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Sunday, 31 March 2019

गलत निर्णय भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों को जनता से विमुख किए हुये हैं ------ विजय राजबली माथुर


N  B  T  ,  lko.  ,  28-03-2019  ,  Page ------ 10



1975  में मेरठ में तथा 1985 में आगरा में मेरा सस्पेंशन और टर्मिनेशन करवाने में तत्कालीन यूनियन प्रेसीडेंट्स का प्रबल हाथ था। अतः मैंने तब किसी बड़े संस्थान की अपेक्षा छोटी-छोटी दुकानों में स्वतंत्र रूप से अकौन्ट्स जाब करके गुज़ारा करना शुरू किया। साथ ही ITC जैसी मल्टीनेशनल कंपनी से अन्यायपूर्ण बर्खास्त्गी  के विरुद्ध संघर्ष करने हेतु  स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी संत कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क किया जिन्होने 'मजदूर भवन',  आगरा  पर कामरेड हरीश आहूजा साहब  के पास भेज दिया । आहूजा साहब ने केस लगा दिया और सप्ताह में एक दिन मजदूर भवन बुलाने लगे जहां CPI नेतागण कामरेड्स रमेश मिश्रा, डॉ महेश चंद्र शर्मा और डॉ जवाहर सिंह धाकरे क्रमिक रूप से आकर  मजदूर समस्याओं और उनके समाधान पर प्रकाश डालते थे। अक्तूबर 1986 में मुझे भी CPI में शामिल कर लिया गया और 'मजदूर भवन ' के स्थान पर मुझे पार्टी कार्यालय में सहयोग करने हेतु बुलाया गया। एक वर्ष के भीतर ही मुझे पार्टी की ज़िला काउंसिल में भी शामिल कर लिया गया।

पार्टी की विशेष बैठकों में कामरेड्स लल्लू सिंह चौहान, जगदीश नारायण त्रिपाठी, रामनारायन उपाध्याय आदि आते रहते थे और इस प्रकार इन स्वाधीनता सेनानियों के विचार भी जानने - समझने के अवसर मिलते रहे। लखनऊ मेरा जन्मस्थान होने के कारण लखनऊ में होने वाले प्रदर्शनों में भाग लेने खुशी-खुशी आता रहता था जबकि नजदीक  ही स्थित  दिल्ली के सिर्फ एक ही प्रदर्शन में भाग ले सका। बाबूजी के सहपाठी और रूममेट कामरेड भीखा  लाल जी से मिलने की काफी इच्छा थी और मैंने इसका ज़िक्र कामरेड डॉ महेश चंद्र शर्मा जी से किया था।बेगम हज़रत महल पार्क में पूरे प्रदेश से आए पार्टी कामरेड्स 'सांप्रदायिकता विरोधी रैली ' में भाग लेने को  एकत्र थे।  भीखा लाल जी पूर्व प्रदेश सचिव थे और उस समय  तत्कालीन प्रदेश सचिव कामरेड सरजू पांडे जी से कुछ चर्चा कर रहे थे जब डॉ शर्मा जी मुझे उनके पास ले गए थे ; हमारे आगरा के तत्कालीन जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी भी पांडे जी के ही साथ थे। कामरेड भीखा लाल जी ने बाबू जी के नाम का सिर्फ 'ताजराज ' शब्द सुनते ही मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा कि, तुम ताजराज बली के बेटे हो तुम उनके बारे में क्या बताओगे हम तुम्हें उनके बारे में बताएँगे। फिर उन्होने वर्ष सन- तारीख बताते हुये किस-किस क्लास में और हास्टल में साथ-साथ रहे  कहा कि वह और मेरे बाबूजी इतना घनिष्ठ रहे हैं जितने कि मेरे बाबूजी अपने घर-परिवार में अपने भाइयों से भी न रहे होंगे। भीखा लाल जी ने यह भी बताया कि 1939 में मेरे बाबूजी के दिवतीय विश्व युद्ध में जाने और 1945 में वापिस लौट कर आने की उनको सूचना है पर फिर संपर्क नहीं हो पाया था,  वह इस बात से बेहद खुश हुये थे कि मैं उनसे मिलने गया। भीखा लाल जी ने मुझसे कहा था कि अगली बार जब भी मैं लखनऊ आऊँ तो बाबूजी को भी साथ लाऊं परंतु कुछ समय बाद ही  भीखा लाल जी का निधन हो गया था।   

