Thursday, 29 November 2018

अतुल अंजान साहब को जन्मदिन की बधाई व शुभकामनायें





*अतुल अंजान साहब का स्पष्ट कहना है कि, 2014 के लोकसभा चुनाव में 35 हजार करोड़ रुपए खर्च करके सत्तारूढ मोदी सरकार कारपोरेट घरानों की सरकार है। 
** जब मोहन भागवत बन्छ आफ थाट  को गुजरे जमाने की किताब बता सकते हैं तब गांधी जी की हत्या के लिए देश से माफी क्यों नहीं मांगते ? 
*** सबरीमाला पर भाजपा की रक्तपात यात्रा जन विरोधी और देश विरोधी और संविधान विरोधी है। 
**** यह देश जितना हिंदुओं का है उतना ही मुसलमानों,सिखों,बौद्धों,जैनियों,पारसियों आदि - आदि का भी है। 
***** इस सरकार के कार्यकाल को यों समझें कि, ''बड़ी - बड़ी बातों के चक्कर में छोटी भी गयी । पतलून की चाहत में लंगोटी भी गई। । "
****** जनता से अनुरोध है कि, जाति, मजहब,धर्म को देख कर वोट न दें बल्कि, बेरोजगारी,मंहगाई,किसान और मजदूरों की समस्याओं को ध्यान में रख कर वोट दें वरना अगली पीढ़ियाँ तबाह हो जाएंगी। 

Saturday, 24 November 2018

चरित्र भ्रष्ट मोदी सरकार चला चली की बेला में ------ अतुल अंजान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान ने भारत वॉयस को दिये साक्षात्कार में बड़े बुलंद अंदाज के साथ मोदी सरकार की विदाई को रेखांकित किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि देश की जनता इस चारित्रिक व आर्थिक रूप से पूर्ण भ्रष्ट सरकार को हटा कर देश , देश के संविधान और लोकतन्त्र की रक्षा के लिए कटिबद्ध है । 
(क्रमश: ) 


Monday, 5 November 2018

‘बेटर दैन कैश एलायंस’ का वायदा पूरा करने के लिए हुई थी नोटबंदी ------ नॉरबर्ट हेयरिंग

* नोटबंदी के थोड़े समय बाद अमेरिकी सलाहकार कंपनी बीसीजी और गूगल ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें भारतीय लेन-देन के बाजार को ‘500 अरब डॉलर के सोने का बर्तन’ कहा गया। नोटबंदी के बाद अमेरिकी निवेशक बैंक ने संभावित मुख्य लाभार्थियों में वीजा, मास्टरकार्ड और एमेजॉन को शामिल किया । 
** नोटबंदी के घोषित उद्देश्य नहीं हुए पूरे
बचत के आधुनिक तरीकों और भुगतान के विकल्पों तक पहुंच देकर गरीबों की मदद करने की बजाय नोटबंदी ने बड़े पैमाने पर गरीबों का नुकसान किया। नगदी के रूप में उनके पास जो भी बचत था, जिससे उनका काम चल रहा था वह भी उनके हाथ से निकल गया।

*********

नोटबंदी के घोषित उद्देश्य नहीं हुए पूरे, लेकिन असली लक्ष्य था कुछ और!
 नॉरबर्ट हेयरिंग

