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Saturday, 22 October 2016

सीतामढ़ी में कन्हैया : हम समाज को बदलने का नारा लगाते हैं ------ राम कृष्ण




हम लेकर रहेंगे आजादी ।सीतामढी मे खेत मजदूर यूनीयन को समबोधीत करते जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष साथी कन्हैया और हम । आने वाले दिनों में हम हिन्दुस्तान की सरज़मी से संघ का खात्मा कर देंगे । सीतामढ़ी में उमड़ी भीड़ यह बता रही थी कि हिन्दुस्तान को किसी भी कीमत पर संघिस्तान नहीं बनने दिया जायेगा । मिथिला से निकला यह संदेश दूर तलक जायेगा । जगत जननी सीता तो मिथिला की बेटी है और राम हमारे कुटुंब हैं । पूरी दुनिया में भले हीं राम को पूजा जाता हो लेकिन हम मिथला के लोग राम को भी गाली देते हैं । राम से हमारा खून का रिश्ता है । तुम्हारे लिए राम ईट पत्थर और गारे  में बसते हैं मेरे तो राम हृदय में बिराजमान हैं ।
रघुकुल रीत सदा चली आई,
प्राण जाई पर वचन न जाई ।




राम कृष्ण
22-10-2016 
लौटा हूं आदि शक्ति सीता की जन्मभूमि सीतामढी से और सोचने को विवश हूं ।जब इस देश के लोगों ने सीता के चरित्र पर ऊंगली उठाया और आदिशक्ति सीता को चरित्रहीन कहकर जंगल में भेज दिया ।राम तो एक बार वनवास गये थे मगर सीता तो दोबारा वनवास गयी थी।आदिशक्ति सीता मिथिला की बेटी थी ।हम और कन्हैया मिथिला के बेटे हैं ।सीता से अग्नि परीक्षा कल भी लिया गया था और सीता के भाई से आज भी अग्नि परीक्षा लिया जा रहा है ।हम अग्नि परीक्षा देते रहें और देते रहेंगे ।और हर अग्नि परीक्षा में हम अग्नि कुंड की लपटो से पवित्र होकर निकले हैं और निकलते रहेंगे ।इतिहास मे हमारा नाम सम्मान से लिखा जाता रहा है और लिखा जाता रहेगा।कन्हैया को कहां गया की ये देशद्रोही है और कारागार में डाल दिया गया।हमारा कन्हैया उस कारागार से अग्नि कुंड में जलने की जगह और सोने की तरह चमकदार होकर निकला,फिर कहा कन्हैया सेना के खिलाफ बोलता है और वहाँ भी इन लोगों की दाल नही गली,फिर कहा कन्हैया देशद्रोही हैं, देश के खिलाफ बोलता है ।कन्हैया देश के खिलाफ नही सामप्रदायिकता के खिलाफ बोलता है ।कन्हैया गरीबों की लूट पर बोलता है ।कन्हैया शोषण पर बोलता है ।कन्हैया बीजेपी और संघ की असलियत बताता हैं ।और कन्हैया को सिर्फ बीजेपी और संघ देशद्रोही बोलती हैं ।नही तो इस देश की अस्सी फीसदी आबादी कन्हैया को अपना नायक मानती हैं ।मिथिला के बेटे या बेटियों के लिए तुम जितने भी अग्नि कुंड तैयार कर लो हर अग्नि कुंड से हम और पवित्र तेजस्वी होकर निकलेगे।मिथिला की बेटी तो रावण के यहाँ रहकर भी पवित्र ही रही, फिर कन्हैया तो मिथिला का बेटा है ।और मिथिला का बेटा तुम्हारा सर्वस्व नाश कर देगा।बीजेपी और संघियो सबसे बड़े देशद्रोही तुम हो और इस बात का प्रमाण तुम्हे मिल चुका हैं ।मैं भी मिथिला का बेटा हूं और मिथिला का हर अमन पसंद व्यक्ति तुम्हे करारा जवाब देगा।सीता तो अग्नि परीक्षा देते समय अकेली थी लेकिन कन्हैया के साथ हजारों लोग हैं ।और वो कह रहे हैं बस बहुत जुल्म सहे हैं अब सिर्फ खुरदाय करेंगे ।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1784400635163397&id=100007804330133
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22-10-2016 

Monday, 26 September 2016

ब्राह्मण वादी निंदनीय दुष्कृत्य ------ विजय राजबली माथुर

24 सितंबर 2016 


हमारे ब्लाग में पोस्ट देख कर मयंक द्वारा कापी करके अपने नाम से छ्पवाना  क्या कम्युनिस्ट नैतिकता के विरुद्ध नहीं है? दोनों के प्रकाशन समय देखें -ब्लाग में 08 :20 (20 : 20 )pm पर मैंने पब्लिश किया है और मयंक ने 10 :24 pm पर उसको अपने नाम से निकाल डाला है। यू पी में मोदीईस्ट बाजारवादी कामरेड्स इसी प्रकार की हरकतों से पार्टी को कमजोर कर रहे हैं।

यों तो छोटों की गलतियों को नज़रअंदाज़ कर देना मेरी  आदत का हिस्सा है। 18 सितंबर को छात्र नेता कन्हैया कुमार यहाँ लखनऊ सम्बोधन हेतु आए थे उनके सम्बोधन के अपने को खास लगे अंशों को अपने ब्लाग 'साम्यवाद COMMUNISM ' पर रात्रि 08 : 20 (20 : 20 ) pm पर प्रकाशित किया था। कानपुर के एक छात्र 'मयंक चकरोबरती ने उसे 10 :24 pm पर अपने नाम से कापी पेस्ट करके पब्लिश कर दिया। चूंकि यह छात्र हमारी पार्टी भाकपा का भी सदस्य है अतः कानपुर के ही एक बड़े प्रभावशाली कामरेड नेता के संज्ञान में सम्पूर्ण तथ्यों को डाला। ऊपरी दबाव में वह बड़े नेता भी इस छात्र के दुष्कृत्य को निंदनीय न ठहरा सके। वस्तुतः यू पी में भाकपा  अब एक ऐसे परिवार की पाकेट पार्टी है जिसमें पति,पत्नी,साली व दत्तक पुत्र की मर्ज़ी ही पार्टी नीति है और वैधानिक पदाधिकारी भी खुद को असहाय पाते हैं। अतः उनके प्रश्रय की प्रबल संभावना के मद्देनज़र उस छात्र को अपनी फेसबुक फ्रेंडशिप से हटाना पड़ा। यह पहला मौका है जब  उम्र में बेहद छोटे व्यक्ति पर बेमन से ही अनफ्रेंड करने की  कारवाई करनी पड़ी है।

जितने भी लोगों ने कन्हैया से संबन्धित अथवा किसी भी पोस्ट को जब भी शेयर किया है ब्लाग पोस्ट के रेफरेंस के साथ ही और इसी प्रकार मैं खुद भी दूसरों की अच्छी पोस्ट्स को शेयर करता रहता हूँ। स्वयं कामरेड अरविंद राज स्वरूप जी  ने भी रेफरेंस सहित ही शेयर किया है । 



विचारणीय  प्रश्न यह है कि, जबकि अतीत में मयंक भी रेफरेंस सहित ही पोस्ट्स शेयर करते रहे हैं तब कन्हैया से संबन्धित पोस्ट को ही अपने नाम से चुराने की क्या ज़रूरत थी ? वजह साफ है कि मयंक नौजवान छात्र हैं और आसानी से कन्हैया से प्रभावित हो सकते हैं। अतः मोदीईस्ट /बाजरवादी/ब्राह्मण वादी कामरेड्स जिनके केंद्रीय मंत्रियों से मधुर संबंध हैं नहीं चाहते थे कि कन्हैया की लखनऊ यात्रा के बाद यू पी में कन्हैया के समर्थक बढ़ें और फासिस्ट सरकार की चूलें हिलें । ऐसे लोगों को मयंक साफ्ट टार्गेट के रूप में मिल गए और उनसे गलत कदम उठवा कर उनको बदनाम कर दिया गया। तोड़- फोड़ और पार्टी संकुचन में संलग्न ब्राह्मण वादी कामरेड्स ने कन्हैया के प्रयासों पर पानी फेरने के लिए  जिस प्रकार मयंक के सिर बदनामी का ठीकरा फोड़ा है वह दुष्कृत्य निंदनीय है। 












