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Wednesday, 12 June 2019

एक ही रास्ता लोकतंत्र को बचाने का ------ अनिल सिन्हा







अनिल सिन्हा
लखनऊ का लोहिया पार्क : मूर्तियों और प्रतीकों तक सिमट गई है विचारधारा
देश के अधिकतर राजनीतिक दलों ने अपने आदर्श छोड़कर पूंजीवाद के आगे घुटने टेक दिए हैं
विचारधाराओं की वापसी से ही बचेगा लोकतंत्र : 
जातियों के कई राजनीतिक समूह अब बड़ी संख्या में उस बीजेपी के साथ हैं, जिसका विरोध दबे-कुचले तबके के लोग मनुवादी के रूप में करते रहे हैं
पहली बार किसी लोकसभा चुनाव के बाद देश की मुख्यधारा की राजनीति में विचारधारा का खालीपन आया है। किसी पार्टी या व्यक्ति को स्पष्ट बहुमत मिलने के उदाहरण पहले भी मिले हैं। बुरी तरह हारने की भी मिसालें हैं। 1977 की भारी पराजय के बाद इंदिरा गांधी की वापसी की कहानी भी हम जानते हैं। उसके बाद 15 वर्षों तक, एक छोटे अंतराल को छोड़कर, उनकी पार्टी कांग्रेस ही सत्ता में रही। लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि देश में विचारधाराएं बेअसर हो गई हैं। 1984 में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ दो सीटें मिलीं, मगर तब भी यह नहीं लगा कि संघ परिवार की विचारधारा खत्म हो गई है। देश में विचारधारओं का एक इंद्रधनुष खिला रहा। इस बार का चुनाव इस मायने में भिन्न है कि भारतीय राजनीति में विचारधाराओं की उपस्थिति पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

 जातियों के समूह :

वामपंथी पार्टियों की ऐसी बुरी हालत कभी नहीं हुई थी। सामाजिक न्याय की शक्तियों के रूप में करीब चालीस साल से उत्तर भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं समाजवादी विरासत वाली पार्टियों का अस्तित्व बचा भी है तो जाति विशेष के समूहों के रूप में। जातियों के कई राजनीतिक समूह अब बड़ी संख्या में उस बीजेपी के साथ हैं जिसका विरोध दबी जातियों के लोग मनुवादी के रूप में करते रहे हैं। व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमने वाली तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, टीडीपी जैसी पार्टियां, जो स्थापित केंद्रीय सत्ता के विरोध में सेक्युलर जनाधार वाली पार्टियां थीं, काफी कमजोर साबित हुई हैं। अलग-अलग पार्टियों पर नजर दौड़ाएं तो साफ दिखाई देता है कि वहां विचारधाराओं की छाया भी नहीं है। वे कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों का वाहक बनने की सिर्फ कोशिश करती दिखाई देती हैं। यही वजह है कि राजनीति में वे शब्द अपना लिए गए हैं जो दुनिया में पूंजी के प्रवाह को आसान बनाने वाली संस्थाओं- विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष- की पंसद के हैं। इन्हीं में से एक शब्द है विकास। हर पार्टी कहने लगी है कि विकास ही उसका अजेंडा है। विकास का मतलब है सड़क, बिजली, पानी, बांध, फ्लाईओवर, शहरों का सौंदर्यीकरण आदि। शिक्षा और स्वास्थ्य भी इसमें शामिल है। रोजगार और गरीबी हटाना इसके नतीजे हैं, लक्ष्य नहीं। पाटियों ने भी यह कहना छोड़ दिया है कि रोजगार और गरीबी हटाना उनका लक्ष्य है। लक्ष्य तो विकास ही है।

कई लोगों को इससे एतराज हो सकता है, लेकिन सचाई यही है कि अपने तमाम विरोध के बावजूद वामपंथी पार्टियों का मुख्य अजेंडा भी अब विकास ही है। यह जरूर है कि वे इस अजेंडे को पूरा करने में सरकारी क्षेत्र का योगदान महत्वपूर्ण मानती हैं और अपने राज्यों में सरकारी कंपनियों को जिंदा रखने की कोशिश करती हैं। इसे छोड़ दें तो उन्होंने वैकल्पिक आर्थिक नीतियों का मॉडल पेश नहीं किया है। यह काम वामपंथी सरकार भारी बहुमत के बाद भी पश्चिम बंगाल में नहीं कर पाई। सिंगूर और नंदीग्राम में उदारवादी आर्थिक नीतियों को अपनाना ही उनकी पराजय का कारण बना। 

विकास की इस अवधारणा में आर्थिक बराबरी कोई मूल्य नहीं है और इसमें बाजार ही अंतिम फैसला करता है। वामपंथी पार्टियां किसान और मजदूरों का संगठन बनाती हैं, लेकिन बराबरी के मुद्दे पर ढीली पड़ गई हैं। पुरानी समाजवादी पार्टियों से निकली सामाजिक न्याय की पार्टियां आरक्षण और सत्ता में दलित-पिछड़ों को प्रतिनिधित्व के सवाल को ही उठाती हैं, समता को मुख्य सवाल नहीं बतातीं। डॉ. लोहिया और बाबा साहेब आंबेडकर की राजनीति की धुरी समता थी। उनके लिए आरक्षण या सत्ता में प्रतिनिधित्व जाति के उन्मूलन और समतावादी समाज बनाने का साधन था। मगर सामाजिक न्याय की पार्टियां अपनी-अपनी जातियों की सत्ता में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी के अजेंडे में ही लगी हैं। सत्ता में प्रतिनिधित्व को लक्ष्य बनाने का नतीजा हुआ है कि पार्टियां जाति संगठन बन गई हैं और सिद्धांत से उनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है। ऊपर से तो यही लगता है कि बीजेपी ही एकमात्र पार्टी है जो दक्षिणपंथ के अपने अजेंडे को लेकर चल रही है और हिंदू राष्ट्रवाद के सपने को सच करना चाहती है। लेकिन यह भी आंशिक सच है। गौर से देखने पर पता चलता है कि हिंदू राष्ट्र का उसका अजेंडा मुक्त बाजार और देशी-विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में चलने वाली अर्थव्यवस्था को टिकाने का एक रास्ता भर रह गया है। उसने पश्चिमी अर्थव्यवस्था के विकल्प के रूप में स्वदेशी की अवधारणा रखी थी। उसे छोड़ कर वह विदेशी कंपनियों को अपने संसाधन सौंपने में उत्साह से जुटी है। उसके राष्ट्रवाद में अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मुलम्मा भी नहीं रह गया है। इसमें अब सिर्फ मुसलमानों से नफरत ही मुख्य तत्व है। आखिर पिज्जा हट और मैकडॉनल्ड की संस्कृति में भारतीय क्या हो सकता है ?  

