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Sunday, 31 March 2019

गलत निर्णय भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों को जनता से विमुख किए हुये हैं ------ विजय राजबली माथुर


N  B  T  ,  lko.  ,  28-03-2019  ,  Page ------ 10



1975  में मेरठ में तथा 1985 में आगरा में मेरा सस्पेंशन और टर्मिनेशन करवाने में तत्कालीन यूनियन प्रेसीडेंट्स का प्रबल हाथ था। अतः मैंने तब किसी बड़े संस्थान की अपेक्षा छोटी-छोटी दुकानों में स्वतंत्र रूप से अकौन्ट्स जाब करके गुज़ारा करना शुरू किया। साथ ही ITC जैसी मल्टीनेशनल कंपनी से अन्यायपूर्ण बर्खास्त्गी  के विरुद्ध संघर्ष करने हेतु  स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी संत कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क किया जिन्होने 'मजदूर भवन',  आगरा  पर कामरेड हरीश आहूजा साहब  के पास भेज दिया । आहूजा साहब ने केस लगा दिया और सप्ताह में एक दिन मजदूर भवन बुलाने लगे जहां CPI नेतागण कामरेड्स रमेश मिश्रा, डॉ महेश चंद्र शर्मा और डॉ जवाहर सिंह धाकरे क्रमिक रूप से आकर  मजदूर समस्याओं और उनके समाधान पर प्रकाश डालते थे। अक्तूबर 1986 में मुझे भी CPI में शामिल कर लिया गया और 'मजदूर भवन ' के स्थान पर मुझे पार्टी कार्यालय में सहयोग करने हेतु बुलाया गया। एक वर्ष के भीतर ही मुझे पार्टी की ज़िला काउंसिल में भी शामिल कर लिया गया।

पार्टी की विशेष बैठकों में कामरेड्स लल्लू सिंह चौहान, जगदीश नारायण त्रिपाठी, रामनारायन उपाध्याय आदि आते रहते थे और इस प्रकार इन स्वाधीनता सेनानियों के विचार भी जानने - समझने के अवसर मिलते रहे। लखनऊ मेरा जन्मस्थान होने के कारण लखनऊ में होने वाले प्रदर्शनों में भाग लेने खुशी-खुशी आता रहता था जबकि नजदीक  ही स्थित  दिल्ली के सिर्फ एक ही प्रदर्शन में भाग ले सका। बाबूजी के सहपाठी और रूममेट कामरेड भीखा  लाल जी से मिलने की काफी इच्छा थी और मैंने इसका ज़िक्र कामरेड डॉ महेश चंद्र शर्मा जी से किया था।बेगम हज़रत महल पार्क में पूरे प्रदेश से आए पार्टी कामरेड्स 'सांप्रदायिकता विरोधी रैली ' में भाग लेने को  एकत्र थे।  भीखा लाल जी पूर्व प्रदेश सचिव थे और उस समय  तत्कालीन प्रदेश सचिव कामरेड सरजू पांडे जी से कुछ चर्चा कर रहे थे जब डॉ शर्मा जी मुझे उनके पास ले गए थे ; हमारे आगरा के तत्कालीन जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी भी पांडे जी के ही साथ थे। कामरेड भीखा लाल जी ने बाबू जी के नाम का सिर्फ 'ताजराज ' शब्द सुनते ही मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा कि, तुम ताजराज बली के बेटे हो तुम उनके बारे में क्या बताओगे हम तुम्हें उनके बारे में बताएँगे। फिर उन्होने वर्ष सन- तारीख बताते हुये किस-किस क्लास में और हास्टल में साथ-साथ रहे  कहा कि वह और मेरे बाबूजी इतना घनिष्ठ रहे हैं जितने कि मेरे बाबूजी अपने घर-परिवार में अपने भाइयों से भी न रहे होंगे। भीखा लाल जी ने यह भी बताया कि 1939 में मेरे बाबूजी के दिवतीय विश्व युद्ध में जाने और 1945 में वापिस लौट कर आने की उनको सूचना है पर फिर संपर्क नहीं हो पाया था,  वह इस बात से बेहद खुश हुये थे कि मैं उनसे मिलने गया। भीखा लाल जी ने मुझसे कहा था कि अगली बार जब भी मैं लखनऊ आऊँ तो बाबूजी को भी साथ लाऊं परंतु कुछ समय बाद ही  भीखा लाल जी का निधन हो गया था।   

कामरेड सरजू पांडे जी एक बार शिवाजी मार्केट, आगरा की बैठक में जब मुख्य वक्ता के रूप में बोलने आए थे तो दोबारा उनको सुनने व देखने का अवसर मिला था। सरजू पांडे जी, भीखा लाल जी और रुस्तम सैटिन साहब आदि कम्युनिस्ट नेतागण बेहद ईमानदार, कर्मठ और स्पष्टवादी थे 'जनहित ' उनके लिए सर्वोपरि थे। 1967 में जब रुस्तम सैटिन साहब चौधरी  चरण सिंह सरकार में गृह राज्यमंत्री थे तब उन्होने ऐसी व्यवस्था की थी कि कोई भी पुलिस वाला किसी भी गरीब - असहाय तबके के इंसान को नाहक परेशान न कर पाये। लखनऊ में कुछ वरिष्ठ कामरेड्स से यह भी ज्ञात हुआ है कि एक बार पुलिसिया रौब में एक रिक्शे वाले को प्रताड़ित किया गया तो बहैसियत मंत्री  रुस्तम सैटिन साहब ने इंचार्ज समेत लखनऊ के उस  पूरे थाने  को सजा दी थी जिसके बाद पूरे प्रदेश में इसका असर हुआ था। 



लेकिन आज कम्युनिस्ट पार्टी में भी ऐसे नेताओं का सर्वथा आभाव है। कामरेड हरीश आहूजा के पार्टी छोडने के बाद रमेश मिश्रा जी ने दूसरे पार्टी कामरेड को मेरे होटल मुगल वाले केस को रेफर कर दिया था जिन्होने 1994 -95 में मेरे परिवार में एक वर्ष के भीतर तीन मौतें हो जाने के बाद मेरी परेशानी के माहौल में  होटल मेनेजमेंट के झुकाव में मेरे केस की पैरवी पर ध्यान नहीं दिया और पीठासीन अधिकारी ने 'Petitioner is no more interested' लिख कर मेनेजमेंट के पक्ष  में मेरी पिटीशन को रद्द कर दिया। वह कामरेड बाद में आगरा CPI के जिलामंत्री भी बने। एक प्राइमरी शिक्षक रमेश कटारा ने उत्तर प्रदेश CPI के कंट्रोल कमीशन में भी स्थान प्राप्त कर लिया था और रमेश मिश्रा जी को तांत्रिक प्रक्रियाओं से वशीभूत कर लिया था। विषम परिस्थितियों में मुझे भी मित्रसेन यादव जी के साथ 1994 में  पार्टी को छोडना पड़ गया  था।परंतु बाद में मिश्रा जी ने रमेश कटारा को पार्टी से निकलवा दिया और उसके बाद 2006 में मेरे घर आकर मुझको पुनः पार्टी में शामिल होने को कहा। उनके आग्रह पर उनके साथ मैं कार्यक्रमों  में भाग लेने लगा था। कमिश्नरी पर सांसद राज बब्बर जी के साथ डॉ गिरीश (अब राज्यसचिव) भी आए थे।   डॉ साहब की उपस्थिति में मिश्रा जी ने मुझसे पार्टी फार्म भरवा कर विधिवत शामिल कर लिया। आगरा से 2009 में लखनऊ शिफ्ट हो जाने के कारण मैं यहाँ सक्रिय हूँ। प्रदेश में एक बैंक कर्मी साहब आगरा के रमेश कटारा के अवतार हैं और तांत्रिक प्रक्रियाओं से कुछ बड़े नेताओं को प्रभावित किए हुये हैं तथा छोटे कार्यकर्ताओं को उत्पीड़ित करते रहते हैं।उनके हमदर्द वकील कामरेड्स अपने ही कैडर का उत्पीड़न / शोषण करने के अवसर तलाशते रहते हैं।   


वर्तमान चुनावों के माध्यम से साम्राज्यवादी / फासिस्ट शक्तियाँ सत्ता पर कब्जा करने की फिराक में हैं और कम्युनिस्ट शक्तियाँ बिखरी हुई हैं। 'संसदीय लोकतन्त्र ' को अपनाने के बावजूद कम्युनिस्ट शक्तियों ने पर्याप्त संख्या में प्रत्याशी ही नहीं खड़े किए हैं। जो संसदीय लोकतन्त्र के विरोधी कम्युनिस्ट हैं वे चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं। ऐसे में साम्राज्यवादी / फासिस्ट शक्तियों को खुला मैदान मिल गया प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त सभी कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व ब्राह्मण वादियों के नियंत्रण में रहने से दलित / पिछड़ा जो वास्तविक ' सर्वहारा' हैं को डिफ़ेक्टो नियंता के  विचारानुसार पार्टियों में उचित स्थान नहीं दिया जाता है।  किन्तु जनप्रिय दलित नेत्री मायावती को निष्प्रभावी करने हेतु भाजपा को लाभ पहुंचाने की पहल कर दी जाती है :   





