मित्रों
कांग्रेस और बी जे पी की विचारधारा में १९ -२० का अंतर है, एक १९ है तो
दूसरा २० हैं और वर्तमान में नए राजनीतिक दल को अगर मानते हैं तो उसे
आप के रूप में २१ मान लें, , यानी १९ - २० - २१ ये तीनों एक ही विचार
धारा के तीन रूप हैं ? दोस्तों समाजवाद के भय और भूत से कांग्रेस के
पीछे लगे पूंजीपतियों के संगठन जो पूंजीपति दुनिया में प्रगतिशील विचारों
के विरोधी हैं उन्होंने अपने अंतर्मन से सोचा की कांग्रेस को प्रगतिशील
पिछड़ों , दलितों और कम्युनिस्टों का समर्थन मिल रहा है, और साथ ही साथ,
देश में कांग्रेस के सहयोग से कम्युनिस्ट विचारधारा तेजी से बढ़ रही हैं,
पूंजीपतियों में संशोधनवादी और प्रगतिशील विचारधारा के लोग भी हैं, इस
लिए यह पूंजीवाद के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं, इस भूत के भय से पहले
तो आम जनता का संगठन बनाकर उसके माध्यम से २०११ से ही यानी २०१४ के लोक
सभा के चुनाओं से पूर्व , दो तीन साल पहले से ही जनता को गुमराह करने
वाले तथाकथित जन आंदोलन चलाये जाते रहे, जबकि इस प्रकार के अपराध पहले
से ही जारी थे, दरशल हो यूँ रहा था कि , कांग्रेस और उसके कार्यों से
विशेषकर कांग्रेस की विदेश नीति के समर्थन से देश के प्रगतिशील विचारधारा
के लोग, जैसे,पिछड़े, दलितों और कम्युनिस्टों तथा समाजवादियों का समर्थन
पाते जा रहे हैं, और कम्युनिस्ट तेजी से भी बढ़ भी रहे थे ? कम्युनिस्ट
क्योंकि कांग्रेस की समाजवादी मुल्कों से सहयोग, और यूं ० एन ० ओ ० और
उसकी सुरक्षा कौंसिल में अधिकतर मामलों में कम्युनिस्ट मुल्कों तब का
सोवियत संघ वर्तमान में रूष , चीन और दुनिया के अन्य समाजवादी मुल्कों
के साथ रहने की नीति के कारण सरकार को बाहरी समर्थन देते थे भारत के
कम्युनिस्ट भी इस लिए समर्थन करते थे, क़ि दुनिया के गरीब और कमजोर मुल्क
धीरे धीरे समाजवादी खेमे का बहुमत बना सकें, और सुरक्षा कौंसिल में एक दिन
प्रभुत्व पा सकें, इन्ही विचारों के मध्यनजर प्रगतिशील पिछड़े और, दलित
कम्युनिस्ट विचार धारा का समर्थन करते थे, यूं ० एन ० ओ ० की सुरक्षा
कौंसिल में अनेक मुल्को पर आक्रमण के फैसलों के खिलाफ रूष और चीन ने
तटस्थता की भूमिका निभाई ? तब प्रगतिशील विचारधारा के पूंजीपति ने सोचा कि
कुल मिला कर भविष्य में समाजवाद से जुड़े यही प्रगतिशील विचार मिल कर
पूंजीवाद के खिलाफ ताकतवर न हो जायँ और कम्युनिस्ट पूंजीवाद पर हावी न
हो जाय, इस भूत के भय के कारण पहले से ही धीरे धीरे जनता के आंदोलन से
ही आप जैसी राजनैतिक पार्टी को जन्म दे दिया गया है, वह भी ऐसे आंदोलन
खड़ा करके क़ि जो अपराध आरम्भ से बड़ी संख्या में होते आ रहे थे, और यह आंदोलन
कांग्रेस की सरकार के पहले दौर २००४-२००९ के समय में भी हो सकते थे,
क्योंकि यदि यह आंदोलन तब होते तो तब बी ० जे ० पी ० को जनता का इतना
समर्थन नहीं था, वह तो एक लम्बे समय में ग्राउंड बनाने की तैयारी कर रहे
थे, जबकि २०१४ के चुनाव होने के पश्चात वर्तमान एन०डी०ए० सरकार में
इसी प्रकार के अपराध, उससे भी तेजी और अनुपात के आंकलन से माह के हिसाब से
अधिक संख्या और अधिक % में हो रहे हैं, जबकि बहुत से मामले प्रकाश में
नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि प्रचार माध्यम बहुत से मामलों को इस वर्तमान
सरकार को बचाने की साजिस के तहत छुपा रहा है, या घटना को दुसरे रूप में
प्रचारित कर रहा है, वैसे चुनाव से पूर्व से ही कांग्रेस पर तो भयंकर
आरोप लगाने की प्रक्रिया या दाग लगाने की साजिस तो लगातार चल ही रही थी
, वैसे मेरी तो धारणा निश्चित रूप से यह मानती है, कि कट्टरवाद अधिक
समय ज़िंदा नहीं रहता, किसी भी प्रकार का कट्टरवाद अपराध का ध्योतक है,
यानी काठ की हांडी ज्यादा समय चूल्हे पर नहीं टिक सकती, यह बरसाती मेंढक
के सामान है, और दुसरे बहुमत की जनता का अंतर्मन से बी जे पी पर अधिक
भरोषा नहीं है, क्योंकि १९९८ - २००४ एन ० डी ० ए ० का वाजपेयी दौर एक अशफल
काल रहा इसी कारण वाजपेयी के नेतृत्व में एन ० डी ० ए ० की असफलता के
कारण पुनः खड़े नहीं किये गए, क्योंकि ठीक २००४ में बुरी तरह हारने के
पश्चात बी ० जे ० पी ० हाशिये से मिट सकती थी, किन्तु तथाकथित पूंजीवाद तो
ऐसा नहीं चाहता था, वह तो आक्रोश में वर्तमान चुनाव २०१४ में कांग्रेस
के खिलाफ लोक सभा चुनाव में पूंजीपतियों द्वारा अंधा प्रचार, और असीमित
धन बल के सहयोग से एन ० डी ० ये ० यानी बी जे पी को सत्ता में बैठाना था,
ताकि भ्रमित करने वाले धर्म के खिलाफ, समाजवाद यानी कम्युनिज्म को हासिये
में ला सकें, क्रांतिकारियों के इस शेर से कि हम को मिटा सके यह जमाने में
दम नहीं ज़माना हम से है जमाने से हम नहीं , अन्यथा जिस प्रकार कांग्रेश के
