Thursday, 8 October 2026
राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा का जश्न ------ Kavita Krishnapallavi's Post
Friday, 2 October 2026
वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र ------ राम या वाम 's Post
भारतीय वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र
क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?
प्रिय वामपंथी नेतृत्व,
यह पत्र किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं है।
यह CPI, CPI(M), CPI(ML) या किसी एक धारा को कटघरे में खड़ा करने के लिए भी नहीं है।
यह सवाल पूरे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से है।
क्योंकि इतिहास का एक अजीब मोड़ हमारे सामने है—
हम सभी शोषण के खिलाफ लड़ने की बात करते हैं,
मजदूर-किसान की एकता की बात करते हैं,
साम्राज्यवाद और पूंजीवादी वर्चस्व का विरोध करते हैं,
सामाजिक न्याय और मेहनतकश जनता के अधिकारों की बात करते हैं।
लेकिन जब सवाल आता है—
“क्या भारतीय वाम की बिखरी हुई ताकतों को व्यापक संघर्ष के लिए एक साथ लाया जा सकता है?”
तो हमारी सारी क्रांतिकारी भाषा अचानक संगठनात्मक सीमाओं से टकराने लगती है।
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एक असहज सवाल से शुरुआत कीजिए
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन कोई नया विषय नहीं है।
1960 के दशक में कार्यक्रम और रणनीति को लेकर गंभीर मतभेदों ने CPI के विभाजन और CPI(M) के गठन का रास्ता बनाया। बाद में विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धाराएँ भी अलग-अलग रास्तों पर चलीं।
इन विभाजनों के पीछे ऐतिहासिक, वैचारिक और रणनीतिक कारण रहे हैं।
इसलिए हर मतभेद को “सत्ता की लड़ाई” कह देना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन आज सवाल यह है—
क्या पुराने मतभेदों को हमेशा के लिए राजनीतिक दीवार बना देना आवश्यक है?
क्या अलग-अलग वैचारिक धाराएँ अपने मतभेद बनाए रखते हुए भी जनता के साझा सवालों पर एक साथ संघर्ष नहीं कर सकतीं?
और अगर कर सकती हैं—
तो हम उतना भी क्यों नहीं कर पा रहे?
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नेतृत्व से मेरा सीधा सवाल है
आप दशकों से जनता को त्याग का पाठ पढ़ाते हैं।
आप कहते हैं—
व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है।
आप कहते हैं—
पार्टी जनता के लिए है।
आप कहते हैं—
नेतृत्व वर्ग-संघर्ष का औजार है।
तो फिर एक दिन यह सवाल अपने ऊपर भी लागू कीजिए—
अगर मेरे पद से हटने से व्यापक वाम एकता मजबूत होती है, तो क्या मैं हटने के लिए तैयार हूँ?
अगर उत्तर “हाँ” है—
तो रास्ता खोलिए।
अगर उत्तर “नहीं” है—
तो कम-से-कम ईमानदारी से यह स्वीकार कीजिए कि समस्या केवल वैचारिक मतभेद की नहीं, संगठनात्मक सत्ता की भी है।
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क्या महासचिव का पद क्रांति से बड़ा है?
यह सवाल कठोर है।
लेकिन शायद अब कठोर सवालों से बचने का समय नहीं है।
महासचिव कौन बनेगा?
राज्य सचिव कौन बनेगा?
केंद्रीय समिति में किसका कितना प्रतिनिधित्व होगा?
किस पार्टी का झंडा आगे रहेगा?
किसका नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा?
किसके पास अंतिम राजनीतिक निर्णय का अधिकार होगा?
ये सवाल संगठन के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
लेकिन जनता के लिए?
एक बेरोजगार युवा के लिए महासचिव की कुर्सी का क्या अर्थ है?
एक मजदूर के लिए केंद्रीय समिति की सीट का क्या अर्थ है?
एक खेत-मजदूर के लिए आपकी संगठनात्मक प्रतिष्ठा का क्या अर्थ है?
वह सिर्फ यह देखता है—
जब उसका जीवन संकट में था, तब कौन उसके साथ खड़ा था?
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आपके अपने दस्तावेज आपको आईना दिखाते हैं
यह आलोचना बाहर से थोपी हुई नहीं है।
CPI अपने संविधान में “unity in action”, आंतरिक बहस और असहमति के सम्मान की बात करती है।
CPI(M) के दस्तावेज Left unity को संयुक्त कार्रवाई और साझा अभियानों के आधार पर मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।
CPI(ML) Liberation का 2023 का कार्यक्रम तो और आगे जाकर सभी भारतीय कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक एकीकरण की दिशा में बात करता है और Left forces की unity in action को महत्वपूर्ण मानता है।
तो सवाल यह नहीं कि—
एकता की बात कौन करता है?
सवाल यह है—
एकता की दिशा में व्यवहारिक कदम कितने उठाए जाते हैं?
यहीं दस्तावेज और व्यवहार के बीच की दूरी पर बहस होनी चाहिए।
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आत्मालोचना दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए
किसी दूसरे संगठन को संशोधनवादी कहना आसान है।
किसी को अवसरवादी कहना आसान है।
किसी को संसदीय भटकाव का शिकार कहना आसान है।
किसी को अतिवामपंथी कहना आसान है।
लेकिन क्या हम अपने संगठन से पूछ सकते हैं—
जनता हमारे साथ क्यों नहीं बढ़ रही?
युवा हमारे साथ स्थायी रूप से क्यों नहीं जुड़ रहे?
मजदूर बस्तियों में हमारी राजनीतिक उपस्थिति क्यों कमजोर है?
किसानों के बीच हमारा प्रभाव अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुँच रहा?
नई पीढ़ी नेतृत्व में क्यों नहीं आ रही?
महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित तबकों को निर्णायक नेतृत्वकारी भूमिका कितनी मिली?
और सबसे कठिन सवाल—
अगर हमारी लाइन इतनी सही है, तो उसका सामाजिक प्रभाव हमारी अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं है?
यह सवाल दूसरे संगठन के खिलाफ हथियार नहीं होना चाहिए।
यह अपने संगठन के सामने रखा हुआ आईना होना चाहिए।
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छोटी-छोटी लाल दीवारों के भीतर बड़ा लाल आंदोलन कैसे बनेगा?
आज वाम आंदोलन के सामने एक विचित्र तस्वीर है।
अलग-अलग कार्यालय।
अलग-अलग सम्मेलन।
अलग-अलग पत्रिकाएँ।
अलग-अलग संगठन।
अलग-अलग नेतृत्व।
अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ।
और कभी-कभी—
एक-दूसरे के खिलाफ सबसे तीखी राजनीतिक भाषा।
लेकिन जनता?
वह इन दीवारों के बाहर खड़ी है।
क्या इन संगठनों को तुरंत एक पार्टी बन जाना चाहिए?
जरूरी नहीं।
क्या सभी वैचारिक मतभेद समाप्त किए जा सकते हैं?
शायद नहीं।
लेकिन क्या साझा मुद्दों पर संयुक्त संघर्ष, संयुक्त अभियान, संयुक्त जनमंच और व्यापक वाम एकता के नए प्रयोग हो सकते हैं?
इस सवाल का जवाब “हाँ” होना चाहिए—यदि जनता का संघर्ष सचमुच सर्वोच्च प्राथमिकता है।
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एकता का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं
यह भी साफ होना चाहिए।
वाम एकता का मतलब यह नहीं कि कोई संगठन अपनी विचारधारा छोड़ दे।
न इसका अर्थ यह है कि सभी ऐतिहासिक मतभेद मिटा दिए जाएँ।
न यह कि हर पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान समाप्त कर दे।
एकता का पहला चरण शायद इतना ही हो सकता है—
जहाँ संघर्ष साझा है, वहाँ संघर्ष भी साझा हो।
मजदूरों का सवाल—साझा संघर्ष।
किसानों का सवाल—साझा संघर्ष।
बेरोजगारी—साझा अभियान।
निजीकरण—साझा प्रतिरोध।
शिक्षा और स्वास्थ्य—साझा जनअभियान।
लोकतांत्रिक अधिकार—साझा मोर्चा।
इसके बाद राजनीतिक विश्वास पैदा होगा।
और शायद उसी से आगे की एकता की जमीन भी तैयार होगी।
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नेतृत्व की अगली परीक्षा
आज के नेतृत्व के सामने शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसने कितने सम्मेलन किए।
न यह कि कितने प्रस्ताव पारित किए।
न यह कि कितनी बार मंच से क्रांति शब्द बोला।
असली परीक्षा यह है—
क्या वह अपने बाद की पीढ़ी तैयार कर रहा है?
क्या वह युवाओं को केवल पोस्टर उठाने और नारे लगाने तक सीमित रखेगा?
या उन्हें निर्णय लेने की जगह देगा?
क्या पुराने नेता जीवन भर पद पर बने रहेंगे?
या एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति बनाएँगे जिसमें नेतृत्व का हस्तांतरण स्वाभाविक प्रक्रिया हो?