मुझे प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के फैसले की ‘असफलता’ पर लिखने के लिए कहा गया है। यह सच है, अगर नोटबंदी की कार्रवाई को आतंकवाद, भ्रष्टाचार और करचोरी रोकने के इसके घोषित उद्देश्यों के आधार पर परखा जाए तो यह एकदम असफल माना जाएगा।एक तो अवैध घोषित किए गए लगभग सारे नोट बैंकों में वापस जमा हो गए और वैध अर्थव्यवस्था में फिर से डाल दिए गए। अगर समावेशी अर्थव्यवस्था बनाने के दूसरे उद्देश्य के पैमाने पर इसे देखा जाए तो वहां भी यह असफल साबित हुआ। बचत के आधुनिक तरीकों और भुगतान के विकल्पों तक पहुंच देकर गरीबों की मदद करने की बजाय नोटबंदी ने बड़े पैमाने पर गरीबों का नुकसान किया। नगदी के रूप में उनके पास जो भी बचत था, जिससे उनका काम चल रहा था वह भी उनके हाथ से निकल गया।जिन लोगों के पास सहायता का अच्छा सामाजिक तंत्र था, उन्हें तो इसे झेलने का तरीका मिल गया। लेकिन विस्थापित मजदूरों जैसे समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों को अस्थायी रूप से मौद्रिक अर्थव्यवस्था से बाहर रहने के कारण काफी नुकसान हुआ।अमेरिकी सरकार 4 घंटे के नोटिस पर ज्यादातर नगदी को सर्कुलेशन से बाहर निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकती। हालांकि, अगर यह भारत में भारत के लोगों के साथ किया गया है, तो यह उनके लिए ठीक है!अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधियों ने इस कदम की तारीफ की थी। दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक संस्था के मुखिया बिल गेट्स ने घोषणा की कि कुल जमा लाभ गरीबों की अस्थायी परेशानी से काफी ज्यादा होगा। ‘बेटर दैन कैश एलायंस’ नाम की संस्था ने भी यही किया। अमेरिकी सरकार और गेट्स फाउंडेशन इस संस्था के मुख्य सदस्य हैं।अमेरिका में नोटबंदी को लेकर जो उत्साह था उसे समझा जा सकता है, अगर समावेश का मतलब यह माना जाए कि सारा पैसा वाणिज्य औद्योगिक क्षेत्र में डाल दिया जाए। 2015 में वाशिंगटन में आयोजित हुए फाइनेंसियल इन्क्लूजन फोरम में ‘पे पाल‘ के सीईओ डैन शूलमैन ने बताया: “वित्तीय समावेश एक उत्साह बढ़ाने वाला शब्द है जिससे कि लोगों को व्यवस्था का अंग बनाया जाए।” और उसी मौके पर बिल गेट्स ने इस बात को विस्तार से बताते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार को यह सुनिश्चित करना था कि वित्तीय लेन-देन डिजिटल व्यवस्था के तहत हो जिसमें अमेरिकी सरकार “उन लेन-देन का पता लगा सके जिनके बारे में वह जानना चाहती है या ब्लॉक करना चाहती है।”गेट्स ने यह भी कहा: “यह निश्चित रूप से हमारा लक्ष्य है कि अगले 3 सालों में बड़े विकासशील देशों में डिजिटलीकरण पूरा हो जाए। हमने पिछले तीन सालों से वहां (भारत) के केंद्रीय बैंक के साथ सीधे तौर पर काम किया है।” भारत में गेट्स फाउंडेशन के मुखिया नचिकेत मोर हैं। वे अभी हाल तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के केंद्रीय बोर्ड के सदस्य थे और उनके पास वित्तीय देख-रेख की जिम्मेदारी थी।नोटबंदी भारतीय लोगों को ‘व्यवस्था’ का हिस्सा बनाने में काफी सफल रही, जिसमें उनका पता लगाया जा सकता है। यह अनुमान लगाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि नोटबंदी का असली लक्ष्य यही था। नोटबंदी के लगभग तीन सप्ताह बाद अपने मासिक संबोधन ‘मन की बात’ में नरेन्द्र मोदी ने कहा था: “हमारा सपना है कि एक कैशलेस समाज बने।”2014 में चुनाव जीतने के बाद जब वे वाशिंगटन गए तो उन्होंने इस लक्ष्य को लेकर एक वादा किया था। उनकी यात्रा के दौरान ‘बेटर दैन कैश एलायंस’ में अमेरिकी सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था यूएसएआईडी, भारत के वित्त मंत्रालय और डिजिटल लेन-देन में शामिल कई अमेरिकी और भारतीय कंपनियों के बीच एक भागीदारी की घोषणा हुई थी। जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2015 में भारत आए तो उनका स्वागत करते हुए भारत ने एक उपहार यह दिया कि भारत ‘बेटर दैन कैश एलायंस’ में शामिल हो गया।अमेरिकी सरकार और गेट्स फाउंडेशन के अलावा ‘बेटर दैन कैश एलायंस’ में अपने हितों को लेकर मौजूद कई मुख्य वाणिज्यिक सदस्य भी हैं। वे अमेरिका के लेन-देन कारोबार के महारथी वीजा और मास्टरकार्ड हैं जिनका बड़ा दखल विश्व बाजार और सीआईटीआई समूह पर है। सीआईटीआई यानी सिटी बैंक इस एलायंस के शुरू होने के वक्त दुनिया का सबसे बड़ा बैंक था।नोटबंदी के थोड़े समय बाद अमेरिकी सलाहकार कंपनी बीसीजी और गूगल ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें भारतीय लेन-देन के बाजार को ‘500 अरब डॉलर के सोने का बर्तन’ कहा गया। नोटबंदी के बाद अमेरिकी निवेशक बैंक ने संभावित मुख्य लाभार्थियों में वीजा, मास्टरकार्ड और एमेजॉन को शामिल किया।सिटी बैंक जैसे वाणिज्यिक बैंक नगद को उतना ही नापसंद करते हैं जितना क्रेडिट कार्ड कंपनियां करती हैं। इसमें पैसा कमाने की बजाय नगद का प्रबंधन करने में पैसे लग जाते हैं, जबकि वे डिजिटल लेन-देन में पैसा कमा लेते हैं। ज्यादा बुरी बात यह है कि लोग बैंकिंग व्यवस्था से अपना पैसा निकाल सकते हैं अगर उनका भरोसा खत्म हो गया। बड़े वित्तीय खेल में घुसने की बैंकिंग व्यवस्था की क्षमता को यह सीमित करता है।जितना कम नगद इस्तेमाल होता है, उतना ज्यादा बैंक में जमा राशि का रूप लेता है। बैंक में जितना ज्यादा पैसा जमा होगा, वे उतने फायदेमंद धंधों में घुस सकते हैं। जर्मनी के एक अखबार को दिए साक्षात्कार में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की तत्कालीन सीईओ अरुंधती भट्टाचार्य इस बात को लेकर बेहद उत्साहित थीं कि बैंकिंग व्यवस्था में बहुत ज्यादा पैसे आ गए हैं। उन्होंने कहा कि जितने पैसे जमा हुए हैं वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था, “सुधार के पहले हम हर महीने 950 मिलियन डेबिट कार्ड लेन-देन करते थे। नोटबंदी के 50 दिन बाद हम 3.9 बिलियन लेन-देन कर रहे हैं।अमेरिकी-भारतीय भागीदारी के वाणिज्यिक सदस्यों के दृष्टि में नोटबंदी बहुती बड़ी सफलता थी। नोटबंदी के 18 महीनों बाद मोबाइल वॉलेट का उपयोग तीन गुना बढ़ गया, बिक्री में डेबिट कार्ड का उपयोग दुगुना हो गया और क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल में काफी बढ़ोतरी हुई।

