Monday, 19 October 2026

सड़क पर उतरने वाली युवा प्रदर्शनकारियों का चेहरा : नेहा बोरा ------ Dinesh Shrinet

 



सड़क पर उतरने वाली बेपरवाह कार्यकर्ता जो भारत के युवा प्रदर्शनकारियों का चेहरा बन गईं

न्यूयार्क टाइम्स से साभार | AI अनुवाद

​जब पुलिस ने कड़ी कार्रवाई की, तो नेहा बोरा ने अपनी ऊर्जा, नुक्कड़ नाटकों के अंदाज और चुटीले अंदाज़ से युवा प्रदर्शनकारियों में नया जोश भर दिया।

​जब भारतीय पुलिस ने बीते हफ्ते नई दिल्ली से हजारों प्रदर्शनकारियों को खदेड़ा, तब 29 साल की नेहा बोरा सड़कों पर डटे रहने की इस लड़ाई का न केवल चेहरा बनीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत भी साबित हुईं।

​नेहा लगातार दौड़ती रहीं; बैरिकेड्स लांघती हुईं और राजधानी में तैनात पुलिसकर्मियों से बचकर आगे बढ़ती रहीं। जब पुलिस ने नेहा को घसीटकर बस में डाला, तो वे तुरंत खिड़की के पास जाकर नारे लगाने लगीं। हिरासत से छूटते ही, पीठ पर बैग टांगे नेहा दूसरी सड़क पर दौड़ पड़ीं और पुलिस फिर उनके पीछे भागी।

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से प्रदर्शन दबाने के लिए दिखाए गए भारी बल का मुकाबला एक निडर छात्र नेता से हुआ, जिनकी जिद ने यह साफ कर दिया कि सरकार का नियंत्रण उतना मजबूत नहीं है जितना दिखता है।

​ऐसे समय में जब युवा आंदोलन के बड़े नेताओं को पकड़ लिया गया था और उनका प्रदर्शन बिखरता दिख रहा था, तब नेहा और उनके वामपंथी छात्र संगठन के साथियों ने ही सड़कों पर मोर्चा संभाले रखा। इसके लिए उन्होंने पुलिस की कार्रवाई से बचने के अपने पुराने अनुभव का इस्तेमाल किया।

​देखते ही देखते, सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने नेहा (जो अपने लिए 'they/them' शब्दों का इस्तेमाल करती हैं और सिर्फ एक नाम से जानी जाती हैं) को विपक्ष के बड़े नेताओं के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। सोमवार को विपक्ष की रैली में नेहा को हजारों की भीड़ ने घेरा हुआ था, तो मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे खुद से दोगुनी उम्र के नेताओं के बीच बैठी थीं।

​इस तरह चर्चा में आने से बहुत पहले से नेहा युवाओं की बुलंद आवाज बन रही थीं। और देश के युवाओं के पास गुस्सा होने की जायज वजहें भी हैं: आए दिन लीक होते पेपर और बदहाल शिक्षा व्यवस्था, नौकरियों की भारी कमी, और महिलाओं की सुरक्षा के खराब हालात। लेकिन हाल के दिनों में, युवाओं का यह गुस्सा सीधे राजनीति पर आ टिका है जो इन समस्याओं को सुलझाने में पूरी तरह नाकाम रही है।

​नेहा ने जन-प्रदर्शन के अपने हुनर और बेबाक बोली को एक बुनियादी बात से जोड़ा है: विरोध करने की आजादी मिलना ही सरकार को जवाबदेह बनाने का पहला कदम है।

​पुलिस हिरासत के बीच 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए इंटरव्यू में नेहा ने कहा, "लोग सड़कों पर उतरने से नहीं डर रहे हैं। और जब ऐसा होता है, तो साफ दिखता है कि सरकार वाकई पीछे हटने पर मजबूर हो जाती है।"

​नेहा का कहना था कि सड़कों पर उमड़ा यह गुस्सा दिखाता है कि पिछले एक दशक से चला आ रहा मोदी सरकार का दबदबा अब ढीला पड़ रहा है। बीते सालों में सरकार ने असंतोष को दबाया है और कई कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमा चलाए सालों से जेल में डाल रखा है।

​'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (AISA) की अध्यक्ष नेहा खुद को इस आंदोलन का मुख्य चेहरा कहलाना पसंद नहीं करतीं। उनका मानना है कि किसी बड़े आंदोलन में individual (व्यक्ति विशेष) को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

​जब नरेंद्र मोदी पहली बार सत्ता में आए थे, तब नेहा सिर्फ 17 साल की थीं। उनकी राजनीतिक सोच ऐसे दौर में बनी है जहां विरोध करने की जगह लगातार घटती गई। वे पिछले दस सालों से यूनिवर्सिटी कैंपस की वामपंथी राजनीति से जुड़ी रही हैं—वही कैंपस जो सरकार के निशाने पर रहे हैं।

