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Monday, 27 August 2018

अस्थियों पर वोट की राजनीति कर रहे हैं संघ और भाजपा ------ डा॰ गिरीश / लोकतन्त्र खतरे में वाम दलों को सभी गैर सांप्रदायिक ताकतों के साथ होना चाहिए ------ डॉ अमर्त्य सेन




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प्रक्रति के प्रकोप के चलते कई वर्षों से गुमनामी के अंधेरे में खोये रहे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी अंततः इस दुनियां को अलविदा कह गये। उनकी मौत पर हर कोई दुखी था और दलीय तथा विचारधाराओं की सीमायें लांघ कर लगभग सभी दलों ने उन्हें सादर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी जो वैचारिक रूप से संघ और भाजपा की सांप्रदायिक, विभाजनकारी, फासीवादी और जनविरोधी नीतियों की मुखर आलोचक रही हैं।
इसका कारण यह था कि हम एक बहुदलीय लोकतन्त्र में जीरहे हैं जिसमें राजनैतिक विरोध स्वाभाविक है, व्यक्तिग्त विरोध का कोई स्थान नहीं। हालांकि राजनैतिक दलों की संकीर्णता और निहित स्वार्थों के चलते समय समय पर व्यक्तिगत विरोध भी छलकता रहता है। दूसरे हमारी ऐतिहासिक परंपरा है कि म्रत्यु के बाद मतभेद अथवा वैमनस्य खत्म होजाता है।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार ने श्री अटल बिहारी बाजपेयी जो कि कई वर्षों से संघ परिवार में पूरी तरह उपेक्षित थे और यदि वे स्वस्थ होते तो श्री आडवाणी जी की तरह ही घनघोर उपेक्षा के शिकार होते, की मौत को 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले वोट बटोरने के एक नायाब मौके के रूप में देखा और पूरा संघ परिवार उनकी मौत को भुनाने में जुट गया। अन्त्येष्टि से लेकर अस्थि कलश विसर्जन तक सबकुछ सुनियोजित तरीके से किया गया और आगे भी हमें ऐसे कई हथकंडे देखने को मिलेंगे।

2014 के लोकसभा चुनावों में वोट बटोरने के लिये उछाले गये जुमले जब बुरी तरह बेनकाब होकर निष्प्रभावी होगये तो 2019 के चुनाव की पूर्व वेला में श्री अटल बिहारी के दिवंगत होने की प्राक्रतिक घटना को संघ ने भुनाने की ठान ली। दिवंगत अटल बिहारी भाजपा के लिये अब ‘वोट बिहारी’ बन कर रह गये हैं। उनकी अस्थियाँ आज ‘वोटस्थियाँ’ और अस्थि कलश आज ‘वोट कलश’ बन कर रह गये हैं। यही वजह है कि श्री अटल के असली परिवारीजन और विपक्षी पार्टियां भाजपा पर आज हड्डियों पर राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं।

अब अस्थियों पर राजनीति करने की भाजपा और संघ की कोशिश कितनी सफल होगी यह तो भविष्य ही तय करेगा। पर ये वो आसुरी शक्तियां हैं जो अस्थियों पर राजनीति करने के लिये सुविख्यात हैं। राजनैतिक स्वार्थों के लिये ये अपनों की मौत को कई दिनों तक छिपाये रह सकते हैं। मौत की अधिक्रत घोषणा से पहले श्रध्दांजलि अर्पित कर सकते हैं। वोटों की खातिर सूखी आंखों को पोंछ कर गम का क्रत्रिम इजहार कर सकते हैं।

1989 में अयोध्या में कथित कार सेवकों जिन्होने इनके उकसाबे पर संविधान, राष्ट्रीय एकता परिषद और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की धज्जियां उड़ायीं थीं, की कथित हड्डियों को गांव गांव गली गली घुमाकर इन्होने समाज विशेष की कोमल भावनाओं को सांप्रदायिक ज्वार में बदला और फिर उनके नाम पर वोट बटोर कर उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में सत्तायें हथियायीं। उसी सरकार की छतरी तले वे सारे कायदे कानूनों और आदेशों निर्देशों को ठेंगा दिखा कर बाबरी ढांचे को ध्वस्त कर चुके हैं। इससे उपजे सांप्रदायिक विभाजन पर ये आज तक वोटों की फसलें उगा रहे हैं।