क्योंकि जो आंदोलन नई पीढ़ी को नेतृत्व नहीं देता, वह अंततः अपने अतीत का संग्रहालय बन सकता है।
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सबसे कठिन त्याग
त्याग का अर्थ केवल जेल जाना नहीं।
त्याग का अर्थ केवल गिरफ्तारी देना नहीं।
त्याग का अर्थ केवल लाठी खाना नहीं।
कभी-कभी—
सबसे कठिन त्याग अपनी कुर्सी छोड़ना होता है।
किसी पद से हटकर दूसरे को आगे बढ़ाना।
अपने संगठन की सीमा स्वीकार करना।
दूसरे संगठन की अच्छाई स्वीकार करना।
अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मानना।
और कभी-कभी यह कहना—
“मेरे रहते अगर एकता नहीं बन रही, तो मैं पीछे हटने को तैयार हूँ।”
यही वाक्य किसी भी नेता की वैचारिक प्रतिबद्धता की बड़ी परीक्षा हो सकता है।
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इतिहास आपसे एक दिन यह सवाल पूछेगा
जब मजदूर बिखरा था—आपने क्या किया?
जब किसान अकेला था—आपने क्या किया?
जब युवा बेरोजगार था—आपने क्या किया?
जब जनता महंगाई से जूझ रही थी—आपने क्या किया?
जब वाम की ताकत अलग-अलग दिशाओं में बंटी थी—आपने दीवार ऊँची की या पुल बनाया?
और जब इतिहास ने अवसर दिया—
क्या आपने अपनी कुर्सी बचाई या आंदोलन को बड़ा किया?
यह फैसला आज नहीं तो कल इतिहास करेगा।
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इसलिए यह खुला पत्र है
भारतीय वाम नेतृत्व से मेरी अपील है—
एक-दूसरे को हराने की राजनीति से ऊपर उठिए।
पहले संयुक्त संघर्ष की शुरुआत कीजिए।
फिर साझा कार्यक्रम बनाइए।
फिर व्यापक जनसंगठनों को जोड़िए।
फिर युवाओं और नई पीढ़ी को नेतृत्व में जगह दीजिए।
और अंततः उस राजनीतिक एकता पर बहस कीजिए जिसकी जरूरत आज जनता महसूस कर रही है।
किस पार्टी का झंडा ऊपर होगा—यह बाद का सवाल है।
पहला सवाल यह है कि जनता का झंडा कितना ऊपर उठेगा।
कौन महासचिव बनेगा—यह बाद का सवाल है।
पहला सवाल यह है कि मजदूर-किसान का नेतृत्व कौन मजबूत करेगा।
कौन सही मार्क्सवादी है—यह बहस चलती रहेगी।
लेकिन उससे पहले यह तय कीजिए—
क्या हम जनता के संघर्ष में एक साथ खड़े हो सकते हैं?
क्योंकि अगर नहीं—
तो हमें दूसरों को क्रांति का पाठ पढ़ाने से पहले अपने भीतर एक छोटी-सी क्रांति करनी होगी।
सत्ता की नहीं।
कुर्सी की नहीं।
दूसरे संगठन के खिलाफ नहीं।
अपने अहंकार के खिलाफ।
और शायद—
यही आज भारतीय वाम आंदोलन की पहली क्रांति होनी चाहिए।
क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?
अब जवाब भाषण से नहीं,
व्यवहार से देना होगा।
Tuesday, 29 September 2026
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, को धिक्कारना ही होगा ------ Hemant Kumar Jha's Post
मोदी नाम का सितारा तेजी से अस्त होने की ओर बढ़ चला है, उनकी रोशनी से रोशन होता शाह नाम का सितारा स्वयं निस्तेज हो जाएगा। यह देश के बरोजगारों, कामगारों और गरीबों के लिए अच्छी खबर है।
नरेंद्र मोदी के पास बेरोजगारों के लिए कोई सार्थक और प्रभावी विजन नहीं था। लप्पेबाजी और नारेबाजी विजन की जगह नहीं ले सकते, इसलिए मोदी राज में देश में बेरोजगारी की दर पिछले पचास वर्षों में सबसे अधिक हो गई।
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां मूलतः कॉर्पोरेट हितैषी और कामगार विरोधी रहीं। इसलिए उनके राज के पिछले दस बारह वर्षों में कॉर्पोरेट का मुनाफा जिस रफ्तार से बढ़ा उसकी आधी क्या, चौथाई भी कामगार की पगार बढ़ने की रफ्तार नहीं रही। मोदी सरकार का जाना इस देश के कामगारों के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए।
मोदी सरकार के पास गरीबों के लिए कुछ भी सार्थक नहीं था, सिवाय कुछ किलो फ्री अनाज या फौरी तौर पर कुछ नकद अनुदान के। इन सबसे गरीबी कम नहीं होती। भारत की लगभग 150 करोड़ आबादी में नीचे के 100 करोड़ लोगों की क्रय शक्ति नगण्य है और इस नगण्यता ने देश के बाजार की गतिशीलता पर जो नकारात्मक प्रभाव डाला है उसकी विवेचना आजकल हर आर्थिक विशेषज्ञ कर रहा है।
सवाल उठता है कि फिर मोदी आखिर करते क्या रहे इन बारह सालों में...???
वे राज करते रहे और वह भी पूरी ठसक के साथ। यह ठसक मिडिल क्लास की नकारात्मक साम्प्रदायिक सोच में उभार लाकर उन्होंने हासिल की, हिन्दी पट्टी के सवर्णों के राजनीतिक समर्थन, जो कालांतर में बेशर्म समर्थन में बदलता गया, से उन्होंने हासिल की और सबसे महत्वपूर्ण, भ्रष्टाचार, निजी महत्वाकांक्षा और जातिवाद के आरोपों से सने, लिथड़े उत्तर भारत के कतिपय क्षेत्रीय दलों की निस्तेज विपक्षी राजनीति से हासिल की, कांग्रेस की उस गतिहीन राजनीति से हासिल की जिसे मोदी नीत भाजपा से चुनावी मैदान में पराजित होने के बाद अगले एक दशक तक यह समझ में ही नहीं आया कि आखिर उसकी राजनीति और चुनावी नीति का आधार क्या हो, आखिर किस पिच पर वह चुनावी बैटिंग करे। कांग्रेस आज भी इस संदर्भ में बहुत क्लियर नहीं है। उसे राहुल की निरंतर बढ़ती जा रही राजनीतिक तेजस्विता का सहारा है और बस, इसी से उम्मीद भी है जो मोदी के बरक्स सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आए हैं।
मोदी की सत्ता की ठसक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका उन रीढ़विहीन लोगों की रही जो लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में स्थापित संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे। चाहे भय के कारण हो, लोभ के कारण हो या अन्य अज्ञात कारण हों, उनमें से अनेक ने इस देश की जनता के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों के पालन में कोताही की और मोदी सत्ता को सहलाने वाले कार्य करते रहे। उनमें से एक, चुनाव आयोग की फजीहत आज देश ही नहीं, दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। देश की न्यायपालिका ने भी इस दौरान अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई नहीं, बल्कि आमलोगों की उसके प्रति आस्था में गिरावट ही आई है और यह इस दौर की सबसे दुखद सच्चाई है। बाकी, सीबीआई, ईडी आदि की तो बिसात ही क्या। राजनीति के मोहरे के रूप में उसकी घटिया छवि कांग्रेस के राज में ही स्थापित हो चुकी थी, मोदी राज में उस छवि में और गहरी कालिख पुती।
मीडिया की तो बात ही क्या करनी। अगर सोशल मीडिया और सिटीजन जर्नलिज्म का जमाना न आया होता तो इस देश के मीडिया ने जितना अंधेरा फैलाया है, लोग समझ भी नहीं पाते और मुख्यधारा के मीडिया को धिक्कार भी नहीं पाते।
सब कुछ के बावजूद, अगर मोदी के दौर के किसी तंत्र को धिक्कारने की बात हो तो सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिसे नेशनल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या मुख्यधारा का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहने का प्रचलन है, को ही धिक्कारने का मन होगा। धिक्कार है उन चैनलों को, उनके एंकरों को, जो पत्रकार की शक्ल में दलाल थे या हैं।
मोदी के दौर ने हमें यह भी बताया कि इस देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग नैतिक और बौद्धिक रूप से कितना पतित हो सकता है। उनके पतन की गाथा कांग्रेस राज के इतिहास में भी दर्ज हुई, लेकिन, मोदी के दौर में उसके हर्फ़ मोटे होते गए, जिन्हें देखना समझना अधिक आसान था, जिन्हें देख समझ कर आम लोगों को भी शर्म आने लगी कि ये हमारे देश के बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल हैं।
मोदी जी अभी सत्ता में हैं, शाह जी भी पॉवर में ही हैं। लेकिन कुछ है ऐसा कि लगता है अब वह इकबाल नहीं रहा। जब उनका दौर बाकायदा खत्म होगा, तब जो इस दौर की कुछ सच्चाइयाँ सामने आ सकती हैं, वे हमें बताएंगी कि नैरेटिव पर आधारित राजनीति की सफलता के पीछे कितनी गहरी धुंध होती है। इंतजार करना होगा।
Sunday, 26 July 2026
नेहा बोरा: जो आंदोलन की आत्मा बनी ------- Ashish Saini
नेहा बोरा: जो आंदोलन की आत्मा बनी!