खिलाफ जनता आक्रोशित थी, उससे तो कांग्रेस के खिलाफ एक गधा भी खड़ा हो
जाता तो वह चुनाव निश्चित ही जीत जाता, और फिर अप्रैल २०१४ के चुनाव के
पश्चात आज फरवरी २०१५ तक जीतने के बाद से आज तक हो क्या रहा है, वही जो
कांग्रेस के सासन काल में चल रहा था, क्योंकि आम जनता जो जागरूक है, वह
बी जे पी को सामंतवादी विचारधारा का समर्थक ,
सम्प्रदायवाद,(साम्प्रदायिक) और धार्मिक कट्टरवाद से जोड़ती है, यदि जनता
एक दम से बी ० जे ० पी ० के खिलाफ हो जाएगी, तो दूसरा , तीसरा विकल्प पहले
से तैयार रहना चाहिए , इस तरीके से तथाकथित पूंजीवाद के दो मकसद पूरे
होते हैं, एक तो कांग्रेस को हमेशा ही रास्ते से साफ़ करने की उनकी साजिश
सफल होती है ताकि उसके समर्थक विशेषकर कम्युनिस्ट , भविष्य में उसके सहयोग
से कुछ हाशिल न कर सकें और दुसरे , कांग्रेस के समर्थक कटघरे में
खड़े होते है, इस लिए तथाकथित पूंजीवाद ने पहले से ही दूसरा विकल्प तैयार
कर लिया है , ताकि भविष्य में बी जे पी के अशफ़ल होने से आप जैसी भोली
भाली जनता के विचारों की एक नयी राजनैतिक पार्टी भविष्य के राजनितिक मंच
के लिए तैयार रहे, और प्रगतिशील विचारों का विरोधी पूंजीवाद का तथाकथित
प्रजातंत्र बनाम गणतंत्र पर शोषण, जुल्म , अत्याचार ,लूट खसोट, और
दमन जारी रहे ?
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Sunday, 1 February 2015
Thursday, 2 January 2014
उमरावजान का सुल्तान है:'आप'/केजरीवाल ---विजय राजबली माथुर
मिर्ज़ा हादी रुसवा द्वारा 1905 में लिखित उर्दू उपन्यास 'उमरावजान अदा'पर आधारित -1981 में प्रदर्शित फिल्म 'उमराव जान' के माध्यम से मुजफ्फर अली साहब ने 1840 से 1857 तक के काल खंड में ब्रिटिश साम्राज्य के सहारे चल रही नवाबों/सुल्तानों की विलासिता और ईमानदारों को कर्तव्य पालन के कारण होने वाली दुश्वारीयों/हानियों तथा निर्दोषों के उत्पीड़न-शोषण की जानकारी उपलब्ध कराई थी। किन्तु शायद इस फिल्म को भी मनोरंजन के ही एक दृष्टिकोण से लिया गया प्रतीत होता है। तभी तो आज दिग्गज चिंतक-विचारक और बड़े कम्युनिस्ट नेता भी 'आप' और केजरीवाल के दीवाने बने घूम रहे हैं।
आज 'आप'/केजरीवाल उसी भूमिका में हैं जिसमें उस वक्त के सुल्तान और नवाब थे। जनता के उत्पीड़न और शोषण से संग्रहीत धन को कारपोरेट घराने इन नए सुल्तानों पर लुटा रहे हैं और ये नए सुल्तान मनमोहनी अदाओं से आज की उमराव जान अर्थात बेगुनाह जनता को दिवा-स्वप्न या ख़्वामख़्वाह के झूठे सब्जबाग दिखा रहे हैं ,जैसे इस सुल्तान ने उमरावजान को दिखाये थे। :
आज 'आप'/केजरीवाल उसी भूमिका में हैं जिसमें उस वक्त के सुल्तान और नवाब थे। जनता के उत्पीड़न और शोषण से संग्रहीत धन को कारपोरेट घराने इन नए सुल्तानों पर लुटा रहे हैं और ये नए सुल्तान मनमोहनी अदाओं से आज की उमराव जान अर्थात बेगुनाह जनता को दिवा-स्वप्न या ख़्वामख़्वाह के झूठे सब्जबाग दिखा रहे हैं ,जैसे इस सुल्तान ने उमरावजान को दिखाये थे। :
एक दारोगा की कर्तव्यपालन में बरती ईमानदारी की सजा उसकी पुत्री को दर-दर भटकने और ठोकरें खाने के रूप में प्राप्त हुई थी। चाह कर भी वह एक बार फँसने के बाद दलदल से न निकल सकी थी। यहाँ तक कि 1857 की क्रांति की तैयारियों में संलिप्त एक योद्धा ने जब उस लड़की को बचा कर निकालने का प्रयास किया तो उसको ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया। क्रांति की विभीषिका में जब लखनऊ छोड़ कर बनारस जाने के फैजाबाद पड़ाव में भाग कर जब वह लड़की उमरावजान छिप कर वहीं डेरा जमा लेती है तो उसका अपना छोटा भाई जो उसके अपहरण का चश्मदीद गवाह था उसको भगा देता है और उसकी माँ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाती है।
बिलकुल उसी लड़की जैसी दशा इस समय देश की जनता की हो रही है। कांग्रेस/भाजपा के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने में संभावित संदेह को देखते हुये आज के नए 'सुल्तान' के रूप में 'आप'/केजरीवाल का अवतरण किया गया है। देश की राजधानी दिल्ली की जनता को ठगने में सफल हो जाने के बाद इस सुल्तान के हौसले बुलंद हैं। सारे देश की जनता उमरावजान की भांति ठगे जाने को आतुर प्रतीत हो रही है। दुखद स्थिति यह है कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध गर्जन/तर्जन करने वाले वामपंथी और कम्युनिस्ट भी इस नए सुल्तान पर फिदा होकर जनता को ठगे जाने की प्रक्रिया में ही शामिल होते दीख रहे हैं। छिट-पुट संघर्ष करने वालों की आवाज़ को उसी तरह दबा दिया जाएगा जिस प्रकार तब गदर के एक नायक फैज अली को उमरावजान को बचाने के प्रयास में मौत के घाट उतार दिया गया था।
Thursday, 19 December 2013
क्या कम्युनिस्ट 'आप' के खतरे को पहचानेंगे?
