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Thursday, 3 September 2020

ब्रिटिश राज में कम्युनिस्टों पर् जुल्म ------ गिरिधर पंडित

 ब्रिटिश राज में कम्युनिस्टों पर् जुल्म(28,अगस्त की पोस्ट से आगे)
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साथियों पिछली पोस्ट में हमने कॉमिन्टर्न की 7 वीं कांग्रेस में व्यापक साम्राज्यवाद विरोधी संयुक्त मोर्चे पर ज्योर्जी दिमित्रोंव और वांग मिंग की रिपोर्ट का हवाला दिया था उसी कर्म में कॉंग्रेस में भारतीय मूल के ब्रिटिश कम्युनिस्टनेता और1929 के मेरठ षड्यंत्र केस के अभियुक्त ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बेन ब्रेडले  ने भारत सम्वन्धी रिपोर्टप्रस्तुत की जी इतिहास "दत्तब्रेडलेथीसिस",नाम से जानताहै। पाठक सवाल करेंगे कि क्यो इन्होंने भारत की तरफ से यह थीसिस प्रस्तुत की।जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से भाग लेने का,एस वी देश पांडे और एस एस मिराजकर रवाना हुए थे लेकिन उन्हें सिंगापुर में गिरफ्तार कर लिया गया इसलिये भारत का प्रतिनिधित्व बेन ब्रेडले ने किया रजनी पामदत्त पहले से ही कॉमिन्टर्न के सदस्य थे।29 फरवरी1936 में यह थीसिस  इम्प्रेकोर में प्रकाशित हुई।
   "दत्त ब्रेडले थीसिस"का सम्वन्ध भारत में व्यापक साम्राज्यवाद विरोधी जन मोर्चे के निर्माण से है।यह वह ऐतिहासिक समय था जब  भारत के विषय में कॉमिन्टर्न को अपनी  6टी कांग्रेस के फैसले में परिवर्तन करना पड़ा। थीसिस का सार संक्षेप इस प्रकार है,:--1-इस समय जो जरूरी है वह यह कि कांग्रेस, टॉड यूनियन, किसान औरयुवा संगठनों में एक सामान्य मंच के रूप में एकता कायम की जाय। इस एकता/समूह बद्धता के लिए  न्यूनतम आधार होगा(1)साम्राज्यवाद के विरुद्ध निरंतर सँघर्ष का गतिपथ(लाइन)और पूर्ण आजादी के लिए एक संविधान(2)जनता की आवश्यक आवश्यकताओं के लिए सक्रिय संघर्ष।
2-साम्राज्यवाद विरोधीजन मोर्चेकि आवश्यकता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।इस बात की भी गुंजाइश है कि  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने संगठन और कार्यक्रम में बदलवाकर  एक मंच/मोर्चे की जरूरत बन सकती है।
      3-लेकिन यह भी मानना जरूरी है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी वर्तमान स्थिति में राष्ट्रीय संघर्ष हेतु भारतीय जनता का एक संयुक्त  मोर्चा नही है।इसके संविधान में अभी  भी  जनता के व्यापक हिस्सों की भागीदारी/भूमिका का उल्लेख नही है।इसका राष्ट्रीय सँघर्ष का कार्यक्रम सभी भी पूर्णतः स्पष्ट नही है।इसके नेतृत्व को अभी राष्ट्रीय संघर्ष के नेता के रूप में मान्य नही किया जा सकता।
   4-अभी भी मजदूर ,किसा ,ट्रेड्यूनियनें और किसान यूनियने कांग्रेस के संविधान से बाहर हैं।सिर्फ जब तमाम शक्तियां-मजदूर किसानों के जन संगठन चाहे संयुक्त मोर्चे  के रूप में,अथवा सामूहिक संबद्धताके जरिये कांग्रेस जुड़ें तभी  हम एक ऐसे राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चे को प्राप्त कर सकते हैं जो एक साम्राज्यवाद विरोध जन मोर्चे को विकसित करने में सक्षम होगा।
     5,-यह जरूरी है कि आजादी और साम्राज्यवाद विरोधी लड़ाई के कार्यक्रम के साथ साथ मजदूर और किसानों की तात्कालिक आवश्यक आवश्यकताओं को भी शामिल किया जाय।"आगे कहा गया," ऐसे कार्यक्रम में निम्न बातें शामिल की जा सकतीहैं:--"( अ)-पूर्ण आजादी का लक्ष्यऔर जनतांत्रिक सरकार की स्थापना
(ब)-भाषण देने,संगठन बनाने,प्रेस,एकत्रित होने,हड़ताल, और धरने की आजादी।
( स)-तमाम मजदूर विरोधी अपवाद स्वरूप और दमनकारी कानूनों,अध्यादेशों की समाप्ति।
   (द)-तमाम राजवंदियों की रिहाई।
(य)-बेतन कटौती,बरख़्वास्तगी का विरोध।सही न्यूनतम वेतन,8 घण्टे का काम,किराए में 50%कटौती, की मांग और ऋण न चुका पाने की स्थिति में किसानों की जमीनों की जब्ती का विरोध। "
 यह भी कहा गया कि संघर्ष का केन्द्रीय नारा होगाकि:-बालिग मताधिकार ,सीधे गुप्त मतदान के आधार पर संविधान सभा  गंठित की जाय।"
    कुल मिला कर" दत्त ब्रेडले थीसिस"में  भारतीय कम्युनिस्टों को"  भारतीय राष्ट्रीयकांग्रेस को रूपांतरित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अनुसार इस रूपान्तरण के लिए चार सुधारों की जरूरत होगी:-1-कांग्रेस को जन संगठनों को  अपने संगठन में सामूहिक प्रवेश देना चाहिए  और उनकी सामूहिक संबद्धता  स्वीकार कने चाहिए। 2-कांग्रेस को अपने संविधान का प्रजातांत्रिककी करण करना चाहिए।-इसे अपने संविधान से केंद्रीकृत नियंत्रण समाप्त करना चाहिए  3-इसे एक स्पष्ट साम्राज्यवाद विरोधी कार्यक्रम स्वीकार करना चाहिए और्वपूर्ण आजादी और जनतांत्रिक सरकार की मांग करनी चाहिए।और4-इसे अहिंसा का उपदेश/मत  खत्म कर देना चाहिए।,"यह भी कहा गया कि इनमें पहला सुधार बाकी की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैताकि इन जन संगठनों के कांग्रेस में प्रवेश से वाम पन्थी धड़े को मजबूती मिल सके परन्तु इससे पहले वामपंथ को अद्वितीय एकता हासिल करनी होगी,इसलिए भारतीय कम्युनिस्टों को प्रतिद्वंदी क्रन्तिकारी समूहों के साथ शांति कायम करनी चाहिए।" दत्त ब्रेडलेथीसिस" में स्पष्ट रूप से कहा गया कि कांग्रेस के  भीतर वाम एकता कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।"
     ज्योर्जी दिमित्रोंव के निर्देश का अनुगमन करते हुए" दत्त ब्रेडले थीसिस "ने भरतीय कम्युनिस्टपार्टी का आह्वान किया कि वह  दक्षिणपंथी नेतृत्व के खिलाफ कांग्रेस के वाम धड़ेको तैयार करे। अर्थात कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के साथ गंठजोड़ करे। भारतीय कम्युनिस्टों को  राष्ट्रीय नेतृत्व को कार्यकर्ताओं से अलग थलग करके कांग्रेस का अधिकाधिक साम्राज्यवाद विरोधी ताकत के रूप में रूपांतरण करना चाहिए।" इस दस्तावेज के बाद भारत के कम्युनिस्टों को खुद को सुधारने का रास्ता मिलगया।(  क्रमशःशेष अगले अंक में)
https://www.facebook.com/giridhar.pandit.12/posts/500898474079235

