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Wednesday, 22 July 2026

आंदोलन मर गया है ------ सुनिधि

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स्पेशल एपिसोड | जनता नहीं मरी है, आंदोलन मर गया है!

जब संघर्ष असली होता है, तब सत्ता भी झुकती है और जनता भी उठ खड़ी होती है।

नमस्कार साथियों,

मैं हूँ सुनिधि और आप देख रहे हैं "राम या वाम"।

साथियों, आज का यह एपिसोड सिर्फ एक राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि वामपंथ और जन आंदोलनों के सामने खड़े सबसे बड़े सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है।

कल दिल्ली की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसने वर्षों से फैलाए जा रहे एक बड़े राजनीतिक झूठ को बेनकाब कर दिया।

हमें लगातार बताया गया कि आज का युवा सिर्फ धर्म, राष्ट्रवाद और प्रचार की राजनीति में उलझ चुका है। कहा गया कि अब युवा सड़क पर नहीं उतरता, उसे केवल सोशल मीडिया की राजनीति पसंद है।

लेकिन कल दिल्ली ने इस झूठ की धज्जियाँ उड़ा दीं।

हजारों युवा सड़कों पर थे।

लाठी चली...

आँसू गैस चली...

पानी की बौछारें चलीं...

लेकिन युवा पीछे नहीं हटे।

इसका मतलब साफ़ है।

युवा मरा नहीं है।

उसका गुस्सा मरा नहीं है।

उसकी लड़ने की इच्छा मरी नहीं है।

मर गई है तो केवल वह राजनीति, जिसने संघर्ष करना छोड़ दिया है।

ध्यान से देखिए...

शुरुआत में इस आंदोलन में भीड़ नहीं थी।

लेकिन जैसे-जैसे लोगों को भरोसा हुआ कि यह केवल फोटो खिंचवाने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि अंत तक लड़ने वाला संघर्ष है, वैसे-वैसे जनता भी जुड़ती चली गई।

जनता भाषण नहीं देखती...

जनता प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं देखती...

जनता यह देखती है कि नेता उसके साथ लाठी खाता है या नहीं।

जेल जाता है या नहीं।

अनशन करता है या नहीं।

अंत तक डटा रहता है या नहीं।

यही भरोसा आंदोलन की सबसे बड़ी पूँजी होता है।

अब मैं वामपंथ से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ।

जिस संगठन की पूरे देश में मजबूत संरचना भी नहीं है, जो अभी शुरुआती दौर में है, यदि वह लगातार संघर्ष करके हजारों युवाओं को सड़क पर ला सकता है...

तो फिर सौ साल पुराना वामपंथ जनता को क्यों नहीं जगा पा रहा है?

क्या जनता खत्म हो गई?

नहीं।

क्या मुद्दे खत्म हो गए?

नहीं।

महँगाई है।

बेरोज़गारी है।

निजीकरण है।

चार श्रम संहिताएँ हैं।

आउटसोर्सिंग है।

मजदूरों पर हमले हैं।

किसानों की बदहाली है।

संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस है।

यानी मुद्दों का पहाड़ खड़ा है।

फिर भी आंदोलन क्यों नहीं खड़े हो रहे?

क्योंकि संघर्ष की राजनीति की जगह कार्यक्रमों की राजनीति ने ले ली है।

एक दिन धरना...

एक दिन प्रदर्शन...

एक ज्ञापन...

एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस...

फिर सब अपने-अपने घर।

क्या ऐसे सत्ता बदलती है?

क्या ऐसे इतिहास लिखा जाता है?

बिल्कुल नहीं।

इतिहास हमेशा उन्हीं लोगों ने लिखा है जिन्होंने आख़िरी साँस तक लड़ाई लड़ी।

अन्ना आंदोलन...

किसान आंदोलन...

देश के तमाम बड़े जन आंदोलन...

इन सबने साबित किया कि जनता तभी जुड़ती है जब उसे विश्वास होता है कि नेतृत्व बिकेगा नहीं, झुकेगा नहीं और भागेगा नहीं।

यही वह जगह है जहाँ, मेरी राय में, आज वामपंथ का एक हिस्सा सबसे बड़ी भूल कर रहा है।

ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के लिए संघर्ष से ज़्यादा महत्वपूर्ण कुर्सी हो गई है।

उन्हें डर रहता है कि बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ तो नए कार्यकर्ता उभरेंगे, नया नेतृत्व सामने आएगा और वर्षों से जमी हुई राजनीति को चुनौती मिलेगी।

इसलिए आंदोलन को बड़ा होने से पहले ही सीमित कर दिया जाता है।

और ये ऐलसोनवादी नेतृत्व जिन्हें न तो आंदोलन से मतलब है ना जनता के दर्द से मतलब है यह सिर्फ और सिर्फ किसी तरह पद पर बना रहना है ताकि समय पर सौदेबाजी कर अपने लिए उचित लाभ प्राप्त कर सके, उन्होंने आंदोलन करना सिर्फ छोड़ ही नहीं दिया है बल्कि उन्हें आंदोलन से विश्वास उठ गया है उन्हें पता है बड़े आंदोलन में 9 केवल सरकारी होती है बल्कि बहुत सारे नेतृत्वकारी साथी सामने आ जाते हैं और जैसे किसी भी साधु की तपस्या से इंद्र डर जाता है उसका अपना इंद्रासन खतरे में दिखाई देने लगता है ठीक उसी तरह से बड़े आंदोलन से यह तथाकथित वामपंथी नेता डर जाते हैं उन्हें अपनी कुर्सी खतरे में दिखाई देने लगती है और इसलिए वह ऐसा नहीं होने देना चाहते इसलिए आंदोलन मर रहा है बाम आज भी समाज में अपना स्थान रखता है लोगों के बीच उसके मुद्दे उसके तौर तरीके महत्व रखते हैं या आज भी अप्रांसगिक नहीं हुआ है लेकिन एक षड्यंत्र के तहत इसके वर्तमान नेतृत्व इसे असफल बनाने का प्रयास करता रहा है

धरना हो...

लेकिन लंबा नहीं।

संघर्ष हो...

लेकिन निर्णायक नहीं।

भीड़ आए...

लेकिन नेतृत्व न बदले।

यही सोच आंदोलन को मार रही है।

याद रखिए...

वामपंथ नहीं मरा है।

वामपंथ का विचार नहीं मरा है।

मरा है तो संघर्ष का साहस।

जिस दिन वामपंथ फिर से जनता के बीच जाएगा...