इसी प्रकार बंगाल में पंचायत चुनावों के माध्यम CPM व भाजपा का तालमेल TMC के विरुद्ध हुआ था जबकि आरोप TMC पर लगा दिया गया है। 
  

Monday, 28 August 2017

तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर

तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं । 
जन भाषा और जन बोली से दूर रहने वाले अति कट्टर साम्यवादी / वामपंथी पटना रैली में CPI के भाग लेने पर आलोचना कर रहे हैं तो कुछ एथीस्ट नेता मनु स्मृति से उदाहरण लेकर बचाव कर रहे हैं। CPM के नेता मनु स्मृति का सहारा लेने की आलोचना कर रहे हैं। 
वास्तविकता तो यह है कि, सभी साम्यवादी / वामपंथी दलों पर ब्राह्मणवादी लोगों का नियंत्रण है और वे अपने कदमों से जाने या अनजाने मोदी के  फासिस्ट कदमों को मजबूती देते जा रहे हैं। 
जब 1952 में संसद ( लोकसभा ) के मुख्य विपक्षी दल की हैसियत में आ गए थे। केरल में चुनाव के जरिये सत्ता हासिल हो चुकी थी तब 'यह आज़ादी झूठी है ' का नारा गढ़ कर पार्टी को विभाजित होते देखा। फिर तो केले के तने की परतों की तरह सैंकड़ा से ऊपर साम्यवादी दल बनते चले गए। ऐसी स्थिति में जनता को जो भी सत्ता - विरोधी विकल्प मिलता रहा उसी के साथ होती चली गई। 
1980 में सत्ता में पुनर्वापिसी के लिए इन्दिरा गांधी ने RSS से जो गुप्त सम्झौता किया और शासन को मजदूर विरोधी दिशा देनी शुरू की उसे राजीव गांधी ने उनकी हत्या के बाद RSS की मदद से ही सत्ता हासिल( तब फिर से RSS ने भाजपा के बजाए इन्दिरा कांग्रेस को समर्थन दिया था और ए बी बाजपेयी को भी हरा दिया था ) करने के कारण कार्पोरेटी स्टाईल में ढालना शुरू किया। 
1991 में वित्तमंत्री बनने के साथ मनमोहन सिंह ने जिस उदारीकरण को अपनाया था उसे एल के आडवाणी साहब न्यूयार्क जाकर अपनी नीतियों को चुराया जाना घोषित कर आए थे। जब उनको तीसरी बार पी एम बनने के आसार नहीं दिखे तब रामदेव,हज़ारे आदि - आदि द्वारा कार्पोरेटी भ्रष्टाचार संरक्षण का आंदोलन खड़ा करवा कर अप्रत्यक्ष रूप से मोदी व भाजपा को इतना मजबूत कर दिया कि, 2014 में उनकी सत्ता आसानी से स्थापित हो गई। 
तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं । 
अतः जो साम्यवादी / वामपंथी लालू यादव और ममता बनर्जी से एलर्जी रख कर दूरी बनाना चाहते हैं वे अंततः मोदी की फासिस्ट सत्ता को ही मजबूत बनाने का बहाना ढूंढ रहे हैं। 
CPI ने भी उन D Raja साहब को भेजा जो मूल भाषण अङ्ग्रेज़ी में देते हैं हिन्दी के जानकार और क्षेत्र से वाकिफ अतुल अंजान साहब को नहीं जिससे पता चलता है  कि, सांकेतिक उपस्थिती ही दर्ज करवाई जनता को ठोस संदेश समर्थन का नहीं दिया गया है। 
1951 में 'नया जमाना ', सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' ने RSS प्रचारक लिमये साहब से कहा था कि, वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली की सड़कों पर RSS और कम्युनिस्टों के बीच निर्णायक रक्त - रंजित संघर्ष होगा। 
तब से RSS निरंतर मजबूत हुआ है जबकि  ब्राह्मण वादियों ने कम्युनिस्टों को विभाजित व कमजोर किया है। आज जिस तरह कम्युनिस्ट  खुद जनता से दूर हुये हैं और जन- नेताओं से दूरी बनाए रखने की चर्चा है उसका लाभ उठा कर यदि फासिस्ट सत्ता और मजबूत हुई तब युवा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता निश्चय ही RSS से सशस्त्र मुक़ाबला करेगा और तब वह इन ब्राह्मण वादी कम्युनिस्ट नेताओं को भी धकेल कर आगे बढ़ जाएगा। 
यदि आज कम्युनिस्ट नेतृत्व जन तंत्र समर्थकों के साथ किसी एलर्जी के कारण नहीं खड़ा हुआ और फासिस्ट पुनः सत्तारूढ़ हुये  तो भविष्य में होने वाले रक्त - रंजित संघर्ष की ज़िम्मेदारी उन पर भी होगी।




Friday, 14 April 2017

Dr. Ambedkar on Communist Party of India ------ S.r. Darapuri


S.r. Darapuri
2016 May 29 at 6:57pm
Dr. Ambedkar on Communist Party of India
“The Communist Party was originally in the hands of some Brahman boys- Dange and others. They have been trying to win over the Maratha community and Scheduled Castes. But they have made no headway in Maharashtra. Why? Because they are mostly a bunch of Brahman boys. The Russians made a great mistake to entrust the Communist movement in India to them. Either the Russians did not want Communism in India- they wanted only drummer boys- or they did not understand.”
– Dr. BR Ambedkar’s interview on 21/2, 28/2 and 9/10/53 at Alipore Road, Delhi by Selig Harrison in “Most Dangerous Decades” published by Oxford Press.



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आज भी तो वही स्थिति है, सभी कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथों में है। सबसे पुरानी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में पहुँच चुके मोदीईस्ट कामरेड तो उत्तर प्रदेश में ओ बी सी और दलित वर्ग के कामरेड्स से सिर्फ काम लेने व उनको कोई पद न देने की मुहिम चलाये रखते हैं । इसी ध्येय की पूर्ती हेतु प्रदेश में दो बार पार्टी तोड़ चुके हैं। सात में से चार सदस्य नेशनल काउंसिल में प्रदेश से ब्राह्मण हैं जिनमें से तीन एक ही परिवार के हैं। 
ऐसा ही लगता है कि, सत्ता प्राप्ति से दूर रह कर कुछ बाजरवादी/कार्पोरेटी ब्राह्मण कामरेड्स अपने परिवार की समृद्धि को ही क्रांति की सफलता माने हुये हैं। डॉ अंबेडकर ने तब सही ही तो कहा था। 


(विजय राजबली माथुर )

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Friday, 19 August 2016

गाँधी का मूल्याङ्कन करने में कम्युनिस्ट साथियों से भूल ------ मधुवनदत्त चतुर्वेदी

गाँधी का मूल्याङ्कन करने में कम्युनिस्ट साथियों से भूल हुई है । संघ से कदम ताल मिला कर गाँधी जी की निंदा करना उनके लिए नुकसान देह ही रहा है । गाँधी जी ने वोल्शेविज्म के आदर्श को नमन किया था , पर वे कम्युनिस्ट तो नहीं ही थे न । कम्युनिस्ट यदि दुनिया भर के मुक्ति संग्रामो और जनवादी क्रांतियो का मूल्याङ्कन करते वक्त उनके नेताओं को इसी कसौटी पर कसने लगें कि उनका कुल आचार-विचार रणनीति और लक्ष्य समाजवादी/कम्युनिस्ट क्रांति के अनुरूप था या नहीं तो फिर सबकी निंदा ही करते रहेंगे ।




Madhuvandutt Chaturvedi

गाँधी का मूल्याङ्कन करने में कम्युनिस्ट साथियों से भूल हुई है । संघ से कदम ताल मिला कर गाँधी जी की निंदा करना उनके लिए नुकसान देह ही रहा है । गाँधी जी ने वोल्शेविज्म के आदर्श को नमन किया था , पर वे कम्युनिस्ट तो नहीं ही थे न । कम्युनिस्ट यदि दुनिया भर के मुक्ति संग्रामो और जनवादी क्रांतियो का मूल्याङ्कन करते वक्त उनके नेताओं को इसी कसौटी पर कसने लगें कि उनका कुल आचार-विचार रणनीति और लक्ष्य समाजवादी/कम्युनिस्ट क्रांति के अनुरूप था या नहीं तो फिर सबकी निंदा ही करते रहेंगे । गाँधी से उन्होंने यही अपेक्षा की थी , जो गलत थी ।भारत के स्वतंत्रता संग्राम में समाज सुधार के कार्यक्रम और समान रूप से सामंतवाद विरोधी जनतान्त्रिक क्रांति को हम समुचित सम्मान नहीं दे सके हैं । ऐसा लगता है जैसे हम गाँधी पर इसलिए झुंझलाते हों कि गाँधी ने समाजवादी क्रांति क्यों नहीं की ।भाई , ये हमारा लक्ष्य है ,उनका नहीं न ।उन्होंने साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रिय आन्दोलन का नेतृत्व किया था और धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य के लिए अपेक्षित राष्ट्रीयता का विकास किया था । इस गणराज्य को फासिज्म की चुनौतियाँ तब भी स्पष्ट थीं और गाँधी- नेहरू ने यह पहचानी हुईं थी । समाजवादी क्रांति के लक्ष्य को आगे बढ़ाते हुए यदि हम फासिज्म की चुनौती का सामना करने के लिए गाँधी- नेहरु की चिन्ताओ में साझा होते रहते तो आज फासिस्ट प्रचारक गाँधी-नेहरु के प्रति युवकों को दुष्प्रचार से भ्रमित करने में सफल न होते ।