​पिछले 12 सालों से सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी पर नेहा कहती हैं, "उन्होंने लोकतंत्र, जवाबदेही और विरोध प्रदर्शन—हर चीज़ के मायने बदल दिए। चूंकि वे नए नियम तय कर रहे थे, इसलिए हमें यह समझने में समय लगा कि आखिर चल क्या रहा है और उनके काम करने का तरीका क्या है।"

​जब पिछले वीकेंड देश भर के युवा संगठनों ने चुनाव मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर सबसे बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया, तो पुलिस ने तुरंत सख्ती दिखाई। प्रदर्शन को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया, दिल्ली के केंद्र को सील कर दिया गया और आयोजकों को हिरासत में ले लिया गया।

​लेकिन नेहा और उनके साथी इसके लिए पहले से तैयार थे। इस बड़े प्रदर्शन से कई दिन पहले से ही वे बैरिकेड्स तोड़ने और पुलिस के तरीकों को समझने का अभ्यास कर रहे थे, ताकि आम प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ सके।

​AISA के पूर्व अध्यक्ष एन. साई बालाजी ने बताया, "बाकी लोगों ने देखा कि हम बैरिकेड्स और पुलिस हिरासत का सामना कैसे करते हैं।"

​भले ही सरकार एक बहुत बड़ी भीड़ को जमा होने से रोकने में कामयाब रही, लेकिन शहर के अलग-अलग हिस्सों में छोटे-छोटे प्रदर्शन होते रहे। छात्र संगठनों ने सोशल मीडिया के जरिए हर एक छोटे प्रदर्शन को हाइलाइट किया ताकि विरोध का माहौल बना रहे।

​बालाजी ने कहा, "सरकार यह नहीं समझ पा रही कि हमारे अनुभव के दम पर हम बिना किसी तय योजना वाले प्रदर्शन को भी एक बड़े आंदोलन में बदल सकते हैं।"

​नेहा का बचपन एक ऐसे सैन्य परिवार में बीता जो भाजपा का समर्थक था। 2016 में जब उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और वामपंथी राजनीति से जुड़ीं, तो परिवार से उनके रिश्ते बिगड़ गए।

​दिल्ली आने के बाद नेहा 'संगवारी' नाम के एक स्ट्रीट थिएटर (नुक्कड़ नाटक) ग्रुप से जुड़ गईं। ग्रुप की वरिष्ठ सदस्य दीशिखा सिंह याद करती हैं कि नेहा "सीखने के जुनून से भरी एक छोटी बच्ची" जैसी थीं। यह ग्रुप सड़कों और बस्तियों में नाटक करता था और सामाजिक मुद्दों पर कवियों-प्रोफेसरों के साथ चर्चा आयोजित करता था। यहीं से नेहा ने गाना, अभिनय करना और सामाजिक मुद्दों को समझना सीखा।

​सोशल मीडिया पर नेहा के शुरुआती दिनों की झलक देखी जा सकती है। दस साल पुरानी एक फोटो में वे छोटे बालों और बड़े चश्मे में बच्चों को नाटक सिखाती दिखती हैं। पांच साल पुराने एक वीडियो में वे हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए किसान आंदोलन के दौरान इंटरव्यू दे रही हैं, जहां वे बार-बार बात काटने वाले रिपोर्टर पर तंज कसती नजर आती हैं।

​जब तक थिएटर की पढ़ाई कर रहीं नेहा छात्र संघ की अध्यक्ष बनीं, तब तक सरकार दिल्ली में प्रदर्शनों पर काफी पाबंदियां लगा चुकी थी। यहां तक कि तय किए गए प्रदर्शन स्थलों पर जाने के लिए भी इजाजत लेना जरूरी कर दिया गया था, जो बहुत कम मिलती थी।

​हाल के महीनों में युवाओं का गुस्सा इन्हीं पाबंदियों को तोड़ रहा है। लेकिन बदलाव की इस लड़ाई में कई लोगों को अपनी जान-माल का जोखिम उठाना पड़ा है।

​इस साल जब परीक्षा पेपर लीक मामले को लेकर गुस्सा भड़का, तो नेहा और उनके साथियों ने मशहूर शिक्षाविद सोनम वांगचुक के अनशन का समर्थन किया।

​23 दिनों के अनशन के बाद नेहा का वजन 7 किलो से ज्यादा घट गया था। पुलिस ने पहले धरने को बलपूर्वक हटाने की कोशिश की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो आखिरकार शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इस जीत ने नेहा और उनके आंदोलन को पूरे देश में पहचान दिलाई।

​थिएटर और राजनीति के इस अनुभव ने नेहा को एक और ताकत दी: व्यंग्य (तंज कसना)। उन्होंने इसी व्यंग्य का इस्तेमाल उस शक्तिशाली नेता और व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए किया, जिसे उनके समर्थक सबसे ताकतवर मानते थे।

​नेहा कहती हैं, "ताकत का दिखावा इसलिए किया जाता है ताकि लोगों में डर बैठ जाए। लेकिन इतिहास गवाह है कि आप डर के दम पर किसी को एक हद तक ही दबा सकते हैं।"

​नेहा का यह अंदाज़ तब भी दिखा जब पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर शहर से 20 मील दूर एक मैरिज हॉल में ले गई।

​एक वीडियो में नेहा नारे लगाती दिखती हैं: "दिल्ली पुलिस, बंदियों को खाना दो!" जिस पर बाकी साथी भी चिल्लाने लगते हैं। फिर वे गाती हैं: "दिल्ली पुलिस, बंदियों को चाय दो!"