23 दिन से उसने अन्न का एक दाना नहीं खाया था। शरीर का वजन साढ़े सात किलो घट चुका था। रक्त में शर्करा खतरनाक स्तर पर पहुँच गई थी। डॉक्टर चेतावनी दे रहे थे कि शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं। फिर भी नेहा बोरा जब जंतर-मंतर के मंच पर पहुँचीं, तो उनकी आवाज़ में कमजोरी नहीं थी।
उन्होंने घायल विद्यार्थियों की ओर देखकर कहा,
“हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”
लगभग 29 वर्ष की नेहा मूल रूप से उत्तराखंड से आती हैं। उनके बचपन का एक हिस्सा सिलीगुड़ी में बीता जहाँ उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, सिलीगुड़ी से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। स्कूल के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आईं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक किया। समाजशास्त्र की पढ़ाई ने उन्हें जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता, सामाजिक सत्ता और संस्थागत भेदभाव जैसे प्रश्नों से जोड़ा।
नेहा ने आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। आंबेडकर विश्वविद्यालय ने सामाजिक विज्ञान, संस्कृति, मानवीय अध्ययन और आलोचनात्मक चिंतन पर केंद्रित शिक्षा के लिए अपनी अलग पहचान बनाई है। यहीं उनके सामाजिक सरोकारों, रंगमंच और सार्वजनिक सक्रियता को अधिक स्पष्ट दिशा मिली।
नेहा रंगमंच से जुड़ी हैं। रंगमंच ने उनकी भाषा, मंच पर उपस्थिति और लोगों से सीधे संवाद करने की क्षमता को मजबूत किया। उनके भाषण में किसी तैयार राजनीतिक पर्चे की भाषा नहीं सुनाई देती। वे सामने खड़े लोगों से बात करती हैं। उनके वाक्य छोटे होते हैं और चोट सीधे करते हैं।
इस समय नेहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पीएचडी के तीसरे वर्ष की शोधार्थी हैं। यह केंद्र सिनेमा, रंगमंच, प्रदर्शन, दृश्य संस्कृति और कला के सामाजिक अर्थों का अध्ययन करता है।
यही उनकी पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। वे केवल नारे लगाने वाली छात्र नेता नहीं हैं। वे समाजशास्त्र की विद्यार्थी, कला और प्रदर्शन की शोधार्थी तथा रंगमंच से जुड़ी कार्यकर्ता हैं। कक्षा, पुस्तकालय, रंगमंच और आंदोलन उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के चार आधार हैं।
जेएनयू में पढ़ाई के दौरान नेहा छात्र राजनीति में सक्रिय हुईं। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन, आइसा से जुड़ीं और बाद में इसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गईं। शिक्षा का निजीकरण, विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि, छात्रावास, छात्रवृत्ति, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की सुरक्षा और लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार उनके प्रमुख मुद्दे बने।
वे मॉब लिंचिंग के विरुद्ध बोलीं। उन्होंने बिलकिस बानो के लिए न्याय की माँग उठाई। उन्होंने गाजा में मारे जा रहे नागरिकों, महिलाओं और बच्चों के पक्ष में आवाज़ उठाई। वे दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के समान अधिकार की बात करती रही हैं। उनका मानना है कि शिक्षा केवल उन परिवारों का विशेषाधिकार नहीं बन सकती, जिनके पास महँगी फीस और निजी कोचिंग के लिए पैसा है।
जंतर-मंतर का आंदोलन पेपर लीक, परीक्षाओं में गड़बड़ियों, बेरोजगारी और विद्यार्थियों की आत्महत्याओं के प्रश्न पर खड़ा हुआ। सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी” के व्यंग्यात्मक नाम से शुरू हुई मुहिम जल्द ही सड़कों पर उतर आई। देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी दिल्ली पहुँचे। उनकी प्रमुख माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी तय करना थी।
नेहा बोरा ने अपने साथियों मनीष कुमार और आमीन अमितोज के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। सोनम वांगचुक भी उनके साथ अनशन पर बैठे। दिन बीतते गए। सरकार की ओर से कोई निर्णायक बातचीत नहीं हुई। नेहा का शरीर लगातार कमजोर होता गया। फिर भी वे वहीं बैठी रहीं।
21वें दिन पुलिस सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई। नेहा ने उसी समय कहा,
“एक ओर सरकार ने 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों और सोनम वांगचुक की कोई सुध नहीं ली। दूसरी ओर हमारे अनशनकारियों को जबरन उठाकर अस्पताल में भर्ती कराने की कोशिश की जा रही है।”
उन्होंने लोगों से जंतर-मंतर पहुँचने की अपील की और कहा,
“यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक समाप्त नहीं होगा।”
संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई ने नेहा को भीतर तक झकझोर दिया। जंतर-मंतर के मंच पर लौटकर उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहे विद्यार्थियों पर लाठियाँ चलाई गईं, आँसू गैस छोड़ी गई और महिला प्रदर्शनकारियों के शरीर के निजी हिस्सों पर बैटन से वार किए गए।
उन्होंने कहा,
“संसद तक अपनी माँगें लेकर पहुँचे, तो हमारे सिर फोड़ दिए गए। इसे याद रखा जाएगा।”
उन्होंने कहा,
“हमारे इस आंदोलन के बाद जितनी जान बाकी छोड़ी है, वह गवाही देगी। हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”
नेहा ने मंच से सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को याद किया। उन्होंने उन स्त्रियों का नाम लिया जिन्होंने गालियाँ, अपमान और हमले सहकर लड़कियों तथा वंचित बच्चों के लिए शिक्षा के द्वार खोले थे। नेहा ने आज की शिक्षा की लड़ाई को उसी परंपरा से जोड़ा। उनका संदेश साफ था कि शिक्षा बचाना केवल वर्तमान विद्यार्थियों का प्रश्न नहीं, आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है।
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने बाद में अपने कार्यक्रम सेंट्रल हॉल में नेहा बोरा, आमीन अमितोज और आंदोलन में शामिल अनुष्का घोष से बातचीत की। बातचीत का विषय छात्र आंदोलन, नीट, पेपर लीक, शिक्षा सुधार और लोकतांत्रिक अधिकार था।
नेहा ने कपिल सिब्बल से कहा कि युवाओं का गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ है। वर्षों की तैयारी के बाद पेपर लीक हो जाता है। परीक्षा रद्द हो जाती है। नई तारीख महीनों नहीं आती। परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। विद्यार्थी अपना सबसे अच्छा समय कोचिंग और परीक्षा केंद्रों के बीच बिता देते हैं। इसके बाद भी उन्हें निष्पक्ष अवसर नहीं मिलता।
उन्होंने साफ किया कि यह आंदोलन अब किसी एक नेता या व्यक्ति का आंदोलन नहीं है। यह उन लाखों विद्यार्थियों का आंदोलन है जिनकी मेहनत को कमजोर परीक्षा व्यवस्था ने अनिश्चितता में डाल दिया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा उनके लिए एक जवाबदेही की माँग है।
कपिल सिब्बल से बातचीत में उन्होंने कहा कि इतिहास में बड़े परिवर्तन युवाओं ने ही किए हैं। नेहा ने आंदोलन का मूल भाव रखा। विद्यार्थी सरकार से बात चाहते हैं, सहानुभूति नहीं। वे ठोस कार्रवाई चाहते हैं, आश्वासन नहीं। वे साफ और सुरक्षित परीक्षा चाहते हैं। वे अपने भविष्य पर भरोसा चाहते हैं।
नेहा बोरा की कहानी अभी लिखी जा रही है। सिलीगुड़ी की छात्रा से दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की विद्यार्थी, आंबेडकर विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर छात्रा, रंगकर्मी, जेएनयू की शोधार्थी और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष तक की उनकी यात्रा लंबी है।
जंतर-मंतर ने उन्हें राष्ट्रीय चेहरा बना दिया है। उनकी माँगें सीधी हैं। पेपर लीक बंद हों। परीक्षाएँ निष्पक्ष हों। दोषियों को सजा मिले। शिक्षा सस्ती हो। सरकार विद्यार्थियों से बात करे। राजनीतिक जवाबदेही तय हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग न हो।
23 दिनों तक भूखी रही वह शोधार्थी आज देश से यही पूछ रही है कि पढ़ने वाला युवा न्याय माँगने कहाँ जाए?
उसका नाम नेहा बोरा है।
और अब उसकी आवाज़ अनसुनी नहीं है।
Wednesday, 22 July 2026
आंदोलन मर गया है ------ सुनिधि
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स्पेशल एपिसोड | जनता नहीं मरी है, आंदोलन मर गया है!
जब संघर्ष असली होता है, तब सत्ता भी झुकती है और जनता भी उठ खड़ी होती है।
नमस्कार साथियों,
मैं हूँ सुनिधि और आप देख रहे हैं "राम या वाम"।
साथियों, आज का यह एपिसोड सिर्फ एक राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि वामपंथ और जन आंदोलनों के सामने खड़े सबसे बड़े सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है।
कल दिल्ली की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसने वर्षों से फैलाए जा रहे एक बड़े राजनीतिक झूठ को बेनकाब कर दिया।
हमें लगातार बताया गया कि आज का युवा सिर्फ धर्म, राष्ट्रवाद और प्रचार की राजनीति में उलझ चुका है। कहा गया कि अब युवा सड़क पर नहीं उतरता, उसे केवल सोशल मीडिया की राजनीति पसंद है।
लेकिन कल दिल्ली ने इस झूठ की धज्जियाँ उड़ा दीं।
हजारों युवा सड़कों पर थे।
लाठी चली...
