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Sunday, 28 January 2018

यह बाजार है.......... मुक्त बाजार...जो ही अनेक अर्थों में वास्तविक जंगल राज है .......... ------ हेमंत कुमार झा

 ऐसे दौर में, जब बाजार की शक्तियां ही नियामक की भूमिका में हों, प्रतिभाओं और परिश्रम का शोषण स्वाभाविक नियति है।
Hemant Kumar Jha
वे कहते हैं कि इस देश के 75 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्नातक नौकरी पाने के काबिल नहीं। 
ऐसा कह कर वे पहले बेरोजगार इंजीनियरों का मनोबल तोड़ते हैं, फिर उन्हें समाज की नजरों में शर्मसार करते हैं और परिवार के प्रति उनके मन में अपराध बोध पैदा करते हैं।
उसके बाद वे अपनी कंपनियों के लिये विज्ञापन जारी करते हैं।
इंटरव्यू में ऐसे पेश आते हैं जैसे वे स्पेसक्राफ्ट बनाने के लिए भर्त्ती कर रहे हों। पहले से ही शर्मसार और टूटे मनोबल वाले बहुत सारे अभ्यर्थी हकलाने लगते हैं, बिखरने लगते हैं। 
वे अभ्यर्थियों की इस बेचारगी का फायदा उठाते हैं। उन्हें इतने कम वेतन का ऑफर देते हैं कि नौकरी के लिये विकल व्यक्ति भी सन्न रह जाता है। लेकिन, उसके पास और कोई चारा नहीं होता। वह 10 हजार, 12 हजार प्रतिमास पर भी तैयार हो जाता है।
उसके बाद शुरू होता है अंतहीन शोषण का सिलसिला। बेहद कम वेतन, बहुत अधिक काम। 
इंजीनियरों की मेहनत से कंपनियां फलती हैं, फूलती हैं। मुनाफा बढ़ता जाता है, लेकिन, बढ़ते मुनाफे के अनुपात में वेतन बढ़ने का कोई सवाल नहीं। कोई प्रतिरोध नहीं कर सकता। 
मुक्त बाजार में भारत के सामान्य इंजीनियरिंग स्नातकों की यही नियति है।
कोई इंजीनियर या तो नौकरी के लायक है या फिर नहीं है। अगर नहीं है तो आप उसे नौकरी मत दो। लेकिन, यह कैसे हो सकता है कि कोई इंजीनियर 10-12-15 हजार के वेतन के लायक समझा जाए? आखिर, इनकी मेहनत की भी बड़ी भूमिका है कि कंपनी का उत्पादन बढ़ता गया, व्यापार बढ़ता गया, मुनाफा बढ़ता गया।
लेकिन, यह बाजार है। मुक्त बाजार...जो ही अनेक अर्थों में वास्तविक जंगल राज है। 
जितने इंजीनियर्स की मांग है, उससे बहुत अधिक की आपूर्त्ति होती रही। तय मानकों की परवाह किये बिना प्राइवेट संस्थान खुलते गए। अधिकांश के शिक्षण में गुणवत्ता का नितांत अभाव।
स्नातकों की भीड़ बढ़ती गई। बेरोजगारी का आलम पसरता गया।