Thursday, 9 June 2016

कन्हैया को डूटा द्वारा बुला कर बोलने से रोकना ;रोशन सुचान की चिंता ------ विजय राजबली माथुर





" वहां एक महिला शिक्षक ( जो संघ और ईरानी के चेली होंगी ) ने कन्हैया के हाथ से माइक छीन लिया और बोलने नहीं दिया और जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया । तब एआईफुक्टो - फेडकुटा द्वारा समर्थित डूटा की ओर से बिलकुल विरोध नहीं किया गया और वहां मौजूद अन्य वामपंथी - लोकतान्त्रिक शिक्षक - छात्र संगठनों से जुड़े शिक्षक भी मौन होकर तमाशबीन बने रहे जो गैरजिम्मेदाराना और निंदनीय है। कन्हैया डूटा के निमंत्रण पर जेएनयू छात्रसंघ का समर्थन देने गए थे. इसके लिए शिक्षक संगठनों को जिम्मेदारी और जवाबदेही लेते हुए जवाब देना होगा कि ऐसा क्यों हुआ ? "
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1142935679104611&id=100001645680180

Sataynarayan Tripathi लिजलिजा सगठनो की हालत पैदा करने का कौन जिम्मेदार है ॽ सगठनो का बैनर वाम प्रगति शील पर कब्जा दछिण पन्थ विचारको का ॽ तब यह स्थिति पैदा होगी ़ॽट्रेड यूनियनो व एशियोसियसनो पर जब वे लोग पदासीन होगे जिन्हे वर्ग मित्र वर्ग शत्रु की पहिचान न होगी या उद्देश्य कलुसित ट्रेड करने के होगे ॽ सगठनो पर आम जन पर होल्ड नही होगा तब यह स्थितियॉ आयेगी ॽ
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जे एन यू एस यू अध्यक्ष कन्हैया से जितना खतरा कार्पोरेटी ब्राह्मण वादी कामरेड्स को है उतना दूसरे किसी को नहीं, इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखना होगा तभी सच्चाई तक पहुंचा जा सकेगा। जबसे 04 मार्च 2016 को जेल से आने पर कन्हैया ने 'नीली' कटोरी और ' लाल ' कटोरी का उदाहरण दे कर  वामपंथ व अंबेडकरवाद की एकता की बात कही है तभी से वह वामपंथ के अश्लीलता समर्थक बाजारवादी ब्राह्मण कामरेड्स के निशाने पर चल रहे हैं। भारत में 'सर्व हारा ' वर्ग का मतलब उस तबके से है जिसे यहाँ दलित कहा जाता है और जो डॉ अंबेडकर का अनुयाई माना जाता है। कन्हैया इसी वर्ग के साथ एकता करके वामपंथ को मजबूत करना चाहते हैं। उनका उद्देश्य पवित्र है। लेकिन इतना तो सच है ही कि, वामपंथी संगठनों पर 'दक्षिण पंथी विचारकों' का ही कब्जा है जिनको कन्हैया की बात कभी भी स्वीकार्य नहीं हो सकती क्योंकि वास्तविक सर्व हारा के वामपंथ के साथ आने से इन संगठनकर्ता ब्राह्मणों का अस्तित्व गौड़ हो जाएगा। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सिद्धांतों की रट लगा कर इन लोगों ने 1964 में  CPM का गठन कर लिया था। उत्तर प्रदेश में इसी लिए 1994 के बाद से दो-दो बार पार्टी में टूटन हो चुकी है। इसका सीधा -सीधा लाभ बाजरवादी ब्राह्मण कामरेड्स को हुआ है। यू पी से CPI की नेशनल काउंसिल में 7 प्रतिनिधि हैं जिनमें से 4 ब्राह्मण हैं और इन चार में 3 एक ही परिवार से संबन्धित हैं। क्या अंबेद्कर वादियों के वामपंथ से जुडने पर ऐसा हो सकेगा? निश्चय ही नहीं। इन ब्राह्मण वादी कामरेड्स को कार्पोरेटी/ मोदीइस्ट कहना अधिक उपयुक्त होगा। ये ही अप्रत्यक्ष रूप से कन्हैया विरोधी अभियान के सूत्रधार हैं। जब तक ऐसे लोगों को वामपंथ से साईडट्रेक नहीं किया जाता तब तक कन्हैया का पवित्र अभियान सफल होना संदिग्ध बना रहेगा। डूटा आंदोलन के दौरान कन्हैया के साथ बदसलूकी इसी का नतीजा है। 

जब तक वामपंथ का शुद्धिकरण नहीं हो जाता फासिस्ट शक्तियाँ निरंतर मजबूत होती जाएंगी। IAS आदि सरकारी सेवाओं में संघी मानसिकता के लोग भरते जाएँगे। यदि केंद्र में गैर फासिस्ट सरकार बन भी जाएगी तब भी ये संघी ब्यूरोक्रेट्स उस सरकार को पंगु करके संघी एजेंडा लागू करते रहेंगे। क्या वामपंथ ने इस लूट के विरुद्ध आवाज़ उठाई ? उठाएँ तो कैसे? संगठनों पर बाजारवादी ब्राह्मण कामरेड्स कब्जा किए हुये हैं, वे अपने वर्ग हित का विरोध करेंगे, ऐसा सोचना भारी भूल होगी। 
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17-06-2016 

Friday, 6 May 2016

कन्हैया नाम को सार्थक करें साथियों सहित 'अनशन ' छोड़ें ------ विजय राजबली माथुर




सुयश सुप्रभ
05-05-2016  
संघियों, अब तो आप ख़ुश हो गए होंगे। Kanhaiya एम्स पहुँच गए, वह भी बेहोशी की हालत में। आपको उनका हवाई जहाज से घूूमना बर्दाश्त नहीं हो रहा था। आपके प्रभु मोदी जब अडानी के हवाई जहाज से घूमते हैं तब वह नेक काम कर रहे होते हैं। हमारे कन्हैया जब किसी आयोजक या संगठन के पैसे से हवाई जहाज में बैठते हैं तो आपका खाना नहीं पचता है। यह अपच असल में आपके वैचारिक ज़हर का नतीजा है।

कन्हैया उन तमाम युवाओं के प्रतिनिधि हैं जो शिक्षा को बाज़ार का माल बनाने से रोकना चाहते हैं। वे जब लड़ाकू विमानों पर 59,000 करोड़ रुपये खर्च करने पर सवाल उठाते हैं तो मीडिया को यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं लगता। वे जब नीतीश कुमार से समान स्कूली शिक्षा की बात करते हैं तो इस बात को सुर्खियों में जगह नहीं मिलती। मीडियाकर्मियों के बच्चे भी तो स्कूल जाते हैं। कल कॉलेज जाएँगे। क्या वे 15-20 लाख रुपये की सालाना फ़ीस देकर अपने बच्चों को पढ़ा पाएँगे? कन्हैया उनके बच्चों के सुरक्षित भविष्य की ही तो लड़ाई रह रहे हैं। इस तस्वीर को अपने अख़बारों, वेबसाइटों आदि में जगह दीजिए। कन्हैया आपकी ही लड़ाई लड़ रहे हैं। कमेटी का फ़ैसला देशद्रोहियों के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि शिक्षा को बाज़ार का माल बनाने का विरोध कर रहे एक्टिविस्टों के ख़िलाफ़ है।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10154181021289696&set=a.128015264695.103352.832064695&type=3

क्रूर फासिस्ट कैसा सोचते हैं 'आरती मिश्रा ' की टिप्पणी में देखें :

लेकिन बाजारवादी कारपोरेट समर्थक वामपंथी भी कन्हैया के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहे हैं उनको बेबाक जवाब यू पी के पूर्व गृह राज्य मंत्री की पुत्री साहिबा ने दिया है , वह सराहनीय व ध्यान देने योग्य है :
निर्मम ,निष्ठुर , निर्लज्ज फासिस्ट सरकार से लड़ने के लिए 'अनशन ' कारगर हथियार नहीं है अतः कन्हैया व उनके साथियों को तत्काल अनशन समाप्त कर 'शठे शाठ्यम ' मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
06-05-2016 