जिस दिन मजदूर, किसान, छात्र और नौजवान के सवालों पर महीनों तक डटकर लड़ना शुरू करेगा...

उसी दिन लाखों लोग फिर लाल झंडे के नीचे दिखाई देंगे।

क्योंकि जनता आज भी न्याय चाहती है।

जनता आज भी बराबरी चाहती है।

जनता आज भी संघर्ष करने वालों का सम्मान करती है।

इसलिए मैं एक बार फिर कहता हूँ—

जनता नहीं मरी है...

आंदोलन मर गया है...

और जिस दिन आंदोलन फिर ज़िंदा होगा...

उसी दिन इतिहास फिर करवट लेगा।

लाल सलाम!

इंकलाब ज़िंदाबाद!

शुद्धिकरण अभियान समिति ज़िंदाबाद! 


संदर्भ =====  https://www.facebook.com/reel/1747155269800555/?__cft__[0]=AZaVxDFNlwnAHM0qpX8Miz5BqFNBgMdGxx9WAZD0Vllg2HQ6aFCoywq4z_8Xls-W7ITfJdmrakOhbcSr1si3jF1uhTa_-_0lxkjsbWoWjyT_4VeBEX4sZLxuHRx2OxxrfoOIQJDqozOtS4rQlbPsS7VzPz4LJzMHqGfijRCcq0s_XQV4p8XX7-YQSknFH13ylac&__tn__=%2CO%2CP-y-R

Thursday, 24 January 2019

EVM दुरुपयोग का सनसनीखेज रहस्योद्घाटन








जिस प्रकार केरल भाजपा से CPM और बंगाल CPM से भाजपा में कार्यकर्ताओं का आदान - प्रदान हुआ है एवं बंगाल की कुछ पंचायतों में CPM - BJP ने गठजोड़ करके TMC को रोका है तथा TMC के विरोध में जिस प्रकार BJP के अध्यक्ष को हेलीकाप्टर उतारने के लिए CPM ने अपनी जमीन उपलब्ध कराई है उसने वामपंथ की विश्वसनीयता को न केवल संदिग्ध बनाया है बल्कि वामपंथ ने खुद को जन - कोप का भाजन भी बना लिया है। EVM रहस्योद्घाटन को जिस प्रकार कांग्रेसी कपिल सिब्बल का स्टंट बताया जा रहा है वह निश्चय ही संदेहास्पद कृत्य है क्योंकि उस प्रेस कान्फरेंस में भाजपा, सपा, बसपा समेत अनेक राजनीतिक दलों को  बुलाया  गया था। कपिल सिब्बल पहुँच गए बाकी पहुंचे नहीं परंतु EVM से चुनाव को संदिग्ध मान कर उसका विरोध तो कर रहे हैं। 





Sunday, 8 November 2015

विचारधारा से ज्यादा जमीनी और व्यवहारिक राजनीति को समझने की जरूरत है ------ चंद्रेश्वर पाण्डेय / विजय राजबली माथुर

******!अब बिहार और देश में भी बाकी सेकुलर और वाम शक्तियों को भी एक मोरचे में शामिल होने की जरूरत है !अभी विचारधारा से ज्यादा जमीनी और व्यवहारिक राजनीति को समझने की जरूरत है।



चंद्रेश्वर पाण्डेय
Edited

लालू और नीतीश की जोड़ी को सलाम !महागठबंधन को सलाम !राजद --जद यू ---काँग्रेस को सलाम !सोनिया --राहुल को सलाम !बिहार की महान जनता को सलाम !बिहार ने हमेशा देश की राजनीति को नई दिशा देने का काम किया है ! देश के इस दौर में फासिज्म के बढ़ते क़दम को रोकने की दिशा में ये बिहार अगुवा की भूमिका में आएगा !बिहार के डीएनए में सहिष्णुता ,समन्वय और उदारता के भाव अन्तर्निहित हैं !इस जीत के पीछे किञ्चित पुरस्कार वापसी आंदोलन की भूमिका भी जरूर होगी ! 'साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। 'हिंदी और भारतीय भाषाओँ के उन तमाम लेखकों और उनके संगठनों को भी सलाम ,जिन्होंने इस जीत के लिए एक माहौल बनाया !बिहार में पिछड़े ,अति पिछड़े ,दलित ,महादलित ,अल्पसंख्यक और प्रगतिशील --जनवादी सवर्ण गोलबंद थे। आज लालू जी ने एक मार्के की बात कही कि हमारे और नीतीश में एक फ़र्क ये है कि हम खोल के बोलता है और नीतीश ढँक के बोलते हैं। लालू जी ने ये भी कहा कहा कि' हम बिहारी लोग उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाता है !'लालू जी के खोल के बोलने की अदा पर भला कौन बिहारी न फ़िदा हो जाय !लालू जी ,आपने फ़ासिज्म और साम्प्रदायिकता को रोकने की दिशा में आगे दिल्ली कूच करने की बात की है ,आप छठ के बाद लालटेन लेकर बनारस भी जाने वाले हैं !आपके साहस और दिलेरी को सलाम ,जो एक खिलंदरपन भी लिए हुए है !अब बिहार और देश में भी बाकी सेकुलर और वाम शक्तियों को भी एक मोरचे में शामिल होने की जरूरत है !अभी विचारधारा से ज्यादा जमीनी और व्यवहारिक राजनीति को समझने की जरूरत है।अब लालू और नीतीश से उम्मीद है कि वे पिछली भूलों से सबक लेते हुए बिहार को एक नया बिहार और एक बेहतर बिहार बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे !वे बिहार और वहाँ की युवा पीढ़ी को निराश नहीं करेंगे !उन्हें अशेष शुभ कामनाओं के साथ एक बार फिर सलाम!

https://www.facebook.com/chandreshwar1/posts/870166289726663?pnref=story


1925 में  आज़ादी के आंदोलन को तीव्र करके एक समता मूलक समाज गठित करने को गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आज विचार धारा के नाम पर अनेक पार्टियों में विभाजित है जबकि 1925 में ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर एस एस अपने अनेक स्व-निर्मित संगठनों के माध्यम से विभिन्न राजनीतिक दलों में घुसपैठ बनाते हुये केंद्र की सत्ता पर काबिज है। आज संघ नियंत्रित फासिस्ट सरकार देश में एक दक्षिण पंथी असैनिक तानाशाही की दिशा में कदम-दर-कदम बढ़ती जा रही है। बिहार के इन चुनाव परिणामों के बाद यदि सभी फासिस्ट विरोधी दल एकजुट न हुये तो वामपंथियों को पहले साफ करते हुये सभी विपक्षी दलों को फासिस्ट शक्तियाँ निगलने का उपक्रम करेंगी। या तो उनसे उनकी ही तरह सैन्य संगठन बना कर रक्त रंजित संघर्ष में परास्त करना होगा या फिर अपनी प्रचार शैली को बदल कर जन-समर्थन हासिल करना होगा जिसमें वामपंथियों की सबसे बड़ी बाधा 'नास्तिकता' : एथीस्टवाद है। हमें जनता के सामने फासिस्ट शक्तियों को 'अधार्मिक' सिद्ध करना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं अन्यथा सैन्य बल पर सत्ता प्राप्ति के बाद भी सोवियत रूस के पतन की भांति ही उसे गवां  भी देंगे। 



सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा(मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य। इंनका का विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए।
विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ'धारण करने का उल्लेख किया है। नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है।
वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -
'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।
'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =
हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।
'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=
हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। ।
'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=
सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान ।
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों कोई न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। ।
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।

ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही साम्यवाद का मूलाधार है । जब मैक्स मूलर साहब भारत से मूल पांडुलिपियाँ ले गए तो उनके द्वारा किए गए जर्मन भाषा मे अनुवाद के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास केपिटल'एवं 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'की रचना की। महात्मा हेनीमेन ने 'होम्योपैथी' की खोज की और डॉ शुसलर ने 'बायोकेमी' की। होम्योपैथी और बायोकेमी हमारे आयुर्वेद पर आधारित हैं और आयुर्वेद आधारित है 'अथर्ववेद'पर। अथर्ववेद मे मानव मात्र के स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र दिये गए हैं फिर इसके द्वारा नारियों की निंदा होने की कल्पना कहाँ से आ गई। निश्चय ही साम्राज्यवादियो के पृष्ठ-पोषक RSS/भाजपा/विहिप आदि के कुसंस्कारों को धर्म मान लेने की गलती का ही यह नतीजा है कि,कम्युनिस्ट और बामपंथी 'धर्म' का विरोध करते हैं । मार्क्स महोदय ने भी वैसी ही गलती समझने मे की । यथार्थ से हट कर कल्पना लोक मे विचरण करने के कारण कम्युनिस्ट जन-समर्थन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषक -उत्पीड़क वर्ग और-और शक्तिशाली होता जाता है।
आज समय की आवश्यकता है कि 'धर्म' को व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलालों (तथाकथित धर्माचार्यों)के चंगुल से मुक्त कराकर जनता को वास्तविकता का भान कराया जाये।संत कबीर, दयानंद,विवेकानंद,सरीखे पाखंड-विरोधी भारतीय विद्वानों की व्याख्या के आधार पर वेदों को समझ कर जनता को समझाया जाये तो जनता स्वतः ही साम्यवाद के पक्ष मे आ जाएगी। काश साम्यवादी/बामपंथी विद्वान और नेता समय की नजाकत को पहचान कर कदम उठाएँ तो सफलता उनके कदम चूम लेगी। वरना दिल्ली की सड़कों पर सत्ता के अंतिम रक्तरंजित संघर्ष के लिए आर एस एस से लड़ने हेतु मुकम्मल तैयारी करें।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/965212736874036

------ विजय राजबली माथुर 

Wednesday, 4 November 2015

जनता के मर्म को समझने वाले एक जन-प्रिय नेता : कामरेड अतुल अनजान ------ विजय राजबली माथुर



(Atul Kumar Anjaan recently was invited by Miss Rolene Strauss- MISS WORLD 2014 
both had a conversation on current issues..... had a great conversation with her... I also had an opportunity to meet Miss Carina Tyrrell - MISS ENGLAND 2014 and Miss Aditi Arya - MISS INDIA 2015
earlier I was having inmpression that these are only beautiful girls but I found they are just only not beautiful but they are so intelligent and intellectually sound too..)
https://www.facebook.com/atul.anjaan.9/timeline/story?ut=43&wstart=0&wend=1448956799&hash=3772699294389714288&pagefilter=3&pnref=story
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
                                  (मैथिलीशरण गुप्त )


अहंकार से कोसों दूर हैं कामरेड अतुल अनजान साहब और इसी वजह से जनता व कार्यकर्ताओं के दिलों में उनके लिए जो जगह है उसे कोई छीन नहीं पाता है। 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे' की तर्ज़ पर कुछ सिरफिरे या हकीकत में बाजारवादी/ब्राह्मणवादी और अश्लीलता समर्थक वामपंथियों ने उनके व्यक्तित्व  पर एक नहीं अनेकों बार निजी हमले किए हैं। किन्तु वह पूर्ण समर्पण भाव से अपने कर्म में लगे रहते हैं और निंदकों पर जवाबी प्रहार किए बगैर ही आगे बढ़ते रहते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि वह अपनी निजी चिंता किए बगैर जन-सेवा में लगे रहेंगे। अभी बिहार के चुनावों में भी उन्होने बावजूद अस्वस्थता के काफी सक्रिय भाग लिया है।वामपंथी होते हुये भी जिन अदूरदर्शी जनों ने उन पर अनर्गल, अवांछनीय और आधारहीन आरोपों की बौछार की उनके संबंध में भी उनका सिर्फ इतना ही कहना है की, 'दुश्मनी करो लेकिन इतनी भी नहीं कि फिर दोस्ती होने पर शर्मिंदा होना पड़े '।   

कामरेड अतुल अनजान लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और AISF के भी पूर्व अध्यक्ष तो हैं ही। वर्तमान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 'राष्ट्रीय सचिव' तथा AIKS-अखिल भारतीय किसानसभा के 'राष्ट्रीय महामंत्री हैं'।  न केवल अपनी ओजस्वी वाक-शैली वरन जनता के मर्म को समझने वाले एक जन-प्रिय नेता के रूप में भी जाने जाते हैं। 

यदि भाकपा केंद्रीय नेतृत्व उनके राष्ट्रीय कृत्यों के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में पार्टी के पथ -प्रदर्शक के रूप में उनको अतिरिक्त भार  दे दे  तो पार्टी को अत्यंत लाभ हो सकता है।  
http://communistvijai.blogspot.in/2013/12/blog-post_24.html
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Sunday, 4 October 2015