1942 August struggle and the communist party of india

by Dilip Bose
Forward By
C Rajeswara Rao

This is not the first time that the Quit India moment has been forked out to slander and attack the communist moment in our country. Whenever the ruling circles and reactionary vested interested are in the tight corner or the communist moment making headway, they would dig up old fables to whip up anti-communist prejudices.The pet theme is the so called ‘betrayal’ of the freedom struggle in 1942 by communist party of india. Such things happened a number of times in the past, even as late as in 1975,during the days of emergency imposed by Mrs Indira Gandhi.
Now extreme reaction is worried because of the forging of left unity through the united struggles of the toiling people and also its gathering round of democratic allies. Hence this resurrection of the ghost of 1942 once again by Arun shourie in order to isolate the communist moment by fanning anti – communism
Communists are second to none in their love for the motherland. Sometimes our path and tactics are differed from thoseof the leadership of the Congress. But that is another matter. We are also second to none in making sacrifices in the cause of the countries freedom and its advance. Because of this the communist moment in our country could attract ardent patriots and revolutionaries form all streams of the freedom moment, including the congress, some of whose names are mentioned in the booklet.
We are proud that we brought the organized movements of the workers, peasants, agricultural labourers, students , youth and women in to the freedom struggle
We are also proud that in the final phase of the freedom struggle, communist party of india led such revolutionary movements as the famous Telengana armed struggle, punnapra vayalar Armed struggle,in Kerala and Bombay textile workers in support of RIN mutiny, Nilgiri- Dhenkanal struggles in the former princely states of Orissa and the Banga Tegbhaga struggle in which over 5000 communists laid down their lives. In this way the CPI played its roll in the foiling the game of British imperialists and their stooges, the native princes, to balkanise our country by spilling the blood of heroic martyrs.

https://communistindian.wordpress.com/2016/03/15/1942-august-struggle-and-the-communist-party-of-india/ 

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निस्संदेह  कम्युनिस्टों का योगदान देश को आज़ादी दिलाने में अविस्मरणीय है। किन्तु बावजूद लेनिन व स्टालिन की उपयुक्त सलाह के भारतीय संदर्भों को न अपनाना तब भी और अब भी कम्युनिस्टों के विपरीत जा  रहा है जिसका पूरा-पूरा लाभ फासिस्ट साम्राज्यवादियो को मिलता रहा है। ब्राह्मण वादी कामरेड्स के कम्युनिस्ट पार्टियों  में नियंता होने का भी सम्पूर्ण लाभ फासिस्ट-साम्राज्यवादी ही उठा रहे हैं। 
(विजय राजबली माथुर )
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Wednesday, 27 May 2015

सांप्रदायिकता /साम्राज्यवाद को परास्त करना है तो कम्यूनिज़्म का भारतीय वांगमय अपनाना होगा --- विजय राजबली माथुर


जो लोग दिवा स्वप्न देखने के अभ्यस्त रहे हैं उनकी आँखें अब तो इस वक्तव्य को पढ़ कर खुल जानी चाहिए। जब तक वर्तमान सरकार को संविधान संशोधन करने लायक तीन चौथाई बहुमत हांसिल नहीं है तभी तक वह संविधान का पालन करेगी अब उस पार्टी के अध्यक्ष ने ही यह स्पष्ट कर दिया है। राज्यों में दिल्ली के केजरीवाल फार्मूले को लागू करते हुये मन-पसंद दूसरे दलों की सरकार होने से केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी किसी भी इल्ज़ाम से साफ-साफ बची रहेगी जबकि उसके मंसूबे पूरे होते ही रहेंगे। केंद्र व राज्यों में तीन चौथाई बहुमत प्राप्त होते ही वर्तमान संविधान को रद्द कर दिया जाएगा और दक्षिणपंथी असैनिक तानाशाही स्थापित कर दी जाएगी।
लेकिन लोकतन्त्र की रक्षा हेतु भी विपक्ष के दल,विद्वान,चिंतक एकजुट होने को तैयार नहीं हैं केवल थोथे अहंकार से सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी शक्तियों को परास्त नहीं किया जा सकता है यदि अब भी न सम्हले तब यह समझा जाना चाहिए कि आत्मघाती कदम उठाए जा रहे हैं।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=885845981477379&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater 
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(वस्तुतः 'साम्यवाद' को  जो कि भारतीय वाङ्ग्मय की देंन  है को विदेशी दृष्टिकोण से लागू करवाने की असफल कोशिशें ही इसकी विफलता का हेतु हैं। समय-समय पर इस ओर ध्यानाकर्षण करने का प्रयास करता रहा हूँ परंतु मेरी हैसियत ही क्या है जो उस पर गौर किया जाये?)

मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.
 http://krantiswar.blogspot.in/2011/05/blog-post_14.html

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काश सभी बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्तियाँ  दीवार पर लिखे को पढ़ें और  यथार्थ को समझें और जनता को समझाएँ तो अभी भी शोषक-उत्पीड़क-सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। लेकिन जब धर्म को मानेंगे नहीं अर्थात 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन नहीं करेंगे 'एथीस्ट वाद' की जय बोलते हुये ढोंग-पाखंड-आडंबर को प्रोत्साहित करते रहेंगे अपने उच्च सवर्णवाद के कारण तब तो कम्यूनिज़्म को पाकर भी रूस की तरह खो देंगे या चीन की तरह स्टेट-कम्यूनिज़्म में बदल डालेंगे।  
http://krantiswar.blogspot.in/2014/05/blog-post_22.html 
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Saturday, 4 April 2015

एक कम्युनिस्ट का आचरण साम्यवाद के मूल विचार के प्रचारक का होना चाहिए --- जे एस नरुका

"बड़ा सवाल !

एक कम्युनिस्ट की अपने दल विशेष प्रति वफादारी जरुरी है पर उसका आचरण मुख्य रूप से साम्यवाद के मूल विचार के प्रचारक का होना चाहिए जो समाज को बेहतर बना सकता है लोगों को एक बेहतर इंसान बना सकता है। पर आमतौर पर अधिकतर कम्युनिष्ट सैंकड़ो विभाजित दलों में से किसी एक के ही कट्टर प्रचारक होते हैं जो एक भक्त के से ही आचरण के प्रतीत होते हैं और जिस विचार से एक बेहतर इंसान निकलके आना चाहिए आश्चर्यजनक रूप से उसके विपरीत एक आत्ममुग्ध, जिद्दी, तुनकमिजाज, समाज से अलग सा दिखने वाला व्यक्तित्व ही एक कम्युनिष्ट नजर आता है..... न.रुका।"



 *हमारे उत्तर-प्रदेश के कर्णधार व उनके राष्ट्रीय आश्रयदाताओं के विचार :

 मार्क्सवाद /साम्यवाद को भारतीय संदर्भ में प्रस्तुत करना तो गलत घोषित हो गया किन्तु RSS/भाजपा, मोदी उसका विकल्प केजरीवाल एवं उसके फिल्मी प्रचारक का उल्लेख -'गुड वन' । क्या 69 प्रतिशत जनता इससे ही वामपंथ की झोली में आ जाएगी? जबकि प्रकाश करात साहब जो इस समय वामपंथ के भगवान बने हुये हैं  M=मार्क्स की जगह मुलायम तथा L= लेनिन की जगह लालू मानते हैं और ये दोनों पिछड़े के नाम पर मोदी के पीछे खड़े हैं। :
2014 के चुनावों में सपा ने भाजपा को समर्थन दिया था और बदले में उसे 2017 के चुनावों में भाजपा का उसी प्रकार अप्रत्यक्ष सहयोग मिलेगा जिस प्रकार 2015 में दिल्ली में आ आ पा को मिला है। लेकिन पार्टी के मुख-पत्रों ने केजरीवाल की जीत पर खुशी ज़ाहिर की थी, इसका क्या मतलब?