Friday, 29 April 2016

" जे एन यू के सौरभ शर्मा के नाम एक टीचर का खुला खत " ------ बोलता हिंदुस्तान / दखल की दुनिया








BH firstpost
“मेरी बेटी ABVP से भी जुड़ सकती थी, लेकिन अब नहीं जुड़ेगी।”

April 27, 2016bh
(ये ख़त 19 मार्च को लिखा गया है। लेखिका ने अभी भेजा तो देर से छाप रहा हूं- मॉडरेटर )

प्रिय सौरभ शर्मा,



मैं बहुत दिनों से तुमसे बात करने की सोच रही थी। परसों जब मैं JNU में अपनी बेटी से मिलने गई थी तो तुम मुझे दिखे भी थे। अनुपम खेर के लिए इंतजाम करने में मशगूल। सोचा भी कि तुमसे मिलकर आऊं, लेकिन तभी उमर और अनिर्बान की ज़मानत की ख़बर आई और देखते ही देखते एडमिन ब्लॉक पर लगने वाले नारों में मैंने ख़ुद को बह जाने दिया। उस खुशी का हिस्सा बन गई, जिसमें हमारी अगली पीढ़ी महफूज़ रहती है। पिछले कई दिनों (11 फरवरी ) से मैं ठीक से सो नहीं पाई थी। चिंता, परेशानी, डर, घृणा, अफ़सोस के साथ हतप्रभ थी। मैंने सोचा नहीं था मैं अपने जीवन में यह दिन देखूंगी। इमरजेंसी के समय मैं बहुत छोटी थी, कुछ भी याद नहीं है। बस सुना ही है उसके बारे में। लेकिन यह जो गुज़री हम सब पर यह भी कम ख़ौफ़नाक नहीं था। युद्ध जब युद्ध के नाम पर हो तब अपना पक्ष तय करना आसान होता है पर जब युद्ध प्रेम, संस्कृति, आस्था, शिक्षा, देश और विकास के नाम पर हो तो लड़ने के लिए बहुत ताक़त लगानी पड़ती है। सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन इस लड़ाई की शुरुआत तुमने कर दी है। हालांकि मैं यह मानती हूँ कि तुम सिर्फ एक मोहरा हो और तुम्हारा इस्तेमाल किया गया है। जिन्होंने यह किया है उनका इतिहास दाग़दार है, हम सब यह जानते हैं। नमो गंगे से नमो दंगे तक की सारी प्रक्रिया से हम सब, पूरा देश वाकिफ़ है।

दूसरी तरफ मैं यह भी मानती हूं कि तुम्हारा विश्वविद्यालय भी अल्टीमेट नहीं है वहाँ भी ज़रूर कुछ कमियां, कुछ ज्यादतियां और परेशानियां होंगी। इसका साफ प्रमाण है कि तुम वहां से चुनाव जीते और तुम्हारे विश्वविद्यालय ने तुम्हें JNU में काम करने का एक बेहतरीन मौका दिया लेकिन अफ़सोस तुमने यह बड़ा मौका गवां दिया और उस जमात में जा शामिल हुए जो बहुत दिनों से रंगे सियार की तरह तुम्हारे विश्वविद्यालय पर नज़रें गड़ाए हुए थे। JNU की सारी कमियों के बावजूद तुम्हें भी यह मानने में परहेज़ नहीं होगा कि JNU हमेशा से सत्ता विरोधी रहा है। नंदीग्राम से लेकर पता नहीं कितने मुद्दों पर हर वक़्त बहस करने को भी तैयार रहता है। वैचारिक विरोध का मतलब वहां दुश्मनी तो कतई नहीं है। सौरभ मैं तुम्हें बताऊं मेरी बेटी तीन साल से वहाँ पढ़ रही है। मैं और उसके बाबा दोनों ही वहाँ पढ़ना चाहते थे पर पढ़ नहीं सके। जिसका अफ़सोस थोड़ा कम हुआ जब हमारी बेटी ने वहां का एंट्रेंस क्लियर किया। हमने उसे शुरू से ही तार्किक और वैज्ञानिक सोच रखने वाला इंसान बनाने की कोशिश की है और उसका व्यक्तित्व स्वतंत्र हो, किसी की छाया नहीं, दूसरों की बात सुनने-समझने का माद्दा हो। गलत चीज पर उसे बहुत गुस्सा आए। झूठ-फरेब से नफरत करे। ऐसी कोशिश हमारी रही है। (कितनी पूरी हो पाई नहीं जानती, क्योंकि सीखने का कोई अंतिम दिन नहीं होता)। कुल मिलाकर मोटे तौर पर तुम यह कह सकते हो कि कुछ वामपंथियों जैसी विचारधारा वाला घर उसे मिला।

JNU, जिसे वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है बड़ा ही स्वाभाविक था कि वह जाते ही किसी वामपंथी स्टूडेन्ट यूनियन से जुड़ जाती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और किसी वाम धड़े ने उसे बाध्य भी नहीं किया। उसने तय किया कि अभी वो सबको, सबके काम को देखेगी फिर सोचेगी कि किसके साथ जुड़ना है, हो सकता था कि तुमसे जुड़ती। ‘था’ इसलिए लिख रही हूं कि अब ऐसा कभी नहीं होगा। तार्किक, समझदार और ईमानदार लोगों के लिए तुमने अपने रास्ते बंद कर लिए हैं।



मैं ये पत्र इसलिए लिख रही हूं कि मैं तुम्हारी, तुम जैसे युवा की पूरी बनावट समझना चाहती हूं। मैं आज तक नहीं समझ पाई कि एक युवा दिमाग जो सबसे ज्यादा सवाल पूछता है, असहमतियां दर्ज करता है। लड़ता है, जूझ़ता है, ग़लत चीजों से सीधे जाकर भिड़ जाता है। कैसे, किसके प्रभाव से षड़यंत्र करने लगा, साम्प्रदायिक हो गया और सबसे बड़ी बात कि वर्ग शत्रु बन गया। दिल पर हाथ रख कर कहो सौरभ जब तुम्हारे साथियों (विरोधी ही सही) को पुलिस घसीट कर ले जा रही थी। तुम्हारे दिल की धड़कने बढ़ नहीं गई थीं? आंखें भर नहीं आईं थी? जब कन्हैया को बेरहमी से मारा जा रहा था। असहाय होने की पीड़ा से तुम गुस्से से छटपटा नहीं रहे थे? जब उमर सिर्फ एक मुसलमान में बदल दिया गया और ‘मास्टर माइंड’ जैसी गालियों से मर रहा था। तुम्हारा दिमाग क्या शांत रह पाया था? वहाँ कोई हलचल नहीं हुई? रामा नागा, अनंत, अनिर्बान, आशुतोष तुम्हारे ही जैसे हाड़-मांस के स्टूडेन्ट जब ‘देशद्रोही’ में बदल दिए गए। तुम्हे अपने आकाओं से घृणा नहीं हुई? रामा तो शायद तुमसे भी ज्यादा ग़रीब परिवार का लड़का है। चलो इन सबको छोड़ो, शायद इन नामों से तुम्हे गुस्सा आता हो, कि ये सब तुम्हारे विरोधी हैं। लेकिन तुम्हें रोहित वेमुला से भी कोई लेना-देना नहीं है? टी.वी. पर जब तुमने कहा कि खेतों में पानी देकर तुमने पढ़ाई की है तो मुझे सुनकर अच्छा लगा, आज तुम अपनी मेहनत से JNU में हो यह जानकर और अच्छा लगा। लेकिन इसी तरह से रोहित के पढ़ने से तुम्हें खुशी क्यूं नहीं होती? उसकी मेहनत और तुम्हारी मेहनत में क्या फर्क रह जाता है? ऐसा क्या गुज़रता है कि रोहित की संस्थागत हत्या होती है और तुम एक लोकतांत्रिक संस्था की हत्या के अगुआ या चेहरा बन जाते हो? अपराध तुमसे हुआ है सौरभ लेकिन तुम स्टूडेन्ट हो इसलिए हम हमेशा इसे एक गलती कह कर सम्बोधित करेंगे क्योंकि अपराध की सज़ा होती है और गलतियां सुधारी जाती हैं। अपराधी से घृणा होती है और गलती करने वाले को सुबह का भूला कह कर सब कुछ भूल जाने का मन करता है।