कामरेड सरजू पांडे जी एक बार शिवाजी मार्केट, आगरा की बैठक में जब मुख्य वक्ता के रूप में बोलने आए थे तो दोबारा उनको सुनने व देखने का अवसर मिला था। सरजू पांडे जी, भीखा लाल जी और रुस्तम सैटिन साहब आदि कम्युनिस्ट नेतागण बेहद ईमानदार, कर्मठ और स्पष्टवादी थे 'जनहित ' उनके लिए सर्वोपरि थे। 1967 में जब रुस्तम सैटिन साहब चौधरी  चरण सिंह सरकार में गृह राज्यमंत्री थे तब उन्होने ऐसी व्यवस्था की थी कि कोई भी पुलिस वाला किसी भी गरीब - असहाय तबके के इंसान को नाहक परेशान न कर पाये। लखनऊ में कुछ वरिष्ठ कामरेड्स से यह भी ज्ञात हुआ है कि एक बार पुलिसिया रौब में एक रिक्शे वाले को प्रताड़ित किया गया तो बहैसियत मंत्री  रुस्तम सैटिन साहब ने इंचार्ज समेत लखनऊ के उस  पूरे थाने  को सजा दी थी जिसके बाद पूरे प्रदेश में इसका असर हुआ था। 



लेकिन आज कम्युनिस्ट पार्टी में भी ऐसे नेताओं का सर्वथा आभाव है। कामरेड हरीश आहूजा के पार्टी छोडने के बाद रमेश मिश्रा जी ने दूसरे पार्टी कामरेड को मेरे होटल मुगल वाले केस को रेफर कर दिया था जिन्होने 1994 -95 में मेरे परिवार में एक वर्ष के भीतर तीन मौतें हो जाने के बाद मेरी परेशानी के माहौल में  होटल मेनेजमेंट के झुकाव में मेरे केस की पैरवी पर ध्यान नहीं दिया और पीठासीन अधिकारी ने 'Petitioner is no more interested' लिख कर मेनेजमेंट के पक्ष  में मेरी पिटीशन को रद्द कर दिया। वह कामरेड बाद में आगरा CPI के जिलामंत्री भी बने। एक प्राइमरी शिक्षक रमेश कटारा ने उत्तर प्रदेश CPI के कंट्रोल कमीशन में भी स्थान प्राप्त कर लिया था और रमेश मिश्रा जी को तांत्रिक प्रक्रियाओं से वशीभूत कर लिया था। विषम परिस्थितियों में मुझे भी मित्रसेन यादव जी के साथ 1994 में  पार्टी को छोडना पड़ गया  था।परंतु बाद में मिश्रा जी ने रमेश कटारा को पार्टी से निकलवा दिया और उसके बाद 2006 में मेरे घर आकर मुझको पुनः पार्टी में शामिल होने को कहा। उनके आग्रह पर उनके साथ मैं कार्यक्रमों  में भाग लेने लगा था। कमिश्नरी पर सांसद राज बब्बर जी के साथ डॉ गिरीश (अब राज्यसचिव) भी आए थे।   डॉ साहब की उपस्थिति में मिश्रा जी ने मुझसे पार्टी फार्म भरवा कर विधिवत शामिल कर लिया। आगरा से 2009 में लखनऊ शिफ्ट हो जाने के कारण मैं यहाँ सक्रिय हूँ। प्रदेश में एक बैंक कर्मी साहब आगरा के रमेश कटारा के अवतार हैं और तांत्रिक प्रक्रियाओं से कुछ बड़े नेताओं को प्रभावित किए हुये हैं तथा छोटे कार्यकर्ताओं को उत्पीड़ित करते रहते हैं।उनके हमदर्द वकील कामरेड्स अपने ही कैडर का उत्पीड़न / शोषण करने के अवसर तलाशते रहते हैं।   


वर्तमान चुनावों के माध्यम से साम्राज्यवादी / फासिस्ट शक्तियाँ सत्ता पर कब्जा करने की फिराक में हैं और कम्युनिस्ट शक्तियाँ बिखरी हुई हैं। 'संसदीय लोकतन्त्र ' को अपनाने के बावजूद कम्युनिस्ट शक्तियों ने पर्याप्त संख्या में प्रत्याशी ही नहीं खड़े किए हैं। जो संसदीय लोकतन्त्र के विरोधी कम्युनिस्ट हैं वे चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं। ऐसे में साम्राज्यवादी / फासिस्ट शक्तियों को खुला मैदान मिल गया प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त सभी कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व ब्राह्मण वादियों के नियंत्रण में रहने से दलित / पिछड़ा जो वास्तविक ' सर्वहारा' हैं को डिफ़ेक्टो नियंता के  विचारानुसार पार्टियों में उचित स्थान नहीं दिया जाता है।  किन्तु जनप्रिय दलित नेत्री मायावती को निष्प्रभावी करने हेतु भाजपा को लाभ पहुंचाने की पहल कर दी जाती है :   





