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Wednesday, 12 December 2018

इतने भी खुश न होइये कि आगे कांग्रेस के खिलाफ बोलने में शर्म आये ------ सीमा आज़ाद

*उत्तर - प्रदेश भाकपा के वरिष्ठ नेता पाँच राज्यों में भाजपा की हार पर खुशी मना रहे हैं तो मानवाधिकार नेत्री आगाह कर रही हैं कि आज कांग्रेस की जीत पर इतनी खुशी मना कर भविष्य में कांग्रेस के उत्पीड़न व शोषण के विरुद्ध आवाज कैसे उठाएंगे ? .................................
**सुश्री सीमा आज़ाद जी द्वारा दी गई चेतावनी समस्त जनवादी व साम्यवादी विचार - धारा के लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए और आर एस एस की दो - दलीय प्रणाली को कामयाब नहीं होने देना चाहिए। 





उत्तर - प्रदेश भाकपा के वरिष्ठ नेता पाँच राज्यों में भाजपा की हार पर खुशी मना रहे हैं तो मानवाधिकार नेत्री आगाह कर रही हैं कि आज कांग्रेस की जीत पर इतनी खुशी मना कर भविष्य में कांग्रेस के उत्पीड़न व शोषण के विरुद्ध आवाज कैसे उठाएंगे ? 
वस्तुतः भाजपा व कांग्रेस की आर्थिक नीतियाँ एक ही हैं । 1991 में नरसिंघा राव की कांग्रेस द्वारा घोषित मनमोहिनी नीतियों की भूरी - भूरी प्रशंसा न्यूयार्क जाकर एल के आडवाणी यह कह कर की थी कि, कांग्रेस ने उनकी नीतियों को चुरा लिया है। 1980 में सत्ता में पुनर्वापिसी हेतु इन्दिरा गांधी द्वारा आर एस एस का अप्रत्यक्ष समर्थन लिया गया था। तब RSS द्वारा इन्दिरा सरकार को पूर्ण हिन्दू - बहुमत की सरकार बताया जाता था। तभी से श्रम - न्यायालयों में श्रमिकों के विरुद्ध निर्णय पारित किए जाने शुरू हुये थे। 1985 के चुनावों में राजीव गांधी भी आर एस एस के समर्थन से ही प्रचंड बहुमत में आए थे। उनके कार्यकाल में ही बाबरी मस्जिद का ताला खोला गया था और 1992 में नरसिंघा राव के कार्यकाल में उसे ढहा दिया गया था। 1998 से 2004 के कार्यकाल में भाजपा ने ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में प्रशासन में आर एस एस के लोगों को भर दिया था।2011 में आर एस एस, भाजपा, कारपोरेट के समर्थन से जो हज़ारे अभियान चला था उसका उद्देश्य कारपोरेट - भ्रष्टाचार को संरक्षण देना था जिसे तत्कालीन कांग्रेसी पी एम का अप्रत्यक्ष समर्थन भी प्राप्त था । इसी अभियान के रथ पर सवार होकर मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई थी। 
अहंकार के वशीभूत होकर मोदी - शाह ने आर एस एस को ही नियंत्रित करने का प्रयास किया जिसके परिणाम स्वरूप आर एस एस ने उनको सबक सिखाने और कालांतर में उनसे छुटकारा पाने हेतु 1980 व 1985 की तर्ज पर  छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को पूरा - पूरा समर्थन नहीं दिया वरना बिना संगठन के कांग्रेस कैसे जीत पाती ?
कांग्रेस तो अब भी अहंकार में ही थी तभी तो क्षेत्रीय दलों से तालमेल नहीं किया वरना भाजपा राजस्थान व मध्य प्रदेश मेँ बुरी तरह से पराजित हो जाती। कांग्रेस नायक राहुल गांधी द्वारा मंदिर - मंदिर जाकर आर एस एस की हिंदुत्ववादी - कारपोरेट समर्थक नीतियों को मूक समर्थन दिया गया और बदले में आर एस एस का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त किया गया। आर एस एस को भस्मासुर बने  मोदी - शाह से छुटकारा न पाना होता तब तीन राज्यों में कांग्रेस की पुनर्वापिसी भी संभव न होती। 2019 में भाजपा की पुनर्वापिसी की सूरत में मोदी - शाह द्वारा आर एस एस को कब्जाने का खतरा न होता तो आर एस एस को उनका समर्थन करने से भी परहेज न होता। शासन,प्रशासन,पुलिस,सेना,खुफिया संस्थानों सभी जगह आर एस एस के लोग पदस्थापित हो चुके हैं अतः भाजपा विरोधी दलों की सरकार बनने पर भी आर एस एस की पकड़ बनी रहेगी। 
इस संदर्भ में अखिलेश यादव व मायावती को कांग्रेस से सहयोग करते हुये सतर्कता बरतने की जरूरत होगी। 
सुश्री सीमा आज़ाद जी द्वारा दी गई चेतावनी समस्त जनवादी व साम्यवादी विचार - धारा के लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए और आर एस एस की दो - दलीय प्रणाली को कामयाब नहीं होने देना चाहिए। 
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14-12-2018 : 
शासन,प्रशासान ,पुलिस,सेना,खुफिया एजेंसियां और न्यायपालिका सभी जगह आर एस एस के लोग बैठाये जा चुके हैं तभी तो जज साहब फैसले में लिख देते हैं कि उनका विश्वास मोदी में है। 