पूर्ववर्तियों का स्मरण : सराहनीय व अनुकरणीय प्रयास -----विजय राज बली माथुर



लखनऊ,0 2 अक्तूबर 2015 : आज गांधी/शास्त्री जयंती थी 22-क़ैसर बाग,स्थित भाकपा ज़िला कार्यालय पर पूर्व जिलामंत्री कामरेड बाबू खाँ साहब की 20 वीं वीं पुण्य तिथि मनाने के लिए प्रमुख कामरेड्स एकत्रित हुये थे। गत वर्ष की भांति ही इस वर्ष भी जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब व मोहम्मद अकरम खान के सौजन्य से इस स्मृति सभा का आयोजन किया गया था। उपस्थित वक्ताओं ने कामरेड बाबू खान साहब के चरित्र व विचारों पर अमल करने का संकल्प दोहराया। आपा-धापी और उठा-पटक के इस नाज़ुक दौर मे कामरेड ख़ालिक़ साहब द्वारा अपने पूर्ववर्तियों का स्मरण करना एक सराहनीय व अनुकरणीय प्रयास है।
कामरेड अतुल अंजान - पार्टी की 'रीढ़' :कामरेड शिव प्रकाश तिवारी 
04/10/2014 --13 :11 
लखनऊ,04  अक्तूबर 2014 : परसों  गांधी/शास्त्री जयंती थी परंतु हम लोग 22-क़ैसर बाग,स्थित भाकपा कार्यालय पर पूर्व जिलामंत्री कामरेड बाबू खाँ साहब की 19 वीं पुण्य तिथि मनाने के लिए एकत्रित हुये थे।  विचार गोष्ठी की अध्यक्षता का भार वयोवृद्ध कामरेड शिव प्रकाश तिवारी जी के कंधों पर था। संचालन जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब ने किया। उन्होने बाबू खाँ साहब के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने हेतु सर्व प्रथम वयोवृद्ध कामरेड मुख्तार अहम्मद साहब को आमंत्रित किया।
मुख्तार साहब ने बाबू खाँ साहब के साथ काम करने के अनुभवों के आधार पर उनका सरल शब्दों में गूढ परिचय दिया। एक सादगी पसंद और नेक इंसान के रूप में उनको सदैव याद किया जाएगा ऐसी उम्मीद उन्होने ज़ाहिर की।

ओ पी अवस्थी साहब ने बताया कि उनकी जन्मतिथि उपलब्ध न होने के कारण उनकी पुण्य तिथि मनाई जा रही है। उन्होने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति के कार्यों का मूल्यांकन उसके जाने के बाद ही हो पाता है। 
मधुकर मौर्या ने नितांत निजी सम्बन्धों के आधार पर बाबू खाँ साहब का बेहद गुण गान किया। उन्होने कहा कि बाबू खाँ जैसा न कोई और कामरेड हुआ है और न आगे होगा। 


कामरेड राजपाल यादव ने इस दोहे के साथ बात की शुरुआत की कि ---
"दुख में सुमिरन सब करें,सुख में करे  न कोय। 
जो सुख में सुमिरन करे ,तो दुख काहे   होय । । "
उन्होने साफ-साफ कहा कि हमें निराश नहीं होना चाहिए और जीवन काल में ही कामरेड्स के गुणों को पहचान कर उनको सम्मान देना चाहिए। उन्होने कहा कि आदरणीय बाबू खाँ साहब जैसे और भी बहुत से कामरेड्स हमारे बीच में आज भी मौजूद हैं। इस कड़ी में उन्होने वर्तमान जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब की तुलना पूर्व जिलामंत्री बाबू खाँ साहब से की। 

कामरेड विजय माथुर ने कहा कि हमें महापुरुषों का स्मरण उनके आचरण को अपने व्यवहार में उतारने का संकल्प लेकर करना चाहिए न कि उनकी यादगार सभा में केवल चाय -नाश्ता करके और कोरा गुण गान  करके खाना-पूर्ती करनी चाहिए। 
उन्होने  प्रारम्भ में  कामरेड नजीरुल हक साहब का लिखा वह नोट पढ़ कर सुनाया जिसमें हक साहब ने 27-28 सितंबर 2014 को इस्लामाबाद में 5 वामपंथी गुटों के द्वारा मिल कर एक 'पाकिस्तान वर्कर्स अवामी पार्टी' बनाने की सूचना दी थी और भारतीय वामपंथियों का आह्वान किया था कि 'दुनिया के मजदूरों एक हो का स्लोगन देने वाले खुद तो एक हो'। http://vijai-vidrohi.blogspot.in/2014/09/duniya-ke-mazddoro-ek-ho-ka-slogan-dene.html
इसके बाद उन्होने किसान सभा व महिला सभा की कर्मठ नेत्री कामरेड अर्चना उपाध्याय जी द्वारा जारी नोट जिसमें उत्तर-प्रदेश भाकपा से सकारात्मक कदम उठाने की मांग की गई थी का ज़िक्र किया। एक कामरेड  ने सुझाव देते हुये कहा कि कामरेड माथुर को नजीरुल हक साहब का नोट 'मुक्ति संघर्ष' व 'पार्टी जीवन ' को प्रकाशनार्थ भेज देना चाहिए। उनका जवाब देते हुये कामरेड माथुर ने कहा कि 'मुक्ति संघर्ष' को भेज देंगे (प्रधान संपादक शमीम फैजी साहब को फेसबुक मेसेज के जरिये अब भेज दिया है ) लेकिन 'पार्टी जीवन ' नहीं छापेगा क्योंकि उसके कार्यकारी संपादक प्रदीप तेवारी उनके प्रति वितृष्णा भाव रखते हैं। उन्होने पार्टी की सिकुड़ती हुई स्थिति व गिरती हुई साख के लिए प्रदीप तेवारी को जिम्मेदार ठहराया। 
बीच में अनाधिकृत हस्तक्षेप करते हुये मधुकर मौर्या ने माथुर को बैठ जाने को कहा। उनको टोकते हुये राजपाल जी ने पूछा कि जब  सभा अध्यक्ष जी व जिलामंत्री जी कुछ नहीं कह रहे हैं तो मधुकर मौर्या किस हैसियत से हस्तक्षेप कर रहे हैं। इस पर अध्यक्ष जी व जिलामंत्री जी ने कामरेड माथुर को अपनी बात जारी रखने को कहा। किन्तु कामरेड माथुर ने यह कहते हुये कि --- 'सोते हुओं को तो जगाया जा सकता है लेकिन जो जागते हुये सोने का उपक्रम करें उनके लिए वह अब एक शब्द भी नहीं कहेंगे। जब इंसान उनको सुनने के लिए तैयार नहीं हैं तो दीवारों को सुनाने का कुछ फायदा नहीं है' ---आगे बोलने से इंकार कर दिया। *