​यह देखकर वहां मौजूद पुलिसकर्मी भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए।

​तभी नेहा ने मुस्कुराते हुए पुलिस वालों की तरफ देखकर नारा बदल दिया:

​"दिल्ली पुलिस, खुद भी खाओ और हमको भी खिलाओ!"

Friday, 16 October 2026

सवाल से बचने का नहीं, जवाब खोजने का समय है ------ Kumar Sandeep's Post




पिछली पोस्ट — “नेहा बोरा नई कन्हैया कुमार?” — को जिस तरह का रिस्पॉन्स मिला, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। एक सामान्य लिखित टेक्स्ट पोस्ट को अब तक लगभग 57 हजार लोगों ने देखा है। यह संख्या सिर्फ एक पोस्ट की पहुँच नहीं बताती, बल्कि यह भी दिखाती है कि छात्र राजनीति, वामपंथी आंदोलन और उससे निकलने वाले नेतृत्व के भविष्य को लेकर लोगों के भीतर गंभीर सवाल मौजूद हैं।

इसी सिलसिले में आज एक बड़ा सवाल उठाना जरूरी है—

क्या भारत की वामपंथी पार्टियाँ धीरे-धीरे कांग्रेस के लिए एक तरह की “कैडर फैक्ट्री” बनती जा रही हैं?

भारतीय छात्र राजनीति का इतिहास देखें तो विश्वविद्यालयों और छात्र संगठनों से बड़ी संख्या में युवा राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता निकले हैं। इनमें से कई ने वामपंथी छात्र संगठनों से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, संघर्ष किया, संगठन में काम किया और अपनी पहचान बनाई। लेकिन सवाल यह है कि उनमें से कितने लोग अंततः अपने मूल संगठन को मजबूत करने के बजाय कांग्रेस या दूसरे बड़े राजनीतिक दलों में चले गए?

कन्हैया कुमार इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं।

एक समय AISF और जेएनयू छात्रसंघ की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे कन्हैया कुमार आज कांग्रेस में महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभा रहे हैं।

यहाँ सवाल कन्हैया कुमार के कांग्रेस में जाने का अकेले नहीं है।

सवाल यह है कि वामपंथी छात्र आंदोलन लगातार ऐसे राजनीतिक नेतृत्व को पैदा क्यों करता है, जिसे बाद में कोई दूसरा बड़ा राजनीतिक दल अपने साथ जोड़ लेता है?

क्या यह केवल उन नेताओं की व्यक्तिगत पसंद है?

या फिर इसके पीछे हमारे संगठनों की अपनी कोई संरचनात्मक कमजोरी भी है?

वामपंथी पार्टियों को इस सवाल से बचने के बजाय इसका सामना करना चाहिए।

हमें सोचना होगा—

क्या हम अपने छात्र और युवा नेताओं को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस दे रहे हैं?

क्या हम युवाओं को केवल आंदोलन, नारे और प्रदर्शन तक सीमित रखते हैं, या उन्हें संगठनात्मक और राजनीतिक निर्णय लेने की वास्तविक जिम्मेदारी भी देते हैं?

क्या पार्टी के भीतर नए नेतृत्व के विकास के लिए पर्याप्त अवसर हैं?

क्या व्यक्तिवाद, गुटबाजी और “हीरोइज्म” सामूहिक नेतृत्व के विकास को कमजोर कर रहे हैं?

राजनीति में व्यक्ति महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी भी विचारधारा की वास्तविक ताकत व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार, संगठन और मजबूत राजनीतिक कैडर होता है।

यदि कोई युवा नेता वर्षों तक संघर्ष करने के बाद भी अपने संगठन के भीतर अपना राजनीतिक भविष्य नहीं देख पाता, उसे जिम्मेदारी और नेतृत्व का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो निश्चित रूप से बड़े राजनीतिक दल उसके सामने एक आकर्षक राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं।

और कांग्रेस ने छात्र एवं युवा राजनीति से आने वाली प्रतिभाओं को अपने राजनीतिक विस्तार में जगह देने की कोशिश पहले भी की है।

इसलिए सवाल केवल कांग्रेस से नहीं है।

सवाल हमसे है।

हम अपने बनाए हुए नेतृत्व को अपने संगठन में रोक क्यों नहीं पा रहे हैं?

