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Sunday, 26 February 2017

उत्तर प्रदेश चुनाव में कहाँ है वामपंथ ? ------ कौशल किशोर

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कौशल किशोर जी ने जिस वास्तविकता को इंगित किया है कि, वामपंथियों ने डॉ अंबेडकर द्वारा बताए मार्ग जातीय असमानता के विरुद्ध संघर्ष को अहमियत नहीं दी वही वह मूल कारण है जिसने भारत की जनता को साम्यवाद / वामपंथ से दूर कर दिया है। 
वस्तुतः भारतीय वांगमय 'समष्टिवाद' पर आधारित है जो साम्यवाद / वामपंथ के निकट है परंतु ब्राह्मण वाद के वर्चस्व के चलते पौराणिक कुव्याख्याओं द्वारा उसी को साम्यवाद विरोध के लिए हथियार बना कर शोषक वर्ग साधारण जनता को भ्रमित कर ले जाता है। 
यदि थोथी 'नास्तिकता '/ 'एथीस्ट्वाद ' के भ्रमजाल से निकल कर वामपंथी विद्वजन जनता को समझाएँ तो कोई कारण नहीं कि, जनता हमारे साथ न आए। 
व्यक्तिगत स्तर पर ' एकला चलो रे ' की तर्ज़ पर मैं इस ओर सतत प्रयास करता रहता हूँ जिसका एथीस्टवादी खूब मखौल उड़ाते हैं बजाए समर्थन करने के। केवल और केवल आर्थिक आधार पर भारत में 'सर्वहारा' को संगठित न किया जा सका है न किया जा पाएगा। क्योंकि भारतीय सर्वहारा वर्ग obc व sc जातियों में सिमटा हुआ है और वांमपंथी कर्णधारों का दृष्टिकोण है कि, obc व sc वर्ग से सिर्फ काम लिया जाये उनको कोई पद न दिया जाये । यही वजह रही है कि, वामपंथ से obc व sc वर्ग के कार्यकर्ता टूट कर सपा व बसपा में चले गए हैं जिससे वामपंथ क्षीण से क्षीणतर होता गया है। छह  वाम दलों का मोर्चा भी ब्राह्मण वर्चस्व पर ही टिका है इसलिए जनता को प्रभावित करने में असमर्थ है। 
 


"काश सभी बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्तियाँ  दीवार पर लिखे को पढ़ें और  यथार्थ को समझें और जनता को समझाएँ तो अभी भी शोषक-उत्पीड़क-सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। लेकिन जब धर्म को मानेंगे नहीं अर्थात 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन नहीं करेंगे 'एथीस्ट वाद' की जय बोलते हुये ढोंग-पाखंड-आडंबर को प्रोत्साहित करते रहेंगे अपने उच्च सवर्णवाद के कारण तब तो कम्यूनिज़्म को पाकर भी रूस की तरह खो देंगे या चीन की तरह स्टेट-कम्यूनिज़्म में बदल डालेंगे। प्रस्तुत कटिंग के लेखक जैसे लोगों को कम्यूनिज़्म-वामपंथ के ढलने की घोषणा करने को प्रेरित करते रहेंगे।"
http://krantiswar.blogspot.in/2014/05/blog-post_22.html

Saturday, 2 April 2016

भारत में साम्यवाद की संभावनाएं ------ विजय राजबली माथुर

1992 में जब निम्नांकित लेख लिखा था और जो उम्मीद तब ज़ाहिर की थी वह पूर्ण नहीं हुई है क्योंकि सभी प्रकार के साम्यवादी/वामपंथी दल 'एथीज़्म' : 'नास्तिकता " के भ्रमजाल में फंसे होने के कारण जीवन व समाज की वास्तविक व यथार्थ आवश्यकताओं की उपेक्षा करके मात्र आर्थिक आधार पर वर्गीय एकता बना कर सफलता की कपोल-कल्पना किए  सोये हुये बैठे हैं। मार्क्स साहब के अनुसार पूर्ण औद्योगीकरण के बाद साम्यवादी क्रान्ति होनी थी किन्तु 1917 व 1949 की रूसी व चीनी साम्यवादी क्रांतियाँ कृषी- प्रधान देशों में हुईं थीं फिर उनका औद्योगीकरण किया गया तथा वास्तविक 'धर्म' के 'मर्म' को न मानने के कारण उसका पालन नहीं किया गया। परिणाम स्वरूप रूस में साम्यवाद उखड़ गया तो चीन में STATE-CAPITALISM में परिवर्तित हो गया है। इन सबका सबक हमारे देश के किसी भी साम्यवादी दल ने नहीं लिया है और आज भी लकीर के फकीर बन कर चल रहे हैं। फलतः पहले चरण में 1998 से 2004 तक सांप्रदायिक शक्तियों के नेतृत्व में सत्ता चली गई थी और दूसरे चरण में 2014 में आ गई है जो नित्य नए-नए फासिस्टी तरीकों से जकड़ती जा रही है। 24 वर्ष बाद फिर से उस पुराने लेख को प्रकाशित करने का उद्देश्य यही है कि, इस वक्त जिस परिवर्तन की बात छात्र नेता कामरेड कन्हैया कुमार ने उठाई है उसकी 80 प्रतिशत बातों का उल्लेख इस लेख में भी समाहित है। 20 प्रतिशत 'धर्म' संबंधी दृष्टिकोण पर कामरेड कन्हैया भी लकीर के फकीर वाली 'नास्तिकता' की डगर पर चल रहे हैं। सभी साम्यवादी व जन -वादी तत्व जब तक वास्तविक 'धर्म' का 'मर्म' जनता के समक्ष नहीं रखते तब तक साप्रदायिक/ फासिस्ट शक्तियों को ही मजबूत करते जाएँगे और ऐसा होगा उनके ब्राह्मण वादी नेतृत्व की असली मानसिकता के कारण। 