जजों का विश्वास संविधान व कानून से हट कर एक व्यक्ति - विशेष में हो जाना ' तानाशाही ' की आहट का आभास कराता है। 


आर एस एस ने  जनसंघ के माध्यम से भारत में दो - दलीय प्रणाली को लागू करवाने की मांग उठाई थी। आज सत्ता व विपक्ष दोनों पर अधिकार जमा कर वह निर्णायक की भूमिका में आने को प्रयासरत है। जज साहब का फैसला उसी की एक बानगी भर है। 
( विजय राजबली माथुर )
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13-12-2018 

Wednesday, 4 October 2017

प्रगतिशील भ्रम और केजरीवाल ------ विजय राजबली माथुर

दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से स्तीफ़ा देकर बनारस में मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने का उद्देश्य 2014 में सिर्फ यह था कि, मोदी विरोधी वोटों को केजरीवाल समेट लें और मोदी को आसान जीत दिला दें। ऐसा करके बदले में दिल्ली चुनावों में आर एस एस के प्रचंड समर्थन से  भाजपा को हराकर केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बन गए। ................................................................................................................................................

 आर एस एस सत्ता पक्ष भाजपा के माध्यम से कब्जा चुका है अब विरोध पक्ष को आ आ पा के माध्यम से कबजाना चाहता है। परंतु 
दुखद तथ्य यह है कि, प्रगतिशील माने जाने वाले विद्वान और दल केजरीवाल और उनके AAP को मोदी / भाजपा विरोधी मानते हुये जनता को गुमराह कर रहे हैं। 
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 हज़ारे को अगुआ बना कर अरविंद केजरीवाल एक लंबे समय से शोषकों -उतपीडकों का बचाव करने हेतु भ्रष्टाचार का राग आलापते  रहे है। पढे-लिखे मूरखों को अपना पिछलग्गू बनाने मे मिली कामयाबी के आधार पर वह फूले नहीं समा रहे हैं और जोश मे होश खो बैठे हैं। उन्होने अपने विभाग से हड़पे नौ लाख रुपए प्रधानमंत्री कार्यालय को लौटाए थे जो उनकी और तत्कालीन  प्रधानमंत्री  की अंतरंगता का ज्वलंत प्रतीक है। हज़ारे  साहब को निजी अस्पताल मे पी एम साहब ने पुष्प गुच्छ भिजवा कर उनके आंदोलन को अपना मूक समर्थन प्रदान किया था।

