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Sunday, 26 January 2025

संविधान और लोकतन्त्र समर्थक ताकतों को सावधान रहना होगा: ----- डा॰ गिरीश

 मौजूदा संविधान को हटा कर हिन्दू राष्ट्र का संविधान लागू करने की योजना घातक


राष्ट्रीय और सान्स्क्रतिक एकता के प्रतीक महाकुंभ को भाजपा ने अपनी घ्रणित राजनीति का अखाड़ा बनाया


लखनऊ- 25 जनबरी 2025, कल 26 जनबरी को जब सारा देश आजाद भारत के संविधान को लागू करने का दिवस- ‘गणतन्त्र दिवस’ मनाने जा रहा है, उससे पहले ही मौजूदा संविधान को हटा कर एक अलग ‘हिन्दू राष्ट्र का संविधान’ लागू करने की साजिशें अब खुल कर सामने आ गयी हैं। यदि लोकतान्त्रिक और संविधान समर्थक ताक़तें अब भी सावधान न हुयीं तो जल्दी ही मौजूदा धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राज्य प्रणाली को अपदस्थ कर कथित तौर पर धर्म आधारित सामंती प्रणाली को देश के ऊपर थोप दिया जायेगा। और यह राज्य पूरी तरह एक फासिस्टवादी राज्य बन जायेगा।


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डा॰ गिरीश ने एक प्रेस बयान में आरोप लगाया कि राष्ट्रीय और सान्स्क्रतिक एकता के प्रतीक ‘महाकुंभ’ को भाजपा और संघ परिवार ने अपनी घ्रणित विभाजनकारी राजनीति का अखाड़ा तो बना ही दिया है, अब वहाँ से मौजूदा संविधान को हटा कर हिन्दू राष्ट्र संविधान लागू करने की तैयारियों संबंधी खबरें सामने आयी हैं।


एक प्रमुख हिन्दी दैनिक में प्रकाशित विस्त्रत समाचार के अनुसार “अखंड हिन्दू राष्ट्र का पहला संविधान तैयार हो चुका है।“ महाकुंभ में इसे तीन फरबरी को वसंत पंचमी के दिन देश की जनता के सामने रखा जायेगा और चारों पीठ के शंकराचार्यों की सहमति के बाद इसे केन्द्र सरकार को भेजा जायेगा। 501 पन्नों के संविधान को मनुस्म्रति और सामंतकालीन अन्य ग्रन्थों के आधार पर तैयार किया गया है।


इस कथित संविधान के निर्माण से जुड़े उच्च पदस्थ संत के अनुसार 2035 तक हिन्दू राष्ट्र की घोषणा का लक्ष्य रखा गया है। कथित संविधान के कुछ अंशो के सामने आने पर ही स्पष्ट हो जाता है कि यह देश पर धर्म आधारित तानाशाही लादने का प्रयास है। इसमें एक सदनात्मक व्यवस्थापिका होगी, सदन का नाम हिन्दू धर्म संसद होगा, सांसद का नाम धर्म सांसद होगा, धर्म सांसद के लिये न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष तथा मतदाता के लिये 16 वर्ष निर्धारित की जायेगी।


इतना ही नहीं सभी स्तरों के विद्यालयों व विश्वविद्यालयों को गुरुकुलों में बदल दिया जायेगा और राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव इन गुरुकुलों से ही होगा जिसमें सामान्य नागरिक के लिये  कोई स्थान नहीं होगा। हिन्दू राष्ट्र में हिन्दू न्याय व्यवस्था लागू की जायेगी। सभी स्तर के न्यायधीश राष्ट्राध्यक्ष के नियंत्रण में होंगे। मदरसे बंद किए जायेंगे। मनु एवं याज्ञवल्क्य की स्म्रतियों को लागू किया जायेगा। पिता की म्रत्यु के बाद श्राध्द कर्म करने वाला ही उसकी संपत्तियों का उत्तराधिकारी होगा। इस संविधान में कोई संशोधन भी नहीं किया जा सकेगा। आदि आदि।


डा॰ गिरीश ने कहा कि मंदिर आंदोलन की भी इसी प्रकार रूपरेखा तैयार की गयी थी। जिसका परिणाम सबके सामने है कि भाजपा देश के सत्ताशिखर पर काबिज है और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं को मनमाने तरीके से रौंद रही है। हो सकता है कि आगामी दिनों में भाजपा द्वारा साधु- संतों को आगे कर इस कथित संविधान को लागू करने का अभियान चलाया जाये और उसके फासिस्टी मंसूबों को अमल में लाया जाये। यही वजह है कि संविधान की मर्यादाओं को किनारे कर प्रधान मंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और डबल इंजन सरकार ने कुम्भ को भाजपा और संघ की राजनीति का अखाड़ा बना दिया है।