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आज जब विश्व के प्रथम साम्यवादी राष्ट्र का विघटन हो चुका है और वहाँ पूर्णतय : साम्यवाद को नकार दिया गया है, प्रस्तुत शीर्षक कुछ लोगों को हास्यास्पद प्रतीत हो सकता है। विगत पाँच -छह वर्षों से जबसे  कि, श्री मिखाईल गोर्बाचोव  ने ग्लासनास्त और पेरेस्त्रोईका के नाम पर सोवियत रूस से साम्यवाद की जड़ें छांटना प्रारम्भ की थीं भारत के हम साम्यवादियों में  से अधिकांश को निराशा ही हुई थी और यहाँ अपना भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगा था । पुनः 1989 और 1991 के चुनावों में भाजपा की सांप्रदायिक बढ़त से हम सहसा हताश होते हुये लोगों को पाते हैं।

परंतु इस संबंध में व्यक्तिगत रूप से मेरा दूसरा ही दृष्टिकोण है। मैं समझता हूँ कि, भारत में अब हमारे लिए अपने विस्तार के लिए परिस्थितियाँ और अधिक अनुकूल हैं । एक तो अब हमें परमुखापेक्षी नहीं रहना है अब हमारी पार्टी की नीतियाँ विशुद्ध रूप से भारतीय वांगमय के मद्दे नज़र बनेंगी और दूसरे भाजपा रूपी सांप्रदायिक एवं विघटनकारी शक्तियों ( जो कि, निश्चित रूप से साम्राज्यवादियों के हाथों में खेल रही हैं ) से टक्कर लेने के लिए समान विचारों वाली जनवादी शक्तियों से मिलकर कार्य करने से हमें अपने विस्तार हेतु क्षेत्र स्वतः ही मिलते जाएँगे।

हमारे विपक्षी हमारी सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर करते हैं कि, साम्यवाद के प्रणेता रूस ने ही क्रांतिकारी योद्धाओं का लेनिन, का स्टालिन आदि की मूर्तियाँ ही नहीं उखाड़ फेंकीं उनकी प्रेरक विचार धारा को ही रसातल में समाविष्ट कर दिया तो हम किस आधार पर भारत में साम्यवाद की सफलता की बात करते हैं? और जबकि यहाँ पिछले दो निर्वाचनों ने सांप्रदायिक शक्तियों को ही बल प्रदान किया है।

मेरी राय में हम अपने आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब कुछ इस प्रकार से दे सकते हैं कि, उनका आधार ही समाप्त हो जाये। हमें यह कहना होगा कि, साम्यवाद मूलतः भारतीय विचार धारा है । भारतीय चिंतकों ने समय-समय पर मानव कल्याण और मानव द्वारा मानव के शोषण समाप्ति हेतु जो मन्तव्य व्यक्त किए और जिनका कि, उल्लेख हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों में आज भी उपलब्ध है । महान दार्शनिक मैक्समूलर सा : भारत में 30 वर्ष रह कर इन ग्रन्थों का मनन और अनुवाद कर जब जर्मन वापिस लौटे तो भारतीय संस्कृति से साम्यवादी विचार भी ले गए। महर्षि कार्ल मार्क्स ने समस्त दर्शनों का गहन अध्यन करने के बाद साम्यवादी सिद्धांतों को मानव- कल्याण के उपयुक्त पाया और उन्होने देश - काल की परिस्थितियों के अनुरूप जो दर्शन प्रस्तुत किया और जिसे उनके ही नाम पर हम आज मार्क्सवादी दर्शन कहते हैं वह वस्तुतः मौलिक रूप से भारतीय अवधारणा ही है। हमारी संस्कृति में व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि पर बल दिया गया है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने " वसुधेव कुटुंबकम " का उद्घोष किया जो हमारे आज के " दुनिया के मजदूरों एक हो " के ही अनुरूप है। हमारे प्राचीन ऋषि समस्त मानवता , सम्पूर्ण विश्व को एक समाज इकाई के रूप में मान कर सबके कल्याण की बात करते हैं और यही बात मार्क्स सा : भी कहते हैं कि, विश्व- व्यापी साम्यवादी व्यवस्था में ही मानव- कल्याण संभव है।

आज सोवियत रूस समेत पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का जो पराभव प्रतीत होता है वह वास्तव में साम्यवाद के मूलभूत तत्वों का यथार्थ पालन न हो पाने के कारण है। हम भारत में योगीराज श्री कृष्ण का दृष्टांत प्रस्तुत कर सकते हैं जिन्होंने महाभारत समर के समय अर्जुन को यह उपदेश देते हुये कहा था कि, " अर्जुनस्य द्वै प्रतिज्ञे, न दैन्यम, न पलायनम " अर्थात कि, हे अर्जुन यह दो प्रतिज्ञाए याद रखो कि, न तो कभी दीनता दिखाना और न ही पलायन करना तभी विजय संभव है। हम देखते हैं कि,  श्री मिखाईल गोर्बाचोव सतत पलायन करते हुये साम्राज्यवादियों  के समक्ष दैन्यवश घुटने टेकते चले गए इसी लिए पराजित हुये।

प्रसंगवश यहाँ यह बताना गलत न होगा कि, हमारी प्राचीन संस्कृति का दुरुपयोग तथाकथित धर्म के ठेकेदारों द्वारा सतत रूप से किया जाता रहा है और हम भारतीय साम्यवादी  खुद को "धर्म" विरोधी घोषित करने के कारण उस पर मौन रहे हैं। वास्तव में वे धर्म के अलमबरदार धर्म का आशय ही नहीं जानते और हमने कभी उनका पर्दाफाश ही नहीं किया । योगीराज श्री कृष्ण ने भी जिसे माना था वह धर्म है - सत्य, अहिंसा(मनसा-वाचा-कर्मणा ),  अस्तेय , अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का समुच्य। इस संदर्भ में हम देखते हैं कि, भाजपा आदि तथाकथित धर्म के ठेकेदार ही इस धर्म का उल्लंघन करने के दोषी हैं।
(1 ) कारण कि, वे इस 'सत्य ' को ही स्वीकारने को प्रस्तुत नहीं हैं कि, भारतीय संस्कृति समष्टिवाद पर आधारित है न कि, व्यष्टिवाद जो कि पूंजीवाद का पर्याय है।   
(2 ) निजी लाभ के लिए वे ही दलित और दमित जन के लिए 'हिंसा' का प्रयोग करते हैं और मनसा-वाचा-कर्मणा समग्र रूप में ।
(3 ) वे धर्म के अलमबरदार कहलाने वाले ही 'कर-वंचना' करते हैं अर्थात 'अस्तेय' का पालन नहीं करते हैं।, और
(4 ) जमाखोरी तो उनके जीवन की धारा ही है जिसके द्वारा आभाव उत्पन्न कर वे जन-जन का शोषण करते हैं।
(5 ) ब्रह्मचर्य का पालन कितना करते हैं यह बात उनके नाईट क्लबों (इंडियन क्लब सरीखे ) से ही पता चल जाएगी।