हो सकता है अभी कुछ लोग तुमसे नफरत कर बैठे हों पर एक टीचर होने के नाते मैं तुमसे नफरत नहीं कर सकती। हां तुमसे नाराज़ हूं और बेहद नाराज़ हूं। हो सकता है तुम भी अपनी संस्था से नाराज़ हो और अलग पार्टी, अलग विचारधारा को अपना कर तुम अपनी नाराज़गी जता ही रहे थे फिर ऐसा क्या हुआ कि नाराज़ होते-होते तुम व्यक्तियों (कन्हैया, उमर, बान, अनंत, आशुतोष, शेहला, रामा आदि) से नफरत करने लगे। इतनी नफरत कि चुपके से तुमने ज़ी न्यूज़ को अपनी संस्था में सेंध लगाने के लिए बुला लिया। बहुत कुछ गुज़र गया सौरभ और जो कुछ घट चुका उसे लौटाया नहीं जा सकता-रोहित वेमुला को नहीं लौटाया जा सकता, कन्हैया, उमर और बान के जेल में बिताए दिन नहीं लौटाए जा सकते, कन्हैया की पिटाई का अपमान नहीं लौटाया जा सकता, उनके परिवारों पर जो गुज़री वो नहीं लौटाया जा सकता, तुम्हारे लोगों द्वारा दी गई भद्दी गालियों का दंश नहीं लौटाया जा सकता लेकिन फिर भी एक चीज़ है जो लौटाई जा सकती है और वो है तुम्हारी समझ और तुम्हारी मरी हुई आत्मा।

अगर ये लौट आए तो JNU  के बेलौस बेफिक्र दिन और रात लौट आएंगे। इस देश के दिलों में पड़ी दरार भर जायेगी। बसंत का मौसम लौट आएगा। राधिका वेमुला के होठों की मुस्कान लौट आयेगी। संघ अपने दड़बे में लौट जायेगा और एमएचआरडी के फरमान लौट जायेंगे। सौरभ तुम्हें लौटना इसलिए भी चाहिए कि जिस तरफ तुम खड़े हो उधर नफरत, घृणा, हिंसा, झूठ, कायरता, साम्प्रदायिकता और फासिज़्म है जिसे अंत में खुद की कनपटी पर गोली मारकर आत्महत्या करनी पड़ती है। और एक टीचर होने के नाते मैं कभी नहीं चाहूंगी कि तुम्हारा नाम इतिहास में एक धोखेबाज़ और विभीषण के तौर पर दर्ज़ हो क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो जब मेरी बेटी की बेटी JNU में पढ़ने जायेगी तो उसके सीनियर भी उसे सुनायेंगे ये कथा कि एक समय में यहाँ एक सौरभ शर्मा हुआ करता था……………।

नोट: मेरा एक सुझाव है कि रबीन्द्र नाथ टैगौर का उपन्यास “गोरा” पढ़ लेना। शायद तुम्हें वापस लौटने में मदद मिले।

साभार- दख़ल की दुनिया (ब्लॉग)


http://boltahindustan.com/a-open-letter-to-saurabh-sharma-from-a-teacher/

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29-04-2016 


Tuesday, 26 April 2016

छात्रों, मजदूरों,किसानों व साधारण जनता की एकजुटता का शहला राशिद का आह्वान



ग्यारह छात्र-युवा संगठनों की एक सम्मिलित गोष्ठी में 23 अप्रैल 2016 को मुंबई में जे एन यू , दिल्ली छात्र यूनियन की उपाध्यक्ष शहला राशिद ने बेहद तर्क-संगत व गंभीर उद्गारों की अभिव्यक्ति की। हालांकि एक छात्र नेता की हैसियत बताते हुये शहला ने अपनी बातों को रखा है परंतु वीडियो सुनने से लगता है कि, वह शिक्षात्मक दृष्टिकोण के साथ बोल रही थीं जो कि एक सराहनीय बात है। उन्होने अपने प्रदेश, महिला छात्राओं, किसानों,मजदूरों सभी की समस्याओं का उल्लेख करते हुये  कहा कि उन पर हस्तक्षेप करना छात्रों का कर्तव्य है और वही कर्तव्य - पालन वह तथा उनके साथी कर रहे हैं। उन्होने यह भी कहा कि जिन  विश्व विद्यालयों में छात्र संगठन नहीं हैं उनकी समस्याओं को भी उठाना उन सब का ही कर्तव्य है जिसको भी उन्हें मिल कर पूरा करना है। बंगलौर की महिला कपड़ा श्रमिकों की संघर्ष गाथा का उल्लेख करते हुये केंद्र सरकार को झुकाने के लिए उन्होने उनकी तारीफ की व उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष को बढ़ाने की बात कही।बंगलौर की एक भावुक घटना का उल्लेख करते हुये शहला ने बताया कि वहाँ जाने पर एक लड़की रोते हुये आकर उनके गले मिली और अपना दुखड़ा यह बताया कि उसका भाई और परिवार भाजपा का समर्थक है लेकिन उसको इन छात्रों की बात में सच्चाई लगती है इसीलिए वह परिवार से बगावत करके उनसे मिलने आई है। उन्होने एक दिन पूर्व की दिल्ली की घटना का उल्लेख करते हुये कहा कि जब वह अपनी पढ़ाई करके सोने जा रही थीं तभी उनको एक पूर्व आर एस एस कार्यकर्ता ने फोन करके सूचित किया कि वह कन्हैया , उमर , अनीबार्न के वीडियों देख सुन कर सच्चाई जान गया है और और लोगों को भी सच्चाई मानने के लिए प्रेरित कर रहा है। 

शहला ने यह भी कहा कि कन्हैया के हाल में प्रवेश करते समय लोगों में जो उत्साह था वह केवल AISF के ही नहीं थे बल्कि विभिन्न संगठनों से सम्बद्ध थे लेकिन न्याय की लड़ाई में वे सब साथ हैं। उन्होने लोगों से लंबे संघर्ष के लिए व्यापक एकजुटता की अपील के साथ अपनी बात का समापन किया। 