Thursday, 7 February 2019

संसदीय साम्यवाद को संसदीय लोकतन्त्र व देश की रक्षा हेतु कदम बढ़ाने की जरूरत ------ विजय राजबली माथुर

पाँच वर्ष पूर्व व्यक्त विचारों  का वर्तमान परिस्थितियों में परिवर्तित प्रस्तुतीकरण 
 " संसदीय साम्यवादी आंदोलन के कमजोर होने का अर्थ क्रांतिकारी गुटों को सबलता प्रदान करना है जिनको कुचलना कारपोरेट समर्थक सरकारों के लिए बहुत आसान होगा। आने वाले समय में उत्पीड़ित -शोषित जनता यदि इन क्रांतिकारी साम्यवादियों के समर्थन में खड़ी हो जाये तो ये सफलता की ओर भी बढ़ सकते हैं किन्तु उस दशा में कारपोरेट के समर्थन से RSS खुल कर इनके प्रतिरोध में हिंसा भड़का देगा और देश गृह-युद्ध की विभीषिका में फंस सकता है जिसका सीधा - सीधा लाभ अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी शक्तियों को मिलेगा। अभी भी समय है कि संसदीय साम्यवादी आंदोलन समय की नज़ाकत को पहचान कर कदम बढ़ा सकता है और संसदीय लोकतन्त्र व देश की रक्षा कर सकता है। "
Saturday, February 8, 2014





अंतिम  तीन चित्रों से ही सारी स्थिति स्पष्ट है। परंतु प्रत्येक व्यक्ति अपनी सोच व समझ के अनुसार अलग-अलग विश्लेषण करता है। जहां एक ओर परस्पर एकजुट 11 दल इसके महत्व को रेखांकित करते हैं वहीं दूसरी ओर इनके विरोधी इनके अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं। जहां इन ग्यारह दलों का एका सांप्रदायिकता को रोकने के विरोध में बताया जा रहा है (वर्द्धन जी व मुलायम सिंह जी का हाथ थामे नीतीश कुमार उसी सांप्रदायिक भाजपा के साथ फिर से हैं ) वहीं इस बीच में ही इनमें से एक महत्वपूर्ण दल - भाकपा के लखनऊ - ज़िला मंत्री रह चुके, बाद में राष्ट्रवादी  कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वे- सर्वा बने, मुलायम सिंह मंत्रीमंडल के पूर्व सदस्य कौशल किशोर जी ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करते हुये भाजपा को कांग्रेस, बसपा व सपा से कम सांप्रदायिक बताया है।

निश्चय ही अपने-अपने स्वार्थों के अनुसार परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाएगा। तब भी जो महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि भाकपा में महत्वपूर्ण पदाधिकारी रहा व्यक्ति भाजपा में सहर्ष कैसे चला गया? हालांकि पहले भी भाकपा छोड़ कर एक महिला वकील भाजपा सरकार में मंत्री रही हैं । ऐसा क्यों होता है क्या सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण ही? फिर कम्युनिस्ट नैतिकता का क्या हुआ? साम्राज्यवाद के विरोधी साम्यवाद का सिपाही कैसे साम्राज्यवाद की सहोदरी सांप्रदायिकता का वरण कर लेता है? इस प्रश्न का जवाब देने से बचने हेतु स्वार्थ-लोलुपता का आरोप लगा देना बेहतर रहता है और वही किया गया है।

चन्द्र्जीत यादव भाकपा छोड़ कर कांग्रेस सरकार में मंत्री बने तब भी यही आरोप था। मित्रसेन यादव  और रामचन्द्र बख्श सिंह भाकपा से अलग हुये तब भी यही आरोप था। लेकिन प्रथम दो चित्रों में उल्लिखित  आरोप पर भी ध्यान देने की नितांत आवश्यकता है। 