कामरेड ख़ालिक़ साहब ने अपने मार्मिक उद्बोद्धन में बाबू खाँ साहब को निर्भीक,साहसी और ईमानदार नेता बताया। उन्होने ज़िक्र किया कि बाबू खाँ साहब कहते थे कि 'प' अक्षर से सावधान रहना चाहिए जैसे-पड़ौसी,पार्टी,पैसा,प्रचार,'प' अक्षर वाले आदमी आदि। ख़ालिक़ साहब ने बताया कि वह सबकी निस्स्वार्थ भाव से मदद करते थे और उनको किसी प्रकार का लालच नहीं था। बेहद सादगी से रहते हुये वह दबंग विचारों के धनी थे। सरकारी अधिकारी उनकी इज्ज़त करते हुये काम कर देते थे। उन्होने कहा कि सच में हमें आज बाबू खाँ साहब के आदर्शों पर चलने की बहुत ज़रूरत है।

अंत में धन्यवाद देने से पूर्व सभा-अध्यक्ष आदरणीय कामरेड शिव प्रकाश तिवारी जी ने कामरेड बाबू खाँ साहब के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर व्यापक प्रकाश डाला। उन्होने इस कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए कामरेड ख़ालिक़ को विशेष धन्यवाद भी दिया। उन्होने कहा कि बाबू खाँ साहब में न तो लालच था और न ही घमंड जिस वजह से वह हमेशा कामयाब रहे। लेकिन अब के कामरेड्स उनके आचरण को अपने जीवन में उतारना ही नहीं चाहते। उन्होने युवा साथी राजपाल यादव की इस बात के लिए भूरी-भूरी प्रशंसा की कि उन्होने लखनऊ पूर्व से चुनाव लड़ कर पार्टी का झण्डा और पहचान घर-घर फिर से पहुंचा दी। उन्होने राजपाल यादव को पार्टी के लिए आशा की एक किरण बताया। उन्होने अशोक मिश्रा जी की प्रशंसा करते हुये कहा कि जब वह जिलामंत्री थे तो उन्होने उनकी काफी सहायता की थी। शिव प्रकाश जी ने पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान को पार्टी की 'रीढ़' बताया। उन्होने कामरेड हरीश तिवारी के दामाद के भाजपा नेता होने का ज़िक्र करते हुये कहा कि कामरेड्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी सन्तानें भी पार्टी की विचार-धारा को ही आगे बढ़ाएँ इसके लिए पार्टी में सभी कामरेड्स को समान महत्व दिये जाने की उन्होने आवश्यकता बताई। पार्टी के सिकुड़ते जाने के लिए उन्होने कुछ नेताओं के अहंकार और स्टेटस को उत्तरदाई माना। इस दुर्वस्था से निकाल कर पार्टी को जनता के बीच ले जाने की ज़रूरत पर उन्होने ज़ोर दिया। 
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* ज्ञातव्य है कि मधुकर मौर्या डॉ गिरीश शर्मा/प्रदीप तेवारी गुट की ओर से जिलामंत्री पद के संभावित प्रत्याशी हैं और इसी अहंकार में अलोकतांत्रिक प्रक्रिया अपना कर प्रदीप तेवारी के प्रति अपनी निजी वफादारी का प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी पुत्री AISF की प्रदेश कोषाध्यक्ष है  और प्रदीप तेवारी AISF के प्रदेश इंचार्ज जिस कारण भी उनको प्रदीप की तरफदारी करना  भी बेहद ज़रूरी था।

Friday, 11 September 2015

'रक्त रंजित' संघर्ष की संभावनाएं : देश के लिए सुखद नहीं --- विजय राजबली माथुर




इस समाचार के अंतिम अनुच्छेद में प्रोफेसर साहब के लिए लिखा गया है-"शुरू से जनता परिवार की एका व पार्टी विलय के खिलाफ थे। "
बिहार में राजद/ज द यू /कांग्रेस गठबंधन के विरुद्ध भाजपा गठबंधन व वामपंथी गठबंधन चुनाव लड़ेंगे। इसका प्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिलता दीखता है इसीलिए सपा को RJC गठबंधन से अलग रखा गया है। जिससे चुनाव बाद जीतने वाले गठबंधन का हाथ थामने में सुविधा रहे। 
रही बात उत्तर प्रदेश के 2017 के चुनावों की तो वे भी 2012 के विधानसभा व 2014 के लोकसभा चुनावों की तर्ज़ पर 'गुप्त समझौते' के तहत ही लड़े जाएँगे और आर एस एस के गुप्त समर्थन से सत्तारूढ़ उसी प्रकार पुनर्वापिसी करेगा जिस प्रकार 1980 में इंदिरा कांग्रेस ने की थी।
पूर्व पी एम नरसिंघा राव जी ने निजी अनुभवों के आधार पर ही 'THE INSIDER' में लिखा है कि हम "स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं "।
लोकतन्त्र में मतदाता के हाथ में 'मत' है लेकिन उसका प्रयोग सुनिश्चित 'जाति','धर्म','संप्रदाय' के आधार पर ही होना है। वर्तमान केंद्र सरकार व उसकी प्रेरक शक्ति को इसी में सुविधा है कि दिखाने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें रहें लेकिन 'वक्त' पर वे केंद्र की फासिस्ट शक्तियों को 'मजबूत' करती जाएँ।
साम्यवाद और वामपंथ के अनुगामी 'नियंत्रक' इस सच्चाई पर 'गौर' किए बगैर जन समर्थन की आस लगाते हैं जो 'मृग-मरीचिका' सिद्ध होती रही है। जब तक जन-पक्षधर शक्तियाँ 'मनसा-वाचा-कर्मणा' संगठित होकर वंचित तबकों को 'दिल' से अपने साथ नहीं जोड़तीं तब तक ऐसा ही होता रहेगा। साम्य और समानता कागजी रहे और आंतरिक रूप से 'जाति','धर्म','संप्रदाय' की नीति पर ही चला जाये तो कैसे जनता का साथ मिले?
जनता को साम्यवाद/वामपंथ द्वारा अपने साथ न जोड़ पाने की दशा में निकट भविष्य में 'रक्त रंजित' संघर्ष की संभावनाएं बनती हैं जो देश के लिए सुखद नहीं होंगी।



Monday, 20 April 2015

मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण का सच--- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी


मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण का सच
किसानों की जमीन छीन कर पूंजीपतियों को सौंपने पर आमादा मोदी सरकार
14 मई को देशव्यापी विरोध
उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर रास्ता रोको
बहनों एवं भाईयों,
किसानों के निरन्तर आन्दोलनों और बलिदानों के कारण 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को 2013 में संसद में सर्वसम्मति से बदला गया था।
बदले कानून में सुनिश्चित किया गया था:
  • जमीन के मालिक किसानों से उनकी रज़ामंदी के बिना जमीन नहीं ली जा सकेगी और जमीन लेने का क्या सामाजिक प्रभाव पड़ेगा, उसका भी पहले आकलन किया जायेगा।
  • किसान को अपनी जमीन के बेहतर मुआवजे के लिए मोल-तोल का अधिकार मिले, उसकी कोई मजबूरी न हो तथा उसका मुआवजा एडवांस में दिया जाये।
  • पूरे मुआवजे के भुगतान के बाद और पुनर्वास एवं पुनः व्यवस्थापन के पूरे इंतजाम के बाद ही जमीन पर कब्जा लिया जाये।
  • किसानों और पंचायतों की रज़ामंदी के बिना जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू नहीं की जायेगी।
  • बहुफसली और सिंचित जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा।
  • अधिग्रहण की प्रक्रिया के पहले किसानों, आजीविका के लिए निर्भर अन्य लोगों एवं समुदाय पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव का आकलन किया जायेगा।
  • सभी विस्थापित परिवारों को पहले से बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित किया जायेगा।
मोदी सरकार किसानों के इन अधिकारों को छीन कर जमीन को पूंजीपतियों को देना चाहती है। उसने लोकशाही की सारी परम्पराओं को त्याग कर 3 अप्रैल 2015 को पुनः अध्यादेश जारी करके अपने किसान विरोधी इरादों का पुनः परिचय दिया है।
सरकार का यह दावा झूठ और मिथ्यापूर्ण प्रचार है कि विकास कार्य क्योंकि रूके पड़े हैं, इसलिए कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश लाना जरूरी है।
दरअसल अध्यादेश का मतलब किसानों से रज़ामंदी के बिना और बिना सामाजिक प्रभाव का आकलन किये जमीनों को किसानों से छीनना है जबकि 2013 का कानून सुनिश्चित करता है कि जिन लोगों से जमीन ली जानी है, उनके 70 प्रतिशत लोग अपनी रज़ामंदी दें और यदि जमीन किसी निजी कम्पनी के लिए ली जा रही है तो उसके लिए 80 प्रतिशत लोगों की रज़ामंदी होनी चाहिए।
सरकारी दावा इससे और भी झूठा साबित हो जाता है कि वर्ष 2013 तक सरकार बड़े पैमाने पर जमीन का अंधाधुंध अधिग्रहण करती रही है। हालत यह है कि बड़ी मात्रा में अधिगृहीत जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है। बड़ी मात्रा में भूमि को कारपोरेट भूमाफिया ने हड़प लिया है जो उसे विकास के लिए इस्तेमाल करने के बजाय बढ़े दामों पर बेचकर पैसा कमा रहे हैं।
कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट दिनांक 28 नवम्बर 2014 के अनुसार विशेष आर्थिक परियोजनाओं के लिए ली गई 45,635.63 हेक्टेयर जमीन में से केवल 28,488.49 हेक्टेयर जमीन का ही इस्तेमाल हुआ है। गुजरात में स्वीकृत 50 विशेष आर्थिक क्षेत्रों में से केवल 15 ही आपरेशनल हैं। वहां प्रधानमंत्री के चहेते अडानी को 2009 में 6,472.86 हेक्टेयर जमीन दी गई जिसमें से 87.11 प्रतिशत जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं किया गया है। कैग ने रिलायंस, एस्सार, डीएलएफ, यूनीटेक्स आदि डेवलपरों को फटकार लगाते हुए कहा है कि इन्होंने विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीनें हथिया ली हैं परन्तु केवल एक मामूली हिस्से का ही इस्तेमाल किया गया है। मुकेश अंबानी ने महाराष्ट्र के द्रोणगिरि में 1,250 हेक्टेयर जमीन ली परन्तु वहां 2006 से अब तक एक भी कारखाना स्थापित नहीं किया गया है। कैग ने स्पष्ट कहा है - ”सरकार द्वारा किसानों से जमीन का अधिग्रहण ग्रामीण आबादी से कारपोरेट जगत को दौलत का हस्तांतरण साबित हो रहा है।“
वास्तविकता, मोदी सरकार के तमाम दावों को खोखला और मिथ्या साबित करती है। वास्तव में मोदी सरकार कारपोरेट घरानों, धन्नासेठों तथा पूंजीपतियों को जमीनें देने और किसानों को बेसहारा करने के लिए ही यह झूठी और खोखली दलीलें देकर देश की जनता की आंख में धूल झोकना चाहती है।
किसान भाईयों,
18 औद्योगिक गलियारों के लिए मोदी सरकार के प्रस्तावों के द्वारा खेती योग्य भूमि का 35 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा आ जायेगा जिससे हजारों गांव लुप्त हो जायेंगे और करोड़ों लोगों को रोजी-रोटी छीनने का रास्ता साफ हो जायेगा। उसके कारण बड़े पैमाने पर सामाजिक विघटन और सामाजिक अराजकता पैदा हो जायेगी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई किसानों, खेत मजदूरों, ट्रेड यूनियनों, नागरिक समाज एवं आम जनता का आह्वान करती है कि मोदी सरकार के घृणित मंसूबों को नाकाम करने के लिए बड़े पैमाने पर 14 मई 2015 को ”रास्ता रोको“ कार्यक्रम को सफल बना कर किसान एवं देश विरोधी अध्यादेश का विरोध करें।

Saturday, 4 April 2015

एक कम्युनिस्ट का आचरण साम्यवाद के मूल विचार के प्रचारक का होना चाहिए --- जे एस नरुका

"बड़ा सवाल !

