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Saturday, 21 December 2024

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गौरवशाली सौ वर्ष- ------ डा. गिरीश

 शताब्दी वर्ष समारोह के आयोजन की तैयारियां ज़ोरों पर


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आगामी 26 दिसंबर 2024 को अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। पूरे देश में शताब्दी वर्ष को भव्य से भव्य बनाने की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। भाकपा ने इस संबंध में काफी समय पहले ही निर्णय ले लिया था और आयोजनों की व्यापक कार्य योजना तैयार की गई थी। इसी माह के प्रारंभ में संपन्न हुयी राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बीच पार्टी के राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्यों द्वारा शताब्दी वर्ष समारोह के लिये एक ‘लोगो’ जारी किया गया।


पार्टी के शताब्दी वर्ष समारोहों का शुभारंभ कानपुर में 26 दिसंबर 2024 को एक भव्य समारोह के साथ होगा। सभी जानते हैं कि कानपुर में ही 25, 26 एवं 27 दिसंबर को पार्टी की स्थापना कांग्रेस हुयी थी। अतएव कानपुर को इस मौके के लिये खासतौर पर चुना गया है। वहां इसके आयोजन की जोरदार तैयारियां चल रही हैं। कानपुर ही नहीं अधिकतर राज्यों की राजधानियों में उस दिन भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे। कई राज्यों में यह आयोजन अगली तिथियों में होगा। ऐसा नेत्रत्व की उपलब्धता को ध्यान में रख कर किया गया है।


जिला स्तरों पर भी अनेकों जगह अनेक कार्यक्र्म आयोजित किए जायेंगे, जो विभिन्न रूपों में पूरे वर्ष चलते रहेंगे। मुख्य उद्देश्य पार्टी के गौरवशाली इतिहास को जन जन तक पहुंचाना तथा देश की बड़ी आबादी को भाकपा की आज प्रासंगिकता से अवगत कराना है। उत्तर प्रदेश जिसे कि भाकपा की स्थापना का गौरव हासिल है, की पार्टी राज्य समिति ने हर जिले में कम से कम 100 बैठकें आयोजित करने का निश्चय किया है, जहां कम से एक नया सदस्य बनाया जाएगा। इस तरह सौ नई शाखाओं की नींव रखी जायेगी। इसके अलावा हर जिले में कई कई बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे।


समापन स्थल के रूप में किसान- सशस्त्र संघर्षों की तपोभूमि- तेलांगाना के खम्मम को चुना गया है, जहां 26 दिसंबर 2025 को एक विशाल रैली और जनसभा आयोजित की जायेगी। 21 से 25 सितंबर के बीच चंडीगढ़ में पार्टी का आगामी महाधिवेशन होने जा रहा है। महाधिवेशन को सफल बनाने और पार्टी के पुनर्निर्माण और कायाकल्प के लिये शताब्दी वर्ष को एक यादगार अवसर बनाने का द्रढ़ निश्चय राष्ट्रीय परिषद में दोहराया गया है।


इस सारी कवायद के गंभीर कारण भी हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश की पहली और एकमात्र पार्टी है जिसकी स्थापना उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के तपे- तपाये नेताओं ने की। देश की आजादी के संघर्ष को व्यापक और जुझारू रुप प्रदान करने तथा “संपूर्ण आजादी” को आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य निर्धारित कराने में इसने उल्लेखनीय भूमिका निभाई।


ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मात्रभूमि को स्वतंत्र कराने की अदम्य इच्छा से लैस विभिन्न क्रांतिकारी समूहों के अगुवा और उत्साही कामरेड्स 25 से 27 दिसंबर 1925 को तत्कालीन मजदूर आंदोलन के प्रमुख केन्द्र  कानपुर में एकत्रित हुये और देश की पहली राष्ट्र- स्तरीय कम्युनिस्ट पार्टी- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( Communist Party of India ) के नाम, नीतियों, लक्ष्यों और सांगठनिक ढांचे का निरूपण किया।


1917 के अक्तूबर माह में संपन्न रूस की समाजवादी क्रान्ति की सफलता ने भी इन्हें एकजुट होने और आजादी के संघर्ष को धार देने के लिये प्रेरित किया था। यहां यह रेखांकित किया जाना चाहिये कि आजादी की लड़ाई में मजदूर वर्ग की भूमिका के महत्व को समझते हुये मार्क्सवाद- लेनिनवाद से अनुप्राणित क्रान्तिकारी- भगत सिंह ने कानपुर में डेरा डाला था और एक समूह का गठन किया था।


तत्कालीन वस्तुगत परिस्थितियों ने भी भाकपा की स्थापना हेतु परिस्थितियों का निर्माण किया था। गांधीजी की अगुवाई और कांग्रेस के नेत्रत्व में चल रहे 1920- 22 के असहयोग आंदोलन और कई अन्य आंदोलनों ने साम्राज्यवाद के खिलाफ जन भागीदारी वाला आकार ग्रहण कर लिया था। लेकिन गोरखपुर के चौरी- चौरा में मुक्तियोद्धाओं के सशस्त्र संघर्ष से विचलित गांधीजी ने आंदोलन को वापस ले लिया था।


इससे हताश नौजवानों ने नई राह तलाशना शुरू कर दिया। इसी तरह अद्वितीय वीरता और बलिदानों के बावजूद संघर्षरत भूमिगत क्रान्तिकारी साम्राज्यवाद के खिलाफ जनता को लामबंद करने में असफल रहे। इससे मोहभंग होने पर युवाओं ने मार्क्सवाद- लेनिनवाद की ओर रुख किया और परिणाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन था।


देश भर में किसान- मजदुर्रों  और छात्रों के जुझारू और वर्गीय आंदोलनों के उभार ने भी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के लिये प्रष्ठभूमि तैयार की थी। क्रांतिकारियों पर विभिन्न षडयंत्रों के झूठे केस लगाने से भी साम्राज्यवादियों द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ वातावरण निर्मित हुआ।


राष्ट्रीय आजादी और वर्ग संघर्ष को आधार बनाते हुये भाकपा ने- जोतने वालों को जमीन, विदेशी साम्राज्यवादी पूंजी का राष्ट्रीयकरण, वयस्क मताधिकार एवं प्रजातन्त्र, राष्ट्र की संपदा राष्ट्र के हाथों, में, काम के घंटे आठ, संगठन बनाने का लोकतान्त्रिक अधिकार,  सभाएं प्रदर्शन एवं हड़ताल, महिलाओं को सामाजिक बराबरी, अछूतों को सामाजिक न्याय आदि मांगों को राष्ट्रीय एजेंडे का रूप दिया।


निर्धारित लक्ष्यों की ओर बढ़ते हुये कम्युनिस्टों की पहलकदमी से 1920 में देश के प्रथम राष्ट्रव्यापी मजदूर संगठन- एआईटीयूसी की स्थापना हुयी जिसमें आज भी वे प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। ये कम्युनिस्ट ही थे जिन्होंने 1921 में कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतन्त्रता हेतु प्रस्ताव पेश किया और बाद में अपने संघर्षों के बल पर स्वीक्रत कराया।


