राम मन्दिर चढ़ावा चोरी प्रकरण -
गहरे संकट में घिरे भाजपा और संघ परिवार
डा.गिरीश
हाल ही में अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे और दान में गवन के आरोपों को लेकर गंभीर विवाद खड़ा होगया है. इस मामले ने संघ परिवार, भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद की साख को बड़ा झटका दिया है. मंदिर के चढ़ावे की लूट में उनके नामित प्रबंधकगण पूरी तरह फंसे हुये हैं. आरोप मात्र चढ़ावे की चोरी तक सीमित नहीं हैं. चढ़ावे की रकम और अन्य उपहार गणना से लेकर बैंक में जमा होने तक कितने बचे, या कितने गायब हुये, यह एक बड़ा सवाल है. चढ़ाए गये आभूषणों, स्वर्ण मुद्राओं, चांदी की शिलाओं और अन्य वेशकीमती उपहारों की रसीद क्यों नहीं दी गयी और वह कहाँ गायब हो गये, यह उससे भी बड़ा सवाल है. इस लूट में लिप्त छुटभैयों ने कितनी संपत्तियां बनायीं और बडभैयों ने धन कहाँ ठिकाने लगाया और किस किस तक पहुंचाया यह सवाल भी सार्वजनिक जीवन चर्चा का विषय बना हुआ है. निर्माण के पूर्व से और पश्चात तक जारी रही भूमियों की खरीद में हुये घपले घोटाले तो चर्चा में हैं ही, अपितु मकानों- जमीनों को बेचने को बाध्य करने हेतु भू-भवन स्वामियों को सत्ता के बल पर बाध्य करने जैसे संगीन सवाल भी आज सुर्खियाँ बटोर रहे हैं. मन्दिर निर्माण फंड में घोटाले के आरोप भी उसी समय लगे थे और घोटाले की जांच करने वाले आयकर अधिकारी के ऊपर संघियों ने किस तरह हमला बोला था, यह भी लोग अभी भूले नहीं हैं. आरोप है कि निर्माण कार्य तक में 40 प्रतिशत कमीशन खाया जा रहा था, और उसका खुलासा करने वाले इंजीनियर को हटा दिया गया था.
चढ़ावा चोरी की परतें क्या उघडी कि नये पुराने घोटालों के उजागर होने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. अब एक नया और सनसनीखेज खुलासा यह हुआ है कि मंदिर निर्माण में लगे पत्थरों की खरीद तक में घोटाला हुआ है. पत्थरों की खदान के मालिक राजस्थान के श्री दिलीप सिंह राठौड़ ने खुलासा किया है कि उन्होंने पहले मंदिर के लिये मुफ्त पत्थर देने की पेशकश की थी. बाद में जिस पत्थर को वे सौ रुपये में देने को तैयार थे, उसके लिये रुपये 500 का बिल बनवाया गया. जब उन्होंने ऐसा न करने को कहा तो उनको धमकाया भी गया कि ‘हम जो कर रहे हैं करने दो, बीच में मत पड़ो, वरना मार दिए जाओगे, कुछ अता पता नहीं लगेगा. रामकाज की आड़ में चोरी और ऊपर से सीनाजोरी संघियों का पुराना गोरखधंधा है. राम मंदिर को संघियों ने अपना निजी एटीएम बना लिया है और देश और जनता को जमकर लूटा है.
आज इन आरोपों के घेरे में यदि आरएसएस और भाजपा बुरी तरह घिरे हैं तो उसके ठोस कारण हैं. सर्वोच्च न्यायलय द्वारा विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण के फैसले के बाद सन 2020 में श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना की गयी थी. धार्मिक ट्रस्ट में सनातनी परम्पराओं के अनुसार शंकराचार्यों से लेकर अखाड़ों के प्रतिनिधि नियुक्त किये जाने के स्थान पर मोदी- योगी मंडली ने उसमें पिट्ठू नौकरशाहों और खांटी संघियों को भर दिया. इनमें संघी चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राय प्रमुख हैं. निर्माण प्रभारी अयोध्या में मस्जिद पर हमला बोलने वालों पर गोली चलवाने वाले नौकरशाह नृपेन्द्र मिश्र बनाये गये. शिलान्यास से लेकर प्राण- प्रतिष्ठा तक, किसी धर्माचार्य को अवसर देने के बजाये प्रधानमंत्री मोदी जी ही छाये रहे. वे ही यजमान थे और वही भगवान. अनेक गेरुआ वस्त्रधारी सरकारी संत उनके चारण की भूमिका में थे. आज इस महाघोटाले के आरोप संघ और भाजपा पर लग रहे हैं तो इसके यही तमाम बुनियादी कारण हैं.