यदि भाजपा और संघ का इस कथित संविधान से कोई संबंध नहीं तो उन्हे स्पष्टीकरण देना चाहिये। और उनकी डबल इंजन सरकार को कुम्भ के परिसर को ऐसी किसी गतिविधि से मुक्त रखने को ठोस कदम उठाने चाहिये। उसके मौन को उसका समर्थन माना जायेगा।


लोकतान्त्रिक शक्तियों और आमजन को संविधान और लोकतन्त्र को बचाने  के लिये भाजपा और संघ के मंसूबों को विफल करना होगा।


डा॰ गिरीश, राष्ट्रीय सचिव


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी   

Thursday, 27 December 2018

क्या मोदी - शाह की भाजपा का जहाज डूब रहा है ? ------ आरफा खानम शेरवानी




 Dec 26, 2018
( https://www.youtube.com/watch?v=4XlohaPjod4 )
बीजेपी के काम-काज पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के हालिया बयानों पर चर्चा करते हुये ‘द वायर’ की सीनियर एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी कह  रही हैं कि, नितिन गडकरी उस नागपुर से सांसद हैं जहाँ आर एस एस का हेड क्वार्टर है और वह भाजपा के पूर्व अध्यक्ष हैं जो मोदी - शाह विरोधी उन भैया जी जोशी के करीबी हैं जो मोहन भागवत के बाद द्सरे प्रभावशाली नेता हैं।
तमाम उद्धरणों के जरिये आरफा खानम ने याद दिलाया है कि, मराठा आंदोलन के समय से जो मुखरता नितिन गडकरी ने अपनाई है उसी पर चल रहे हैं भले ही फिर यह भी कह देते हैं कि उनके कहने का आशय वह नहीं था जो लिया गया है। एज आफ यूथ के कार्यक्रम में बोलते हुये आरफा खानम यह भी कह चुकी हैं कि 2019 के चुनाव में कांग्रेस समेत वर्तमान विपक्ष की सरकार बनने के बाद भी आर एस एस प्रशासन में प्रभावशाली बना रहेगा।
संदर्भ ------ https://www.youtube.com/watch?v=V0as-C8Tm6k  
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वस्तुतः आरफा खानम शेरवानी का विश्लेषण यथार्थ की अभिव्यक्ति ही है। 
जनसंघ के माध्यम से आर एस एस भारत में भी यू एस ए व यू के की भांति दो पार्टी पद्धति की वकालत करता रहा है। 1980 के लोकसभा चुनावों में आर एस एस ने नवगठित भाजपा के बजाए इन्दिरा कांग्रेस को समर्थन दिया था। इन्दिरा जी की उस सरकार को पूर्ण हिन्दू बहुमत से बनी सरकार की संज्ञा दी गई थी। 1985 में राजीव गांधी को भी आर एस एस का समर्थन मिला था और इसी लिए 1989 में उनके द्वारा अयोध्या के विववादित ढांचे का ताला खुलवाया गया था। 1998 से 2004 तक के भाजपा शासन में प्रशासन,सेना,पुलिस,खुफिया एजेंसियों में आर एस एस के लोगों की भरपूर घुसपैठ करा दी गई थी। 1977 की मोरारजी सरकार के समय भी विदेश और संचार मंत्रालयों में आर एस एस के लोग दाखिल कराये जा चुके थे। 
2014 से अब तक शिक्षा संस्थाओं, संवैधानिक संस्थाओं समेत लगभग पूरी सरकारी मशीनरी में आर एस एस के लोग बैठाये जा चुके हैं। अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि, पी एम भाजपा का है या कांग्रेस का या किसी अन्य दल का। मोदी - शाह की जोड़ी न सिर्फ भाजपा संगठन पर मनमाने तरीके से काबिज थी बल्कि आर एस एस को भी काबू करने की कोशिशों में लगी थी इसी वजह से आर एस एस को उनका विरोध कराना पड़ रहा है क्योंकि भाजपा को बहुमत मिलने की दशा में इस जोड़ी को हटाना संभव नहीं होगा बल्कि यह आर एस एस को भी कब्जा लेगी। 2013 में कोलकाता में घोषित योजना से ( जिसके अनुसार दस वर्ष मोदी को पी एम रहना था और फिर योगी को बनाया जाना था ) हट कर आर एस एस अब राहुल कांग्रेस को गोपनीय समर्थन दे रहा है जिससे भाजपा विरोधी सरकार 2019 में सत्तारूढ़ होने से मोदी - शाह जोड़ी से संघ को छुटकारा मिल जाये। संघ अब सत्ता और विपक्ष दोनों को अपने अनुसार चलाना चाहता है। 
संघ विरोधियों विशेषकर साम्यवादियों व वामपंथियों को संघ की इस चाल को समझते हुये तीसरा मोर्चा के माध्यम से स्वम्य  को मजबूत करना चाहिए। 