**उपरोक्त विचारों के संदर्भ में युवा कामरेड की उपरोक्त  पीड़ा भी विचारणीय है। साम्यवाद व वामपंथ के हितैषियों की सोच को जहां कर्णधार संघी सोच घोषित कर रहे हैं वहीं उनके विचार जन-मानस में क्या छवी बनाते हैं उसका आभास जोया अंसारी साहिबा की इस टिप्पणी से होता है कि " साम्यवाद को सर्वहारा को सौंपें " । 
वस्तुतः बक़ौल मनीषा पांडे जी ( इलाहाबाद के सी पी एम नेता की पुत्री तथा पत्रकार  ) कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता अपनी पत्नियों की कमाई पर नेतागिरी करते हैं और इस प्रकार महिलाओं के शोषण के लिए उत्तरदाई हैं । व्यवहार में मनीषा जी का कथन सही है। 
वरिष्ठ जागरूक पत्रकार पलाश विश्वास साहब कम्युनिस्ट कर्णधारों  की जनता से दूरी को देश के लिए घातक मानते हैं :
 http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/views/2015/03/23/
ऐसे लोग जन-जागरण वाले विचारों को 'एथीस्टवाद' के विरुद्ध बता कर अप्रत्यक्ष रूप से ढोंग-पाखंड-आडंबर को ही बढ़ावा देते हैं उसे 'ब्राहमणवाद' न कहा जाये तो क्या कहा जाये? राजद के युवा का मानना है कि 1991 से प्रारम्भ उदरवाद को रोकना संभव नहीं है।


तो क्या देश की जनता सशस्त्र क्रान्ति का साथ देगी? क्या सशस्त्र क्रान्ति के लिए समय उपयुक्त है और वह सफल हो सकेगी? 1857 का उदाहरण सामने है तभी तो गांधी जी को 'सत्य-अहिंसा' का सहारा लेना पड़ा था। आज मार्कन्डेय काटजू साहब की गांधी-विरोधी लेखनी व गोडसे के महिमा-मंडन के परिप्रेक्ष्य में नीतियाँ निर्धारित करके जनता को जागरूक करने की नितांत आवश्यकता है तभी 'संघ' के कुचक्र को नष्ट किया जा सकेगा। केवल और केवल 'आर्थिक-आंदोलन' जब तक कि 'सामाजिक-जाग्रति' न उत्पन्न हो कोई क्रान्ति नहीं कर सकता है।
----- विजय  राजबली माथुर
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Sunday, 1 February 2015

प्रगतिशील विचार मिल कर पूंजीवाद के खिलाफ ताकतवर न हो जायँ : आप जैसी राजनैतिक पार्टी को जन्म दे दिया गया है---जगदीश चंद्र




01 Feb.2015 · Delhi ·
मित्रों कांग्रेस और बी जे पी की विचारधारा में १९ -२० का अंतर है, एक १९ है तो दूसरा २० हैं और वर्तमान में नए राजनीतिक दल को अगर मानते हैं तो उसे आप के रूप में २१ मान लें, , यानी १९ - २० - २१ ये तीनों एक ही विचार धारा के तीन रूप हैं ? दोस्तों समाजवाद के भय और भूत से कांग्रेस के पीछे लगे पूंजीपतियों के संगठन जो पूंजीपति दुनिया में प्रगतिशील विचारों के विरोधी हैं उन्होंने अपने अंतर्मन से सोचा की कांग्रेस को प्रगतिशील पिछड़ों , दलितों और कम्युनिस्टों का समर्थन मिल रहा है, और साथ ही साथ, देश में कांग्रेस के सहयोग से कम्युनिस्ट विचारधारा तेजी से बढ़ रही हैं, पूंजीपतियों में संशोधनवादी और प्रगतिशील विचारधारा के लोग भी हैं, इस लिए यह पूंजीवाद के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं, इस भूत के भय से पहले तो आम जनता का संगठन बनाकर उसके माध्यम से २०११ से ही यानी २०१४ के लोक सभा के चुनाओं से पूर्व , दो तीन साल पहले से ही जनता को गुमराह करने वाले तथाकथित जन आंदोलन चलाये जाते रहे, जबकि इस प्रकार के अपराध पहले से ही जारी थे, दरशल हो यूँ रहा था कि , कांग्रेस और उसके कार्यों से विशेषकर कांग्रेस की विदेश नीति के समर्थन से देश के प्रगतिशील विचारधारा के लोग, जैसे,पिछड़े, दलितों और कम्युनिस्टों तथा समाजवादियों का समर्थन पाते जा रहे हैं, और कम्युनिस्ट तेजी से भी बढ़ भी रहे थे ? कम्युनिस्ट क्योंकि कांग्रेस की समाजवादी मुल्कों से सहयोग, और यूं ० एन ० ओ ० और उसकी सुरक्षा कौंसिल में अधिकतर मामलों में कम्युनिस्ट मुल्कों तब का सोवियत संघ वर्तमान में रूष , चीन और दुनिया के अन्य समाजवादी मुल्कों के साथ रहने की नीति के कारण सरकार को बाहरी समर्थन देते थे भारत के कम्युनिस्ट भी इस लिए समर्थन करते थे, क़ि दुनिया के गरीब और कमजोर मुल्क धीरे धीरे समाजवादी खेमे का बहुमत बना सकें, और सुरक्षा कौंसिल में एक दिन प्रभुत्व पा सकें, इन्ही विचारों के मध्यनजर प्रगतिशील पिछड़े और, दलित कम्युनिस्ट विचार धारा का समर्थन करते थे, यूं ० एन ० ओ ० की सुरक्षा कौंसिल में अनेक मुल्को पर आक्रमण के फैसलों के खिलाफ रूष और चीन ने तटस्थता की भूमिका निभाई ? तब प्रगतिशील विचारधारा के पूंजीपति ने सोचा कि कुल मिला कर भविष्य में समाजवाद से जुड़े यही प्रगतिशील विचार मिल कर पूंजीवाद के खिलाफ ताकतवर न हो जायँ और कम्युनिस्ट पूंजीवाद पर हावी न हो जाय, इस भूत के भय के कारण पहले से ही धीरे धीरे जनता के आंदोलन से ही आप जैसी राजनैतिक पार्टी को जन्म दे दिया गया है, वह भी ऐसे आंदोलन खड़ा करके क़ि जो अपराध आरम्भ से बड़ी संख्या में होते आ रहे थे, और यह आंदोलन कांग्रेस की सरकार के पहले दौर २००४-२००९ के समय में भी हो सकते थे, क्योंकि यदि यह आंदोलन तब होते तो तब बी ० जे ० पी ० को जनता का इतना समर्थन नहीं था, वह तो एक लम्बे समय में ग्राउंड बनाने की तैयारी कर रहे थे, जबकि २०१४ के चुनाव होने के पश्चात वर्तमान एन०डी०ए० सरकार में इसी प्रकार के अपराध, उससे भी तेजी और अनुपात के आंकलन से माह के हिसाब से अधिक संख्या और अधिक % में हो रहे हैं, जबकि बहुत से मामले प्रकाश में नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि प्रचार माध्यम बहुत से मामलों को इस वर्तमान सरकार को बचाने की साजिस के तहत छुपा रहा है, या घटना को दुसरे रूप में प्रचारित कर रहा है, वैसे चुनाव से पूर्व से ही कांग्रेस पर तो भयंकर आरोप लगाने की प्रक्रिया या दाग लगाने की साजिस तो लगातार चल ही रही थी , वैसे मेरी तो धारणा निश्चित रूप से यह मानती है, कि कट्टरवाद अधिक समय ज़िंदा नहीं रहता, किसी भी प्रकार का कट्टरवाद अपराध का ध्योतक है, यानी काठ की हांडी ज्यादा समय चूल्हे पर नहीं टिक सकती, यह बरसाती मेंढक के सामान है, और दुसरे बहुमत की जनता का अंतर्मन से बी जे पी पर अधिक भरोषा नहीं है, क्योंकि १९९८ - २००४ एन ० डी ० ए ० का वाजपेयी दौर एक अशफल काल रहा इसी कारण वाजपेयी के नेतृत्व में एन ० डी ० ए ० की असफलता के कारण पुनः खड़े नहीं किये गए, क्योंकि ठीक २००४ में बुरी तरह हारने के पश्चात बी ० जे ० पी ० हाशिये से मिट सकती थी, किन्तु तथाकथित पूंजीवाद तो ऐसा नहीं चाहता था, वह तो आक्रोश में वर्तमान चुनाव २०१४ में कांग्रेस के खिलाफ लोक सभा चुनाव में पूंजीपतियों द्वारा अंधा प्रचार, और असीमित धन बल के सहयोग से एन ० डी ० ये ० यानी बी जे पी को सत्ता में बैठाना था, ताकि भ्रमित करने वाले धर्म के खिलाफ, समाजवाद यानी कम्युनिज्म को हासिये में ला सकें, क्रांतिकारियों के इस शेर से कि हम को मिटा सके यह जमाने में दम नहीं ज़माना हम से है जमाने से हम नहीं , अन्यथा जिस प्रकार कांग्रेश के खिलाफ जनता आक्रोशित थी, उससे तो कांग्रेस के खिलाफ एक गधा भी खड़ा हो जाता तो वह चुनाव निश्चित ही जीत जाता, और फिर अप्रैल २०१४ के चुनाव के पश्चात आज फरवरी २०१५ तक जीतने के बाद से आज तक हो क्या रहा है, वही जो कांग्रेस के सासन काल में चल रहा था, क्योंकि आम जनता जो जागरूक है, वह बी जे पी को सामंतवादी विचारधारा का समर्थक , सम्प्रदायवाद,(साम्प्रदायिक) और धार्मिक कट्टरवाद से जोड़ती है, यदि जनता एक दम से बी ० जे ० पी ० के खिलाफ हो जाएगी, तो दूसरा , तीसरा विकल्प पहले से तैयार रहना चाहिए , इस तरीके से तथाकथित पूंजीवाद के दो मकसद पूरे होते हैं, एक तो कांग्रेस को हमेशा ही रास्ते से साफ़ करने की उनकी साजिश सफल होती है ताकि उसके समर्थक विशेषकर कम्युनिस्ट , भविष्य में उसके सहयोग से कुछ हाशिल न कर सकें और दुसरे , कांग्रेस के समर्थक कटघरे में खड़े होते है, इस लिए तथाकथित पूंजीवाद ने पहले से ही दूसरा विकल्प तैयार कर लिया है , ताकि भविष्य में बी जे पी के अशफ़ल होने से आप जैसी भोली भाली जनता के विचारों की एक नयी राजनैतिक पार्टी भविष्य के राजनितिक मंच के लिए तैयार रहे, और प्रगतिशील विचारों का विरोधी पूंजीवाद का तथाकथित प्रजातंत्र बनाम गणतंत्र पर शोषण, जुल्म , अत्याचार ,लूट खसोट, और दमन जारी रहे ?