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उसके अनुयायियों की सक्रिय भागीदारी से 1936 में तीन संयुक्त जन संगठनों की स्थापना की गयी। वे हैं- आल इंडिया किसान सभा (AIKS), आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) एवं प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (PWA)। 1941 में इंडियन प्यूपिल्स थ्येटर एसोशिएसन (IPTA) की स्थापना की गयी । सभी संगठनों ने देश के जाने माने बुध्दिजीवियों और आमजनों को आजादी के आंदोलन में उतारा और जनजागरण किया। महिला कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने 1954 में नेशनल फेडरेशन आफ इंडियन वीमेन (NFIW) के गठन में निर्णायक भूमिका निभाई।


1946 में निजाम के सामन्तवादी शासन को उखाड़ कर ज़मीनों को कब्जा कर जनता में बांटने का काम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने किया। इसे तेलांगाना सशस्त्र आंदोलन के नाम से जाना जाता है। 1940 में हुये कय्यूर, पुन्नप्रा- वायलार, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान संघर्ष और ऐसे ही कई और बलिदानी आंदोलन इसकी झोली में हैं। राजशाही राज्यों को स्वतंत्र भारत में मिलाने के लिये भी भाकपा ने मजबूत आवाज उठायी।


1946 में हुये चुनावों में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वाकायदा हिस्सा लिया। स्पष्ट है भाकपा ने जन आंदोलनों, चुनावों और सशस्त्र संघर्षों को लक्ष्य प्राप्ति हेतु माध्यम बनाया।


हिटलर के फासीवाद पर ऐतिहासिक विजय के परिणामस्वरूप उत्पन्न जन उभार ने भारत की स्वतन्त्रता के लिये अंतिम संघर्ष के द्वार खोल दिये थे। युध्द के बाद के काल में 1945- 47 के साम्राज्यवाद विरोधी ज्वार में कम्युनिस्ट निर्णायक भूमिका में थे।


स्वतन्त्रता के बाद 1952 में हुये देश के प्रथम आम चुनावों में सीपीआई विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। आगे के कई चुनावों में भी पार्टी शानदार जीत हासिल कर विपक्ष की भूमिका में रही। पार्टी की विपक्षी भूमिका को निरूपित करते हुये पार्टी के तत्कालीन महासचिव अजय घोष ने कहा कि हम केवल विरोध के ही लिये नहीं, इतिहास के नवनिर्माण हेतु विपक्ष की भूमिका निभायेंगे। यह है विपक्ष की भूमिका में कम्युनिस्टों का द्रष्टिकोण।


1957 में देश की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में स्थापित हुयी।


भाषा के आधार पर राज्यों के निर्धारण हेतु भी सीपीआई ने अहम भूमिका निभाई। दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की आकांक्षाओं को सम्पूर्ण महत्व देते हुये भी सीपीआई जातिवाद का प्रबल विरोध करती है। शोषण और दमन से मुक्त वर्गविहीन और जातिविहीन समाज का निर्माण ही हमारा भविष्य का द्रष्टिकोण है।


व्यापक विविधता और बहुलवाद की भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुकूल संसदीय प्रणाली की रक्षा में भाकपा ने अद्भुत कार्य किया है। साथ ही संसद को जनता की सही आकांक्षाओं को पूरा करने वाला संस्थान बनाने को वह चुनाव सुधारों के लिये अभियान चला रही है ताकि चुनावों में धनबल और बाहुबल के प्रभाव को रोका जा सके। फासीवादी लक्ष्यों की ओर बढ़ रही मौजूदा सरकार द्वारा संविधान पर बोले जा रहे हमलों को वह अन्य शक्तियों के साथ मिल कर विफल करने के प्रयासों में जुटी है।


देश की एकता अखंडता की रक्षा में वह किसी से पीछे नहीं। खालिस्तानी आतंकवाद हो या कश्मीर का प्रायोजित आतंकवाद, सभी के खिलाफ लड़ते हुये उसके तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शानदार शहादतें दी हैं। सांप्रदायिकता के खतरे को सर्वप्रथम पहचानते हुये इसने इसके विरूध्द संघर्ष को राजनीति के केन्द्र में ला दिया। सांप्रदायिक फासीवादी शासन की कुटिल मंशा को विफल बनाने को भाकपा ने ‘हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई एकता’ को वजूद में लाने के लिये कार्य किया है। वहीं किसानों- कामगारों के मुद्दा आधारित संघर्षों की अगुवाई कर उन्हें आजादी और लोकतन्त्र की रक्षा के संघर्ष में उतारा है।


100 वर्षों के विशाल और सम्रध्द इतिहास को कुछ पन्नों में नहीं समेटा जा सकता। भावी पीढ़ियाँ उसे पढ़ेंगी जानेंगीं और समझेंगीं। वे यह भी समझेंगीं कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन न केवल कम्युनिस्ट आंदोलन बल्कि देश की शोषित पीढ़ित जनता की पीठ में छुरा भौंकने के अतिरिक्त कुछ न था। विभाजन की चपेट में पार्टी ही नहीं जन संगठनों को भी लाया गया। यहां तक कि स्थापना दिवस पर भी नाहक विवाद खड़ा किया गया। जबकि संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी की का. बी. टी. रणदीवे की अध्यक्षता में संपन्न केंद्रीय सेक्रेटरियट की एक बैठक में अंतिम रूप से तय पाया गया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में हुयी थी।


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वैचारिक एवं राजनैतिक मतभेदों को दूर करते हुये अंतिम रूप से कम्युनिस्ट एकीकरण पर ज़ोर दे रही है। कारपोरेट- सांप्रदायिक- फासीवाद से निर्णायक संघर्ष के लिये ये अति आवश्यक है। उतना ही आवश्यक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गौरवशाली इतिहास को जनता के बीच ले जाना है, ताकि पार्टी कतारों और आमजन को समाजवाद के लक्ष्य को हासिल करने को तैयार किया जा सके।