 उदारवादी आर्थिक नीति : 

क्या भारतीय राजनीति से विचारधाराएं सदा के लिए विदा ले चुकी हैं हरगिज नहीं। गौर से देखें तो जनता तमाम पार्टियों को नकार रही हैं क्योंकि उनके पास विकास की विचारधारा, जो वास्तव में संसाधनों पर बड़ी कंपनियों के कब्जे का प्रॉजेक्ट है, को छोड़ कर कोई विचारधारा नहीं है। बीजेपी की विजय भी उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण नहीं हुई है। लोगों ने उसे भारतीय राष्ट्र को बचाए रखने के लिए वोट दिया है जिसकी स्थापना आजादी के आंदोलन ने की है। उसने एक खास समुदाय और पड़ोसी देश को इसका विरोधी साबित किया। विपक्ष इसे गलत नहीं ठहरा पाया। यही वक्त है कि विचारधाराएं सच्चे रूप में लोगों के सामने आएं। कांग्रेस, सामाजिक न्याय की पार्टियों, क्षेत्रीय दलों और  वामपंथी  पार्टियों को विचारधाराओं की ओर लौटना होगा। लोकतंत्र को बचाने का यही एक रास्ता है।
http://epaper.navbharattimes.com/details/38964-76896-2.html

Saturday, 27 April 2019

कन्हैया कुमार की सफलता हेतु शुभकामनायें ------ विजय राजबली माथुर







कन्हैया के प्रचार में शबाना आज़मी को सुनते हुये 
कन्हैया का 26 अप्रैल 2019 वाला भाषण सुनते हुये 






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जब से  कन्हैया कुमार पर झूठा इल्जाम लगाया गया है हम लोग उनकी सफलता की शुभकामना करते रहे हैं। जब 18 सितंबर 2016 को वह रवींद्रालय , लखनऊ आए तब उनको  साक्षात सुनने व उनसे मुलाक़ात करने का मौका भी मिला है। 
हम उनके निर्वाचन क्षेत्र में प्रचार करने तो न जा सके किन्तु  घर पर बैठे - बैठे उनके कार्यक्रमों से अवगत होते रहे हैं। उनकी सार्वजनिक अपील पर भी तुच्छ योगदान ही कर सके। 
हम लोग उनके सांसद निर्वाचित होने हेतु हार्दिक आशीर्वाद देते हैं और अग्रिम बधाई भी मंगलकामना सहित प्रेषित करते हैं। 
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Apr 27, 2019


Pulse of India /जनता की नब्ज़ को टटोलने वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह पहुंची बिहार के बेगुसराय में। सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को तमाम वाम दलों के साथ-साथ व्यापक समुदाय का समर्थन हासिल है। पूरे बिहार में सबसे ज्यादा अगर किसी सीट की चर्चा है, तो वह है बेगुसराय और बेगुसराय में हर तरफ चर्चा का विषय बने हुए हैं कन्हैया। विरोधी खेमे से लेकर समर्थकों के बीच बेगुसराय का यह लाल भारी है। बेगुसराय सीट पर सिर्फ वाम कतारों की ही नहीं, देश के बड़े जम्हूरियत पसंद तबकें की आस टिकी है : 

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Saturday, 20 October 2018

सर्वसत्ताग्राही अराजक गिरोह बन चुके हैं आरएसएस और भाजपा ------ डा॰ गिरीश



हाथरस में दशहरे के दिन आरएसएस के शस्त्र पूजन कार्यक्रम में आग्नेयास्त्रों से हुयी फायरिंग में प्रेस फोटोग्राफर के गंभीर रूप से और फायरिंग करने वाले विधायक पुत्र के मामूली रूप से घायल होने से हाथरस ही नहीं देश के तमाम सामाजिक, राजनैतिक हल्कों और मीडियाकर्मियों के बीच गहरी बहस छिड़ गई है।

ज्ञातव्य हो कि दशहरे के दिन संघ के लोग हर साल शस्त्र पूजन करते हैं जिसमें भाजपाई भी बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं। हाथरस में यह आयोजन स्थानीय श्री बागला इंटर कालेज में किया गया। इस बार केन्द्र में और उत्तर प्रदेश में सत्ता में होने का नशा सिर पर चढ़ कर बोल रहा था तो संघी और भाजपाइयों ने लुत्फ उठाने को एक से बढ़ कर एक आला हथियारों से फायरिंग शुरू कर दी।

इसी बीच फायरिंग कर रहे हाथरस अनुसूचित विधानसभा क्षेत्र के विधायक ने अपनी रायफल अपने बेटे को थमा दी और फिर विधायक पुत्र ने हथियार पर हाथ आजमाना शुरू कर दिया। इस बीच अनाड़ीपन से चलायी जारही रायफल की गोली उलटी चल गयी फलतः रायफल की मैगजीन फट गयी। परिणामस्वरूप मैगजीन का एक बड़ा टुकड़ा शस्त्र प्रदर्शन का कवरेज कर रहे प्रेस फोटोग्राफर की गर्दन में जा धंसा और वह गंभीर रूप से घायल होगया। विधायक पुत्र के भी खरौंचे लगी हैं।

घायल फोटोग्राफर को अलीगढ़ रेफर किया गया जहां आपरेशन के बाद उसकी हालत में सुधार होरहा है। विधायकपुत्र घर पर ही आराम फरमा रहे हैं।

सामान्य रूप से यह कानून व्यवस्था का मामला दिखाई देता है। कालेज के प्रधानाचार्य द्वारा दिये गए बयान के अनुसार  संघ के स्थानीय प्रमुख ने उनसे सुबह कुछ घंटे दशहरा मनाने को कालेज परिसर में जगह मांगी थी, शस्त्र संचालन के लिए नहीं। स्थानीय प्रशासन ने भी कहा है कि कार्यक्रम की अनुमति नहीं लीगयी थी। अब सवाल उठता है कि बिना अनुमति किये जारहे आयोजन में संगीन आग्नेयास्त्र लिये लोग एकत्रित होते रहे, सत्ता के घमंड में चूर संघी और भाजपाई फायरिंग करते रहे लेकिन प्रशासन ने उधर से आँखें फेरे रखीं। जबकि हर्ष फायरिंग पूरी तरह से प्रतिबंधित है और इस प्रतिबंध को अमल में लाने का दायित्व शासक दल और उसके मातहत प्रशासन पर है।  

