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Saturday, 3 September 2016

इतिहास के झरोखे से ------ विजय राजबली माथुर


Mukutdhari Agrawal


कुछ वर्ष पूर्व इंटीलीजीलेंस व्युरों (आई बी ) के पूर्व संयुक्त निर्देशक एम के धर की एक पुस्तक खुले रहस्य ' आई थी जिसमे उन्होने रहस्योद्घाटन किया था कि मुकेश अंबानी के स्व0 पिता धीरु भाई अंबानी ने किस तरह काँग्रेस पार्टी , उसके मंत्रियो और वरिष्ठ प्रशासको को प्रभावित किया था । पुस्तक से कुछ अंश :- 
" 1980 मे धीरुभाई भारत के औधौगिक व आर्थिक परिदृश्य पर एकाएक छा गए / इसी समय काँग्रेस पार्टी ,उसके कुछ मंत्री व वरिष्ठ प्रशासक अंबानी के आकर्षण मे आए और उन्होने उभरते उद्योगपति को 500 बड़े उद्योगपतिओ के दायरे मे शामिल होने मे मदद की । 1986 मे धीरुभाई अंबानी भारतीय व्यवस्था तंत्र को अभूतपूर्व रूप से प्रभावित करने की स्थिति मे आ चुके थे । उन्होने इन्दिरा प्रशासन मे अपनी पैठ बना ली थी । इसका जरिया बने प्रणव मुखर्जी ,जैसे राजनैतिक प्रशासक ,और लाभान्वित करनेवाले अनेक पेशेवर प्रशासक जिनमे गोपी अरोरा ,नितीश सेनगुप्ता एवं एन के सिंह प्रमुख थे । 1986 मे धीरु भाई समझ गए थे कि बोली लगाने और खरीदने से भारत उनका हो सकता है "
"धीरुभाई अंबानी ने देश को सबसे बड़े औढयोगिक घरानो मे एक दिया । इसके लिए उन्होने भारत की राजनेतिक एवं प्रशासकीय पद्धति को तोड़ -मरोड़ कर रख दिया । अपनी विलक्षण प्रगति मशीन मे उन्होने अपने खास तरीके से मानव मूल्यो ,संवेधानिक औचित्यों तथा प्रशासन की कानूनी धारणायों के टुकड़े -टुकड़े कर हरेक को भ्रष्ट कर डाला ।"
- एम के धर ,पूर्व संयुक्त निर्देशक , आई बी 
' खुले रहस्य 'पुस्तक से साभार
मुकेश अंबानी स्व 0 धीरु भाई अंबानी के बड़े पुत्र है । जब पिता ने काँग्रेस सत्ता और उसके मंत्रियो तथा वरीय प्रशासकीय अधिकारिओ को प्रभावित कर इतना बड़ा औढयोगिक साम्राज्य कायम कर लिया तब आज उनके पुत्र मुकेश वर्तमान प्रधान मंत्री के संपर्क का कथित लाभ ले रहे है तो आश्चर्य की बात क्या है ।