इंजीनियरिंग जैसा प्रतिष्ठित कोर्स समाज में सम्मान खोता गया। आखिर, हर कोई आईआईटी में तो जा नहीं सकता। इनकी संख्या कम है, सीटें सीमित हैं। कुछ खास प्राइवेट संस्थान भी गुणवत्ता के मानकों पर खरे उतरते हैं। बाकी तो...क्या सरकारी, क्या प्राइवेट, गुणवत्ता से दूर दूर तक मतलब नहीं। सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों की बदहाली के अपने कारण हैं। नियमित शिक्षकों की नितांत कमी और आधारभूत संरचना का अभाव उनके छात्रों की पढ़ाई पर बेहद बुरा असर डालता है। जैसे तैसे डिग्री लेकर निकले इनके अधिकांश स्नातक रोजगार की प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं।
किसी का मनोबल तोड़ना है तो योजनाबद्ध तरीके से उसका सम्मान छीनो। भविष्य के प्रति असुरक्षा का भाव पैदा करो उसमें। वह टूटेगा...फिर वह तुम्हारे कदमों पर गिरेगा...तुम्हारी ही शर्त्तों पर। उद्योगपतियों का यह आजमाया फार्मूला है।
एसोचैम अपने सम्मेलनों में जोर-शोर से यह प्रचारित करता है कि भारत के तीन चौथाई से भी अधिक इंजीनियरिंग स्नातक किसी लायक नहीं। 
'एसोचैम'...यानी "Associated Chambers of Commerce and Industry" (ASSOCHAM), यानी "भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल"। भारत की एक लाख से अधिक कम्पनियां इसकी सदस्य हैं।
इन्हीं कंपनियों का राज है देश में। इन्हें कोई यह नहीं पूछता कि जिन्हें आपने नियुक्त किया है वे अगर अयोग्य थे तो उन्हें रखा ही क्यों। अगर रखा है तो अपने काम के लायक ही समझ कर रखा। तो फिर, जिन्हें इंजीनियर माना, जिन्हें काम पर रखा, उन्हें इतना अल्प वेतन क्यों?
यह मुनाफा का शास्त्र है। इस शास्त्र में शोषण सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। शोषण का चक्र चलाते रहने के लिये मनोवैज्ञानिक असर डालना होता है, ताकि लोग इसके साथ जीने के लिये तैयार हों।
दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार इंजीनियर भारत में हैं। इस देश के आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ इसके शिक्षा तंत्र का कोई तालमेल नहीं। लचर तंत्र प्रतिभाओं की कत्लगाह साबित होता है, और, अपमानित, शोषित होते हैं वे, जिन्हें सही पढ़ाई मिलती तो किसी से कम नहीं रहते। 
ये किसानों के बेटे/बेटियां हैं, जिनके पिता ने उनकी पढ़ाई के लिये जमीन बेची, ये निम्न मध्यवर्गीय नौकरीपेशा वालों के बेटे/बेटियां हैं, जिन्होंने उनकी पढ़ाई के लिये लोन लिये, अपने सपने त्यागे और बच्चों के भविष्य के लिये अपनी हैसियत दांव पर लगा दी। 
मुक्त बाजार में अगर नियामक तंत्र प्रभावी नहीं हो तो बाजार की शक्तियां शोषण के कीर्त्तिमान स्थापित करती हैं। 10-12 हजार पर इंजीनियरों से काम लेना ऐसा ही कीर्त्तिमान है, जिसकी मिसाल दुनिया में अन्य किसी देश में शायद ही मिले।
लेकिन, ऐसे दौर में, जब बाजार की शक्तियां ही नियामक की भूमिका में हों, प्रतिभाओं और परिश्रम का शोषण स्वाभाविक नियति है।