हम उन्हें आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर क्यों नहीं दे पा रहे हैं?

हमारे संगठन से निकला युवा नेता दूसरे दल के लिए अधिक उपयोगी और हमारे अपने संगठन के लिए कम उपयोगी क्यों हो जाता है?

वामपंथी आंदोलन को अगर भविष्य में मजबूत होना है तो उसे व्यक्तिवाद से ऊपर विचार, व्यक्ति से ऊपर संगठन और पुराने नेतृत्व से ऊपर नए नेतृत्व के निर्माण को प्राथमिकता देनी होगी।

छात्र आंदोलन से निकला हर प्रतिभाशाली युवा किसी दूसरे राजनीतिक दल की राजनीतिक पूंजी बनने के बजाय अपने विचार और अपने संगठन को मजबूत करे—इसके लिए केवल युवाओं को दोष देना पर्याप्त नहीं है।

संगठनों को भी अपने भीतर ऐसा लोकतांत्रिक और राजनीतिक वातावरण बनाना होगा, जहाँ युवाओं को सम्मान, जिम्मेदारी, निर्णय लेने की शक्ति और आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले।

वरना स्थिति यही बनी रहेगी—

वामपंथी संगठन पौधे तैयार करेंगे,

संघर्ष से उन्हें सींचेंगे,

राजनीतिक प्रशिक्षण देंगे,

और जब वे फल देने लगेंगे,

तो कोई बड़ा राजनीतिक दल उन्हें अपने बगीचे में ले जाएगा।

यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है।

यह पूरे वामपंथी आंदोलन के लिए आत्ममंथन का विषय है।

छात्र और युवा आंदोलनों से कांग्रेस की मुख्यधारा की राजनीति में गए कुछ चर्चित नामों की सूची इस प्रकार है—

• कन्हैया कुमार — अखिल भारतीय छात्र महासंघ (AISF) के पूर्व नेता और जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष (2015–16), बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।

• सैयद नसीर हुसैन — स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1999–2000) रहे। बाद में युवा कांग्रेस से जुड़े और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद तथा पार्टी महासचिव बने।

• शकील अहमद खान — SFI से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1992) रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और बिहार विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे।

• बत्ती लाल बैरवा — SFI से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (1996) रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।

• संदीप सिंह — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2007–08) रहे। बाद में प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीतिक टीम से जुड़े।

• अकबर चौधरी — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2013–14) रहे। बाद में कांग्रेस से जुड़े।

• मोहित पांडेय — AISA से जुड़े रहे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष (2016–17) रहे। बाद में कांग्रेस से जुड़े राजनीतिक कार्यों में सक्रिय रहे।

• प्रसनजीत बोस — SFI से जुड़े वामपंथी कार्यकर्ता रहे और बाद में कांग्रेस के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

डी. पी. त्रिपाठी: एसएफआई के नेता और जेएनयूएसयू के अध्यक्ष (1975–76)। बाद में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का दामन थामा और वर्ष 1999 में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए।

इन नामों की सूची किसी व्यक्ति के राजनीतिक निर्णय पर व्यक्तिगत हमला करने के लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति पर बहस शुरू करने के लिए है।

सवाल सीधा है—

क्या वामपंथी पार्टियाँ देश के लिए वैकल्पिक राजनीति का मजबूत नेतृत्व तैयार कर रही हैं, या अनजाने में ऐसे नेताओं को तैयार कर रही हैं जिनका अंतिम राजनीतिक ठिकाना कोई दूसरा बड़ा दल बन जाता है?

इस सवाल से बचने का नहीं, इसका जवाब खोजने का समय है।

विचार बचेगा तो संगठन बचेगा,

संगठन बचेगा तो आंदोलन बचेगा,

और आंदोलन बचेगा तो नेतृत्व भी बचेगा।

Thursday, 8 October 2026

राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा का जश्न ------ Kavita Krishnapallavi's Post

 


