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Sunday, 16 May 2021

लुटेरी प्रणाली से समाज में हिंसा बढ़ रही है ------ अश्वनी प्रधान


 

Ashwani Pradhan

16-05-2021 

शायद कुछ ही वर्षों में हम इस देश में करोड़ों गरीबों से उनकी ज़मीने पीट पीट कर छीन लेगे.

गरीब विरोध करेंगे.

हम  पुलिस से गरीबों को पिटवा कर उनकी ज़मीने छीन लेंगे.

गरीबों से ज़मीने छीन कर हम अपने लिये हाइवे, शापिंग माल, हवाई अड्डे, बाँध, बिजलीघर, फैक्ट्री बनायेंगे और अपना विकास करेंगे.

हम ताकतवर हैं इसलिए हम अपनी मर्जी चलाएंगे ? 

गाँव वाले कमज़ोर हैं इसलिए इनकी बात सुनी भी नहीं जायेगी ? 

सही वो माना जाएगा जो ताकतवर है ? तर्क की कोई ज़रुरत नहीं है ? बातचीत की कोई गुंजाइश ही नहीं है ?

और इस पर तुर्रा यह कि हम दावा भी कर रहे हैं कि अब हम अधिक सभ्य हो रहे हैं.

अब हम अधिक लोकतान्त्रिक हो रहे हैं ! और अब हमारा समाज अधिक अहिंसक बन रहा है.

हम किसे धोखा दे रहे हैं ? खुद को ही ना ?

करोड़ों लोगों की ज़मीने ताकत के दम पर छीनना,  लोगों पर बर्बर हमले करना, फिर उनसे बात भी ना करना, उनकी तरफ देखने की ज़हमत भी ना करना.

कब तक इसे ही हम राज करने का तरीका बनाये रख पायेंगे ?

क्या हमारी यह छीन झपट और क्रूरता करोड़ों गरीबों के दिलों में कभी कोई क्रोध पैदा नहीं कर पायेगा ? 

क्या हमें लगता है कि ये गरीब ऐसे ही अपनी ज़मीने सौंप कर चुपचाप मर जायेगे या रिक्शे वाले या मजदूर बन जायेंगे ? 

या ये लोग भीख मांग कर जी लेंगे और इनकी बीबी और बेटियाँ वेश्या बन कर परिवार का पेट पाल ही लेंगी ? 

और इन लोगों की गरीबी के कारण हमें सस्ते मजदूर मिलते रहेंगे ?

दुनिया में हर इंसान जब पैदा होता है तो ज़मीन, पानी, हवा, धूप, खाना, कपडा और मकान पर उसका हक जन्मजात और बराबर का होता है.

और किसी भी इंसान को उसके इस कुदरती हक से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि इनके बिना वह मर जाएगा.

इसलिए अगर कोई व्यक्ति या सरकार किसी भी मनुष्य से उसके यह अधिकार छीनती है तो छीनने का यह काम प्रकृति के विरुद्ध है, समाज के विरुद्ध है, संविधान के विरुद्ध है और सभ्यता के विरुद्ध है.

हम रोज़ लाखों लोगों से उनकी ज़मीने, आवास , भोजन और पानी का हक छीन रहे हैं. और इसे ही हम विकास कह रहे हैं. सभ्यता कह रहे हैं. लोकतंत्र कह रहे हैं .

यदि किसी व्यक्ति के पास अनाज, कपड़ा, मकान,  कपडा,  दूध दही, एकत्रित करने की शक्ति आ जाती है तो हम उसे विकसित व्यक्ति कहते है. 

भले ही वह व्यक्ति अनाज का एक दाना भी ना उगाता हो, मकान ना बना सकता हो, खदान से सोना ना खोद सकता हो, गाय ना चराता हो.

अर्थात वह संपत्ति का निर्माण तो ना करता हो परन्तु उसके पास संपत्ति को एकत्र करने की क्षमता होने से ही हम उसे विकसित व्यक्ति कहते हैं.

बिना उत्पादन किये ही उत्पाद को एकत्र कर सकने की क्षमता प्राप्त कर लेना किसी विशेष आर्थिक प्रणाली के द्वारा ही संभव है.

और ऐसी अन्यायपूर्ण आर्थिक प्रणाली समाज में लागू होना किसी राजनैतिक प्रणाली के संरक्षण के बिना संभव नहीं है.

इस प्रकार के अनुत्पादक व्यक्तियों या व्यक्तियों के वर्ग को उत्पाद पर कब्ज़ा कर लेने को जायज़ मानने वाली राजनैतिक प्रणाली उत्पादकों की अपनी प्रणाली तो नहीं ही हो सकती.

इस प्रकार की अव्यवहारिक, अवैज्ञानिक, अतार्किक और शोषणकारी आर्थिक और राजनैतिक प्रणाली मात्र हथियारों के दम पर ही टिकी रह सकती है और चल सकती है.