आँसू गैस चली...
पानी की बौछारें चलीं...
लेकिन युवा पीछे नहीं हटे।
इसका मतलब साफ़ है।
युवा मरा नहीं है।
उसका गुस्सा मरा नहीं है।
उसकी लड़ने की इच्छा मरी नहीं है।
मर गई है तो केवल वह राजनीति, जिसने संघर्ष करना छोड़ दिया है।
ध्यान से देखिए...
शुरुआत में इस आंदोलन में भीड़ नहीं थी।
लेकिन जैसे-जैसे लोगों को भरोसा हुआ कि यह केवल फोटो खिंचवाने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि अंत तक लड़ने वाला संघर्ष है, वैसे-वैसे जनता भी जुड़ती चली गई।
जनता भाषण नहीं देखती...
जनता प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं देखती...
जनता यह देखती है कि नेता उसके साथ लाठी खाता है या नहीं।
जेल जाता है या नहीं।
अनशन करता है या नहीं।
अंत तक डटा रहता है या नहीं।
यही भरोसा आंदोलन की सबसे बड़ी पूँजी होता है।
अब मैं वामपंथ से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ।
जिस संगठन की पूरे देश में मजबूत संरचना भी नहीं है, जो अभी शुरुआती दौर में है, यदि वह लगातार संघर्ष करके हजारों युवाओं को सड़क पर ला सकता है...
तो फिर सौ साल पुराना वामपंथ जनता को क्यों नहीं जगा पा रहा है?
क्या जनता खत्म हो गई?
नहीं।
क्या मुद्दे खत्म हो गए?
नहीं।
महँगाई है।
बेरोज़गारी है।
निजीकरण है।
चार श्रम संहिताएँ हैं।
आउटसोर्सिंग है।
मजदूरों पर हमले हैं।
किसानों की बदहाली है।
संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस है।
यानी मुद्दों का पहाड़ खड़ा है।
फिर भी आंदोलन क्यों नहीं खड़े हो रहे?
क्योंकि संघर्ष की राजनीति की जगह कार्यक्रमों की राजनीति ने ले ली है।
एक दिन धरना...
एक दिन प्रदर्शन...
एक ज्ञापन...
एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस...
फिर सब अपने-अपने घर।
क्या ऐसे सत्ता बदलती है?
क्या ऐसे इतिहास लिखा जाता है?
बिल्कुल नहीं।
इतिहास हमेशा उन्हीं लोगों ने लिखा है जिन्होंने आख़िरी साँस तक लड़ाई लड़ी।
अन्ना आंदोलन...
किसान आंदोलन...
देश के तमाम बड़े जन आंदोलन...
इन सबने साबित किया कि जनता तभी जुड़ती है जब उसे विश्वास होता है कि नेतृत्व बिकेगा नहीं, झुकेगा नहीं और भागेगा नहीं।
यही वह जगह है जहाँ, मेरी राय में, आज वामपंथ का एक हिस्सा सबसे बड़ी भूल कर रहा है।
ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के लिए संघर्ष से ज़्यादा महत्वपूर्ण कुर्सी हो गई है।
उन्हें डर रहता है कि बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ तो नए कार्यकर्ता उभरेंगे, नया नेतृत्व सामने आएगा और वर्षों से जमी हुई राजनीति को चुनौती मिलेगी।
इसलिए आंदोलन को बड़ा होने से पहले ही सीमित कर दिया जाता है।
और ये ऐलसोनवादी नेतृत्व जिन्हें न तो आंदोलन से मतलब है ना जनता के दर्द से मतलब है यह सिर्फ और सिर्फ किसी तरह पद पर बना रहना है ताकि समय पर सौदेबाजी कर अपने लिए उचित लाभ प्राप्त कर सके, उन्होंने आंदोलन करना सिर्फ छोड़ ही नहीं दिया है बल्कि उन्हें आंदोलन से विश्वास उठ गया है उन्हें पता है बड़े आंदोलन में 9 केवल सरकारी होती है बल्कि बहुत सारे नेतृत्वकारी साथी सामने आ जाते हैं और जैसे किसी भी साधु की तपस्या से इंद्र डर जाता है उसका अपना इंद्रासन खतरे में दिखाई देने लगता है ठीक उसी तरह से बड़े आंदोलन से यह तथाकथित वामपंथी नेता डर जाते हैं उन्हें अपनी कुर्सी खतरे में दिखाई देने लगती है और इसलिए वह ऐसा नहीं होने देना चाहते इसलिए आंदोलन मर रहा है बाम आज भी समाज में अपना स्थान रखता है लोगों के बीच उसके मुद्दे उसके तौर तरीके महत्व रखते हैं या आज भी अप्रांसगिक नहीं हुआ है लेकिन एक षड्यंत्र के तहत इसके वर्तमान नेतृत्व इसे असफल बनाने का प्रयास करता रहा है
धरना हो...
लेकिन लंबा नहीं।
संघर्ष हो...
लेकिन निर्णायक नहीं।
भीड़ आए...
लेकिन नेतृत्व न बदले।
यही सोच आंदोलन को मार रही है।
याद रखिए...
वामपंथ नहीं मरा है।
वामपंथ का विचार नहीं मरा है।
मरा है तो संघर्ष का साहस।
जिस दिन वामपंथ फिर से जनता के बीच जाएगा...
जिस दिन मजदूर, किसान, छात्र और नौजवान के सवालों पर महीनों तक डटकर लड़ना शुरू करेगा...
उसी दिन लाखों लोग फिर लाल झंडे के नीचे दिखाई देंगे।
क्योंकि जनता आज भी न्याय चाहती है।
जनता आज भी बराबरी चाहती है।
जनता आज भी संघर्ष करने वालों का सम्मान करती है।
इसलिए मैं एक बार फिर कहता हूँ—
जनता नहीं मरी है...
आंदोलन मर गया है...
और जिस दिन आंदोलन फिर ज़िंदा होगा...
उसी दिन इतिहास फिर करवट लेगा।
लाल सलाम!
इंकलाब ज़िंदाबाद!
शुद्धिकरण अभियान समिति ज़िंदाबाद!
संदर्भ ===== https://www.facebook.com/reel/1747155269800555/?__cft__[0]=AZaVxDFNlwnAHM0qpX8Miz5BqFNBgMdGxx9WAZD0Vllg2HQ6aFCoywq4z_8Xls-W7ITfJdmrakOhbcSr1si3jF1uhTa_-_0lxkjsbWoWjyT_4VeBEX4sZLxuHRx2OxxrfoOIQJDqozOtS4rQlbPsS7VzPz4LJzMHqGfijRCcq0s_XQV4p8XX7-YQSknFH13ylac&__tn__=%2CO%2CP-y-R
Wednesday, 15 July 2026
क्या संगठन की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होनी चाहिए? ------ सुनिधि
गंभीर आरोपों पर चुप्पी क्यों? CPI (बिहार) में पारदर्शिता और जवाबदेही का बड़ा सवाल"
लाल सलाम साथियों!
मैं हूँ सुनिधि, और आप देख रहे हैं "राम या वाम"। यहाँ हम सत्ता से नहीं, सवालों से डरते हैं; व्यक्तियों से नहीं, तथ्यों से बात करते हैं। आज का सवाल है—क्या किसी भी संगठन की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?
आखिर सी पी आई, बिहार के राज्य सचिव कामरेड रामनरेश पांडेय का कौन सा गुप्त रहस्य मधुबनी जिला मंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य कामरेड मिथिलेश झा और एक अन्य विवादास्पद महिला नेतृ कामरेड राजश्री किरण के पास है जिस आधार पर ये दोनों राज्य सचिव को आपने दबाव में ले रहे हैं?
कामरेड मिथिलेश झा और राजश्री किरण के खिलाफ ठगी,गबन और धोखाधड़ी के आरोप लगातार लग रहे हैं और साथ हीं साथ कईआडियो और एक साथी द्वारा शपथ-पत्र भी दिया गया जिसकी कापी राम या वाम पर भी उपलब्ध है । 2018 में मधुबनी में संपन्न पार्टी के राज्य सम्मेलन के अवसर पर कईयों व्यावसायी से लाखो रुपए रूपए का उधार लेकर न चुकाने के आरोप भी मिथिलेश झा पर आज भी लग रहे हैं।जिसका एक उदाहरण है उदय किराना स्टोर ,जिसके मालिक ने हाल ही लगभग दो महीना पूर्व राज्य सचिव को एक लाख सोलह हजार रुपए मिथिलेश झा द्वारा न चुकाए जाने की शिकायत , पत्र द्वारा की। जिसकी एक कापी शुद्धिकरण अभियान समिति के पास भी है । लेकिन राज्य सचिव उसे भी फाईल में दबाकर बैठे हैं जबकि मधुबनी राज्य सम्मेलन के एक आयोजनकर्ता खुद राज्य सचिव ही थे।इसलिए पार्टी की हो रही बदनामी से वह अपने को अलग नही कर सकते।
सबसे चिंताजनक पहलू यह कि मधुबनी जिला में बड़े पैमाने पर फर्जी पार्टी सदस्यता और पार्टी फंड की हेराफेरी का मामला प्रकाश में आ रहा है।इससे बड़ा फंड हेराफेरी का उदाहरण क्या होगा कि जिला पार्टी का बैंक एकाउंट नही होने की बात कही जा रही है।फर्जी पार्टी सदस्यता का आंखे खोल देने वाला उदाहरण ही है राज्य और केन्द्र की नवीकरण मद का लाखो रुपए की बकाया राशि।अगर नवीकरण सही हुआ है तो बकाया राशि कैसे?