इतना ही नहीं कई घंटों तक पुलिस- प्रशासन ने घटना को नजरंदाज किया और कोई तहरीर न होने का बहाना बनाते हुये एफ॰ आई॰ आर॰ तक दर्ज नहीं की। बाद में राजनैतिक और पत्रकारिक हलकों में कड़ी प्रतिक्रिया को देखते हुये तथा अपने को औरों से अलग कहने वाली पार्टी के विधायक विरोधी खेमे के सक्रिय होने के बाद पुलिस को मजबूरन अपनी ओर से एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। सभी फायरिंग करने वालों को चिन्हित कर कार्यवाही होगी या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। जख्मी मीडिया कर्मी को पर्याप्त मुआबजा देने की मांग भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित कई स्थानीय संगठनों ने की है।

सवाल यह है कि क्या आरएसएस एक संविधान, न्यायप्रणाली और लोकतान्त्रिक व्यवस्था का विरोधी संगठन नहीं बन चुका है। दशहरे पर किसी व्यक्ति या परिवार द्वारा शस्त्र पूजन की परंपरा रही है। लेकिन आरएसएस इसे अपने घ्रणित उद्देश्यों के लिये स्तेमाल करता है। कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखा कर पूजन के नाम पर शस्त्र प्रदर्शन और परेड निकालने वाले संघ ने आजादी के बाद हुये कई युद्धों के लिये अपनी निजी सेनाओं को भेजने का आफ़र क्या कभी सरकार को दिया? नहीं न। दरअसल उसका शस्त्र पूजन और पथ संचलन अल्पसंख्यकों, दलितों और अन्य कमजोरों में दहशत पैदा करने का माध्यम है, राष्ट्र रक्षा का नहीं।

आज संघ गिरोह सबरीमाला में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की धज्जियां बिखेर कर महिलाओं के मंदिर प्रवेश को रोकने वाली दकियानूस और कट्टरपंथी ताकतों की अगुवाई कर रहा है। 6 दिसंबर 19992 में इसी गिरोह ने राष्ट्रीय एकता परिषद और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को ठेंगा दिखा कर बाबरी ढांचे का ध्वंस किया था। मामले के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद वे 2019 में हर हाल में मंदिर निर्माण की घोषणायेँ कर रहे हैं। वोट और सत्ता के लिये वे कानून हाथ में लेने, संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की प्रभुता को पैरों तले रौंदने से न वे पहले कभी चुके हैं न आगे चूकने वाले हैं। सभी लोकतान्त्रिक और लोकहितकारी ताकतों को यह साफ तौर पर समझना चाहिए।

प्राक्रतिक आपदाओं के समय किसी सुरक्षित से स्थान पर राहत कार्य करते हुये फोटो खिंचवा कर वाहवाही लूटना इनका एक और प्रमुख शगल है। हाल ही में केरल में आयी महाविपत्ति के बीच राहत कार्य में जुटे भाकपा के एक मंत्री की फोटो वायरल कर संघियों ने दाबा ठोका कि उसके लोग राहत कार्य में जुटे हैं। किसी कमजोर की मदद करते, किसी बलात्कारी या हत्यारे का सामाजिक बहिष्कार करते, किसी कर्ज में डूबे किसान की कर्ज से मुक्ति में मदद करते, किसी नौकरी से हठाए गये अथवा बेरोजगार युवक को नौकरी दिलवाते अथवा भारतीय संसक्रति के उदार पक्षों को उद्घाटित करते इस कथित सामाजिक- सान्स्क्रतिक संगठन को देखा नहीं गया। अलबत्ता इसके उलट तमाम कारगुजारियों में इसे हर रोज लिप्त पाया जाता है। मोब लिंचिंग के हर मामले में संघ गिरोह लिप्त पाया गया है।

व्यवस्था, लोकतन्त्र, संविधान और न्याय प्रणाली के लिये चुनौती बन चुके संघ परिवार को सामाजिक और कानूनी तौर पर नियंत्रित करने की जरूरत है। सभी लोकतान्त्रिक ताकतों को इस हकीकत को समझना चाहिये। इन सभी शक्तियों के सामूहिक और निजी प्रयासों से ही यह संभव है। कांग्रेस और मध्यमार्गी दलों को समझना होगा कि संघ के प्रति उनके ढुलमुल द्रष्टिकोण से देश और उसकी लोकतान्त्रिक प्रणाली को भारी हानि उठानी पड़ सकती है।

डा॰ गिरीश

Thursday, 30 August 2018

दक्षिण पंथी तानाशाही स्थापित करने का कुचक्र है अर्बन नक्सल का शिगूफ़ा ------ विजय राजबली माथुर










सिद्धार्थ शंकर रे जब बंगाल के मुख्यमंत्री बने तब उन्होने बर्बरतापूर्वक नक्सल आंदोलन के कार्यकर्ताओं को कुचल डाला था।छिट - पुट यह आंदोलन विभक्त होते हुये भी चलता ही रहा है क्योंकि, सैद्धान्तिक रूप से यह जायज मांगों पर आधारित है इसलिए पीड़ित जनता इनका साथ देती है। किन्तु सरकारें पूँजीपतियों और विशेषकर कारपोरेट घरानों के हितार्थ इनका दमन  अमानवीयता के साथ क्रूरतापूर्वक करती हैं। 
किन्तु इस बार जून 2018 से इनके नाम पर मानवाधिकार के लिए संघर्ष करने वाले बुद्धिजीवियों को शिकार बनाया जा रहा है। दक्षिण पंथी तानाशाही स्थापित करने के लिए विवेकशील बुद्धिजीवियों पर मोदी सरकार का यह हमला गृह युद्ध की दिशा में एक और बढ़ा हुआ कदम है।  
लगभग 39   वर्ष पूर्व सहारनपुर के 'नया जमाना'के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1951  - 52 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व .लिंमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि, कम्युनिस्टों  और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।


आज संघ और उसके सहायक संगठनों ने सड़कों पर लड़ाई का बिगुल बजा दिया है, वामपंथी अभी तक कागजी तोपें दाग कर सांप्रदायिकता का मुक़ाबला कर रहे हैं;  प्रश्न यह है कि, व्यापक जन-समर्थन और प्रचार के बगैर क्या वे संघियों के सांप्रदायिक राक्षस का संहार कर सकेंगे? सर्वोच्च न्यायालय के सहारे लोकतन्त्र की रक्षा कब तक की जा सकती है ? ऐसे में सशस्त्र संघर्ष के हामी युवक ही संघ का मुक़ाबला करने को डटेंगे लेकिन बिना जन - समर्थन के 1857 की क्रांति की पुनरावृति होगी या वे कामयाब होंगे ? 
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31-08-2018 : 
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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग ------ डा॰ गिरीश



भाकपा ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की निन्दा और रिहाई की मांग की।