जब रोम जल रहा था, नीरो सुख और चैन की बाँसुरी बजा रहा था!
भाजपाई अश्लीलता का ताज़ातरीन प्रदर्शन : जनता सड़कों पर विरोध कर रही है और प्रधानसेवक 25 साल के "उपलब्धियों" के जश्न में मशगूल हैं। 
रोम के क्रूर तानाशाह के बारे में प्रचलित यह कहावत आज हमारे देश के हालात पर बिल्कुल सटीक बैठती है। पूरे देश में आम जनता जब अपनी बुनियादी माँगों और अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर है, तब फ़ासीवादी शासक कभी अपना जन्मदिन मनाने में व्यस्त है, कभी भजन गाने में तल्लीन है, तो कभी अपने (कु)शासन की खुशियाँ मनाने में। सत्ताधारी महामानव के 25 साल के कार्यकाल पूरे होने के मौके पर केन्द्रीय कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित किया। इसके तहत देशभर में भाजपा नरेन्द्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक करियर का जश्न मनाने के लिये कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। 'सेवा संकल्प अभियान' के नाम से शुरू किये गये इन कार्यक्रमों में लोगों को "ईश्वरीय अवतार" के उपलब्धियों से परिचित कराने की पुरज़ोर कोशिश की जायेगी! एक बार फ़िर इसके लिए सरकारी आयोजन किये जायेंगे, जनता का हज़ारों करोड़ रुपये महामानव की छवि को बचाने की कोशिश में बहाया जायेगा। ख़ैर! इससे पहले कि हम भाजपा द्वारा आयोजित किये जा रहे इन कार्यक्रमों की मंशा पर सवाल करें, हमें फ़ासीवादी तानाशाह की "विराट छवि" को गढ़ने वाली उनकी उपलब्धियों को याद कर लेना चाहिए।
"हिन्दू हृदय सम्राट" के पिछले 25 साल की "अद्वितीय प्रतिभा" के कुछ चुनिन्दा उदाहरण :
गुजरात नरसंहार 2002 
मुज्ज़फरनगर दंगे 2014
दिल्ली दंगे 2020 
नोटबन्दी घोटाला
अनियोजित कोविड लॉकडाउन
पीएनबी घोटाला
पीएम केयर्स फण्ड का घोटाला
राफेल घोटाला
राम मन्दिर चन्दा चोरी घोटाला
सीबीएसई घोटाला
रिकॉर्डतोड़ परीक्षा घोटाला
पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस व अन्य ज़रूरी उत्पादों की क़ीमत को आसमान तक ले जाना!
देश की लगभग आधी आबादी को बेरोज़गारी, अर्द्धबेरोज़गारी या प्रच्छन्न बेरोज़गारी की स्थिति में पहुँचाने की कला!
चार लेबर कोड लाकर मज़दूरों के शोषण और लूट को क़ानूनी जामा पहनाने में भरपूर योगदान!
वैश्विक भूखमरी और ग़रीबी सूचकांक में भारत को अव्वल स्थान पर लेकर जाना!
महिला असुरक्षा के मामले में भारत को सर्वोच्य स्थान दिलाना!
प्रेस स्वतन्त्रता के मामले में लगातार भारत का नीचे लुढ़कते जाना!
छात्रों युवाओं पर लठियाँ, गोलियाँ और पैलेट गन चलवाना!
साम्प्रदायिक हिंसा में अभूतपूर्व बढ़ोतरी का श्रेय!
इलेक्शन कमीशन से लेकर ईडी, सीबीआई व न्यायपालिका तक में फ़ासीवादी घुसपैठ के ज़रिये उनकी बर्बादी में योगदान!
SIR के ज़रिये चुनावी घपलेबाज़ी का कलात्मक प्रदर्शन 
उपरोक्त चन्द घोटालो, घपलों, भाजपाई तरक्की और विकास का पूरा-पूरा श्रेय मोदी जी के महान नेतृत्व को जाता है। आम जनता को लाइनों में लगवाकर, उनके बचे-खुचे अधिकारों को छीनकर, देश को भूखमरी, बेरोज़गारी, ग़रीबी, महिला असुरक्षा में सबसे आगे पहुँचाकर उत्सव मनाने की जो नायाब कला है, उसकी प्रथम वाहवाही का हक़दार फ़ासिस्ट गिरोह के सरदार के अलावा भला और कौन हो सकता है! इसलिए, राजनीति में उसके 25 साल के नग्ण और बेशर्म प्रदर्शन पर यह संघी जश्न लाज़मी है। कोई भी आम इन्सान अगर इन कार्यक्रमों की ज़रूरत पर दो मिनट रुक कर सोचेगा, तो इसके पीछे की सच्चाई भी समझते देर नहीं लगेगी।
नरेन्द्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक करियर में आम आवाम को क्या हासिल हुआ? "नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमन्त्री" के सिर्फ़ और सिर्फ़ 12 साल के कार्यकाल को भी देखें और तमाम चुनावी वायदों को याद करें तो शायद ही आप कोई ऐसा वायदा पूरा होते हुए ढूँढ पाये जो मेहनतकश जनता के हितों का साधन करता हो। आज जब एक बड़ी आबादी कमरतोड़ महँगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी की मार झेल रही है, छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, देश के अल्पसंख्यक विशेष तौर पर मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और फ़ासीवादी हिंसा के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के 25 सालों पर मनाएँ जाने वाले ये उत्सवी कार्यक्रम जनता के दुख-तकलीफ़ों के साथ एक क्रूर मज़ाक है। भाजपा,आरएसएस के तमाम नेता इस मौक़े पर ख़ुद को परमभक्त साबित करने की प्रतिस्पर्द्धा में कहीं कीर्तन, कहीं जागरण करवा रहें हैं, तो कहीं नये सिरे से साम्प्रदायिकता के ज़हर को घोलने के काम में लग गये हैं। यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए ताकि छात्र-युवा आन्दोलन के दौरान पूरी दुनिया में महामानव कि चूर-चूर हो चुकी छवि को फ़िर से जोड़ा और चमकाया जा सके। याद हो की परीक्षाओं में धाँधली के ख़िलाफ़ दो महीने पहले हुए छात्रों के आन्दोलन ने प्रधानसेवक की गढ़ी गयी छवि को अर्श से फर्श पर ला खड़ा किया था। इस नुक़सान की भरपाई के लिये अब नये सिरे से भव्य कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू किया जा रहा है।
फ़ासीवादी राजनीति कि यह विशेषता होती है की वह अपने शीर्ष नेता यानी "फ़्यूहरर" को शुद्ध रूप से तैयार किये गये विचारधारात्मक समुदाय के अकेले प्रवक्ता, एकमात्र नेता और हृदय सम्राट के रूप में स्थापित करता है और इसके लिए वह इन तमाम तरीकों का इस्तेमाल करता है, जिसका जनजीवन के असल सवालों से कोई लेना-देना नहीं होता। फ़ासीवादी नेता का कद इस कदर बड़ा बना दिया जाता है कि उसका विरोध असम्भव प्रतीत होने लगे, यहाँ तक कि उससे सवाल करना भी देश और राष्ट्रद्रोह की गिनती में ले आया जाता है। यही आज हमारे देश में मोदी नीत भाजपा सरकार के फ़ासीवादी शासन में हो रहा है।
25 साल सत्ता में रहना कोई उपलब्धि है या नहीं यह इस देश कि आम जनता तय करेगी और इस वक़्त भाजपा सरकार के प्रति जो असंतोष और गुस्सा लोगों में है वह सड़कों पर अभिव्यक्त हो रहा है। फ़ासीवादी तानाशाहों के लम्बे से लम्बे कार्यकाल को जनता ने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है, इसका इतिहास गवाह है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता। फ़ासीवादी प्रधानसेवक की चकनाचूर छवि को बचाने के लिए भाजपा-आरएसएस द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न इनके राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा है और आम जनता की समस्याओं को नज़रअन्दाज़ करने का बेशर्म उदाहरण भी है।