पार्टी साथियों का आरोप है कि मिथिलेश झा लगभग ग्यारह वर्षों से मधुबनी जिला पार्टी के सचिव हैं।इस अवधि में नवीकरण में 40 प्रतिशत राशि जो जिला और निचली इकाई का हिस्सा है,मिथिलेश झा ने उस राशि का कभी हिसाब नही दिया।अगर सभी को जोड़ा जाए तो यह राशि 30 से 40 लाख रुपए होती है।अगर यह आरोप सच है तो फर्जी सदस्यता का यह भी एक अकाट्य उदाहरण है।
सामान्य परिस्थिति में एक कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ऐसे आरोपों के लगने के बाद बिना विलंब किए संबद्ध व्यक्ति का पार्टी से निष्कासन एक मात्र सजा है।लेकिन उल्टे कामरेड रामनरेश पांडेय और उनके कुछ गुर्गे मिथिलेश झा और राजश्री किरण के बचाव में बेतुका तर्क देते नजर आ रहे हैं।इसमें कथित बिहार पार्टी प्रभारी कामरेड गिरीश चन्द्र शर्मा भी शामिल हैं जो मिथिलेश झा के निर्दोष होने पर तर्क देते घूम रहे हैं।इसी से लगता है कि मिथिलेश झा और राजश्री किरण के हाथों कामरेड रामनरेश पांडेय ब्लैकमेल हो रहे हैं जो पार्टी के लिए अत्यधिक चिंताजनक है।
लाल सलाम
कम्यूनिस्ट पार्टी जिंदाबाद
शुद्धिकरण अभियान समिति जिंदाबाद
Thursday, 9 July 2026
राम मन्दिर चढ़ावा चोरी प्रकरण - गहरे संकट में घिरे भाजपा और संघ परिवार ------------------------------------------- डा.गिरीश
राम मन्दिर चढ़ावा चोरी प्रकरण -
गहरे संकट में घिरे भाजपा और संघ परिवार
डा.गिरीश
हाल ही में अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे और दान में गवन के आरोपों को लेकर गंभीर विवाद खड़ा होगया है. इस मामले ने संघ परिवार, भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद की साख को बड़ा झटका दिया है. मंदिर के चढ़ावे की लूट में उनके नामित प्रबंधकगण पूरी तरह फंसे हुये हैं. आरोप मात्र चढ़ावे की चोरी तक सीमित नहीं हैं. चढ़ावे की रकम और अन्य उपहार गणना से लेकर बैंक में जमा होने तक कितने बचे, या कितने गायब हुये, यह एक बड़ा सवाल है. चढ़ाए गये आभूषणों, स्वर्ण मुद्राओं, चांदी की शिलाओं और अन्य वेशकीमती उपहारों की रसीद क्यों नहीं दी गयी और वह कहाँ गायब हो गये, यह उससे भी बड़ा सवाल है. इस लूट में लिप्त छुटभैयों ने कितनी संपत्तियां बनायीं और बडभैयों ने धन कहाँ ठिकाने लगाया और किस किस तक पहुंचाया यह सवाल भी सार्वजनिक जीवन चर्चा का विषय बना हुआ है. निर्माण के पूर्व से और पश्चात तक जारी रही भूमियों की खरीद में हुये घपले घोटाले तो चर्चा में हैं ही, अपितु मकानों- जमीनों को बेचने को बाध्य करने हेतु भू-भवन स्वामियों को सत्ता के बल पर बाध्य करने जैसे संगीन सवाल भी आज सुर्खियाँ बटोर रहे हैं. मन्दिर निर्माण फंड में घोटाले के आरोप भी उसी समय लगे थे और घोटाले की जांच करने वाले आयकर अधिकारी के ऊपर संघियों ने किस तरह हमला बोला था, यह भी लोग अभी भूले नहीं हैं. आरोप है कि निर्माण कार्य तक में 40 प्रतिशत कमीशन खाया जा रहा था, और उसका खुलासा करने वाले इंजीनियर को हटा दिया गया था.
चढ़ावा चोरी की परतें क्या उघडी कि नये पुराने घोटालों के उजागर होने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. अब एक नया और सनसनीखेज खुलासा यह हुआ है कि मंदिर निर्माण में लगे पत्थरों की खरीद तक में घोटाला हुआ है. पत्थरों की खदान के मालिक राजस्थान के श्री दिलीप सिंह राठौड़ ने खुलासा किया है कि उन्होंने पहले मंदिर के लिये मुफ्त पत्थर देने की पेशकश की थी. बाद में जिस पत्थर को वे सौ रुपये में देने को तैयार थे, उसके लिये रुपये 500 का बिल बनवाया गया. जब उन्होंने ऐसा न करने को कहा तो उनको धमकाया भी गया कि ‘हम जो कर रहे हैं करने दो, बीच में मत पड़ो, वरना मार दिए जाओगे, कुछ अता पता नहीं लगेगा. रामकाज की आड़ में चोरी और ऊपर से सीनाजोरी संघियों का पुराना गोरखधंधा है. राम मंदिर को संघियों ने अपना निजी एटीएम बना लिया है और देश और जनता को जमकर लूटा है.
आज इन आरोपों के घेरे में यदि आरएसएस और भाजपा बुरी तरह घिरे हैं तो उसके ठोस कारण हैं. सर्वोच्च न्यायलय द्वारा विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण के फैसले के बाद सन 2020 में श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना की गयी थी. धार्मिक ट्रस्ट में सनातनी परम्पराओं के अनुसार शंकराचार्यों से लेकर अखाड़ों के प्रतिनिधि नियुक्त किये जाने के स्थान पर मोदी- योगी मंडली ने उसमें पिट्ठू नौकरशाहों और खांटी संघियों को भर दिया. इनमें संघी चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राय प्रमुख हैं. निर्माण प्रभारी अयोध्या में मस्जिद पर हमला बोलने वालों पर गोली चलवाने वाले नौकरशाह नृपेन्द्र मिश्र बनाये गये. शिलान्यास से लेकर प्राण- प्रतिष्ठा तक, किसी धर्माचार्य को अवसर देने के बजाये प्रधानमंत्री मोदी जी ही छाये रहे. वे ही यजमान थे और वही भगवान. अनेक गेरुआ वस्त्रधारी सरकारी संत उनके चारण की भूमिका में थे. आज इस महाघोटाले के आरोप संघ और भाजपा पर लग रहे हैं तो इसके यही तमाम बुनियादी कारण हैं.
घोटाले की राशि और अन्य चढ़ावों के मूल्यों के बारे में लगाये जा रहे अनुमान सिर्फ अनुमान ही हैं. उनके वास्तविक मूल्य शायद ही कभी सामने आयें. वेशकीमती दान को लेकर नित नए श्रद्धालु सामने आरहे हैं. जिन्होंने सोना दिया चांदी दी, आभूषण दिए, हार दिए वेशकीमती रामायण भेंट की, मगर न तो उन्हें रसीद दी गयी और न ही पूछने पर संतोषजनक जबाव ही दिया गया. प्राण- प्रतिष्ठा के दिन से ही शुरू हुए इस घोटाले का सही आकार- प्रकार का अंदाजा शायद ही कोई जांच एजेंसी लगा पाये. श्रद्धालुओं और भक्तों को शायद इसी में संतोष कर लेना पड़ेगा कि असली दोषी पकडे जायें और उन्हें इबरतनाक सजा मिले. छोटी ही नहीं बड़ी मछलियाँ भी कटघरे में खड़ी दिखाई दें. पर अभी तक जो लक्षण दिखाई दे रहे हैं, उसमें यह दूर की कौड़ी ही दिखाई देती है. देश और उत्तर प्रदेश की सरकारों द्वारा अब तक उठाये गये कदम तो न केवल नाकाफी हैं अपितु छलावेपूर्ण हैं.
मामले के उजागर होने के बाद राज्य सरकार को सबसे पहले एफआईआर दर्ज करानी चाहिये थी. मगर उसने तत्काल ऐसा नहीं किया. राज्य सरकार ने अपने अधीन अधिकारियों को लेकर एक जांच कमेटी- एसआईटी गठित कर दी गयी. इसकी जबावदेही केवल राज्य सरकार के प्रति है, किसी न्यायिक निकाय के प्रति नहीं. पारदर्शिता अथवा जनता को जानकारी देना तो बहुत दूर की बात है. जब दबाव बड़ा तो 8 दिनों बाद एफआईआर दर्ज की गयी. पर अभी तक तो पुलिस और एसआईटी दोनों अठखेलियाँ कर रही हैं. ऊपर से नीचे तक वालों को ताबड़तोड़ हिरासत में लेकर पूछताछ करने के बजाये अभी तक छुटभैयों को ही हिरासत में लिया गया है. उनको भी पुलिस ने अभी तक रिमांड पर नहीं लिया है. सामान और रकम की जब्ती भी मामूली ही हुयी है. एसआईटी तक जेल में जाकर उनसे पूछताछ कर रही है. उनके प्रति इस वीआईपीनुमा व्यवहार से सभी हतप्रभ हैं. अभियुक्तों को रिमांड पर लेने के लिये लगातार दबाव बढ़ रहा है. अब खबरें आ रही हैं कि मामले में ईडी को भी शामिल किया जारहा है. अब्बल तो अभी तक यह मामला ईडी की जांच की श्रेणी में आता ही नहीं है, फिर भी यदि ईडी को इसमें शामिल किया जा रहा है तो यह मामले को उलझाने की कवायद ज्यादा नजर आरही है. निश्चय ही भाजपा और संघ परिवार दोषियों को बचाने में जुटे हैं.