'आत्मालोचना ' की चर्चा कम्युनिस्टों में आम बात है। लेकिन दलितों-पिछड़ों की उपेक्षा  से संबन्धित आत्मालोचना की आवश्यकता शायद  उचित नहीं  समझी गई है। डॉ अंबेडकर क्यों नहीं कम्युनिस्ट बन सके इस बात की आत्मालोचना करने के बजाए उनको ही साम्राज्यवाद का पोषक घोषित कर दिया गया है। क्यों डॉ अंबेडकर को यह कहना पड़ा कि हिन्दू के रूप में उनका जन्म न होता यह तो उनके बस में न था किन्तु हिन्दू के रूप में मृत्यु न हो यह उनके बस में है? और इसी लिए मृत्यु से छह माह पूर्व उन्होने 'बौद्ध मत 'ग्रहण कर लिया था। गौतम बुद्ध को क्यों प्रचलित कुरीतियों के विरोध में मुखर होना पड़ा और वे कुरीतियाँ क्यों और किसके हित में प्रचलित की गई थीं इस तथ्य पर ध्यान दिये बगैर केवल 'एथीस्ट' कहने या 'मार्क्स' का जाप करते रहने से भारत में 'साम्यवाद' को स्थापित नहीं किया जा सकता - न ही संसदीय लोकतन्त्र के जरिये और न ही सशस्त्र क्रान्ति के जरिये। यदि पारस्परिक फूट से साम्राज्यवाद 1857 की क्रांति को कुचलने में कामयाब न होता तो महात्मा गांधी को 'सत्य-अहिंसा ' की आवाज़ न बुलंद करनी पड़ती। जब साम्राज्यवाद विरोधी आपस में भिड़ कर खुद को कमजोर करते जाएँगे तब साम्राज्यवाद को खुद को मजबूत करने का अधिक प्रयत्न  भी नहीं करना पड़ेगा और जनता आसानी से गुमराह होती जाएगी। 

देशी-विदेशी कारपोरेट/RSS/मनमोहन गठजोड़ ने बड़ी चालाकी से आ आ पा/केजरीवाल को विकल्प के रूप में साम्राज्यवादी हितों के मद्देनजर खड़ा कर दिया है तथा साम्यवादी दलों में शामिल ' ब्राह्मणवादी ' खुल कर उनका समर्थन कर रहे हैं ।   इसी गुट ने दिवंगत कामरेड जंग बहादुर व कामरेड झारखण्डे राय की मूर्तियों का मुलायम सिंह जी द्वारा अनावरण होने से रुकवा दिया जबकि दिवंगत कामरेड सरजू पांडे की मूर्ती का अनावरण मुलायम सिंह जी द्वारा पूर्व में सम्पन्न हो चुका था। इसके पीछे कौन सी मनोदशा हो सकती है समझना कठिन नहीं है। वैसे एथीस्ट कम्युनिस्ट कैसे मूर्ती-पूजक हो गए? यह भी विचारणीय होना चाहिए क्योंकि 'पदार्थ-विज्ञान ' (MATERIAL-SCIENCE) पर आधारित यज्ञ-हवन का तो मखौल एथीस्ट के नाम पर ही उड़ाया जाता है। 

1925 में जबसे भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रादुर्भाव हुआ है तभी से ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने हितार्थ RSS का गठन इसकी काट के लिए करवा लिया था। 1930 में डॉ लोहिया/जयप्रकाश नारायण/आचार्य नरेंद्र देव की 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' (जिसकी उत्तराधिकारी आज की 'सपा' है) भी कम्युनिस्ट प्रभाव को क्षीण करने हेतु ही गठित हुई थी। डॉ लोहिया और जयप्रकाश जी की मदद से ही RSS भारतीय राजनीति में प्रभावी भूमिका में आ सका है।  2014 में   क्यों केरल की जन्मना ब्राह्मण जयललिता जी को अघोषित  रूप से भावी पी एम बनाने की पहल हुई ? क्यों नहीं उनके बजाए मायावती जी को पी एम बनाने की पहल हुई थी। 2019 का  यह चुनाव एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आ रहा है जब कम्युनिस्ट आंदोलन डॉ अंबेडकर की उपेक्षा के आरोप से उबरने हेतु मायावती  जी का समर्थन करके लाभान्वित होने की कोशिश कर सकता है । 
 क्या एक मार्क्सवादी विचारक जेमिनी गणेशन की पुत्री होने के कारण रेखा साम्यवादी दलों का समर्थन नहीं प्राप्त कर सकती ?

इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में यदि वामपंथी मोर्चा ममता बनर्जी से तालमेल करके चुनाव लड़े तो वहाँ की सभी सीटों पर जीत हासिल कर सकता है । सहृदयता और सादगी की छाप ममता जी में निम्न चित्र में उनकी हस्त-रेखाओं द्वारा स्पष्ट समझी जा सकती है। फिर 2014 की पसंद ब्राह्मण जयललिता के मुक़ाबले 2019 में ब्राह्मण ममता बनर्जी क्यों कुबूल नहीं हो रही हैं ?

2009 में सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाना चाहा था किन्तु मनमोहन जी दुबारा बनने के लिए अड़े हुये थे और भय यह भी था कि वह बदले जाने की स्थिति में भाजपा के समर्थन से डटे रह सकते हैं। बीच में भी जब उनको राष्ट्रपति बनाने की कोशिश हुई तो ममता जी के सहज भाव से प्रेस में कह देने के कारण वह एलर्ट हो गए और जापान से लौटते में विमान में ही पत्रकार वार्ता में कह दिया कि वह जहां हैं वहीं ठीक हैं अर्थात यदि उनको हटाने का प्रयास हुआ तो वह भाजपा के समर्थन से डटे रहेंगे। उन्होने बड़ी चतुराई  से हज़ारे द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा  करवा दिया जिसकी उपज आ आ पा/ केजरीवाल हैं।