 लखनऊ- 29 अगस्त 2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मण्डल ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुध्दिजीवियों सुधा भारद्वाज, वरनन गोन्साल्वस, गौतम नवलखा, वरवारा राव एवं अरुण फ़रेरा जो दलितों, आदिवासियों और समाज के अन्य कमजोर तबकों के लिये संघर्ष करते रहे हैं के घरों पर देश भर में की गयी छापेमारी और उनकी गिरफ्तारी की कड़े शब्दों में निन्दा की है।

सरकार ने उनके ऊपर शहरी नक्सलवादी होने का काल्पनिक आरोप लगाया है। यह कितना आश्चर्यजनक है कि एक ओर सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिये नक्सलवाद के खत्म होने के दाबे करती है वहीं दूसरी तरफ प्रतिरोध की आवाज को दबाने को हर घ्रणित हथकंडा अपना रही है।

भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसक वारदातों के बाद भाजपा की केन्द्र और महाराष्ट्र सरकार इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ऊपर फर्जी आरोप लगाने और उनको माओवादियों से जोड़ने के लिये विभिन्न जांच एजेंसियों का स्तेमाल करती रही हैं।

भाकपा की यह द्रढ़ राय है कि यह सब कार्यवाही सनातन संस्था द्वारा ईद और गणेश चतुर्थी पर सीरियल ब्लास्ट करने की योजना और गौरी लंकेश, दाभोलकर, गोविंद पनसारे और दूसरे पोंगापंथ विरोधियों की हत्या में इनकी संलिप्तता से ध्यान हटाने के उद्देश्य से कीगयी है।

यह दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों तथा समाज के अन्य कमजोर तबकों के ऊपर होने वाले अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को धमका कर उनकी आवाज बन्द करने की साजिश है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर गंभीर टिप्पणी की है कि असहमति की आवाज लोकतन्त्र के लिये सेफ्टी बाल्व है।

इन कारगुजारियों से एक बार फिर वर्तमान सरकार का फासीवादी चेहरा सामने आगया है। यह घटनाक्रम एक बार फिर भारतीयों के संवैधानिक अधिकारों और लोकतन्त्र की रक्षा के लिये सभी धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक एवं वामपंथी ताकतों की एकता और कार्यवाही की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भाकपा सभी गिरफ्तार शख़्सियतों की तत्काल रिहाई और उन पर लगाये गए सभी झूठे और मनगढ़ंत आरोपों की वापसी की मांग करती है।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश
सभी फोटो साभार का ॰ अरविंद राज स्वरूप 



Monday, 27 August 2018

अस्थियों पर वोट की राजनीति कर रहे हैं संघ और भाजपा ------ डा॰ गिरीश / लोकतन्त्र खतरे में वाम दलों को सभी गैर सांप्रदायिक ताकतों के साथ होना चाहिए ------ डॉ अमर्त्य सेन




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प्रक्रति के प्रकोप के चलते कई वर्षों से गुमनामी के अंधेरे में खोये रहे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी अंततः इस दुनियां को अलविदा कह गये। उनकी मौत पर हर कोई दुखी था और दलीय तथा विचारधाराओं की सीमायें लांघ कर लगभग सभी दलों ने उन्हें सादर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी जो वैचारिक रूप से संघ और भाजपा की सांप्रदायिक, विभाजनकारी, फासीवादी और जनविरोधी नीतियों की मुखर आलोचक रही हैं।
इसका कारण यह था कि हम एक बहुदलीय लोकतन्त्र में जीरहे हैं जिसमें राजनैतिक विरोध स्वाभाविक है, व्यक्तिग्त विरोध का कोई स्थान नहीं। हालांकि राजनैतिक दलों की संकीर्णता और निहित स्वार्थों के चलते समय समय पर व्यक्तिगत विरोध भी छलकता रहता है। दूसरे हमारी ऐतिहासिक परंपरा है कि म्रत्यु के बाद मतभेद अथवा वैमनस्य खत्म होजाता है।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार ने श्री अटल बिहारी बाजपेयी जो कि कई वर्षों से संघ परिवार में पूरी तरह उपेक्षित थे और यदि वे स्वस्थ होते तो श्री आडवाणी जी की तरह ही घनघोर उपेक्षा के शिकार होते, की मौत को 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले वोट बटोरने के एक नायाब मौके के रूप में देखा और पूरा संघ परिवार उनकी मौत को भुनाने में जुट गया। अन्त्येष्टि से लेकर अस्थि कलश विसर्जन तक सबकुछ सुनियोजित तरीके से किया गया और आगे भी हमें ऐसे कई हथकंडे देखने को मिलेंगे।

2014 के लोकसभा चुनावों में वोट बटोरने के लिये उछाले गये जुमले जब बुरी तरह बेनकाब होकर निष्प्रभावी होगये तो 2019 के चुनाव की पूर्व वेला में श्री अटल बिहारी के दिवंगत होने की प्राक्रतिक घटना को संघ ने भुनाने की ठान ली। दिवंगत अटल बिहारी भाजपा के लिये अब ‘वोट बिहारी’ बन कर रह गये हैं। उनकी अस्थियाँ आज ‘वोटस्थियाँ’ और अस्थि कलश आज ‘वोट कलश’ बन कर रह गये हैं। यही वजह है कि श्री अटल के असली परिवारीजन और विपक्षी पार्टियां भाजपा पर आज हड्डियों पर राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं।

अब अस्थियों पर राजनीति करने की भाजपा और संघ की कोशिश कितनी सफल होगी यह तो भविष्य ही तय करेगा। पर ये वो आसुरी शक्तियां हैं जो अस्थियों पर राजनीति करने के लिये सुविख्यात हैं। राजनैतिक स्वार्थों के लिये ये अपनों की मौत को कई दिनों तक छिपाये रह सकते हैं। मौत की अधिक्रत घोषणा से पहले श्रध्दांजलि अर्पित कर सकते हैं। वोटों की खातिर सूखी आंखों को पोंछ कर गम का क्रत्रिम इजहार कर सकते हैं।

1989 में अयोध्या में कथित कार सेवकों जिन्होने इनके उकसाबे पर संविधान, राष्ट्रीय एकता परिषद और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की धज्जियां उड़ायीं थीं, की कथित हड्डियों को गांव गांव गली गली घुमाकर इन्होने समाज विशेष की कोमल भावनाओं को सांप्रदायिक ज्वार में बदला और फिर उनके नाम पर वोट बटोर कर उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में सत्तायें हथियायीं। उसी सरकार की छतरी तले वे सारे कायदे कानूनों और आदेशों निर्देशों को ठेंगा दिखा कर बाबरी ढांचे को ध्वस्त कर चुके हैं। इससे उपजे सांप्रदायिक विभाजन पर ये आज तक वोटों की फसलें उगा रहे हैं।