https://www.facebook.com/mukutdhari.agrawal/posts/1099126916836443

बुजुर्ग पत्रकार एवं उद्योगपति 'मुकुट धारी अग्रवाल ' साहब के इस रहस्योद्घाटन ने मुझे भी निकट इतिहास को स्मरण करने को प्रेरित कर दिया है। 
1972 में  सरधना रोड , मेरठ स्थित जिस  प्राईवेट  कंपनी के अकाउंट्स विभाग से मैंने रोजगार प्रारम्भ किया था उसमें मेरे साथ  'पतला' गाँव , मोदिनगर के एक कपड़ा व्यापारी अग्रवाल साहब के सबसे छोटे पुत्र  भी कुछ समय बाद मेरे साथ आ गए थे। वह वस्तुतः LLb की पढ़ाई  मेरठ कालेज , मेरठ से कर रहे थे किन्तु  सांयकालीन कक्षाएं होने के कारण दिन में जाब ज्वाईन करके अपना खर्च निकाल लेते थे। उनके एक अध्यापक 'सिन्हा' साहब  सुप्रसिद्ध न्यायमूर्ति  जगमोहन लाल सिन्हा साहब के रिश्तेदार थे। प्रोफेसर सिन्हा साहब ला के साथ-साथ अपने छात्रों को तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम का विश्लेषण भी समझाते चलते थे। मेरे सहकर्मी अग्रवाल साहब तो व्यापारिक घराने से थे और उनको टेक़सेशन  में डिग्री हासिल करनी थी, राजनीति में उनको खुद दिलचस्पी नहीं थी । मेरे राजनीतिक रुझान के मद्दे नज़र वह मुझे कक्षा में प्राप्त विश्लेषणों  से अवगत कराते रहते थे। 
इन्दिरा गांधी का चुनाव रद्द हो सकता है  : 
प्रोफेसर सिन्हा ने 1973 में ही घोषित कर दिया था कि, रायबरेली संसदीय क्षेत्र से पी एम इन्दिरा गांधी का चुनाव रद्द हो सकता है क्योंकि न्यायाधीश सिन्हा साहब एक निर्भीक और निष्पक्ष व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हैं। सुचेता कृपलानी जी के मुख्यमंत्रित्व काल में  1963 में वह जुड़ीशियल मेजिस्ट्रेट नियुक्त हुये थे  और 1973 में इलाहाबाद उच्च  न्यायालय में राजनारायन/इंदिरा गांधी के चुनाव की सुनवाई कर रहे थे। प्रसंग वश प्रोफेसर सिन्हा साहब ने बताया था कि, जब चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री बने तब उनके एक रिश्तेदार का केस मेरठ के ज़िला न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब की अदालत में चल रहा था। चरण सिंह फैसला अपने पक्ष में कराने के उद्देश्य से जज साहब की कोठी पर पहुँच गए थे। जज सिन्हा साहब ने अर्दली से पुछवाया कि, उनसे पता करो कि वह चौधरी  चरण सिंह हैं या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री। चौधरी चरण सिंह ने अर्दली से कहलवा दिया था कि जज साहब से कह दो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह आए हैं। जज साहब ने कहला भेजा कि उनको मुख्यमंत्री से नहीं मिलना है और बाद में फैसला चरण सिंह के रिश्तेदार के विरुद्ध आया था। इसी प्रकार  12 जून 1975 को फैसला पी एम इन्दिरा गांधी के विरुद्ध आया जिसका अनुमान प्रोफेसर सिन्हा ने 1973 में ही लगा लिया था। 
1980 से श्रम न्यायालयों में निर्णय श्रमिकों के विरुद्ध होने लगेंगे ::
इसी प्रकार 1973 में ही प्रोफेसर सिन्हा का आंकलन था कि, जैसी आर्थिक राजनीति चल रही है उसके अनुसार 1980 आते-आते श्रम न्यायालयों से फैसले श्रमिकों के विरुद्ध आने शुरू हो जाएँगे। 25/26 जून 1975 की एमर्जेंसी ,1977 की जनता सरकार और 1979 में उसका पतन, चौधरी चरण सिंह की इन्दिरा जी के सहयोग से गठित सरकार और उसका पतन  और फिर 1980 का चुनाव RSS के अंदरूनी समर्थन से जीत कर इन्दिरा जी की पुनर्वापिसी ही वह कारण थी कि, सरकार में व्यापारियों/उद्योगपतियों का हस्तक्षेप प्रभावी भूमिका में आता चला गया जिसका वर्णन मुकुटधारी अग्रवाल साहब ने एम के धर ,पूर्व संयुक्त निर्देशक , आई बी  द्वारा लिखित पुस्तक' खुले रहस्य ' के हवाले से किया है। 

