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Thursday, 30 October 2014
पुनः स्थापित किया जा सकता है साम्यवादी दल का वर्चस्व ?---विजय राजबली माथुर
उपरोक्त फोटो से स्पष्ट होगा कि एक टिप्पणीकर्ता साहब इस बात पर ही यकीन नहीं कर रहे हैं कि अभी कुछ माह पूर्व ही केरल भाजपा के लोग केरल माकपा में शामिल किए गए हैं और उसके बाद पश्चिम बंगाल माकपा के लोग वहाँ की भाजपा में चले गए हैं। वह साहब करात साहब को बुद्धिजीवी विद्वान मानते हैं। यह करात साहब ही तो थे जिन्होने कामरेड ज्योति बसु को 1996 में प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था जिसे बाद में बसु साहब ने ऐतिहासिक भूल कहा था। 1997में भूतपूर्व कम्युनिस्ट इंदर गुजराल साहब तभी प्रधानमंत्री बन सके थे जबकि करात साहब से प्रभावित माकपा महासचिव कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत साहब एक दिवसीय दौरे पर मास्को गए हुये थे जो कि मुलायम सिंह जी को देवगौड़ा साहब के स्थान पर पी एम बनाने पर सहमत थे किन्तु गृह मंत्री कामरेड इंद्रजीत गुप्त , पूर्व पी एम- वी पी सिंह आदि ने कामरेड ज्योति बसु से गुजराल साहब की घोषणा करवा दी थी। यदि करात साहब की दाल गल जाती तो गुजराल साहब की जगह मुलायम सिंह ही पी एम बनते जिनको 2014 में फिर एक बार करात साहब ने पी एम बनवाने का पाँसा फेंका था।
एक और टिप्पणीकर्ता कामरेड नजीरुल हक साहब का दृष्टिकोण कि CPI और CPIM का विलय करके एक नई पार्टी बनाना चाहिए तो ठीक है। परंतु व्यवहार में वैसा नहीं है जैसा कि दूसरे टिप्पणीकर्ता साहब ने कम्युनिस्ट पार्टियों में आंतरिक लोकतन्त्र होने की बात कही है। करात साहब की अधिनायकवादी और वाम विरोधी निजी स्वार्थपरक नीतियों के विरुद्ध ही तो येचूरी साहब को मुखर होना पड़ा है।
भाकपा में भी कुछ पदाधिकारी करात प्रवृति के हैं कम से कम उत्तर प्रदेश में तो हैं ही। बीस वर्षों से प्रदेश पार्टी के सीताराम केसरी बने पदाधिकारी इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। वह राजधानी के ज़िला इंचार्ज भी हैं और उस रूप में सुपर जिलामंत्री खुद को समझते हैं । प्रदेश कंट्रोल कमीशन के पूर्व सदस्य रमेश कटारा की भांति ही वह तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा भी लेते हैं और 'एथीस्ट ' भी कहाते हैं। प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता को बदनाम करने व कमजोर करने के लिए वह अतीत में राजधानी के एक पूर्व जिलामंत्री को उनसे भिड़ा कर पार्टी से निकलवा चुके हैं। वह पूर्व जिलमंत्री तो अलग पार्टी बना कर विधायक व मंत्री भी बने तथा अब भाजपा सांसद बन गए हैं किन्तु उनके गुरु व प्रेरणा स्त्रोत रहे वह वरिष्ठ नेता आज भी उन सीताराम केसरी के षड्यंत्र का शिकार बने हुये हैं। एक राष्ट्रीय सचिव व एक वरिष्ठ नेता को गत वर्ष 30 नवंबर 2013 को मऊ में कामरेड झारखण्डे राय और कामरेड जय बहादुर सिंह की प्रतिमाएँ जो लगभग आठ वर्षों से तैयार हैं के उदघाटन समारोह में आना था। अपने मौसेरे भाई आनंद प्रकाश तिवारी (जो अब निष्कासित हैं ) के जरिये इस पदाधिकारी ने उन वरिष्ठ कामरेड्स के विरुद्ध इतना घृणित अभियान चलवाया कि वह सम्पूर्ण कार्यक्रम ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गया।