Friday, 2 October 2026

वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र ------ राम या वाम 's Post

 


भारतीय वाम नेतृत्व के नाम खुला पत्र

क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?

प्रिय वामपंथी नेतृत्व,

यह पत्र किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं है।

यह CPI, CPI(M), CPI(ML) या किसी एक धारा को कटघरे में खड़ा करने के लिए भी नहीं है।

यह सवाल पूरे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से है।

क्योंकि इतिहास का एक अजीब मोड़ हमारे सामने है—

हम सभी शोषण के खिलाफ लड़ने की बात करते हैं,

मजदूर-किसान की एकता की बात करते हैं,

साम्राज्यवाद और पूंजीवादी वर्चस्व का विरोध करते हैं,

सामाजिक न्याय और मेहनतकश जनता के अधिकारों की बात करते हैं।

लेकिन जब सवाल आता है—

“क्या भारतीय वाम की बिखरी हुई ताकतों को व्यापक संघर्ष के लिए एक साथ लाया जा सकता है?”

तो हमारी सारी क्रांतिकारी भाषा अचानक संगठनात्मक सीमाओं से टकराने लगती है।

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एक असहज सवाल से शुरुआत कीजिए

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन कोई नया विषय नहीं है।

1960 के दशक में कार्यक्रम और रणनीति को लेकर गंभीर मतभेदों ने CPI के विभाजन और CPI(M) के गठन का रास्ता बनाया। बाद में विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धाराएँ भी अलग-अलग रास्तों पर चलीं।

इन विभाजनों के पीछे ऐतिहासिक, वैचारिक और रणनीतिक कारण रहे हैं।

इसलिए हर मतभेद को “सत्ता की लड़ाई” कह देना भी उचित नहीं होगा।

लेकिन आज सवाल यह है—

क्या पुराने मतभेदों को हमेशा के लिए राजनीतिक दीवार बना देना आवश्यक है?

क्या अलग-अलग वैचारिक धाराएँ अपने मतभेद बनाए रखते हुए भी जनता के साझा सवालों पर एक साथ संघर्ष नहीं कर सकतीं?

और अगर कर सकती हैं—

तो हम उतना भी क्यों नहीं कर पा रहे?

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नेतृत्व से मेरा सीधा सवाल है

आप दशकों से जनता को त्याग का पाठ पढ़ाते हैं।

आप कहते हैं—

व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है।

आप कहते हैं—

पार्टी जनता के लिए है।

आप कहते हैं—

नेतृत्व वर्ग-संघर्ष का औजार है।

तो फिर एक दिन यह सवाल अपने ऊपर भी लागू कीजिए—

अगर मेरे पद से हटने से व्यापक वाम एकता मजबूत होती है, तो क्या मैं हटने के लिए तैयार हूँ?