अपने सुपरिचित हथकंडों को अपनाते हुये आज वे पुनः श्री अटल बिहारी बाजपेयी की अस्थियों पर वोट की फसल उगाने की कोशिश में जुटे हैं। हिन्दू धर्म और परंपराओं के रक्षक होने का दाबा करने वाले ये लालची धर्म और परंपराओं को भी भूल गये। शास्त्रों के अनुसार अस्थियों का विसर्जन किसी मान्य तीर्थस्थल पर निकटस्थ परिजनों द्वारा एकल रूप से किया जाना चाहिये ताकि दिवंगत आत्मा को चिरस्थायी शान्ति प्राप्त होसके। लेकिन इन्होने उन्हे 4000 भागों में बांट दिया। अब मुश्किल से 70- 75 ग्राम आस्थियाँ चार हजार कलशों में क्यों और कैसे विभाजित की गईं यह तो भाजपा ही बता सकती है।

अटलजी उस संघ के कार्यकर्ता थे जिसके पास तिल को ताड़ बनाने की ताकत है। वह संघ जो अपने झूठे प्रचार और मैसमेरिज्म के जरिये करोड़ों लोगों को भ्रमित कर गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने को मंदिरों के बाहर कतारों में खड़ा कर सकता है। उसी संघ की छतरी तले अटल जी का अधिकांश जीवन विपक्ष में ही बीता। उनकी वाकपटुता को संघ ने खूब भुनाया। वे कई बार चुनाव हारे तो संघ ने उसे एक योग्य नेता का अपमान प्रचारित किया। पहली बार वे जोड़तोड़ से प्रधानमंत्री बने और विश्वास हासिल नहीं कर पाये। संघ ने प्रचारित किया कि यह एक योग्य व्यक्ति को सत्ता से दूर रखने की साजिश है। अंततः वे फिर जोड़तोड़ से प्रधानमंत्री बने। संघ ने जनता को फर्जी ‘फील गुड’ का अहसास कराया और ‘इंडिया इज शाइनिंग’ का जुमला उछाला। लेकिन 2004 में जनता ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसके बाद वे गुमनामी में किसी और ने नहीं उसी संघ और भाजपा ने धकेल दिये जिनके कि वे सदैव संकटमोचक बने।

‘जिन्दा हाथी लाख का मरा डेढ़ लाख का’ की तर्ज पर भाजपा आज उनकी सीमित लोकप्रियता को बढ़ा चड़ा कर पेश कर रही है। वह आज उन्हें आजादी के बाद का सबसे महान नेता जताने का प्रयास कर रही है। संघ उस ऐतिहासिक तथ्य को भी ढांपना चाहता है कि वह आजादी के आंदोलन से बाहर था और उसके द्वारा क्रत्रिम तौर पर गड़े और खड़े किये गये क्रत्रिम नायक या तो अंग्रेजों से माफी मांग रहे थे या फिर आजादी के लिये जूझने वालों के खिलाफ गवाहियाँ डेराहे थे। वीर सावरकर और अटल बिहारी संघ द्वारा गड़े गये नायकों में सबसे आगे की कतार में खड़े हैं।

उनके पास आज आज सत्ता है, सत्ता के कारण भीड़ है, पर्याप्त संख्या में संघ का काडर है, दौलत है और सबसे ऊपर हवाबाज़ मीडिया है। इस सबके बल पर वे अटलजी का क्रत्रिम महिमा क्षेत्र तैयार कर रहे हैं। भूख, गरीबी, दमन, अत्याचार से दमित जनता का ध्यान बंटाने की कोशिश कर रहे हैं। हर चुनाव क्षेत्र तक लाव लश्कर के साथ पहुँचने के लिये गंदी संदी नालेनुमा नदियों तक में अस्थि विसर्जन का ढोंग रचा जारहा है। आयोजनों पर अनाप शनाप जनता की गाड़े पसीने की कमाई को बहाया जारहा है। आपदाग्रस्त केरल को मात्र रु॰ 600 करोड़ देकर हाथ झाड लिये गये मगर वोट कलश विसर्जन पर अथाह धन व्यय किया जारहा है। देश के कोने कोने में बाड़ आयी हुयी है। आम जनता पर अनेक मुसीबतों का पहाड़ टूटा पड़ा है, पर मान्य मंत्रीगण कंधों पर कलश लिये घूम रहे हैं। वोट बटोरने की इस म्रग मरीचिका में वे अपने निर्धारित दायित्वों से भाग रहे हैं।

अब यह तो वक्त ही बताएगा कि 2004 में खुद सिंहासन पर आरूढ़ प्रधानमंत्री श्री बाजपेयी तत्कालीन एनडीए को बहुमत नहीं दिला पाये तो क्या आज के एनडीए की डूबती नाव को पार लगा पायेंगे। पर संघ और भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों की पूर्ववेला में हुयी श्री अटल की मौत को राजनैतिक रूप से भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।

डा॰ गिरीश

Monday, 2 May 2016

विविधता में एकता वाले देश में एकल विचारधारा नहीं थोपी जा सकती ------ कन्हैया कुमार






पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हाल में मजदूर दिवस : पहली मई को ए आई एस एफ तथा ए आई वाई एफ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'आज़ादी कार्यक्रम ' में जे एन यू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने शिक्षा को धर्म निरपेक्षता एवं वैज्ञानिक आधार पर समान रूप से सबको उपलब्ध कराने की मांग उठाई। नौजवानों, छात्रों तथा प्रबुद्ध जनों से खचाखच भरे हाल में कन्हैया को सुनने के लिए लोगों में तीव्र जिज्ञासा व उत्सुकता पाई गई। 

कन्हैया ने बेबाक कहा कि, जो लोग आज़ादी के आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों की चापलूसी करते थे आज संविधान प्रदत्त जन अधिकारों को छीनने का कुचक्र रच रहे है और इसके लिए वे जातिगत व सांप्रदायिक आधार पर जनता को बांटने तथा आपस में लड़ाने का ताना बाना बुन रहे हैं। उन्होने देश की जनता से अपील की कि, हमें न्यूनतम सहमति के आधार पर अधिकतम एकता की बात करनी चाहिए और अपने देश की 'विविधता में एकता ' वाली संस्कृति की रक्षा के लिए खड़े होना चाहिए। एक रंग और एक  राग अलापने वालों से सावधान रह कर रंग- बिरंगी छटा बिखेरते हुये भारत को लोकतान्त्रिक समाजवादी व्यवस्था पर चलाने के लिए भेदभाव मूलक ब्राह्मण वाद एवं शोषण पर आधारित पूंजीवाद का विरोध करने का उन्होने जनता से आह्वान किया। 





