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Saturday, 4 March 2017

नोटबंदी की घोषणा करने का हक पी एम को कैसे मिला ? ------ अतुल कुमार अंजान

सवाल यह भी है कि  नोटबंदी की घोषणा करने का हक पी एम को कैसे मिला ? यह हक तो रिज़र्व बैंक के गवर्नर का है। नोटबंदी से किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी सभी की मुसीबत बढ़ गई । निर्यात घटा, रोजगार के अवसर कम हो गए। अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतर  गई। नए नोट छापने के लिए कागज विदेशों से आयात किया जाएगा। 
हिंदुस्तान , लखनऊ, 03 मार्च 2017, पृष्ठ - 14 पर  अतुल अंजान साहब का साक्षात्कार ------

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1352467731481866&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3
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March 1 at 6:20pm
'नया जमाना ', सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' ने 1950 - 51 में ही RSS प्रचारक लिंमये साहब से कह दिया था कि, जैसी गतिविधियेँ हैं यदि इनमें सुधार न हुआ तो एक दिन दिल्ली की सड़कों पर RSS और कम्युनिस्टों के मध्य सत्ता के लिए निर्णायक संघर्ष होगा। 
गत वर्ष से चल रहे घटनाक्रमों का तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में विश्लेषण किया जाये तो बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा कि, कुछ भी अनायास नहीं हुआ है। यह सब प्रभाकर जी के द्वारा व्यक्त पूर्वानुमान का पूर्वाभ्यास ही है। कैसे ? :
* रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या और शराब व्यापारी विजय माल्या के देश छोडने की घटनाओं से ध्यान हटाने के लिए जे एन यू के तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष को 'राष्ट्र द्रोह ' का कल्पित आरोप लगा कर गिरफ्तार कर लिया गया जिससे सबका ध्यान इस गिरफ्तारी के पक्ष - विपक्ष में उलझ गया और फासिस्ट सरकार को राहत मिल गई। 
* इस बार नोटबंदी से साधारण जनता,छोटे व्यापारी और सबसे ज़्यादा किसान - मजदूर त्रस्त थे। पाँच राज्यों में चल रहे चुनावों में केंद्र की सरकार के विरुद्ध आक्रोश परिलक्षित हो रहा था। अतः JNU छात्र उमर खालिद की आड़ में ABVP के माध्यम से रामजस कालेज, दिल्ली में उपद्रव करवा कर फिर उससे भी ध्यान हटाने के लिए दस माह पुराने वीडियो के मात्र एक पोस्टर को संदर्भ से काट कर विदेशी गिल्ली - डंडा के खिलाड़ी से उछलवा कर कार्गिल शहीद की पुत्री पर चरित्र हनन का दुष्प्रचार करवाया गया। स्व्भाविक रूप से जिसका प्रतिरोध हुआ ही और नोटबंदी की हानियों की ओर से जनता का ध्यान हटा दिया गया। :
* कम्युनिस्टों / वामपंथ ने अपने को गलत प्रचार के कारण जनता से भले ही काट रखा है परंतु इनके 'युवा ' और 'छात्र ' संगठन अभी भी जागरूक हैं । इसी कारण गत वर्ष भी और इस वर्ष भी CPI के एक राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी राजा और CPM के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सीताराम येचूरी तक को छात्रों के प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी करनी ही पड़ी है। 
* आने वाले समय में संभवतः 2019 के लोकसभा चुनावों से पूर्व ही आर एस एस ऐसी परिस्थितियेँ उत्पन्न कर देगा कि, इच्छा या अनिच्छा से कम्युनिस्टों को दिल्ली समेत प्रमुख नगरों में सड़कों पर संघर्ष में कूदना ही पड़ेगा। आज की तारीख तक आर एस एस से निबटने के लिए वैसा ही मिलिटेंट संगठन किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के पास नहीं है। उत्तर प्रदेश समेत इन विधानसभा चुनावों में चतुराई से भाग लिया नहीं गया है। किसी भी संघर्ष की स्थिति में कम्युनिस्टों को केवल फासिस्ट संगठन ही नहीं उनको सहयोग कर रहे पुलिस,सेना,अदालत का भी मुक़ाबला करना होगा। हमारे देश में कामरेड लेनिन और कामरेड माओ जैसे चिंतक - विचारक संघर्षशील कामरेड नेता अभी तक प्रगट नहीं हुये हैं। 
* सारा का सारा दारोमदार ' युवा ' व 'छात्र ' कम्युनिस्टों पर रहेगा। इनके ही दम पर फ़ासिस्टी शक्तियों की पराजय की उम्मीद की जा सकती है।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1350894501639189
(विजय राजबली माथुर )

Friday, 20 January 2017

एथीज़्म पोंगापंथ : एक समाना ------ विजय राजबली माथुर / सीपीएम की अदूरदर्शिता --- रोशन सुचान

19 - 1 - 2017 


संयुक्त वाम और यूपी चुनाव:

"एक गंभीर विचार फेस बुक पर देखा कि जो बीजेपी को हराये उसे ही वोट कर दो!
कम्युनिस्ट पार्टियां भी बीजेपी को हराना चाहती हैं पर वो अपनी उपस्थिति भी वैकल्पिक आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक नीतियों के आधार पर विधान सभा में दर्ज़ कराना चाहती हैं।
वो जनता को यह भी बताना चाहती हैं कि क्यों मोदी जी सत्ता में आये।
देश के धनवानों ने देश के जनवाद को अपने हिसाब से ढाल लिया है।"

"फिर पूंछना पड़ रहा है,
'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
.…....................................................
इधर कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों ने बहस शुरू की है कि जो बीजेपी को हराये उसे ही वोट कर दो.....
वामपंथ भी बीजेपी को किसी भी सूरत में हारते हुए देखना चाहता हैं पर वो क्या उसको अपनी पूरी ताकत से अपनी उपस्थिति वैकल्पिक आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक नीतियों के आधार पर विधान सभा में दर्ज़ कराने का अधिकार नहीं है ?"