स्वामी विवेकानंद जिन्हे वे अपने संकीर्ण दायरे में रख कर प्रचारित करते हैं, स्वम्य गरीबों और दुखियों के पक्षधर थे और सांप्रदायिक विद्वेष के विरुद्ध थे। एक मुसलमान का हुक्का गुड़गुड़ाने पर उन्हें जो प्रताड़णा मिली उसी से प्रेरित होकर वह घर-परिवार छोड़ कर समष्टि के कल्याण हेतु निकल पड़े। स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट कहा था कि, जब तक भारत में निर्धन की झोंपड़ी में खुशी का दीपक नहीं जलता भारत प्रगति नहीं कर सकता। यह एक वाक्य ही साम्यवादी दर्शन की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है। आवश्यकता है तो इस बात की कि, हम भारतीय संस्कृति से समष्टिवादी सिद्धांतों और तर्कों को ढूंढ कर भारतीय मनीषियों द्वारा व्यक्त विचारों से पुष्ट करते हुये जनता को अपने स्तर से जाग्रत करें तभी हम सांप्रदायिक शक्तियों भाजपा आदि को शिकस्त दे सकते हैं।

आज श्री राम के नाम पर उन्होने बवंडर उठाया हुआ है । हम जन-जन को समझा सकते हैं कि, श्री राम ने तत्कालीन साम्राज्यवाद के सरगना रावण को नष्ट करके भारत की जनता को शोषण और उत्पीड़न से बचाया था। लेकिन आज साम्राज्यवादियों की सहायक लुटेरी शक्तियाँ उनके नाम का सर्वथा दुरुपयोग कर रही हैं।
(रावण - वध एक पूर्व निर्धारित योजना --- http://krantiswar.blogspot.in/2015/10/blog-post_5.html
जब श्री राम ने स्वम्य भारत में एकाधिकारवादी राज्य की स्थापना की ओर कदम बढ़ाया तो तत्कालीन राजनीति के मनीषियों की प्रेरणा पर सीता ने राजमहल से विद्रोह कर दिया और वाल्मीकि मुनि के आश्रम में आश्रय लेकर अपने पुत्रों लव- कुश को राम के जन- विरोधी राज्य के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी। लव-कुश ने जन -सहयोग से मध्य भारत में जनवादी पंचायती राज्य की स्थापना कर डाली और उस पर आक्रमण करके श्री राम को परास्त होना पड़ा। राम जन - शक्ति के आगे झुके और भविष्य में अपने राज्य को जनवादी सिद्धांतों पर चलाने को राज़ी हुये।
(1 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/02/blog-post_19.html
(2 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_27.html
(3 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_12.html 
(4 ) http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_30.html
यदि हम भारतीय संस्कृति से दृष्टांत ले कर जन - कल्याणकारी साम्यवादी सिद्धांतों का प्रचार करें और सांप्रदायिक शक्तियों पर प्रहार करें तो सफलता निश्चित ही हमारे चरण चूम लेगी। मुझे ऐसी आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास भी है और इसी कारण मैं भारत में साम्यवाद की उज्ज्वल संभावनाओं की उम्मीद करता हूँ। बस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित  सभी वांम - दलों को भारतीय संदर्भों पर विशेष बल देने की ही आवश्यकता है। मार्ग स्वतः ही सुगम होता जाएगा।

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Tuesday, 8 September 2015

: वाम असफल क्यो ? कौन दोषी है ? कहाँ चूक हुई ?,कमजोरियाँ किधर है ? ---विजय राजबली माथुर

07-09-2015 

ढ़ोंगी पोंगापंथी और एथीस्ट एक समान :

वेदों में निहित हैं साम्यवाद के सिद्धान्त :
 जिस प्रकार किसी भी संगठन या संस्था  के निर्माण के पूर्व उसके संचालन के लिए 'नियम' बनाए जाते हैं उसी प्रकार इस धरती के निर्माण के बाद जब 'मननशील प्राणी' = 'मनुष्य' की उत्पत्ति अब से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व  हुई तो इस नई सृष्टि के संचालन हेतु भी कुछ नियमों का निर्धारण किया गया । इन नियमों का संकलन 'वेदों' में है जो  श्रेष्ठ=आर्ष= आर्य  विद्वानों द्वारा संग्रहित किए गए थे। कालांतर में ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों द्वारा जिस हिंसक 'हिन्दू' संप्रदाय/मजहब/रिलीजन को खड़ा किया गया उसने वैदिक ज्ञान-विज्ञान को ध्वस्त करके पौराणिक कपोलकल्पित कहानियों की रचना की जो 'गर्व से हिन्दू' कहलाने वालों का आदर्श बनी हुई हैं। ये पौराणिक हिन्दू वैदिक ज्ञान को परिदृश्य में धकेलने हेतु उनको वेद-सम्मत बताते हैं और एथीस्ट उनके कथन को ब्रह्म-वाक्य मान कर चलते हैं। उपरोक्त फोटो टिप्पणियाँ ऐसे ही दो एथीस्टों द्वारा व्यक्त हैं जो उत्तर-प्रदेश भाकपा के कर्णधार भी हैं । ऐसी ही कारगुजारियों के कारण देश की जनता कम्यूनिज़्म को हिकारत की नज़र से देखती है।