भास्कर चक्रवर्ती अमेरिका के टफ्ट्स विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस इन ग्लोबल कॉन्टेक्स्ट के निदेशक हैं। इस संस्था को गेट्स फाउंडेशन और सिटी समूह वित्तीय सहायता देता है। हार्वर्ड बिजेनस रिव्यू में उन्होंने नोटबंदी पर लिखते हुए माना कि नोटबंदी अपने घोषित उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा और गरीब लोगों और अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हुआ।उन्होंने आगे कहा कि यह कोई समस्या नहीं थी क्योंकि नोटबंदी की मुख्य बात पूरी तरह अलग है। नोटबंदी में जनता को इतनी तकलीफ होने के बावजूद मोदी की बड़ी चुनावी सफलताओं को नोट करते हुए उन्होंने लिखा, “जब लोगों को लगता है कि आप उनके लिए लड़ रहे हैं, तो बहुत ठोस तथ्यों का भी कम से कम असर होता है। आखिरकार, भारत में नोटबंदी की कहानी का सबसे बड़ा सबक आंकड़ों के खिलाफ प्रचार की जीत है।”बिना तथ्यों के बड़े वादे करना बेटर दैन कैश एलायंस की रणनीति है जिस पर वह काफी मजबूती से आगे बढ़ रहा है। वे लगातार दावा कर रहे हैं कि लेन-देन का डिजिटलीकरण गरीबी को मिटाने में मदद करेगा और विकास की गति बढ़ाएगा। उनके लिए इसका कोई मतलब नहीं है कि इस तर्क के खिलाफ कई सारे तथ्य मौजूद हैं।
साभार : 
https://www.navjivanindia.com/india/demonetisation-was-a-failure-in-terms-of-its-announced-goals-but-the-real-aim-something-else?utm_source=one-signal&utm_medium=push-notification
********************************
फेसबुक कमेंट्स : 