अगर उत्तर “हाँ” है—

तो रास्ता खोलिए।

अगर उत्तर “नहीं” है—

तो कम-से-कम ईमानदारी से यह स्वीकार कीजिए कि समस्या केवल वैचारिक मतभेद की नहीं, संगठनात्मक सत्ता की भी है।

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क्या महासचिव का पद क्रांति से बड़ा है?

यह सवाल कठोर है।

लेकिन शायद अब कठोर सवालों से बचने का समय नहीं है।

महासचिव कौन बनेगा?

राज्य सचिव कौन बनेगा?

केंद्रीय समिति में किसका कितना प्रतिनिधित्व होगा?

किस पार्टी का झंडा आगे रहेगा?

किसका नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा?

किसके पास अंतिम राजनीतिक निर्णय का अधिकार होगा?

ये सवाल संगठन के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

लेकिन जनता के लिए?

एक बेरोजगार युवा के लिए महासचिव की कुर्सी का क्या अर्थ है?

एक मजदूर के लिए केंद्रीय समिति की सीट का क्या अर्थ है?

एक खेत-मजदूर के लिए आपकी संगठनात्मक प्रतिष्ठा का क्या अर्थ है?

वह सिर्फ यह देखता है—

जब उसका जीवन संकट में था, तब कौन उसके साथ खड़ा था?

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आपके अपने दस्तावेज आपको आईना दिखाते हैं

यह आलोचना बाहर से थोपी हुई नहीं है।

CPI अपने संविधान में “unity in action”, आंतरिक बहस और असहमति के सम्मान की बात करती है।

CPI(M) के दस्तावेज Left unity को संयुक्त कार्रवाई और साझा अभियानों के आधार पर मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।

CPI(ML) Liberation का 2023 का कार्यक्रम तो और आगे जाकर सभी भारतीय कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक एकीकरण की दिशा में बात करता है और Left forces की unity in action को महत्वपूर्ण मानता है।

तो सवाल यह नहीं कि—

एकता की बात कौन करता है?

सवाल यह है—

एकता की दिशा में व्यवहारिक कदम कितने उठाए जाते हैं?

यहीं दस्तावेज और व्यवहार के बीच की दूरी पर बहस होनी चाहिए।

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आत्मालोचना दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए

किसी दूसरे संगठन को संशोधनवादी कहना आसान है।

किसी को अवसरवादी कहना आसान है।

किसी को संसदीय भटकाव का शिकार कहना आसान है।

किसी को अतिवामपंथी कहना आसान है।

लेकिन क्या हम अपने संगठन से पूछ सकते हैं—

जनता हमारे साथ क्यों नहीं बढ़ रही?

युवा हमारे साथ स्थायी रूप से क्यों नहीं जुड़ रहे?

मजदूर बस्तियों में हमारी राजनीतिक उपस्थिति क्यों कमजोर है?

किसानों के बीच हमारा प्रभाव अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुँच रहा?

नई पीढ़ी नेतृत्व में क्यों नहीं आ रही?

महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित तबकों को निर्णायक नेतृत्वकारी भूमिका कितनी मिली?

और सबसे कठिन सवाल—

अगर हमारी लाइन इतनी सही है, तो उसका सामाजिक प्रभाव हमारी अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं है?

यह सवाल दूसरे संगठन के खिलाफ हथियार नहीं होना चाहिए।

यह अपने संगठन के सामने रखा हुआ आईना होना चाहिए।

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छोटी-छोटी लाल दीवारों के भीतर बड़ा लाल आंदोलन कैसे बनेगा?

आज वाम आंदोलन के सामने एक विचित्र तस्वीर है।

अलग-अलग कार्यालय।

अलग-अलग सम्मेलन।

अलग-अलग पत्रिकाएँ।

अलग-अलग संगठन।

अलग-अलग नेतृत्व।

अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ।

और कभी-कभी—

एक-दूसरे के खिलाफ सबसे तीखी राजनीतिक भाषा।

लेकिन जनता?

वह इन दीवारों के बाहर खड़ी है।

क्या इन संगठनों को तुरंत एक पार्टी बन जाना चाहिए?

जरूरी नहीं।

क्या सभी वैचारिक मतभेद समाप्त किए जा सकते हैं?

शायद नहीं।

लेकिन क्या साझा मुद्दों पर संयुक्त संघर्ष, संयुक्त अभियान, संयुक्त जनमंच और व्यापक वाम एकता के नए प्रयोग हो सकते हैं?