Sunday, 17 April 2016

जो लोग संविधान के पक्ष में हैं वे एक तरफ आना होगा ------ कन्हैया कुमार

 डॉ अंबेडकर जयंती 14 अप्रैल 2016 , नागपूर :






नागपुर । जेएनयू अध्‍यक्ष कन्‍हैया कुमार का दावा है कि भारत से अलग पाकिस्‍तान बनाने की अवधारणा मोहम्‍मद अली जिन्‍ना के बजाय सबसे पहले वीर सावरकर ने रखी थी। नागपुर में कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत में कन्‍हैया ने यह दावा किया।

इससे पहले उन्‍होंने कहा कि देश को मोदी से, संसद को आरएसएस से और संविधान को मनुस्‍मृति से बदले जाने के खिलाफ वे लड़ाई लड़ते रहेंगे। कन्‍हैया से जब पूछा गया कि कांग्रेस के सह आयोजन वाले कार्यक्रम का न्‍योता उन्‍होंने कैसे स्‍वीकार किया।

इस पर जवाब आया,’मैंने किसी को मुझे बुलाने के लिए नहीं कहा। यह देश संविधान से चलेगा या मनुस्‍मृति से इस सवाल पर लोकतंत्र में हमें एक लाइन खींचनी होगी। जो लोग संविधान के पक्ष में हैं वे एक तरफ आना होगा। मेरे भाषण में मैंने लोकतंत्र को लेकर मौजूद खतरे पर ही चर्चा की।

जहां तक साम्‍प्रदायिकता की बात है तो हमें इतिहास में जाना होगा जहां से इसकी शुरुआत हुई। दो देशों की धारणा की नींव रखने वाले सावरकर थे न कि मोहम्‍मद अली जिन्‍ना।’ नेशनल कॉलेज में कन्‍हैया पर जूता भी फेंका गया, इस बारे में उन्‍होंने कहा,’जब मैं जेल से नहीं घबराया तो जूते से कोई असर नहीं पड़ेगा।

अगर आप हिंदुत्‍व के सच्‍चे सिपहसालार हैं तो आप हिंसा क्‍यों कर रहे हैं।’ उन्‍होंने कहा,’नागपुर संघभूमि नहीं दीक्षाभू‍मि है। इसका संबंध अंबेडकर से न कि गोलवलकर से, ठीक वैसे ही जैसे गुजरात का संबंध गांधी से न कि मोदी से। इस शहर में फुल दिमाग वाले लोग रहते हैं न कि हाफ वाल पैंट वाले।’ कन्‍हैया ने आरएसएस और भाजपा को हिटलर के बाराती की संज्ञा भी दे डाली।

कन्‍हैया ने पीएम मोदी के 56 इंच के सीने वाले बयान पर हमला करते हुए कहा,’ सामाजिक आर्थिक समानता के लिए हमें लड़ना होगा। 56 इंच के सीने वालों को हम 18 इंच के सीने वाले मिलकर नीचे गिराएंगे।’

जूते फेंकने की घटना के बारे में उन्‍होंने कहा,’ ये वही लोग हैं जिन्‍होंने आजादी के 50 साल बाद तक तिरंगा नहीं फहराया। जिन्‍होंने अंग्रेजों के लिए जासूसी की। देश को लूटा। अब वे हमें देशभक्ति सिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

हमने जेएनयू में कभी देश विरोधी ताकतों की मदद नहीं की। इन लोगों ने छेड़छाड़ कर वीडियो बनाए। राज्‍य सभा टिकट का वादा कर एक टीवी चैनल के मालिक को खरीद लिया और मेरी छवि खराब करने की कोशिश की।’

साभार :
http://www.rashtradhara.com/national-news/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%9F%E0%A4%B2%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98-%E0%A4%94%E0%A4%B0/


कन्हैया कुमार की नागपूर स्पीच :


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Wednesday, 30 March 2016

विरोधियों को राष्ट्रविरोधी घोषित करने की मुहिम ------ इरफान हबीब

(लेखक इतिहासकार हैं)
इसका असर क्या होगा, यह किस हद तक जाएगा, यह कहना तो बड़ा मुश्किल है. भारत बड़ा देश है. सिर्फ आरएसएस ही भारत नहीं है. देश की सारी जनता वैसी ही नहीं है जैसी भाजपा समझती है. उन्हें मात्र 31 प्रतिशत वोट मिले हैं. लेकिन जो मौका मिला है, वे समझते हैं कि इसका फायदा उठाकर मनमानी कर लें. 

*****इस पूरी बहस के सहारे कोशिश की जा रही है कि भाजपा और आरएसएस के खिलाफ जो भी लोग हैं उन्हें राष्ट्रविरोधी घोषित किया जाए. ये मुहिम चला रहे हैं. हर जगह जनता में बंटवारे की कोशिश की जा रही है. अगर यह तर्क है कि देश को बचाने के लिए यह राष्ट्रवादी अभियान चलाया जा रहा है तो देश पर कौन सा ऐसा खतरा आ गया है जिससे वे बचा रहे हैं? राष्ट्र काफी पुराना शब्द है, उसका मतलब एक देश से होता है. अंग्रेजी शब्द जो नेशन है उसके मायने भी बदलते रहे हैं, लेकिन आखिर में उसे समझा जाता है कि वह एक ऐसा मुल्क है जिसके लोग चेतना संपन्न हों, उन्हें यह एहसास हो कि हम इस मुल्क के हैं और हमारी हुकूमत होनी चाहिए. वह राष्ट्र बनता है. राष्ट्र कोई ऐसी चीज नहीं है कि वह कोई जमीन का टुकड़ा हो, या कोई भौगोलिक देश हो, लोग होते हैं जो राष्ट्र निर्मित करते हैं.

यहां तो यह समझा जाता है कि हदबंदी कर रखी है. किसी ने कह दिया कि उस देश से आप सुलह कर लो, कुछ उन्हें दे दो, कुछ उनसे ले लो, जो उनके पास है उसे रहने दो, जो हमारे पास है वो हमारे पास रहे तो यह कोई गैर-राष्ट्रीयतावाद है. असली चीज तो यह है कि आप देश के लोगों से प्रेम करते हैं कि नहीं करते हैं. 1947 से पहले तो वही लोग देशभक्त कहे जा सकते थे जो अंग्रेजों के विरोधी हों. उसमें तो आरएसएस और हिंदू महासभा ने कोई खास काम नहीं किया. आरएसएस ने तो बिल्कुल नहीं. 1947 तक इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कोई मुहिम नहीं चलाई. मुसलमानों का विरोध करते रहे और कांग्रेस का विरोध करते रहे. यह समझ में नहीं आता कि ये कैसी देशभक्ति है! जब देश को देशभक्ति की जरूरत थी तब तो आप मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए.