Sunday, 4 November 2018

न्यायिक सक्रियता, संघ की बौखलाहट और मन्दिर राग ------ डा॰ गिरीश


Girish CPI

Nov 3, 2018, 1:38 PM
न्यायिक सक्रियता, संघ की बौखलाहट और मन्दिर राग  : 


अदालतों के हाल के कुछ निर्णयों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके आनुसांगिक संगठनों खासकर भाजपा की बौखलाहट निरंतर बढ़ती जारही है। इस बौखलाहट के चलते एक ओर वह सर्वोच्च न्यायालय पर हमलावर हुये हैं वहीं उन सबने अयोध्या में मन्दिर निर्माण का कीर्तन पुनः तेज कर दिया है। सारी सीमायें लांघ कर सर्वोच्च न्यायालय पर जिस भौंडे ढंग से हमले किये जारहे हैं वे देश और लोकतान्त्रिक समाज के लिये बेहद चिंता का सबब बनते जारहे हैं। अंततः ये हमले हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली और संविधान के ऊपर हैं।

इसी बीच संघ, विश्व हिन्दू परिषद और संघ के तमाम सहोदरों ने चार साल की हैरान करने वाली चुप्पी को तोड़ते हुये अयोध्या में मन्दिर आंदोलन को धार देना शुरू कर दिया है। अब बात यहां तक पहुंच गयी है कि अध्यादेश लाकर और कानून बना कर मन्दिर बनाने की मांग की जारही है। यह मांग किसी और ने नहीं विजयादशमी पर अपने परंपरागत भाषण में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्वयं की। नाटकीयता की हद यह है कि सरकार का नियंता संघ अपनी ही सरकार से मांग करने का अभिनय कर रहा है।

लेकिन  महामुख के खुलते ही दसों मुख खुल गये हैं। कथित विहिप और संत समाज तो पहले ही अभियान की रूपरेखा तैयार कर चुके थे अब गिरराज किशोर और सुब्रह्मण्यम स्वामी सरीखे भाजपा के वाचाल भी सक्रिय होगये हैं। एक दो नहीं संवैधानिक पदों पर बैठे कोई दर्जन भर दुर्मुख एक ही भाषा बोल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो यहां तक कह डाला कि मन्दिर निर्माण तो जारी है। उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य ने कहाकि 2019 से पहले ही मन्दिर का निर्माण अवश्य होगा भले ही उसके लिये कानून बनाना पड़े। राम भक्त दर्शाने की होड़ मची है। तोगड़िया और शिवसेना प्रमुख देखने में भले ही अलग दिखाई देते हों पर उनका मन्दिर राग भाजपा और संघ के लिये आधार तैयार करने वाला ही नजर आरहा है।

