Showing posts with label अरविंद राज स्वरूप. Show all posts
Showing posts with label अरविंद राज स्वरूप. Show all posts

Monday, 2 October 2017

वैदिक मत में साम्यवाद - कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है ------ विजय राजबली माथुर

भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं - भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है. 






वस्तुतः भारत में कम्यूनिज़्म को जातिवाद की समस्या पर ध्यान न देते हुये और रूसी नेताओं की सलाह को भी ठुकराते हुये केवल आर्थिक आधार पर वर्ग - संघर्ष की अवधारणा को साकार करने का राग अलापते हुये एक दक़ियानूसी ढंग से लागू करने की कोशिशें हुईं और समय की नज़ाकत तथा जनता की नब्ज़ को पहचानने की कोई ज़रूरत नहीं समझी गई जिसका दुष्परिणाम है जनता का सहयोग न प्राप्त कर पाना। कामरेड सुभाषिणी भी सच बोलने के नाम पर सच छिपाती रहीं। 1964 में CPI का विभाजन कर CPM के गठन का कारण पार्टी को ब्राह्मण वादी नेतृत्व में उलझाए रखना था। इसी कारण फिर 1967 में CPM का भी विभाजन हुआ और आज तो केले के तने की भांति अनेकानेक कम्युनिस्ट दल हैं और लगभग सभी का नेतृत्व ब्राह्मणों या ब्राह्मण वादियों के हाथों में है जो चाहते हैं कि, obc व sc कामरेड्स से काम तो लिया जाये लेकिन उनको पद न दिये जाएँ। इसी कारण तमाम कामरेड्स सपा और बसपा, राजद,जद(यू ) आदि में चले गए जिससे कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठन कमजोर होता रहा लेकिन इनका नेतृत्व इसलिए आत्म - मुग्ध रहा कि, नेतृत्व ब्राह्मण वाद के अधीन रहा। शीर्ष कम्युनिस्ट नेतृत्व खुद में सांप्रदायिक मनोवृत्ति का होने के कारण जातिवाद के उन्मूलन अथवा obc / sc कामरेड्स के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करना चाहता जिस कारण साधारण जनता को जागरूक भी नहीं करता और वह भटक कर सांप्रदायिक / पूंजीवादी दलों को मजबूत कर देती है जो कारपोरेट घरानों के भले की योजनाएँ बनाते हैं, जन - कल्याण कारी नहीं। 
रूस में साम्यवाद के पतन का कारण भी गलत ढंग से लागू किया जाना था और चीन में तो आज साम्यवाद के नाम पर State capitalism ही चल रहा है।  
            *****                                                               *****                                                            *****