 ये कर्णधार सवर्णवाद/ब्रहमनवाद से भी बुरी तरह से ग्रस्त हैं जिसका ज्वलंत उदाहरण यह टिप्पणी है ;



अभी हाल ही में भाकपा से लखनऊ की दो विधानसभा क्षेत्रों से पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी रहे( एक पिछड़े वर्ग से व दूसरे दलित वर्ग से संबन्धित ) पार्टी छोड़ कर एक ऐसी पार्टी में शामिल हुये हैं जो फासिस्ट संगठन की ही सहायक है। उन दोनों को धनिक होने के कारण पार्टी में शामिल करके प्रत्याशी बनाया गया था लेकिन उनके प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। उनको हारने पर संकेत दे दिया गया था कि अगले चुनावों में उनको प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा अतः गैर-कम्युनिस्ट प्रवृति के वे लोग उखड़ गए। कर्णधारों का यह व्यवहार उपरोक्त टिप्पणियों पर अवलंबित रहा है। 

ढोंगियों को जवाब देने या उनसे जवाब मांगने की क्या ज़रूरत ?:

एथीस्ट वादी भी ढोंगियों-पाखंडियों-आडंबरकारियों की ही तरह 'अधर्म' को धर्म कहते हैं व सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे भी उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ रहे हैं। इसी कारण खुद को उग्र क्रांतिकारी कहने वाले एथीस्टों ने चुनाव बहिष्कार करके अथवा 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थक दलों का विरोध करके केंद्र में सांप्रदायिकता के रुझान वाली सरकार गठित करवा दी है जिसका खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना होगा। 

धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।



अध्यात्म =अध्यन+ आत्मा = अपनी आत्मा का अध्यन। 
देवता= जो देता है और लेता नहीं है ,जैसे-नदी,वृक्ष,पर्वत,आकाश,अन्तरिक्ष,अग्नि,जल,वायु आदि न कि जड़ मूर्तियाँ/चित्र आदि। 

भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी)+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I (अनल-अग्नि )+न (नीर-जल )। 

खुदा = चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी भी प्राणी ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 

GOD = G (जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय )। उत्पत्ति,पालन व संहार करने के कारण ही इनको GOD भी कहते हैं। 
देखिये कैसे?:
वायु +अन्तरिक्ष =  वात 

अग्नि  =पित्त

 भूमि + जल = कफ 

इन तीनों का समन्वय ही शरीर को धारण करता है 

वात +पित्त + कफ =भगवान=खुदा=GOD 

शरीर को धारण करने व समाज को धारण करने हेतु
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। 

क्या महर्षि कार्ल मार्क्स अथवा शहीद भगत सिंह जी ने कहीं कहा है कि साम्यवाद के अनुयाइयों को झूठ बोलना चाहिये,हिंसा ही करनी चाहिए,चोरी करना चाहिए,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा करना चाहिए और अनियंत्रित सेक्स करना चाहिए। यदि इन विद्वानों ने  ऐसा नहीं कहा है तो इनका नाम बदनाम करने के लिए 'एथीस्ट वादी' ही जिम्मेदार हैं। और इसी कारण रूस से भी साम्यवाद उखड़ा है। 

"येभ्यो माता ................................................................आदित्यां अनुमदा स्वस्तये " (ऋग्वेद मंडल १० /सूक्त ६३ में वर्णित इस मन्त्र के भवानी दयाल सन्यासी जी द्वारा किये काव्यानुवाद  पंक्ति:

ऋतू अनुकूल मेंह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे.
सुजला सुफला मातृ भूमि हो,मधुमय क्षीर पिलावे..

अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है. दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है.जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है.

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यग्य रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं.

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न  इन्द्रावरुणा रातहव्या। 
शमिन्द्रासोमा सुविताय शं यो :शं न  इन्द्रा पूष्णा वाजसतौ । ।

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की.

सर्वे भवन्तु सुखिन: ,सर्वे सन्तु निरामय :। 
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुखभाग भवेत॥ 
ऋग्वेद के अंतिम सूक्त के पांचवें इस  श्लोक  का काव्यानुवाद यह है---
सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान । 
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण । । 
हे ईश सब सुखी हों कोई न हो  दुखारी। 
सब हों निरोग भगवन धनधान्य के भण्डारी। । 
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों। 
दुखिया न कोई होवे सृष्टि में प्राणधारी । । 

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव  ही नहीं जीव-निर्जीव सभी सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं। 
यदि हम जनता के समक्ष इन सच्चाईयों को लेकर जाएँ तो जनता हमारा न केवल स्वागत व समर्थन करेगी बल्कि संसद से ढ़ोंगी-साम्राज्यवादी/संप्रदायवादी  लोगों को भी उखाड़ फेंकेगी।





धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।



अध्यात्म =अध्यन+ आत्मा = अपनी आत्मा का अध्यन। 

देवता= जो देता है और लेता नहीं है ,जैसे-नदी,वृक्ष,पर्वत,आकाश,अन्तरिक्ष,अग्नि,जल,वायु आदि न कि जड़ मूर्तियाँ/चित्र आदि। 

भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी)+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I (अनल-अग्नि )+न (नीर-जल )। 

खुदा = चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी भी प्राणी ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 

GOD = G (जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय )। उत्पत्ति,पालन व संहार करने के कारण ही इनको GOD भी कहते हैं। 
देखिये कैसे?:
वायु +अन्तरिक्ष =  वात 
अग्नि  =पित्त
 भूमि + जल = कफ 
इन तीनों का समन्वय ही शरीर को धारण करता है 

वात +पित्त + कफ =भगवान=खुदा=GOD 

शरीर को धारण करने व समाज को धारण करने हेतु
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। 

क्या महर्षि कार्ल मार्क्स अथवा शहीद भगत सिंह जी ने कहीं कहा है कि साम्यवाद के अनुयाइयों को झूठ बोलना चाहिये,हिंसा ही करनी चाहिए,चोरी करना चाहिए,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा करना चाहिए और अनियंत्रित सेक्स करना चाहिए। यदि इन विद्वानों से ऐसा नहीं कहा है तो इनका नाम बदनाम करने के लिए 'एथीस्ट वादी' ही जिम्मेदार हैं। और इसी कारण रूस से भी साम्यवाद उखड़ा है। 