आजादी के आंदोलन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं रही. इन्होंने उसे बार-बार तोड़ने की कोशिश की. टू नेशन थ्योरी की बात करते थे. गोलवलकर ने अपनी किताब में ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में यही लिखा है कि सिर्फ हिंदू यहां के नागरिक होंगे, बाकी नहीं होंगे. यह 1937 में लिखी हुई किताब है, जिसे ये अपना बाइबिल मानते हैं. इस तरह की बात से तो अंग्रेजों को लाभ ही होगा. पूरे राष्ट्रीय आंदोलन को तो इन्होंने नुकसान ही पहुंचाया है.

आजादी के बाद अगर आप सरकार के साथ आरएसएस का पत्र व्यवहार देखें तो ये तिरंगा झंडा मानने को तैयार नहीं थे. तब भारत सरकार ने कहा, तभी आप जेल से छोड़े जाएंगे जब झंडा स्वीकार करेंगे. उस वक्त तक ये संविधान नहीं बना था. उस समय जो सरकार थी, जिसने कानून बनाया था. उसके बाद 1950 में हमारा संविधान बना, उसको भी मानने को तैयार नहीं थे. उसी तरह झंडे को मानने को तैयार नहीं थे. इस बात के कागजात मौजूद हैं कि इन्होंने देश के प्रतीकों को मानने से इनकार किया था. लेकिन जब बताया गया कि अगर आप नहीं मानेंगे तो रिहा भी नहीं होंगे. तब इन्होंने उस पर सहमति जताई.

अब बुद्धिजीवियों पर हमले करके यह कोशिश की जा रही है कि वे और लोगों की आवाज बंद कर दें. जिन नारों के बहाने सरकार जेएनयू पर कार्रवाई कर रही है, वह फिजूल है. इससे मालूम पड़ता है कि आप घबरा गए हैं. कश्मीर में तो इस तरह रोज आजादी के नारे लगते हैं. इतना बड़ा देश है, ऐसे कुछ नारों से क्या फर्क पड़ता है. सरकार जो कर रही है, वह सब राष्ट्रवाद के लिए तो बिल्कुल नहीं है. क्योंकि इससे राष्ट्र को फायदा हो रहा है या और बदनाम हो रहा है? इससे हमें क्या फायदा होगा? जितना नुकसान वे कर सकते थे, वह कर चुके हैं. राष्ट्रवाद का अर्थ गुंडागर्दी तो बिल्कुल नहीं होता है.

इसका असर क्या होगा, यह किस हद तक जाएगा, यह कहना तो बड़ा मुश्किल है. भारत बड़ा देश है. सिर्फ आरएसएस ही भारत नहीं है. देश की सारी जनता वैसी ही नहीं है जैसी भाजपा समझती है. उन्हें मात्र 31 प्रतिशत वोट मिले हैं. लेकिन जो मौका मिला है, वे समझते हैं कि इसका फायदा उठाकर मनमानी कर लें. हालांकि, मुझे शक है कि यह ज्यादा वक्त तक चल पाएगा.*****
*** साभार ***http://tehelkahindi.com/opinion-of-historian-irfan-habib-on-nationalism-debate/

Tuesday, 15 March 2016

कन्हैया की अलोकतांत्रिक गिरफ्तारी संविधान व जनतंत्र पर हमला है

Published on Mar 9, 2016
Abhinandan Sekhri talks to Kanhaiya Kumar about sedition, being attacked inside Patiala House, whether he’ll join politics,​ and more.




***  इस साक्षात्कार में अभिनंदंन सीखरी साहब ने उन रहस्यों को भी उद्घाटित करा लिया है जिनकी ओर अन्य साक्षात्कार कर्ताओं का ध्यान नहीं गया था अथवा उन्होने उनको महत्वपूर्ण नहीं माना था। 

इससे ज्ञात होता है कि, 11 फरवरी की अर्द्ध रात्रि को लगभग 12 बजे के बाद जब जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार कुछ साथियों के साथ चाय पीने के लिए हास्टल के अपने कमरे से बाहर आए तब सादी  वर्दी में तैनात पुलिस कर्मियों ने जिनको कन्हैया पहचानते थे उनको जांच में सहयोग के नाम पर अपने साथ ले लिया और सिविल कार से संभवतः LIU आफिस जिसे कन्हैया नहीं जानते थे ले गए तथा वरदीधारी पुलिस के हवाले कर दिया। LIU कर्मियों ने कन्हैया का फोन पहले ही अपने कब्जे में कर लिया था। वारंट मांगने पर बाद में देने को कहा जो फिर दिया नहीं। इसके बाद का घटनाक्रम अब जग-ज़ाहिर है कि, तीन चेनल्स के मिलावटी वीडियोज़ प्रसारण को आधार बना कर उन पर 'देशद्रोही' का ठप्पा चस्पा कराया गया और वकीलों के नाम पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर कोर्ट में ही  जानलेवा हमला कराया गया जिसमें दिल्ली पुलिस मूक दर्शक बनी रही। अब उनकी जीभ काटने,गर्दन काटने व गोली से उड़ा देने की धमकियाँ दी जा रही हैं। गोयबल्स चेनल उनके विरुद्ध घृणित अभियान ज़ोर-शोर से चला रहा है जिसके परिणाम स्वरूप उन पर JNU परिसर में भी जानलेवा हमला हुआ। मुजफ्फरपुर में उनके समर्थन में हो रही सभा पर ही पत्थर-लाठियों से हमला किया गया। कानून व संविधान का खुला उल्लंघन किया जा रहा है। 

कन्हैया समस्त लोकतन्त्र रक्षकों की एकता चाहते हैं जो वक्त की बेहद ज़रूरत है। इसी हेतु उनका आज संसद पर मार्च हो रहा है जिसे 'देशभक्त' और 'लोकतान्त्रिक' शक्तियों का समर्थन मजबूती से मिलना चाहिए। ***

Thursday, 25 February 2016

रोहित वेमुला के हत्यारों को सज़ा दो! कन्हैया को तत्काल रिहा करो !! --- लोकतन्त्र बचाओ मार्च