प्रकरण पर लम्बे समय तक चुप्पी साधे रहने के बाद 3 जुलाई को संघ ने मौन तोड़ा संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले सामने आये. संघ जब संकट में होता है तो मातहत बचाव में उतरते हैं. शेष दिनों में सरसंघचालक ही गरजते- बरसते हैं. चढ़ावे की लूट पर घडियाली आंसू बहाते हुए होसबोले ने कहा- पीढ़ियों के संघर्ष और करोड़ों रामभक्तों के समर्पण से बना श्रीराम मंदिर संपूर्ण हिन्दू समाज की आस्था का केन्द्र है. चढ़ावे की चोरी से रामभक्तों की भावना और श्रद्धा को आघात पहुंचा है. एसआईटी जांच में जो भी दोषी पाये जायें उन्हें कठोर दंड मिले. इस विषय में जब श्री मोहन भागवत से सवाल किया गया तो उन्होंने यह कह कर पल्ला झाड लिया कि इस विषय पर होसबोले बात रख चुके हैं.
यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या संघ को सरकार के माध्यम से अपने द्वारा मनोनीत ट्रस्टियों और पदाधिकारियों के कुकृत्यों पर कोई पश्चाताप नहीं? संघ ने जिस एसआईटी पर भरोसा जताया है, उसकी भूमिका तो बेहद संदिग्ध है. होसबोले ट्रस्ट पर ही उम्मीद जता रहे हैं कि वह अपनी कमियों को दूर करेगा, जबकि उसको तत्काल भंग करने की जोरदार मांग उठ रही है. इतना ही नहीं इस महालूट को वे भ्रम और असमंजस की स्थिति बता रहे हैं. मन्दिर ट्रस्ट में सभी सदस्य या तो आरएसएस के हैं या उसके द्वारा मनोनीत हैं. वे इस पर चुप्पी साधे हैं, और सवाल उठाने वालों को राष्ट्रविरोधी और धर्मविरोधी बता रहे हैं. होसबोले ने न तो किसी अपने स्वयंसेवक का नाम लिया, न ही ट्रस्ट को भंग करने की बात की, और न ही इस घोटाले पर कोई नाराजगी जाहिर की. जनता को जरूर बरगलाया कि “धैर्य रखो और हिन्दू विरोधी, राष्ट्र विरोधी शक्तियों के हिन्दू धर्म एवं समाज को बदनाम करने के षडयंत्रों को विफल करो.” इसी तरह की बयानबाजी साधुवेशधारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ भी आये दिन करते रहते हैं और विपक्ष पर ही हमला बोलते रहते हैं.
संघ गिरोह से सीधा सवाल यह है कि जिस ट्रस्ट में पीएमओ का सीधा दखल हो, जिसमें पीएमओ का अधिकारी बैठा हो, जिसमें सारे सदस्य आरएसएस के हों, जिसमें राज्य के बड़े अधिकारी शामिल हों, जहां मुख्यमंत्री हर 15 दिन में चक्कर लगाते हों, वहां अदने से नौकर सालों से चोरी करते रहे और किसी को पता ही नहीं चला. अगर यह आपकी सरकार की काबिलियत है, यही आपका इंटेलिजेंस है, यही आपकी ईमानदारी और आपका चरित्र है तो ‘संघियो’ प्लीज भारत भूमि को माफ़ कर दीजिये. सत्ताभोग और धन एकत्रीकरण की भूख आप में बेहद प्रबल है, तो उस क्षुधा को शांत करने के लिये कोई और भूभाग तलाश कर लीजिये, भारत भूमि को मुक्त कर दीजिए.
छोटी छोटी बातों पर स्तरहीन प्रतिक्रिया देने वाले हमारे प्रधानमत्री श्री मोदी जी की इस विकराल घटना पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. इससे कोई और परेशान हो न हो अंधभक्तगण बेहद परेशान हैं. उनकी यह समझ में ही नहीं आ रहा कि छत्तीस इंची सीनाधारी यह नॉन- बायोलोजिकल प्राणी इस गंभीर मामले पर आखिर कब मौन तोड़ेगा? पर इस प्रकरण में शायद उन्हें निराश ही होना पड़ेगा. हाँ चेले- चमाटो को बचाने के लिये वे परदे के पीछे बेहद सक्रिय हैं. वकौल विनय कटियार के पधानमंत्री जी ने उनसे बात की और पूछा कि आगे क्या होगा?
राम मंदिर निर्माण, जिसे होसबोले पीढ़ियों के संघर्ष का परिणाम बता रहे हैं, वह संघर्ष किस हद तक काल्पनिक और मनगढ़ंत तथ्यों की बुनियाद पर खड़ा था, यहाँ उसकी चर्चा करना विषय को बहुत विस्तारित कर देगा. यहाँ हम बताना चाहते हैं कि इस संघर्ष में आरएसएस अथवा उसके अंग कहीं दूर दूर तक शामिल नहीं थे. न तो तब जब 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखी गयी, और न ही 1989 में राम मंदिर के शिलान्यास के समय. 1949 में देश और उत्तर प्रदेश कांग्रेस की सरकारें थीं, जबकि 1989 में केन्द्र में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में श्री मुलायम यादव की सरकार थी. लेकिन जब संघ ने मंदिर आन्दोलन में होने वाले राजनैतिक लाभ का आकलन कर लिया तब सारा संघ परिवार इस आन्दोलन में कूद पड़ा. तब से लेकर आज तक मंदिर के माध्यम से वोट और धन की लूट में संघ परिवार जुटा है. लेकिन चढ़ावा चोरी की इस घटना ने इसे अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है.
ऐसा नहीं है कि संघ पर यह संकट पहली बार आया है. गांधीजी की हत्या से लेकर आपातकाल के विरोध तक कई बार वह गहरे संकट में फंसा है. एक बार तो भाजपा के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष रिश्वत लेते कैमरे में कैद हुये और संघ की भारी थू थू हुयी. लेकिन हर बार वह अपनी कुटिल चालों और विपक्ष की सदाशयता से साफ़ बच निकलने में सफल रहा है. पर यह घटना औरों से भिन्न है क्योंकि इसने आस्थावानों की आस्था पर गहरी चोट पहुंचाई है. इस घटना से ट्रस्ट का ट्रस्ट ही नहीं भाजपा/ आरएसएस का तिलिस्म भी टूटा है.
पर यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस बार संघ गिरोह पहले से अधिक सुविधाजनक स्थिति में है. केन्द्र और उत्तर प्रदेश दोनों ही जगह उसकी सरकारें हैं. शासकीय मशीनरी से लेकर मीडिया तक उनके हाथों में है. दोनों ही सरकारें बड़ी ही बेशर्मी से बड़े दोषियों को बचाने में जुटी
सत्ता और सत्ता की ताकत के इस घटाटोप में जनता के साथ किस हद तक न्याय हो पायेगा कहना कठिन है. पर अंतिम न्याय तो जनता की अदालत में होना शेष है.
डा. गिरीश दिनांक- 9.7.2026
Wednesday, 29 April 2026
ये वीरांगनाएं ------ गुरुदास
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🔴 कौन हैं सृष्टि गुप्ता, आकृति चौधरी और मनीषा चौहान —
जिन्हें नोएडा पुलिस ने गिरफ़्तार किया?
आज जब इन तीनों महिलाओं को मुजरिम की तरह पेश किया जा रहा है, तब एक पल ठहरकर यह जानना और भी ज़रूरी हो जाता है कि—आख़िर ये हैं कौन?
इनकी विचारधारा क्या है?
इनके सामाजिक सरोकार क्या हैं?
ये किन मुद्दों पर खड़ी होती रही हैं और किस तरह के कामों में सक्रिय रही हैं?