घोटाले की राशि और अन्य चढ़ावों के मूल्यों के बारे में लगाये जा रहे अनुमान सिर्फ अनुमान ही हैं. उनके वास्तविक मूल्य शायद ही कभी सामने आयें. वेशकीमती दान को लेकर नित नए श्रद्धालु सामने आरहे हैं. जिन्होंने सोना दिया चांदी दी, आभूषण दिए, हार दिए वेशकीमती रामायण भेंट की, मगर न तो उन्हें रसीद दी गयी और न ही पूछने पर संतोषजनक जबाव ही दिया गया. प्राण- प्रतिष्ठा के दिन से ही शुरू हुए इस घोटाले का सही आकार- प्रकार का अंदाजा शायद ही कोई जांच एजेंसी लगा पाये. श्रद्धालुओं और भक्तों को शायद इसी में संतोष कर लेना पड़ेगा कि असली दोषी पकडे जायें और उन्हें इबरतनाक सजा मिले. छोटी ही नहीं बड़ी मछलियाँ भी कटघरे में खड़ी दिखाई दें. पर अभी तक जो लक्षण दिखाई दे रहे हैं, उसमें यह दूर की कौड़ी ही दिखाई देती है. देश और उत्तर प्रदेश की सरकारों द्वारा अब तक उठाये गये कदम तो न केवल नाकाफी हैं अपितु छलावेपूर्ण हैं.
मामले के उजागर होने के बाद राज्य सरकार को सबसे पहले एफआईआर दर्ज करानी चाहिये थी. मगर उसने तत्काल ऐसा नहीं किया. राज्य सरकार ने अपने अधीन अधिकारियों को लेकर एक जांच कमेटी- एसआईटी गठित कर दी गयी. इसकी जबावदेही केवल राज्य सरकार के प्रति है, किसी न्यायिक निकाय के प्रति नहीं. पारदर्शिता अथवा जनता को जानकारी देना तो बहुत दूर की बात है. जब दबाव बड़ा तो 8 दिनों बाद एफआईआर दर्ज की गयी. पर अभी तक तो पुलिस और एसआईटी दोनों अठखेलियाँ कर रही हैं. ऊपर से नीचे तक वालों को ताबड़तोड़ हिरासत में लेकर पूछताछ करने के बजाये अभी तक छुटभैयों को ही हिरासत में लिया गया है. उनको भी पुलिस ने अभी तक रिमांड पर नहीं लिया है. सामान और रकम की जब्ती भी मामूली ही हुयी है. एसआईटी तक जेल में जाकर उनसे पूछताछ कर रही है. उनके प्रति इस वीआईपीनुमा व्यवहार से सभी हतप्रभ हैं. अभियुक्तों को रिमांड पर लेने के लिये लगातार दबाव बढ़ रहा है. अब खबरें आ रही हैं कि मामले में ईडी को भी शामिल किया जारहा है. अब्बल तो अभी तक यह मामला ईडी की जांच की श्रेणी में आता ही नहीं है, फिर भी यदि ईडी को इसमें शामिल किया जा रहा है तो यह मामले को उलझाने की कवायद ज्यादा नजर आरही है. निश्चय ही भाजपा और संघ परिवार दोषियों को बचाने में जुटे हैं.
प्रकरण पर लम्बे समय तक चुप्पी साधे रहने के बाद 3 जुलाई को संघ ने मौन तोड़ा संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले सामने आये. संघ जब संकट में होता है तो मातहत बचाव में उतरते हैं. शेष दिनों में सरसंघचालक ही गरजते- बरसते हैं. चढ़ावे की लूट पर घडियाली आंसू बहाते हुए होसबोले ने कहा- पीढ़ियों के संघर्ष और करोड़ों रामभक्तों के समर्पण से बना श्रीराम मंदिर संपूर्ण हिन्दू समाज की आस्था का केन्द्र है. चढ़ावे की चोरी से रामभक्तों की भावना और श्रद्धा को आघात पहुंचा है. एसआईटी जांच में जो भी दोषी पाये जायें उन्हें कठोर दंड मिले. इस विषय में जब श्री मोहन भागवत से सवाल किया गया तो उन्होंने यह कह कर पल्ला झाड लिया कि इस विषय पर होसबोले बात रख चुके हैं.
यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या संघ को सरकार के माध्यम से अपने द्वारा मनोनीत ट्रस्टियों और पदाधिकारियों के कुकृत्यों पर कोई पश्चाताप नहीं? संघ ने जिस एसआईटी पर भरोसा जताया है, उसकी भूमिका तो बेहद संदिग्ध है. होसबोले ट्रस्ट पर ही उम्मीद जता रहे हैं कि वह अपनी कमियों को दूर करेगा, जबकि उसको तत्काल भंग करने की जोरदार मांग उठ रही है. इतना ही नहीं इस महालूट को वे भ्रम और असमंजस की स्थिति बता रहे हैं. मन्दिर ट्रस्ट में सभी सदस्य या तो आरएसएस के हैं या उसके द्वारा मनोनीत हैं. वे इस पर चुप्पी साधे हैं, और सवाल उठाने वालों को राष्ट्रविरोधी और धर्मविरोधी बता रहे हैं. होसबोले ने न तो किसी अपने स्वयंसेवक का नाम लिया, न ही ट्रस्ट को भंग करने की बात की, और न ही इस घोटाले पर कोई नाराजगी जाहिर की. जनता को जरूर बरगलाया कि “धैर्य रखो और हिन्दू विरोधी, राष्ट्र विरोधी शक्तियों के हिन्दू धर्म एवं समाज को बदनाम करने के षडयंत्रों को विफल करो.” इसी तरह की बयानबाजी साधुवेशधारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ भी आये दिन करते रहते हैं और विपक्ष पर ही हमला बोलते रहते हैं.