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लखनऊ, 25 फरवरी, 2016 आज दोपहर 22,कैसरबाग  स्थित  भाकपा कार्यालय से CPI, CPI(M ), CPI(ML ), SUCI(C), AIFB, एडवा, एपवा, महिला फेडरेशन,एस एफ आई, आइसा, ए आई एस फ , पी यू सी एल, डी आई एफ आई, जसम, जलेस, प्रलेस, इप्टा, कलम सांस्कृतिक मंच, रिहाई मंच, राहुल फाउंडेशन, अलग दुनिया, साझी दुनिया, वर्कर्स काउंसिल,सी आई टी यू, एटक, निर्माण मजदूर सभा, भवन निर्माण मजदूर सभा आदि संगठनों के तत्वावधान में एक जुलूस प्रारम्भ हुआ जो सफ़ेद बारादरी, कैसरबाग, लालबाग, हलवासिया, हजरतगंज होते हुये अंबेडकर प्रतिमा पर एक सभा में परिवर्तित हो गया। सभा की अध्यक्षता लखनऊ विश्व विद्यालय की पूर्व उपकुलपति डॉ रूप रेखा वर्मा ने की और संचालन कामरेड प्रदीप शर्मा ने। मार्ग में जुलूस के दौरान और सभा के मध्य में लगाए जाने वाले नारों में प्रमुख थे रोहित वेमुला के हत्यारों को गिरफ्तार करो , कामरेड कन्हैया को बिना शर्त  रिहा करो , डॉ अंबेडकर के संविधान की रक्षा करो, शिक्षण संस्थाओं का दमन बंद करो इत्यादि। 

सभा में बोलने वाले मुख्य वक्ता थे क्रमशः रमेश सिंह सेंगर, डॉ गिरीश, सुभाषिनी  अली, वंदना मिश्रा, विजय सिंह, वीरेंद्र यादव, इप्टा के राकेश, रमेश दीक्षित, राहुल फाउंडेशन के सत्येन्द्र। अध्यक्षीय भाषण व धन्यवाद ज्ञापन डॉ रूप रेखा वर्मा ने दिया। 

लगभग सभी वक्ता इस बात पर सहमत थे कि, शोद्ध छात्र रोहित वेमुला के उत्पीड़न और उसकी हत्या तुल्य आत्म-हत्या से उपजी समस्याओं का निराकरण करने में विफल रहने पर JNUSU अध्यक्ष कामरेड कन्हैया को षड्यंत्र पूर्वक  झूठा इल्जाम लगा कर गिरफ्तार किया गया है ।  वक्ताओं ने रोहित की हत्या के लिए जिम्मेदार केंद्रीय मंत्रियों को बर्खास्त किए जाने तथा उसे न्याय दिलाये जाने की पुरजोर मांग की तथा कन्हैया पर लगाए गए झूठे आरोपों को वापिस लेकर तुरंत बिना शर्त रिहाई की मांग की। वक्ताओं ने न्याय प्राप्त होने तक संघर्ष किए जाने का ऐलान किया और इसे और व्यापक रूप देकर जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। 

सभा में आज इलाहाबाद में तथा कल लखनऊ में हुये संघी आतंकवाद व हिंसा की घोर निंदा की गई। कन्हैया पर अदालत में हुये कातिलाना हमले को केंद्र सरकार की कायराना हरकत बताया गया। 

प्रदर्शन - जुलूस  व सभा में अन्य  लोगों के अतिरिक्त कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़, अशोक मिश्रा, परमानंद दिवेदी, मोहम्मद अकरम, शरीफ, मास्टर सत्यनारायण, मधुकर मौर्या, प्रदीप घोष,विजय माथुर, डॉ सक्सेना, रिशी श्रीवास्तव,कौशल किशोर ,शकील अहमद सिद्दीकी,आनंद तिवारी,ओ पी अवस्थी, ओ पी सिन्हा, के के शुक्ल, महेश देवा, मधु गर्ग, ताहिरा हसन,लता राय,आशा मिश्रा,कान्ति मिश्रा, सुशीला पूरी, कल्पना पांडे तथा काफी संख्या में ई-रिक्शा चालक आदि भी शामिल थे।  

Wednesday, 27 May 2015

सांप्रदायिकता /साम्राज्यवाद को परास्त करना है तो कम्यूनिज़्म का भारतीय वांगमय अपनाना होगा --- विजय राजबली माथुर


जो लोग दिवा स्वप्न देखने के अभ्यस्त रहे हैं उनकी आँखें अब तो इस वक्तव्य को पढ़ कर खुल जानी चाहिए। जब तक वर्तमान सरकार को संविधान संशोधन करने लायक तीन चौथाई बहुमत हांसिल नहीं है तभी तक वह संविधान का पालन करेगी अब उस पार्टी के अध्यक्ष ने ही यह स्पष्ट कर दिया है। राज्यों में दिल्ली के केजरीवाल फार्मूले को लागू करते हुये मन-पसंद दूसरे दलों की सरकार होने से केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी किसी भी इल्ज़ाम से साफ-साफ बची रहेगी जबकि उसके मंसूबे पूरे होते ही रहेंगे। केंद्र व राज्यों में तीन चौथाई बहुमत प्राप्त होते ही वर्तमान संविधान को रद्द कर दिया जाएगा और दक्षिणपंथी असैनिक तानाशाही स्थापित कर दी जाएगी।
लेकिन लोकतन्त्र की रक्षा हेतु भी विपक्ष के दल,विद्वान,चिंतक एकजुट होने को तैयार नहीं हैं केवल थोथे अहंकार से सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी शक्तियों को परास्त नहीं किया जा सकता है यदि अब भी न सम्हले तब यह समझा जाना चाहिए कि आत्मघाती कदम उठाए जा रहे हैं।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=885845981477379&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater 
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(वस्तुतः 'साम्यवाद' को  जो कि भारतीय वाङ्ग्मय की देंन  है को विदेशी दृष्टिकोण से लागू करवाने की असफल कोशिशें ही इसकी विफलता का हेतु हैं। समय-समय पर इस ओर ध्यानाकर्षण करने का प्रयास करता रहा हूँ परंतु मेरी हैसियत ही क्या है जो उस पर गौर किया जाये?)

मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.
 http://krantiswar.blogspot.in/2011/05/blog-post_14.html

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काश सभी बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्तियाँ  दीवार पर लिखे को पढ़ें और  यथार्थ को समझें और जनता को समझाएँ तो अभी भी शोषक-उत्पीड़क-सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। लेकिन जब धर्म को मानेंगे नहीं अर्थात 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन नहीं करेंगे 'एथीस्ट वाद' की जय बोलते हुये ढोंग-पाखंड-आडंबर को प्रोत्साहित करते रहेंगे अपने उच्च सवर्णवाद के कारण तब तो कम्यूनिज़्म को पाकर भी रूस की तरह खो देंगे या चीन की तरह स्टेट-कम्यूनिज़्म में बदल डालेंगे।  
http://krantiswar.blogspot.in/2014/05/blog-post_22.html 
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