केरल के सबरीमाला मन्दिर के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सभी स्त्रियों के प्रवेश के निर्णय पर संघ और भाजपा ने सारी सीमायें लांघ कर अपनी फौजें सड़कों पर उतार दीं। इतना ही नहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सर्वोच्च न्यायालय को खुल्लमखुला नसीहत दे डाली कि सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे निर्णय नहीं देने चाहिये जो जनता की आस्था के विपरीत हों और जिन्हें लागू नहीं किया जासके। यह सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता और हमारे संविधान पर खुला हमला है जिसके तहत व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सर्वोच्चता स्थापित की गयी है। इस प्रकरण ने संघ और भाजपा के नारी सम्मान और स्वातंत्र्य के प्रति ढोंग को भी उजागर कर दिया। एक केन्द्रीय महिला मन्त्री ने तो बेहद फूहड़ बयान देकर नारी की निजता पर घ्रणित हमला बोला।

ऐसा नहीं कि भाजपा ऐसा पहली बार कर रही है। वह ऐसा बार- बार और लगातार करती आयी है। आस्था और श्रध्दा उसके राजनीतिक कवच- कुंडल हैं। इन्हीं की आड़ में इस समूह ने 6 दिसंबर 1992 को राष्ट्रीय एकता परिषद को दिये अपने वचन और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की धज्जियां बिखेरते हुये अयोध्या के विवादित ढांचे को ही ज़मींदोज़ कर दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय पर संघ परिवार का ताज़ा हमला उसके अधीन विचारधीन अयोध्या विवाद की सुनवाई जनवरी 2019 में शुरू करने के फैसले को लेकर है। संघ भली प्रकार जानता है कि 29 अक्तूबर को सक्षम बेंच के अभाव में सुनवाई संभव नहीं थी और एक सक्षम बेंच के गठन के लिये भी वक्त चाहिये होता है। लेकिन संघ को तो राजनीति करनी थी। पहले कहा गया कि यह सब कांग्रेस के दबाव में किया जारहा है। जब यह पटाखा फुस्स होगया तो कहा जाने लगाकि सर्वोच्च न्यायालय करोड़ों हिंदुओं की भावना से खिलवाड़ न करे। यह सर्वोच्च न्यायालय को खुली धमकी है जो अपने वोट बैंक को बरगलाने के लिये की जारही है।

सर्वोच्च न्यायालय ही नहीं तमाम स्वायत्त संस्थाओं को भी संघ परिवार तहस नहस कर रहा है। निर्वाचन आयोग, सीबीआई, सीवीसी और अब रिजर्व बैंक को निशाने पर लिया गया है।

संघ और भाजपा की इस बौखलाहट और कारगुजारियों के लिये पर्याप्त कारण भी हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और मोदीजी द्वारा जनता को तमाम सब्जबाग दिखाये गये थे। आज उनकी कलई पूरी तरह खुल गयी है। दो करोड़ नौजवानों को हर वर्ष रोजगार देने का वायदा अब उन्हें पकौड़े तलने की नसीहत में बदल गया है। किसानों की आमदनी दोगुनी करने, विदेशों से कालाधन वापस लाकर हर खाते में रुपये- 15 लाख पहुंचाने, आतंकवाद की रीड़ तोड़ने, पाकिस्तान की आँखों में आँखें डाल कर बात करने जैसे झांसे और “न खाऊँगा न खाने दूंगा” जैसी कसमें सभी तार- तार होचुके हैं। भाजपा स्वयं इन्हें चुनावी जुमला बता चुकी है।

नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के दुष्परिणाम सभी के सामने हैं। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में अभूतपूर्व व्रध्दी और कमरतोड़ महंगाई, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में रुपये की निरंतर गिरती कीमत और भ्रष्टाचार के मोर्चे पर मोदी सरकार की विफलता ने भाजपा के पैरों तले से जमीन खिसका दी है। राफेल विमान सौदे में सीधे प्रधानमंत्री की लिप्तता ने डूबते जहाज की पैंदी में एक और छेद कर दिया। इसे भाजपा भी समझ रही है और संघ भी। विकास, स्वच्छता अभियान और विदेशों में छवि निर्माण के ढोंग भी परवान नहीं चड़ सके। सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा पर चढ़ कर फायदा उठाने का मंसूबा आरएसएस के बारे में सरदार पटेल के स्पष्ट विचारों ने धराशायी कर दिया।