कितना सटीक है यह कथन कि 'एक मूर्ख को सही बात बताना गलत है वह इस पर घृणा करेगा'। आजकल क्या बुजुर्ग पत्रकार, क्या उतावले कम्युनिस्ट सभी एक स्वर से 'आप'/केजरी भक्ति में तल्लीन हैं जैसे उन्होने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है और उनको अब कुछ नहीं चाहिए। इनको मधुकर दत्तात्रेय उर्फ बाला साहब देव रस की तिकड़म सफल होने पर खुशी हो रही है। पहले केवल 'जनसंघ' ही RSS का राजनीतिक विंग था फिर 1980 में आपात काल के दौरान देवरस/इन्दिरा के मध्य हुये 'गुप्त समझौते'के अंतर्गत कांग्रेस में संघियों की पैठ हुई और इंदिराजी की सत्ता वापिसी भी। कालांतर में 'जनसंघ' को जनता पार्टी में विलीन करके समाजवादियों में भी संघ की पैठ बना ली गई जो 'भाजपा' में स्पष्ट देखी जा सकती है। पूर्व सोशलिस्ट सुषमा स्वराज जी आज भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं। जब कांग्रेस और भाजपा दोनों की पोल खुलने लगी तो संघ ने हज़ारे/केजरी को आगे करके एक नया प्रयोग/विकल्प खड़ा किया जिसकी परिणति 'आप' है। अब यदि कुछ कम्युनिस्ट भी 'आप' के गीत गाते हैं तो समझना चाहिए कि या तो वे निकट अतीत से अपरिचित हैं या फिर उनके निजी स्वार्थ अब संघ के साथ जाने में हैं। 'उत्पादन और वितरण के साधनों पर समाज का स्वामित्व 'चाहने वाला कोई भी व्यक्ति कारपोरेट/RSS के चहेते 'आप' की वकालत नहीं कर सकता।
क्या है देवरस तिकड़म?
माधव राव सदाशिव गोलवलकर अपने जीवन काल में केंद्र में संघ को सत्ता पर जब काबिज न करा सके तो उनके उत्तराधिकारी मधुकर दत्तात्रेय देवरस ने शहरों के 2 प्रतिशत और गांवों के 3 प्रतिशत वोटों के सहारे संघियों को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाने का नया सूत्र खोजा था । आपातकाल की गिरफ्तारी के दौरान उन्होने इंदिराजी से एक गुप्त सम्झौता किया जिसके अनुसार उनको समर्थन देकर अपना एजेंडा कार्यान्वित करवाने का भरोसा उनको मिला। 1980 में पहली बार RSS के शुद्ध समर्थन से इन्दिरा कांग्रेस की सरकार बनी और 'समाजवाद' की नीति का परित्याग हुआ। 'श्रम न्यायालयों'में श्रमिकों के विरुद्ध फैसले सुनाये जाने की प्रक्रिया इसी का प्रतिफल थी। 1984 में भी संघ का समर्थन इन्दिरा कांग्रेस को मिला जिसके फलस्वरूप राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद/रामजन्म भूमि का ताला खुलवा कर पूजा प्रारम्भ कारवाई। 1992 में पूर्व संघी एवं इन्दिरा कांग्रेसी प्रधानमंत्री के आशीर्वाद से कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद को ढहवा दिया।
1996 में 13 दिनी सरकार के गृह मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने संघ को घेरने वाली तमाम फ़ाईलो को जलवा डाला। 1998 से 2004 तक के गृह मंत्री आडवाणी ने पुलिस,सी बी आई आदि-आदि में संघियों को भर्ती करा दिया। आज के अनेक जांच परिणाम इसी सांप्रदायिक सोच को दर्शाते हैं। यही नहीं सेना मे भी संघी सोच के लोग प्रविष्ट करवाए गए।
प्रो . बलराज माधोक ने तो खुल कर भाजपा को कांग्रेस की 'बी' टीम बताया ही था दोनों की सरकारों द्वारा समान नीतियाँ अपनाने से जब जनता को भी ऐसा ही आभास होने लगा तब शातिर संघियों ने देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों के सहयोग से NGOs का मोर्चा 'आप' पार्टी के रूप में गठित करा दिया जो NGOs एवं कारपोरेट घरानों को 'लोकपाल'के दायरे से मुक्त रखने का ज़बरदस्त अभियान चलाये है और अभी सफल भी है।
भ्रष्टाचार के जनक उद्योगपति/व्यापारी,IAS/IPS होते हैं और इनकी ही पत्नियाँ अधिकांश NGOs की संचालक हैं। स्पष्ट है कि 'आप' पार्टी श्रमिकों/किसानों का शोषण करने वाले व्यापारियों/उद्योगपतियों एवं उनके सहयोगी IAS/IPS का बचाव करने वाली पार्टी है न कि आम जनता की हितैषी। इस सबके बावजूद जो लोग खुद को 'कम्युनिस्ट' बताते हुये भी 'आप' का घोषणा-पत्र प्रचारित कर रहे हैं उसकी वकालत कर रहे हैं तो साफ है कि वे RSS को ही संरक्षण प्रदान कर रहे हैं।
एक ओर कम्युनिस्ट खुद परस्पर बंटे हुये हैं उस पर उनके बीच ऐसे संघियों का प्रवेश भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों का एक भयावह संकेत प्रस्तुत करता है। पुलिस,सेना,विभिन्न सरकारी विभागों में बैठे संघी भाजपा,कांग्रेस,आप के संघियों की खुल कर मदद करेंगे तथा कम्युनिस्टों के बीच घुस आए संघी तोड़-फोड़ करेंगे। तब एकमात्र मार्ग हिंसक और रक्त-रंजित क्रांति का ही बचेगा जैसा कि 'नया ज़माना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने RSS प्रचारक लिंमये से दिल्ली में कहा था और अपने एक समपादकीय मे इसका उल्लेख किया था।
1925 में स्थापित सर्वाधिक पुराने राजनीतिक दल 'भाकपा' जिसने संसदीय लोकतन्त्र को अख़्तियार किया है से यह अपेक्षा है कि आगे आ कर संसदीय लोकतन्त्र की रक्षा हेतु समस्त कम्युनिस्ट शक्तियों को एकजुट करे व अपने बीच से संघियों की छुट्टी करे। अन्यथा आने वाले समय में भूखी जनता जब क्रांति करेगी तो नेतृत्व छोटे-छोटे गुटों के हाथ में होगा। भाकपा को उनका अनुसरण करना तब मजबूरी होगी। अभी समय है कि 'आप' के समर्थकों से पार्टी किनारा कर ले।
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group -CPI...