https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/1533889100052331

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31-01-2018 

Wednesday, 11 May 2016

कन्हैया के बिहार दौरे पर मीडिया की नकारात्मक भूमिका की वजह ------ संतोष सिंह





 ,,,सेमीनार में मुख्य तौर पर प्रबंधन के दबाव को बहुत ही बेवाकी से मीडियाकर्मियों ने अपनी बात रखी ,,,,,कैसे पत्रकारों को किसी खास एंगल से खबर लिखने और दिखाने के लिए मजबूर किया जा रहा है और ऐसा नही करने पर कैसे रातो रात नौकरी से हटाया गया इस पर पत्रकारों ने खुल कर अपनी बात रखी,,,, ..................
मीडिया कर्मियों  को सहयोग  करिए जिम्मेवारी आप जैसे लोगो के कंधे पर हैं आरोपित मत करिए उनके बीच जाइए बहुत बुरी स्थिति है ,,,,,


Santosh Singh
May 9 at 8:09pm ·
जनशक्ति भवन में ,कन्हैया का बिहार दौरा और मीडिया की भूमिका ,विषय पर सेमीनार का आयोजन किया गया था। आयोजन कन्हैया के बिहार दौरे कि तैयारी में परोक्ष या अपरोक्ष से जुड़े लोगों के द्वारा बुलाया गया था ।।।
हलाकि मैं थोड़ा विलम्भ से पहुंचा लेकिन थोड़ी देर में ही सेमीनार किस उद्देश्य से बुलाया गया था समझ में आने लगा,,,,,रिपोर्टिंग को लेकर पहली बार किसी राजनैतिक दल की  और से इस तरह का पहल देखने को मिला,,,,कन्हैया के बिहार दौरे पर मीडिया की नकारात्मक भूमिका  की क्या वजह रही और फिर बेहतर कवरेज के लिए और क्या क्या किये जा सकते हैं,,,,,
जहां तक मुझे जानकारी दी गयी थी लगभग सभी मीडिया हाउस के लोगों के साथ साथ कई पुराने पत्रकार को भी आमंत्रित किया गया था ,,,एक दर्जन से अधिक मुख्यधारा के पत्रकार सेमीनार में भाग लेने आये भी हुए थे ,,,सेमीनार में मुख्य तौर पर प्रबंधन के दबाव को बहुत ही बेवाकी से मीडियाकर्मियों ने अपनी बात रखी ,,,,,कैसे पत्रकारों को किसी खास एंगल से खबर लिखने और दिखाने के लिए मजबूर किया जा रहा है और ऐसा नही करने पर कैसे रातो रात नौकरी से हटाया गया इस पर पत्रकारों ने खुल कर अपनी बात रखी,,,, 
लेकिन एक सवाल जो एक घंटे से अधिक समय से चल रहे सेमीनार के दौरान बार बार मेरे मन में उठ रहा था वह बिहार जो परिवर्तन की धरती रही है और परिवर्तन के साथ चलने के लिए अभी भी जाना जाता है उस बिहार को आखिर हो क्या गया,,,,,,
आधुनिक काल कि ही बात करे तो गांधी का चम्पारण सत्याग्रह हो, जेपी का 1974 का आन्दोलन हो या फिर बोफोर्स और वीपी सिंह का राजीव गांधी के खिलाफ संखनाद हो या फिर अन्ना का आन्दोलन बिहार की मीडिया और बिहार की जनता पूरी ताकत के साथ इस परिवर्तन के जंग में एक साथ खड़ा था ,,,,लेकिन कन्हैया के मामले में ऐसा क्या हुआ कि हमारे मीडिया के बंधु कन्हैया के पटना पहुंचने के साथ ही नकारात्मक रिपोर्टिंग शुरु कर दिये,,,
इस विषय पर सोच ही रहे थे कि आयोजक ने मुझे बोलने के लिए आमंत्रित कर दिया,,, मैं क्या बोलू ,,,कहां से शुरु करु किसके बारे में बोलू,,सच कहे तो पहली बार महाभारत के उस युद्द मैंदान में जब अर्जून कह रहा था वो तो मेरे काका है वो तो मेरे दादू हैं किस पर वाण चलाउ,,, मेरी स्थिति भी महाभारत के उसी अर्जून की तरह ही था सामने उस संस्थान पर एक से एक हमला हो रहा था जिस संस्थान की पवित्रा की कसमे रोज खाते हैं,,, लेकिन आज मेरे साथ कृष्ण मौंजूद नही थे मैंने शुरुआत ही इसी से किया मित्रों आज के दौर में मीडिया से हमलोग जैसे जो लोग जुड़े हैं प्लीज उनसे सहानुभूति रखिए,,,, हमलोग किसी आन्दोलन कि उपज नही है कही कोई ट्रेनिंग नही लिया है पढाई कि बात करे तो इससे कोई वास्ता नही रहा है ,,,लेकिन पत्रकार है संस्थान ने किसी को कलम दिया है तो किसी को लोगो ,,,,खबर लिखनी ही है और खबर दिखानी ही है मजबूरी है सवाल नौकरी का भी है ऐसे में अगर हमलोगो का आचरण बंदर के हाथ में अंतूरा जैसा भी हो तो प्लीज माफ कर दीजिए।।।
मेरा आग्रह है इसी तरह का सेमीनार ,,आप जो नाटक करते हैं या फिर मौंर्यालोक में जो ज्ञाण बांटते हैं प्लीज हम लोगो को किसी तरह से जोड़िए पता नही कब किसे पत्रकार होने कि वजह समझ में आ जाये।।
मित्रों आपको बता दे हम लोगो में ये भी क्षमता नही है कि प्रबंधन जो चाह रहा है उस पर भी खरे  उतर जाये ,,, आज किसी को कोई काम नही मिल रहा है तो वो मीडिया में आ रहे हैं वही वकील और नेता वाली स्थिति है।।इसलिए चलते चलते मेरी यही सलाह है इस हालात से बाहर निकालने में मीडिया कर्मियों  को सहयोग  करिए जिम्मेवारी आप जैसे लोगो के कंधे पर हैं आरोपित मत करिए उनके बीच जाइए बहुत बुरी स्थिति है ,,,,,

https://www.facebook.com/santoshsingh.etv/posts/1068875636484893