Sunday, 2 November 2014

बोलो कॉमरेड क्या करोगे---सुदीप ठाकुर

http://cgkhabar.com/communist-party-movement-india-suggestion-20141101/


बोलो कॉमरेड क्या करोगे

Saturday, November 1, 2014
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लाल झंडा
नई दिल्ली| सुदीप ठाकुर: भारत के वामपंथी एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं और लगता है कि उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है. कम्युनिस्ट पार्टियों की आज जो हालत हो गई है, एक दशक पहले 2004 में कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. उस दौर में कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं ने माकपा महासचिव प्रकाश करात को देश के सबसे ताकतवर लोगों में शुमार किया था. यूपीए की पहली सरकार कम्युनिस्ट पार्टियों के बाहरी समर्थन से ही टिकी थी. तब वाम मोर्चे को लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक 59 सीटें मिली थीं. और आज हालत यह हो गई है कि वाम पार्टियां ले देकर दहाई का आंकड़े तक पहुंच पाईं.
मगर लोकसभा या विधानसभा में मौजूदगी से भी गंभीर मसला उनके अस्तित्व से आ जुड़ा है. नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा के उभार से सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों को ही चुनौती नहीं मिली हैं, इससे कांग्रेस की नेहरूवादी समाजवाद की धारा को भी गहरा झटका लगा है, जिसे उदार वामपंथ के करीब माना जाता है.
हैरत नहीं होनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के पूरे अभियान में कांग्रेस को ध्वस्त करने के लिए सबसे पहले नेहरू को निशाना बनाया था. उनकी यह रणनीति कारगर साबित हुई, जिसे न तो कांग्रेस समझ पा रही थी और न ही वामपंथी पार्टियां. बात सिर्फ मोदी या भाजपा की कारगर रणनीति की नहीं है, देश की जनता में यदि किसी परिवर्तन की जरूरत महसूस हो रही थी, तो उसकी थाह पाने में ये पार्टियां नाकाम रहीं.
जाहिर है, यह बहस अभी पूरी नहीं हुई है कि मोदी की जीत हुई है या नेहरूवादी समाजवाद की पराजय! और विडंबना देखिये कि 14 नवंबर को स्वच्छता अभियान से जोड़कर मोदी गांधी और पटेल की तरह नेहरू को विचारधारा के खांचे से भी बाहर निकालने की तैयारी कर रहे हैं और ऐसा कर वह उन्हें सिर्फ एक राष्ट्रीय प्रतीक में बदल देंगे!
मगर सबसे फजीहत तो वामपंथियों की हो रही है, जो अंधी सुरंग से बाहर नहीं निकलना चाहते. जबकि दक्षिणपंथ के उभार के साथ एक उदार वामपंथ की गुंजाइश लगातार बनती जा रही है. और कॉमरेड, राजनीति सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए नहीं की जाती! सच यह भी है कि भाजपा का यह उभार मुश्किल से तीस-बत्तीस फीसदी वोटों के दम पर है.
ऐसा लगता है कि विपक्ष की अपनी पारंपरिक भूमिका भी वामपंथी भूलते जा रहे हैं. ऐसे समय जब दिल्ली में दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियां मंथन कर रही हैं, मेरे पास उनके लिए कुछ बिन मांगे सुझाव हैं:
पहला, प्रतीकों को पहचानें. यह देश प्रतीकों का देश है, जिसे भाजपा खासतौर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बखूबी समझता है. हैरानी की बात है कि वामपंथी पार्टियों ने अपने प्रतीकों को ही हाशिये पर डाल रखा है. संभवतः अब किसी को ठीक से याद भी नहीं होगा कि पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार ई एम एस नंबूदरीपाद ने बनाई थी और वह देश के पहले गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री भी थे. इस वर्ष 8 जुलाई को ज्योति बसु जैसे दिग्गज वामपंथी नेता का सौवां जन्मदिन गुजर गया और किसी को ठीक से खबर तक न हुई!
इंद्रजीत गुप्त और गीता मुखर्जी जैसे वामपंथी सांसद जिनकी कमी आज भी संसद में महसूस की जा सकती है, जिन्हें भुला ही दिया गया है. क्या कम्युनिस्ट पार्टियों को अपने इन नेताओं को याद नहीं करना चाहिए और उनके योगदान को देश के सामने नहीं लाना चाहिए.
दूसरा सुझाव यह है कि कम्युनिस्ट पार्टियां खुद का भारतीयकरण करने पर विचार करें. हैरानी की बात है कि कम्युनिस्ट पार्टियां आज तक भारतीय मानकों के अनुरूप खुद को नहीं ढाल सकी हैं. मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था, लेकिन भारत में धर्म जीवनशैली का हिस्सा है. धर्म की व्यापकता को हिंदुत्व के इन दिनों प्रचलित खांचे से बाहर निकालकर देखने की जरूरत है. इसका शिक्षा और ज्ञान से कुछ लेना देना नहीं है.
अंध भक्ति, अंधविश्वास, कट्टरता, धर्मांधता आदि से अलग एक उदारवादी भारतीय चेहरा भी है, जो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजाघर और सूफी संतों की मजारों में जाता है, व्रत रखता है और सोच में प्रगतिशील है. वह उत्सवधर्मी भी है, जिसकी झलक पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के समय दिखाई देती रही है, जहां तीन दशक तक माकपा की सरकार रही. ऐसे समय जब धर्म को लेकर संकुचित तरीके से माहौल बनाया जा रहा है, वामपंथी पार्टियां चुप बैठी हैं. उन्हें धर्म को लेकर असमंजस से निकलना पड़ेगा. इस देश को उस धर्म की जरूरत है, जिसकी पैरवी एक अन्य नरेंद्र ने सौ साल पहले की थी.
तीसरा सुझाव कांग्रेस को लेकर है. कम्युनिस्ट पार्टियों को कांग्रेस के साथ अपने रिश्ते को लेकर स्पष्ट होना चाहिए. वे कांग्रेस के साथ रहेंगी, या उसे समर्थन देंगी या उससे अलग चलेंगी? कांग्रेस के साथ अब तक उनकी राजनीति सुविधा की राजनीति थी, लेकिन बदली परिस्थितियों में उन्हें अपना नजरिया बदल लेना चाहिए.
इसी तरह उन्हें मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, मायावती और अन्नाद्रमुक तथा द्रमुक को लेकर अपना नजरिया स्पष्ट करना चाहिए. मायावती और जयललिता पर लगाए गए उनके दांव सिरे ही नहीं चढ़ सके थे, इसलिए उन्हें संभावित सहयोगियों को लेकर स्पष्ट होना चाहिए.
चौथा सुझाव इतिहास से जुड़ा है. इतिहास भी विचित्र संयोगों के साथ उपस्थित होता है. ठीक पचास वर्ष पूर्व पंडित जवाहर लाल नेहरू की मौत हुई थी और उसी वर्ष देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ था. सच तो यह है कि नेहरू के प्रधानमंत्री रहते नंबूदरीपाद की सरकार को बर्खास्त किया गया था. इसके बावजूद विचारधारा के स्तर पर नेहरू और कम्युनिस्ट पार्टी एक दूसरे के काफी करीब थे. आज पचास वर्ष बाद जब नरेंद्र मोदी नेहरू की विरासत को चुनौती दे रहे हैं, ठीक उसी समय वामपंथी पार्टियां अपने सबसे दुर्दिन देख रही हैं.
हालत यह है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मान्यता ही खतरे में पड़ गई है. क्या यही ठीक समय नहीं है, जब इतिहास को नए सिरे से लिखा जाए और देश की दो बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियां माकपा और भाकपा आपस में मिल जाएं. विचारधारा और पार्टी लाइन अपनी जगह है, लेकिन जब आधार ही नहीं बचेगा तो विचारधारा का क्या करोगे. वैसे भी आपके पास खोने के लिए अब बहुत कुछ नहीं बचा है.
*लेखक अमर उजाला, दिल्ली के स्थानीय संपादक हैं.
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Thursday, 19 June 2014