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Monday, 16 December 2013
कमजोर तबके को पूर्ण रूप से जागरूक करना होगा, तभी हम समाजवाद या वैदिक काल के साम्यवाद की कल्पना कर सकते हैं ??---Jagdish Chander
http://communistvijai.blogspot.in/2013/12/blog-post_15.html
दिये लिंक (हमारे पिछले पोस्ट ) पर कामरेड Jagdish Chanderजी ने 'जनवादी जन मंच'ग्रुप में जो टिप्पणियाँ दी हैं उनको संयुक्त रूप से यहाँ आलेख रूप में दिया जा रहा है :---
Jagdish Chander :
सुधा सिंह जी का सवाल और धर्मेन्द्र प्रताप सिंह जी का नजरिया पर आनंद प्रकाश तिवारी जी स्पष्ट रूप से आम आदमी पार्टी को भारत का भविष्य मान रहे हैं, दुःख इस बात का है कि यदि कोई वरिष्ट कामरेड अपने को एक वाम विचारधारा का मानते हैं तो क्या वे कम्युनिस्ट के सिद्धांतो से भली भाँती परिचित नहीं हैं हम तो आपको वाम विचारधारा का मार्गदर्शक समझते हैं और हम आपके विचारों को पढ़ कर हताशा के भंवर में फंश जाते हैं, किन्तु हम यह भी समझते हैं कि बहुत से आप जैसे कामरेड हताशा में अपना यह मार्ग छोड़ जाते हैं, हो सकता है वे भी आपके सामान अपने ही जीवन में समाजवाद और साम्यवाद पूरे देश और दुनिया में स्थापित होते देखना चाहता हो , ऐसा होना स्वाभाविक ही है, हम वाम विचारधारा के सामाजिक कार्यकर्ता जब अपने को तथाकथित किसी भी धर्म का अनुयायी मानते हैं तो ऐसा ही होता है ? क्योंकि तथाकथित धार्मिक विचार हमें हताशा की ही और ले जाते है इसी कारण वहुत से वाम विचारधारा के मित्र वाम मार्ग को हताशा में छोड़ कर चले गए , कहाँ गए कुछ पता नहीं चलता ?? वामपंथी विचारधारा में मैंने सबसे पहले जो सिक्षा ली है वह है कि :- " हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है , किन्तु पाने के लिए सारा संसार पढ़ा है" ? कम्युनिस्म एक विज्ञान है ? इसलिए उसे हमें विज्ञानिक नजरिये से ही देखना , पढ़ना और समझना होगा ? उत्पादन के साधनों का स्वामी समाज होगा ? क्या हमने इसे विज्ञानिक नजरिये से समझा है ? सायद नहीं ? उत्पादन के साधन क्या हैं ? और इन उत्पादन के साधनों का स्वामी वर्त्तमान में कौन है ? और समाज क्या है और कैसे यह समाज उत्पादन के साधनों का स्वामी बनेगा आदि आदि ?
इतिहास के थोड़ा सा गर्भ में जाते हैं, कहा जाता है कि वैदिक काल यानि आदिम मानव जब जंगलों में रहता था, पेट भरने के लिए वह जीवों और जीव न मिलने पर अपने मानव साथियों को भी मार कर खा जाता था, काल परिवर्तन में वह उस जीवन से निकल कर जब मानव सभ्य होने लगा तो वह कबीलों और फिर काल परिवर्तन यानि हर बार कालपरिवर्तन का अर्थ है कि उसकी बुद्धि विकसित होती गयी, और धीरे धीरे उसे विद्द्या ज्ञान यानि वैदिक ज्ञान प्राप्त होने लगा, यानि वह भोजन के लिय़े जंगली जीवों को अपने उपयोग के लिए पालने लगा और उसे मांश के लिए जंगलों में नहीं जाना पढता था, सो उसे भोजन के लिए मानवों का मांश खाने की जरूरत नहीं पढ़ी ?? ??????????
2 ---- - इस प्रकार उस काल के मानव समाज की बुद्धि का जब विकास होने लगा तो वह अपनी विकसित बुद्धि के जरिये खेती बाड़ी करने लगा, तब तक सायद मानव कबीलों में ही रहता था, जनसंख्या के बढ़ते कबीलों के क्षेत्र निर्धारित होने लगे, फिर भी वही जंगली प्रवृति नहीं छोड़ पा रहे थे, बुद्धि और विकसित हुयी, विज्ञानिक सिद्धांत है कि आवस्यकता अविस्कार की जननी है, तब लेखनी का जन्म हुआ, प्रारम्भिक लेखनी में मानव चित्रों में ही अपने विचार ब्यक्त करता था, और फिर कालपरिवर्तन में विकसित कबीलो की रचना होने लगी, अधिक विकसित बुद्धि के मनुष्यों ने सोचा कि यह कबीलों का आपसी संघर्ष बंद होना चाहिए वे संगठित होने लगे, और उस लेखनी को रेखाओं आदि विकसित तरीके से विचार ब्यक्त करने लगे, उस ज्ञान से विचारों को उस काल के ताल पत्रों यानि ताड़ के बृक्षों के बड़े बड़े पत्तों में , आदि में रचना करने लगे और उसके बाद सायद रेखाओं को जोड़कर अक्षरों का ज्ञान और काल परिवर्तन में धातु का अविस्कार और तब धातुओं के ताम्रपत्रों में विचार संचित होने लगे, यही वह काल था जब मानवों की जनसंख्या बहुत अधिक बढ़ने लगी , और आवस्यकता की वस्तुओं को पाने के लिए दुसरे दुर्बल कबीलों से युद्ध करके उसे छीन लिया जाता था, इस प्रकार युद्धों में बहुत से मानवों की हत्याओं से बाद में वस्तुओं की आपूर्ति तो होनी ही थी क्योंकि जिस वास्तु का वह कबीला उत्पादन करता था जरूरी नहीं कि उसका ज्ञान उस दुसरे कबीले को रहता होगा ? क्रमानुसार विकास के सिद्धांत में मनुष्य ने वर्ण ब्यवस्था को जन्म दिया , मनुष्य के सरीर की रचना के सिद्धांत पर मनुष्य के ब्रह्म यानि सर के भाग को एक हिस्सा, दूसरा मनुष्य के वक्षसतल यांनी मनुष्य की छाती, और तीसरा मनुष्य के पेट यानि रूद्र, और चौथा सरीर का सबसे निचला भाग उसके पैर, इस प्रकार मनुष्य सरीर के हिस्सों के आधार पर चार वर्णो की स्थापना की ??? ????????????????????..........................