इसी प्रकार बंगाल में पंचायत चुनावों के माध्यम CPM व भाजपा का तालमेल TMC के विरुद्ध हुआ था जबकि आरोप TMC पर लगा दिया गया है। 
  

Monday, 2 July 2018

सामाजिक - आर्थिक असमानता मिटाये बिना जनतंत्र संभव नहीं ------ सी पी भांबरी


आंबेडकरवादियों,  समाजवादियों और वामपंथियों का साझा कार्यक्रम पर आधारित गठबंधन परमावश्यक 


फोटो सौजन्य से एस आर दारापुरी साहब 

दैनिक जागरण,लखनऊ,02-07-2018 

Friday, 19 January 2018

मानवता की रक्षा के लिए साम्राज्यवादी कुचक्र को विफल करना होगा ------ अतुल अंजान


वामपंथी दलों की ओर से इज़राईली प्रधानमंत्री के आगमन पर जोरदार विरोध किया गया जिसमें बोलते हुये भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान ने विश्व में फैलते साम्राज्यवाद के खतरों के प्रति आगाह किया। उन्होने बताया कि, सम्पूर्ण विश्व में लोकतन्त्र व मानवता की समर्थक शक्तियाँ साम्राज्यवाद से सतत संघर्ष कर रही हैं और यह विरोध भी उसी कड़ी में है।

कुछ लोग और विशेषकर भारत में सत्तारूढ़ भाजपा समर्थक कम्यूनिज़्म का मज़ाक उड़ाते हुये इसे खत्म हुआ बताते हैं। पोलिटिकल साईन्स के प्रोफेसर तैमुर रहमान साहब द्वारा ऐसे लोगों की आशंका को निर्मूल सिद्ध किया है ------


Tuesday, 7 November 2017

क्या कम्युनिस्टों की अदूरदर्शिता ने मोदी को पी एम बनाया ? ------ विजय राजबली माथुर













 हज़ारे को अगुआ बना कर अरविंद केजरीवाल एक लंबे समय से शोषकों -उतपीडकों का बचाव करने हेतु भ्रष्टाचार का राग आलापते  रहे है। पढे-लिखे मूरखों को अपना पिछलग्गू बनाने मे मिली कामयाबी के आधार पर वह फूले नहीं समा रहे हैं और जोश मे होश खो बैठे हैं। उन्होने अपने विभाग से हड़पे नौ लाख रुपए प्रधानमंत्री कार्यालय को लौटाए थे जो उनकी और तत्कालीन  प्रधानमंत्री  की अंतरंगता का ज्वलंत प्रतीक है। हज़ारे  साहब को निजी अस्पताल मे पी एम साहब ने पुष्प गुच्छ भिजवा कर उनके आंदोलन को अपना मूक समर्थन प्रदान किया था।

हज़ारे आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन गुट/आर एस एस/देशी-विदेशी NGOs का भरपूर समर्थन था । रामदेव का आंदोलन  केवल आर एस एस /विदेशी समर्थन पर आधारित था। इसीलिए  रामदेव के आंदोलन पर हज़ारे आंदोलन  बढ़त कायम कर सका। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही था भारत मे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करके 'अर्द्ध सैनिक तानाशाही' स्थापित करना।

1974 मे चिम्मन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध मे लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन मे पहली बार नानाजी देशमुख की अगुआई मे आर एस एस ने घुसपैठ की थी और अपार सफलता प्राप्त  थी।1977 की जनता पार्टी सरकार मे अटल बिहारी बाजपाई ने विदेश विभाग मे तथा एल के आडवाणी ने सूचना एवं प्रसारण विभाग मे आर एस एस के लोगो की घुसपैठ करा दी थी। 1980 मे आर एस एस के सहयोग से इंदिरा गांधी की कांग्रेस पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकी थी। यह आर एस एस की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वी पी सिंह के 'बोफोर्स कमीशन विरोधी आंदोलन' मे घुस कर आर एस एस ने संतुलंनकारी भूमिका निभा कर अपनी शक्ति मे अपार वृद्धि कर ली थी और 'राम मंदिर आंदोलन' की आड़ मे पिछड़े वर्ग के हित मे लागू 'मण्डल कमीशन' रिपोर्ट की धज्जिये उड़ा दी थी। देश को साम्राज्यवादियों के अस्त्र 'सांप्रदायिकता' से दंगो मे फंसा कर अपार जन-धन की क्षति की गई थी।