हज़ारे आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन गुट/आर एस एस/देशी-विदेशी NGOs का भरपूर समर्थन था । रामदेव का आंदोलन  केवल आर एस एस /विदेशी समर्थन पर आधारित था। इसीलिए  रामदेव के आंदोलन पर हज़ारे आंदोलन  बढ़त कायम कर सका। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही था भारत मे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करके 'अर्द्ध सैनिक तानाशाही' स्थापित करना।

1974 मे चिम्मन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध मे लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन मे पहली बार नानाजी देशमुख की अगुआई मे आर एस एस ने घुसपैठ की थी और अपार सफलता प्राप्त  थी।1977 की जनता पार्टी सरकार मे अटल बिहारी बाजपाई ने विदेश विभाग मे तथा एल के आडवाणी ने सूचना एवं प्रसारण विभाग मे आर एस एस के लोगो की घुसपैठ करा दी थी। 1980 मे आर एस एस के सहयोग से इंदिरा गांधी की कांग्रेस पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकी थी। यह आर एस एस की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वी पी सिंह के 'बोफोर्स कमीशन विरोधी आंदोलन' मे घुस कर आर एस एस ने संतुलंनकारी भूमिका निभा कर अपनी शक्ति मे अपार वृद्धि कर ली थी और 'राम मंदिर आंदोलन' की आड़ मे पिछड़े वर्ग के हित मे लागू 'मण्डल कमीशन' रिपोर्ट की धज्जिये उड़ा दी थी। देश को साम्राज्यवादियों के अस्त्र 'सांप्रदायिकता' से दंगो मे फंसा कर अपार जन-धन की क्षति की गई थी।

1998  -2004 के राजग शासन काल मे गृह मंत्रालय और विशेष कर खुफिया विभागो मे आर एस एस की ज़बरदस्त पैठ बना दी गई। इनही तत्वो ने रामदेव को सहानुभूति दिलाने हेतु राम लीला मैदान कांड अंजाम दिलाया। लेकिन रामदेव की मूर्खताओ के कारण जनता मे उनकी कलई खुल गई। अतः  हज़ारे को आगे खड़ा किया गया। जो कुछ हुआ और हो रहा है सब की आँखों के सामने है। जो लोग व्यापारियों,उद्योगपतियों,ब्यूक्रेट्स के शोषण -उत्पीड़न को ढकने हेतु भ्रष्टाचार का जाप कर रहे थे और जनता को उल्टा भड़का रहे थे उनके मास्टर माइंड हीरो अरविंद केजरीवाल 'मतदान' ही नहीं करना चाहते थे और वह मतदाता तक न बने थे जो उनके 'लोकतन्त्र विरोधी' होने और 'तानाशाही समर्थक' होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। 

तत्कालीन  मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीरप्पा मोइली ने खुलासा किया था  कि मनमोहन सिंह ने हड़बड़ी मे 'उदारवाद' अर्थात आर्थिक सुधार लागू किए थे जिनसे 'भ्रष्टाचार' मे अपार वृद्धि हुई है। 

तो यह वजह है कि मनमोहन सिंह जी ने आर एस एस को ताकत पहुंचाने हेतु  हज़ारे के आंदोलन को बल प्रदान किया था। सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही भ्रष्टाचार को अनंत काल तक संरक्षण प्रदान कर सकती है और इसी लिए इन आंदोलनकारियों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति नफरत भर कर ये लोग जनता को लोकतन्त्र से दूर करना चाहते हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से स्तीफ़ा देकर बनारस में मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने का उद्देश्य 2014 में सिर्फ यह था कि, मोदी विरोधी वोटों को केजरीवाल समेट लें और मोदी को आसान जीत दिला दें। ऐसा करके बदले में दिल्ली चुनावों में आर एस एस के प्रचंड समर्थन से  भाजपा को हराकर केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बन गए। 
आगामी चुनावों में भाजपा की मदद के लिए केजरीवाल आ आ पा को गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल,राजस्थान सभी जगह चुनाव लड़ाएँगे जिससे भाजपा विरोधी वोट बाँट कर उसे आसान जीत उपलब्ध करवा  सकें। आर एस एस सत्ता पक्ष भाजपा के माध्यम से कब्जा चुका है अब विरोध पक्ष को आ आ पा के माध्यम से कबजाना चाहता है। परंतु 
दुखद तथ्य यह है कि, प्रगतिशील माने जाने वाले विद्वान और दल केजरीवाल और उनके AAP को मोदी / भाजपा विरोधी मानते हुये जनता को गुमराह कर रहे हैं। 