3---- मनुष्य सरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा मस्तक यानि मनुष्य का सिर यानि मस्तिक में ही बुद्धि यानि ब्रह्म ज्ञान का द्रव्य होता है, इस लिए पहले वर्ण का नाम ब्राह्मण यानि ज्ञान देने वाला उसका कार्य लिखने और ज्ञान देने और विचारों के आदान प्रदान का था, दूसरा क्षत्रिय यानि जंगली जानवरों से रक्षा, चौकीदारी, और सिपाही, का कार्य, तीसरा , जिस प्रकार मनुष्य भोजन करता है और पेट के अंदर सुरक्षित रहकर सरीर के सभी हिस्सों में अनुपात के अनुसार खुराक भेजता है, उसी प्रकार तीसरे वर्ण का नाम वैश्य रखा गया, यानि वह उत्पादित सामान या वास्तु को समाज में अनुपात के अनुसार सामान रूप से वितरित करे,, और चौथा वर्ण बनाया सूद्र, मनुष्य के सरीर का सबसे निचला हिस्सा पैर का है, जो सरीर का सारा भार सम्भालता है, उस वर्ण का नाम सूद्र रखा गया ? वर्ण व्यवस्था वह ब्यवस्था थी जिसमे मनुष्यों के समूहों को उनकी योग्यता के अनुसार कार्य बाँट दिए गए ? सायद इसी काल को हम वैदिक काल कह सकते हैं, सायद वर्ण ब्यवस्था काफी विकसित ब्यवस्था थी ? तब उस काल में निश्चित रूप से किसी भी वर्ण की संतान के जन्म के पश्चात जब उसे ज्ञान प्राप्ति के लिए आश्रम में भेजा जाता तो उसकी बुद्धि और कर्म यानि उसकी शारीरिक बुद्धि या क्षमता या योग्यता के अनुसार उसे सिक्षा दी जाती थी, इस सन्दर्भ में हम यह स्पष्ट कर दें कि कालांतर में भी ऐसा निश्चित नहीं था और वर्त्तमान में भी ऐसा नहीं होता कि डाक्टर का पुत्र डाक्टर ही बनेगा, और शिक्षक का पुत्र शिक्षक ही और सैनिक का पुत्र सैनिक ही बनेगा, वैसे भी तब भी और आज भी योग्यता और सरीर की सक्षमता के अनुसार ही उसे उस का ज्ञान दिया जाता था , इसलिए वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण का पुत्र सूद्र के कार्य के योग्य होता तो उसे सूद्र का ही कार्य करना पढता था, क्षत्रिय का पुत्र भी यदि किसी भी ऊपर की तीनों वर्णों की योग्यता नहीं रखता तो उसे भी सूद्र का ही कार्य करना पड़ता था, इसी प्रकार वैश्य के पुत्र को भी ऊपर के तीनों वर्णों की अयोग्यता होने पर उसे भी सूद्र का ही कार्य करना पढता था, और कोई सूतपुत्र पुत्र यदि बुद्धिमान होता तो उसे उसकी योग्यता के अनुसार ब्राह्मण के वर्ण का कार्य दिया जाता था ?????????????????????????????/-----.........
-4------ कामरेड्स यदि पढ़ने वाले बुरा न माने तो हम वर्त्तमान में यह कह सकते हैं कि कौन सी जाती का इंसान किस वर्ण की संतान है, कोई दावा नही कर सकता, क्योंकि जैसे ही जाती ब्यवस्था का चालाकी से जन्म होने लगा, सब कुछ मिक्स होने लगा , वर्ण ब्यवस्था के चौथे वर्ण सूद्र के पास उस काल में सबसे अधिक कार्य था, उत्पादन के तमाम साधन उसके ही हाथ में थे वह मालिक नहीं था क्योंकि उत्पादित वस्तुओं का वर्ण ब्यवस्था के काल में समाज के सभी वर्णो में बराबर की हिस्सेदारी होती थी, उस काल में सभी के पास रहने के लिए घर पहनने के लिए वस्त्र, और खाने के लिए अनाज होता था, उत्पादित वस्तुओं का आदान प्रदान वैश्य के सुपुर्द था क्योंकि उसे हिसाब किताब का ज्ञान दिया जाता था यानि वह एक स्थान से उत्पादित वास्तु को दुसरे स्थान पर विनिमय के आधार पर लाने और ले जाने का कार्य करता था, क्योंकि उस काल में सायद आवा गमन के साधन कम ही थे , यानि वह कुली का भी कार्य करता था, और क्षत्रिय का कर्म यानि कार्य तो उसकी सरीर की सक्षमता के अनुसार सिपाही, चौकीदार, और सुरक्षा गार्ड का ही होता था, कबीलों के प्रमुखों में सभी वर्णों की बराबर सामान भागेदारी हुआ करती थी कोई बड़ा और छोटा प्रमुख नहीं होता था, उम्र के हिसाब से सबसे बृद्ध ही प्रमुख होता होगा, वह चाहे सूद्र हो, इस प्रकार वही प्रमुख वर्ण ब्यवस्था को मजबूत बनाये रखते थे ??? इसी विकसित समाज में ब्राह्मणों के कार्य करने वाले विद्वानों ने वेदों की रचना की, यानि ज्ञान को कलम बांध करने लगे, लेकिन काल परिवर्तन में वर्णों में स्वार्थ पनपने लगा विशेषकर ब्राह्मण ने सोचा कि अपनी संतान को ऊपर के तीनों वर्णों की अयोग्यता होते हुए भी उसे ब्राह्मण का ज्ञान जबर्दस्ती देने लगा, क्योंकि तब उसकी समाज की एकता और समानता की सोच के विरुद्ध अपने खून के प्रति स्वार्थ पनपने लगा, और वह अज्ञानी पुत्र को ब्राह्मण का ज्ञान देने लगा, और वह अज्ञानी अधूरा ज्ञान प्राप्त करके , जिन रचित वेदों से वर्ण ब्यवस्था की रचना की गयी थी और उन वेदों के माध्यम से वर्ण व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी, उन वेदों में वह मन्त्रों के स्थान पर कुमन्त्रों को जोड़ने लगा ???????????????????????????????????????????...