अपने सुपरिचित हथकंडों को अपनाते हुये आज वे पुनः श्री अटल बिहारी बाजपेयी की अस्थियों पर वोट की फसल उगाने की कोशिश में जुटे हैं। हिन्दू धर्म और परंपराओं के रक्षक होने का दाबा करने वाले ये लालची धर्म और परंपराओं को भी भूल गये। शास्त्रों के अनुसार अस्थियों का विसर्जन किसी मान्य तीर्थस्थल पर निकटस्थ परिजनों द्वारा एकल रूप से किया जाना चाहिये ताकि दिवंगत आत्मा को चिरस्थायी शान्ति प्राप्त होसके। लेकिन इन्होने उन्हे 4000 भागों में बांट दिया। अब मुश्किल से 70- 75 ग्राम आस्थियाँ चार हजार कलशों में क्यों और कैसे विभाजित की गईं यह तो भाजपा ही बता सकती है।

अटलजी उस संघ के कार्यकर्ता थे जिसके पास तिल को ताड़ बनाने की ताकत है। वह संघ जो अपने झूठे प्रचार और मैसमेरिज्म के जरिये करोड़ों लोगों को भ्रमित कर गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने को मंदिरों के बाहर कतारों में खड़ा कर सकता है। उसी संघ की छतरी तले अटल जी का अधिकांश जीवन विपक्ष में ही बीता। उनकी वाकपटुता को संघ ने खूब भुनाया। वे कई बार चुनाव हारे तो संघ ने उसे एक योग्य नेता का अपमान प्रचारित किया। पहली बार वे जोड़तोड़ से प्रधानमंत्री बने और विश्वास हासिल नहीं कर पाये। संघ ने प्रचारित किया कि यह एक योग्य व्यक्ति को सत्ता से दूर रखने की साजिश है। अंततः वे फिर जोड़तोड़ से प्रधानमंत्री बने। संघ ने जनता को फर्जी ‘फील गुड’ का अहसास कराया और ‘इंडिया इज शाइनिंग’ का जुमला उछाला। लेकिन 2004 में जनता ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसके बाद वे गुमनामी में किसी और ने नहीं उसी संघ और भाजपा ने धकेल दिये जिनके कि वे सदैव संकटमोचक बने।

‘जिन्दा हाथी लाख का मरा डेढ़ लाख का’ की तर्ज पर भाजपा आज उनकी सीमित लोकप्रियता को बढ़ा चड़ा कर पेश कर रही है। वह आज उन्हें आजादी के बाद का सबसे महान नेता जताने का प्रयास कर रही है। संघ उस ऐतिहासिक तथ्य को भी ढांपना चाहता है कि वह आजादी के आंदोलन से बाहर था और उसके द्वारा क्रत्रिम तौर पर गड़े और खड़े किये गये क्रत्रिम नायक या तो अंग्रेजों से माफी मांग रहे थे या फिर आजादी के लिये जूझने वालों के खिलाफ गवाहियाँ डेराहे थे। वीर सावरकर और अटल बिहारी संघ द्वारा गड़े गये नायकों में सबसे आगे की कतार में खड़े हैं।

उनके पास आज आज सत्ता है, सत्ता के कारण भीड़ है, पर्याप्त संख्या में संघ का काडर है, दौलत है और सबसे ऊपर हवाबाज़ मीडिया है। इस सबके बल पर वे अटलजी का क्रत्रिम महिमा क्षेत्र तैयार कर रहे हैं। भूख, गरीबी, दमन, अत्याचार से दमित जनता का ध्यान बंटाने की कोशिश कर रहे हैं। हर चुनाव क्षेत्र तक लाव लश्कर के साथ पहुँचने के लिये गंदी संदी नालेनुमा नदियों तक में अस्थि विसर्जन का ढोंग रचा जारहा है। आयोजनों पर अनाप शनाप जनता की गाड़े पसीने की कमाई को बहाया जारहा है। आपदाग्रस्त केरल को मात्र रु॰ 600 करोड़ देकर हाथ झाड लिये गये मगर वोट कलश विसर्जन पर अथाह धन व्यय किया जारहा है। देश के कोने कोने में बाड़ आयी हुयी है। आम जनता पर अनेक मुसीबतों का पहाड़ टूटा पड़ा है, पर मान्य मंत्रीगण कंधों पर कलश लिये घूम रहे हैं। वोट बटोरने की इस म्रग मरीचिका में वे अपने निर्धारित दायित्वों से भाग रहे हैं।