वेदों मे निहित समानता की भावना ही साम्यवाद का मूलाधार है ---विजय राजबली माथुर

 यह लेख मूल रूप से पूर्व प्रकाशित है :

Wednesday, April 25, 2012


अधर्म को 'धर्म' मानने की गलती

 

हिंदुस्तान,लखनऊ,23-04-2012 ,पृष्ठ-7

मुद्रा राक्षस जी बुजुर्ग और उच्च कोटि के विद्वान हैं। वह जो कहना चाहते थे उसे समझे बगैर लोगों ने उनका विरोध कर दिया।
* किन्तु थोड़ी सी गलती उनकी भी यह है कि उन्होने 'हिन्दू धर्म' शब्द का प्रयोग किया है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों ,उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। 

*मुद्रा जी से दूसरी गलती यह हो गई है कि उन्होने आदि शंकराचार्य के बाद 'ज्ञान-विज्ञान'की रचना न किए जाने की बात कही।एक हद तक 'बुद्ध' के विचार 'वैज्ञानिक'थे किन्तु शंकराचार्य ने अविज्ञान का भ्रम फैला कर उन्हें धूलि-धूसरित कर दिया है। आज भारत जो गारत हो गया है वह इन्हीं शंकराचार्य की देंन  है। इन लोगों के बारे मे हकीकत यह है देखें -



*मुद्रा जी ने तीसरी गलती यह कर दी है कि उन्होने कहा कि 'ऋग वेद और अथर्व वेद' मे महिलाओं के लिए निंदनीय शब्द हैं। लगता है कि मुद्रा जी ने आचार्य श्री राम शर्मा सरीखे अवैज्ञानिक लोगों की व्याख्याओं को अपने निष्कर्ष का आधार बनाया है।

लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका का विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए।

विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ'धरण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है।


वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -

'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।


'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =


हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों। 
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। । 


'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=


हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा। 
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। । 


'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=


सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान । 
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। । 
हे ईश सब सुखी हों कोई  न हो दुखारी। 
 सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। । 
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों। 
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।    

ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही साम्यवाद का मूलाधार है । जब मैक्स मूलर साहब भारत से मूल पांडुलिपियाँ ले गए तो उनके द्वारा किए गए जर्मन भाषा मे अनुवाद के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास केपिटल'एवं 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'की रचना की। महात्मा हेनीमेन ने 'होम्योपैथी' की खोज की और डॉ शुसलर ने 'बायोकेमी' की। होम्योपैथी और बायोकेमी हमारे आयुर्वेद पर आधारित हैं और आयुर्वेद आधारित है 'अथर्ववेद'पर। अथर्ववेद मे मानव मात्र के स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र दिये गए हैं फिर इसके द्वारा नारियों की निंदा होने की कल्पना कहाँ से आ गई। निश्चय ही साम्राज्यवादियो के पृष्ठ-पोषक RSS/भाजपा/विहिप आदि के कुसंस्कारों को धर्म मान लेने की गलती का ही यह नतीजा है कि,कम्युनिस्ट और बामपंथी 'धर्म' का विरोध करते हैं । मार्क्स महोदय ने भी वैसी ही गलती समझने मे की जैसी कि मुद्रा राक्षस जी ने यथार्थ को समझने मे कर दी। यथार्थ से हट कर कल्पना लोक मे विचरण करने के कारण कम्युनिस्ट जन-समर्थन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषक -उत्पीड़क वर्ग और-और शक्तिशाली होता जाता है। 

आज समय की आवश्यकता है कि 'धर्म' को व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलालों (तथाकथित धर्माचार्यों)के चंगुल से मुक्त कराकर जनता को वास्तविकता का भान कराया जाये।संत कबीर, दयानंद,विवेकानंद,सरीखे पाखंड-विरोधी भारतीय विद्वानों की व्याख्या के आधार पर वेदों को समझ कर जनता को समझाया जाये तो जनता स्वतः ही साम्यवाद के पक्ष मे आ जाएगी। काश साम्यवादी/बामपंथी विद्वान और नेता समय की नजाकत को पहचान कर कदम उठाएँ तो सफलता उनके कदम चूम लेगी।

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नोट -पिछली पोस्ट पर फुट नोट देखना न भूलें।    और यह लिंक भी देखने का कष्ट करें । 

Thursday, 6 February 2014

केजरीवाल की पार्टी की गुण्‍डागर्दी का विरोध करें, इनके असली चेहरे को पहचानें---मजदूर बिगुल

आखिर इतनी बौखलाहट क्‍यों?
फिर आखिर इस आन्‍दोलन से आम आदमी पार्टी को इतनी बौखलाहट क्‍यों है कि आन्‍दोलन की
 अभियान टोलियों के साथ जगह-जगह उनके कार्यकर्ता उलझ रहे हैं, गाली-गलौज कर रहे हैं और पर्चे जला रहे हैं। पिछले एक हफ्ते से उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली क्षेत्र में लगभग हर रोज़ ‘आप’ के कार्यकर्ताओं ने अभियान टोली के साथ बदसलूकी की, प्रचार सभाओं में बाधा पैदा करके मज़दूरों को तितर-बितर करने की कोशिश की। एक दिन एक प्रचार टोली से पर्चे छीन कर जलाये। यहाँ तक कि शाहाबाद डेयरी स्थित जिस शहीद भगतसिंह पुस्‍तकालय में स्‍त्री और पुरुष मज़दूरों की मीटिंगें और विविध सांस्‍कृतिक कार्यक्रम हुआ करते हैं, रात में उसका बोर्ड कुछ लोग उतार ले गये। फिर वहाँ पत्‍थरबाजी भी की गयी। कल शाम को गाड़ी में सवार पीकर धुत्‍त ‘आप’ पार्टी के कुछ लोगों ने बादली में प्रचार टोली की स्‍त्री सदस्‍यों के साथ गाली-गलौज की और धमकियाँ दीं, फिर मज़दूरों के इकट्ठा होने पर वे वहाँ से चले गये!पहली बात, यही वह लोकतांत्रिक संस्‍कृति है, जिसकी केजरीवाल, सिसोदिया और योगेन्‍द्र यादव दुहाई देते नहीं थकते? मज़दूरों के नितान्‍त शान्तिपूर्ण आन्‍दोलन से इतनी बौखलाहट क्‍यों? आखिर मज़दूर माँग ही क्‍या रहे हैं? उनका मात्र इतना कहना है कि केजरीवाल ने मज़दूरों से जो वायदे किये थे, उन्‍हें पूरा करने के बारे में कुछ तो बोलें! वे तो सत्‍तासीन होने के बाद साँस-डकार ही नहीं ले रहे हैं।
मज़दूरों से किये गये एक भी वायदे की चर्चा भी नहीं 