यदि मोदी - शाह की जोड़ी ने आर एस एस को ही चंगुल में लेने का प्रयास न किया होता तो आर एस एस नागपुर के सांसद और केंद्रीय मंत्री गडकरी साहब के जरिये उस जोड़ी की आलोचना न करवाता। 2019 के चुनावों में मोदी  - शाह की जोड़ी को हटाने के लिए भाजपा का अल्पमत में आना जरूरी है अन्यथा उनको हटाया न जा सकेगा। इसीलिए राहुल कांग्रेस को अप्रत्यक्ष रूप से आर एस एस का सीमित समर्थन मिलने की संभावना है तभी गडकरी साहब नेहरू जी की प्रशंसा कर रहे हैं और चिदम्बरम साहब गडकरी साहब की।
आर एस एस को भाजपा या कांग्रेस दोनों में किसी एक की सत्ता होने पर कोई दिक्कत नहीं होती है। बंगाल में CPM द्वारा भाजपा से मिल कर TMC को पंचायत चुनावों में परास्त करना आर एस एस के लिए बोनस है,  CPM की जमीन पर भाजपा अध्यक्ष का हेलीकाप्टर उतरना  उसके लिए उत्साहजनक घटना है। लेकिन वामपंथ के लिए यही घटना आत्मघाती सिद्ध होगी। 
यदि साम्राज्यवाद / सांप्रदायिकता का निर्मूलन करना है तो मायावती और ममता बनर्जी को वामपंथ का समर्थन मिलना चाहिए जो आज समय की आवश्यकता है। 

Wednesday, 12 December 2018

इतने भी खुश न होइये कि आगे कांग्रेस के खिलाफ बोलने में शर्म आये ------ सीमा आज़ाद

*उत्तर - प्रदेश भाकपा के वरिष्ठ नेता पाँच राज्यों में भाजपा की हार पर खुशी मना रहे हैं तो मानवाधिकार नेत्री आगाह कर रही हैं कि आज कांग्रेस की जीत पर इतनी खुशी मना कर भविष्य में कांग्रेस के उत्पीड़न व शोषण के विरुद्ध आवाज कैसे उठाएंगे ? .................................
**सुश्री सीमा आज़ाद जी द्वारा दी गई चेतावनी समस्त जनवादी व साम्यवादी विचार - धारा के लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए और आर एस एस की दो - दलीय प्रणाली को कामयाब नहीं होने देना चाहिए। 





उत्तर - प्रदेश भाकपा के वरिष्ठ नेता पाँच राज्यों में भाजपा की हार पर खुशी मना रहे हैं तो मानवाधिकार नेत्री आगाह कर रही हैं कि आज कांग्रेस की जीत पर इतनी खुशी मना कर भविष्य में कांग्रेस के उत्पीड़न व शोषण के विरुद्ध आवाज कैसे उठाएंगे ? 
वस्तुतः भाजपा व कांग्रेस की आर्थिक नीतियाँ एक ही हैं । 1991 में नरसिंघा राव की कांग्रेस द्वारा घोषित मनमोहिनी नीतियों की भूरी - भूरी प्रशंसा न्यूयार्क जाकर एल के आडवाणी यह कह कर की थी कि, कांग्रेस ने उनकी नीतियों को चुरा लिया है। 1980 में सत्ता में पुनर्वापिसी हेतु इन्दिरा गांधी द्वारा आर एस एस का अप्रत्यक्ष समर्थन लिया गया था। तब RSS द्वारा इन्दिरा सरकार को पूर्ण हिन्दू - बहुमत की सरकार बताया जाता था। तभी से श्रम - न्यायालयों में श्रमिकों के विरुद्ध निर्णय पारित किए जाने शुरू हुये थे। 1985 के चुनावों में राजीव गांधी भी आर एस एस के समर्थन से ही प्रचंड बहुमत में आए थे। उनके कार्यकाल में ही बाबरी मस्जिद का ताला खोला गया था और 1992 में नरसिंघा राव के कार्यकाल में उसे ढहा दिया गया था। 1998 से 2004 के कार्यकाल में भाजपा ने ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में प्रशासन में आर एस एस के लोगों को भर दिया था।2011 में आर एस एस, भाजपा, कारपोरेट के समर्थन से जो हज़ारे अभियान चला था उसका उद्देश्य कारपोरेट - भ्रष्टाचार को संरक्षण देना था जिसे तत्कालीन कांग्रेसी पी एम का अप्रत्यक्ष समर्थन भी प्राप्त था । इसी अभियान के रथ पर सवार होकर मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई थी। 
अहंकार के वशीभूत होकर मोदी - शाह ने आर एस एस को ही नियंत्रित करने का प्रयास किया जिसके परिणाम स्वरूप आर एस एस ने उनको सबक सिखाने और कालांतर में उनसे छुटकारा पाने हेतु 1980 व 1985 की तर्ज पर  छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को पूरा - पूरा समर्थन नहीं दिया वरना बिना संगठन के कांग्रेस कैसे जीत पाती ?
कांग्रेस तो अब भी अहंकार में ही थी तभी तो क्षेत्रीय दलों से तालमेल नहीं किया वरना भाजपा राजस्थान व मध्य प्रदेश मेँ बुरी तरह से पराजित हो जाती। कांग्रेस नायक राहुल गांधी द्वारा मंदिर - मंदिर जाकर आर एस एस की हिंदुत्ववादी - कारपोरेट समर्थक नीतियों को मूक समर्थन दिया गया और बदले में आर एस एस का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त किया गया। आर एस एस को भस्मासुर बने  मोदी - शाह से छुटकारा न पाना होता तब तीन राज्यों में कांग्रेस की पुनर्वापिसी भी संभव न होती। 2019 में भाजपा की पुनर्वापिसी की सूरत में मोदी - शाह द्वारा आर एस एस को कब्जाने का खतरा न होता तो आर एस एस को उनका समर्थन करने से भी परहेज न होता। शासन,प्रशासन,पुलिस,सेना,खुफिया संस्थानों सभी जगह आर एस एस के लोग पदस्थापित हो चुके हैं अतः भाजपा विरोधी दलों की सरकार बनने पर भी आर एस एस की पकड़ बनी रहेगी। 
इस संदर्भ में अखिलेश यादव व मायावती को कांग्रेस से सहयोग करते हुये सतर्कता बरतने की जरूरत होगी। 
सुश्री सीमा आज़ाद जी द्वारा दी गई चेतावनी समस्त जनवादी व साम्यवादी विचार - धारा के लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए और आर एस एस की दो - दलीय प्रणाली को कामयाब नहीं होने देना चाहिए। 
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14-12-2018 : 
शासन,प्रशासान ,पुलिस,सेना,खुफिया एजेंसियां और न्यायपालिका सभी जगह आर एस एस के लोग बैठाये जा चुके हैं तभी तो जज साहब फैसले में लिख देते हैं कि उनका विश्वास मोदी में है। 