1998  -2004 के राजग शासन काल मे गृह मंत्रालय और विशेष कर खुफिया विभागो मे आर एस एस की ज़बरदस्त पैठ बना दी गई। इनही तत्वो ने रामदेव को सहानुभूति दिलाने हेतु राम लीला मैदान कांड अंजाम दिलाया। लेकिन रामदेव की मूर्खताओ के कारण जनता मे उनकी कलई खुल गई। अतः  हज़ारे को आगे खड़ा किया गया। जो कुछ हुआ और हो रहा है सब की आँखों के सामने है। जो लोग व्यापारियों,उद्योगपतियों,ब्यूक्रेट्स के शोषण -उत्पीड़न को ढकने हेतु भ्रष्टाचार का जाप कर रहे थे और जनता को उल्टा भड़का रहे थे उनके मास्टर माइंड हीरो अरविंद केजरीवाल 'मतदान' ही नहीं करना चाहते थे और वह मतदाता तक न बने थे जो उनके 'लोकतन्त्र विरोधी' होने और 'तानाशाही समर्थक' होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। 

तत्कालीन  मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीरप्पा मोइली ने खुलासा किया था  कि मनमोहन सिंह ने हड़बड़ी मे 'उदारवाद' अर्थात आर्थिक सुधार लागू किए थे जिनसे 'भ्रष्टाचार' मे अपार वृद्धि हुई है। 

तो यह वजह है कि मनमोहन सिंह जी ने आर एस एस को ताकत पहुंचाने हेतु  हज़ारे के आंदोलन को बल प्रदान किया था। सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही भ्रष्टाचार को अनंत काल तक संरक्षण प्रदान कर सकती है और इसी लिए इन आंदोलनकारियों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति नफरत भर कर ये लोग जनता को लोकतन्त्र से दूर करना चाहते हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से स्तीफ़ा देकर बनारस में मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने का उद्देश्य 2014 में सिर्फ यह था कि, मोदी विरोधी वोटों को केजरीवाल समेट लें और मोदी को आसान जीत दिला दें। ऐसा करके बदले में दिल्ली चुनावों में आर एस एस के प्रचंड समर्थन से  भाजपा को हराकर केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बन गए। 
आगामी चुनावों में भाजपा की मदद के लिए केजरीवाल आ आ पा को गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल,राजस्थान सभी जगह चुनाव लड़ाएँगे जिससे भाजपा विरोधी वोट बाँट कर उसे आसान जीत उपलब्ध करवा  सकें। आर एस एस सत्ता पक्ष भाजपा के माध्यम से कब्जा चुका है अब विरोध पक्ष को आ आ पा के माध्यम से कबजाना चाहता है। परंतु 
दुखद तथ्य यह है कि, प्रगतिशील माने जाने वाले विद्वान और दल केजरीवाल और उनके AAP को मोदी / भाजपा विरोधी मानते हुये जनता को गुमराह कर रहे हैं। 

1952 के प्रथम आम चुनाव में  भाकपा लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल थी और 1957 में केरल में संसदीय चुनावों के जरिये सत्ता में आ चुकी थी तब  ' यह आज़ादी अधूरी है ....'  का नारा लगा कर संसदीय भटकाव का राग अलापते हुये और खुद को एथीस्ट घोषित करते हुये जनता से अलग - थलग करने की ज़रूरत क्या थी ? सिर्फ  ब्राह्मण वाद की रक्षा हेतु ही 1964 में पार्टी में विभाजन हुआ और विभक्त हुई पार्टी से 1967 और उसके बाद विभाजन का सिलसिला ही शुरू हो गया। आज केवल आर्थिक संघर्षों के जरिये देश की सत्ता नहीं प्राप्त की जा सकती है जब तक कि, ब्राह्मण वाद की देन  सामाजिक विषमता अर्थात जाति - व्यवस्था पर प्रहार नहीं किया जाता। क्या सभी साम्यवादी दल  / वामपंथ जिन पर ब्राह्मण वादी वर्चस्व है ऐसा होने देंगे ? जब तक ब्राह्मण वाद के विरुद्ध कम्युनिस्ट नहीं खड़े होंगे भारत वर्ष में सफल भी नहीं हो सकेंगे। इस तथ्य को आज सर्वहारा क्रांति की शताब्दी मनाते हुये ध्यान में रख कर आगे बढ़ेंगे तो सफलता चरण चूम लेगी। 
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Monday, 28 August 2017

तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर

तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं । 
जन भाषा और जन बोली से दूर रहने वाले अति कट्टर साम्यवादी / वामपंथी पटना रैली में CPI के भाग लेने पर आलोचना कर रहे हैं तो कुछ एथीस्ट नेता मनु स्मृति से उदाहरण लेकर बचाव कर रहे हैं। CPM के नेता मनु स्मृति का सहारा लेने की आलोचना कर रहे हैं। 
वास्तविकता तो यह है कि, सभी साम्यवादी / वामपंथी दलों पर ब्राह्मणवादी लोगों का नियंत्रण है और वे अपने कदमों से जाने या अनजाने मोदी के  फासिस्ट कदमों को मजबूती देते जा रहे हैं। 
जब 1952 में संसद ( लोकसभा ) के मुख्य विपक्षी दल की हैसियत में आ गए थे। केरल में चुनाव के जरिये सत्ता हासिल हो चुकी थी तब 'यह आज़ादी झूठी है ' का नारा गढ़ कर पार्टी को विभाजित होते देखा। फिर तो केले के तने की परतों की तरह सैंकड़ा से ऊपर साम्यवादी दल बनते चले गए। ऐसी स्थिति में जनता को जो भी सत्ता - विरोधी विकल्प मिलता रहा उसी के साथ होती चली गई। 
1980 में सत्ता में पुनर्वापिसी के लिए इन्दिरा गांधी ने RSS से जो गुप्त सम्झौता किया और शासन को मजदूर विरोधी दिशा देनी शुरू की उसे राजीव गांधी ने उनकी हत्या के बाद RSS की मदद से ही सत्ता हासिल( तब फिर से RSS ने भाजपा के बजाए इन्दिरा कांग्रेस को समर्थन दिया था और ए बी बाजपेयी को भी हरा दिया था ) करने के कारण कार्पोरेटी स्टाईल में ढालना शुरू किया। 
1991 में वित्तमंत्री बनने के साथ मनमोहन सिंह ने जिस उदारीकरण को अपनाया था उसे एल के आडवाणी साहब न्यूयार्क जाकर अपनी नीतियों को चुराया जाना घोषित कर आए थे। जब उनको तीसरी बार पी एम बनने के आसार नहीं दिखे तब रामदेव,हज़ारे आदि - आदि द्वारा कार्पोरेटी भ्रष्टाचार संरक्षण का आंदोलन खड़ा करवा कर अप्रत्यक्ष रूप से मोदी व भाजपा को इतना मजबूत कर दिया कि, 2014 में उनकी सत्ता आसानी से स्थापित हो गई। 
तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं । 
अतः जो साम्यवादी / वामपंथी लालू यादव और ममता बनर्जी से एलर्जी रख कर दूरी बनाना चाहते हैं वे अंततः मोदी की फासिस्ट सत्ता को ही मजबूत बनाने का बहाना ढूंढ रहे हैं। 
CPI ने भी उन D Raja साहब को भेजा जो मूल भाषण अङ्ग्रेज़ी में देते हैं हिन्दी के जानकार और क्षेत्र से वाकिफ अतुल अंजान साहब को नहीं जिससे पता चलता है  कि, सांकेतिक उपस्थिती ही दर्ज करवाई जनता को ठोस संदेश समर्थन का नहीं दिया गया है। 
1951 में 'नया जमाना ', सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' ने RSS प्रचारक लिमये साहब से कहा था कि, वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली की सड़कों पर RSS और कम्युनिस्टों के बीच निर्णायक रक्त - रंजित संघर्ष होगा। 
तब से RSS निरंतर मजबूत हुआ है जबकि  ब्राह्मण वादियों ने कम्युनिस्टों को विभाजित व कमजोर किया है। आज जिस तरह कम्युनिस्ट  खुद जनता से दूर हुये हैं और जन- नेताओं से दूरी बनाए रखने की चर्चा है उसका लाभ उठा कर यदि फासिस्ट सत्ता और मजबूत हुई तब युवा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता निश्चय ही RSS से सशस्त्र मुक़ाबला करेगा और तब वह इन ब्राह्मण वादी कम्युनिस्ट नेताओं को भी धकेल कर आगे बढ़ जाएगा। 
यदि आज कम्युनिस्ट नेतृत्व जन तंत्र समर्थकों के साथ किसी एलर्जी के कारण नहीं खड़ा हुआ और फासिस्ट पुनः सत्तारूढ़ हुये  तो भविष्य में होने वाले रक्त - रंजित संघर्ष की ज़िम्मेदारी उन पर भी होगी।