Thursday, 21 April 2016

कन्हैया युवा वर्ग की आवाज बनता जा रहा है ------ प्रिया कुमारी


‪#‎कन्हैया‬ : कैसे एक गर्वित भारतीय बन गया 'देशद्रोही'
यह 2007 की बात थी, दिल्ली में एक इंटर-यूनिवर्सिटी कल्चरल मीट में कार्यक्रम की शुरुआत से पहले छात्रों को एक घंटे तक बोलने का मौका दिया गया था। डिबेट में भाग लेने वाली कन्हैया कीे दोस्त और एआईएसएफ की सदस्य राहिला परवीन ने उस दौर को याद करते हुए कहा, 'इस डिबेट में कन्हैया ने पूरे जज्बे और दिल के साथ अपनी बात रखी थी। भले ही वह पुरस्कार नहीं जीत पाया था, लेकिन उसके भाषण से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। इस भाषण प्रतियोगिता का टॉपिक था, मुझे भारतीय होने पर गर्व है।
अब करीब एक दशक बाद कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का आरोप लगा है । उसे देशविरोधी नारें लगाने के आरोप में गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल में डाल दिया गया था ।
उसको कोर्ट परिसर में दो दिन मारा पीटा गया , कुछ फर्जी देशभक्तों ने उसके साथ बदसलूकी की , मारपीट की और उसको लगातार टोर्चर किया गया ।
22 दिन जेल में रहने के बाद उसको जमानत मिली ।
अभी भी उसे जान से मारने की धमकी मिल रही है ।
अब कन्हैया युवा वर्ग की आवाज बनता जा रहा है । रातोंरात वह छात्रों का हीरो बन गया है । पढ़ा-लिखा और शिक्षित वर्ग उसके समर्थन में आ गये हैं । लोग उसको सुनना चाहते हैं ।
वो आम लोगों की बात उठा रहा है ।
वो कई आंदोलनों का पोस्टर बाॅय बन गया है ।
काॅग्रेंस पार्टी ने उसको अपने पोस्टर में बड़ी जगह दी है।
कन्हैया का खुद के प्रति आत्मविश्वास, जमीनी और ओजस्वी भाषण के चलते चर्चित है। यूट्यूब के एक विडियो में भी देखा जा सकता है कि सितंबर में जेएनयू चुनाव के दौरान वह कैसे प्रतिद्वंद्वी वामपंथी उम्मीदवार और कैसे वह '56 इंच की नकली छाती' पर हमला बोलता है। यही वजह थी कि कन्हैया के पक्ष में न्यूट्रल वोट भी पड़ा और वह जेएनयू में एआईएसएफ की ओर से पहला प्रेजिडेंट बना। उनके भाषण बताते हैं कि उन्हें कम्युनिस्ट पॉलिटिक्स में कितना विश्वास है। एक वक्त में छोटे कॉन्ट्रैक्टर रहे उनके पिता जय शंकर सिंह ने कहा, 'हमारा पूरा परिवार ही वामपंथी विचारधारा से जुड़ा रहा है।'
कन्हैया का परिवार ही नहीं बल्कि उनके गांव बीहट को भी इलाके में 'मिनी मॉस्को' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि पूरी दुनिया बदल सकती है, लेकिन यहां सीपीआई का सांगठनिक आधार हमेशा से मजबूत रहा है। सुबोध मालाकार ने कहा, 'बाजार में सीपीआई और इप्टा दोनों का ऑफिस है।'
कन्हैया के भाई बताते हैं कि कन्हैया ने स्कुली शिक्षा बरौनी और मोकामा से ली है और काॅलेज की पढ़ाई के लिए कन्हैया पटना चला गया था ।
एआईएसएफ के राष्ट्रीय महासचिव बिस्वजीत कुमार ने कहा कि कन्हैया कुमार ने 2002 में एआईएसएफ जॉइन किया था। तीन साल बाद ही वह मगध यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ कॉमर्स के प्रेजिडेंट चुने गए।
कन्हैया के दोस्त और पार्टी सदस्य बताते हैं कि बिहार से हजारों युवाओं की तरह वह भी सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए दिल्ली आए थे। राहिला बताती हैं, 'कन्हैया ने बिहार पब्लिक सर्विसेज कमिशन की एक बार परीक्षा भी दी थी।'
#कन्हैया की जिंदगी के कुछ पहलू यह भी :-
कन्हैया ने कई इंटर-कॉलेज और इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते।
रामधारी सिंह 'दिनकर', नागार्जुन और दुष्यंत की कविताओं को वह पसंद करते रहे हैं।
डफली बजाने और क्रांतिकारी गीत गाने का उन्हें पुराना शौक रहा है। इनमें से ही एक भोजपुरी गीत है 'कह बा ता लाग जाई धक से' भी है।
राजकपूर की मशहूर फिल्म श्री 420 का गीत 'दिल का हाल सुने दिलवाला' उनका पसंदीदा फिल्मी गीत है।

साभार : 
Priya Kumari

Wednesday, 23 March 2016

कन्हैया के विरुद्ध बाजरवादी वामपंथियों का प्रहार किसको लाभ पहुंचाने के लिए ? ------ विजय राजबली माथुर

23 मार्च 2016 को  हैदराबाद में रोहित वेमुला की माँ से AISF महासचिव के साथ कन्हैया कुमार 


******JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार AISF महासचिव सैयद वलीउल्लाह खादरी के साथ हैदराबाद यूनिवर्सिटी के दिवंगत छात्र रोहित वेमुला की माँ व परिवारीजनों से मिलने गए। उनको वहाँ यूनिवर्सिटी में जा कर आज सभा को संबोधित करना था किन्तु कल ही छात्रों पर पुलिस द्वारा बर्बर लाठी चार्ज के बाद 28 तारीख तक के लिए यूनिवर्सिटी को बंद कर दिया गया था। 
कन्हैया और साथियों ने जे एन यू में रोहित को न्याय दिलाने के लिए मुहिम चला रखी है। अपनी गिरफ्तारी से पूर्व व पश्चात भी कई बार कन्हैया ने वामपंथ (लाल ) व आंबेडकर पंथ ( नीला ) के सहयोग तथा समन्वय से साम्राज्यवादी/संप्रदायवादी शक्तियों से आज़ादी की बात उठाई है। इसीलिए उनके भाषण के वीडियोज़ में ओवरलेपिंग करके उनको झूठे आरोपों पर गिरफ्तार कराया गया व उन पर शारीरिक हमले कराये गए। उनकी हत्या के लिए इनाम घोषित कराये गए। उन पर सेना को बदनाम करने के मन गढ़ंत आरोप लगाए गए। जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट एवं रेलमंत्री को ट्वीट किए गए समाचारों से कन्हैया द्वारा व्यक्त तथ्यों की पुष्टि ही होती है। फिर भी उनका चरित्र हनन अभियान जारी है। 
ऐसे में प्रश्न उठता है कि अति वामपंथ अथवा क्रांति के नाम पर कन्हैया विरोधी अभियान चलाने वाले आखिर किसका भला कर रहे हैं। इसे समझने के लिए 1964 के सी पी आई के विभाजन को याद करना होगा। तब पार्टी में दलित व पिछड़ा वर्ग के लोग प्रभावी होने की स्थिति में आ रहे थे अतः ब्राह्मण वादियों ने सिद्धांतों का जामा पहना कर सी पी एम का गठन करके पार्टी को विभाजित कर दिया जिससे दोनों दलों में ब्राह्मण वर्चस्व बना रहा। सी पी एम से अनेक और विभाजन हुये परिणाम स्वरूप वामपंथ जनता से और दूर हो गया। केंद्र में दक्षिण पंथी तानाशाही चाहने वाला दल सत्ता में आ गया जो पुलिस,सेना,प्रशासन और न्यायपालिका तक को प्रभावित करने को प्रयत्नशील है।   इन परिस्थितियों की भयावत: के बीच उन कन्हैया  पर सोशल मीडिया के माध्यम से प्रहार किया जा रहा है जो दक्षिण पंथ विरोधी व्यापक एकता की बात की पहल कर रहे हैं। तब मतलब साफ है कि यह एक ब्राह्मण वादी साजिश है जो दक्षिण पंथ की ही सहायता का अभियान है। 

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फेसबुक पर प्राप्त  टिप्पणी ::

वस्तुतः आज भी मार्क्स की जय बोलते हुये मास्को/पेकिंग रिटर्ण्ड ब्राह्मण वादी कामरेड्स सामंतवादी/साम्राज्य वादी/सांप्रदायिक मानसिकता से ग्रस्त हैं परंतु विभिन्न दलों में ये ही नियंत्रक बने हुये हैं। अन्य लोगों को दबा/कुचल कर रखना इनका शगल है और विभिन्न विभाजनों के लिए ये ही जिम्मेदार हैं। इनका कहना है ओ बी सी व दलित से काम तो लो लेकिन उनको पद न दो । यह व्यवहार खुद में शोषण-उत्पीड़न ही है। कन्हैया ने सबको समान महत्व देने की बात उठाई है इसलिए दक्षिण पंथी और वामपंथी ब्राह्मण एक साथ उनका विरोध कर रहे हैं। 
हालांकि 'नौजवान भारत सभा' के कार्यालय पर भी रात को छापा डाला गया है। किन्तु दलित छात्रों जिनमें डॉ आंबेडकर के पौत्र भी शामिल हैं देशद्रोही बताया जा रहा है। 

जैसा आलोकतांत्रिक वातावरण व्याप्त हो रहा है उसमें सभी लोकतान्त्रिक लोगों को एकजुट होने की ज़रूरत है और यही प्रयास कन्हैया का है। जब लोकतन्त्र ही नहीं रहेगा तब जनता तो बस गुलाम ही होगी। इसलिए वामपंथ में घुसे आलोकतांत्रिक लोगों से सतर्क रहने की प्रबल आवश्यकता है। 

Tuesday, 15 March 2016

जेएनयू नहीं, लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई ----- कन्हैया

126 ***** जेएनयू के छात्रों ने देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में बंद उमर और अनिर्बान की रिहाई के लिए मंडी हाउस पर मार्च किया। इसी दौरान तीन लोग कन्हैया कुमार के मंच पर बढ़े और पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया।*****मंडी हाउस से संसद तक आयोजित इस मार्च को पुलिस ने संसद मार्ग थाने से आगे नहीं जाने दिया।
पीपल्स मार्च में आए लोगों को यहीं पर कन्हैया ने संबोधित किया। संबोधन के दौरान कन्हैया पर तीन बार हमला करने की कोशिश की गई।***** 




जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर मंगलवार को चार युवकों ने हमला करने की कोशिश की, जिसे वहां खड़े दिल्ली पुलिस के जवानों ने नाकाम कर दिया। पुलिस तुरंत ही उन युवक को काबू में करके संसद मार्ग थाने में ले गई। जब यह घटना घटित उस समय कन्हैया पीपल्स मार्च में आए लोगों को संबोधित कर रहे थे।

देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए जेएनयू के छात्र उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य की रिहाई के लिए जेएनयू छात्र संघ के बैनर तले एक पीपल्स मार्च का आयोजन किया गया था। मंडी हाउस से संसद तक आयोजित इस मार्च को पुलिस ने संसद मार्ग थाने से आगे नहीं जाने दिया।

पीपल्स मार्च में आए लोगों को यहीं पर कन्हैया ने संबोधित किया। संबोधन के दौरान कन्हैया पर तीन बार हमला करने की कोशिश की गई। पुलिस के चौकन्ने जवानों ने सभी हमलों को नाकाम कर दिया और हमला करने की कोशिश करने वाले चार युवकों को थाने ले गई।

इन हमलों के बारे में कन्हैया ने कहा कि अगर मेरे ऊपर हमला करने से किसी का भला होता है तो मैं उसके लिए भी तैयार हूं। जो मेरे ऊपर हमला करना चाहते हैं, दरअसल वह मोदी सरकार के बचे तीन सालों में सेट होना चाहते हैं। यदि मेरी वजह से किसी को नौकरी मिल जाए तो भला इससे अच्छा क्या हो सकता है। क्योंकि मोदी जी तो किसी को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं।

जेएनयू नहीं, लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई
पीपल्स मार्च को संबोधित करते हुए कन्हैया ने कहा कि यह मार्च सिर्फ जेएनयू बचाने के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र बचाने के लिए निकाला गया है। उन्होंने कहा कि तमाम तरह की साजिश की जा रही हैं। कहते हैं कि जेएनयू खतरनाक जगह है। जेएनयू खतरनाक जगह है क्योंकि वहां सरकार की जनविरोधी नितियों के खिलाफ आवाज उठाई जाती है। देश के विश्वविद्यालय जहां लोग ज्ञान प्राप्त करते हैं। वहां ज्ञान होता है जो लोकतंत्र को लेकर हो, जो संविधान को लेकर हो। यह सरकार उसी से ध्यान भटकाना चाहती है। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई में हमें आगे बढ़ते रहना होगा।

लेखिका अरुंधति राय भी पहुंची
मशहूर लेखिका अरुंधति राय भी पीपल्स मार्च में अपना समर्थन देने के लिए संसद मार्ग थाने पहुंची थीं। उन्होंने कहा कि यह 'नफरत करने वालों' और 'सोचने वालों' के बीच की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि जिन्हें वे देशद्रोही कहते हैं, वे भूमि, नदी और जंगलों से प्यार करते हैं।

Published:15-03-2016 07:44:31 PMLast Updated:15-03-2016 08:44:45 PM
   
http://www.livehindustan.com/news/ncr/article1-jnu-mandi-house-protest-three-people-tried-to-threaten-kanhaiyakumar-arrested-520948.html



https://www.youtube.com/watch?v=w8S6rTyz2hA&feature=youtu.be



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फेसबुक कमेंट्स : 

Tuesday, 8 March 2016

विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ------ राजेंद्र शर्मा


जेएनयू में छात्रों के एक ग्रुप के 9 फरवरी के जिस आयोजन के नाम पर, मोदी सरकार और संघ परिवार ने अपने सभी विरोधियों और सबसे बढ़कर वामपंथ को देशद्रोही दिखाने की जबर्दस्त मुहिम छेड़ी है, उस आयोजन को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। बेशक, इस क्रम में अफजल गुरु की फांसी की सजा के विरोध को जिस तरह देशद्रोह बनाने की कोशिश की गई है, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी भी प्रकार के नारे लगाने भर को राजद्रोह नहीं माना जा सकता है। वास्तव में इस संबंध में तो देश का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्टï राय दे चुका है और बाकायदा हिंसा के लिए फौरी उकसावे की शर्त लगा चुका है। फिर भी, उक्त आयोजन को लेकर सरकार समेत संघ परिवार की ''देशद्रोह के नमूनेÓÓ की निर्मिति खुद गंभीर संदेहों के घेरे में है। इन संदेहों के दो-तीन तत्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पहला, तथ्य जो खासतौर पर दिल्ली सरकार द्वारा कराई गई पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जांच से सामने आया है, यह है कि उक्त आयोजन के लिए दो टेलीविजन चैनलों के कैमरों को विशेष रूप से और निजी तौर पर बुलाया गया था। इनमें से एक चैनल को तो बाद में उक्त कार्यक्रम की रिकार्डिंग के साथ छेड़छाड़ कर के कन्हैया के मुंह से नारे लगवाने वाला फर्जी वीडियो बनाने के लिए, रंगे हाथों पकड़ा भी गया है। यह दूसरी बात है कि भाजपा सरकार के आशीर्वाद से इसके बावजूद, इस चैनल को कोई नोटिस तक नहीं मिला है, फिर दूसरों को वीडियो के साथ फर्जीवाड़ा न करने का सबक देने वाली कोई सजा दिए जाने का तो सवाल ही कहां उठता है। विश्वविद्यालय सिक्युरिटी के परिसर में प्रवेश के रिकार्ड के अनुसार, इन चैनलों को प्रस्तावित आयोजन से काफी पहले और जेएनयू के एबीवीपी नेताओं द्वारा बुलाया गया था।
इससे कम से कम एक बात तो निर्विवाद रूप से साबित हो ही जाती है। 9 फरवरी को जेएनयू में जो कुछ हुआ, स्वत:स्फूर्त नहीं था। उसके लिए कम से कम उन लोगों की तरफ से पूरी तैयारी थी, जिन्होंने बाद में इसे जेएनयू के खिलाफ हमले का हथियार बनाया। क्या टेलीविजन चैनल इस पूर्व-नियोजित टकराव को, संघ-एबीवीपी के पक्ष से दर्ज करने के लिए ही बुलाए गए थे? आखिरकार, 'देशभक्तों बनाम देशद्रोहियों के युद्घÓ के भोंडे रूपक के प्रचार के जरिए,  इस रिकार्डिंग का जेएनयू के छात्र आंदोलन को बदनाम करने में तो उपयोग किया ही जा सकता था। पहले पुणे फिल्म तथा टेलीविजन इंस्टीट्यूट, फिर मद्रास आईआईटी पेरियार-आंबेडकर स्टडी सर्किल, फिर गैर-नैट छात्रवृत्ति बंद किए जाने के खिलाफ आक्यूपाई यूजीसी और अंतत: रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या, हरेक मामले में मोदी सरकार और उसकी शिक्षा मंत्री के कदमों के खिलाफ संघर्ष के अगले मोर्चे पर रहे जेएनयू के वामपंथी छात्र आंदोलन पर अंकुश लगाना जरूरी था।
लेकिन, लगता है कि खेल शायद इससे भी बड़ा था। एबीवीपी के बुलाए वफादार चैनलों की रिकार्डिंग के माध्यम से सत्तापक्ष तथा उसके द्वारा नियंत्रित शासन-प्रशासन के पास, 9 फरवरी को जो कुछ हुआ था, उसकी साक्ष्यों समेत पूरी जानकारी शुरु से ही थी, जिसमें आपत्तिजनक नारे लगाने वालों से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। इसके बावजूद, पहले एबीवीपी व भाजपा सांसद की शिकायत के माध्यम से सिर्फ आपत्तिजनक नारों को उछाला गया और उनके लिए छात्रसंघ के अध्यक्ष व महासचिव समेत, वामपंथी छात्र नेताओं के मुंह में ये नारे रखने की कोशिश की गई। इनका झूठ अब बाकायदा पकड़ा जा चुका है।  लेकिन, कन्हैया की गिरफ्तारी से लेकर अब जमानत पर रिहाई तक, पिछले इतने घटनापूर्ण करीब चार हफ्तों में पुलिस, न सिर्फ उक्त नकाबपोशों को पकड़ नहीं पाई है बल्कि उनकी किसी तरह से पहचान तक नहीं कर पाई है। वास्तव में पुलिस इस सच्चाई को देखकर भी नहीं देखना चाहती है कि कोई बाहरी नकाबपोश थे, जिन्होंने उक्त आपत्तिजनक नारे लगाए थे।
इसका सबसे उदार अर्थ तो यही हो सकता है कि सरकार की और इसलिए उसकी पुलिस की भी दिलचस्पी, वास्तव में न तो उक्त राष्टï्रविरोधी नारों में थी और न उक्त नारे लगाने वालों को देश के कानून के तहत बनने वाली सजा दिलाने में। उनकी दिलचस्पी तो जेएनयू छात्र आंदोलन, जेएनयू और उसके बहाने से विपक्ष तथा विशेष रूप से वामपंथ को देशविरोधी प्रचारित करने में थी और यह उद्देश्य पूरा हो चुका है। लेकिन, इससे एक और गंभीर आशंका भी पैदा होती है। कहीं मौके पर संघ के वफादार टेलीविजन कैमरों की ही तरह, देश तोडऩे के नारे लगाने वाले नकाबपोशों की उपस्थिति भी प्रायोजित और इसलिए एक बड़े षडय़ंत्र का हिस्सा तो नहीं थी? बेशक, नवउदारवाद के इस जमाने में बार-बार कहकर 'षडय़ंत्र सिद्घांतÓ को इतना बदनाम कर दिया गया है कि ऐसे षडय़ंत्र की ओर इशारा करते हुए भी हिचक होती है। लेकिन, सच्चाई यह है कि दुनिया भर में सत्ताधारी ताकतेें, एजेंट प्रोवेकेटियरों का ऐसा उपयोग करती आई हैं और आज भी कर रही हैं।
वास्तव में इसी बीच सामने आई इशरत जहां प्रकरण को नया रंग देने की सारी कोशिशों के बावजूद, पूर्व-गृह सचिव जीके पिल्लै ने चिदंबरम तथा कांग्रेस को मुश्किल में डालने की कोशिश करते हुए भी, इस पूरे प्रकरण के खुफिया ब्यूरो का एक ''कंट्रोल्ड आपरेशनÓÓ होने की बात मानी है। सुरक्षातंत्र की भाषा के जानकारों के अनुसार, इस मामले में कंट्रोल्ड ऑपरेशन का संक्षिप्त अर्थ है—बहकाकर बुलाना और खत्म कर देना! हालांकि यह सोचकर दहशत होती है, फिर भी सच यही है कि जो खुफिया एजेंसियां एक कॉलेज छात्रा समेत चार लोगों को, उनकी पृष्ठïभूमि कुछ भी हो, फंसाकर षडय़ंत्रपूर्वक मौत के घाट उतार सकती हैं और इससे सत्ताधारी नेताओं की हत्या के षडय़ंत्र को विफल करना प्रचारित कर सकती हैं, क्या एक कार्यक्रम में अपने 'मनचाहेÓ नारे लगवाने के लिए तीन नकाबपोश खड़े नहीं कर सकती हैं? क्या पुलिस इसीलिए उन्हें बचा रही है? मुद्दा नारों के देशद्रोहात्मक या राजद्रोहात्मक होने न होने का नहीं है। मुद्दा इस मुद्दे को इतना तूल देने के बावजूद, ये नारे लगाने वालों की सही पहचान करने से शासनतंत्र के कतराने का है। जब तक उक्त नकाबपोशों की पक्की पहचान नहीं की जाती है और इसी के हिस्से के तौर पर छात्रसंघ के पदाधिकारियों समेत वामपंथी छात्र नेताओं को उक्त नारों से अलग नहीं किया जाता है, तब तक यह संदेह बना ही रहेगा और समय गुजरने के साथ और गहरा होता जाएगा कि कहीं यह भी छात्र आंंदोलन तथा आम तौर पर विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ऑपरेशन उनके लिए अंतत: फायदे का सौदा होगा या घाटे का, यह एक अलग विषय है।