जजों का विश्वास संविधान व कानून से हट कर एक व्यक्ति - विशेष में हो जाना ' तानाशाही ' की आहट का आभास कराता है। 


आर एस एस ने  जनसंघ के माध्यम से भारत में दो - दलीय प्रणाली को लागू करवाने की मांग उठाई थी। आज सत्ता व विपक्ष दोनों पर अधिकार जमा कर वह निर्णायक की भूमिका में आने को प्रयासरत है। जज साहब का फैसला उसी की एक बानगी भर है। 
( विजय राजबली माथुर )
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13-12-2018 

Wednesday, 22 June 2016

यहाँ उस पार्टी लाईन की ही उपेक्षा हुई, जिसे हमारे पुरोधाओं ने अपने खून पसीने से सींचकर आगे बढ़ाया ------ जगमती सांगवान

Jagmati Sangwan


प्रिय साथियो,
मैं 1986 से सीपीआई एम की सदस्या थी और जीवन में कोई भी व्यक्ति अपनी राजनीति, सिद्धान्तों और मूल्यों के लिए जितना संघर्ष कर सकता है या जो कीमत दे सकता है, वो मैंने ईमानदारी से करने की कोशिश की। लेकिन आज जब मैं एडवा की सचिव थी व केन्द्रीय कमेटी की सदस्या थी, तब पार्टी से इस्तिफा देने की क्या नौबत आ गई, वह मैं अपने साथियों, मित्रों व शुभचिन्तकों के साथ साझा करना चाहती हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरे साथी परेशान हैं व वो जानना चाहते हैं कि मैंने अंदरूनी संघर्ष का रास्ता ही क्यों नहीं अपनाया। परेशान मैं भी अत्याधिक हूं। और हर कोशिश की कि पूरे मसले को पार्टी के अन्दर उपलब्ध तौर तरीकों से ही डील किया जाए। वरना हकीकत में बोलते हुए जिसदिन से सीपीएम ने बंगाल में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने का फैसला किया उसी दिन से आत्मा परेशान थी। क्योंकि हम शुरू से अपने नेताओं से सुनते आए हैं कि बंगाल में ;इसमें व्यक्तियों की बात नहीं है ।वर्ग संघर्ष की राजनीति का इतिहास रहा है, कि वहां कांग्रेस के हाथ हमारे गरीब, प्रतिबद्ध साथियों के खून से रंगे हुए हैं। वर्गीय राजनीति को छोड़ दें तो कांग्रेस में भी कई नेक लोग हो सकते हैं, पर सवाल व्यक्तियों का नहीं है। 
आज आप उसी वर्ग विरोधी राजनीति से हाथ मिला रहे हैं। वो भी भाजपा के खिलाफ नहीं जो वर्ग विरोधी और साम्प्रदायिक दोनों ही है, बल्कि कांग्रेस से टूट कर अलग हुए एक हिस्से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ। केन्द्रीय कमेटी की विशेष बैठक बुलाई गई इस पूरे सवाल पर विमर्श के लिए। पीबी में महासचिव तथा बंगाल के 4 साथियों के अलावा इस लाईन को किसी का भी समर्थन नहीं था। केन्द्रीय कमेटी ने भी दो-तिहाई से भी ज्यादा के बहुमत से उस प्रस्ताव को ठुकराया। लेकिन बंगाल की पार्टी ने फिर भी वही किया। उस वक्त जब हम सवाल उठा रहे थे तो हमें कहा गया कि चुनाव के बाद बोलना, बीच में डिस्टर्ब मत करो। हमने ठीक वैसा ही किया। और एक बात और यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि अगर मेरी ईमानदारी के कोई मायने हैं तो मैंने यह सोचा था कि अगर पार्टी जीत भी जाती है तो भी मैं गलत को गलत कहने में सबकुछ दाव पर लगा दूंगी। दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य से बंगाल की जनता ने भी इस अवसरवादिता को नकार दिया। 
फिर 18-20 जून को केन्द्रीय कमेटी की बैठक हुई। उसमें पोलिट ब्यूरो का ;बहुमत का नोट रखा गया जिसमें इस फैसले को राजनीतिक-कार्यनीतिक लाईन का उल्लं घन बताया गया। मीटिंग में उसे सुनकर बहुत राहत मिली कि आखिर पार्टी सही जगह पर आई। परन्तु उसके साथ-साथ पार्टी महासचिव ने अपना अलग नोट रखा जिसमें उन्होंने कहा कि बंगाल कमेटी द्वारा कांग्रेस के साथ जाने की सारी कवायदें पार्टी के लाईन से मेल भर नहीं खाती तथा यह इसका उल्लंघन नहीं है। बंगाल के दो मुख्य नेता यहां तक बोल गए कि अगर पीबी का नोट माना गया तो वे इस्तिफा दे देंगे। इसके बावजूद केन्द्रीय कमेटी के दो-तिहाई सदस्यों ने इसे पार्टी कार्यक्रम, राजनीतिक-कार्यनीतिक लाईन व केन्द्रीय कमेटी के फैसले का उल्लंघन बताया तथा साथ में उन्होंने इस समझौतावादी रूख से उनके अपने राज्यों में हुए नुक्सान को भी बयां किया। इसके बावजूद बहस को सुनकर पीबी ने जो प्रस्ताव अंत में रखा उसमें बहुमत की भावना के बजाय अल्पमत की भावना को दर्ज करते हुए ‘उल्लंघन‘ को हटाकर ‘मेल नहीं खाता है‘ कर दिया। मतलब राजनीतिक-कार्यनीतिक लाईन से समझौते के लिए किसी की भी जवाबदेही तय नहीं की जाएगी। इस पर कुछ साथियों ने सवाल उठाए व इसे पास नहीं किया, जिनमें मैं भी शामिल थी। साथी जब बोलने की कोशिश कर रहे थे तो उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा था। इसके बाद मुझे अंदरूनी संघर्ष की जगह खत्म लगी। अतः मैंने प्रोटैस्ट करते हुए कहा कि मैं इस व्यवहार के खिलाफ व इस प्रस्ताव के खिलाफ केन्द्रीय कमेटी व पार्टी सदस्यता से इस्तिफा देती हूं।
हमने पार्टी में आते ही यही सीखा था कि हमारी पार्टी लाईन व जनवादी केन्द्रीयतावाद पार्टी की जीवन रेखा है तथा इनसे समझौता व छेड़छाड़ सबसे बड़ा अपराध है। सबसे बड़े अपराध की जवाबदेही तक अगर तय न हो तो इसे हजम कैसे किया जा सकता है? आज पार्टी में अपने ही राजनीतिक सिद्धान्तों से समझौता करने की प्रवृत्तियों से पार्टी व उसकि राजनीति को बचाने की जरूरत है। और मैंने वही किया है सभी उपयुक्त नाॅर्म और फोरम का प्रयोग करते हुए। पार्टी कार्यक्रम, पार्टी लाईन व केन्द्रीय कमेटी के फैसले को यूं तोड़ने की गलती को कोई गलती न माने और उसे हजम करने के रास्ते पर चलने का काम करे तो ये उनका अपना फैसला हो सकता है। लेकिन मैं ये नहीं कर पाई व न ही करूंगी। ये कोई भावुकता या गुस्से का सवाल नहीं है। 
मैं पार्टी कारयकर्म से मतभेद नहीं रखती । पर यहाँ उस पार्टी लाईन की ही उपेक्षा हुई, जिसे हमारे पुरोधाओं ने अपने खून पसीने से सींचकर आगे बढ़ाया व आज भी हमारे हज़ारों प्रतिबद्ध साथी वही काम कर रहे हैं। मैं उनके उस जज्बे को उसी जज्बे के साथ सलामी देना चाहती हूं चाहे कितनी भी बड़ी कीमत देनी पड़े।
जगमती सांगवान
21 जून, 2016