------ विजय राजबली माथुर  
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Monday, 18 June 2018

आ आ पा ( AAP ) को समर्थन देने वाले मोदी और भाजपा को मजबूत कर रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर







समाजशास्त्र (सोशियोलाजी ) में ज़िक्र आता है कि, प्राचीन समाजों के इतिहास का अध्यन  करने हेतु प्रतीकों  का अवलोकन करके निष्कर्ष निकाला जाता है। हालांकि, आधिकारिक  रूप से पुष्टि तो इसकी भी नहीं की जा सकती है। बी ए के कोर्स की पुस्तक में दो उदाहरण देकर इसे सिद्ध किया गया है।
 ( 1 ) जंगल में धुआँ  देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, आग लगी है। 
( 2 ) किसी गर्भिणी को देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, संभोग हुआ है। 
जबकि आधिकारिक रूप से कहने के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है किन्तु ये अनुमान बिलकुल सटीक होते हैं। 
 साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के स्वार्थ लोलुप लोग आसानी से आर एस एस की चाल का शिकार खुद - ब - खुद बन चुके हैं । ऐसे लोग न घर के होते हैं न घाट के।
 सन 2011 में जब राष्ट्रपति चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी  और मनमोहन सिंह जी को राष्ट्रपति बना कर प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाने की कवायद शुरू हुई तब जापान की यात्रा से लौटते में विमान में सिंह साहब ने पत्रकारों से कहा था कि , वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि , तीसरी बार भी पी एम बनने के लिए प्रस्तुत है। जब सोनिया जी इलाज के वास्ते विदेश गईं तब सिंह साहब की प्रेरणा से हज़ारे / रामदेव आदि ने कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण में जनलोकपाल आंदोलन खड़ा कर दिया जिसका उद्देश्य संघ / भाजपा / कारपोरेट जगत को लाभ पहुंचाना था। आज की एन डी ए  सरकार के गठन में सौ से भी अधिक भाजपाई बने कांग्रेसियों का प्रबल योगदान है। 
जनसंघ युग में ब्रिटेन व यू एस ए की तरह दो पार्टी शासन की वकालत उनका उद्देश्य था। उस पर अमल करने का मौका उनको अब मिला है जब भाजपा केंद्र की सत्ता में और आ आ पा उसके विरोध की मुखर पार्टी के रूप में सामने है। 
आ आ पा का उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी,अंबेडकरवादी आदि समेत सम्पूर्ण विपक्ष को ध्वस्त कर खुद को स्थापित करना है। भाजपा के विपक्ष में आ आ पा और आ आ पा के विपक्ष में भाजपा को दिखाना आर एस एस की रणनीति है। बनारस में मोदी साहब को आसान जीत दिलाने के लिए केजरीवाल साहब ने वहाँ पहुँच कर भाजपा विरोधियों को ध्वस्त कर दिया था और पुरस्कार स्वरूप दिल्ली में थमपिंग मेजारिटी से उनकी सरकार का गठन हो गया तथा कांग्रेस समेत सम्पूर्ण विपक्ष ध्वस्त हो गया। 
अभी भी जो लोग आ आ पा में विश्वास बनाए रखते हैं वे वस्तुतः अप्रत्यक्ष रूप से मोदी और भाजपा को ही मजबूत बनाने में लगे हुये हैं। 
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Tuesday, 8 March 2016

विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ------ राजेंद्र शर्मा


जेएनयू में छात्रों के एक ग्रुप के 9 फरवरी के जिस आयोजन के नाम पर, मोदी सरकार और संघ परिवार ने अपने सभी विरोधियों और सबसे बढ़कर वामपंथ को देशद्रोही दिखाने की जबर्दस्त मुहिम छेड़ी है, उस आयोजन को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। बेशक, इस क्रम में अफजल गुरु की फांसी की सजा के विरोध को जिस तरह देशद्रोह बनाने की कोशिश की गई है, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी भी प्रकार के नारे लगाने भर को राजद्रोह नहीं माना जा सकता है। वास्तव में इस संबंध में तो देश का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्टï राय दे चुका है और बाकायदा हिंसा के लिए फौरी उकसावे की शर्त लगा चुका है। फिर भी, उक्त आयोजन को लेकर सरकार समेत संघ परिवार की ''देशद्रोह के नमूनेÓÓ की निर्मिति खुद गंभीर संदेहों के घेरे में है। इन संदेहों के दो-तीन तत्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पहला, तथ्य जो खासतौर पर दिल्ली सरकार द्वारा कराई गई पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जांच से सामने आया है, यह है कि उक्त आयोजन के लिए दो टेलीविजन चैनलों के कैमरों को विशेष रूप से और निजी तौर पर बुलाया गया था। इनमें से एक चैनल को तो बाद में उक्त कार्यक्रम की रिकार्डिंग के साथ छेड़छाड़ कर के कन्हैया के मुंह से नारे लगवाने वाला फर्जी वीडियो बनाने के लिए, रंगे हाथों पकड़ा भी गया है। यह दूसरी बात है कि भाजपा सरकार के आशीर्वाद से इसके बावजूद, इस चैनल को कोई नोटिस तक नहीं मिला है, फिर दूसरों को वीडियो के साथ फर्जीवाड़ा न करने का सबक देने वाली कोई सजा दिए जाने का तो सवाल ही कहां उठता है। विश्वविद्यालय सिक्युरिटी के परिसर में प्रवेश के रिकार्ड के अनुसार, इन चैनलों को प्रस्तावित आयोजन से काफी पहले और जेएनयू के एबीवीपी नेताओं द्वारा बुलाया गया था।
इससे कम से कम एक बात तो निर्विवाद रूप से साबित हो ही जाती है। 9 फरवरी को जेएनयू में जो कुछ हुआ, स्वत:स्फूर्त नहीं था। उसके लिए कम से कम उन लोगों की तरफ से पूरी तैयारी थी, जिन्होंने बाद में इसे जेएनयू के खिलाफ हमले का हथियार बनाया। क्या टेलीविजन चैनल इस पूर्व-नियोजित टकराव को, संघ-एबीवीपी के पक्ष से दर्ज करने के लिए ही बुलाए गए थे? आखिरकार, 'देशभक्तों बनाम देशद्रोहियों के युद्घÓ के भोंडे रूपक के प्रचार के जरिए,  इस रिकार्डिंग का जेएनयू के छात्र आंदोलन को बदनाम करने में तो उपयोग किया ही जा सकता था। पहले पुणे फिल्म तथा टेलीविजन इंस्टीट्यूट, फिर मद्रास आईआईटी पेरियार-आंबेडकर स्टडी सर्किल, फिर गैर-नैट छात्रवृत्ति बंद किए जाने के खिलाफ आक्यूपाई यूजीसी और अंतत: रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या, हरेक मामले में मोदी सरकार और उसकी शिक्षा मंत्री के कदमों के खिलाफ संघर्ष के अगले मोर्चे पर रहे जेएनयू के वामपंथी छात्र आंदोलन पर अंकुश लगाना जरूरी था।
