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Friday, 18 March 2016

प्रारब्ध के धनी व विचारों से समृद्ध कन्हैया कुमार ------ विजय राजबली माथुर



****** कामरेड कन्हैया कुमार अब किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।****** 

 वह वैचारिक प्रचलित आधार पर खुद को 'नास्तिक ' कहते हैं , किन्तु स्वामी विवेकानंद के अनुसार 'नास्तिक' वह है जिसका खुद अपने ऊपर विश्वास न हो जबकि 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर पूर्ण विश्वास हो ।  जो लोग खुद पर नहीं किसी अदृश्य पर विश्वास करते हैं वे नास्तिक अथवा ढ़ोंगी हैं। हम स्वामी विवेकानंद की परिभाषा के अनुसार कन्हैया को 'पूर्ण आस्तिक' कह सकते हैं। वह पूर्ण आध्यात्मिक भी हैं क्योंकि अध्यात्म का अर्थ है अध्यन + आत्मा अर्थात अपनी आत्मा का अध्यन ; कन्हैया ने प्रत्येक भाषण में खुद अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति करने की बात कही है। स्पष्ट है वह अपना आत्मावलोकन करके ही वेदना व्यक्त कर रहे हैं।  जो लोग पाखंड और आडंबर को अध्यात्म बताते हैं वे भी वस्तुतः ढ़ोंगी ही हैं।

मानव जीवन को 'सुंदर, सुखद व समृद्ध' बनाने का मार्ग बताने वाला विज्ञान ही ज्योतिष है और इसका 'रेखा गणितीय' विश्लेषण 'हस्त रेखा विज्ञान' कहलाता है। जो लोग बाएँ हाथ को स्त्रियों  का व दायें को पुरुषों का बता कर विश्लेषण करते हैं वे पूर्णत :  सही विश्लेषण प्रस्तुत नहीं करते हैं। इसी प्रकार जो लोग बाएँ हाथ को बेरोजगारों व दायें हाथ को सरोजगारों के लिए निर्धारित करते हैं वे भी अपूर्ण निष्कर्ष तक ही पहुँचते हैं।

वस्तुतः स्त्री-पुरुष एवं रोजगार-बेरोजगार का विभेद किए बगैर बाएँ हाथ से किसी भी मनुष्य के  जन्मगत 'प्राब्ध'/भाग्य/LUCK का ज्ञान प्राप्त होता है और उसके दायें हाथ से व्यावहारिक तौर पर  कर्मगत उसने जो प्राप्त/अर्जित किया है उसका ज्ञान होता है। उपरोक्त चित्रों में कन्हैया का बायाँ हाथ जितना स्पष्ट है उतना ही दायाँ हाथ भी स्पष्ट है। उनकी भाग्य रेखा दोनों हाथों में मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर शनि पर्वत तक स्पष्ट पहुँच रही है। उसकी एक शाखा की पहुँच गुरु पर्वत पर भी है। हस्तरेखा विज्ञान में ऐसी भाग्यरेखा 'सर्व-श्रेष्ठ' होती है। लाल बहादुर शास्त्री जी के हाथों में भी ऐसी ही भाग्यरेखा थी। ऐसी भाग्यरेखा के संबंध में डॉ नारायण दत्त श्रीमाली का निष्कर्ष है  :
" ऐसा व्यक्ति अपने देश की भलाई में अपने आप को न्योछावर कर देता है। यह व्यक्ति सबका प्रिय, स्वाभिमानी, दानी, सबकी सुनने वाला होता है। यह व्यक्ति उन्मुक्त सिंह की तरह अपने विचार धड़ल्ले के साथ व्यक्त करने वाला होता है। "

उनके प्रत्येक भाषण से डॉ श्रीमाँली के इस निष्कर्ष की स्पष्ट परिपुष्टि हो रही है। बड़ी बेबाकी के साथ उन्होने गाँव से लेकर समाज,राष्ट्र व विश्व की वृहद चर्चा की है और शक्तिशाली व बर्बर सरकार के उत्पीड़न की परवाह किए बगैर अपने विचारों को सुस्पष्ट तौर पर रखा है।

कन्हैया के दोनों हाथों में सभी ग्रहों के पर्वत उन्नत हैं अतः उनको पूर्ण फल प्राप्त होगा। मूल भाग्यरेखा के साथ-साथ चंद्र पर्वत से एक और सहायक भाग्यरेखा भी आ रही है अर्थात विवाहोपरांत उनका भाग्य और गति प्राप्त करेगा। उनकी हृदय रेखा स्पष्टतः गुरु पर्वत के नीचे पहुँच रही है जिसका फल उनकी इस सहृदयता में सबके सामने है कि, वह अपने आक्रांताओं के प्रति भी निर्मम नहीं उदार हैं।