संघ गिरोह से सीधा सवाल यह है कि जिस ट्रस्ट में पीएमओ का सीधा दखल हो, जिसमें पीएमओ का अधिकारी बैठा हो, जिसमें सारे सदस्य आरएसएस के हों, जिसमें राज्य के बड़े अधिकारी शामिल हों, जहां मुख्यमंत्री हर 15 दिन में चक्कर लगाते हों, वहां अदने से नौकर सालों से चोरी करते रहे और किसी को पता ही नहीं चला. अगर यह आपकी सरकार की काबिलियत है, यही आपका इंटेलिजेंस है, यही आपकी ईमानदारी और आपका चरित्र है तो ‘संघियो’ प्लीज भारत भूमि को माफ़ कर दीजिये. सत्ताभोग और धन एकत्रीकरण की भूख आप में बेहद प्रबल है, तो उस क्षुधा को शांत करने के लिये कोई और भूभाग तलाश कर लीजिये, भारत भूमि को मुक्त कर दीजिए.
छोटी छोटी बातों पर स्तरहीन प्रतिक्रिया देने वाले हमारे प्रधानमत्री श्री मोदी जी की इस विकराल घटना पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. इससे कोई और परेशान हो न हो अंधभक्तगण बेहद परेशान हैं. उनकी यह समझ में ही नहीं आ रहा कि छत्तीस इंची सीनाधारी यह नॉन- बायोलोजिकल प्राणी इस गंभीर मामले पर आखिर कब मौन तोड़ेगा? पर इस प्रकरण में शायद उन्हें निराश ही होना पड़ेगा. हाँ चेले- चमाटो को बचाने के लिये वे परदे के पीछे बेहद सक्रिय हैं. वकौल विनय कटियार के पधानमंत्री जी ने उनसे बात की और पूछा कि आगे क्या होगा?
राम मंदिर निर्माण, जिसे होसबोले पीढ़ियों के संघर्ष का परिणाम बता रहे हैं, वह संघर्ष किस हद तक काल्पनिक और मनगढ़ंत तथ्यों की बुनियाद पर खड़ा था, यहाँ उसकी चर्चा करना विषय को बहुत विस्तारित कर देगा. यहाँ हम बताना चाहते हैं कि इस संघर्ष में आरएसएस अथवा उसके अंग कहीं दूर दूर तक शामिल नहीं थे. न तो तब जब 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखी गयी, और न ही 1989 में राम मंदिर के शिलान्यास के समय. 1949 में देश और उत्तर प्रदेश कांग्रेस की सरकारें थीं, जबकि 1989 में केन्द्र में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में श्री मुलायम यादव की सरकार थी. लेकिन जब संघ ने मंदिर आन्दोलन में होने वाले राजनैतिक लाभ का आकलन कर लिया तब सारा संघ परिवार इस आन्दोलन में कूद पड़ा. तब से लेकर आज तक मंदिर के माध्यम से वोट और धन की लूट में संघ परिवार जुटा है. लेकिन चढ़ावा चोरी की इस घटना ने इसे अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है.
ऐसा नहीं है कि संघ पर यह संकट पहली बार आया है. गांधीजी की हत्या से लेकर आपातकाल के विरोध तक कई बार वह गहरे संकट में फंसा है. एक बार तो भाजपा के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष रिश्वत लेते कैमरे में कैद हुये और संघ की भारी थू थू हुयी. लेकिन हर बार वह अपनी कुटिल चालों और विपक्ष की सदाशयता से साफ़ बच निकलने में सफल रहा है. पर यह घटना औरों से भिन्न है क्योंकि इसने आस्थावानों की आस्था पर गहरी चोट पहुंचाई है. इस घटना से ट्रस्ट का ट्रस्ट ही नहीं भाजपा/ आरएसएस का तिलिस्म भी टूटा है.
पर यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस बार संघ गिरोह पहले से अधिक सुविधाजनक स्थिति में है. केन्द्र और उत्तर प्रदेश दोनों ही जगह उसकी सरकारें हैं. शासकीय मशीनरी से लेकर मीडिया तक उनके हाथों में है. दोनों ही सरकारें बड़ी ही बेशर्मी से बड़े दोषियों को बचाने में जुटी
सत्ता और सत्ता की ताकत के इस घटाटोप में जनता के साथ किस हद तक न्याय हो पायेगा कहना कठिन है. पर अंतिम न्याय तो जनता की अदालत में होना शेष है.
डा. गिरीश दिनांक- 9.7.2026
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