इस सवाल का जवाब “हाँ” होना चाहिए—यदि जनता का संघर्ष सचमुच सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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एकता का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं

यह भी साफ होना चाहिए।

वाम एकता का मतलब यह नहीं कि कोई संगठन अपनी विचारधारा छोड़ दे।

न इसका अर्थ यह है कि सभी ऐतिहासिक मतभेद मिटा दिए जाएँ।

न यह कि हर पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान समाप्त कर दे।

एकता का पहला चरण शायद इतना ही हो सकता है—

जहाँ संघर्ष साझा है, वहाँ संघर्ष भी साझा हो।

मजदूरों का सवाल—साझा संघर्ष।

किसानों का सवाल—साझा संघर्ष।

बेरोजगारी—साझा अभियान।

निजीकरण—साझा प्रतिरोध।

शिक्षा और स्वास्थ्य—साझा जनअभियान।

लोकतांत्रिक अधिकार—साझा मोर्चा।

इसके बाद राजनीतिक विश्वास पैदा होगा।

और शायद उसी से आगे की एकता की जमीन भी तैयार होगी।

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नेतृत्व की अगली परीक्षा

आज के नेतृत्व के सामने शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसने कितने सम्मेलन किए।

न यह कि कितने प्रस्ताव पारित किए।

न यह कि कितनी बार मंच से क्रांति शब्द बोला।

असली परीक्षा यह है—

क्या वह अपने बाद की पीढ़ी तैयार कर रहा है?

क्या वह युवाओं को केवल पोस्टर उठाने और नारे लगाने तक सीमित रखेगा?

या उन्हें निर्णय लेने की जगह देगा?

क्या पुराने नेता जीवन भर पद पर बने रहेंगे?

या एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति बनाएँगे जिसमें नेतृत्व का हस्तांतरण स्वाभाविक प्रक्रिया हो?

क्योंकि जो आंदोलन नई पीढ़ी को नेतृत्व नहीं देता, वह अंततः अपने अतीत का संग्रहालय बन सकता है।

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सबसे कठिन त्याग

त्याग का अर्थ केवल जेल जाना नहीं।

त्याग का अर्थ केवल गिरफ्तारी देना नहीं।

त्याग का अर्थ केवल लाठी खाना नहीं।

कभी-कभी—

सबसे कठिन त्याग अपनी कुर्सी छोड़ना होता है।

किसी पद से हटकर दूसरे को आगे बढ़ाना।

अपने संगठन की सीमा स्वीकार करना।

दूसरे संगठन की अच्छाई स्वीकार करना।

अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मानना।

और कभी-कभी यह कहना—

“मेरे रहते अगर एकता नहीं बन रही, तो मैं पीछे हटने को तैयार हूँ।”

यही वाक्य किसी भी नेता की वैचारिक प्रतिबद्धता की बड़ी परीक्षा हो सकता है।

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इतिहास आपसे एक दिन यह सवाल पूछेगा

जब मजदूर बिखरा था—आपने क्या किया?

जब किसान अकेला था—आपने क्या किया?

जब युवा बेरोजगार था—आपने क्या किया?

जब जनता महंगाई से जूझ रही थी—आपने क्या किया?

जब वाम की ताकत अलग-अलग दिशाओं में बंटी थी—आपने दीवार ऊँची की या पुल बनाया?

और जब इतिहास ने अवसर दिया—

क्या आपने अपनी कुर्सी बचाई या आंदोलन को बड़ा किया?

यह फैसला आज नहीं तो कल इतिहास करेगा।

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इसलिए यह खुला पत्र है

भारतीय वाम नेतृत्व से मेरी अपील है—

एक-दूसरे को हराने की राजनीति से ऊपर उठिए।

पहले संयुक्त संघर्ष की शुरुआत कीजिए।

फिर साझा कार्यक्रम बनाइए।

फिर व्यापक जनसंगठनों को जोड़िए।

फिर युवाओं और नई पीढ़ी को नेतृत्व में जगह दीजिए।

और अंततः उस राजनीतिक एकता पर बहस कीजिए जिसकी जरूरत आज जनता महसूस कर रही है।

किस पार्टी का झंडा ऊपर होगा—यह बाद का सवाल है।

पहला सवाल यह है कि जनता का झंडा कितना ऊपर उठेगा।

कौन महासचिव बनेगा—यह बाद का सवाल है।

पहला सवाल यह है कि मजदूर-किसान का नेतृत्व कौन मजबूत करेगा।

कौन सही मार्क्सवादी है—यह बहस चलती रहेगी।

लेकिन उससे पहले यह तय कीजिए—

क्या हम जनता के संघर्ष में एक साथ खड़े हो सकते हैं?

क्योंकि अगर नहीं—

तो हमें दूसरों को क्रांति का पाठ पढ़ाने से पहले अपने भीतर एक छोटी-सी क्रांति करनी होगी।

सत्ता की नहीं।

कुर्सी की नहीं।

दूसरे संगठन के खिलाफ नहीं।

अपने अहंकार के खिलाफ।

और शायद—

यही आज भारतीय वाम आंदोलन की पहली क्रांति होनी चाहिए।

क्रांति कहाँ है—पार्टी में या कुर्सी में?

अब जवाब भाषण से नहीं,

व्यवहार से देना होगा।