की!
केजरीवाल ने पूरी दिल्‍ली से ठेका प्रथा को खत्‍म करने का वायदा किया था। अब उन्‍होंने इसकी तकनीकि जाँच के लिए एक समिति बना दी है, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। उन्‍हें करना सिर्फ इतना था कि सिर्फ एक दिन का विधान सभा सत्र बुलाकर इस आशय का विधेयक पारित करवा लेना था कि दिल्‍ली में कोई भी निजी या सरकारी नियोक्‍ता नियमित प्रकृति के काम के लिए ठेका मज़दूर नहीं रह सकता। इसके बजाये एक समिति बनाकर केजरीवाल ने मामले को टाल दिया है। समिति रिपोर्ट देगी और उसपर सरकार विचार करेगी, तबतक लोकसभा चुनावों की आचार संहिता लागू हो जायेगी।केजरीवाल ने कहा था कि निजी झुग्‍गीवासियों को पक्‍के मकान दिये जायेंगे और तबतक कोई झुग्‍गी उजाड़ी नहीं जायेगी। अब इस काम के लिए समय-सीमा बताना तो दूर, केजरीवाल कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। यही नहीं, कांग्रेस सरकार के समय जिन झुग्‍गी बस्तियों का नियमतिकरण हुआ था, अब उनमें भ्रष्‍टाचार बताकर उस फैसले को पलटने की बात की जा रही है। यानी लाखों मज़दूरों को पुनर्वास की व्‍यवस्‍था के बिना उजाड़ने की भूमिका तैयार की जा रही है।केजरीवाल ने दिल्‍ली के सभी पटरी दुकानदारों और रेहड़ीवालों को लाइसेंस और स्‍थाई स्‍थान देने का वायदा किया था, उसके बारे में भी वे अब साँस-डकार नहीं ले रहे हैं।चुनाव प्रचार के दौरान मज़दूर बस्तियों में उनके उम्‍मीदवार सौ अतिरिक्‍त सरकारी स्‍कूल खोलने और वर्तमान स्‍कूलों के स्‍तर को ठीक करने का वायदा कर रहे थे। इस वायदें को भी ठण्‍डे बस्‍ते में डाल दिया गया।
केजरीवाल का भ्रष्‍टाचार-विरोध मज़दूरों के लिए नहीं है!
केजरीवाल की राजनीति की पूरी बुनियाद भ्रष्‍टाचार-विरोध पर टिकी है। फिलहाल हम इस बुनियादी प्रश्‍न पर नहीं जाते कि पूँजीवाद को पूरी तरह भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त किया ही नहीं जा सकता, कि पूँजीवाद स्‍वयं में ही भ्रष्‍टाचार है और यह कि जनता को भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त पूँजीवाद नहीं, बल्कि पूँजीवाद-मुक्‍त राज और समाज चाहिए। भष्‍टाचार कितनी अधिक धनराशि का है, इससे अधिक अहम बात यह है कि किस भ्रष्‍टाचार से व्‍यापक आम आबादी का जीना मुहाल है! दिल्‍ली की साठ लाख मज़दूर आबादी का जीना मुहाल करने वाला भ्रष्‍टाचार है — श्रम विभाग का भ्रष्‍टाचार। किसी भी फैक्‍ट्री या व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठान में मज़दूरों को न्‍यूनतम मज़दूरी नहीं मिलती, काम के तय घण्‍टों से अधिक काम करना पड़ता है, ओवरटाइम तय से आधी दर पर मिलता है, कैजुअल मज़दूरों का मस्‍टर रोल नहीं मिंटेन होना, सैलरी स्लिप नहीं मिलती, पी.एफ. इ.एस.आई. की सुविधा नहीं मिलती, फैक्‍ट्री इंस्‍पेक्‍टर, लेबर इंस्‍पेक्‍टर आदि दौरा नहीं करते, कारखाने स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा और पर्यावरण के निर्धारित मानकों का पालन नहीं करते! तात्‍पर्य यह कि किसी भी श्रम कानूनों का पालन नहीं होता। यदि केजरीवाल वास्‍तव में भ्रष्‍टाचार से आम लोगों को होने वाली परेशानी से परेशान हैं, तो सबसे पहले उन्‍हें श्रम विभाग के भ्रष्‍टाचार को दूर करना चाहिए। मज़दूरों की यही माँग है।लेकिन मज़दूरों के प्रति केजरीवाल की सरकार का रवैया क्‍या है? डी.टी.सी. के 20हजार ठेका कर्मचारियों और 10हजार अस्‍थाई शिक्षकों के धरने और अनशन को हवाई आश्‍वासन की आड़ में नौकरी छीन लेने और दमन की धमकी से समाप्‍त कर दिया गया। वजीरपुर कारखाना यूनियन के मज़दूर जब अपनी माँगों को लेकर सचिवालय पहुँचे तो बैरिकेडिंग करके पुलिस खड़ी करके उन्‍हें मंत्री से मिलने से रोक दिया गया और दफ्तर में केवल उनका माँगपत्रक रिसीव कर लिया गया। केजरीवाल का जनता दरबार तो हवा हो ही गया, अब उनके मंत्री जनता से मिलते तक नहीं।
‘आप’ के आम आदमी
ये ‘आप’ के आम आदमी हैं कौन? यूँ तो ऊपर भी विचित्र खिचड़ी है! केजरीवाल का एन.जी.ओ. गिरोह, किशन पटनायक धारा के समाजवादी योगेन्‍द्र यादव, राज नारायण धारा के समाजवादी आनंद कुमार, मंचीय नुक्‍कड़ कवि, घोर दखिणपंथी विचारों वाला कुमार विश्‍वास, ए.बी.वी.पी. से एन.एस.यू.आई. से भा.क.पा.(मा-ले) होते हुए यहाँ तक आये गोपाल राय तथा कमल मित्र शेनॉय, परिमल माया सुधाकर, बली सिंह चीमा, आतिशी मारलेना आदि-आदि भाँति-भाँति के, रंग-बिरंगे ”वामपंथियों” के साथ कैप्‍टन गोपी नाथ, नारायण मूर्ति और वी. बालाकृष्‍णन जैसे कारपोरेट शहंशाह…। ऐसी लोकरंजक राजनीतिक खिंचड़ी का असली रंग और स्‍वाद तो ग्रासरूट स्‍तर पर पता चलता है। केजरीवाल को मध्‍यवर्गीय इलाकों में आर.डब्‍ल्‍यू.ए. खुशहाल मध्‍य वर्गीय जमातों, कारोबारियों और आई.टी. – व्‍यापार प्रबंधन आदि पेशों में लगे उन युवाओं का समर्थन प्राप्‍त है, जो पारम्‍परिक तौर पर दक्षिणपंथी विचारों के और प्राय: भाजपा के वोट बैंक होते रहे हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों में देखने को मिलता है। वहाँ सारे छोटे कारखानेदारों, दुकानदारों, लेबर-कांट्रेक्‍टर के अतिरिक्‍त मज़दूरों को सूद पर पर पैसे देने वाले, कमेटी डालने वाले, मज़दूरों के रिहाइश वाले लॉजों-खोलियों और घरों के मालिक तथा प्रापर्टी डीलर और उनके चम्‍पुओं के गिरोह — यही आम आदमी की टोपी पहनकर मज़दूर बस्‍तियों में घूम रहे हैं। पिछले एक माह के अभियान के दौरान हमलोगों ने इस नंगी-कुरूप सच्‍चाई को बहुत गहराई से महसूस किया और झेला। सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा। ‘बवाना चैम्‍बर ऑफ इण्‍डस्‍ट्रीज’ के चेयरमैन प्रकाशचंद जैन उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के एक अग्रणी नेता हैं। इनके साथ और भी कई फैक्‍ट्री मालिक, प्रॉपर्टी डीलर और ठेकदार हैं। कोई प्रकाश चन्‍द जैन से ही पूछे क्‍या उनके कारखानों में मज़दूरों को न्‍यूनतम वेतन, पी.एफ., ई.एस.आई. आदि दिया जाता है, क्‍या वहाँ श्रम कानूनों का पालन होता है? कमोबेश यही स्थिति दिल्‍ली के सभी औद्योगिक इलाकों और मज़दूर बस्तियों की है। इसके बावजूद, एन.जी.ओ.-सुधारवादियों और भाँति-भाँति के सामाजिक जनवादियों को तो छोड़ ही दें, आम आदमी पार्टी की झोली में यूँ ही जा टपकने वाले भावुकतावादी कम्‍युनिस्‍टों को अभी भी केजरीवाल की राजनीति का असली रंग नहीं दिख रहा है, तो निश्‍चय ही राजनीतिक काला मोतिया के चपेट में वे अंधे हो चुके हैं। या हो सकता है, वे पहले से ही अंधे रहे हों।आम जनता स्‍वराज और सड़क से सत्‍ता चलाने की रट लगाने वाले लोकरंजकातावादी मदारी अब सरकारी धोखाधड़ी और धमकी, पुलिसिया धौंसपट्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं की दादागीरी का खुलकर सहारा ले रहे हैं। मज़दूरों की वर्ग दृष्टि एकदम साफ है। वह केजरीवाल के लोकरंजकतावाद की असलियत को अभी से समझने लगा है। वह कुछ कुलीनतावादी दिवालिये किताबी वामपंथियों की तरह मतिभ्रम-संभ्रम-दिग्‍भ्रम का शिकार नहीं है।

साभार : 