एथीस्ट वादी भी ढोंगियों-पाखंडियों-आडमबरकारियों की ही तरह 'अधर्म' को धर्म कहते हैं व सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे भी उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ रहे हैं। इसी कारण खुद को उग्र क्रांतिकारी कहने वाले एथीस्टों ने चुनाव बहिष्कार करके अथवा 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थक दलों का विरोध करके केंद्र में सांप्रदायिकता के रुझान वाली सरकार गठित करवा दी है जिसका खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना होगा। 

ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी और एथीस्ट दोनों का ही हित तानाशाही में है दोनों की ही आस्था लोकतन्त्र में नहीं है और दोनों ही परस्पर अन्योनाश्रित हैं । एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही संभव नहीं है। दोनों ही 'सत्य ' उद्घाटित नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि अज्ञान ही उनका संबल है जागरूक जनता को वे दोनों ही उल्टे उस्तरे से मूढ़ नहीं सकेंगे। 
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Monday, 19 January 2015

समष्टिवाद-साम्यवाद-कम्यूनिज़्म पूर्णता: भारतीय अवधारणा है ----- विजय राजबली माथुर




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वर्तमान में उत्तर प्रदेश में संगठन को कुछ लोगों के निजी हितों के अनुकूल चलाया जा रहा है जिसका परिणाम गैर कम्युनिस्ट विचार धारा के लोगों को पार्टी प्रत्याशी बना दिया जाता है जो मतलब न सधने पर दूसरे ठिकाने पर पहुँच जाते हैं लेकिन जनता के बीच पार्टी की स्थिति हास्यास्पद बन जाती है।

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साम्यवाद अथवा वामपंथ के पुरोधा यह मानने को तैयार नहीं हैं कि यह मूलतः भारतीय अवधारणा है और वे विदेशी नक्शे-कदम चल कर इसे भारत में लागू करने की घोषणा तो करते हैं किन्तु खुद ही उन सिद्धांतों का पालन नहीं करते जिंनका उल्लेख अपने प्रवचनों में करते हैं। इसी वजह से जनता को प्रभावित करने में असमर्थ हैं और जिस दिन जाग जाएँगे और सही दिशा में चलने लगेंगे जनता छ्ल-छ्द्यम वालों को रसातल में पहुंचा कर उनके पीछे चलने लगेगी। लेकिन सबसे पहले साम्यवाद व वामपंथ के ध्वजावाहकों को अपनी सोच को 'सम्यक' बनाना होगा।