http://www.deshbandhu.co.in/article/5758/10/330#.Vt0ab30rK1s

Tuesday, 1 March 2016

देशभक्त बेटे को देशद्रोही कहा जा रहा है ------ मुचकुंद कुमार

***** पर कन्हैया के परिवारजनों, शुभचिंतकों, मित्रों के अंदर यह सवाल तो उठ ही रहा है(जो बिल्कुल जायज भी है) कि राष्ट्रपिता के हत्यारे की जयजयकार संसद परिसर में खुलेआम करने वाले देशद्रोही नहीं होते पर देश सेवा के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं करने वाला उनका कन्हैया, भगत सिंह को अपना आदर्श बताने वाला कन्हैया देशद्रोही है! *****



February 23
12:29201

  देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद कन्हैया कुमार के लकवाग्रस्त 60 वर्षीय पिता जयशंकर सिंह एवं आंगनबाड़ी सेविका के रूप में महज साढ़े तीन हजार रुपये के मानदेय पर काम करने वाली मां मीना देवी ने यह समझाने की पूरी कोशिश की थी कि देश सेवा और समाज सेवा के साथ करियर भी जरूरी चीज है। इतना पढ़-लिख गए हो तो कोई नौकरी पकड़ लो ताकि दूसरे परिवार की तरह हमारे परिवार की स्थिति भी सुधरे। पर कन्हैया ने कहा कि करियर बने न बने, मुझे देश के लिए काम करना है। गरीबों, मजलूमों व असहायों के लिए जीना है। उसे मैं नहीं छोड़ सकता। जयशंकर सिंह ने भी ज्यादा दबाव नहीं दिया क्योंकि ये संस्कार तो उन्होंने ही अपने बेटे को दिए थे। पर देश के लिए काम करने का जज्बा अपने मन में पालने वाले जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया का आज देशद्रोह के आरोप में जेल जाना जयशंकर सिंह के लिए किसी सदमेे से कम नहीं है। सदमा इस बात के लिए नहीं कि बेटा जेल चला गया। सदमा इस बात के लिए कि उनके देशभक्त बेटे को देशद्रोही कहा जा रहा है। सचमुच यह बहुत सारे लोगों के लिए विस्मय का विषय ही है कि जिस कन्हैया को उन्होंने कबीरा खड़ा बाजार में, कुमति नगर का किस्सा जैसे नाटकों में रंगमंच पर अभिनय करते हुए देखा। जिस कन्हैया को बचपन से ही गरीबों, मजलूमों के पक्ष में खड़ा होते हुए देखा वह आज देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद है। बेगूसराय बीहट के मसनदपुर टोले में बेहद साधारण परिवार में कन्हैया का जन्म हुआ। पिता जीप चालक के रूप में किसी तरह रोजी-रोटी की व्यवस्था करते थे। सरकारी विद्यालय से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कर जेएनयू पहुंचना कन्हैया जैसे छात्रों के लिए आश्चर्य की बात थी पर अदम्य इच्छा शक्ति, जज्बा एवं प्रतिभा ने ही यह मुमकिन किया कि वह जेएनयू का छात्र बन पाया। कन्हैया के मित्रों एवं परिजनों के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल है कि जो कन्हैया हमेशा अपने सहकर्मियों को भगत सिंह की विचारधारा से रू-ब-रू करवाते रहता था। पत्र-पत्रिकाओं समेत विभिन्न तरह की किताबों से दोस्ती करने के लिए प्रेरित करते रहता था वह आखिर देशद्रोही कैसे हो सकता है!
विगत विधानसभा चुनाव में कन्हैया बेगूसराय आया था और अपने पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में सैकड़ों सभाएं की थी। जिन लोगों ने भी उसे बोलते हुए सुना वे सब उसके प्रशंसक बन गए। आज उनसबके लिए भी यह अकल्पनीय ही है कि कैसे वह ऐसा हो सकता है? निश्चित रूप से कोई गहरी साजिश है, यह भी कुछ लोग मान रहे हैं। पर जो भी हो फिलहाल वह सींखचो के अंदर है और बाहर घमासान मचा है। पर कन्हैया के परिवारजनों, शुभचिंतकों, मित्रों के अंदर यह सवाल तो उठ ही रहा है(जो बिल्कुल जायज भी है) कि राष्ट्रपिता के हत्यारे की जयजयकार संसद परिसर में खुलेआम करने वाले देशद्रोही नहीं होते पर देश सेवा के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं करने वाला उनका कन्हैया, भगत सिंह को अपना आदर्श बताने वाला कन्हैया देशद्रोही है!