एक कम्युनिस्ट की अपने दल विशेष प्रति वफादारी जरुरी है पर उसका आचरण मुख्य रूप से साम्यवाद के मूल विचार के प्रचारक का होना चाहिए जो समाज को बेहतर बना सकता है लोगों को एक बेहतर इंसान बना सकता है। पर आमतौर पर अधिकतर कम्युनिष्ट सैंकड़ो विभाजित दलों में से किसी एक के ही कट्टर प्रचारक होते हैं जो एक भक्त के से ही आचरण के प्रतीत होते हैं और जिस विचार से एक बेहतर इंसान निकलके आना चाहिए आश्चर्यजनक रूप से उसके विपरीत एक आत्ममुग्ध, जिद्दी, तुनकमिजाज, समाज से अलग सा दिखने वाला व्यक्तित्व ही एक कम्युनिष्ट नजर आता है..... न.रुका।"



 *हमारे उत्तर-प्रदेश के कर्णधार व उनके राष्ट्रीय आश्रयदाताओं के विचार :

 मार्क्सवाद /साम्यवाद को भारतीय संदर्भ में प्रस्तुत करना तो गलत घोषित हो गया किन्तु RSS/भाजपा, मोदी उसका विकल्प केजरीवाल एवं उसके फिल्मी प्रचारक का उल्लेख -'गुड वन' । क्या 69 प्रतिशत जनता इससे ही वामपंथ की झोली में आ जाएगी? जबकि प्रकाश करात साहब जो इस समय वामपंथ के भगवान बने हुये हैं  M=मार्क्स की जगह मुलायम तथा L= लेनिन की जगह लालू मानते हैं और ये दोनों पिछड़े के नाम पर मोदी के पीछे खड़े हैं। :
2014 के चुनावों में सपा ने भाजपा को समर्थन दिया था और बदले में उसे 2017 के चुनावों में भाजपा का उसी प्रकार अप्रत्यक्ष सहयोग मिलेगा जिस प्रकार 2015 में दिल्ली में आ आ पा को मिला है। लेकिन पार्टी के मुख-पत्रों ने केजरीवाल की जीत पर खुशी ज़ाहिर की थी, इसका क्या मतलब?

**उपरोक्त विचारों के संदर्भ में युवा कामरेड की उपरोक्त  पीड़ा भी विचारणीय है। साम्यवाद व वामपंथ के हितैषियों की सोच को जहां कर्णधार संघी सोच घोषित कर रहे हैं वहीं उनके विचार जन-मानस में क्या छवी बनाते हैं उसका आभास जोया अंसारी साहिबा की इस टिप्पणी से होता है कि " साम्यवाद को सर्वहारा को सौंपें " । 
वस्तुतः बक़ौल मनीषा पांडे जी ( इलाहाबाद के सी पी एम नेता की पुत्री तथा पत्रकार  ) कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता अपनी पत्नियों की कमाई पर नेतागिरी करते हैं और इस प्रकार महिलाओं के शोषण के लिए उत्तरदाई हैं । व्यवहार में मनीषा जी का कथन सही है। 
वरिष्ठ जागरूक पत्रकार पलाश विश्वास साहब कम्युनिस्ट कर्णधारों  की जनता से दूरी को देश के लिए घातक मानते हैं :
 http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/views/2015/03/23/
ऐसे लोग जन-जागरण वाले विचारों को 'एथीस्टवाद' के विरुद्ध बता कर अप्रत्यक्ष रूप से ढोंग-पाखंड-आडंबर को ही बढ़ावा देते हैं उसे 'ब्राहमणवाद' न कहा जाये तो क्या कहा जाये? राजद के युवा का मानना है कि 1991 से प्रारम्भ उदरवाद को रोकना संभव नहीं है।


तो क्या देश की जनता सशस्त्र क्रान्ति का साथ देगी? क्या सशस्त्र क्रान्ति के लिए समय उपयुक्त है और वह सफल हो सकेगी? 1857 का उदाहरण सामने है तभी तो गांधी जी को 'सत्य-अहिंसा' का सहारा लेना पड़ा था। आज मार्कन्डेय काटजू साहब की गांधी-विरोधी लेखनी व गोडसे के महिमा-मंडन के परिप्रेक्ष्य में नीतियाँ निर्धारित करके जनता को जागरूक करने की नितांत आवश्यकता है तभी 'संघ' के कुचक्र को नष्ट किया जा सकेगा। केवल और केवल 'आर्थिक-आंदोलन' जब तक कि 'सामाजिक-जाग्रति' न उत्पन्न हो कोई क्रान्ति नहीं कर सकता है।
----- विजय  राजबली माथुर
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Wednesday, 1 April 2015

ब्राहमणवाद की गिरफ्त में फंसा है : भारत में मार्क्स वाद ----- रामेन्द्र जेनवार





क्रांति-योग पुस्तक (कॉमरेड स्व भोगेन्द्र झा के जीवन पर आधारित) स लेल ज्ञान-त्रयोंदश :

धारण करअ जगत के ,जन के तकरे धर्म कहल जइत छै !
जनहित धर्म ,अधर्म अहित जन , धर्म पाप बुझल जइत छै !! 1 !!

ने राजा-राज , ने जाती-पाति , ने धनिक-गरिबक बर्ग बिभेद !
तकरे आदिम साम्यवाद , सतयुग के स्वणि॔म नाम कहय छै !! 2 !!

धनुय॔ञ में धनुभ॔न्ग जे केलनि तिनके राम कहय छै !
लंका गढ पर चढि जे गर्जल, तिनके सब हनुमान कहय छै !! 3 !!

कुरुक्षेत्र के रणस्थलि में ज्ञान मंत्र देलक से गीता !
"फाटू धरती तार जाई" कहीं रानी पद त्यागल से सीता !! 4 !!

सीता वनवासक अपराधे बान्हल चारु भाई राम के !
वीर शिरोमणि , तै दुनु बालक के लव-कुश नाम कहय छै !! 5 !!

जाती-पाइति केर उंच-नीच केर मध्यम पथ समेट जे चलला !
“धम्मं , बुध्दं , संघं ,शरणं गच्छामि” के बुध्द कहय छै !! 6 !! 

ने राजा ने राज रहत से कहने माता-पिता जहल में !
गर्भ जन्म जहले में जिनकर तिनके सब श्री कृष्ण कहय छै !! 7 !!

सुईयक भूरे ऊँट निकलतइ तैयओ धनिक ने स्वर्ग-द्वार में !
कहइत-कहइत शूली चढला , तिनके ईश मशीह कहय छै !! 8 !!

एककों पाई सुदी जे लेतइ से ने मुसलमान भ सकतइ !
कहने मक्का भले छोड़लइन , रसूला मुहम्मद लोक कहय छै !! 9 !!

धिपल बालु कर्बला में जे वीर बह्ह्तइर नइ झूकला !
तै "चालीसी शहीद" सभक अगुआ के हुसैन इमाम कहय छै !! 10 !!

मजहब, जाति, अछूत-छूत , पूजा-नमाज के कात हटा !
सब मानव के एक बुझय जे , तकरे शंत कबीर कहय छै !! 11 !!

