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Friday, 22 July 2022

क्यों 'साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक' ताकतों के हवाले जनता को कर रखा है? ------ विजय राजबली माथुर

 तुलसी दास का प्रादुर्भाव जब हुआ तब देश में पहले 'सलीम' का अकबर के विरुद्ध विद्रोह हो चुका था फिर जहांगीर के विरुद्ध 'खुर्रम' का विद्रोह भी हुआ था। 'साहित्य समाज का दर्पण होता है' अर्थात अपने ग्रंथ 'रामचरित मानस' के माध्यम से तुलसी दास ने राम और भरत के राजसत्ता के प्रति त्याग भावना पर बल देकर जनता का आव्हान किया है कि ऐसे विलासी शासन को उखाड़ फेंके। तुलसी दास ने रावण के विस्तार वादी -साम्राज्यवादी शासन तंत्र को जन-नायक राम द्वारा परास्त कर लोक शासन की स्थापना का चित्रण किया है। यही वजह थी कि 'काशी' के पंडों ने उनकी 'संस्कृत' में लिखी पाण्डुलिपियों को जला डाला तब उनको भाग कर अयोध्या में 'मस्जिद' में शरण लेनी पड़ी और फिर उनको ग्रंथ भी लोकभाषा 'अवधी' में लिखना पड़ा ।  ( कैसे रहे ? खुद तुलसी के शब्दों में ‘ माँग के खईबो , मसीद में सोईबो ‘ । मसीद यानी मस्जिद । कहा जाता है)---

http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/.../banarastuls.../

दुर्भाग्य से 'एथीस्ट वादी' भी पोंगापंथियों की भांति ही तुलसी दास को बदनाम करने में आगे हैं। पोंगापंथियों ने तो प्रेक्षकों के माध्यम से रामचरित मानस में अनर्गल ठूँसा ही है और राम को अवतार घोषित करके एक क्रांतिकारी ग्रंथ को ढ़ोंगी ग्रंथ में परिवर्तित कर ही दिया है। क्रांतिकारियों विशेषकर वामपंथियों को राम-रावण संघर्ष को साम्राज्यवाद और जनता के बीच संघर्ष के रूप में व्याख्यायित करके जनता को अपने पक्ष में तथा पोंगापंथियों के विरुद्ध खड़ा करना चाहिए था। किन्तु अफसोस कि वे ऐसा न करके खुद तुलसी दास को ही ब्राह्मणवादी ठहरा कर ढोंगियों का मनोबल बढ़ा देते हैं। 

तुलसी दास ने जातिवाद पर करारा प्रहार किया है जब वह 'काग भुशुंडी' अर्थात 'कौआ' से 'गरुँण' को उपदेश के रूप में मानस का आख्यान चलाते हैं। स्त्री-पुरुष समानता का उदाहरण है 'सीता' का वन-गमन प्रसंग और फिर 'अशोक वाटिका' से चलाया गया कूटनीतिक अभियान। सीता द्वारा प्रेषित सूचनाओं के आधार पर ही एयर मार्शल (वायु-नर) 'हनुमान' ने लंका के समुद्री 'राडार'-सुरसा का ध्वंस कर दिया था जिससे आसन्न युद्ध के समय राम पक्ष के विमान लंका की सीमा में निर्बाध प्रवेश कर सकें। विदेशमंत्री 'विभीषण' को तोड़ना,कोषागार  तथा शस्त्रालयों को अग्नि बमों द्वारा राख़ करके हनुमान ने रावण को पहले ही खोकला कर दिया था। अपने विमान की पूंछ पर रावण की सेना के प्रहार से 'आग' लग जाने पर भी सकुशल वापिस लौट आना हनुमान का रणनीतिक व कूटनीतिक कौशल था।

लेकिन जनता को गुमराह करके पोंगापंडित जनता को जागरूक नहीं होने देते हैं व उल्टे उस्तरे से ठगने हेतु 'मानस' की पूजा-आरती व राम के अवतारी होने में उलझाए रखते हैं-उनका तो निहित स्वार्थ है। लेकिन खुद को वामपंथी कहने वाले 'एथीस्ट वाद' के नाम पर सच्चाई को सामने लाने से क्यों बचना छाते हैं?इसमें तो जन-संघर्षों की एकता हेतु सहायता ली जा सकती थी ,जनता को जागरूक करके संगठित किया जा सकता था फिर क्यों 'साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक' ताकतों के हवाले जनता को कर रखा है?