डा. गिरीश


19.12.2024   

Monday, 3 December 2018

किसान - मजदूर दुर्दशा एक समान : भारत हो या पाकिस्तान

महाराष्ट्र के नासिक में एक किसान को अपनी प्याज की उपज एक रूपये प्रति किलोग्राम से कुछ अधिक की दर पर बेचनी पड़ी। उसने विरोध स्वरूप अपनी मेहनत की कमाई प्रधानमंत्री राहत कोष में भेज दी है। 
देश भर के किसानों का मोदी सरकार के खिलाफ गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही के दिनों में देशभर से आए किसानों ने अपनी फसलों के वाजिब दाम और कर्जमाफी जैसी मांग को लेकर रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक मार्च किया था। इसके बावजूद मोदी सरकार किसानों को लेकर संजीदा दिखाई नहीं दे रही है। अब महाराष्ट्र के नासिक में किसानों ने पीएम मोदी विरोध के रुप में चेक भेजा है।दरअसल महाराष्‍ट्र में किसानों को फसल बेचने के बाद भी उसकी लागत तक नहीं मिल पा रही है। नासिक में प्याज के दाम गिरने से किसान परेशान हैं। हालात यह है कि 1 किलो प्याज 1 रुपये में बेचने की नौबत आ गई है। एक किसान ने तो लागत के बराबर पैसे नहीं मिलने से नाराज होकर मिले पैसे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मनी आर्डर कर दिया। विरोधस्वरूप में किसानों ने 750 किलो प्याज के बदले मिले 1064 रुपये प्रधानमंत्री को भेज दिया और कहा कि इस पैसे को प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कर दिए जाएं।





नासिक जिले के निफड़ तहसील के रहने वाले संजय साठे उन चुनिंदा ‘प्रगतिशील किसानों’ में थे, जिन्हें 2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के दौरान उनसे संवाद करने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा चुना गया था। अब वो दुख बताते हुए कहा, “मैंने इस सीजन में 750 किलो प्याज का उत्पादन किया, लेकिन पिछले हफ्ते निफड़ थोक बाजार में मुझे 1 रुपये प्रति किलो का भाव मिल रहा था। किसी तरह मैंने मोल-भाव करके 1.40 रुपये प्रति किलो में सौदा तय किया और 750 किलो प्याज के बदले मुझे 1064 रुपये मिले।”
उन्होंने आगे कहा, ‘ कई महीनों की कड़ी मेहनत के बाद ऐसी हालात होने पर तकलीफ होती है। इसलिए मैंने विरोधस्वरूप 1064 रुपये प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में दान कर दिया। मैंने अतिरिक्त 54 रुपये मनी ऑर्डर से भेजे हैं।”बता दें कि देश के कुल प्याज उत्पादन की 50 फीसदी पैदावार उत्तरी महाराष्ट्र के नासिक जिले में ही होती है। 
https://www.navjivanindia.com/news/farmers-got-only-1064-rupees-of-750-kg-of-onion-angry-farmers-send-all-amount-to-pm-relief-fund?utm_source=one-signal&utm_medium=push-notification

Thursday, 28 December 2017

दूसरों की मेहनत पर जीने वाला देश का दुश्मन है ------ Sunita B Moodee

........हम मजदूर वर्ग के लोग सब एक है.......जो मेहनत करके (खेती-खलिहान-कल-कारखानो मे) फसल उगाये वही उसका मालिक है.......जो दूसरों का मेहनत पर जीता है वो देश का दुश्मन है........... अपनी योग्यता के अनुसार सभी को काम पाने का अधिकार है और हर मेहनती इंसान को अपनी जरूरतों के अनुसार दाम पाने का हक है ...... आदि आदि। ................................................युवा शक्ति को इंटरनेट के जरिये विकृत यौन को उजागर करनेवाली विडियो-कहानिया आदि परोस रहे है ताकि उनके अंदर जवानी का ताकत कभी खुदीराम बोस, बिरसा मुंडा, भगत सिंह, आसफकुललाह, आदि के रूप मे न उभर सके वलकी वे एक यौन-बिकृत पशु की तरह गुलाम की जिंदगी को जीने मे ही अपना शान समझे।


Sunita B Moodee

Wednesday, 15 June 2016

उसने इस बहाने मेरा घर जला दिया ------ अतुल कुमार अंजान






EK  KADUWA   SACH. ............ PYASSI  THI   ZAMEEN  SARA  LAHOO   PILA   DIYA                   MUJHPER  WATAN   KA  KARZ  THHA  MAINE  USSE  CHUKAA  DIYA                                                MAINE  USSE   KAHA   JALANE  KO  IKK   CHIRAG        USSNE  ISS  BAHANE  MERA  GHAR   JALA   DIYA..RGDS...    ATUL    KUMAR    ANJAAN


"प्यासी थी ज़मीन    सारा   लहू  पिला   दिया 
मुझ पर वतन का कर्ज़ था मैंने उसे चुका दिया 
मैंने उसे कहा जलाने को        इक      चिराग 
उसने इस      बहाने मेरा घर       जला दिया "

अतुल कुमार अंजान साहब भाकपा के राष्ट्रीय सचिव होने के साथ-साथ किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं  जिसके नाते  किसानों से उनका निरंतर जीवंत संपर्क बना रहता है। रात  के नौ-नौ बजे तक उनको कार्यालय  में  किसान समस्याओं पर मंथन करते देखा जा सकता है। उनका ख्याल है जो किसान इतनी दूर से उनको अपनी समस्या बताने आया है  तो उसकी  बात  सुनना  उनका फर्ज़ है और जो मदद वह दिला सकते हैं  उसको दिलवा देते हैं। 

किसानों की बातें सुनते-सुनते उनके दिमाग में आया कि, बड़े अरमानों से किसान व साधारण जनता ने मोदी सरकार को सत्तारूढ़ किया था पर बदले में उसे क्या मिला ? उसी का उत्तर है यह शेर । देश में महाराष्ट्र हो या बुंदेलखंड या फिर कालाहांडी सब जगह किसानों  के घर जल रहे हैं, किसान आत्म- हत्यायेँ  कर रहे हैं। किसानों  की झोंपड़ियाँ  सूनी हैं  और सूना है उनका जीवन। किसान दिन  रात  कड़ी मेहनत करके अपना खून सुखा कर  फसल उगाता है लेकिन उसे उसका लागत मूल्य भी नहीं मिल पाता है। 

यह स्थिति  कामरेड अंजान को व्यथित करती है और उनके कवि हृदय  से छंद  निकल पड़ता है। अंजान साहब का ज्ञान कंजूस का धन नहीं है उनके मन में जो विचार आ जाते हैं उनको वह कुछ चुनिन्दा लोगों  से साझा कर डालते हैं। लखनऊ  के उन लोगों में से एक मैं भी हूँ। और लोग इसका क्या प्रयोग करते हैं मुझे मालूम नहीं , लेकिन  मैं  अंजान साहब द्वारा व्यक्त विचारों को अपने ब्लाग्स में  संग्रहित करने का लोभ नहीं छोड़ पाता। हो सकता है कवि  के कहने का आशय भिन्न हो  किन्तु मैंने जो निष्कर्ष निकाला उसके अनुसार व्याख्या कर डाली। प्राप्त करने के बाद इतना अधिकार मैंने स्वतः हासिल कर लिया। 
(विजय राजबली माथुर )
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Thursday, 28 January 2016

संविधान बचाने का संकल्प लीजिये ------ अतुल कुमार अंजान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं अखिल भारतीय किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल कुमार अंजान साहब ने देशवासियों से भारतीय गणतंत्र  व  संविधान बचाने का संकल्प  लेने की अपील की है । उनका संदेश निमन्वत है :

" इस बड़े देश भारत को आगे ले जाने के लिए बड़ा दिल रखना होगा। संविधान बचाने का संकल्प लीजिये, गणतंत्र ज़िन्दाबाद" ------ अतुल कुमार अंजान 
27-01-2016 
11:47:25 pm





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Tuesday, 19 January 2016

स्त्रियों की आधी आबादी की जागृति और लामबन्दी के बिना कोई भी सामाजिक परिवर्तन सम्भव नहीं ------ M.s. Rana

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रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी शहादत से पहले जनता के नाम यह वसीयत की थी कि “यदि देशवासियों को हमारे मरने का ज़रा भी अफसोस है तो वे जैसे भी हो हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम करें। यही हमारी आखिरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है।”...........................

शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को याद करते हुए क्रान्ति का सन्देश कल-कारखानों और खेतों-खलिहानों तक लेकर जाना होगा। स्त्रियों की आधी आबादी की जागृति और लामबन्दी के बिना कोई भी सामाजिक परिवर्तन सम्भव नहीं। मेहनतकशों, छात्रों-युवाओं, बुद्धिजीवियों सभी मोर्चों पर स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाना सफलता की बुनियादी शर्त्त है। हमें हर तरह के जातीय-धार्मिक-लैंगिक उत्पीड़न और दमन के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा इस संघर्ष को व्यापक सामाजिक बदलाव की लड़ाई का एक ज़रूरी हिससा बनाना होगा।


साथियो,
इक्कीसवीं सदी का एक और साल अतीत का हिस्सा बन चुका है। देश की ऊपरी 10-12 प्रतिशत सम्पन्न आबादी नये साल के जश्न पर अरबों रुपये उड़ा रही है। मगर देश के आम मेहनतकश लोगों के लिए तो आने वाला नया साल हर बार की तरह समस्याओं और चुनौतियों के पहाड़ की तरह खड़ा है। आम मेहनतकशों और ग़रीबों के दुखों और आँसुओं के सागर में बने अमीरी के टापुओं पर रहने वालों का स्वर्ग तो इस व्यवस्था में पहले से सुरक्षित है, वे तो जश्न मनायेंगे ही। मगर “अच्छे दिनों” के इन्तज़ार में साल-दर-साल शोषण-दमन-उत्पीड़न झेलती जा रही देश की आम जनता आख़िर किस बात का जश्न मनाये?
क्या इस बात का जश्न मनाया जाये कि लम्बे-चौड़े वादों और तरह-तरह की घोषणाओं के बावजूद देश के लगभग आधे नौजवान बेकारी में धक्के खा रहे हैं या फिर औनी-पौनी कीमत पर अपनी मेहनत और हुनर को बेचने पर मजबूर हैं? क्या इस बात का जश्न मनाया जाये कि महाशक्ति बनने का दावा करने वाले इस देश की लगभग 50 फीसदी स्त्रियाँ खून की कमी और 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, भूख और कुपोषण के कारण लगभग 7000 बच्चे रोज़ाना मौत के मुँह में समा जाते हैं। बजट का 90 फीसदी अप्रत्यक्ष करों द्वारा आम जनता से वसूला जाता है लेकिन आज़ादी के 68 वर्षों बाद भी स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पानी, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी आम जनता वंचित है। क्या इस बात की ख़ुशी मनायी जाये कि धर्म और जाति के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाने का गन्दा ख़ूनी खेल गुज़रे साल में नयी नीचताओं तक पहुँच गया?
बेशक, हर नया साल इन सम्भावनाओं से भी भरा हुआ होता है कि हम इस तस्वीर को बदल डालने की राह पर आगे बढ़ें। लेकिन अगर हम बस हाथ पर हाथ धरकर ऐसे ही बैठे रहेंगे और अपनी दुर्दशा के लिए कभी इस कभी उस पार्टी को कोसते रहेंगे या उनके बहकावे में आकर एक-दूसरे को अपनी हालत के लिए दोषी मानते रहेंगे तो सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा, जैसे पिछले सात दशकों से चल रहा है।
1947 के बाद से 68 वर्ष का सफ़रनामा गोरे अंग्रेज़ों की जगह आये काले अंग्रेज़ों के शासन में नयी ग़ुलामी के मज़बूत होने का इतिहास बनकर रह गया है। देश में आज लगभग एक लाख अरबपति हैं। 2006 में दुनिया के 946 खरबपतियों में से 36 भारतीय थे। आज यह संख्या और भी बढ़ गयी है। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा अँधेरा पहलू यह है कि दस फ़ीसदी लोगों की यह समृद्धि नब्बे फीसदी लोगों को नर्क के अँधेरे में धकेलकर हासिल की गयी है। 10 प्रतिशत अमीर लोगों का देश की 76.3 प्रतिशत सम्पत्ति पर कब्ज़ा है। उनकी कमाई लगातार बढ़ती जा रही है जिसे उद्योग, शेयर मार्केट, मनोरंजन उद्योग आदि क्षेत्रों में लगाकर मुट्ठीभर लोग बेहिसाब मुनाफ़ा बटोर रहे हैं। एक ओर मुकेश अम्बानी है जिसके 6 लोगों के परिवार के लिए 2700 करोड़ की लागत से बना मकान है और दूसरी ओर पूरे देश में 18 करोड़ लोग झुग्गियों में रहते हैं और 18 करोड़ लोग फुटपाथों पर सोते हैं। देश की ऊपर की तीन फ़ीसदी और नीचे की 40 प्रतिशत आबादी की आमदनी के बीच का अन्तर आज 60 गुना हो चुका है। सन सैंतालीस के बाद देश के शासकों ने पूँजीवादी विकास का जो रास्ता चुना उसने एक ऐसा समाज बनाया है जो सिर से पाँव तक सड़ रहा है। चारों ओर लूट-खसोट, अन्धी प्रतिस्पर्द्धा, अपराध, शोषण-दमन-उत्पीड़न, अमानवीयता और भयंकर ग़ैर-बराबरी छाई हुई है।
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के गहराते संकट ने हालत बद से बदतर बना दी है। बाज़ार में अपने-अपने सामानों को बेचने की गलाकाटू प्रतियोगिता के चलते हर उद्योगपति अपने सामान की लागत कम करना चाहता है। और लागत कम करने का मतलब है कामगारों को कम से कम कीमत पर ज़्यादा से ज़्यादा निचोड़ना! पिछले 25 वर्षों के दौरान उदारीकरण-निजीकरण की नीतियाँ लागू होने के साथ ही मज़दूरों-कर्मचारियों की भारी आबादी को नियमित रोज़गार से बाहर धकेलकर ठेका और दिहाड़ी मज़दूर बना दिया गया है जिनके पास रोज़गार सुरक्षा, न्यूनतम मज़दूरी, पेंशन-पीएफ जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। निजी कम्पनियों और कारख़ानों में ही नहीं, सरकारी विभागों और सार्वजनिक उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर छँटनी की गयी है। नियमित रोज़गार समाप्त किये जा रहे हैं और ज़्यादा से ज़्यादा कामों को ठेके पर दिया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी के 10 करोड़ रोज़गार देने और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे जुमलों के बावजूद सच्चाई यही है कि चपरासी के 368 पदों के लिए 23 लाख से भी ज़्यादा नौजवान आवेदन करते हैं जिनमें पीएच.डी. और एमबीए के डिग्रीधारक भी शामिल हैं। एम.ए. और बी.एससी. किये हुए नौजवान लेबर चौक पर अपने आप को बेचते हुए मिल जायेंगे! यही है उस “रोज़गारविहीन विकास” की सच्चाई जिसका राग विश्व बैंक और आई.एम.एफ. की शह पर पिछले कई वर्ष से अलापा जा रहा है।