लेकिन, लगता है कि खेल शायद इससे भी बड़ा था। एबीवीपी के बुलाए वफादार चैनलों की रिकार्डिंग के माध्यम से सत्तापक्ष तथा उसके द्वारा नियंत्रित शासन-प्रशासन के पास, 9 फरवरी को जो कुछ हुआ था, उसकी साक्ष्यों समेत पूरी जानकारी शुरु से ही थी, जिसमें आपत्तिजनक नारे लगाने वालों से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। इसके बावजूद, पहले एबीवीपी व भाजपा सांसद की शिकायत के माध्यम से सिर्फ आपत्तिजनक नारों को उछाला गया और उनके लिए छात्रसंघ के अध्यक्ष व महासचिव समेत, वामपंथी छात्र नेताओं के मुंह में ये नारे रखने की कोशिश की गई। इनका झूठ अब बाकायदा पकड़ा जा चुका है।  लेकिन, कन्हैया की गिरफ्तारी से लेकर अब जमानत पर रिहाई तक, पिछले इतने घटनापूर्ण करीब चार हफ्तों में पुलिस, न सिर्फ उक्त नकाबपोशों को पकड़ नहीं पाई है बल्कि उनकी किसी तरह से पहचान तक नहीं कर पाई है। वास्तव में पुलिस इस सच्चाई को देखकर भी नहीं देखना चाहती है कि कोई बाहरी नकाबपोश थे, जिन्होंने उक्त आपत्तिजनक नारे लगाए थे।
इसका सबसे उदार अर्थ तो यही हो सकता है कि सरकार की और इसलिए उसकी पुलिस की भी दिलचस्पी, वास्तव में न तो उक्त राष्टï्रविरोधी नारों में थी और न उक्त नारे लगाने वालों को देश के कानून के तहत बनने वाली सजा दिलाने में। उनकी दिलचस्पी तो जेएनयू छात्र आंदोलन, जेएनयू और उसके बहाने से विपक्ष तथा विशेष रूप से वामपंथ को देशविरोधी प्रचारित करने में थी और यह उद्देश्य पूरा हो चुका है। लेकिन, इससे एक और गंभीर आशंका भी पैदा होती है। कहीं मौके पर संघ के वफादार टेलीविजन कैमरों की ही तरह, देश तोडऩे के नारे लगाने वाले नकाबपोशों की उपस्थिति भी प्रायोजित और इसलिए एक बड़े षडय़ंत्र का हिस्सा तो नहीं थी? बेशक, नवउदारवाद के इस जमाने में बार-बार कहकर 'षडय़ंत्र सिद्घांतÓ को इतना बदनाम कर दिया गया है कि ऐसे षडय़ंत्र की ओर इशारा करते हुए भी हिचक होती है। लेकिन, सच्चाई यह है कि दुनिया भर में सत्ताधारी ताकतेें, एजेंट प्रोवेकेटियरों का ऐसा उपयोग करती आई हैं और आज भी कर रही हैं।
वास्तव में इसी बीच सामने आई इशरत जहां प्रकरण को नया रंग देने की सारी कोशिशों के बावजूद, पूर्व-गृह सचिव जीके पिल्लै ने चिदंबरम तथा कांग्रेस को मुश्किल में डालने की कोशिश करते हुए भी, इस पूरे प्रकरण के खुफिया ब्यूरो का एक ''कंट्रोल्ड आपरेशनÓÓ होने की बात मानी है। सुरक्षातंत्र की भाषा के जानकारों के अनुसार, इस मामले में कंट्रोल्ड ऑपरेशन का संक्षिप्त अर्थ है—बहकाकर बुलाना और खत्म कर देना! हालांकि यह सोचकर दहशत होती है, फिर भी सच यही है कि जो खुफिया एजेंसियां एक कॉलेज छात्रा समेत चार लोगों को, उनकी पृष्ठïभूमि कुछ भी हो, फंसाकर षडय़ंत्रपूर्वक मौत के घाट उतार सकती हैं और इससे सत्ताधारी नेताओं की हत्या के षडय़ंत्र को विफल करना प्रचारित कर सकती हैं, क्या एक कार्यक्रम में अपने 'मनचाहेÓ नारे लगवाने के लिए तीन नकाबपोश खड़े नहीं कर सकती हैं? क्या पुलिस इसीलिए उन्हें बचा रही है? मुद्दा नारों के देशद्रोहात्मक या राजद्रोहात्मक होने न होने का नहीं है। मुद्दा इस मुद्दे को इतना तूल देने के बावजूद, ये नारे लगाने वालों की सही पहचान करने से शासनतंत्र के कतराने का है। जब तक उक्त नकाबपोशों की पक्की पहचान नहीं की जाती है और इसी के हिस्से के तौर पर छात्रसंघ के पदाधिकारियों समेत वामपंथी छात्र नेताओं को उक्त नारों से अलग नहीं किया जाता है, तब तक यह संदेह बना ही रहेगा और समय गुजरने के साथ और गहरा होता जाएगा कि कहीं यह भी छात्र आंंदोलन तथा आम तौर पर विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ऑपरेशन उनके लिए अंतत: फायदे का सौदा होगा या घाटे का, यह एक अलग विषय है।