https://www.facebook.com/jagmati.sangwan/posts/738711109603548

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27-06-2016 

Sunday, 1 February 2015

प्रगतिशील विचार मिल कर पूंजीवाद के खिलाफ ताकतवर न हो जायँ : आप जैसी राजनैतिक पार्टी को जन्म दे दिया गया है---जगदीश चंद्र




01 Feb.2015 · Delhi ·
मित्रों कांग्रेस और बी जे पी की विचारधारा में १९ -२० का अंतर है, एक १९ है तो दूसरा २० हैं और वर्तमान में नए राजनीतिक दल को अगर मानते हैं तो उसे आप के रूप में २१ मान लें, , यानी १९ - २० - २१ ये तीनों एक ही विचार धारा के तीन रूप हैं ? दोस्तों समाजवाद के भय और भूत से कांग्रेस के पीछे लगे पूंजीपतियों के संगठन जो पूंजीपति दुनिया में प्रगतिशील विचारों के विरोधी हैं उन्होंने अपने अंतर्मन से सोचा की कांग्रेस को प्रगतिशील पिछड़ों , दलितों और कम्युनिस्टों का समर्थन मिल रहा है, और साथ ही साथ, देश में कांग्रेस के सहयोग से कम्युनिस्ट विचारधारा तेजी से बढ़ रही हैं, पूंजीपतियों में संशोधनवादी और प्रगतिशील विचारधारा के लोग भी हैं, इस लिए यह पूंजीवाद के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं, इस भूत के भय से पहले तो आम जनता का संगठन बनाकर उसके माध्यम से २०११ से ही यानी २०१४ के लोक सभा के चुनाओं से पूर्व , दो तीन साल पहले से ही जनता को गुमराह करने वाले तथाकथित जन आंदोलन चलाये जाते रहे, जबकि इस प्रकार के अपराध पहले से ही जारी थे, दरशल हो यूँ रहा था कि , कांग्रेस और उसके कार्यों से विशेषकर कांग्रेस की विदेश नीति के समर्थन से देश के प्रगतिशील विचारधारा के लोग, जैसे,पिछड़े, दलितों और कम्युनिस्टों तथा समाजवादियों का समर्थन पाते जा रहे हैं, और कम्युनिस्ट तेजी से भी बढ़ भी रहे थे ? कम्युनिस्ट क्योंकि कांग्रेस की समाजवादी मुल्कों से सहयोग, और यूं ० एन ० ओ ० और उसकी सुरक्षा कौंसिल में अधिकतर मामलों में कम्युनिस्ट मुल्कों तब का सोवियत संघ वर्तमान में रूष , चीन और दुनिया के अन्य समाजवादी मुल्कों के साथ रहने की नीति के कारण सरकार को बाहरी समर्थन देते थे भारत के कम्युनिस्ट भी इस लिए समर्थन करते थे, क़ि दुनिया के गरीब और कमजोर मुल्क धीरे धीरे समाजवादी खेमे का बहुमत बना सकें, और सुरक्षा कौंसिल में एक दिन प्रभुत्व पा सकें, इन्ही विचारों के मध्यनजर प्रगतिशील पिछड़े और, दलित कम्युनिस्ट विचार धारा का समर्थन करते थे, यूं ० एन ० ओ ० की सुरक्षा कौंसिल में अनेक मुल्को पर आक्रमण के फैसलों के खिलाफ रूष और चीन ने तटस्थता की भूमिका निभाई ? तब प्रगतिशील विचारधारा के पूंजीपति ने सोचा कि कुल मिला कर भविष्य में समाजवाद से जुड़े यही प्रगतिशील विचार मिल कर पूंजीवाद के खिलाफ ताकतवर न हो जायँ और कम्युनिस्ट पूंजीवाद पर हावी न हो जाय, इस भूत के भय के कारण पहले से ही धीरे धीरे जनता के आंदोलन से ही आप जैसी राजनैतिक पार्टी को जन्म दे दिया गया है, वह भी ऐसे आंदोलन खड़ा करके क़ि जो अपराध आरम्भ से बड़ी संख्या में होते आ रहे थे, और यह आंदोलन कांग्रेस की सरकार के पहले दौर २००४-२००९ के समय में भी हो सकते थे, क्योंकि यदि यह आंदोलन तब होते तो तब बी ० जे ० पी ० को जनता का इतना समर्थन नहीं था, वह तो एक