'एकला चलो रे' की तर्ज़ पर मैं अपना फर्ज़ निबहता रहता हूँ और मैंने आज की परिस्थितियों का आंकलन इसी ब्लाग पर पहले ही  दिया था जिसे हू-ब-हू पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ:
Sunday, September 18, 2011
बामपंथी कैसे सांप्रदायिकता का संहार करेंगे?
आज संघ और उसके सहायक संगठनों ने सड़कों पर लड़ाई का बिगुल बजा दिया है,बामपंथी अभी तक कागजी तोपें दाग कर सांप्रदायिकता का मुक़ाबला कर रहे हैं;व्यापक जन-समर्थन और प्रचार के बगैर क्या वे संघियों के सांप्रदायिक राक्षस का संहार कर सकेंगे?
भारत मे इस्लाम एक शासक के धर्म के रूप मे आया जबकि भारतीय धर्म आत्मसात करने की क्षमता त्याग कर संकीर्ण घोंघावादी हो चुका था। अतः इस्लाम और अनेक मत-मतांतरों मे विभक्त और अपने प्राचीन गौरव से भटके हुये यहाँ प्रचलित धर्म मे मेल-मिलाप न हो सका। शासकों ने भारतीय जनता का समर्थन प्राप्त कर अपनी सत्ता को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए इस्लाम का ठीक वैसे ही प्रचार किया जिस प्रकार अमीन सायानी सेरोडान की टिकिया का प्रचार करते रहे हैं। जनता के भोलेपन का लाभ उठाते हुये भारत मे इस्लाम के शासकीय प्रचारकों ने कहानियाँ फैलाईं कि,हमारे पैगंबर मोहम्मद साहब इतने शक्तिशाली थे कि,उन्होने चाँद के दो टुकड़े कर दिये थे। तत्कालीन धर्म और  समाज मे तिरस्कृत और उपेक्षित क्षुद्र व पिछड़े वर्ग के लोग धड़ाधड़ इस्लाम ग्रहण करते गए और सवर्णों के प्रति राजकीय संरक्षण मे बदले की कारवाइया करने लगे। अब यहाँ प्रचलित कुधर्म मे भी हरीश भीमानी जैसे तत्कालीन प्रचारकों ने कहानियाँ गढ़नी शुरू कीं और कहा गया कि,मोहम्मद साहब ने चाँद  के दो टुकड़े करके क्या कमाल किया?देखो तो हमारे हनुमान लला पाँच वर्ष की उम्र मे सम्पूर्ण सूर्य को रसगुल्ला समझ कर निगल गए थे---
"बाल समय रवि भक्षि लियौ तब तींन्हू लोक भयो अंधियारों।
............................ तब छाणि दियो रवि कष्ट निवारों। "
(सेरीडान  की तर्ज पर डाबर की सरबाइना जैसा सायानी को हरीश  भीमानी जैसा जवाब था यह कथन)
इस्लामी प्रचारकों ने एक और अफवाह फैलाई कि,मोहम्मद साहब ने आधी रोटी मे छह भूखों का पेट भर दिया था। जवाबी अफवाह मे यहाँ के धर्म के ठेकेदारों ने कहा तो क्या हुआ?हमारे श्री कृष्ण ने डेढ़ चावल मे दुर्वासा ऋषि और उनके साठ हजार शिष्यों को तृप्त कर दिया था। 'तर्क' कहीं नहीं था कुतर्क के जवाब मे कुतर्क चल रहे थे।
अभिप्राय यह कि,शासक और शासित के अंतर्विरोधों से ग्रसित इस्लाम और यहाँ के धर्म को जिसे इस्लाम वालों ने 'हिन्दू' धर्म नाम दिया के परस्पर उखाड़-पछाड़ भारत -भू पर करते रहे और ब्रिटेन के व्यापारियों की गुलामी मे भारत-राष्ट्र को सहजता से जकड़ जाने दिया। यूरोपीय व्यापारियों की गुलामी मे भारत के इस्लाम और हिन्दू दोनों के अनुयायी समान रूप से ही उत्पीड़ित हुये बल्कि मुसलमानों से राजसत्ता छीनने के कारण शुरू मे अंग्रेजों ने मुसलमानों को ही ज्यादा कुचला और कंगाल बना दिया।
ब्रिटिश दासता
साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने भारत की धरती और जन-शक्ति का भरपूर शोषण और उत्पीड़न किया। भारत के कुटीर उदद्योग -धंधे को चौपट कर यहाँ का कच्चा माल विदेश भेजा जाने लगा और तैयार माल लाकर भारत मे खपाया  जाने लगा। ढाका की मलमल का स्थान लंकाशायर और मेंनचेस्टर की मिलों ने ले लिया और बंगाल (अब बांग्ला देश)के मुसलमान कारीगर बेकार हो गए। इसी प्रकार दक्षिण भारत का वस्त्र उदद्योग तहस-नहस हो गया।
आरकाट जिले के कलेक्टर ने लार्ड विलियम बेंटिक को लिखा था-"विश्व के आर्थिक इतिहास मे ऐसी गरीबी मुश्किल से ढूँढे मिलेगी,बुनकरों की हड्डियों से भारत के मैदान सफ़ेद हो रहे हैं। "
सन सत्तावन की क्रान्ति
लगभग सौ सालों की ब्रिटिश गुलामी ने भारत के इस्लाम और हिन्दू धर्म के अनुयायीओ को एक कर दिया और आजादी के लिए बाबर के वंशज बहादुर शाह जफर के नेतृत्व मे हरा झण्डा लेकर समस्त भारतीयों ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति कर दी। परंतु दुर्भाग्य से भोपाल की बेगम ,ग्वालियर के सिंधिया,नेपाल के राणा और पंजाब के सिक्खों ने क्रान्ति को कुचलने मे साम्राज्यवादी अंग्रेजों का साथ दिया।
अंग्रेजों द्वारा अवध की बेगमों पर निर्मम अत्याचार किए गए जिनकी गूंज हाउस आफ लार्ड्स मे भी हुयी। बहादुर शाह जफर कैद कर लिया गया और मांडले मे उसका निर्वासित के रूप मे निधन हुआ। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई वीर गति को प्राप्त हुयी। सिंधिया को अंग्रेजों से इनाम मिला। असंख्य भारतीयों की कुर्बानी बेकार गई।
वर्तमान सांप्रदायिकता का उदय
सन 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों को बता दिया कि भारत के मुसलमानों और हिंदुओं को लड़ा कर ही ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित  रखा जा सकता है। लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य का सेफ़्टी वाल्व कांग्रेस राष्ट्र वादियों  के कब्जे मे जाने लगी थी। बाल गंगाधर 'तिलक'का प्रभाव बढ़ रहा था और लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल के सहयोग से वह ब्रिटिश शासकों को लोहे के चने चबवाने लगे थे। अतः 1905 ई मे हिन्दू और मुसलमान के आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया गया । हालांकि बंग-भंग आंदोलन के दबाव मे 1911 ई मे पुनः बंगाल को एक करना पड़ा परंतु इसी दौरान 1906 ई मे ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को फुसला कर मुस्लिम लीग नामक सांप्रदायिक संगठन की स्थापना करा दी गई और इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप 1920 ई मे हिन्दू महा सभा नामक दूसरा सांप्रदायिक संगठन भी सामने आ गया। 1932 ई मे मैक्डोनल्ड एवार्ड के तहत हिंदुओं,मुसलमानों,हरिजन और सिक्खों के लिए प्रथक निर्वाचन की घोषणा की गई। महात्मा गांधी के प्रयास से सिक्ख और हरिजन हिन्दू वर्ग मे ही रहे और 1935 ई मे सम्पन्न चुनावों मे बंगाल,पंजाब आदि कई प्रान्तों मे लीगी सरकारें बनी और व्यापक हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैलते चले गए।