हाल के कुछ न्यायिक फैसलों ने भी संघ और भाजपा की कथनी करनी और दोगलेपन को उजागर किया है। सबरीमाला मन्दिर में सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश, शहरी नक्सल के नाम पर गिरफ्तार बुध्दिजीवियों की गिरफ्तारी के मामले को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार के लिये स्वीकार करना, सीबीआई प्रकरण पर सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 31 वर्ष पुराने हाशिमपुरा मामले में दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाना और उत्तर प्रदेश में 68,500 शिक्षकों की भर्ती में हुये घोटाले की इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई से जांच के आदेश पारित करना आदि तमाम मामले हैं जो भाजपा, संघ और उनकी सरकारों की कारगुजारियों को बेनकाब करते हैं।

इन सब से बौखलाया संघ परिवार मन्दिर मुद्दे की सुनवाई को जनवरी तक बढ़ाए जाने को कुटिलता से आस्था का प्रश्न बना कर सर्वोच्च न्यायालय पर हमले बोल रहा है। हर तरफ से घिरे और पूरी तरह बेनकाब संघ के सामने “मन्दिर शरणम गच्छामि” के अलाबा कोई रास्ता नहीं है। अतएव अध्यादेश लाकर अथवा कानून बना कर मन्दिर बनाने की आवाजें तेज हो गईं हैं। मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच हुई गुफ्तगू भी इसी उद्देश्य से है। संघ के महासचिव ने 1992 जैसा आंदोलन छेड़ने की धमकी दी है। यह साख बचाने और चेहरा छिपाने की कवायद भी होसकती हैं।  

अब देखना यह है कि क्या संघ के निर्देशों का पालन करते हुये केन्द्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र से पहले मन्दिर निर्माण के लिये अध्यादेश लाएगी? या फिर संसद में कोई बिल लाकर यह जताने का प्रयास करेगी कि वह तो मन्दिर निर्माण के लिये प्रतिबध्द है। लेकिन इस बिल के अधर में लटक जाने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। पर भाजपा को लोगों को भ्रमित करने का बहाना तो मिल ही जाएगा। कानूनी पेंच यह भी है कि अयोध्या के विवादित भूखंड का अदालती निर्णय आने से पहले वहाँ कोई निर्माण संभव नहीं है। भाजपा और संघ यह भली प्रकार जानते हैं। अतएव मन्दिर राग अलापना उनकी मजबूरी है तो न्यायपालिका को धमकाना उनकी राजनैतिक जरूरत। इसे वे निरंतर जारी रखेंगे भले ही देश के लोकतान्त्रिक ढांचे को कितनी ही क्षति क्यों न उठानी पड़े।

डा॰ गिरीश

Saturday, 20 October 2018

सर्वसत्ताग्राही अराजक गिरोह बन चुके हैं आरएसएस और भाजपा ------ डा॰ गिरीश



हाथरस में दशहरे के दिन आरएसएस के शस्त्र पूजन कार्यक्रम में आग्नेयास्त्रों से हुयी फायरिंग में प्रेस फोटोग्राफर के गंभीर रूप से और फायरिंग करने वाले विधायक पुत्र के मामूली रूप से घायल होने से हाथरस ही नहीं देश के तमाम सामाजिक, राजनैतिक हल्कों और मीडियाकर्मियों के बीच गहरी बहस छिड़ गई है।

ज्ञातव्य हो कि दशहरे के दिन संघ के लोग हर साल शस्त्र पूजन करते हैं जिसमें भाजपाई भी बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं। हाथरस में यह आयोजन स्थानीय श्री बागला इंटर कालेज में किया गया। इस बार केन्द्र में और उत्तर प्रदेश में सत्ता में होने का नशा सिर पर चढ़ कर बोल रहा था तो संघी और भाजपाइयों ने लुत्फ उठाने को एक से बढ़ कर एक आला हथियारों से फायरिंग शुरू कर दी।