5------क्योंकि ज्ञान में रूचि न रखने वाला मनुष्य कुपरिवृतियों में निपुण हो जाता है, और तब हुयी पुराणों की रचना, जिसमे मन्त्रों को बदल कर कुमन्त्रों में उलटे सीधे संस्कार और कर्म काण्डों की रचना होने लगी, , यानि वेदों के पश्चात जन्म ,मृत्य, यात्रा ,किसी भी प्रकार का निर्माण, बीमारी, दुर्घटना आदि के कारणों को अज्ञात शक्ति के हाथों में नियंत्रित मानते हुए उनके निवारण के लिए पूजा पाठ,आदि कर्म काण्ड करने का उलटा ज्ञान दिया जाने लगा, क्योंकि बाकी सामान को तो आवस्यकता अनुसार ही ही दिया जाता था, आदि किसी भी प्रकार के कार्यों के आरंभ को कुमन्त्रों से पूजा पाठ आदि की ब्यवस्था की रचना कर दी , और तब जन्म हुआ वर्ण व्यवस्था के कार्यों के हिस्सेदारी पर अधिकार की सुरुआत , क्योंकि सूद्र की संख्या यानि कह सकते हैं आज के दलित , पिछड़े, और ट्राईबल उस काल में यह वर्ण कुल जनसंख्या का सायद, ९०% रहा होगा, क्योंकि यही वर्ण मेहनती था, और उत्पादन के सभी साधन उसी के हाथ में थे, ब्राह्मण ने उसे ज्ञान देना बंद कर दिया और कहा कि तुम मेहनत करते हो तुम्हारे पास समय कम होता है, इसलिए तुम अपने काम में लगे रहो,पढ़ने की कोई आवस्यकता नहीं और वह बेचारा उस चतुर अज्ञानी ब्राह्मण की चतुरता को नहीं समझ पाया, और काल परीवर्तन में वह अज्ञान के अँधेरे में ही सोया और पढ़ा रहा, तब उस चतुर तथाकथित अज्ञानी ब्रहामण ने चातुरता से उत्पादन के साधनों पर लेखनी द्वारा अपना स्वामित्व कायम करना आरम्भ कर दिया, और कालांतर में उस तथाकथित चतुर ब्राह्मण ने राजतंत्र की स्थापना करनी आरम्भ कर दी ?? ????????????????????????????????/-----.....
--6---------- और इस प्रकार us kaal me ताकतवर चौकीदार, सिपाही, और सुरक्षा गार्ड में से एक को राजा बना दिया और वैश्य को उत्पादन रखने के भांडारों का मालिक बना दिया, और चतुर्थ वर्ण को मेहनत के लालच में उलझाये रखा, तब होता है जाती ब्यवस्था का जन्म, और तब ब्राह्मण राजा को नियुक्त करता है, और समाज की आवस्यकता के अनुसार वर्णों को जाती में बदलने के पश्चात उसकी आवस्यकता के अनुसार ज्ञान देने लगा, और तब उसने राजा की परिभाषा देनी आरम्भ कर दी कि राजा भगवान् का भेजा हुआ प्रतिनिधि है, क्योंकि कर्म काण्ड, तो वह कुमन्त्रों की रचना करते हुए ही आरम्भ कर चुका था, सो राजा भगवान् का भेजा हुआ प्रतिनिधि है, यानि राजा का आदेश भगवान् का आदेश माना जाएगा, क्योंकि परिभाषा तो तथाकथित ब्राह्मण ने निश्चित कर दी थी इस लिए वह जब चाहे राजा और प्रजा को को भगवान् के भय से कहीं भी घुमा सकता था, क्योंकि समाज को उसके कार्य की योग्या के अनुसार ही ज्ञान दिया जाता था, यानि उस तथाकथित ब्राह्मण ने सभी वर्णों को परिवर्तित जातियों में रचना करते हुए उसके कार्य पुराणों में निर्धारित कर दिए थे, और वह ताकत के साथ मिलकर बाकी समाज का शोषण और उत्पीड़न करने लगा, काल परिवर्तन में उसके हाथ में हमेशा ही लड्डू रहते हैं ? अब हम उक्त सही विषय में आते हैं, कि जाती ब्यवस्था और फिर बाद में तथाकथित धर्म का जन्म , इस प्रकार हमारे अंदर आदिम काल की कुप्रवृति के बीज तो हैं, इस लिए हम अपनी ऊंची जाती के होने पर अपने को सभी मनुष्यों में सर्वश्रेष्ट मानते हैं, और दूसरों का दमन और शोषण करने से नहीं हिचकिचाते,क्योंकि हमारे अंदर आदिम कुप्रवृति जीवित है,हम प्रतेक वास्तु पर अपना अधिकार या वर्चस्व चाहते हैं, सब कुछ एक साथ पाना चाहते हैं , इस कुप्रवृति को समाज से दूर करने के लिए समाज को पूरे इतिहास का सही ज्ञान यानि जागरूक कर सही दिशा देनी होगी , वर्ण व्यवस्था का पूरा ज्ञान सही तरीके से पढ़ाना होगा, हाँ यह भी सत्य है कि सदियों से दलितों और पिछड़ों को ज्ञान से वंचित रखा गया था और उनसे सभी अधिकार छीन लिए गए थे, इस लिए दलित और पिछड़े समाज को सर्वप्रथम जागरूक करना होगा, कालांतर पूर्व ताकतवर समाज प्रतेक उत्पादन के साधनों पर अपना वर्चस्व कायम कर चुका था, इसी लिए आज भारत के गावो में रहने वाले ८०% लोग निर्धन ही हैं, उसमे भी सबसे अधिक निर्धन दलित और पिछड़े ही हैं क्योंकि वह वर्णव्यवस्था के काल से ही मेहनत करते रहे हैं, और इसी कारण वह अज्ञानता के अन्धकार में ही डूबे रहे क्योंकि उन्हें ज्ञान से वंचित ही रखा गया था यानि उन्हें ज्ञान दिया ही नहीं गया था इसी प्रकार सवर्ण वर्ग के कमजोर तबके को पूर्ण रूप से जागरूक करना होगा, तभी हम समाजवाद या वैदिक काल के साम्यवाद की कल्पना कर सकते हैं ??