Friday, 7 April 2017

कूपमंडूकता है कम्युनिस्टों की विफलता का कारण ------ विजय राजबली माथुर

*लेकिन 27 सितंबर 1925 को गठित आर एस एस क्यों सफल होता रहा और क्यों 25 / 26 दिसंबर 1925 को गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी टूटते टूटते विफल रही।
*1980 में पहली बार RSS के गुप्त  समर्थन से इन्दिरा जी ने  आसान सत्ता वापसी तो कर ली थी किन्तु श्रमिकों / कर्मचारियों के लिए तभी से मुसीबतें शुरू हो गईं थीं। तभी से श्रम न्यायालयों में श्रमिकों के विरुद्ध निर्णय आने शुरू हो गए थे। आर एस एस ने इन्दिरा कांग्रेस को समर्थन देने की कीमत अपने व्यापारी / उद्योपति वर्ग के लिए इस प्रकार वसूली थी। 1984 में आर एस एस के समर्थन से राजीव गांधी को प्रचंड बहुमत तो मिल गया था किन्तु उसकी कीमत के भुगतान में बाबारी मस्जिद / राम जन्मभूमि में 1949 से लगा ताला खुलवाना पड़ा था।
*Trade Union नेता सिर्फ आर्थिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं और वे कर्मचारियों को न तो सामाजिक सरोकारों के प्रति जाग्रत करते हैं न ही राजनीतिक कर्तव्यों के प्रति। परिणाम सामने है तानाशाही की दिशा में बढ़ती फासिस्ट सरकार।

1980 में पहली बार RSS के गुप्त  समर्थन से इन्दिरा जी ने  आसान सत्ता वापसी तो कर ली थी किन्तु श्रमिकों / कर्मचारियों के लिए तभी से मुसीबतें शुरू हो गईं थीं। तभी से श्रम न्यायालयों में श्रमिकों के विरुद्ध निर्णय आने शुरू हो गए थे। आर एस एस ने इन्दिरा कांग्रेस को समर्थन देने की कीमत अपने व्यापारी / उद्योपति वर्ग के लिए इस प्रकार वसूली थी। 1984 में आर एस एस के समर्थन से राजीव गांधी को प्रचंड बहुमत तो मिल गया था किन्तु उसकी कीमत के भुगतान में बाबारी मस्जिद / राम जन्मभूमि में 1949 से लगा ताला खुलवाना पड़ा था। परिणाम स्वरूप 1991 में यू पी में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार का गठन व 1992 में  बाबरी विध्वंस हुआ था। गोधरा कांड, मुंबई बम ब्लास्ट कांड बाबरी विध्वंस के ही साईड इफ़ेक्ट्स थे।कांग्रेस पर किए गए ट्रायल की सफलता के बाद 2014 में आर एस एस पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार  बनवाने सफल हुआ था और 2017 में यू पी में पूर्ण बहुमत की योगी सरकार बनवाने में सफल हुआ है। तब से अब तक यू पी भाकपा में दो-दो बार विभाजन हो चुका है। ट्रेड यूनियन मूवमेंट रसातल को जा चुका है। 