Saturday, 7 May 2016

जे एन यू बचाओ - लोकतन्त्र बचाओ







लखनऊ, 07 मई 2016 :

आज साँय  4 बजे गांधी प्रतिमा, हजरतगंज पर  'जे एन यू बचाओ संघर्ष समिति ' के तत्वावधान में  एक धरने का आयोजन जे एन यू के छात्रों  के संघर्ष का समर्थन करने व उनके साथ एकजुटता का बोध कराने व सरकार को आगाह करने हेतु किया गया। धरना -सभा का संचालन रमेश दीक्षित व अध्यक्षता वंदना मिश्रा ने किया। 
सभा को संबोधित करने वाले अन्य लोगों में प्रमुख थे - भाकपा , उत्तर प्रदेश के राज्यसचिव डॉ गिरीश,एटक के संरक्षक अरविंद राज  स्वरूप, सीटू के प्रदेश अध्यक्ष रमाशंकर बाजपेयी ,प्रेमनाथ राय, राही मासूम रज़ा साहित्य एकेडमी के महामंत्री राम किशोर,जसम के कौशल किशोर,इप्टा के राकेश,प्रलेस के वीरेंद्र यादव और शकील सिद्दीकी , वर्कर्स काउंसिल के ओ पी सिन्हा व के के शुक्ल आदि थे। 
वक्ता गण एकमत से कन्हैया और उनके साथियों के साथ उनके संघर्ष में अपना समर्थन और आशीर्वाद व्यक्त कर रहे थे। उन्होने साधारण जनता से आह्वान किया कि इस संघर्ष को कन्हैया व कुछ छात्रों का व्यक्तिगत मामला न समझें बल्कि यह जनतंत्र पर हमला है और शिक्षा संस्थाओं को नष्ट करने के बाद जनता के अन्य अधिकारों को कुचलने का क्रम शुरू होने वाला है। अंततः संविधान को नष्ट करके फासिस्ट कारपोरेटी तानाशाही स्थापित करने की प्रक्रिया चल रही है जिसकी प्रथम चोट हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों पर पड़ी और उनके होनहार छात्र रोहित वेमुला को अपनी ज़िंदगी से भी हाथ धोना पड़ा। जे एन यू पर तो इतना तीखा हमला किया गया कि पूरी यूनिवर्सिटी को देशद्रोही कह कर बदनाम किया गया और तीन छात्रों पर अभी भी मुकदमे चल रहे हैं और वे जमानत पर हैं। 
सभा के अंत में 'आज़ादी' गीत का सामूहिक गायन भी उपस्थित लोगों ने करके जे एन यू के संघर्ष को नैतिक बल प्रदान किया। 
अल्प सूचना पर भी लखनऊ के प्रबुद्ध लोगों ने एकत्र होकर जे एन यू छात्रों की हौसला अफजाई पूरे तौर पर की। सभा में उपस्थित अन्य लोगों में प्रमुख नाम हैं --- डॉ  डंडा लखनवी,जनसंदेश टाईम्स के प्रधान संपादक सुभाष राय,भाकपा लखनऊ के जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़,सर्व कामरेड पी एन दिवेदी,मोहम्मद अकरम खान,फूल चंद यादव,आनंद रमन,विजय माथुर ,दिनकर कपूर एवं  महिला फेडरेशन व एडवा की महिलाएं आदि। 