दुनिया की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्ष से घनघोर मन्दी की चपेट में है। मगर इस मन्दी का बोझ कौन उठा रहा है? क्या देश के पूँजीपतियों, अफसरशाहों, नेताओं या उच्च मध्यवर्ग की ऐयाशियों में कोई कमी आयी है? नहीं! बल्कि उनकी दौलत का अश्लील प्रदर्शन पहले से कई गुना बढ़ गया है। वास्तव में इस मन्दी का सारा बोझ भी आम मेहनतकश जनता ही उठा रही है। बेहिसाब महँगाई, छँटनी, बेरोज़गारी, वास्तविक वेतन और मज़दूरी में गिरावट और मूलभूत सुविधाओं में एक-एक करके होने वाली कटौती ने आम लोगों का जीना भी मुहाल कर दिया है। दूसरी ओर, हमारी पीठ पर टैक्सों का पहाड़ लादकर पूँजीपतियों को हज़ारों करोड़ रुपये के पैकेज दिये गये ताकि उनकी कम्पनियों का मुनाफ़ा कम न हो जाये।
इस पूँजीवादी लोकतंत्र की सच्चाई यही है कि सारी सरकारें वास्तव में इन्ही देशी-विदेशी लुटेरों की मैनेजिंग कमेटी के रूप में काम करती हैं। चाहे जिस पार्टी की सरकार सत्ता में आ जाये, धन्नासेठों के हितों में कोई आँच नहीं आती। सभी चुनावी पार्टियों के चुनाव का ख़र्च बड़े-बड़े धनकुबेर उठाते हैं। देश के सांसदों पर पाँच साल में लगभग 16 अरब 38 करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं, संसद की एक मिनट की कार्यवाही में ढाई लाख रुपये का खर्च आम जनता अपना पेट काटकर चुकाती है और वहाँ होता क्या है? सांसदों के सोने, ऊँघने, गाली-गलौच और “तू चोर-तू चोर, तू नंगा-तू नंगा” के शोर-शराबे के अलावा जनता को लूटने-खसोटने और देशी-विदेशी धन्नासेठों की तिजोरियाँ भरने की नयी-नयी तिकड़मों को क़ानून का नाम दिया जाता है।
चुनाव के समय “आम” लोगों के लिए “अच्छे दिन” लाने के नाम पर चुनावी पार्टियों के बीच जो कुत्ताघसीटी होती है, वह वास्तव में जनता के बीच भ्रम पैदा करने के लिए किया जाता है। जनता इस भ्रम का शिकार होकर रावण के दस मुखौटों में से किसी एक मुखौटे के हाथ में अपना भविष्य सौंप देती है। एक मुखौटे से भ्रम टूटने पर दूसरा मुखौटा, दूसरे मुखौटे से भ्रम टूटने पर तीसरा मुखौटा… तब तक पुराना मुखौटा अपना चेहरा थोड़ा बदलकर, जनता के हित का अधिक शोर मचाता हुआ फिर जनता के सामने आ जाता है…! साँपनाथ और नागनाथ का यह खेल आज़ादी के बाद से ऐसे ही बदस्तूर चल रहा है। कांग्रेसी मुखौटे से त्रस्त जनता ने मायावी रावण के जिस मुखौटे पर इस बार दाँव लगाया, उसने ख़ुद को चाय बेचने वाला बताते हुए कहा कि ग़रीब प्रधानमंत्री बनेगा तो ग़रीबों के लिए काम करेगा, अच्छे दिन आयेंगे! लेकिन सत्ता में आने के बाद उसने अमीरों की तिजोरी भरने में पुरानी सभी सरकारों को पीछे छोड़ दिया। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं थी क्योंकि इस “ग़रीब” को 100 कारपोरेट घरानों में से 74 ने अपनी पहली पसन्द बताया था और चुनाव प्रचार के लिये अपनी तिजोरियों का मुँह खोल दिया था।
महँगाई डायन को मार भगाने का वादा करने वाले मोदी के सत्ता में आने पर रसोई गैस, रेल भाड़ा आदि की कीमतों में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई। इस “ग़रीब” ने ग़रीबों की थाली से दाल, सब्ज़ी तक छीन लिया। केंद्र व राज्य स्तर पर मोदी सरकार के मंत्रियों ने भ्रष्टाचार व गुंडागर्दी के पुराने रिकार्ड तोड़ने शुरू कर दिये हैं। मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला तो इसकी एक बानगी भर है। युवा-शक्ति की दुहाई देने वाली भाजपा सरकार इस समय युवा-शक्ति को सड़कों पर पीट रही है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के समझौते के तहत शिक्षा को देशी-विदेशी लुटेरों की लूट का चरागाह बनाने के ख़ि‍लाफ़ दिल्ली सहित देशभर में सड़कों पर उतरे छात्र-छात्राओं को बुरी तरह पीटा गया है। स्वदेशी व राष्ट्रवाद का नगाड़ा बजाने वाले मोदी ने बीमा, रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की छूट दी है, जबकि यही भाजपा कांग्रेस शासन में एफ.डी.आई. का विरोध कर रही थी। देश के सबसे बड़े धन्नासेठों अम्बानी, अडानी, बिड़ला, टाटा आदि को मोदी सरकार ने करों में भारी छूट दी है। उनके हित में श्रम क़ानूनों में बदलाव किये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों-कर्मचारियों को लूटना और भी आसान हो जाये। पिछले बजट में कारपोरेट करों की दर 30 से घटाकर 25 प्रतिशत कर दी गयी जिससे आम जनता पर 23383 करोड़ रुपये का बोझ अप्रत्यक्ष करों के रूप में पड़ेगा। आने वाले बजट में जनता पर और भी कड़ी मार पड़ने वाली है। काले धन के मामले में मोदी, रामदेव सब चुप्पी आसन लगाकर बैठे हैं। ‘अच्छे दिन’ बस एक चुनावी जुमला था यह सच्चाई तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही उगल चुके हैं। अब ये जुमलेबाज़ अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज़ को कुचल डालना चाहते हैं। भाजपा की नीतियों का विरोध करने वालों पर आई.एस.आई. का एजेंट, नक्सलवादी, देशद्रोही आदि का ठप्पा लगा देना आम बात है।