Ashwani Srivastava
पिछले तीन दिन से मास्को शहर घूम रहा हूँ । पर मेरा जो विशेष मक़सद था वह है यहाँ रूस के साम्यवाद को समझना , साम्यवाद के पतन के कारणों को समझना । मैने जो कुछ भी समझा , उसे आपसे साझा करने की शुरुआत कर रहा हूँ । किश्त जारी रहेगी - 
आदमी की बेसिक आवश्यकता होती है रोटी कपड़ा और मकान । सोवियत संघ की साम्यवादी सरकार ने इसकी ब्यवस्था की । 1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद स्टालिन सत्ता में आये । उसने सोवियत संघ में ज़बरदस्त औद्योगीकरण करवाया और केंद्रीय आर्थिक व्यवस्था बनाई। कृषि और अन्य व्यवसायों का सामूहिकीकरण किया गया, यानि खेत किसानों की निजी संपत्ति न होकर राष्ट्र की संपत्ति हो गए । सन ८२ में जे एन यू से रूसी भाषा पढ़ने आये रामेश्वर सिंह , जो आजकल हिंदी रूसी भाषा मैत्री संघ के अध्यक्ष भी है , बताते है कि उस समय सबके पास मकान थे , स्टोर से हम लोग कपड़े ले आते थे , लगभग ९० रूबल स्टाइपेंट भी मिलता था जो महीने भर ठीक ठाक खाने पीने के लिये पर्याप्त था । लगता था कि साम्यवादी सरकार से बेहतर कुछ है ही नहीं । यही बात हमारे मेज़बान पप्पू जी भी बताते है । बताते है कि ९० रूबल से लेकर १५० रूबल तक ज्यादातर लोगो को स्टाइपेंट मिलता था । बचपन से ही किसे क्या पढ़ना है , तय कर दिया जाता था और विद्यार्थियों को किसी फैक्ट्री से सम्बद्ध कर दिया जाता था जो उसकी पढाई का बोझ उठाने लगता था । लोग खुस थे , मस्त थे । जरूरत के मुताबिक़ सबको मकान मिला था । सभी को स्टोर से कपड़े मिलते थे । सामूहिक खेती होती थी , उत्पादन होते थे । सोवियत रूस दुनिया की एक ताकत थी । सोवियत रूस के पास इतनी सम्पन्नता तो थी ही कि वह दुनिया में अपने खेमे के तमाम देशों की मदद करते हुये , उन्हे कड़े पहरे में रखने मे सफल था । शीत युद्ध के दौरान अमेरिका से प्रतिस्पर्धा चली जिसमें सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी क्षेत्रों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी।गुटनिरपेक्ष भारत मे भी ज्यादातर भारी उद्योग सोवियत रूस ने लगवाये थे । अंतरिक्ष में अमेरिका से आगे पहुँचे थे । भारी उद्योग लगाने में, मिसाइले , लड़ाकू जहाज़ , टैंक आदि बनाने में बहुत माहिर हो गये थे । एक तरह से बहुत आत्मसंतुष्ठ थे रूसी । भारत से दोस्ती परवान पर चढ़ी थी । ७१ मे बंगलादेश को स्वतंत्र कराने मे सोवियत रूस की भूमिका भी बहुत सराहनीय थी । हां सोवियत रूस कड़े पहरे ( iron curtains) मे था । बाहरी दुनिया के लोगो को सामंती दृष्टिकोण वाला मानते हुये शंका की दृष्टि से देखा जाता था और यह भी कहीं ये लोग सोवियत रूस के लोगो को बरगला न दे ।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=786422318197132&id=100004881137091

*****                                                               *****                                                            *****


Saturday, May 14, 2011
भारत में कम्युनिज्म कैसे कामयाब हो ?
वैदिक मत के अनुसार मानव कौन ?

त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,
भद्र भावना-भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन'है.
होता व्यय नित-प्रति पर -हित में,जिसका शुची संचित 'धन'है,
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है.


इसी को आधार मान कर महर्षि कार्ल मार्क्स द्वारा  साम्यवाद का वह सिद्धान्त प्रतिपादित  किया गया जिसमें मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने का मन्त्र बताया गया है. वस्तुतः मैक्स मूलर सा : हमारे देश से जो संस्कृत की मूल -पांडुलिपियाँ ले गए थे और उनके जर्मन अनुवाद में जिनका जिक्र था महर्षि कार्ल मार्क्स ने उनके गहन अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाले थे उन्हें 'दास कैपिटल' में लिपिबद्ध किया था और यही ग्रन्थ सम्पूर्ण विश्व में कम्यूनिज्म  का आधिकारिक स्त्रोत है.स्वंय मार्क्स महोदय ने इन सिद्धांतों को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार लागू करने की बात कही है ;परन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें लागू करते समय इस देश की परिस्थितियों को नजर-अंदाज कर दिया गया जिसका यह दुष्परिणाम है कि हमारे देश में कम्यूनिज्म को विदेशी अवधारणा मान कर उसके सम्बन्ध में दुष्प्रचार किया गया और धर्म-भीरु जनता के बीच इसे धर्म-विरोधी सिद्ध किया जाता है.जबकि धर्म के तथा-कथित ठेकेदार खुद ही अधार्मिक हैं परन्तु हमारे कम्यूनिस्ट साथी इस बात को कहते एवं बताते नहीं हैं.नतीजतन जनता गुमराह होती एवं भटकती रहती है तथा अधार्मिक एवं शोषक-उत्पीडक लोग कामयाब हो जाते हैं.आजादी के ६३( अब 2017 में 70 ) वर्ष एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन की स्थापना के ८६ (अब 2017 में 92 ) वर्ष बाद भी सही एवं वास्तविक स्थिति जनता के समक्ष न आ सकी है.मैंने अपने  ब्लॉग 'क्रान्तिस्वर' के माध्यम से ढोंग,पाखण्ड एवं अधार्मिकता का पर्दाफ़ाश  करने का अभियान चला रखा है जिस पर आर.एस.एस.से सम्बंधित लोग तीखा प्रहार करते हैं परन्तु एक भी बामपंथी या कम्यूनिस्ट साथी ने उसका समर्थन करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है.'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता '  परन्तु कवीन्द्र रवीन्द्र के 'एक्ला चलो रे ' के तहत मैं लगातार लोगों के समक्ष सच्चाई लाने का प्रयास कर रहा हूँ -'दंतेवाडा त्रासदी समाधान क्या है?','क्रांतिकारी राम','रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','सीता की कूटनीति का कमाल','सर्वे भवन्तु सुखिनः','पं.बंगाल के बंधुओं से एक बे पर की उड़ान','समाजवाद और वैदिक मत','पूजा क्या?क्यों?कैसे?','प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है -यह दुनिया अनूठी है' ,समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स,१८५७ की प्रथम क्रान्ति आदि अनेक लेख मैंने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित अभिमत के अनुसार प्रस्तुत किये हैं जो संतों एवं अनुभवी विद्वानों के वचनों पर आधारित हैं.

मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.कविवर नन्द लाल जी यही कहते हैं :-

जिस नर में आत्मिक शक्ति है ,वह शीश झुकाना क्या जाने?
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है वह पाप कमाना क्या जाने?
माँ -बाप की सेवा करते हैं ,उनके दुखों को हरते हैं.
वह मथुरा,काशी,हरिद्वार,वृन्दावन जाना क्या जाने?
दो काल करें संध्या व हवन,नित सत्संग में जो जाते हैं.
भगवान् का है विशवास जिन्हें दुःख में घबराना क्या जानें?
जो खेला है तलवारों से और अग्नि के अंगारों से .
रण- भूमि में पीछे जा के वह कदम हटाना क्या जानें?
हो कर्मवीर और धर्मवीर वेदों का पढने वाला हो .
वह निर्बल दुखिया बच्चों पर तलवार चलाना क्या जाने?
मन मंदिर में भगवान् बसा जो उसकी पूजा करता है.
मंदिर के देवता पर जाकर वह फूल चढ़ाना क्या जानें?
जिसका अच्छा आचार नहीं और धर्म से जिसको प्यार नहीं.
जिसका सच्चा व्यवहार नहीं 'नन्दलाल' का गाना क्या जानें?


संत कबीर आदि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद आदि महा पुरुषों ने धर्म की विकृतियों तथा पाखंड का जो पर्दाफ़ाश किया है उनका सहारा लेकर भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं - भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है. 

http://krantiswar.blogspot.in/2011/05/blog-post_14.html


************************************************
Facebook Comments : 

Sunday, 28 June 2015

पहचान के संकट से जूझ रहा है- कम्युनिस्ट पार्टी की तरह --------- डॉ गिरीश




*****युवा दृष्टिकोण :
*2012 मथुरा विधानसभा क्षेत्र :
**2012 में उत्तर-प्रदेश विधानसभा के  चुनाव लड़े भाकपा प्रतियाशियों के प्राप्त मत :
***14 may 2015 रास्ता रोको अभियान :
***

 **अपने ब्लाग-पोस्ट में रामचन्द्र गुहा साहब के एक लेख को उद्दृत करते हुये मैंने अंतिम अनुच्छेद में लिखा था :

Friday, June 26, 2015


एमर्जेंसी 26 जून 1975 की ---

"रामचन्द्र गुहा साहब ने उचित रूप से ही कांग्रेस व भाजपा को आपातकाल लगाने वालों से युक्त बताया है। मुलायम,लालू व नीतीश की पार्टियों को भी जे पी के रास्ते से भटका बता कर सही बात कही है। शेष बचते हैं साम्यवादी-वामपंथी दल उनमें भी कुछ कांग्रेस के साथ थे। आज के संन्दर्भ में फासीवाद की तलवार सिर पर लटकने के बावजूद वे ठोस मोर्चा बना कर जनता को अपने पीछे लामबंद करने में तब तक असमर्थ रहेंगे जब तक सामाजिक स्तर पर ब्राह्मणवाद से टकराना नहीं चाहेंगे। विभिन्न साम्यवादी दलों में ब्राह्मणों का प्रभाव व अस्तित्व देखते हुये अभी तो उनके ब्राह्मणवाद के विरुद्ध उठ खड़े होने की कोई संभावना नहीं है जो उन फासीवादी शक्तियों के लिए टानिक का काम कर रही है जो कि संविधान व लोकतन्त्र को नष्ट करने की दिशा में कदम उठा चुकी हैं।"  
http://krantiswar.blogspot.in/2015/06/26-1975.html