अब यह तो वक्त ही बताएगा कि 2004 में खुद सिंहासन पर आरूढ़ प्रधानमंत्री श्री बाजपेयी तत्कालीन एनडीए को बहुमत नहीं दिला पाये तो क्या आज के एनडीए की डूबती नाव को पार लगा पायेंगे। पर संघ और भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों की पूर्ववेला में हुयी श्री अटल की मौत को राजनैतिक रूप से भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।

डा॰ गिरीश

Friday, 22 June 2018

चुनाव में बहुमत प्राप्त करना प्राथमिक लक्ष्य ------ अतुल अंजान



संबित पात्रा ने जब पंडित नेहरु का अपमानजनक शब्दों से उल्लेख किया तब कामरेड  अतुल अनजान ने उनकी  बखियाउखेडते हुये कहा कि, आखिरकार पंडित जवाहर लाल नेहरू आज़ाद भारत के पहले प्रधामन्त्री थे और उनका इस प्रकार अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। बाद में संबित पात्रा  को नेहरू जी कहना पड़ा। 
इसी प्रकार कामरेड अंजान ने पंडित मोतीलाल नेहरू के स्वतन्त्रता आंदोलन में योगदान का ज़िक्र करते हुये बताया कि उन्होने क्रांतिकारियों के मुकदमे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़े थे जिनमें सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद आदि के साथ उनके अपने पिताजी भी शामिल थे। 
कामरेड अंजान ने भाजपा की इस मांग को ठुकराते हुये कि, विपक्ष पहले अपने संभावित पी एम का नाम घोषित करे कहा कि चुनाव में बहुमत प्राप्त करना प्राथमिक लक्ष्य है उसके बाद निर्वाचित सांसद अपना नेता चुन लेंगे जो प्रधानमंत्री बनेगा। 



Saturday, 24 January 2015

लखनऊ में ओबामा विरोधी सफल प्रदर्शन --- विजय राजबली माथुर




लखनऊ, 24 जनवरी 2015 : आज  निर्धारित समय से भाकपा कार्यालय -22, क़ैसर बाग  से एक जुलूस के रूप में पार्टी सदस्यों ने चल कर परिवर्तन चौक पर अन्य वामपंथी दलों के साथ संयुक्त होकर  विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। मार्ग में गगनभेदी नारे लगाता हुआ प्रदर्शन गंतव्य गांधी प्रतिमा, जी पी ओ पार्क, लखनऊ पहुंचा जहां वह एक सभा में परिवर्तित हो गया। सभा की अध्यक्षता भाकपा, लखनऊ के जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ ने की जो बाईं आँख में चोट लगी होने बावजूद सोत्साह प्रदर्शन में शामिल रहे। भाकपा ,उ . प्र. के वरिष्ठ नेता कामरेड रामप्रताप त्रिपाठी की उपस्थिती इसलिए विशेष उल्लेखनीय है कि उन्होने हार्ट समस्या से ग्रस्त होने के बावजूद कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्द्धन करने व अपना आशीर्वाद प्रदान करने हेतु आने का कष्ट किया।  भाकपा के  अन्य सदस्यों में सर्व कामरेड आशा मिश्रा, कल्पना पांडे'दीपा', राकेश, मास्टर सत्य नारायण, मोहम्मद अकरम, पी एन दिवेदी, विजय माथुर आदि भी उपस्थित थे। 

भाकपा की ओर से राकेश जी व आशा मिश्रा जी ने सभा को संबोधित किया एवं ख़ालिक़ साहब ने अध्यक्षीय भाषण दिया। अन्य वामपंथी दलों की भागीदारी व उनके नेताओं के भी भाषण हुये। सभी वक्ताओं ने एक स्वर से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को गणतन्त्र दिवस पर बुलाये जाने की कटु निंदा एवं नरेंद्र मोदी की घोर भर्तस्ना   की व आगे भी इसका विरोध जारी रखने की घोषणा की। 

प्रदर्शन के दौरान मार्ग में व सभा के बीच में भी कार्यकर्ताओं द्वारा जोशीले नारे लगाए जाते रहे :
बराक ओबामा वापस जाओ,
BARAK OBAMA GO BACK,
नरेंद्र मोदी हाय-हाय ,
नरेंद्र मोदी होश में आओ,
एफ डी आई नहीं चलेगी ,
नरेंद्र मोदी गद्दी छोड़ो, आदि-आदि