बामपंथ का आगमन
1917 ई मे हुयी रूस मे लेनिन की क्रान्ति से प्रेरित होकर भारत के राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर मे 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी'की स्थापना करके पूर्ण स्व-राज्य के लिए क्रांतिकारी आंदोलन शुरू कर दिया और सांप्रदायिकता को देश की एकता के लिए घातक बता कर उसका विरोध किया। कम्यूनिस्टों से राष्ट्रवादिता मे पिछड्ता पा कर 1929 मे लाहौर अधिवेन्शन मे जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस का लक्ष्य भी पूर्ण स्वाधीनता घोषित करा दिया। अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग,हिन्दू महासभा के सैन्य संगठन आर एस एस (जो कम्यूनिस्टों का मुकाबिला करने के लिए 1925 मे ही अस्तित्व मे आया) और कांग्रेस के नेहरू गुट को प्रोत्साहित किया एवं कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया । सरदार भगत सिंह जो कम्यूनिस्टों के युवा संगठन 'भारत नौजवान सभा'के संस्थापकों मे थे भारत मे समता पर आधारित एक वर्ग विहीन और शोषण विहीन समाज की स्थापना को लेकर अशफाक़ उल्ला खाँ व राम प्रसाद 'बिस्मिल'सरीखे साथियों के साथ साम्राज्यवादियों से संघर्ष करते हुये शहीद हुये सदैव सांप्रदायिक अलगाव वादियों की भर्तस्ना करते रहे।
वर्तमान  सांप्रदायिकता
1980 मे संघ के सहयोग से सत्तासीन होने के बाद इंदिरा गांधी ने सांप्रदायिकता को बड़ी बेशर्मी से उभाड़ा। 1980 मे ही जरनैल सिंह भिंडरावाला के नेतृत्व मे बब्बर खालसा नामक घोर सांप्रदायिक संगठन खड़ा हुआ जिसे इंदिरा जी का आशीर्वाद पहुंचाने खुद संजय गांधी और ज्ञानी जैल सिंह पहुंचे थे। 1980 मे ही संघ ने नारा दिया-भारत मे रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा जिसके जवाब मे काश्मीर मे प्रति-सांप्रदायिकता उभरी कि,काश्मीर मे रहना होगा तो अल्लाह -अल्लाह कहना होगा। और तभी से असम मे विदेशियों को निकालने की मांग लेकर हिंसक आंदोलन उभरा।
पंजाब मे खालिस्तान की मांग उठी तो काश्मीर को अलग करने के लिए धारा 370 को हटाने की मांग उठी और सारे देश मे एकात्मकता यज्ञ के नाम पर यात्राएं आयोजित करके सांप्रदायिक दंगे भड़काए। माँ की गद्दी पर बैठे राजीव गांधी ने अपने शासन की विफलताओं और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने हेतु संघ की प्रेरणा से अयोध्या मे विवादित रामजन्म भूमि/बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर हिन्दू सांप्रदायिकता एवं मुस्लिम वृध्दा शाहबानों को न्याय से वंचित करने के लिए संविधान मे संशोधन करके मुस्लिम सांप्रदायिकता को नया बल प्रदान किया।
बामपंथी कोशिश
भारतीय कम्यूनिस्ट,मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट,क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी और फारवर्ड ब्लाक के 'बामपंथी मोर्चा'ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध व्यापक जन-अभियान चलाया । बुद्धिजीवी और विवेकशील  राष्ट्र वादी  सांप्रदायिक सौहार्द के प्रबल पक्षधर हैं,परंतु ये सब संख्या की दृष्टि से अल्पमत मे हैं,साधनों की दृष्टि से विप्पन  हैं और प्रचार की दृष्टि से बहौत पिछड़े हुये हैं। पूंजीवादी प्रेस बामपंथी सौहार्द के अभियान को वरीयता दे भी कैसे सकता है?उसका ध्येय तो व्यापारिक हितों की पूर्ती के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को सबल बनाना है। अपने आदर्शों और सिद्धांतों के बावजूद बामपंथी अभियान अभी तक बहुमत का समर्थन नहीं प्राप्त कर सका है जबकि,सांप्रदायिक शक्तियाँ ,धन और साधनों की संपन्नता के कारण अलगाव वादी प्रवृतियों को फैलाने मे सफल रही हैं।
सड़कों पर दंगे
अब सांप्रदायिक शक्तियाँ खुल कर सड़कों पर वैमनस्य फैला कर संघर्ष कराने मे कामयाब हो रही हैं। इससे सम्पूर्ण विकास कार्य ठप्प हो गया है,देश के सामने भीषण आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है । मंहगाई सुरसा की तरह बढ़ कर सांप्रदायिकता के पोषक पूंजीपति वर्ग का हित-साधन कर रही है। जमाखोरों,सटोरियों और कालाबाजारियों की पांचों उँगलियाँ घी मे हैं। अभी तक बामपंथी अभियान नक्कार खाने मे तूती की आवाज की तरह चल रहा है। बामपंथियों ने सड़कों पर निपटने के लिए कोई 'सांप्रदायिकता विरोधी दस्ता' गठित नहीं किया है। अधिकांश जनता अशिक्षित और पिछड़ी होने के कारण बामपंथियों के आदर्शवाद के मर्म को समझने मे असमर्थ है और उसे सांप्रदायिक शक्तियाँ उल्टे उस्तरे से मूंढ रही हैं।
दक्षिण पंथी तानाशाही का भय
वर्तमान (1991 ) सांप्रदायिक दंगों मे जिस प्रकार सरकारी मशीनरी ने एक सांप्रदायिकता का पक्ष लिया है उससे अब संघ की दक्षिण पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित होने का भय व्याप्त हो गया है। 1977 के सूचना व प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी ने आकाशवाणी व दूर दर्शन मे संघ की कैसी घुसपैठ की है उसका हृदय विदारक उल्लेख सांसद पत्रकार संतोष भारतीय ने वी पी सरकार के पतन के संदर्भ मे किया है। आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया ताज़ी घटना है।
पुलिस और ज़िला प्रशासन मजदूर के रोजी-रोटी के हक को कुचलने के लिए जिस प्रकार पूंजीपति वर्ग का दास बन गया है उससे संघी तानाशाही आने की ही बू मिलती है।
बामपंथी असमर्थ
वर्तमान परिस्थितियों का मुक़ाबला करने मे सम्पूर्ण बामपंथ पूरी तरह असमर्थ है। धन-शक्ति और जन-शक्ति दोनों ही का उसके पास आभाव है। यदि अविलंब सघन प्रचार और संपर्क के माध्यम से बामपंथ जन-शक्ति को अपने पीछे न खड़ा कर सका तो दिल्ली की सड़कों पर होने वाले निर्णायक युद्ध मे संघ से हार जाएगा जो देश और जनता के लिए दुखद होगा।

परंतु बक़ौल स्वामी विवेकानंद -'संख्या बल प्रभावी नहीं होता ,यदि मुट्ठी भर लोग मनसा- वाचा-कर्मणा संगठित हों तो सारे संसार को उखाड़ फेंक सकते हैं। 'आदर्शों को कर्म मे उतार कर बामपंथी संघ का मुक़ाबला कर सकते हैं यदि चाहें तो!वक्त अभी निकला नहीं है।

परंतु बक़ौल स्वामी विवेकानंद -'संख्या बल प्रभावी नहीं होता ,यदि मुट्ठी भर लोग मनसा- वाचा-कर्मणा संगठित हों तो सारे संसार को उखाड़ फेंक सकते हैं। 'आदर्शों को कर्म मे उतार कर बामपंथी संघ का मुक़ाबला कर सकते हैं यदि चाहें तो!वक्त अभी निकला नहीं है।

http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post_18.html


लगभग 12 (अब  32)  वर्ष पूर्व सहारनपुर के 'नया जमाना'के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1952 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व .लिंमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्यूनिस्टों और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।

