाले ये विद्वान राम-रावण युद्ध को कपोल कल्पना कह कर राम को साम्राज्यवादी RSS का खिलौना बना देते हैं। साम्राज्यवादियों ने दो धाराएँ फैला कर वास्तविकता को ढकने का स्वांग रचा है। पहले कहा गया कि वेद गड़रियों के गीत हैं और खुद 'मेक्समूलर' के माध्यम से यहाँ से मूल पांडुलिपियाँ ले गए। अंनुसन्धान किए और वेदों का भरपूर लाभ उठाया। दूसरे RSS,मूल निवासी,आदिवासी,आदि तमाम संगठनों के माध्यम से वेद और आर्यों के विरुद्ध दुष्प्रचार करवाया । कोई हिटलर की तर्ज पर हिन्दुत्व को नस्लवादी आर्य बताता है तो कोई आर्यों को यहाँ के मूल निवासियों का शोषक आक्रांता। दुर्भाग्य यह है कि साम्यवादी विद्वान इनमे से ही किसी न किसी बात को सही मानते हैं और अपना दिमाग लगा कर कुछ सोचना व समझना ही नहीं चाहते हैं। यदि कोई ऐसा प्रयास करता है तो तत्काल उसे प्रतिगामी घोषित कर देते हैं जबकि खुद कार्ल मार्क्स ने 'साम्यवाद' को देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की बात कही थी। भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होने पर स्टालिन ने भी इसके संस्थापकों से ऐसा ही कहा था। किन्तु इन लोगों ने न तो मार्क्स के सिद्धांतों का पालन किया न ही स्टालिन के सुझाव माने और रूसी पैटर्न की नकल कर डाली। भारतीय वांगमय से मेल न खाने के कारण यहाँ की जनता के बीच साम्राज्यवादियों के सहयोग से यह प्रचारित किया गया कि साम्यवाद विदेशी विचार-धारा है और देश के अनुकूल नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया और लाल बहादुर शास्त्री सरीखे नेताओं ने इसी आधार पर साम्यवाद को अत्यधिक क्षति पहुंचाई। स्टालिन ने हिटलर से समझौता  कर लिया तो ठीक था लेकिन नेताजी सुभाष बोस ने हिटलर का सहयोग लेकर जापान मे पनाह ली तो उनको 'तोजो का कुत्ता' कह कर इन साम्यवादी विद्वानों ने संभोधित किया और अपेक्षा करते हैं कि जनता उनको सहयोग दे । हालांकि अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि नेताजी का विरोध करना तब गलत था।

'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' के माध्यम से मैंने बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार राम ने रावण के 'साम्राज्यवाद' को नष्ट किया था। यदि आज भी साम्यवाद को कामयाब करना है तो राम की नीतियों को अपनाना पड़ेगा ,राम की आलोचना करके या अस्तित्व को नकार के कामयाब न अभी तक हुये हैं न ही आगे भी हो सकेंगे। योगी राज श्री कृष्ण ने तो सर्वाधिकार का बचपन से ही विरोध किया था गावों की संपत्ति का शहरी उपभोग समाप्त करने के लिए उन्होने 'मटका फोड़' आंदोलन चलाया था और गावों का मक्खन शहर आने से रोका था। गो-संवर्द्धन पर अनुसंधान करवाया और सफलता प्राप्त की लेकिन ढ़ोंगी गोवर्धन-परिक्रमा के नाम पर इस उपलब्धि पर पलीता लगाते हैं क्योंकि उसी मे साम्राज्यवादियों का हित छिपा हुआ है। किन्तु साम्यवादी क्यों नही 'सत्य' को स्वीकार करते हैं? क्यों साम्यवादी विद्वान ढोंगियों के कथन पर ध्यान देते हैं और वास्तविकता से आँखें मूँद लेते हैं। 

अभी तक सभी साम्यवादी विद्वानों ने साम्राज्यवादियों के षड्यंत्र मे फंस कर 'नकारात्मक' सोच को सच माना है। किन्तु अब आवश्यकता है कि इस सोच को सकारात्मक बना कर 'सच' को स्वीकार करें और सफलता हासिल करें। अन्यथा पूर्व की भांति 'साम्राज्यवाद को ही मजबूत' करते रहेंगे। मार्क्स ने जिस GOD का विरोध किया वह पाखंडियों की सोच वाला था वास्तविक नहीं। हमे जनता को बताना चाहिए वास्तविक GOD,खुदा या भगवान प्रकृति के पाँच तव हैं और कुछ नहीं। जनता को धर्म का मर्म बताना पड़ेगा तब ही वह ढोंग-पाखंड-आडंबर से दूर हो पाएगी। कृपया साम्यवाद का चोला ओढ़ कर 'मार्क्स' को बदनाम करना और इस प्रकार 'साम्राज्यवाद को' मजबूत करना बंद करें। 
 
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यह लेख 

मंगलवार, 3 जुलाई 2012 को 'क्रांतिस्वर'पर पूर्व प्रकाशित है जिस पर विवेकानंद त्रिपाठी जी की यह टिप्पणी भी प्राप्त हुई थी:


koi saamyavaadee aapke saath chaahe ho yaa na ho, aap bahut bada kaam kar rahe hain.

thanks

vivekanand tripathi