लम्बे समय में ग्राउंड बनाने की तैयारी कर रहे थे, जबकि २०१४ के चुनाव होने के पश्चात वर्तमान एन०डी०ए० सरकार में इसी प्रकार के अपराध, उससे भी तेजी और अनुपात के आंकलन से माह के हिसाब से अधिक संख्या और अधिक % में हो रहे हैं, जबकि बहुत से मामले प्रकाश में नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि प्रचार माध्यम बहुत से मामलों को इस वर्तमान सरकार को बचाने की साजिस के तहत छुपा रहा है, या घटना को दुसरे रूप में प्रचारित कर रहा है, वैसे चुनाव से पूर्व से ही कांग्रेस पर तो भयंकर आरोप लगाने की प्रक्रिया या दाग लगाने की साजिस तो लगातार चल ही रही थी , वैसे मेरी तो धारणा निश्चित रूप से यह मानती है, कि कट्टरवाद अधिक समय ज़िंदा नहीं रहता, किसी भी प्रकार का कट्टरवाद अपराध का ध्योतक है, यानी काठ की हांडी ज्यादा समय चूल्हे पर नहीं टिक सकती, यह बरसाती मेंढक के सामान है, और दुसरे बहुमत की जनता का अंतर्मन से बी जे पी पर अधिक भरोषा नहीं है, क्योंकि १९९८ - २००४ एन ० डी ० ए ० का वाजपेयी दौर एक अशफल काल रहा इसी कारण वाजपेयी के नेतृत्व में एन ० डी ० ए ० की असफलता के कारण पुनः खड़े नहीं किये गए, क्योंकि ठीक २००४ में बुरी तरह हारने के पश्चात बी ० जे ० पी ० हाशिये से मिट सकती थी, किन्तु तथाकथित पूंजीवाद तो ऐसा नहीं चाहता था, वह तो आक्रोश में वर्तमान चुनाव २०१४ में कांग्रेस के खिलाफ लोक सभा चुनाव में पूंजीपतियों द्वारा अंधा प्रचार, और असीमित धन बल के सहयोग से एन ० डी ० ये ० यानी बी जे पी को सत्ता में बैठाना था, ताकि भ्रमित करने वाले धर्म के खिलाफ, समाजवाद यानी कम्युनिज्म को हासिये में ला सकें, क्रांतिकारियों के इस शेर से कि हम को मिटा सके यह जमाने में दम नहीं ज़माना हम से है जमाने से हम नहीं , अन्यथा जिस प्रकार कांग्रेश के खिलाफ जनता आक्रोशित थी, उससे तो कांग्रेस के खिलाफ एक गधा भी खड़ा हो जाता तो वह चुनाव निश्चित ही जीत जाता, और फिर अप्रैल २०१४ के चुनाव के पश्चात आज फरवरी २०१५ तक जीतने के बाद से आज तक हो क्या रहा है, वही जो कांग्रेस के सासन काल में चल रहा था, क्योंकि आम जनता जो जागरूक है, वह बी जे पी को सामंतवादी विचारधारा का समर्थक , सम्प्रदायवाद,(साम्प्रदायिक) और धार्मिक कट्टरवाद से जोड़ती है, यदि जनता एक दम से बी ० जे ० पी ० के खिलाफ हो जाएगी, तो दूसरा , तीसरा विकल्प पहले से तैयार रहना चाहिए , इस तरीके से तथाकथित पूंजीवाद के दो मकसद पूरे होते हैं, एक तो कांग्रेस को हमेशा ही रास्ते से साफ़ करने की उनकी साजिश सफल होती है ताकि उसके समर्थक विशेषकर कम्युनिस्ट , भविष्य में उसके सहयोग से कुछ हाशिल न कर सकें और दुसरे , कांग्रेस के समर्थक कटघरे में खड़े होते है, इस लिए तथाकथित पूंजीवाद ने पहले से ही दूसरा विकल्प तैयार कर लिया है , ताकि भविष्य में बी जे पी के अशफ़ल होने से आप जैसी भोली भाली जनता के विचारों की एक नयी राजनैतिक पार्टी भविष्य के राजनितिक मंच के लिए तैयार रहे, और प्रगतिशील विचारों का विरोधी पूंजीवाद का तथाकथित प्रजातंत्र बनाम गणतंत्र पर शोषण, जुल्म , अत्याचार ,लूट खसोट, और दमन जारी रहे ?

Thursday, 19 December 2013

क्या कम्युनिस्ट 'आप' के खतरे को पहचानेंगे?