Sunday, 15 December 2013
सर्वाधिक आर्टिकुलेटेड वामदल इन चुनावों में एकदम क्यों नहीं चले?---सुधा सिंह
https://www.facebook.com/sudha.singh.56884/posts/678842268803483
Sudha Singh:
कॉग्रेस, बीजेपी के बाद तीसरा विकल्प राष्ट्रीय स्तर पर वाम पार्टियां हुआ
करती थीं। 'आप' के साथ अगर झुग्गी-झोपड़ी के साधारण जन और मध्य वर्ग का एक
बड़ा तबका शिफ्ट हुआ है तो यह वाम पार्टियों के लिए विचारणीय होना चाहिए।
साधारण जन की रहनुमाई और उन्हीं के मुद्दे लेकर अरविंद केजरीवाल चुनावी
मैदान में कूदे। यह पॉपुलर मुद्दा है और केजरीवाल की पार्टी का ट्रीटमेंट
भी इन मुद्दों के साथ पॉपुलर क़िस्म का है। बिना किन्हीं स्पष्ट
आर्थिक-सामाजिक नीतियों के वे सब समस्याओं को हल करने का सब्ज़ बाग़ दिखा
रहे हैं। सोचने की बात है कि इन मुद्दों पर सर्वाधिक आर्टिकुलेटेड वामदल इन
चुनावों में एकदम क्यों नहीं चले?
You, Jagadishwar Chaturvedi and 20 others like this.
Dharmendra Pratap Singh :
आज के वामपंथी दलों और उनके नेताओं को सबसे बड़ा मुद्दा केवल 'सांप्रदायिकता' ही नज़र आता है और यही कारण है कि लगभग पांच साल वे सभी कांग्रेस के साथ मिलकर यूपीए - 1 की सरकार भी चलाये. ऐसे में विकल्प के रूप में उन्हें देखना अब खुद से बेईमानी ही कही जायेगी. आने वाले आम चुनावों के सन्दर्भ में भी यह चर्चा उठ रही है कि ये वामपंथी दल कांग्रेस के साथ मिलकर दीदी से मुकाबला करने जा रहे हैं. अतः ऐसे में ये विकल्प कैसे बन सकते हैं? 'मोदीयापा' से छुटकारा मिले तो भी सैद्धान्तिक दलदल में ही उलझ जाते हैं ये राजनीतिक दल. अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने सही मायने में दिखा दिया है कि विकल्प क्या होता है और आम जन चाहता क्या है...!
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चिराग तले अंधेरा ---विजय राजबली माथुर
सुधा सिंह जी का सवाल और उस पर धर्मेन्द्र प्रताप सिंह जी का नज़रिया चाहे जो हो परंतु वरिष्ठ कामरेड क्या कह रहे हैं जो आजकल 'आप'के पैरोकार बने हुये हैं ,देखें एक झलकी :
लब्ध-प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकार वीरेंद्र यादव जी पर 'घृणा निर्माण'का इल्ज़ाम लगाने वाले का अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय नेता के प्रति 'प्रेम -सम्मान' यह है :
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=489602807814378&set=gm.427019937399700&type=1&theater
26 दिसंबर 2010 को प्रदेश भाकपा कार्यालय में पार्टी के 86 वें स्थापना दिवस पर मुख्य वक्ता थे पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान साहब लेकिन उनके सम्बोधन के मध्य IAC के अरविंद केजरीवाल साहब वहाँ पधारे थे और सर्व-मान्य परम्पराओं को तोड़ते हुये संचालक प्रदीप तिवारी जी ने जो कि अंजान साहब से व्यक्तिगत रूप से नफरत करते हैं केजरीवाल साहब को मुख्य वक्ता के बाद सभा में भाषण देने को सहर्ष आमंत्रित किया था। अतः उनके ही बंधु आनंद तिवारी जी द्वारा अंजान साहब के प्रति व्यक्त दुर्भावनापूर्ण दृष्टिकोण अनायास ही नहीं है।
"मैंने 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' ब्लाग में पाँच सितंबर 2013 को कामरेड अतुल अंजान साहब की मऊ में सम्पन्न रैली के समाचार की कटिंग देते हुये एक पोस्ट निकाली थी। इस पोस्ट को प्रदीप तिवारी साहब ने इसलिए हटा दिया क्योंकि वह अपने राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान साहब को व्यक्तिगत रूप से नापसंद करते हैं। इतना ही नहीं इस पोस्ट के प्रकाशन का दायित्व मेरा था इसलिए मुझको भी ब्लाग एडमिन एंड आथरशिप से हटा दिया। "
http://communistvijai.blogspot.in/2013/09/blog-post_11.html
जबकि हकीकत यह है कि लखनऊ और लखनऊ के बाहर भी अतुल अंजान साहब भाकपा के पर्याय माने जाते हैं और पार्टी के भीतर जो लोग उनके बारे में अनर्गल प्रचार करते हैं वे वस्तुतः निजी स्वार्थों के कारण पार्टी को बढ़ते नहीं देखना चाहते ।
http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post_22.html
वे सभी लोग काफी समझदार थे उन्हें आसानी से सारी बातें समझ आ गईं और उन्होने मुझ से मेरे ब्लाग्स के रेफरेंस भी लेकर नोट कर लिए। फिर मेरा परिचय मांगने पर जब उन्हें बताया कि पेशे से ज्योतिषी और राजनीतिक रूप से कम्यूनिस्ट हूँ तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ और स्पष्टीकरण मांगा कि कम्यूनिस्ट पार्टी माने अतुल अनजान की पार्टी । जब जवाब हाँ मे दिया तो बोले अनजान साहब की पार्टी तो अच्छी पार्टी है । जैसे आगरा मे भाकपा की पहचान चचे की पार्टी या हफीज साहब की पार्टी के रूप मे थी उसी प्रकार लखनऊ मे भाकपा से तात्पर्य अनजान साहब की पार्टी से लिया जाता है। उनमे से दो-तीन लोग तो यूनीवर्सिटी मे अनजान साहब के साथ के पढे हुये भी थे ,इसलिए भी अनजान साहब की पार्टी मे मेरा होना उन्हें अच्छा लगा।