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*21 वर्ष पूर्व 1996 में पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का प्रस्ताव था कि, कामरेड ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनें जिस पर अन्य दलों की तो सहमति थी परंतु CPM के तत्कालीन महासचिव  कामरेड प्रकाश करात ने ही ऐसा नहीं होने दिया जिसे कामरेड ज्योति बसु ने 'ऐतिहासिक भूल ' कहा था। 
*लोकसभा अध्यक्ष कामरेड सोमनाथ चटर्जी को CPM से निष्कासित करके यू पी ए सरकार से वामपंथ ने समर्थन वापिस ले लिया लेकिन सरकार नहीं गिरी जबकि वामपंथ को नुकसान पहुंचा था। 
*1994 में यू पी CPI में विभाजन कर एक गुट सपा में शामिल हो गया था तब भी भाकपा के तत्कालीन महासचिव और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री बने कामरेड इंद्रजीत गुप्ता ने 1996  के चुनावों में यू पी में सपा को समर्थन दिया था। कांग्रेस के समर्थन से 13 दिनी बाजपेयी सरकार को गिरा कर जो संयुक्त सरकार बनी थी उसमें कामरेड इंद्रजीत गुप्त के अतिरिक्त कामरेड चतुरानन मिश्रा भी कृषी मंत्री के रूप में शामिल हुये थे। 
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19-01-2017

* 2017 के यू पी चुनावों में वामपंथी दलों ने अलग से चुनाव लड़ने का फैसला किया है जैसा कि, अरविंद राज स्वरूप जी एवं प्रदीप शर्मा जी के नोट्स से प्रमाणित भी होता है । केवल 140 सीटों पर चुनाव लड़ कर और 263 सीटों पर चुनाव न लड़ कर वामपंथी जनता को यही संदेश देने जा रहे हैं कि, उनकी दिलचस्पी सरकार बनाने में बिलकुल भी नहीं है और इस प्रकार भाजपा विरोधी वोट बांटने से चूंकि भाजपा को ही लाभ होगा : जनता के समक्ष यही संदेश स्पष्ट है ;अतः जनता का समर्थन वामपंथ को नहीं मिलने जा रहा है । यदि अन्य जंतांत्रिक दलों के साथ मिल कर कामरेड इंद्रजीत गुप्त के फार्मूले पर मोर्चा बनाया जाता तब वामपंथ को जनता की सहानुभूति भी मिलती और कुछ विधायक भी चुन कर आ जाते।
*कहने को तो यह छह वामपंथी दलों का गठबंधन है लेकिन लखनऊ के बख्शी का तालाब विधासभा क्षेत्र से CPM प्रत्याशी स्थानीय CPI कार्यकर्ताओं के विरुद्ध विष - वमन कर रहे हैं जिसकी शिकायत उन लोगों ने बाकायदा पार्टी मीटिंग में दर्ज कराई है। लखनऊ उत्तर से एक पुराने CPI कार्यकर्ता कामरेड  आनंद रमन  तिवारी ने चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की थी किन्तु उनको स्थानीय मंत्री से गुप्त समझौता होने के कारण चुनाव नहीं लड़ाया जा रहा है। इन परिस्थितियों में यह कहना कि, वामपंथ की उपस्थिती दर्ज कराने के लिए चुनाव लड़ा जा रहा है सरासर झूठ है।
*2012 और 2014 के विधानसभा चुनावों में SC व OBC कामरेड्स को प्रत्याशी तो बनाया गया था किन्तु प्रादेशिक नेताओं का सहयोग व समर्थन नहीं मिला था। इस बार लखनऊ पश्चिम से एक मुस्लिम कामरेड को प्रत्याशी बनाया गया है उनका चुनाव परिणाम ही बताएगा कि, वरिष्ठ नेताओं के द्वारा उनको कितना सहयोग दिया गया।
* यदि वामपंथ के सहयोग के बगैर ही सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त कर दिया गया तो वामपंथ की प्रासांगकिकता को ज़बरदस्त आघात इन चुनावों के जरिये पहुंचेगा। लेकिन यदि सांप्रदायिकता विरोधी वोटों के बांटने से सांप्रदायिक शक्तियों को यू पी की सत्ता मिल जाती है तो उसमें वामपंथ का भी सहयोग समझा जाएगा। इस दृष्टि से यह चुनाव वामपंथ की लोकतान्त्रिक प्रतिबद्धता के लिए भी चुनौती साबित होंगे क्योंकि तब सांप्रदायिक शक्तियों  के निर्मूलन  के लिए 'हिंसा ' व 'बल प्रयोग ' ही एकमात्र विकल्प बचेगा । यू पी चुनाव में सांप्रदायिक शक्तियों की जीत होने पर संविधान व लोकतन्त्र के नष्ट होने का मार्ग ही प्रशस्त होगा।उस सूरत में वामपंथ(एथीज़्म ) - पोंगापंथ के COMPLEMETARY & SUPPLEMENTARY के रूप में जनता के सामने होगा।  उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता वामपंथ को दरकिनार करके लोकतन्त्र की रक्षा करेगी ऐसी संभावना प्रबल है। अतः जिस तरीके से वामपंथ चुनाव लड़ रहा है वह वामपंथ को ही नष्ट करने का आत्मघाती प्रयास बन सकता है। 

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फेसबुक कमेंट्स :
23-01-2017 


24-01-2017 
सीपीएम की अदूरदर्शिता, छोटी सोच और बडी गलतियां करने की आदतों का परिणाम 
Roshan Suchan