इस पर एक युवा कम्युनिस्ट ने घोर आपत्ति की थी कि कम्युनिस्ट विरोधी गुहा साहब का कथन क्यों उद्धृत किया गया जबकि हिन्दी के वृद्ध विद्वान की टिप्पणी यह थी: 
("विभिन्न साम्यवादी दलों में ब्राह्मणों का प्रभाव व अस्तित्व देखते हुये अभी तो उनके ब्राह्मणवाद के विरुद्ध उठ खड़े होने की कोई संभावना नहीं है" अभी नहीं प्रारंभ से इनका प्रभुत्व रहा है और इनके प्रभुत्व के कारण ही साम्यवादी आंदोलन अपने अपेक्षित लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सका|)

इस पर मुझे यह लिखना पड़ा : 
अक्सर अपने ब्लाग-पोस्ट के समर्थन में किसी विद्वान के द्वारा व्यक्त विचारों वाला लेख स्कैन कटिंग के रूप में लगा देते हैं। सम्पूर्ण विवरण ब्लाग में ही होता है जिसे पढे बगैर सिर्फ फेसबुक लिंक को देख कर कुछ उतावले लोग असंदर्भित टिप्पणियाँ कर देते हैं उंनका जवाब देना मेरे लिए जरूरी नहीं है।

 परंतु मेरा कहना यह है कि भले ही रामचन्द्र गुहा कम्यूनिज़्म के विरोधे हों और उनका लेख हमारे पक्ष के लिए नहीं लिखा गया हो एक कम्युनिस्ट के नाते हम क्यों न उनके लेख का अपने हक में स्तेमाल कर लें। इसी वजह से उनके लेख को अपने ब्लाग पोस्ट के समर्थन में लिया है। खेद इस बात का है कि खुद कम्युनिस्ट लोग ही इसकी आलोचना करके अपने विरोधियों का उत्साह वर्द्धन करने लगे हैं। 
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/902430993152211?pnref=story
 कहा तो यह जाता है कि संकट के समय परस्पर संघर्षरत लोग एकजुट हो जाते हैं। लेकिन  जब फ़ासिज़्म की ओर तेज़ी से बढ़ रही सरकार निरंतर जन-विरोधी कार्यों में संलग्न है विभिन्न वामपंथी गुट ऊपरी एकता की बातें एक ओर करते तो हैं लेकिन भीतरी तौर पर अपने ही लोगों को काटने में मशगूल भी हैं। इस संबंध में लखनऊ नगर के एक विद्वान का कहना है कि ऊपर के वामपंथी नेता भीतर-भीतर मोदी सरकार को ही मजबूत करने में लगे हैं उनको जनवाद और जनता से उतना ही सरोकार है जितना प्रदर्शनों में भीड़ जुटाने की ज़रूरत है। केवल और केवल आर्थिक लड़ाई द्वारा साम्यवाद नहीं स्थापित किया जा सकता है जब तक कि जनता के सामाजिक सरोकारों को न समझा जाये और सामाजिक -विषमता को दूर करने का प्रयास न किया जाये। और  जबकि वामपंथी नेतृत्व भी उच्च सामाजिक वर्ग से संबन्धित है यह कैसे संभव है?
------(विजय राजबली माथुर )
*******************************************************************************
Comments on Facebook :