लेकिन इनको भी पता है कि जनता को केवल कानून और डण्डे के दम पर नहीं दबाया जा सकता। इसलिए ये अब अंग्रेजों की देन और पिछले 68 साल के आज़माये नुस्खे ‘फूट डालो राज करो’ पर अमल में पूरी तरह जुट गये हैं। संघ परिवार और उसके तमाम आनुषंगिक संगठनों द्वारा ‘लव जिहाद’, ‘धर्मान्तरण’, ‘बीफ प्रकरण’ जैसी बातों को लेकर साम्प्रदायिक माहौल बनाया जा रहा है। बिहार चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण की सारी कोशिशों के बावजूद बुरी तरह पिटने के बाद भी ये अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इनके पास लोगों को उल्लू बनाने के लिए दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है। डेढ़ वर्ष बाद होने वाले उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव की तैयारी में अयोध्या में मन्दिर निर्माण के नाम पर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने की कोशिशें अभी से शुरू कर दी गयी हैं। समाजवादी पार्टी का ‘धर्मनिरपेक्षता’ का पाखण्ड तो मुज़फ्फ़रनगर में दंगों के समय ही सामने आ चुका था, अब भाजपा के साथ उसकी साँठगाँठ की पोल पूरी तरह खुल चुकी है।
अन्धविश्वास, रूढ़ियों के ख़िलाफ़ लड़ने वाले प्रो. कलबुर्गी, गोविन्द पानसरे, नरेन्द्र दाभोलकर की कट्टरपन्थी हिन्दू संगठनों द्वारा हत्या के दोषियों पर आजतक कोई कार्रवाई नहीं की गयी है। बच्चों और युवाओं के दिमाग में नफ़रत के बीज बोने के लिए शिक्षा-संस्कृति का भगवाकरण किया जा रहा है। धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति अपने दूसरे छोर पर भी कट्टरपंथ को ही बढ़ावा देती है। जब एक ओर योगी आदित्यनाथ और प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग होंगे तो दूसरी ओर ओवैसी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी नेता भी सांप्रदायिक उन्माद के चेहरे के रूप में मौजूद होंगे। ये दोनों एक दूसरे की राजनीति के लिये तो फायदेमन्द होते हैं पर इनके उकसावे में आने वाली आम जनता ही जानमाल का नुकसान उठाती है। ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचें कि 1. फूट डालो और राज करो की नीति की ज़रूरत आज किसको है और क्यों? 2. जब चुनाव करीब होते हैं, तभी क्यों लव-जिहाद, बीफ़, मंदिर-मस्जिद, आदि के नाम पर साम्प्रदायिक दंगे भड़काये जाते हैं? 3. क्या यह सच नहीं है कि इन दंगों में अपने-अपने महलों में बैठे धर्मों के ठेकेदारों पर कोई आँच नहीं आती है, ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा में घूमने वाले नेताओं को कोई चोट नहीं पहुँचती है, हमेशा केवल आम ग़रीब लोग ही मरते हैं, उन्हीं के घर जलते हैं?
साम्प्रदायिकता के ज़हर को दिमाग से हटाकर सोचा जाय तो इन सवालों का जवाब बहुत आसान है। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में क्रान्तिकारियों ने इस चीज़ को शुरू में ही समझ लिया था। 1925 में आर.एस.एस. के स्थापना से पहले ही हिन्दू महासभा आदि के नेतृत्व में साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत हो चुकी थी। आर.एस.एस. की स्थापना के बाद यह बहुत तेज़ी से आगे बढ़ी। इन्होंने कभी आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया और जब सारा देश एक होकर ब्रिटिश हुकूमत से लड़ रहा था तो ये हिन्दू-मुसलमानों को आपस में लड़ाने में लगे हुए थे। फाँसी पर लटकाये जाने से सिर्फ तीन दिन पहले लिखे ख़त में काकोरी काण्ड के शहीद अशफ़ाकउल्ला ने देशवासियों को आगाह किया था कि इस तरह के बँटवारे आज़ादी की लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने लिखा थाः “सात करोड़ मुसलमानों को ‘शुद्ध’ करना नामुमकिन है, और इसी तरह यह सोचना भी फ़ि‍ज़ूल है कि पच्चीस करोड़ हिन्दुओं से इस्लाम कबूल करवाया जा सकता है। मगर हाँ, यह आसान है कि हम सब ग़ुलामी की ज़ंजीरें अपनी गर्दन में डाले रहें।” इसी तरह रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी शहादत से पहले जनता के नाम यह वसीयत की थी कि “यदि देशवासियों को हमारे मरने का ज़रा भी अफसोस है तो वे जैसे भी हो हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम करें। यही हमारी आखिरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है।”
शहीदेआज़म भगतसिंह ने कहा था कि लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए उनमें वर्ग-चेतना विकसित करने की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों व किसानों को यह बात समझानी होगी कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिए।
आज़ादी और बराबरी के इन मतवालों को आज याद करने का मतलब यही हो सकता है कि हम धर्म और जाति के भेदभाव भूलकर इस देश के लुटेरों के ख़िलाफ़ एकजुट हो जायें. अशपफ़ाक-बिस्मिल-आज़ाद और भगतसिंह की विरासत को मानने का मतलब आज यही है कि हम हर क़ि‍स्म के मज़हबी कट्टरपंथ पर हल्ला बोल दें। आज हम सभी नौजवानों और आम मेहनतकशों को यह समझ लेना चाहिये कि हमें धर्म और जाति के नाम पर बाँटने और हमारी लाशों पर रोटियाँ सेंकने का काम आज हर चुनावी पार्टी कर रही है! हमें इनका जवाब अपनी फ़ौलादी एकजुटता से देना होगा। परिवर्तनकामी छात्रों-युवाओं को नये सिरे से मेहनतकशों के संघर्षों से जोड़ना होगा। उन्हें शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को याद करते हुए क्रान्ति का सन्देश कल-कारखानों और खेतों-खलिहानों तक लेकर जाना होगा। स्त्रियों की आधी आबादी की जागृति और लामबन्दी के बिना कोई भी सामाजिक परिवर्तन सम्भव नहीं। मेहनतकशों, छात्रों-युवाओं, बुद्धिजीवियों सभी मोर्चों पर स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाना सफलता की बुनियादी शर्त्त है। हमें हर तरह के जातीय-धार्मिक-लैंगिक उत्पीड़न और दमन के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा इस संघर्ष को व्यापक सामाजिक बदलाव की लड़ाई का एक ज़रूरी हिससा बनाना होगा।
हम जानते हैं कि यह रास्ता लम्बा होगा, कठिन होगा और प्रयोगों से और चढ़ावों-उतारों से भरा होगा। पर यही एकमात्र विकल्प है। यही जन-मुक्ति-मार्ग है। यही इतिहास का रास्ता है। और हर लम्बे रास्ते की शुरुआत एक छोटे से क़दम से ही होती है।