जे कमेंतइ से खेतइ , जे करत काज से कारत राज !
"दुनिया के मजदूर एक हो" उद्घोसक के मार्क्श कहय छै !! 12 !!


अस्त्र-शस्त्र के त्यागि , पकरलइन सत्यं-अहिंसा के हथियार !
स्वातंत्र समर के सेनापति गाँधी के अमर शहीद कहय छै !! 13 !!


---कॉमरेड स्व भोगेन्द्र झा

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=448457125329040&set=gm.286222328168154&type=1&theater 


ये भी पढ़े:
PATHANKOT Incident. 22.03.15.
This is another incident of VIP high handedness,this time they have not spared two serving Army officers & a retired Brigadier.
On the night of 20 Mar, around 2300h, Brig Arun Kaistha, (Reter) of 16 CAV with his wife, daughter, son in law Maj Raul Pallat & Son Maj Arjun Kaistha both serving officers posted at Mamun were returning from a family dinner outing at a restraunt in Pathankot when they accosted a car being driven rashly. On slowing down the erring driver Arjun who was driving the family car was abused and a verbal altercation ensued. The Brigadier got down and tried to calm down the situation but to no avail. The lady in the erring car suddenly started screaming and made calls to someone. Soon a mob gathered and berated the Army Officers of molesting and harasing the civilian couple. The mob was led by one Mr Sahni a BJP Municipal pradhan & the erring driver is some Bakshi. As things got worse a couple of policemen turned up and started to harass the hapless officers with their ladies cowering in the car.
Brigadier Kaistha requested the policemen to call a PCR. Though the call was made no one turned up for an agonising half an hour or so. All this while the crowd continued to heckle and abuse the trio. An ASI finally turned up, made arrangements for the ladies to leave and instructed the policemen to take the two Army Officers to the PS. Brigadier Kaistha, the two officers, two policemen accompanied by the municipal pradhan moved to the PS. The crowd followed raising Anti Army slogans at the behest of the politico.
In the meantime one of the tamasha watchers in the mob not connected with the incident collapsed and subsequently died of natural causes.
This was an opportunity for the politico to earn brownie points. He declared that the man died due to alter cation with the trio and immediately the police who till then were behaving amicably with the faujis turned hostile particularly the SHO. Immediately a charge under section 302 of IPC was levied against the serving officers and they were detained.
Approximately 48h later the officers continue to be detained.
No copy of the FIR has been made available
There is no sign of the PM report of the alleged case of death.
The body has since been cremated.
There is no sign of the concerned magistrate in front of whom they should have been produced within 24h.
Despite Best efforts by the HQ Western & Northern Commands, HQ 9 Corps & Sub Area Commander 21 Sub Area, the police is not relenting possibly at the behest of a light weight politico from the ruling alliance in Punjab.
Video grabs of the incident are reportedly available with reporters of "Dainik Jagran" & a local daily called "AAJ".
The SSP is apparently out of town and an SHO is holding the fort.
A case where a law abiding citizen more so an army officer only wanted to advise the erring individual of the hazards of rash driving specially in the congested roads of mofussil towns.
The officers are still in custody, the army has not been able to take over the case, the offrs are still languisging in the jail for the past 5 days without any solid evidence against them just on the basis of a false FIR by a politician ... This just shows that The citizens of this country would rather trust a corrupt Politician than the army . . .
Please spread the word around.
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1602424679975664
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कामरेड भोगेंद्र झा साहब काफी समय मधुबनी, बिहार से  लोकसभा सदस्य रहे हैं उनकी रचना जो उनके व्यक्तित्व का दर्पण है  जनता का हृदय जीतने वाली है इसीलिए वह उसका प्रतिनिधित्व करने में सफल हो सके । लेकिन आज उत्तर-प्रदेश में पार्टी नेतृत्व के बारे में निवेदिता श्रीवास्तव जी का आंकलन सत्य का आईना है।   रामेन्द्र जेनवार साहब का कमेन्ट एक हकीकत है। राष्ट्रीय परिषद के लिए उत्तर-प्रदेश से प्रतिनिधित्व करने वालों में 50 प्रतिशत ब्राह्मण जाति के लोग हैं जिसका 66 प्रतिशत (कुल प्रदेशीय प्रतिनिधित्व का 33 प्रतिशत ) एक ही परिवार का है। कर्ण धारों की सोच कैसी है ?इसका एक उदाहरण उपरोक्त फेसबुक नोट व उस पर महाराष्ट्र के प्रबुद्ध कामरेड के कमेन्ट से स्पष्ट होता है। जनता व पार्टी कार्यकर्ताओं की अपेक्षा फिल्मी नायकों का चिंतन किया जाता है और  उस IAS अधिकारी  के लिए सड़क पर प्रदर्शन किया जाता है जो प्रदेश से केडर बदलवा कर चला जाता है। साफ है कि निकट भविष्य में पार्टी लोकप्रियता नहीं अर्जित करने जा रही है फिर कैसे सांप्रदायिकता का मुक़ाबला करेगी? सही सलाह को ठुकरा कर और चापलूसों को आगे बढ़ा कर जनता के बीच पैठ नहीं बनाई जा सकती है -यह एक कटु सत्य है। दलित व पिछड़ा वर्ग से काम तो लो परंतु उनको आगे न बढ्ने दो इस सोच से पार्टी का विस्तार कभी नहीं हो सकता है बल्कि निरंतर संकुचन होता जा रहा है। पूर्व में दो बार पार्टी में इसी कारण विभाजन हो चुके हैं तथा इस वर्ष इसी आधार पर नए आए लोग पार्टी छोड़ गए हैं। उनको मार्क्स वाद समझाने के बजाए उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। स्वार्थी तत्वों को बचाने के लिए सत्यावलंबियों को सतत दबाया जा रहा है। वामपंथ के हितैषियों द्वारा आगाह करने पर उनको संघी का खिताब दे देने से जनता पार्टी के पाले में कैसे खींची जा सकती है? कंवल भारती जी, लालाजी निर्मल और रामेन्द्र जेनवार साहब  ने सटीक सत्य की ओर ही इंगित किया है।

बजाए नेक सलाहों को मानने के यदि इसी प्रकार हितैषियों पर प्रहार जारी रहे तो साफ है कि ऐसा करने वाले दक्षिण पंथी अर्द्ध-सैनिक तानाशाही के लिए लगे लोगों की ही ख़्वाहिश पूरी करने जा रहे हैं जनता का भला करने या पार्टी को मजबूत करने नहीं।
--- विजय राजबली माथुर