NDTV की इस सूचना के अनुसार TRAI ने रिलायंस जियो को आदेश दिया है कि, 15 दिन की बढ़ी अवधी को तुरंत वापिस लिया जाये। मूडीज़ ने इन ग्राहकों को रिलायंस की वित्तीय स्थिति के लिए लाभप्रद बताया है लेकिन इसका राजनीतिक लाभ मोदी सरकार को मिल रहा है। इसके पीछे कंपनी के कर्मचारियों का उत्पीड़न और शोषण भी छिपा हुआ है।कर्मचारियों से अनवरत 15- 16 घंटे कार्य लिया जा रहा है ।  क्योंकि कंपनी के कर्मचारी यूनियन बना नहीं सकते ( पहल की भनक लगते ही उनकी नौकरी खत्म कर दी जाएगी ), ट्रेड यूनियन लीडर्स तब तक नहीं बोलेंगे जब तक कर्मचारी उनकी ट्रेड यूनियन का सदस्य नहीं बनेगा। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। कर्मचारी यूनियन बना नहीं सकते ट्रेड यूनियन्स उनका मामला उठा नहीं सकते। इनके कर्मचारियों को भाजपा कार्यकर्ता के रूप मे भी इस्तेमाल किया जा रहा है। व्हाट्स एप ग्रुप मेसेज्स के जरिये उनको 'दैनिक जागरण ' पढ़ने को उसी प्रकार कहा जा रहा है जिस प्रकार यू पी के चुनावों मे भाजपा को वोट देने और दिलवाने को कहा गया था। किसी विपक्षी दल को यह सब सोचने - देखने की फुर्सत कहाँ ? सभी बहती गंगा में हाथ धोने को लालायित दिख रहे हैं।
*पहले बैंक ब्याज दरों को घटा कर बैंक जमा को हतोत्साहित किया गया और अब जमा धन की न्यूनतम राशि को बढ़ा कर रु 5000/- किया जा रहा है जिसे न बनाए रख पाने की स्थिति में शुल्क थोपे जा रहे हैं। अपनी ज़रूरत के लिए भी धन निकासी पर शुल्क लगाए जा रहे हैं। स्टेट बैंक के बाद यही व्यवस्था सभी बैंकों में लागू होगी। मतलब यह है कि, जनता बैंकों से धन निकाल कर प्राईवेट कंपनियों में जमा करे और कर्ज लेने के लिए महाजनों के जाल में फिर से फंसे। जब बैंक घाटे में चले जाएँ तब उनका निजीकरण कर दिया जाएगा।
*कर्मचारी यूनियनें सिर्फ अपने वेतन आदि में बढ़ोतरी के लिए तो आगे आती हैं लेकिन जब अपने रोजगार पर भी चोट पड़ने वाली है तब भी तब तक आगे न आएंगी जब तक जबरिया छंटनी न शुरू हो जाएगी।
*1936 में AITUC की स्थापना हुई थी तब इसने देश की आज़ादी के आंदोलन में भी भाग लिया था। जहां जहां कांग्रेस सरकारें थीं AITUC सफल और मजबूत हुई उसी के साथ - साथ CPI भी।
* 13 वर्ष बाद 1949 में सरदार पटेल ने इसे तोड़ कर INTUC की स्थापना कर ली जो सरकार समर्थक संगठन हो गया।
* आर एस एस के दततोंपंत  ठेंगड़ी ने BMS की स्थापना कर ली जो निजी कारखानों में मालिकों का समर्थक संगठन बन गया। लेकिन यही सरकारी विभागों व उद्यमों में शुद्ध Trade Unionist संगठन के रूप में सामने आया।
*1964 में CPM के गठन के बाद AITUC फिर टूटा और CITU का गठन हुआ।
अब जितने राजनीतिक दल हैं उतने ही trade unions तो हैं ही लेकिन जातियों पर आधारित trade unions भी बन गए हैं जो एक- दूसरे के विरुद्ध चलते हैं।
*Trade Union नेता सिर्फ आर्थिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं और वे कर्मचारियों को न तो सामाजिक सरोकारों के प्रति जाग्रत करते हैं न ही राजनीतिक कर्तव्यों के प्रति। परिणाम सामने है तानाशाही की दिशा में बढ़ती फासिस्ट सरकार।

*कर्मचारियों को दोषी ठहराने वाले trade union नेता अपने व अपने संगठनों के नेताओं की फूट और गैर ज़िम्मेदारी के बारे में क्या अनर्गल कहेंगे?