सरकार पर व्यापार जगत का ही यह प्रभाव था कि, हकीकत में श्रम न्यायालयों ने मालिकों के हित में मजदूरों के विरुद्ध निर्णय सुनाये। अब तो मजदूरों की दशा 18 वीं सदी की ओर लौट गई है। 
उदारीकरण का अंजाम : 
रिलाएन्स जियो और वर्तमान पी एम के रिश्तों की जो चर्चा है वह उदारीकरण की स्व्भाविक परिणति है। 1985 का चुनाव भी राजीव गांधी ने RSS के अंदरूनी समर्थन से ही जीता था। उन्होने ही सरकार का कार्पोरेटिकरण शुरू किया था अरुण सिंह व अरुण नेहरू के सहयोग से। यही अरुण नेहरू बाजपेयी साहब की NDA सरकार के भी सलाहकार बने थे। राजीव गांधी के वित्तमंत्री  वी पी सिंह ने जब व्यापार जगत में आय कर  के छापे डलवाए तब उनको बर्खास्त करा दिया गया और जब जन-समर्थन से वह पी एम बन भी गए तब उनकी एक बैसाखी RSS समर्थक भाजपा थी। धीरुभाई अंबानी को तवज्जो  न देने के कारण  मण्डल रिपोर्ट लागू करने को बहाना बना कर भाजपा ने उनकी सरकार को गिरा दिया था। देश में जातीय दंगे/सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे। 

1991 में THE INSIDER उपन्यास ( जिसमें कुबूला गया है कि, 'हम स्वतन्त्रता के भ्रम जाल में जी रहे हैं' ) बाद में लिखने वाले पी वी नरसिंघा राव साहब के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जी ने देश में 'उदार आर्थिक' नीतियाँ लागू कीं थीं जिनको न्यूयार्क जा कर भाजपा नेता एल के आडवाणी ने उनकी नीतियों को चुराया जाना बताया था। इसीलिए 1996 में 13 दिन के लिए फिर 1998 में 13 माह के लिए व 1999 में 60 माह के लिए भाजपा नीत  सरकारें रहीं एवं 1999 से 2014 तक मनमोहन नीत  कांग्रेस सरकारें दोनों में उदारीकरण बढ़ते-बढ़ते सरकारी उपक्रम निजी हाथों को सौंपे जाते रहे। 

कंपनी शासन की वापसी  : 
रिलाएन्स जियो क्यों? 1912 के राष्ट्रपति चुनाव की ओर ध्यान दें जब मनमोहन सिंह जी के आशीर्वाद से मुकेश अंबानी की इच्छा पर प्रणव मुखर्जी साहब राष्ट्रपति बनाए गए थे जिनहोने पद पर रहते हुये 'पुजारी' की भूमिका अपने गाँव जा कर निभाई थी । 2014 का चुनाव कारपोरेट वर्चस्व स्थापित करने का ही चुनाव था। 2019 का चुनाव  ईस्ट इंडिया कंपनी की तर्ज़ पर प्राईवेट कंपनियों के सरकार पर खुले नियंत्रण को स्थापित करने जा रहा है। 

ब्राह्मण वाद कारपोरेट शासन में सहायक : 
देश में  जितने भी राजनीतिक दल हैं सबका नियंत्रण ब्राह्मणों अथवा ब्राह्मण वादियों के हाथों में है। साम्यवादी दल और सम्पूर्ण वामपंथ भी इससे अछूता नहीं रहे हैं। वर्तमान राजनीति और अर्थनीति तेज़ी से ब्राह्मण वाद की जकड़ स्थापित करने की ओर बढ़ रही है कारपोरेट घरानों का इसी में हित है जो पूरा करेंगे ब्राह्मण वादी मोदीईस्ट  कामरेड्स। साधारण जनता को जागरूक करने वाला आज कोई प्रभावशाली व्यक्तित्व सामने नहीं है। कथनी और करनी में भारी अंतर है। इतिहास से कोई सबक लेने वाला नहीं है। 
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फेसबुक पर प्राप्त विचार :