उनमे से एक जो बैंक अधिकारी थे ने बताया कि अब यू पी मे AIBEA को उसके नेताओं ने कमजोर कर दिया है जो खुद तो लाभ व्यक्तिगत रूप से उठाते हैं लेकिन कर्मचारियों की परवाह नहीं करते। इसी कारण छोटे स्तर के नेता प्रमोशन लेकर आफ़ीसर बन गए और दूसरे संगठनों की आफ़ीसर यूनियन से सम्बद्ध हो गए। वह यह चाहते थे कि अनजान साहब कुछ हस्तक्षेप करके AIBEA को फिर से पुरानी बुलंदियों पर पहुंचाने मे मदद करे जिसका लाभ पार्टी को भी मिलेगा।
30 सितंबर की लखनऊ रैली को अंजान साहब ने 'राजनीतिक सन्नाटा तोड़ने वाली' कहा था।
मैंने तब भी आशंका व्यक्त की थी :
जहां तक रैली की भौतिक सफलता का प्रश्न है रैली पूर्ण रूप से सफल रही है और कार्यकर्ताओं में जोश का नव संचार करते हुये जनता के मध्य आशा की किरण बिखेर सकी है। लेकिन क्या वास्तव में इस सफलता का कोई लाभ प्रदेश पार्टी को या राष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा?यह संदेहास्पद है क्योंकि प्रदेश में एक जाति विशेष के लोग आपस में ही 'टांग-खिचाई' के खेल में व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि प्रदेश में पार्टी का जो रुतबा हुआ करता था वह अब नहीं बन पा रहा है। ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न एक पदाधिकारी विशेष द्वारा निर्लज्ज तौर पर किया जाता है और उसको सार्वजनिक रूप से वाह-वाही प्रदान की जाती है। एक तरफ ईमानदार IAS अधिकारी 'दुर्गा शक्ती नागपाल'के अवैध निलंबन के विरुद्ध पार्टी सार्वजनिक प्रदर्शन करती है और दूसरी तरफ उत्पीड़क पदाधिकारी का महिमामंडन भी। यह द्वंदात्मक स्थिति पार्टी को अनुकूल परिस्थितियों का भी लाभ मिलने से वंचित ही रखेगी। तब इस प्रदर्शन और इसकी कामयाबी का मतलब ही क्या होगा?
और अब तिवारी बंधुओं के कारनामे इस आशंका को सही ही ठहरा रहे हैं। प्रदीप तिवारी जी ने रैली की सफलता और प्रदेश सचिव कामरेड डॉ गिरीश जी की प्रशंसा से खिन्न होकर उनको रैली के ग्लैमर से भ्रमित होना लोगों के बीच फुसफुसाया था।
इन परिस्थितियों में सुधा सिंह जी भाकपा से क्या आशा कर सकेंगी?
*जब दादरी में अनिल अंबानी के बिजली घर के वास्ते किसानों की ज़मीनें मुलायम शासन में जबरन छीनी जा रही थीं तब वी पी सिंह साहब द्वारा राज बब्बर के साथ मिल कर एक जबर्दस्त आंदोलन खड़ा किया गया था। किसान सभा के राष्ट्रीय महामंत्री और भाकपा के राष्ट्रीय सचिव की हैसियत से कामरेड अतुल अंजान साहब ने भी उसमें सहयोग किया था। इसी सिलसिले में पी एंड टी ग्राउंड ,आगरा में एक जनसभा में कामरेड अतुल अंजान ,वी पी सिंह और राज बब्बर के साथ मंच पर बैठे थे जैसे ही उनकी निगाह आगरा,भाकपा के जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी पर पड़ी जो ज़िला-स्तर के अन्य पार्टी नेताओं के साथ बैठे हुये थे। अंजान साहब ने अपने ठीक बगल में एक कुर्सी रखवा कर कामरेड मिश्रा जी को अपने साथ बैठा लिया था जो कि उनकी संवेदनाओं को ठीक से समझने का अनुपम दृष्टांत पेश करता है।
*कामरेड अतुल अंजान के किसान हितों में किए गए कार्यों हेतु ही बांगला देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा उनको ढाका बुला कर सम्मानित किया गया था जो तिवारी बंधुओं की आँखों से ओझल हैं।
*कामरेड रमेश मिश्रा जी ने ही कामरेड अंजान की एक और विशेषता का उल्लेख किया था कि जबकि वह किसी कार्यवश अजय भवन ,दिल्ली गए थे और वापिस ट्रेन पकड़ने हेतु स्टेशन जा रहे थे। कामरेड अंजान को अपनी कार से कहीं अन्यत्र जाना था किन्तु आगरा के जिलामंत्री रमेश मिश्रा जी पर निगाह पड़ते ही उनको कार से स्टेशन छोडने का प्रस्ताव कर दिया और उनके इस आग्रह पर भी कि वह खुद चले जाएँगे क्योंकि कामरेड अंजान को दूसरी दिशा में जाना है। कामरेड अंजान ने पहले मिश्रा जी को स्टेशन छोड़ा फिर अपने गंतव्य को गए।
एक सहृदय लोकप्रिय कामरेड पर प्रहार करके तिवारी बंधु उत्तर प्रदेश में भाकपा को मजबूत नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि यदि यहाँ कामरेड अतुल अंजान की अगुवाई में वामपंथी वैकल्पिक मोर्चा बंनता है तो जनता उसके प्रति निश्चय ही आकृष्ट होगी और उससे भाकपा को मजबूती एवं सफलता ही मिलेगी। 'चिराग तले अंधेरा' का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता है?
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