इसलिए अधिक विकसित वर्गों को अधिक हथियारों, अधिक सैनिकों और अधिक जेलों की आवश्यकता पड़ती है. ताकि इस कृत्रिम राजनैतिक प्रणाली पर प्रश्न खड़े करने वालों को और इस प्रणाली को बदलने की कोशिश करने वालों को कुचला जा सके.

बिन मेहनत के हर चीज़ का मालिक बन बैठे हुए वर्ग के लोग अपनी इस लूट की पोल खुल जाने से डरते हैं. और इसलिए यह लोग इस प्रणाली को विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली सिद्ध करने की कोशिश करते हैं.  

इस प्रणाली को यह लुटेरा वर्ग लोकतंत्र कहता है.  इसे पवित्र सिद्ध करने की कोशिश करता है.  इसके लिये धर्म, महापुरुष, फ़िल्मी सितारों, मशहूर खिलाड़ियों और सारे पवित्र प्रतीकों को अपने पक्ष में दिखाता है.

सारी दुनिया में अब यह लुटेरी प्रणाली सवालों के घेरे में आ रही है. इस प्रणाली के कारण समाज में हिंसा बढ़ रही है.

हम इसका कारण नहीं समझ रहे और इस हिंसा को पुलिस के दम पर कुचलने की असफल कोशिश कर रहे हैं. देखना यह है कि यह लूट अब और कितने दिन तक अपने को हथियारों के दम पर टिका कर रख पायेगी ?


साभार : 

https://www.facebook.com/


Friday, 1 April 2016

संविधान को बचाना ही राष्ट्रवाद है ------ कन्हैया कुमार




Kanhaiya Kumar

संविधान को बचाना ही राष्ट्रवाद है
कन्हैया कुमार प्रेसिडेंट, जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन, AISF
भारत महज एक शब्द नहीं है। हम जब भारत में राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो सिर्फ भारत के भौगोलिक नक्शे की बात नहीं करते, बल्कि भारत की संपूर्णता जो इसके इतिहास, भूगोल, अर्थव्यवस्था, समाज, राजनीति, संस्कृति, परंपरा, धर्म और यहां के लोगों में निहित है, उसकी बात करते हैं। यही वजह है कि भारत का राष्ट्रवाद किसी एक धर्म, भाषा, संस्कृति या राजनीतिक सोच से तय नहीं किया जा सकता। भारत में राष्ट्रवाद का विमर्श यहां के संविधान के अनुरूप होना चाहिए और हमारे संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत 'हम भारत के लोग...' से होती है। इसका मतलब है कि भारत का राष्ट्रवाद एकलवादी नहीं बल्कि बहुलवादी है इसलिए पहले ही अनुच्छेद में कहा गया है कि भारत 'राज्यों का संघ' है। भारत का राष्ट्रवाद यूरोप के राष्ट्रवाद से बिल्कुल अलग है और भारत के संदर्भ में यह कहना सही होगा कि भारत का राष्ट्रवाद बहुआयामी है और कई राष्ट्रवादी विचारों को अपने में समाहित करता है। भारत के राष्ट्रवाद को जर्मनी की तरह एक राष्ट्र, एक दल, एक नेता की तर्ज पर परिभाषित करना एक खतरनाक परिस्थिति को उत्पन्न करना होगा। अगर हम भारत में राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो यहां की भौगोलिक सीमा में निवास करने वाली हर भाषा, संस्कृति, पहचान, वर्ग और धर्म के सवा सौ करोड़ लोगों की बात करनी होगी। एक धर्म या संस्कृति की वकालत भारत में राष्ट्रवाद के विमर्श को गलत दिशा में ले जाती है। भारत के राष्ट्रवादी विमर्श में भारत के लोग आधारभूत स्तंभ हैं और भारत विविधता में एकता का बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। इस राष्ट्रवादी विमर्श में लोगों की बुनियादी जरूरतों मसलन रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि की बात करना और इसको सबके लिए सुलभता से उपलब्ध करवाना ही राष्ट्रवाद है। आज हमारे सामने चुनौती यह है कि राष्ट्रवाद के तथाकथित विमर्श में भारत में रहने वाले लोगों को छोड़कर, उनके हक-अधिकारों की बातों को भुलाने की कोशिश की जा रही है। ऐसा अगर होता रहा तो न तो भारत आगे बढ़ेगा, न इसका राष्ट्रवाद क्योंकि लोगों के बिना राष्ट्र का अपना कोई आस्तित्व नहीं होता। इसलिए अगर भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत करना है तो यहां के किसानों की आत्महत्या, खेती की दुर्दशा, शिक्षा और रोजगार की बदहाली, मजदूरों और छोटे व्यापारियों के शोषण पर बात करनी होगी, इसका समाधान ढूंढना होगा। वित्तीय पूंजी की लूट से उत्पादन एवं संसाधनों को बचाना होगा क्योंकि भूमंडलीकरण के इस दौर में राष्ट्रीय राज्य एवं लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा खतरे में है। ऐसे में नवउदारवादी सरकार अगर राष्ट्रवाद के राग अलापे तो हमें इस अंतर्विरोध को समझते हुए लोगों के पक्ष में लोकतंत्र के साथ संविधान को बचाना ही राष्ट्रवाद है।