http://www.deshbandhu.co.in/article/5758/10/330#.Vt0ab30rK1s

Saturday, 4 April 2015

एक कम्युनिस्ट का आचरण साम्यवाद के मूल विचार के प्रचारक का होना चाहिए --- जे एस नरुका

"बड़ा सवाल !

एक कम्युनिस्ट की अपने दल विशेष प्रति वफादारी जरुरी है पर उसका आचरण मुख्य रूप से साम्यवाद के मूल विचार के प्रचारक का होना चाहिए जो समाज को बेहतर बना सकता है लोगों को एक बेहतर इंसान बना सकता है। पर आमतौर पर अधिकतर कम्युनिष्ट सैंकड़ो विभाजित दलों में से किसी एक के ही कट्टर प्रचारक होते हैं जो एक भक्त के से ही आचरण के प्रतीत होते हैं और जिस विचार से एक बेहतर इंसान निकलके आना चाहिए आश्चर्यजनक रूप से उसके विपरीत एक आत्ममुग्ध, जिद्दी, तुनकमिजाज, समाज से अलग सा दिखने वाला व्यक्तित्व ही एक कम्युनिष्ट नजर आता है..... न.रुका।"



 *हमारे उत्तर-प्रदेश के कर्णधार व उनके राष्ट्रीय आश्रयदाताओं के विचार :

 मार्क्सवाद /साम्यवाद को भारतीय संदर्भ में प्रस्तुत करना तो गलत घोषित हो गया किन्तु RSS/भाजपा, मोदी उसका विकल्प केजरीवाल एवं उसके फिल्मी प्रचारक का उल्लेख -'गुड वन' । क्या 69 प्रतिशत जनता इससे ही वामपंथ की झोली में आ जाएगी? जबकि प्रकाश करात साहब जो इस समय वामपंथ के भगवान बने हुये हैं  M=मार्क्स की जगह मुलायम तथा L= लेनिन की जगह लालू मानते हैं और ये दोनों पिछड़े के नाम पर मोदी के पीछे खड़े हैं। :
2014 के चुनावों में सपा ने भाजपा को समर्थन दिया था और बदले में उसे 2017 के चुनावों में भाजपा का उसी प्रकार अप्रत्यक्ष सहयोग मिलेगा जिस प्रकार 2015 में दिल्ली में आ आ पा को मिला है। लेकिन पार्टी के मुख-पत्रों ने केजरीवाल की जीत पर खुशी ज़ाहिर की थी, इसका क्या मतलब?

**उपरोक्त विचारों के संदर्भ में युवा कामरेड की उपरोक्त  पीड़ा भी विचारणीय है। साम्यवाद व वामपंथ के हितैषियों की सोच को जहां कर्णधार संघी सोच घोषित कर रहे हैं वहीं उनके विचार जन-मानस में क्या छवी बनाते हैं उसका आभास जोया अंसारी साहिबा की इस टिप्पणी से होता है कि " साम्यवाद को सर्वहारा को सौंपें " । 
वस्तुतः बक़ौल मनीषा पांडे जी ( इलाहाबाद के सी पी एम नेता की पुत्री तथा पत्रकार  ) कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता अपनी पत्नियों की कमाई पर नेतागिरी करते हैं और इस प्रकार महिलाओं के शोषण के लिए उत्तरदाई हैं । व्यवहार में मनीषा जी का कथन सही है। 
वरिष्ठ जागरूक पत्रकार पलाश विश्वास साहब कम्युनिस्ट कर्णधारों  की जनता से दूरी को देश के लिए घातक मानते हैं :
 http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/views/2015/03/23/
ऐसे लोग जन-जागरण वाले विचारों को 'एथीस्टवाद' के विरुद्ध बता कर अप्रत्यक्ष रूप से ढोंग-पाखंड-आडंबर को ही बढ़ावा देते हैं उसे 'ब्राहमणवाद' न कहा जाये तो क्या कहा जाये? राजद के युवा का मानना है कि 1991 से प्रारम्भ उदरवाद को रोकना संभव नहीं है।


तो क्या देश की जनता सशस्त्र क्रान्ति का साथ देगी? क्या सशस्त्र क्रान्ति के लिए समय उपयुक्त है और वह सफल हो सकेगी? 1857 का उदाहरण सामने है तभी तो गांधी जी को 'सत्य-अहिंसा' का सहारा लेना पड़ा था। आज मार्कन्डेय काटजू साहब की गांधी-विरोधी लेखनी व गोडसे के महिमा-मंडन के परिप्रेक्ष्य में नीतियाँ निर्धारित करके जनता को जागरूक करने की नितांत आवश्यकता है तभी 'संघ' के कुचक्र को नष्ट किया जा सकेगा। केवल और केवल 'आर्थिक-आंदोलन' जब तक कि 'सामाजिक-जाग्रति' न उत्पन्न हो कोई क्रान्ति नहीं कर सकता है।
----- विजय  राजबली माथुर
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