https://www.facebook.com/ankitkumar.anant/posts/1055174251211812
हालांकि उन पर शारीरिक व मानसिक रूप से निष्ठुर प्रहार किए गए हैं उनको 'देशद्रोही' तक कह  कर उनके प्रति घृणा को प्रचारित किया गया है। परंतु उन्होने अपना संयम नहीं खोया है। स्वामी विवेकानंद का कहना है कि प्रारम्भ में जिस व्यक्ति या  पदार्थ का जितना तीव्र विरोध होता है कालांतर में वह व्यक्ति या पदार्थ उतना ही 'लोकप्रिय ' होता है। कन्हैया की लोकप्रियता का अंदाज़ 'जन संदेश टाईम्स ' में प्रकाशित इस समाचार से भी लग सकता है एवं निम्नांकित चित्रों से भी। ।
जन संदेश टाइम्स







15 मार्च के संसद मार्च व जनसभा  में भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी राजा साहब व माकपा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सीताराम येचूरी साहब की उपस्थिती कन्हैया की जनप्रियता के ही कारण थी। प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय जी व अन्य महानुभाव उनके वैचारिक महत्व के कारण ही शामिल हुये हैं। 
उनके हाथों में मस्तिष्क रेखा स्पष्ट व गहरी है और चंद्र पर्वत की ओर ढलवां झुकी हुई है जो एक आदर्श रूप में उपस्थित है और इसी के कारण वह प्रत्येक बात को गहराई से अध्यन  करके सुस्पष्ट रूप में सार्वजनिक रूप से रखने में समर्थ रहते हैं। इसी कारण शक्तिशाली सर्वोच्च सत्ता से टकरा कर उनकी जनप्रियता उच्च सोपान को छू सकी है। 

उनकी गिरफ्तारी के समय की प्रश्न कुंडली प्राप्त करने पर ज्ञात होता है कि, उस समय नौ में से सात ग्रह उनके अनुकूल थे। केवल सूर्य तथा शनि ग्रह उनके प्रतिकूल थे। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण उनका 'मान-भंग' हुआ जो उन पर 'देशद्रोह' का झूठा आरोप थोपा गया और शनि की प्रतिकूलता के कारण उनको कारागार की यात्रा करनी पड़ी। जैसा की न्यूज़ लाउंड्री को दिये साक्षात्कार में उन्होने बताया भी है कि 'जांच में सहयोग' करने के नाम पर धोखे में रख कर उनको गिरफ्तार किया गया यह भी शनि का ही प्रकोप रहा है। शुक्र व बुध ग्रहों के शक्तिशाली होने के कारण उनका बुद्धि,ज्ञान,विवेक संतुलित रहा एवं उनको कानूविदों का भी सहयोग प्राप्त हुआ जिससे वह अन्तरिम रूप से ही सही रिहा हो सके। शनि के स्त्रीकारक ग्रह होने के कारण जहां उनकी गिरफ्तारी में महिला मंत्री का हाथ रहा वहीं रिहाई में भी महिला न्यायाधीश का हाथ रहा है। स्त्रीकारक ग्रह शुक्र  के सर्वाधिक शक्तिशाली होने व माँ के भाव में होने के कारण सर्वप्रथम उनको अपनी माता जी का पूर्ण आशीर्वाद मिला है। उनकी अनुपस्थिति में महिला उपाध्यक्ष ने ही कुशलतापूर्वक उनके कार्यों का निष्पादन व आंदोलन का संचालन किया है। गुरु,राहू और केतू ग्रह भी उनको सुख दिलाने व हमलों से बचाने में समर्थ रहे हैं बल्कि यदि कहें कि सरकार का दांव सरकार को ही उल्टा पड़ने में इन सब ग्रहों की प्रमुख भूमिका रही है तो गलत न होगा । 
सिर्फ यह कह देने से कि हम नहीं मानते ग्रहों के प्रभाव से अछूता नहीं रहा जा सकता है। कन्हैया का इस समय जनता पर अनुकूल प्रभाव है और यदि वह जनता को सामाजिक रूप से जागरूक करने को कहें कि सरकार और उसके समर्थक अधार्मिक तत्व हैं जबकि वह जनता के धर्म की रक्षा का युद्ध लड़ रहे हैं। वस्तुतः 'धर्म' शब्द की व्युत्पति 'धृति' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना। अर्थात मानव शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही 'धर्म' हैं , यथा-
सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। इनका पालन ही धर्म है बाकी सब ढोंग-पाखंड-आडंबर है। 
यही उपयुक्त समय है जब जनता को समझाया जा सकता है कि, 'कृणवनतो विश्वमार्यम ' अर्थात सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने वाला समष्टिवाद ही आज का साम्यवाद है जो विश्व के  मेहनतकशों  को एकजुट करने की बात उठाता है और उसका विरोध करने वाले ही वस्तुतः देशद्रोही हैं। 
हमारी शुभकामनायें  सदैव  कामरेड कन्हैया कुमार के साथ हैं। 


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