Thursday, 2 January 2014

उमरावजान का सुल्तान है:'आप'/केजरीवाल ---विजय राजबली माथुर

 मिर्ज़ा हादी  रुसवा द्वारा 1905 में लिखित उर्दू उपन्यास 'उमरावजान अदा'पर आधारित -1981 में प्रदर्शित फिल्म 'उमराव जान' के माध्यम से मुजफ्फर अली साहब ने 1840 से 1857 तक के काल खंड में ब्रिटिश साम्राज्य के सहारे चल रही नवाबों/सुल्तानों की विलासिता और ईमानदारों को कर्तव्य पालन के कारण होने वाली दुश्वारीयों/हानियों तथा निर्दोषों के उत्पीड़न-शोषण की जानकारी उपलब्ध कराई थी। किन्तु शायद इस फिल्म को भी मनोरंजन के ही एक दृष्टिकोण  से लिया गया प्रतीत होता है। तभी तो आज दिग्गज चिंतक-विचारक और बड़े कम्युनिस्ट नेता भी 'आप' और केजरीवाल के दीवाने बने घूम रहे हैं।

आज 'आप'/केजरीवाल उसी भूमिका में हैं जिसमें उस वक्त के सुल्तान और नवाब थे। जनता के उत्पीड़न और शोषण से संग्रहीत धन को कारपोरेट घराने इन नए सुल्तानों पर लुटा रहे हैं और ये नए सुल्तान मनमोहनी अदाओं से आज की उमराव जान अर्थात बेगुनाह जनता को दिवा-स्वप्न या ख़्वामख़्वाह के झूठे सब्जबाग दिखा रहे हैं ,जैसे इस सुल्तान ने उमरावजान को दिखाये थे। :



एक दारोगा की कर्तव्यपालन में बरती ईमानदारी की सजा उसकी पुत्री को दर-दर भटकने और ठोकरें खाने के रूप में प्राप्त हुई थी। चाह कर भी वह एक बार फँसने के बाद दलदल से न निकल सकी थी। यहाँ तक कि 1857 की क्रांति  की तैयारियों में संलिप्त एक योद्धा ने जब उस लड़की को बचा कर निकालने का प्रयास किया तो उसको ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया। क्रांति की विभीषिका में जब लखनऊ छोड़ कर बनारस जाने के फैजाबाद पड़ाव में भाग कर जब वह लड़की उमरावजान छिप कर वहीं डेरा जमा लेती है तो उसका अपना छोटा भाई जो उसके अपहरण का चश्मदीद गवाह था उसको भगा देता है और उसकी माँ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाती है। 

बिलकुल उसी लड़की जैसी दशा इस समय देश की जनता की हो रही है। कांग्रेस/भाजपा के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने में संभावित संदेह को देखते हुये आज के नए 'सुल्तान' के रूप में 'आप'/केजरीवाल का अवतरण किया गया है। देश की राजधानी दिल्ली की जनता को ठगने में सफल हो जाने के बाद इस सुल्तान के हौसले बुलंद हैं। सारे देश की जनता उमरावजान की भांति ठगे जाने को आतुर प्रतीत हो रही है। दुखद स्थिति यह है कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध गर्जन/तर्जन करने वाले वामपंथी और कम्युनिस्ट भी इस नए सुल्तान पर फिदा होकर जनता को ठगे जाने की प्रक्रिया में ही शामिल होते दीख रहे हैं। छिट-पुट संघर्ष करने वालों की आवाज़ को उसी तरह दबा दिया जाएगा जिस प्रकार तब गदर के एक नायक फैज अली को उमरावजान को बचाने के प्रयास में मौत के घाट उतार दिया गया था।

Saturday, 19 October 2013

वामपंथी आंदोलन सही दिशा में आगे बढ़ा होता तो........................शेष नारायण सिंह/असरार खान

Asrar Khan commented on a status.



लोकजनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ,राम विलास पासवान की प्रेस वार्ता में कल मैं भी पंहुच गया . बहुत दुखी थे. लक्ष्मणपुर बाथे में हुए नरसंहार के अभियुक्तों के बरी हो जाने पर बहुत दुखी थे . लेकिन कोई स्टैंड लेने को तैयार नहीं थे .एक समय में वंशवादी राजनीति के घोर विरोधी रहे रामविलास जी के बाएं बाजू उनके पुत्र विराजमान थे और दाहिने बाजू उनके भ्राता . रामविलास जी की राजनीति में वह जादू है कि वी पी सिंह , बीजेपी और कांग्रेस सभी उनको बहुत प्रेम करते हैं और उनको किसी भी पार्टी में सद्गुण नज़र आ जाता है . बस शर्त यह है कि पार्टी को उस वक़्त सत्ता में होना चाहिए . इस बार यू पी ए के समर्थक हैं . इसके पहले एन डी ए के समर्थक भी रह चुके हैं . १९८९ में वी पी सिंह के तो बहुत बड़े सिपहसालार थे . आजकल हमारे कई प्रगतिशील और वामपंथी साथी भी उनके साथ हैं .रामविलास जी अच्छे इंसान हैं.


  • Chanchal Bhu १९८० का रिटायर कामरेड् असरार वहाँ हैं क्या ? हों तो हटा दीजियेगा पासवान के साठ वो भी नाली में न गिर जाय .

  • Amalendu Upadhyaya जी। हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी श्री असरार खान साहब भी लोजपा के राष्ट्रीय सचिव हैं। यह खुशी की बात है http://www.lokjanshaktiparty.org.in/office-_bearers.html

  • Mahesh Rathi BHUTPURVA LOHIAWADI KAH SAKTE HEY?SAMYAWADIO KA TO FILSAFA SAMAJH NAHI AATA KABHI LALOO KO TO KABHI KARUNANIDHI KO APNA NATURAL ALLY MANATE HEY.LAGATA HEY VICHARDHARA BHALE HI DEBATABLE RAHI HO LEKIN VYAKTIO KI IMANDARI BHI INKI SANGAT SE TAI KARE TO TAJJUB WALI HEY.

  • Devendra Yadav कुछ भी कहिये! अब वंशवादी राजनीति पर सभी चुप हैं। ये मुद्दा भी नही बन पायेगा। वस्तुतः लोकतंत्र और राजतन्त्र का कारवां सामानांतर दौड रहा है।



  • Asrar Khan चंचल जी राजनीति में कोई रिटायर नहीं होता ..आज आपने जेपी पर लिखा है जिन्होंने बुढापे में हिलाकर रख दिया था ..../ मैं नौ साल की उम्र में कम्युनिस्ट बन गया था इस तरह २२ साल की उम्र में माकपा का असली चेहरा सामने आ चुका था ...तो उसे छोड़ दिया ....लेकिन उतने बड़े संगठन को छोड़ने के बाद अकेले भी लड़ता रहा और आज १९८३ के जेएनयू छात्र आंदोलन में उपलब्धि के नाम पर अगर किसी के पास कुछ है तो वह केवल मेरे पास है .....थोड़ा सा विद्रोही के पास भी होगा लेकिन वह अपनी निजी लड़ाई की वजह न के बराबर ही है ...बाकी सारे छात्र संगठन खलनायक सिद्ध हो चुके हैं ....यह मेरी बड़ी उपलब्धि है जिसे याद करने भर से मेरे अंदर भगत सिंह जैसा साहस पैदा होता है ../ ऐसी अनेको घटनाएं हैं जिन्हें याद करके मैं खुश हो लेता हूँ और मुझे अपनी सोच पर आगे चलने की प्रेरणा स्वतः मिलती रहती है .../

  • Asrar Khan शेष नारायण जी आपने मुझे बहुत अहमियत दिया और इतना बड़ा पोस्ट लिख डाले ...मैं आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ सोच नहीं पा रहा हूँ ...?
    मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि पासवान जी के साथ मैं हूँ और वहाँ पर लोग मुझे जानते हैं कि मैं मार्क्सवादी विचारधारा का समर्थ
    क हूँ ...खुद वे मुझे एक कम्युनिस्ट के तौर पर ही जानते हैं ....यानि कि मैं किसी चोरी से नहीं हूँ ....खैर मैं इतना ही कहना मुनासिब समझता हूँ कि पासवान जी एक बेदाग़ नेता हैं और सभी राजनितिक घरानों की तरह उनके परिवार के लोग भी उनकी पार्टी में हैं उनके साहबजादे भी राजनीति में कदम रख चुके हैं लेकिन उन्होंने कभी भी न तो अपने पिता श्री राम विलास पासवान या किसी अन्य पार्टी मेंबर को अपमानित किया है और न ही किसी ड्रामे के जरिये चर्चाओं में आने की कोशिअश करते हैं ....अभी तक मैंने उन्हें पासवान जी के किसी दस्तावेज को फाड़ते हुए नहीं देखा बल्कि जोड़ते हुए जरूर देखा है .../
    यह भी बताना जरूरी है कि अगर भारत का वामपंथी आंदोलन सही दिशा में आगे बढ़ा होता तो मैं भी वहीँ होता और मेरे जैसे अनेकों लोग जो वामपंथ से निराश होकर इधर-उधर विखर गए हैं और उनकी भूमिका संदिग्ध नज़र आ रही है वे भी वाम के लिए मर मिटते ..

  • Gyanendra Pandey aaj to communist parties bhi avsarvadi ho gayi hein to bechare Ram vilas paswan ji kyon peechhe rahen.