कितना सटीक है यह कथन कि 'एक मूर्ख को सही बात बताना गलत है वह इस पर घृणा करेगा'। आजकल क्या बुजुर्ग पत्रकार, क्या उतावले कम्युनिस्ट सभी एक स्वर से 'आप'/केजरी भक्ति में तल्लीन हैं जैसे उन्होने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है और उनको अब कुछ नहीं चाहिए। इनको मधुकर दत्तात्रेय उर्फ बाला साहब देव रस की तिकड़म सफल होने पर खुशी हो रही है। पहले केवल 'जनसंघ' ही RSS का राजनीतिक विंग था फिर 1980 में आपात काल के दौरान देवरस/इन्दिरा के मध्य हुये 'गुप्त समझौते'के अंतर्गत कांग्रेस में संघियों की पैठ हुई और इंदिराजी की सत्ता वापिसी भी। कालांतर में 'जनसंघ' को जनता पार्टी में विलीन करके समाजवादियों में भी संघ की पैठ बना ली गई जो 'भाजपा' में स्पष्ट देखी जा सकती है। पूर्व सोशलिस्ट सुषमा स्वराज जी आज भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं। जब कांग्रेस और भाजपा दोनों की पोल खुलने लगी तो संघ ने हज़ारे/केजरी को आगे करके एक नया प्रयोग/विकल्प खड़ा किया जिसकी परिणति 'आप' है। अब यदि कुछ कम्युनिस्ट भी 'आप' के गीत गाते हैं तो समझना चाहिए कि या तो वे निकट अतीत से अपरिचित हैं या फिर उनके निजी स्वार्थ अब संघ के साथ जाने में हैं। 'उत्पादन और वितरण के साधनों पर समाज का स्वामित्व 'चाहने वाला कोई भी व्यक्ति कारपोरेट/RSS के चहेते 'आप' की वकालत नहीं कर सकता।

क्या है देवरस तिकड़म?

माधव राव सदाशिव गोलवलकर अपने जीवन काल में केंद्र में संघ को सत्ता पर जब काबिज न करा सके तो उनके उत्तराधिकारी मधुकर दत्तात्रेय देवरस ने शहरों के 2 प्रतिशत और गांवों के 3 प्रतिशत वोटों के सहारे संघियों को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाने का नया सूत्र खोजा था । आपातकाल की गिरफ्तारी के दौरान उन्होने इंदिराजी से एक गुप्त सम्झौता किया जिसके अनुसार उनको समर्थन देकर अपना एजेंडा कार्यान्वित करवाने का भरोसा उनको मिला। 1980 में पहली बार RSS के शुद्ध समर्थन से इन्दिरा कांग्रेस की सरकार बनी और 'समाजवाद' की नीति का परित्याग हुआ। 'श्रम न्यायालयों'में श्रमिकों के विरुद्ध फैसले सुनाये जाने की प्रक्रिया इसी का प्रतिफल थी। 1984 में भी संघ का समर्थन इन्दिरा कांग्रेस को मिला जिसके फलस्वरूप  राजीव गांधी  ने बाबरी मस्जिद/रामजन्म भूमि का ताला खुलवा कर पूजा प्रारम्भ कारवाई। 1992 में पूर्व संघी एवं इन्दिरा कांग्रेसी प्रधानमंत्री के आशीर्वाद से कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद को ढहवा दिया। 

1996 में 13 दिनी सरकार के गृह मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने संघ को घेरने वाली तमाम फ़ाईलो को जलवा डाला। 1998 से 2004 तक के गृह मंत्री आडवाणी ने पुलिस,सी बी आई आदि-आदि में संघियों को भर्ती करा दिया। आज के अनेक जांच परिणाम इसी सांप्रदायिक सोच को दर्शाते हैं। यही नहीं सेना मे भी संघी सोच के लोग प्रविष्ट करवाए गए। 

प्रो . बलराज माधोक ने तो खुल कर भाजपा को कांग्रेस की 'बी' टीम बताया ही था दोनों की सरकारों द्वारा समान नीतियाँ अपनाने से जब जनता को भी ऐसा ही आभास होने लगा तब शातिर संघियों ने देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों के सहयोग से NGOs का मोर्चा 'आप' पार्टी के रूप में गठित करा दिया जो NGOs एवं कारपोरेट घरानों को 'लोकपाल'के दायरे से मुक्त रखने का ज़बरदस्त अभियान चलाये है और अभी सफल भी है। 

भ्रष्टाचार के जनक उद्योगपति/व्यापारी,IAS/IPS होते हैं और इनकी ही पत्नियाँ अधिकांश NGOs की संचालक हैं। स्पष्ट है कि 'आप' पार्टी श्रमिकों/किसानों का शोषण करने वाले व्यापारियों/उद्योगपतियों एवं उनके सहयोगी IAS/IPS का बचाव करने वाली पार्टी है न कि आम जनता की हितैषी। इस सबके बावजूद जो लोग खुद को 'कम्युनिस्ट' बताते हुये भी 'आप' का घोषणा-पत्र प्रचारित कर रहे हैं उसकी वकालत कर रहे हैं तो साफ है कि वे RSS को ही संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। 

एक ओर कम्युनिस्ट खुद परस्पर बंटे हुये हैं उस पर उनके बीच ऐसे संघियों का प्रवेश भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों का एक भयावह संकेत प्रस्तुत करता है। पुलिस,सेना,विभिन्न सरकारी विभागों में बैठे संघी भाजपा,कांग्रेस,आप के संघियों की खुल कर मदद करेंगे तथा कम्युनिस्टों के बीच घुस आए संघी तोड़-फोड़ करेंगे। तब एकमात्र मार्ग हिंसक और रक्त-रंजित क्रांति का ही बचेगा जैसा कि 'नया ज़माना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने RSS प्रचारक लिंमये से दिल्ली में कहा था और अपने एक समपादकीय मे इसका उल्लेख किया था। 

1925 में स्थापित सर्वाधिक पुराने राजनीतिक दल 'भाकपा' जिसने संसदीय लोकतन्त्र को अख़्तियार किया है से यह अपेक्षा है कि आगे आ कर संसदीय लोकतन्त्र की रक्षा हेतु समस्त कम्युनिस्ट शक्तियों को एकजुट करे व अपने बीच से संघियों की छुट्टी करे। अन्यथा आने वाले समय में भूखी जनता जब क्रांति करेगी तो नेतृत्व छोटे-छोटे गुटों के हाथ में होगा। भाकपा को उनका अनुसरण करना तब मजबूरी होगी। अभी समय है कि 'आप' के समर्थकों से पार्टी किनारा कर ले। 
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