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Monday, 20 April 2015

मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण का सच--- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी


मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण का सच
किसानों की जमीन छीन कर पूंजीपतियों को सौंपने पर आमादा मोदी सरकार
14 मई को देशव्यापी विरोध
उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर रास्ता रोको
बहनों एवं भाईयों,
किसानों के निरन्तर आन्दोलनों और बलिदानों के कारण 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को 2013 में संसद में सर्वसम्मति से बदला गया था।
बदले कानून में सुनिश्चित किया गया था:
  • जमीन के मालिक किसानों से उनकी रज़ामंदी के बिना जमीन नहीं ली जा सकेगी और जमीन लेने का क्या सामाजिक प्रभाव पड़ेगा, उसका भी पहले आकलन किया जायेगा।
  • किसान को अपनी जमीन के बेहतर मुआवजे के लिए मोल-तोल का अधिकार मिले, उसकी कोई मजबूरी न हो तथा उसका मुआवजा एडवांस में दिया जाये।
  • पूरे मुआवजे के भुगतान के बाद और पुनर्वास एवं पुनः व्यवस्थापन के पूरे इंतजाम के बाद ही जमीन पर कब्जा लिया जाये।
  • किसानों और पंचायतों की रज़ामंदी के बिना जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू नहीं की जायेगी।
  • बहुफसली और सिंचित जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा।
  • अधिग्रहण की प्रक्रिया के पहले किसानों, आजीविका के लिए निर्भर अन्य लोगों एवं समुदाय पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव का आकलन किया जायेगा।
  • सभी विस्थापित परिवारों को पहले से बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित किया जायेगा।
मोदी सरकार किसानों के इन अधिकारों को छीन कर जमीन को पूंजीपतियों को देना चाहती है। उसने लोकशाही की सारी परम्पराओं को त्याग कर 3 अप्रैल 2015 को पुनः अध्यादेश जारी करके अपने किसान विरोधी इरादों का पुनः परिचय दिया है।
सरकार का यह दावा झूठ और मिथ्यापूर्ण प्रचार है कि विकास कार्य क्योंकि रूके पड़े हैं, इसलिए कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश लाना जरूरी है।
दरअसल अध्यादेश का मतलब किसानों से रज़ामंदी के बिना और बिना सामाजिक प्रभाव का आकलन किये जमीनों को किसानों से छीनना है जबकि 2013 का कानून सुनिश्चित करता है कि जिन लोगों से जमीन ली जानी है, उनके 70 प्रतिशत लोग अपनी रज़ामंदी दें और यदि जमीन किसी निजी कम्पनी के लिए ली जा रही है तो उसके लिए 80 प्रतिशत लोगों की रज़ामंदी होनी चाहिए।
सरकारी दावा इससे और भी झूठा साबित हो जाता है कि वर्ष 2013 तक सरकार बड़े पैमाने पर जमीन का अंधाधुंध अधिग्रहण करती रही है। हालत यह है कि बड़ी मात्रा में अधिगृहीत जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है। बड़ी मात्रा में भूमि को कारपोरेट भूमाफिया ने हड़प लिया है जो उसे विकास के लिए इस्तेमाल करने के बजाय बढ़े दामों पर बेचकर पैसा कमा रहे हैं।
कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट दिनांक 28 नवम्बर 2014 के अनुसार विशेष आर्थिक परियोजनाओं के लिए ली गई 45,635.63 हेक्टेयर जमीन में से केवल 28,488.49 हेक्टेयर जमीन का ही इस्तेमाल हुआ है। गुजरात में स्वीकृत 50 विशेष आर्थिक क्षेत्रों में से केवल 15 ही आपरेशनल हैं। वहां प्रधानमंत्री के चहेते अडानी को 2009 में 6,472.86 हेक्टेयर जमीन दी गई जिसमें से 87.11 प्रतिशत जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं किया गया है। कैग ने रिलायंस, एस्सार, डीएलएफ, यूनीटेक्स आदि डेवलपरों को फटकार लगाते हुए कहा है कि इन्होंने विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीनें हथिया ली हैं परन्तु केवल एक मामूली हिस्से का ही इस्तेमाल किया गया है। मुकेश अंबानी ने महाराष्ट्र के द्रोणगिरि में 1,250 हेक्टेयर जमीन ली परन्तु वहां 2006 से अब तक एक भी कारखाना स्थापित नहीं किया गया है। कैग ने स्पष्ट कहा है - ”सरकार द्वारा किसानों से जमीन का अधिग्रहण ग्रामीण आबादी से कारपोरेट जगत को दौलत का हस्तांतरण साबित हो रहा है।“
वास्तविकता, मोदी सरकार के तमाम दावों को खोखला और मिथ्या साबित करती है। वास्तव में मोदी सरकार कारपोरेट घरानों, धन्नासेठों तथा पूंजीपतियों को जमीनें देने और किसानों को बेसहारा करने के लिए ही यह झूठी और खोखली दलीलें देकर देश की जनता की आंख में धूल झोकना चाहती है।
किसान भाईयों,
18 औद्योगिक गलियारों के लिए मोदी सरकार के प्रस्तावों के द्वारा खेती योग्य भूमि का 35 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा आ जायेगा जिससे हजारों गांव लुप्त हो जायेंगे और करोड़ों लोगों को रोजी-रोटी छीनने का रास्ता साफ हो जायेगा। उसके कारण बड़े पैमाने पर सामाजिक विघटन और सामाजिक अराजकता पैदा हो जायेगी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई किसानों, खेत मजदूरों, ट्रेड यूनियनों, नागरिक समाज एवं आम जनता का आह्वान करती है कि मोदी सरकार के घृणित मंसूबों को नाकाम करने के लिए बड़े पैमाने पर 14 मई 2015 को ”रास्ता रोको“ कार्यक्रम को सफल बना कर किसान एवं देश विरोधी अध्यादेश का विरोध करें।

Wednesday, 9 October 2013

बी जे पी उपाध्यक्ष का लेख झूठ का पुलिंदा ---विजय राजबली माथुर


वैसे तो भाजपा उपाध्यक्ष ने अपने लेख में व्यक्तिगत रूप से कामरेड सीताराम येचूरी को निशाना बनाया है ,जिसका जवाब वह खुद ही  देंगे या उनकी पार्टी को देना होगा। परंतु लेख में कुछ ऐसे अनर्गल तथ्य ठूँसे गए हैं जिंनका इशारा हमारी पार्टी भाकपा की ओर है। हमारे बड़े नेता जब जो जवाब देंगे तब देंगे किन्तु यहाँ मेरा उद्देश्य उन बी जे पी उपाध्यक्ष महोदय के झूठ का पर्दाफाश करना है। 