Friday, 26 September 2014

डॉ गिरीश से लखनऊ में भेंट की पाँचवीं वर्षगांठ पर विशेष -----विजय राजबली माथुर





आगरा से लखनऊ आने के बाद मैंने भाकपा कार्यालय,क़ैसर बाग जाकर डॉ गिरीश साहब  से मिलने के प्रयत्न कई बार किए किन्तु वह अक्सर टूर पर होते थे और कामरेड अशोक मिश्रा जी भी नहीं मिल पाये थे। मैं आगरा से ही इन दोनों नेताओं से ही परिचित था तथा लखनऊ के और कामरेड्स से अनभिज्ञ था।किन्तु 25 सितंबर 2010 को मुझे लखनऊ में डॉ गिरीश साहब से भेंट करने का सुअवसर मिल ही गया और उन्होने पहचान भी लिया तथा लगभग तीन घंटे का समय मुझसे बात-चीत करने में व्यय  भी किया। इसी दौरान महिला फेडरेशन की वरिष्ठ नेत्री कामरेड आशा मिश्रा जी का भी आगमन हुआ और डॉ साहब ने उनसे भी मेरा परिचय करवाया जबकि वरिष्ठ नेता कामरेड अशोक मिश्रा जी से पूर्व परिचित था ही।

नितांत व्यक्तिगत आधार पर हुई इस भेंट में डॉ साहब ने यह भी बताया था कि यहाँ लखनऊ में उनकी बीमारी के चलते साथी कामरेड्स उनसे घृणा करते हैं तथा उनको सहयोग नहीं करते हैं। मेरा यहाँ निवास नौ किलो मीटर दूर होने के बावजूद कभी-कभी उनसे मिलते रहने को उन्होने मुझसे  कहा जिसका पालन मैंने अक्सर ही किया क्योंकि  पूर्व परिचय रहने तथा उनकी व्यथा सुनने के बाद उनसे व्यतिगत रूप से सहानुभूति भी मुझे हो गई थी।

डॉ साहब ने 'पार्टी जीवन' अखबार के लिए प्रधान संपादक की हैसियत से उनको  सहयोग करने को मुझसे 2011 में कहा मैं तो उनके आदेश का पालन करने को तत्पर था किन्तु कार्यकारी संपादक को ठीक न लगा। AISF की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर भी डॉ साहब के निर्देश पर मैं लगातार पार्टी कार्यालय जाता रहा और इस बात का ज़िक्र उन्होने समापन गोष्ठी में मेरे नाम का भी उल्लेख उनको सहयोग देने वालों की सूची में जोड़ कर किया। 

मई 2013 में एक बार फिर डॉ साहब ने 'पार्टी जीवन' हेतु मेरी सेवाएँ लेने की बात कही और इस बार उन्होने पुराने कंप्यूटर की मरम्मत करवाकर मुझे कार्य करने हेतु उपलब्ध करा दिया। तमाम दूसरे लोगों को भी बुरा लगा हो सकता है किन्तु कार्यकारी संपादक को  मैं उनका प्रतिद्वंदी नज़र आने लगा कि कहीं उनसे कार्य छीनने की डॉ साहब की चाल तो नहीं है जबकि ऐसा था नहीं क्योंकि एक बार खुद डॉ साहब ने उनको कहा था कि तुमको 'हैंड ' की ज़रूरत थी तुमको 'हैंड' दे दिये हैं।लेकिन उस शख्स को किसी ईमानदार आदमी की ज़रूरत नहीं थी जो डॉ साहब ने मेरे रूप में उनको सुपुर्द किया था। उस शख्स का मुझसे शुरू -शुरू में ही यह  कहना था  कि यहाँ (पार्टी कार्यालय ) में हर एक का कमीशन तय है और हर काम में लोग अपना कमीशन लेते हैं जबकि मैं तो जिस प्रकार आगरा में पार्टी हित में अपनी सेवाएँ देता था उसी अनुरूप प्रदेश कार्यालय के लिए भी कर रहा था। अतः  कार्यकारी संपादक के लिए बाधक व अनफ़िट था। बीच में कार्यकारी संपादक ने एक और पाँसा फेंकते हुये डॉ साहब से मुझे पार्टी की ओर से 'वेज' लेने का प्रस्ताव दिलाया परंतु मैंने डॉ साहब को स्पष्ट कह दिया कि आपके आदेश का अनुपालन करने हेतु एक कार्यकर्ता की हैसियत से योगदान कर रहा हू और निशुल्क सेवाएँ देता रहूँगा। परंतु का .स . को ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो पैसा लेकर दब कर गलत कार्य कर सके अतः मुझे परेशान करने  हेतु  13 जूलाई 2013 की पार्टी ज़िला काउंसिल की बैठक में उसने  अपने एक निष्क्रिय मित्र के सहायक के रूप में मुझसे कार्य कराने का प्रस्ताव डॉ साहब से रखवाया और उसे स्वीकार करने हेतु व्यक्तिगत रूप से मेरे पैरों पर अपने पैरों से प्रहार किया । 