आइए, देखते हैं इनके जीवन और काम की एक झलक—ताकि तस्वीर का वह पहलू भी सामने आ सके, जो शोर और आरोपों के बीच अक्सर दबा दिया जाता है।
➤ सृष्टि गुप्ता :
यह लखनऊ की रहने वाली एक संवेदनशील और सक्रिय छात्र-कार्यकर्ता हैं। वे एक कलाकार हैं और शांतिनिकेतन की पूर्व छात्रा रही हैं। दिल्ली के मॉडल टाउन में रहकर वे समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के बीच काम करती रही हैं। मजदूर बस्तियों में नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और शिक्षा, सम्मान व बराबरी के सवालों को जनता के बीच ले जाना उनके काम का हिस्सा रहा है।
वे दिशा छात्र संगठन से भी जुड़ी रही हैं, जो छात्र हितों के मुद्दों को सर्वोपरि मानता है और क्रांतिकारी विचारधाराओं से प्रेरित सामाजिक-शैक्षिक सरोकारों के लिए काम करता है।
➤ आकृति चौधरी :
यह एक थिएटर कलाकार हैं और DNU की पूर्व छात्रा रही हैं। दिल्ली में रहकर वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय रही हैं—झुग्गी बस्तियों के बच्चों को पढ़ाना, महिला मुद्दों पर काम करना और छात्र आंदोलनों में भाग लेना उनके काम का हिस्सा रहा है। उनके काम का केंद्र शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय रहा है।
वे भी दिशा छात्र संगठन से जुड़ी रही हैं, और छात्र हितों तथा सामाजिक न्याय के सवालों पर सक्रिय भागीदारी निभाती रही हैं।
➤ मनीषा चौहान :
यह एक फैक्ट्री वर्कर होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। वे उन युवा स्त्रियों में से हैं जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज के व्यापक हित को प्राथमिकता दी। वे मजदूरों और महिलाओं के मुद्दों पर सक्रिय रही हैं और ज़मीनी स्तर पर लोगों को संगठित करने का काम करती रही हैं।
इन्होंने दिल्ली में चले बादाम मजदूरों के आंदोलन, आंगनवाड़ी वर्कर्स के संघर्ष और सैकड़ों महिला आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। राजधानी दिल्ली में महिला आंदोलनों में इनकी मजबूत भागीदारी रही है और ये मजदूर आंदोलनों से भी गहराई से जुड़ी रही हैं।
तीनों की सोच और जीवनदृष्टि सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख और दुर्गा भाभी जैसी ऐतिहासिक हस्तियों के संघर्षों से प्रेरित है। वे खुद को इसी संघर्षशील विरासत का हिस्सा मानती हैं।
लेकिन दूसरी तरफ़__
11 अप्रैल को नोएडा में चल रहे शांतिपूर्ण मजदूर आंदोलन के दौरान इन तीनों को सादी वर्दी में पुलिसकर्मियों द्वारा बोटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से उठाया गया। आरोप है कि यह कार्रवाई बिना स्पष्ट वारंट और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए की गई।
कानून—विशेषकर BNSS और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश—गिरफ्तारी को लेकर कुछ स्पष्ट सुरक्षा देते हैं:
• सूर्यास्त के बाद महिला की गिरफ्तारी सामान्यतः नहीं की जा सकती।
• विशेष स्थिति में मजिस्ट्रेट की अनुमति और महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी अनिवार्य होती है।
• अरेस्ट मेमो देना और परिवार/वकील को सूचना देना जरूरी होता है।
• 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है।
इन नियमों का मकसद नागरिकों—खासतौर पर महिलाओं—की सुरक्षा करना है। लेकिन इस मामले में इनके उल्लंघन के आरोप इस पूरी कार्रवाई को गंभीर सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं।
और सबसे चिंताजनक बात…
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा करने वाला मीडिया भी इस पूरे मामले में निष्पक्ष नहीं दिखता। कई न्यूज़ चैनल इन तीनों को अदालत के फ़ैसले से पहले ही “अपराधी” की तरह पेश कर रहे हैं।
बिना ठोस प्रमाण और न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुए इस तरह का मीडिया ट्रायल न सिर्फ़ न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी और विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
सवाल सिर्फ तीन नामों का नहीं है…
क्या मजदूरों के हक़ की बात करना अपराध है?
क्या सामाजिक न्याय के लिए खड़ा होना साज़िश है?
क्या शांतिपूर्ण आंदोलनों का समर्थन करना कानून के खिलाफ है?
हम यह स्पष्ट चाहते हैं कि तीनों को निष्पक्ष और पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया मिले।
गिरफ्तारी से जुड़े सभी तथ्यों की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
केवल खबरें सुनना या देखना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उनपर विचार करना, सत्य और झूठ की परख करना भी जरूरी है।
#ManishaChauhan #SrishtiGupta #AkritiChaoudhary #noidaworkerprotest
Tuesday, 24 March 2026
ममता बनर्जी की संभावनाएं ------ विजय राजबली माथुर
Friday, October 19, 2012
"ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं ? "
उद्धृत लेख द्वारा मैंने स्पष्ट किया था :
पुराने अखबारों का अवलोकन करते समय सुश्री ममता बनर्जी की यह जन्मपत्री दिखाई दे गई जिसमे सन 2002 तक का उनका भविष्य लेखक ने अपनी थ्यौरी से दिया था। उसके सही-गलत होने की विवेचना मैं नहीं कर रहा हूँ। मैंने विगत विधानसभा चुनावों से पूर्व अपने एक लेख द्वारा ममता जी की कटु राजनीतिक आलोचना भी की थी और पश्चिम बंगाल की जनता से आह्वान भी किया था कि वह ममता जी को सत्तारूढ़ न होने दे। परंतु ममता जी मुख्यमंत्री बनी और बड़ी शान से बनीं। इसलिए भी कौतूहल था उनका भविष्य जानने का और इसलिए भी कि दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी मे 8वी कक्षा से 10वी बोर्ड की परीक्षा पास करने तक रहने के कारण बंगाल की राजनीति मे दिलचस्पी सदा ही रही है। वहाँ से 10-15 किलोमीटर दूर ही है नक्सल बाड़ी जहां 1967 मे 'नक्सल बाड़ी से नल बाड़ी तक' आंदोलन हमारे रहते ही शुरू हुआ था। इस आंदोलन का सम्पूर्ण लाभ राजस्थान के मारवाड़ियों को हुआ था जिनको इंश्योरेंस क्लेम नुकसान से कहीं बहुत ज़्यादा मिला था। अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर आज भी मैं ममता जी का समर्थक नहीं हूँ,परंतु उनके ग्रह-नक्षत्र जो बोल रहे हैं उनको झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। misuse of knowledge भी मैं नहीं कर सकता। अतः ममता जी की कुंडली का वैज्ञानिक निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत करने मे कोई पूर्वाग्रह(IBN7 के प्रतिनिधि ब्लागर एवं उनकी सहयोगी पूना प्रवासी ब्लागर की भांति जो ज्योतिष को मीठा जहर कहते हैं ) भी नहीं है।
ममता जी की प्रस्तुत जन्मपत्री के अनुसार उनका जन्म लग्न-मकर है और---
द्वितीय भाव मे कुम्भ का 'मंगल'
पंचम भाव मे वृष का 'चंद्रमा'
षष्ठम भाव मे मिथुन का 'केतू'
सप्तम भाव मे कर्क का 'ब्रहस्पति'
दशम भाव मे तुला का 'शनि'
एकादश भाव मे वृश्चिक का 'शुक्र'
द्वादश भाव मे धनु के 'सूर्य','बुध' और 'राहू'
अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है।
इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है
जो 'राज योग' है।
ममता जी को समयानुकूल सही बात कहने व उठाने का विलक्षण लाभ भी उनके ग्रह प्रदान कर रहे हैं
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आजकल इधर कई यू ट्यूब चेनल्स पर दिग्गज ज्योतिषी गण ' ममता बनर्जी ' के सत्ता वापसी को असंभव बताते नहीं थक रहे है ऐसा कर वे सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं।
मेरे अपने आँकलंन के अनुसार ०६ फरवरी २०२६ से ०६ दिसंबर २०२८ तक ममता जी की बुध महादशान्तर्गत ' शुक्र' की अंतर्दशा चल रही है जो सुखदायक और श्रेष्ठ है उसके बाद भी ०९ मार्च २०३२ तक ममता जी का समय लाभदायक,श्रेष्ठ और राज्य वृद्धिदायक होगा। अतः यदि व्यापक हेराफेरी ,धांधली और धूर्तता कामयाब न हो तो ममता जी की पुनः जीत अवश्य ही होगी। हम उनकी सफलता के लिए मंगलकामना करते हैं।
Wednesday, 18 March 2026
युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं! ------ डा॰ गिरीश
साम्राज्यवादी युद्धोन्मादी अमेरिका और जियानवादी हिंसक इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये अवांच्छित और विध्वंसकारी युद्ध की विभीषिका पर कालजयी शायर साहिर लुधियानवी की मशहूर नज्म आज और भी प्रासंगिक बन पड़ी है। युद्ध के बारे में लिखी गयी इस नज्म का यद्यपि एक एक हरूफ़ सार्थक और सोद्देश्य है लेकिन ये चार पंक्तियाँ ही युद्ध की समूची फिलास्फी को तार- तार कर देती हैं-
जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
आग और ख़ून आज वख्शेगी
भूख और एहतियाज कल देगी
अमेरिका और इजरायल ईरान पर थोपे गये इस युद्ध को उचित ठहराने के जो कारण गिनाते रहे हैं वे तर्क की कसौटी पर कहीं भी खरे नहीं उतरते। वे कहते रहे हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने जा रहा है। तो फिर सवाल उठता है कि आप कौन होते हैं उसे रोकने वाले। आप दोनों तो ख़ुद ही परमाणु हथियारों का भारी जखीरा लिये बैठे हैं। इजरायल ईरान का दसवां भाग भी नहीं है, लेकिन उसके गोदामों में भारी मात्रा में परमाणु अस्त्र- शस्त्र भरे पड़े हैं। वे प्रचारित करते हैं कि ईरानी परमाणु बम इजरायल और अमेरिका को बर्वाद करने को लक्षित हैं, तो फिर आप भी जबाव दीजिये कि आपके हथियार क्या शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिये हैं? क्या हथियारों के बल पर दुनियाँ में कहीं कोई शान्ति स्थापित हुयी है? दुनियाँ के किसी भी कोने में इतिहास में कोई एक भी उदाहरण मिलता हो तो बताइये जरूर।
फिर गत वर्ष भी आपने परमाणु हथियारों को विनष्ट करने का बहाना लेकर ईरान के संभावित परमाणु केन्द्रों पर B-2 जैसे घातक बमवर्षकों से हमला बोल दिया था और दावा किया था कि नाभिकीय ठिकानो, नाभिकीय ईधन और हथियारों को नष्ट कर दिया गया है। तो जबाव दीजिये कि दुनियाँ से आप तब झूठ बोल रहे थे या अब? क्या इससे साबित नहीं होता कि आप अपनी सनक, अपनी हनक, अपनी अर्थव्यवस्था-- जो कच्चे- पक्के तेल और विनाशक हथियारों की तिजारत से फलफूल रही है की वासना के वशीभूत हो कर ही दुनियाँ के कोने कोने में युद्ध थोपते हैं और वहां लूटपाट कर निकल लेते हैं।
आपका दूसरा तर्क भी टिकाऊ नहीं है। दुनियाँ में लोकतन्त्र के स्वयंभू रक्षक बनने की हसरत पाले बैठे आपने दावा किया था कि आप ईरान की इस्लामिक तानाशाही को समाप्त कर वहां लोकतन्त्र स्थापित करना चाहते हैं। आपने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये पहले सत्ताविरोधी आंदोलन भड़काया जिसमें आपको असफलता हाथ लगी। फिर आपने शांति वार्ता का नाटक रचा और वार्ता के दरम्यान ही छलपूर्वक हमला कर सुप्रीमो अयातुल्लाह खोमेनी को उनके 44 साथियों सहित मार डाला। आपको लगा कि ईरान नेत्रत्वविहीन होगया और अब लोग सड़कों पर उतर आयेंगे। तब आप ईरान में अपनी कठपुतली सरकार बैठा देंगे। आपने ईरान को वेनेज्वेला समझने की भूल की और आपका यह सपना भी धरे का धरा रह गया।
आर्थिक- साम्राज्यवादी शोषण से संचित अपार धन संपदा आपके पास है, और दुनियाँ के सोने का बड़ा हिस्सा आपके गोदामों में भरा है। कहावत है कि ‘सर्व गुणा: कांचनम् आश्रयन्ति’ अर्थात सारे गुण सोने ( धन सम्पदा ) में निहित हैं। उसके बल पर आपने विध्वंसकारी हथियार जुटाये हैं और पिट्ठू इजरायल के साथ मिल कर आपने ईरान के कोने कोने को ध्वस्त कर दिया। आप निरंतर जीत के ख्याली दावे कर रहे हैं । फिर यह विनाशक जंग क्यों जारी है आप जबाव नहीं दे पा रहे हैं। साफ है आपके पास हमले के लिये कोई वाजिब कारण था ही नहीं और अब जब इस महायुद्ध में गर्दन तक फंस गये हैं , उससे बाहर निकलने और नाक बचाने को आपको कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। जो दुर्गति आपने अफगानिस्तान में झेली वही आप ईरान में झेलने जा रहे हैं। अब तो आप समझ ही गये होंगे कि हजारों साल पुरानी सभ्यतायें चन्द बमों से नष्ट नहीं की जा सकतीं।
आप और आपका देश मानवाधिकारों का पहरुआ बनने की कोशिशें करता रहा है। लेकिन इजरायल द्वारा गाजा में किये जा रहे नरसंहार को आपका निर्लज्ज समर्थन हासिल है। इस बीच आपको शांतिदूत बन कर नोबेल शान्ति पुरुष्कार पाने की सनक सवार है। एक उधार का नोबेल आप अपने गले में लटकाये घूम रहे हैं। आपके भारतीय मित्र भी इजरायल जाकर एक ऐसा ही फर्जी तमगा गले में डलवा कर आत्म संतुष्ट हैं। लेकिन 28 फरबरी को आपने एक बालिका विद्यालय पर थोड़े अंतराल से दो बार बमबारी कराई ,जिसमें 168 निर्दोष बच्चियाँ और 14 अध्यापिकाएं शहीद हो गईं। आपको इस जघन्य अपराध के लिये क्षमा मांगनी चाहिये थी, लेकिन ढीढ़ता की सारी हदें पार करते हुये, आपने ईरान पर ही इसका आरोप जड़ दिया।
धनबल और शस्त्रबल में ईरान आपके सामने कहीं नहीं ठहरता, लेकिन जिस बहादुरी से वह इजरायल और अमेरिकी अड्डों को तवाह कर रहा है, वह इतिहास के स्वर्णिम दस्तावेजों में दर्ज हो रहा है। इससे न केवल आपकी बौखलाहट बढ़ी है, अपितु हताशा में आपने एक बार फिर ईरानी नेत्रत्व का संहार शुरू कर दिया। सामंतवादी युग में भी युद्ध के कुछ नियम थे लेकिन आधुनिकता और लोकतन्त्र का परचम लहराने का नाटक करते हुये आपने सारे संसार पर जंगल के कानून थोप दिये।
बक़ौल आपके आपने यह युद्ध आप द्वारा ख़ुद गड़े गये मुद्दों के हल के लिये शुरू किया था, लेकिन इसने आज अनेक मुद्दे खड़े कर दिये हैं।
किसी भी देश के भीतर सत्ता में बदलाव उस देश का निजी मामला होता है। उस देश की जनता का अधिकार है कि वह लोकतान्त्रिक तरीके से अपनी सरकार चुने। पर आपने तो सारी दुनियाँ में दखलंदाजी का ठेका ले रखा है। आपकी साजिशों में सहभागी इजरायल फिलिस्तीन, गाजा, लेबनान और ईरान में वही सब कर रहा है। आपने वेनेज्वेला में कमांडो आपरेशन चला कर प्रेसीडेंट मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर उन पर अभियोग चलाया है। लेकिन एक संप्रभु देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर वहाँ के राष्ट्राध्यक्ष के अपहरण का मुकदमा तो आप पर चलना चाहिए।
इराक, लीबिया और अब ईरान के नेत्रत्व को आपने जिस तरह बलात हलाक किया है, क्या इससे यौद्धिक हिंसा की नयी परंपरा कायम नहीं होगयी? यदि यही परंपरा दूसरे शक्तिशाली देश भी शुरू कर दिये तो बची खुची विश्व व्यवस्था भी तहस नहस हो जाएगी। आपकी मनमानी से संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतराष्ट्रीय न्याय प्रणाली अंतिम साँसे गिन रहे हैं और बढ़ा प्रश्न खड़ा हो गया है कि अमेरिका- इजरायल को कौन युद्ध अपराधी घोषित करेगा? कौन उन्हें दंडित करेगा? आप सारी दुनियाँ को ईरान के खिलाफ बरगला कर विश्वयुद्ध भड़काना चाहते हैं। आप उन देशों का आह्वान कर रहे हैं कि वे अपनी सेनाएँ होरमुज भेजें जिनके कि जहाज वहाँ फंसे हैं।
आपके इस मनमाने कदम से विश्व अर्थव्यवस्था आज चरमरा कर रह गयी है। शिपिंग का खर्च 5 गुना बढ़ गया है। अकेले भारत का ही 12000 करोड़ का माल समुद्र में फंसा है। कच्चे तेल की कीमतें काबू के बाहर जा चुकी हैं। रसोई गैस की महंगाई और अनुपलब्धता ने घर और बाजार की व्यवस्था पर गहरी चोट की है। शेयर बाजार धड़ाम हो गये है। डालर के मुक़ाबले रुपया 92 के ऊपर हो गया है। आयात निर्यात में भारी गिरावट है। पेट्रोलियम पदार्थ आधारित उद्योग ठप पद चुके हैं। इसका प्रभाव अन्य उद्योगों पर साफ दिख रहा है। बेरोजगारी मेन बेपनाह बढ़ोत्तरी हुयी है। प्राक्रतिक और मानव निर्मित संपदाओं की बड़े पैमाने पर बरवादी हो रही है। पर्यावरण को अकल्पनीय क्षति पहुंची है। आप इन समूचे हालातों पर संवेदनशील और तार्किक रुख अपनाने के बजाए निरंतर उकसावे और विनाशकारी कारगुजारियों में जुटे हैं।
जंग खत्म करने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की अनुपस्थिति में ईरान ने ही आगे बढ़ कर जंग खत्म करने की सशर्त पेशकश की है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने साफ कहा है कि अगर क्षेत्र में जारी तनाव और जंग को खत्म करना है तो पहले ईरान के अधिकारों को स्वीकार करना होगा। उन्होने कहा कि हालिया हमलों से हुये नुकसान की भरपाई की जाये और भविष्य में ईरान पर किसे तरह के हमले न हों, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गारंटी दी जाये। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि इन शर्तों के बिना स्थाई शांति संभव नहीं है।
विश्व जनमत को ईरान की इस पुकार को सुनना चाहिये और जंग जल्द से जल्द खत्म हो और प्रथ्वी इवान मानवता का भविष्य सुरक्षित हो सके। युद्ध किसी समस्या का समाधान न कभी हुआ है न होगा- साहिर की पंक्तियाँ
इसलिए ए शरीफ इन्सानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है।
डा॰ गिरीश।
18.3.2026.