सूरज में लगे धब्बे फितरत के करिश्मे हैं।
मुचकुंद कुमार (लेखक शिक्षाविद् हैं)।

http://www.begusaraimedia.com/?p=5759

Thursday, 25 February 2016

रोहित वेमुला के हत्यारों को सज़ा दो! कन्हैया को तत्काल रिहा करो !! --- लोकतन्त्र बचाओ मार्च




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लखनऊ, 25 फरवरी, 2016 आज दोपहर 22,कैसरबाग  स्थित  भाकपा कार्यालय से CPI, CPI(M ), CPI(ML ), SUCI(C), AIFB, एडवा, एपवा, महिला फेडरेशन,एस एफ आई, आइसा, ए आई एस फ , पी यू सी एल, डी आई एफ आई, जसम, जलेस, प्रलेस, इप्टा, कलम सांस्कृतिक मंच, रिहाई मंच, राहुल फाउंडेशन, अलग दुनिया, साझी दुनिया, वर्कर्स काउंसिल,सी आई टी यू, एटक, निर्माण मजदूर सभा, भवन निर्माण मजदूर सभा आदि संगठनों के तत्वावधान में एक जुलूस प्रारम्भ हुआ जो सफ़ेद बारादरी, कैसरबाग, लालबाग, हलवासिया, हजरतगंज होते हुये अंबेडकर प्रतिमा पर एक सभा में परिवर्तित हो गया। सभा की अध्यक्षता लखनऊ विश्व विद्यालय की पूर्व उपकुलपति डॉ रूप रेखा वर्मा ने की और संचालन कामरेड प्रदीप शर्मा ने। मार्ग में जुलूस के दौरान और सभा के मध्य में लगाए जाने वाले नारों में प्रमुख थे रोहित वेमुला के हत्यारों को गिरफ्तार करो , कामरेड कन्हैया को बिना शर्त  रिहा करो , डॉ अंबेडकर के संविधान की रक्षा करो, शिक्षण संस्थाओं का दमन बंद करो इत्यादि। 

सभा में बोलने वाले मुख्य वक्ता थे क्रमशः रमेश सिंह सेंगर, डॉ गिरीश, सुभाषिनी  अली, वंदना मिश्रा, विजय सिंह, वीरेंद्र यादव, इप्टा के राकेश, रमेश दीक्षित, राहुल फाउंडेशन के सत्येन्द्र। अध्यक्षीय भाषण व धन्यवाद ज्ञापन डॉ रूप रेखा वर्मा ने दिया। 

लगभग सभी वक्ता इस बात पर सहमत थे कि, शोद्ध छात्र रोहित वेमुला के उत्पीड़न और उसकी हत्या तुल्य आत्म-हत्या से उपजी समस्याओं का निराकरण करने में विफल रहने पर JNUSU अध्यक्ष कामरेड कन्हैया को षड्यंत्र पूर्वक  झूठा इल्जाम लगा कर गिरफ्तार किया गया है ।  वक्ताओं ने रोहित की हत्या के लिए जिम्मेदार केंद्रीय मंत्रियों को बर्खास्त किए जाने तथा उसे न्याय दिलाये जाने की पुरजोर मांग की तथा कन्हैया पर लगाए गए झूठे आरोपों को वापिस लेकर तुरंत बिना शर्त रिहाई की मांग की। वक्ताओं ने न्याय प्राप्त होने तक संघर्ष किए जाने का ऐलान किया और इसे और व्यापक रूप देकर जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। 

सभा में आज इलाहाबाद में तथा कल लखनऊ में हुये संघी आतंकवाद व हिंसा की घोर निंदा की गई। कन्हैया पर अदालत में हुये कातिलाना हमले को केंद्र सरकार की कायराना हरकत बताया गया। 

प्रदर्शन - जुलूस  व सभा में अन्य  लोगों के अतिरिक्त कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़, अशोक मिश्रा, परमानंद दिवेदी, मोहम्मद अकरम, शरीफ, मास्टर सत्यनारायण, मधुकर मौर्या, प्रदीप घोष,विजय माथुर, डॉ सक्सेना, रिशी श्रीवास्तव,कौशल किशोर ,शकील अहमद सिद्दीकी,आनंद तिवारी,ओ पी अवस्थी, ओ पी सिन्हा, के के शुक्ल, महेश देवा, मधु गर्ग, ताहिरा हसन,लता राय,आशा मिश्रा,कान्ति मिश्रा, सुशीला पूरी, कल्पना पांडे तथा काफी संख्या में ई-रिक्शा चालक आदि भी शामिल थे।  

Wednesday, 24 February 2016

देश अराजकता के हवाले.. कन्हैया को जमानत नहीं ----- Surendra Grover

***** प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर जमानत का विरोध होगा और ‪#‎न्यायालय‬ उसी आधार पर निर्णय लेगा जोकि पुलिस के पक्ष में होगा.. यानि कन्हैया को जमानत नहीं मिलेगी..
देश अराजकता के हवाले.. *****
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http://www.livehindustan.com/news/national/article1-jnu-issue-kanhaiya-bail-hearing-extend-upto-29-february-by-delhi-high-court-518219.html


https://www.facebook.com/grover.surendra/posts/782637625201887




Surendra Grover
New Delhi, India
वाब किसी के पास नहीं.. एक समझदार अफसर की तरह बस्सी सबसे पहले उस न्यूज़ चैनल से, जिसने वो वीडियो रिकॉर्ड किया था, उस वीडियो का फुटेज जब्त कर उसकी ‪#‎फोरेंसिक_जांच‬करवाते और उसकी फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही करते तो आज देश इस तरह आक्रोशित नहीं होता..
यदि #JNU में सच में भारत की बर्बादी जैसी बात प्रामाणिक तौर पर सामने रखी जाती तो पुलिस कार्यवाही का इतना विरोध नहीं होता और न ही उन्हें ‪#‎PMO‬ में तलब कर डाँट ही पिलाई गई होती.. यही नहीं सेवा निवृति के बाद ‪#‎सूचना_आयुक्त‬ पद के लिए उनका विरोध भी नहीं होता..
खैर, अब सरकार और पुलिस अपनी खाल बचाने के लिए आक्रामक हो गई है.. ध्यान दें, पुलिस प्रत्यक्षदर्शियों के crpc की धारा 161 में बयान ‪#‎कन्हैया‬ की जमानत के विरोध में पेश करेगी.. 😂😂 पुलिस ऐसे गवाह पैदा कैसे करती है यह किसी से छुपा नहीं है.. कोई वैज्ञानिक जांच नहीं आ रही उस वीडियो की कि साउंड ट्रैक असल है या एडिट कर इन्सर्ट किये गए.. प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर जमानत का विरोध होगा और ‪#‎न्यायालय‬ उसी आधार पर निर्णय लेगा जोकि पुलिस के पक्ष में होगा.. यानि कन्हैया को जमानत नहीं मिलेगी..
देश अराजकता के हवाले..

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https://www.facebook.com/grover.surendra/posts/782637625201887

देखिये कितना सटीक रहा सुरेन्द्र ग्रोवर जी का निष्कर्ष : 

http://www.livehindustan.com/news/national/article1-jnu-issue-kanhaiya-bail-hearing-extend-upto-29-february-by-delhi-high-court-518219.html

यह यों भी स्पष्ट था कि, आक्रांता वकीलों ने सुदृढ़ दावा किया था कि कन्हैया को जमानत नहीं मिलेगी। भले ही भाजपा प्रतिनिधि ने उनको सूरमा भोपाली व एंकर महोदया ने बड़बोला कहा हो और पुलिस कमीशनर साहब ने उनकी बातों पर ध्यान न देने को कहा हो लेकिन उनकी पहुँच तो केंद्र सरकार तक है ही। 

http://aajtak.intoday.in/story/sting-operation-patiala-house-accused-lawyers-exposed-how-they-planned-to-beat-kanhaiya-1-855926.html