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Ramashanker Bajpai :
20:30 hrs ·
बराबरी और हक़ के लिए लड़ता छात्र जब 
तक सुरक्षित है और जिन्दा है.....तभी तक
यह लोकतंत्र भी सुरक्षित है...
आज लखनऊ मे गांधी प्रतिमा, जी पी ओ
पार्क में सभी लोकतान्त्रिक ताकतों द्वारा
आयोजित धरना जो कि jnu,amu, hcu,
bbu सहित देश के विश्वविद्यालयो को
निशाना बनाने के खिलाफ था, जिसमे
शहर के शिक्षक, पत्रकार, साहित्यकार
लेखक,आलोचक, कलाकार, विद्याथी,
महिला सगंठन, ट्रेड्यूनियंस एवं
बुद्दिजीवियों ने भारी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज करी ।
धरने को प्रो० रमेश दीक्षित, डॉ० गिरीश
प्रेमनाथ राय, अंशु केडिया, सी एस वर्मा
अतहर हुसैन,आशा मिश्रा, प्रशांत त्रिवेदी
रमेश सिंह सेंगर, अमित मिश्रा और
वंदना मिश्रा,नितीश,रविकांत,जहीर सिद्दीकी
दीपा चौधुरी,खालिद भाई, आशीष अवस्थी,
राकेश, वीरेंद्र जी,प्रवीण पाण्डेय तथा अरविन्द राज स्वरुप आदि ने संबोधित किया ।
इस संघर्ष में अपनी बुलंद आवाज से
jnu के पूर्व छात्र साथी शन्ने भाई ने
एक नज़्म के जरिये इस आंदोलन को तेजी
से बढ़ाने का आवाहन किया ।।
‪#‎sandwichJNU‬.
https://www.facebook.com/ramashanker.bajpai/posts/1143028769062570

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जनसंदेश टाईम्स,लखनऊ,पृष्ठ-5 ,08 मई 2016 



Tuesday, 15 March 2016

कन्हैया की अलोकतांत्रिक गिरफ्तारी संविधान व जनतंत्र पर हमला है

Published on Mar 9, 2016
Abhinandan Sekhri talks to Kanhaiya Kumar about sedition, being attacked inside Patiala House, whether he’ll join politics,​ and more.




***  इस साक्षात्कार में अभिनंदंन सीखरी साहब ने उन रहस्यों को भी उद्घाटित करा लिया है जिनकी ओर अन्य साक्षात्कार कर्ताओं का ध्यान नहीं गया था अथवा उन्होने उनको महत्वपूर्ण नहीं माना था। 

इससे ज्ञात होता है कि, 11 फरवरी की अर्द्ध रात्रि को लगभग 12 बजे के बाद जब जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार कुछ साथियों के साथ चाय पीने के लिए हास्टल के अपने कमरे से बाहर आए तब सादी  वर्दी में तैनात पुलिस कर्मियों ने जिनको कन्हैया पहचानते थे उनको जांच में सहयोग के नाम पर अपने साथ ले लिया और सिविल कार से संभवतः LIU आफिस जिसे कन्हैया नहीं जानते थे ले गए तथा वरदीधारी पुलिस के हवाले कर दिया। LIU कर्मियों ने कन्हैया का फोन पहले ही अपने कब्जे में कर लिया था। वारंट मांगने पर बाद में देने को कहा जो फिर दिया नहीं। इसके बाद का घटनाक्रम अब जग-ज़ाहिर है कि, तीन चेनल्स के मिलावटी वीडियोज़ प्रसारण को आधार बना कर उन पर 'देशद्रोही' का ठप्पा चस्पा कराया गया और वकीलों के नाम पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर कोर्ट में ही  जानलेवा हमला कराया गया जिसमें दिल्ली पुलिस मूक दर्शक बनी रही। अब उनकी जीभ काटने,गर्दन काटने व गोली से उड़ा देने की धमकियाँ दी जा रही हैं। गोयबल्स चेनल उनके विरुद्ध घृणित अभियान ज़ोर-शोर से चला रहा है जिसके परिणाम स्वरूप उन पर JNU परिसर में भी जानलेवा हमला हुआ। मुजफ्फरपुर में उनके समर्थन में हो रही सभा पर ही पत्थर-लाठियों से हमला किया गया। कानून व संविधान का खुला उल्लंघन किया जा रहा है। 

कन्हैया समस्त लोकतन्त्र रक्षकों की एकता चाहते हैं जो वक्त की बेहद ज़रूरत है। इसी हेतु उनका आज संसद पर मार्च हो रहा है जिसे 'देशभक्त' और 'लोकतान्त्रिक' शक्तियों का समर्थन मजबूती से मिलना चाहिए। ***