बैठक के तुरंत बाद डॉ साहब से कामरेड अतुल अंजान साहब की उपस्थिति में मैंने उसके मित्र का सहायक बनने से स्पष्ट इंकार कर दिया व उसके बाद से 'पार्टी जीवन' के लिए भी कार्य करना छोड़ दिया। तब से वह शख्स मुझे अपना निजी दुश्मन  मान कर लगातार विभिन्न तरीकों से परेशान करता आ रहा है। एक तो खुद को 'एथीस्ट ' घोषित करता है दूसरी ओर कंट्रोल कमीशन के पूर्व सदस्य रमेश कटारा की भांति 'तांत्रिक' प्रक्रियाँओं से भी उत्पीड़न करता आ रहा है।



जैसा कि प्रस्तुत फोटो से स्पष्ट है वह शख्स निजी रूप से मुझे प्रताड़ित  करने हेतु कपोल-कल्पित बातें गढ़ता रहता है। मैंने गत वर्ष 30 सितंबर 2013 की सफल रैली के बाद डॉ साहब को आगाह करने का प्रयास किया था।
"जहां तक रैली की भौतिक सफलता का प्रश्न है रैली पूर्ण रूप से सफल रही है और कार्यकर्ताओं में जोश का नव संचार करते हुये जनता के मध्य आशा की किरण बिखेर सकी है। लेकिन क्या वास्तव में इस सफलता का कोई लाभ प्रदेश पार्टी को या राष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा?यह संदेहास्पद है क्योंकि प्रदेश में एक जाति विशेष के लोग आपस में ही 'टांग-खिचाई' के खेल में व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि प्रदेश में पार्टी का जो रुतबा हुआ करता था वह अब नहीं बन पा रहा है। ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न एक पदाधिकारी विशेष द्वारा निर्लज्ज तौर पर किया जाता है और उसको सार्वजनिक रूप से वाह-वाही प्रदान की जाती है। एक तरफ ईमानदार IAS अधिकारी 'दुर्गा शक्ती नागपाल'के अवैध निलंबन के विरुद्ध पार्टी सार्वजनिक प्रदर्शन करती है और दूसरी तरफ उत्पीड़क पदाधिकारी का महिमामंडन भी। यह द्वंदात्मक स्थिति पार्टी को अनुकूल परिस्थितियों का भी लाभ मिलने से वंचित ही रखेगी। तब इस प्रदर्शन और इसकी कामयाबी का मतलब ही क्या होगा?  "
http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/09/3-30.html

मेरे इस आंकलन  का कारण  प्रदीप तेवारी  द्वारा  डॉ साहब पर रैली के संबंध में किया गया यह व्यंग्य है कि वह ग्लैमर में लगे रहते हैं : रैली निकालना उनके बूते की बात नहीं है। जबकि रैली के मंच से राष्ट्रीय सचिव अतुल अंजान साहब ने इस रैली को 'राजनीतिक सन्नाटा तोड़ने वाली रैली' की संज्ञा दी थी। किन्तु तेवारी साहब अपने दबदबे से 'अंजान' साहब के विरुद्ध घृणित प्रचार अभियान चलाते रहते हैं उनकी एक पोस्ट  लगाने के कारण ही मुझे पार्टी ब्लाग के एडमिन व आथरशिप से उन्होने मुझे हटा दिया था जिस कारण मुझे 'साम्यवाद (COMMUNISM)' ब्लाग निकालना पड़ा।

 कल दिनांक 24 सितंबर 2014 की ज़िला काउंसिल द्वारा 'चुनाव समीक्षा' बैठक में ज़िला इंचार्ज के नाते तेवारी साहब ने जिला मंत्री द्वारा एक प्रस्ताव के जरिये 60 वर्ष की आयु से अधिक के कामरेड्स के पदाधिकारी बनने पर रोक लगवा दी है। यदि इस प्रस्ताव को प्रदेश में भी लागू करवाया जा सका तो प्रदेश सचिव डॉ साहब व प्रदेश के सहायक सचिव अरविंद जी भी दौड़ से बाहर हो जाएँगे और तेवारी साहब का रास्ता 'निष्कंटक ' हो जाएगा।