भारत विविधता मे एकता वाला एक अनुपम राष्ट्र है। विभिन्न भाषाओं,पोशाकों,आचार-व्यवहार आदि के उपरांत भी भारत अनादी  काल से एक ऐसा राष्ट्र रहा है जहां आने के बाद अनेक आक्रांता यहीं के होकर रह गए और भारत ने उन्हें आत्मसात कर लिया। यहाँ का प्राचीन आर्ष धर्म हमें "अहिंसा परमों धर्मा : "और "वसुधेव कुटुम्बकम" का पाठ पढ़ाता रहा है। नौवीं सदी के आते-आते भारत के व्यापक और सहिष्णू स्वरूप को आघात लग चुका था। यह वह समय था जब इस देश की धरती पर बनियों और ब्राह्मणों के दंगे हो रहे थे। ब्राह्मणों ने धर्म को संकुचित कर घोंघावादी बना दिया था । सिंधु-प्रदेश के ब्राह्मण आजीविका निर्वहन के लिए समुद्री डाकुओं के रूप मे बनियों के जहाजों को लूटते थे। ऐसे मे धोखे से अरब व्यापारियों को लूट लेने के कारण सिंधु प्रदेश पर गजनी के शासक महमूद गजनवी ने बदले की  लूट के उद्देश्य से अनेकों आक्रमण किए और सोमनाथ को सत्रह बार लूटा। महमूद अपने व्यापारियों की लूट का बदला जम कर लेना चाहता था और भारत मे उस समय बैंकों के आभाव मे मंदिरों मे जवाहरात के रूप मे धन जमा किया जाता था। प्रो नूरुल हसन ने महमूद को कोरा लुटेरा बताते हुये लिखा है कि,"महमूद वाज ए डेविल इन कार्नेट फार दी इंडियन प्यूपिल बट एन एंजिल फार हिज गजनी सबजेक्ट्स"। महमूद गजनवी न तो इस्लाम का प्रचारक था और न ही भारत को अपना उपनिवेश बनाना चाहता था ,उसने ब्राह्मण लुटेरों से बदला लेने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र मे व्यापक लूट-पाट की । परंतु जब अपनी फूट परस्ती के चलते यहीं के शासकों ने गोर के शासक मोहम्मद गोरी को आमंत्रित किया तो वह यहीं जम गया और उसी के साथ भारत मे इस्लाम का आगमन हुआ।
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मेरा आज भी सुदृढ़ अभिमत है कि यदि कम्युनिस्ट -वामपंथी जनता को 'धर्म' का मर्म समझाएँ और बताएं कि जिसे धर्म कहा जा रहा है वह तो वास्तव में अधर्म है,ढोंग,पाखंड,आडंबर है जिसका उद्देश्य साधारण जनता का शोषण व उत्पीड़न करना है तो कोई कारण नहीं है कि जनता वस्तु-स्थिति को न समझे।लेकिन जब ब्राह्मणवादी-पोंगापंथी जकड़न से खुद कम्युनिस्ट-वामपंथी निकलें तभी तो जनता को समझा सकते हैं? वरना धर्म का विरोध करके व एथीस्ट होने का स्वांग करके उसी पाखंड-आडम्बर-ढोंगवाद को अपनाते रह   कर तो जनता को अपने पीछे लामबंद नहीं किया जा सकता है।
परमात्मा  या प्रकृति के लिए सभी प्राणी व मनुष्य समान हैं और उसकी ओर से  सभी को जीवन धारण हेतु समान रूप से वनस्पतियाँ,औषद्धियाँ,अन्न,खनिज आदि-आदि बिना किसी भेद-भाव के  निशुल्क उपलब्ध हैं। अतः इस जगत में एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण करना परमात्मा व प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है और इसी बात को उठाने वाले दृष्टिकोण को समष्टिवाद-साम्यवाद-कम्यूनिज़्म कहा जाता है और यह पूर्णता: भारतीय अवधारणा है। आधुनिक युग में जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने इस दृष्टिकोण को पूर्ण वैज्ञानिक ढंग से पुनः प्रस्तुत किया है। 'कृणवन्तो विश्वमार्यम' का अभिप्राय है कि समस्त विश्व को आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ बनाना है और यह तभी हो सकता है जब प्रकृति के नियमानुसार आचरण हो। कम्युनिस्ट प्रकृति के इस आदि नियम को लागू करके समाज में व्याप्त मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने हेतु 'उत्पादन' व 'वितरण' के साधनों पर समाज का अधिकार स्थापित करना चाहते हैं। इस आर्ष व्यवस्था का विरोध शासक,व्यापारी और पुजारी वर्ग मिल कर करते हैं वे अल्पमत में होते हुये भी इसलिए कामयाब हैं कि शोषित-उत्पीड़ित वर्ग परस्परिक फूट में उलझ कर शोषकों की चालों को समझ नहीं पाता है। उसे समझाये कौन? कम्युनिस्ट तो खुद को 'एथीस्ट' और धर्म-विरोधी सिद्ध करने में लगे रहते हैं। 

काश सभी बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्तियाँ  दीवार पर लिखे को पढ़ें और  यथार्थ को समझें और जनता को समझाएँ तो अभी भी शोषक-उत्पीड़क-सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। लेकिन जब धर्म को मानेंगे नहीं अर्थात 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन नहीं करेंगे 'एथीस्ट वाद' की जय बोलते हुये ढोंग-पाखंड-आडंबर को प्रोत्साहित करते रहेंगे अपने उच्च सवर्णवाद के कारण तब तो कम्यूनिज़्म को पाकर भी रूस की तरह खो देंगे या चीन की तरह स्टेट-कम्यूनिज़्म में बदल डालेंगे।
http://krantiswar.blogspot.in/2014/05/blog-post_22.html