https://www.facebook.com/isupportkanhaiya/photos/a.2005793673045125.1073741828.2005716053052887/2024493964508429/?type=3

Tuesday, 15 March 2016

जेएनयू नहीं, लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई ----- कन्हैया

126 ***** जेएनयू के छात्रों ने देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में बंद उमर और अनिर्बान की रिहाई के लिए मंडी हाउस पर मार्च किया। इसी दौरान तीन लोग कन्हैया कुमार के मंच पर बढ़े और पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया।*****मंडी हाउस से संसद तक आयोजित इस मार्च को पुलिस ने संसद मार्ग थाने से आगे नहीं जाने दिया।
पीपल्स मार्च में आए लोगों को यहीं पर कन्हैया ने संबोधित किया। संबोधन के दौरान कन्हैया पर तीन बार हमला करने की कोशिश की गई।***** 




जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर मंगलवार को चार युवकों ने हमला करने की कोशिश की, जिसे वहां खड़े दिल्ली पुलिस के जवानों ने नाकाम कर दिया। पुलिस तुरंत ही उन युवक को काबू में करके संसद मार्ग थाने में ले गई। जब यह घटना घटित उस समय कन्हैया पीपल्स मार्च में आए लोगों को संबोधित कर रहे थे।

देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए जेएनयू के छात्र उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य की रिहाई के लिए जेएनयू छात्र संघ के बैनर तले एक पीपल्स मार्च का आयोजन किया गया था। मंडी हाउस से संसद तक आयोजित इस मार्च को पुलिस ने संसद मार्ग थाने से आगे नहीं जाने दिया।

पीपल्स मार्च में आए लोगों को यहीं पर कन्हैया ने संबोधित किया। संबोधन के दौरान कन्हैया पर तीन बार हमला करने की कोशिश की गई। पुलिस के चौकन्ने जवानों ने सभी हमलों को नाकाम कर दिया और हमला करने की कोशिश करने वाले चार युवकों को थाने ले गई।

इन हमलों के बारे में कन्हैया ने कहा कि अगर मेरे ऊपर हमला करने से किसी का भला होता है तो मैं उसके लिए भी तैयार हूं। जो मेरे ऊपर हमला करना चाहते हैं, दरअसल वह मोदी सरकार के बचे तीन सालों में सेट होना चाहते हैं। यदि मेरी वजह से किसी को नौकरी मिल जाए तो भला इससे अच्छा क्या हो सकता है। क्योंकि मोदी जी तो किसी को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं।

जेएनयू नहीं, लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई
पीपल्स मार्च को संबोधित करते हुए कन्हैया ने कहा कि यह मार्च सिर्फ जेएनयू बचाने के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र बचाने के लिए निकाला गया है। उन्होंने कहा कि तमाम तरह की साजिश की जा रही हैं। कहते हैं कि जेएनयू खतरनाक जगह है। जेएनयू खतरनाक जगह है क्योंकि वहां सरकार की जनविरोधी नितियों के खिलाफ आवाज उठाई जाती है। देश के विश्वविद्यालय जहां लोग ज्ञान प्राप्त करते हैं। वहां ज्ञान होता है जो लोकतंत्र को लेकर हो, जो संविधान को लेकर हो। यह सरकार उसी से ध्यान भटकाना चाहती है। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई में हमें आगे बढ़ते रहना होगा।

लेखिका अरुंधति राय भी पहुंची
मशहूर लेखिका अरुंधति राय भी पीपल्स मार्च में अपना समर्थन देने के लिए संसद मार्ग थाने पहुंची थीं। उन्होंने कहा कि यह 'नफरत करने वालों' और 'सोचने वालों' के बीच की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि जिन्हें वे देशद्रोही कहते हैं, वे भूमि, नदी और जंगलों से प्यार करते हैं।

Published:15-03-2016 07:44:31 PMLast Updated:15-03-2016 08:44:45 PM
   
http://www.livehindustan.com/news/ncr/article1-jnu-mandi-house-protest-three-people-tried-to-threaten-kanhaiyakumar-arrested-520948.html



https://www.youtube.com/watch?v=w8S6rTyz2hA&feature=youtu.be



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