ज़िला-स्तर पर कार्यकर्ताओं में विभ्रम उत्पन्न करना और परस्पर मन-मुटाव पैदा करना उनके बाएँ हाथ का खेल है। इसके लिए सारे नियम और पार्टी -परम्पराएँ तोड़ने में उनको आनंद आता है। उनकी हकीकत को उजागर करने वाले कामरेड को संघी घोषित करके निकलवा देने की अफवाह एक जन-संगठन के संयोजक से उड़वाते हैं तो दूसरे जन-संगठन के जिलाध्यक्ष से खुद के संबंध में कहलवाते हैं कि उनका विरोध करने वाला पार्टी में टिक नहीं सकता। ज़िला कार्यकारिणी के एक सदस्य से 16 सितंबर को कहलवाया कि उनसे 36 का आंकड़ा रखने वाला बाहर का रास्ता देखने को तैयार रहे तो 2 अक्तूबर की एक गोष्ठी में अपने खास हिमायती के जरिये मुझे विचार व्यक्त करने में व्यवधान प्रस्तुत करवाया।
किसी भी संगठन के विस्तार व विकास के लिए आवश्यक है कि 'लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं ' को सम्मान दिया जाये किन्तु ऐसी बातें केवल एक व्यक्ति की सनक की पूरती तो कर सकती हैं पार्टी का सांगठनिक विस्तार नहीं और यही उनका उद्देश्य भी है। यदि CPI और CPIM एक हो जाएँ तो ऐसे लोगों का खेल समाप्त हो सकता है तथा देश में साम्यवादी दल का वर्चस्व पुनः स्थापित किया जा सकता है।
Saturday, 28 December 2013
वाम से आप बन जाने का आग्रह भी कम दिलचस्प नहीं है--- धीरेश सैनी
December 24 at 10:28am · Edited
https://www.facebook.com/dheeresh.saini/posts/590603941005459
केजरीवाल लिमिटेड का किस्सा कई मायनों में दिलचस्प है। अरुंधति और कई अन्य विश्लेषकों ने इस बात को शुरू में ही भांप लिया था कि अन्ना की डोर किसके हाथ में है और केजरीवाल की महत्वकांक्षाएं इस डोर से बंधी नहीं रह सकती हैं। भ्रष्टाचार के मूल स्रोत कॉरपोरेट पर अन्ना एंड केजरीवाल की खामोशी के अर्थ भी बताए गए थे। लेकिन अन्ना और उनकी डोर थाम रही ताकत शुरू में केजरीवाल को समझने में गच्चा खा गई। बाद में संघ संभला और उसके शावकों ने अपने हर तरीके से हमले शुरू भी किए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। हालांकि, उनके इन अभियानों ने इतना जरूर किया कि केजरीवाल लिमिटेड पूर्ण बहुमत से जरा दूर रह गई। कांग्रेस को अपनी हार का गुमान तो था लेकिन उसे दिल्ली असेंबली चुनाव में केजरीवाल के इतनी बड़ी ताकत बनकर उभर आने का अहसास तो कतई नहीं था। मीडिया की दुविधा भी दोहरी रही। `मेकिंग ऑफ केजरीवाल` में मीडिया की भूमिका बहुत बड़ी थी लेकिन अब यह कहना मुश्किल है कि मीडिया ने केजरीवाल को यूज किया या केजरीवाल ने मीडिया को। क्योंकि मीडिया की बड़ी प्रतिबद्धता इन दिनों मोदी से भी है और जब तक केजरीवाल सिर्फ कांग्रेस की नैया डुबो रहे थे, तब तक ठीक था लेकिन जैसे ही दिल्ली में मोदी कंपनी का जहाज डगमगाया तो मीडिया के लिए दुविधा बढ़ गई। नतीजों के बाद मीडिया बीजेपी को नहीं ललकार रहा था बल्कि केजरीवाल को ही जिम्मेदारी से न भागने की नसीहत दे रहा था। कांग्रेस की हालत जूते और प्याज दोनों खाने वाली कहानी जैसी है। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों के ही नेताओं के बयान भी दिलचस्प और दुर्भाग्यपूर्ण हैं। वे कह रहे हैं कि केजरीवाल सरकार बनाएं और फिर बिजली-पानी और दूसरे लोकलुभावन वादे पूरा करके दिखाएं। मतलब, उन्हें जनता को जरूरी सुविधाएं न मिल पाने का पूरा यकीन है और उनकी यही इच्छा है। दोनों को लगता है कि इस तरह केजरीवाल औंधे मुंह गिरेंगे। क्या होगा, कौन जानता है लेकिन जिस व्यवस्था में जनता को उसका निरीह अधिकार मिलना दूभर कर दिया गया है, अगर वहां मामूली अधिकार भी कुछ समय के लिए मुहैया करा दिए जाएं तो बड़ा आश्चर्य मान लिया जाता है। लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल अगर इस तरह के लोकलुभावन कामों की झड़ी लगा दें और इस बीच उनकी सरकार गिरा भी दी जाए तो नुकसान कांग्रेस को ही होगा। तब केजरीवाल को तो फायदा ही फायदा होगा। वैसे भी जनता को तात्कालिक लाभ देने के लिए जरूरी नहीं कि कंपनियों की लूट पर अंकुश लगाना जरूरी हो। गन्ना मिल मालिकों को हरामखोरी से बाज आने के लिए बाध्य करने के बजाय केंद्र सरकार ने उन्हें बड़े पैकेज मुहैया करा दिए। मतलब जनता का और पैसा उन्हें थमा दिया गया। यानी मियां की जूती, मियां के सिर। कहने का मतलब यह कि भयंकर लूट की इस व्यवस्था में अगर थोड़ा भी इधर-उधर कर लिया जाए तो जनता को तात्कालिक रूप से खुश किया जा सकता है। केजरीवाल लि. इस खेल को कितना साध पाती है, यह आने वाला समय बताएगा? प्रोग्रेसिव ताकतों की हालत भी अजब है। ।एक क्रांतिकारी संगठन तो अन्ना की जय-जयकार में इतना आगे था कि इस प्रायोजति आंदोलन पर कुछ तार्किक सवाल उठा देने भर से अरुंधति पर सरकंडे के तीर बरसाने में जुट गया था फेसबुक पर प्रो. आशुतोष इसकी अगुआई कर रहे थे। सामाजिक न्याय के विमर्शकार योगेंद्र यादव तो आरक्षण विरोध के हीरो रहे केजरीवाल के विमर्शकार ही बन बैठे। लेकिन, सीपीआई और सीपीआईएम में आस्था रखने वाले लोगों ने भी केजरीवाल को वोट नहीं किए हैं, यह कहना गलत होगा। आखिर वाम पार्टियों को दिल्ली में मिले वोट उनकी पार्टी सदस्यता और विभिन्न सहयोगी संगठनों की सदस्यता संख्या जितने तो होनी ही चाहिए थे। बहुत से बुद्धिजीवी तो आप पार्टी से वाम को कुछ बौद्धिक खुराक लेने की नसीहतें भी दे रहे हैं। वे यह तो जानते ही होंगे कि वाम की संशोधनवादी से संशोधनवादी पार्टी भी आर्थिक और सामाजिक-साम्प्रदायिक मसलों पर वैसी चुप्पी या पलटी नहीं साध सकती जैसी कि केजरीवाल लि. साध सकती है। वाम पार्टियों के दिल्ली तक के बड़े से बड़े आंदोलनों-रैलियों के लिए उस मीडिया में कोई जगह नहीं होती है, जिसमें केजरीवाल और अन्ना के आंदोलन बाकायदा प्रायोजित किए जाते थे। इन बुद्धिजीवियों का वाम से आप बन जाने का आग्रह भी कम दिलचस्प नहीं है।*
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*धीरेश सैनी जी का कथन सत्य है:
यह फोटो जो कह रहा है क्या CPI की अधिकृत नीति अब 'आप' को समर्थन देने की है?:
https://www.facebook.com/shriram.tiwari1/posts/686707368028027
यह दृष्टिकोण यथार्थ का वास्तविक चित्रण है अतः जो वामपंथी 'आप'की वकालत कर रहे हैं वे निश्चय ही निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर ही कर रहे हैं न कि 'जनहित'में।
(विजय राजबली माथुर)
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