प्रस्तुत फोटो कापी में व्यक्त विचार अक्सर कामरेड्स द्वारा भी दोहराए जाते हैं। 



'कम्यूनिज़्म '  या '  साम्यवाद ' वह व्यवस्था है जिसमें प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार कार्य लिया जाता है और प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार उसका हक दिया जाता है, जिसमें मानव द्वारा मानव का शोषण नहीं किया जाता है और मानव मात्र के जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने के कार्य सम्पन्न किए जाते हैं।
इस व्यवस्था को 'समाजवाद' द्वारा लागू किया जाता है। 'समाजवाद ' वह आर्थिक प्रणाली है जिसमें 'उत्पादन ' व 'वितरण ' के साधनों पर 'समाज ' का अधिकार सरकार के माध्यम से होता है।





लेकिन 27 सितंबर 1925 को गठित आर एस एस क्यों सफल होता रहा और क्यों 25 / 26 दिसंबर 1925 को गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी टूटते टूटते विफल रही। कुछ - कुछ ऊपर दिये चित्रों से समझा जा सकता है। बी एस एफ के कमांडर( जो आतंकी हमले में अपनी आँखें गंवा बैठे थे ) के घर जाकर भाजपाई गृह मंत्री राजनाथ सिंह भोजन करके न केवल एक परिवार का  बल्कि समस्त सैन्य बलों का मनोवैज्ञानिक समर्थन हासिल कर लेते हैं जिसका लाभ निश्चित रूप से उनकी भाजपा को ही मिलेगा। मुख्यमंत्री की दाढ़ी बनाने से केश कलाकार की किस्मत ही बदल जाती है और उसका वर्ग भाजपा के समर्थन में खड़ा हो जाता है। 
1977 में दूर संचार मंत्री एल के आडवाणी ने अपने विभाग व विदेशमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने विभाग में संघ समर्थक कर्मचारियों की भरमार कर दी थी। उसका लाभ आज तक उनकी पार्टियों को मिलता आ रहा है। 
जबकि, 1967 में यू पी के गृह राज्यमंत्री रुस्तम सैटिन साहब और खाद्यमंत्री झारखण्डे राय साहब यदि चाहते तो भाकपा समर्थकों को प्रशासन में स्थान दे सकते थे। इसी प्रकार 1996  में इंद्रजीत गुप्ता साहब गृह मंत्रालय में और चतुरानन मिश्रा साहब कृषि मंत्रालय में भाकपा समर्थकों को समायोजित कर सकते थे, दोनों ही केबीनेट मंत्री थे। किन्तु ऐसा न हुआ और न ही हुआ भाकपा को कोई प्रशासनिक लाभ। 
इस संदर्भ में आगरा के एक पूर्व जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा साहब के निजी एहसास का उल्लेख करना प्रासांगिक रहेगा। यू पी के विभाजन के बाद आगरा के एक दंपत्ति के एकमात्र चिकित्सक पुत्र उत्तरांचल में रह गए और उनको वहीं का कैडर दे दिया गया। वृद्ध दंपत्ति ने दो दो केंद्रीय भाकपा मंत्रियों के रहते हुये आगरा के जिलामंत्री रमेश मिश्रा से संपर्क किया। मिश्रा जी उनको लेकर कामरेड इंद्रजीत गुप्ता व चतुरानन मिश्रा से मिले लेकिन दोनों ने मदद देने से इंकार कर दिया। निराश मिश्रा जी को लौटते में अजय सिंह ( पूर्व सांसद आगरा जो वी पी सिंह मंत्रीमंडल में रेल उपमंत्री रहे थे ) मिल गए और उदासी का कारण पूछा उनके बताने पर हँसते हुये बोले यह भी कोई बड़ी बात है आपका काम हो गया , समझिए। अजय सिंह उन डाक्टर के पिता श्री व मिश्रा जी को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय में सचिव के पास गए जिनहोने  सिंह साहब को देखते ही खड़े होकर स्वागत किया और सुन कर उन डाक्टर का ट्रांसफर  उत्तरांचल से यू पी करने का आदेश करा दिया। जिस कार्य को करने से भाकपा के दो दो केबिनेट मंत्रियों ने इंकार कर दिया था उसी को पूर्व रेल उपमंत्री ने तत्क्षण करा दिया। जनता के बीच साख किसकी बनेगी ? भाकपा की , इसके नेताओं की ? कैसे?
भाकपा में तो यू पी में एक डिफ़ेक्टो प्रशासक भी हैं जिनको दो दो बार पार्टी को दोफाड़ करने का ठोस अनुभव भी है जो obc व sc कार्यकर्ताओं से सिर्फ काम लेने के हामी हैं और उनको पदाधिकारी बनाने के सख्त खिलाफ हैं। उनके चापलूस पार्टी कार्यकर्ताओं को अपमानित करते रहते हैं। क्या ऐसे ही कम्युनिस्ट आर एस एस को परास्त कर लेंगे ? फिर कौन सफल हो सकता था आर एस एस या कम्युनिस्ट ? 
यदि अभी भी कम्युनिस्ट ' नास्तिकवाद ' / एथीज़्म की ज़िद्द पर अड़े रहे और जनता को 'धर्म ' का वास्तविक 'मर्म ' समझाने को तत्पर न हुये तब फासिस्ट सांप्रदायिक तानाशाही को रोका ही नहीं जा सकता। आने वाले समय में वामपंथी युवा ही आर एस एस से आर - पार की लड़ाई लड़ेंगे परिणाम चाहे जो हो भीषण रक्तपात होगा और इसके जिम्मेदार पूरी तरह से एथीस्ट वामपंथी नेता होंगे क्योंकि यदि वे जन - विरोधी रुख न अख़्तियार करते तो जनता आर एस एस / भाजपा की तरफ जाती ही नहीं। 