Friday, 13 March 2015

भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ


--------------------------"आआप" की हकीक़त--------------------------------
अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो ‘श्रीमान ईमानदार’ को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में ‘परिवर्तन’ में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ ने ‘उभरते नेतृत्व’ के लिए ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके। इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ ‘कबीर’ से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।
अरविंद को समझने से पहले ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को समझ लीजिए!
अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)’ अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी ‘फोर्ड’ द्वारा संचालित ‘फोर्ड फाउंडेशन’ एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ‘छवि निर्माण’ से लेकर उन्हें ‘नॉसियोनालिस्टा पार्टी’ का उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी ‘एडवर्ड लैंडस्ले’ ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।
ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और ‘डर्टी ट्रिक्स’ के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘क्वायरिनो’ की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की ‘गढ़ी गई ईमानदार छवि’ और क्वायरिनो की ‘कुप्रचारित पतित छवि’ ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।
उन्हीं ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ मिलकर अप्रैल 1957 से ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ अवार्ड प्रदान कर रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व ‘आम आदमी पार्टी’ के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड से उनका एनजीओ ‘कबीर’ और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ है।
भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग!
‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।
अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।
डच एनजीओ ‘हिवोस’ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। ‘पनोस’ में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस’ के जरिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ की फंडिंग काम कर रही है। ‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है।
माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।
‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’ ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।
‘जनलोकपाल आंदोलन’ से ‘आम आदमी पार्टी’ तक का शातिर सफर!
आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नारा देते हुए वर्ष 2011 में ‘जनलोकपाल आंदोलन’ की रूप रेखा खिंची।
इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए थे। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में ‘लॉंच’ कर दिया। अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद ‘कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया’ के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई।
विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और ‘कैश फॉर वोट’ घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।
आगे बढ़ते हैं…! अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी ‘आम आदमी पार्टी’ खड़ा करने में सफल रहे। जनलोकपाल आंदोलन के पीछे ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से ‘कबीर’ व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया। लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने ‘बिजनस स्टैंडर’ अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने ‘कबीर’ को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।
सूचना के मुताबिक अमेरिका की एक अन्य संस्था ‘आवाज’ की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी ‘आवाज’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी ‘आवाज’ संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस ‘फंडिंग का खेल’ खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और ‘आम आदमी पार्टी’ उसी की देन हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010’ के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है।
बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

साभार :

https://www.facebook.com/dhruva.n.gupta/posts/10153868256385752
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प्रस्तुत लेख आ आ पा और कांग्रेस में मिलीभगत को इंगित करता है। 2011 से ही अपने ब्लाग http://krantiswar.blogspot.in/ के माध्यम से स्पष्ट करता रहा हूँ कि हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव  के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन सिंह गुट/RSS का समान समर्थन रहा है। जब मनमोहन जी को तीसरी बार पी एम बनाने का आश्वासन नहीं मिला तो मोदी को पी एम बनवा दिया गया है और मोदी के विकल्प के रूप में केजरीवाल को तैयार किया जा रहा है। RSS के कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना को अमेरिका प्रवास के दौरान जस्टिस काटजू साहब बखूबी संवार रहे हैं महात्मा गांधी,नेताजी सुभाष और जिन्नाह साहब के विरुद्ध विष-वमन करके।
मनमोहन जी के विकल्प के रूप में मोदी व मोदी के विकल्प के रूप में केजरीवाल की ताजपोशी की रूप रेखा व्हाईट हाउस में बराक ओबामा के निर्देश पर तैयार की गई थी और निर्वाचन प्राणाली की खामियों तथा ई वी एम के करिश्मे के जरिये उस पर जनता की मोहर लगवा ली गई है। परंतु साम्यवादियों/वामपंथियों का केजरीवाल की परिक्रमा करना आत्मघाती तो है ही बल्कि देश के लिए भी अहितकर है।
---विजय राजबली माथुर 
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