हिन्दू : 
'सनातन हिन्दू जीवन दर्शन' का उल्लेख किया गया है। जबकि आर्यसमाज के प्रचारक महोदय कहते हैं---

विश्वप्रिय वेदानुरागी हिन्दू का एक संक्षिप्तिकरण देखिये :- “हि” “न्” “दु”
“हि” अर्थात् हित ना करे वह
“न्” अर्थात् न्याय ना करे वह
“दु” अर्थात् दुष्टता करे वह
और इसका प्रमाण निम्न श्लोक है :-

हिन्दू शब्द की एक और व्याख्या देखिये जिसमें हिन्दू शब्द का निन्दित अर्थ दिया गया है |
हितम् न्यायम् न कुर्याद्यो
दुष्टतामेव आचरेत्
स पापात्मा स दुष्टात्मा
हिन्दू इत्युच्यते बुधै:||३/२१||
आत्मानम् यो वदेत् हिन्दू
स याति अधमां गतिम् |
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तु त हिन्दुं
सद्य: स्नानमुपाचरेत् ||७/४७||
हिंकारेण परीहार्य:
नकारेण निषेधयेत् |
दुत्कारेण विलोप्तव्य:
यस्स हिन्दू सदास्मरेत् ||९/१२||
इति कात्थक्य: शिवस्मृतौ



शिव स्मृति
(जो हित और न्याय ना करे, दुष्टता का आचरण करे, वह पापी, वह दुष्टात्मा हिन्दू कहलाते हैं)
(जो व्यक्ति अपने आप को हिन्दू कहता है वह अधम गति को प्राप्त होता है और ऐसे हिन्दू को देख कर स्पर्श कर शीघ्र ही स्नान करें)
(हिं हिं करके जिसका परिहार करना चाहिए, न न करके जिसका निषेध करना चाहिए, दूत् दूत् करके जिसे दूर भगाना (नष्ट कर देना) चाहिए वही हिन्दू है इसे सदा याद रखें)

इस लिंक पर भी 'हिन्दू' शब्द विदेशी होने के प्रमाण हैं-http://madhyabharat.net/archives.asp?NewsID=179
 
 लेख में RSS की स्थापना के लिए केरल के दंगों को ज़िम्मेदार बताया गया है जबकि हकीकत यह है कि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट 'बहादुर शाह जफर' के नेतृत्व में लड़े जाने जिसको शिवाजी के वंशज मराठों का सम्पूर्ण समर्थन था  के बाद ब्रिटिश शासकों ने  देश में फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत ढाका के  नवाब मुश्ताक हुसैन को फुसला कर 1906 में 'मुस्लिम लीग' और लाला लाजपत राय,मदन मोहन मालवीय जैसे वयोवृद्ध कांग्रेसियों को फुसला कर 'हिंदूमहासभा' का गठन कराया था। मुस्लिम लीग तो सफल रही हिंदूमहासभा विफल। अतः डॉ हेडगेवार जैसे कांग्रेसी तथा विनायक दामोदर सावरकर जैसे पूर्व क्रांतिकारी को आगे करके 1925 में RSS की स्थापना कराई गई जिसका मूल उद्देश्य ही 1925 में ही स्थापित 'कम्युनिस्ट'पार्टी के नेतृत्व में चलाये जाने वाले क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलना था। शहीद भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद,रामप्रसाद बिस्मिल आदि आर्यसमाजी भी रहे और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट भी। इनमे से किसी ने भी हिंदूवाद की बात नहीं की थी। 'हिंदूमहासभा' ने तो 'मुस्लिम लीग' से मिल कर सरकार भी बनाई थी और ब्रिटिश हुकूमत को पूरी पूरी मदद की थी :





 बी जे पी उपाध्यक्ष महोदय जिस हिंदूवाद की बात करते हैं उसके धर्म की दशा उपरोक्त अखबारी खबरें ही बता रही हैं। 'ढोंग-पाखंड-आडंबर-अधर्म' को ये लोग धर्म की संज्ञा देते हैं जिसके नमूने आशाराम,रामदेव,निर्मल आदि के कच्चे-चिट्ठे अब खुल चुके हैं। 

'धर्म' =सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो धारण करने योग्य है। इन सद्गुणों का विरोध किस कम्युनिस्ट पार्टी ने और कब किया इसका विवरण लेख में न देकर थोथी  बातों का आडंबर बघारा गया है।

बी जे पी आदि व्यापारियों/उद्योगपतियों की पार्टियां हैं उनका उद्देश्य उनके व्यापारिक -आर्थिक हितों की रक्षा करना है उनका सरोकार साधारण जनता से नहीं है इसीलिए पोंगा पंडितों के माध्यम से अधर्म को धर्म कह कर कम्युनिस्टों को कोसते हैं क्योंकि कम्युनिस्ट गरीब मेहनतकश किसान-मजदूर की आवाज़ को बुलंद करते हैं।


Bhavesh Bhardwaj
कम्यूनिस्ट पढ़ने की नहीं, अनुकरण करने की एक महापवित्र राजमार्ग है......
अगर ये पढ़े-लिखे नौजवान "लाचार और असहाय" हैं, तो इस देश का फिर भगवान ही मालिक है। देश के निर्णय जिम्मेदार लोगों के, तर्कशील लोगों के उपर निर्भर होना चाहिये, धार्मिक राष्ट्रवाद का सपना देखने वाले के हाथ में नहीं। कम्यूनिस्ट लोग ही नफ़रत की राजनीति को वैचारिक ढंग से परास्त कर सकते हैं, मार्क्सिस्ट विचारों में ही वो दम है जो धर्म मज़हब जाती बिरादरी और दूसरे हीन और संकीर्ण विचारों से लोगों को बाहर निकाल सकता है. कम्यूनिस्ट पढ़ने की नहीं, अनुकरण करने की एक महा पवित्र राजमार्ग है ......
वोट के सौदागरों ने वोट की ख़ातिर सामाजिक ताने-बाने को तार-तार किया है. मौजूदा राजनीति में वहीं फलफूल रहे हैं,जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों अौर पूँजीपतियों के दलाल हैं. अपराधी अौर भ्रष्ट हैं. जिनके पास अकूत पैसे का स्रोत है. जहां इनका प्रभाव नहीं हैं,वहाँ वोट जाति-क्षेत्र अौर धर्म के जलजले का शिकार है. पूरब से पश्चिम तक,उत्तर से दक्षिण तक लोकतंत्र मुट्ठीभर परिवारों में क़ैद है. इन परिवारों की दिलचस्पी लोक कल्याणकारी राज्य की व्यवस्था की जगह ख़ुद का कल्याण करने के माॅडल पर टीका हुआ है.'लोक','तंत्र' के नीचे दबा हुआ 'कम्यूनिस्ट' को पुकार रहा है. ......