Wednesday, 2 March 2016

देश मे कैसे आग लगाई जा सकती है ? क्या- क्या करके देश को तोड़ने का प्रयास हुआ है ??

Shilpi Tewari



Tuesday, March 1st, 2016
Smriti Irani’s former aide allegedly doctored Kanhaiya video, deletes twitter account
A forensic report has revealed that one of Smriti Irani’s former aides had ‘doctored’ videos that accused the JNU students’ leader Kanhaiya Kumar of making anti-India slogans.

India Today reported that the ‘Forensic Audio, Video, Authentication Report’ found two files to be ‘problematic.’

The first video was named as Q1 and titled as ‘Kanhaiya caught shouting anti-India slogans.’ This clip reportedly came from YouTue and was later used by several news channels.

This, the channels had said provided clinching proof of Kanhaiya’s involvement in anti-national? sloganeering.

Second video, named as Q2, according to India Today, was picked up from a URL address ‘shilpitewari.’

Shilpi Tewari, an active twitter user in flying the flag for Sangh ideology on twitter and known for trolling anybody critical of Prime Minister Narendra Modi and his government, was a campaign manager of Irani during Lok Sabha election in Amethi.

Tiwari has since then deleted her twitter account and gone underground.

Such is Tewari’s proximity to Irani that social media has been abuzz with allegations that HRD Ministry had relaxed the rules to employ Tiwari as a consultant ‘at a fee of Rs 35,000 per month.’ (See the meeting note below).

The meeting note below is now being widely shared on twitter in the wake of new revelation of Tewari’s alleged involvement in doctoring Kanhaiya video.

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In its conclusion, the forensic report has said that ‘abrupt changes were found in the pitch and the intensity contours….indicating that the recording is not authentic.”

However, Indian Express reported that three out of the seven video clips of the alleged ‘anti-national’ sloganeering in Jawaharlal Nehru University (JNU) on 9 February, examined by the Delhi government, had been found to be ‘doctored.

The video samples were sent by the Delhi government to Truth Lab in Hyderabad. On 13 February, the Aam Aadmi Party government in Delhi had ordered the District Magistrate in the capital to file a factual report about the incident, following conflicting claims of different parties shouting allegedly anti-national slogans on the JNU campus.


http://www.jantakareporter.com/india/smriti-iranis-former-aide-doctored-kanhaiya-video/39260


https://www.facebook.com/mohd.zahid.92/posts/963660677022464