इसी बीच फायरिंग कर रहे हाथरस अनुसूचित विधानसभा क्षेत्र के विधायक ने अपनी रायफल अपने बेटे को थमा दी और फिर विधायक पुत्र ने हथियार पर हाथ आजमाना शुरू कर दिया। इस बीच अनाड़ीपन से चलायी जारही रायफल की गोली उलटी चल गयी फलतः रायफल की मैगजीन फट गयी। परिणामस्वरूप मैगजीन का एक बड़ा टुकड़ा शस्त्र प्रदर्शन का कवरेज कर रहे प्रेस फोटोग्राफर की गर्दन में जा धंसा और वह गंभीर रूप से घायल होगया। विधायक पुत्र के भी खरौंचे लगी हैं।

घायल फोटोग्राफर को अलीगढ़ रेफर किया गया जहां आपरेशन के बाद उसकी हालत में सुधार होरहा है। विधायकपुत्र घर पर ही आराम फरमा रहे हैं।

सामान्य रूप से यह कानून व्यवस्था का मामला दिखाई देता है। कालेज के प्रधानाचार्य द्वारा दिये गए बयान के अनुसार  संघ के स्थानीय प्रमुख ने उनसे सुबह कुछ घंटे दशहरा मनाने को कालेज परिसर में जगह मांगी थी, शस्त्र संचालन के लिए नहीं। स्थानीय प्रशासन ने भी कहा है कि कार्यक्रम की अनुमति नहीं लीगयी थी। अब सवाल उठता है कि बिना अनुमति किये जारहे आयोजन में संगीन आग्नेयास्त्र लिये लोग एकत्रित होते रहे, सत्ता के घमंड में चूर संघी और भाजपाई फायरिंग करते रहे लेकिन प्रशासन ने उधर से आँखें फेरे रखीं। जबकि हर्ष फायरिंग पूरी तरह से प्रतिबंधित है और इस प्रतिबंध को अमल में लाने का दायित्व शासक दल और उसके मातहत प्रशासन पर है।  

इतना ही नहीं कई घंटों तक पुलिस- प्रशासन ने घटना को नजरंदाज किया और कोई तहरीर न होने का बहाना बनाते हुये एफ॰ आई॰ आर॰ तक दर्ज नहीं की। बाद में राजनैतिक और पत्रकारिक हलकों में कड़ी प्रतिक्रिया को देखते हुये तथा अपने को औरों से अलग कहने वाली पार्टी के विधायक विरोधी खेमे के सक्रिय होने के बाद पुलिस को मजबूरन अपनी ओर से एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। सभी फायरिंग करने वालों को चिन्हित कर कार्यवाही होगी या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। जख्मी मीडिया कर्मी को पर्याप्त मुआबजा देने की मांग भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित कई स्थानीय संगठनों ने की है।

सवाल यह है कि क्या आरएसएस एक संविधान, न्यायप्रणाली और लोकतान्त्रिक व्यवस्था का विरोधी संगठन नहीं बन चुका है। दशहरे पर किसी व्यक्ति या परिवार द्वारा शस्त्र पूजन की परंपरा रही है। लेकिन आरएसएस इसे अपने घ्रणित उद्देश्यों के लिये स्तेमाल करता है। कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखा कर पूजन के नाम पर शस्त्र प्रदर्शन और परेड निकालने वाले संघ ने आजादी के बाद हुये कई युद्धों के लिये अपनी निजी सेनाओं को भेजने का आफ़र क्या कभी सरकार को दिया? नहीं न। दरअसल उसका शस्त्र पूजन और पथ संचलन अल्पसंख्यकों, दलितों और अन्य कमजोरों में दहशत पैदा करने का माध्यम है, राष्ट्र रक्षा का नहीं।

आज संघ गिरोह सबरीमाला में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की धज्जियां बिखेर कर महिलाओं के मंदिर प्रवेश को रोकने वाली दकियानूस और कट्टरपंथी ताकतों की अगुवाई कर रहा है। 6 दिसंबर 19992 में इसी गिरोह ने राष्ट्रीय एकता परिषद और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को ठेंगा दिखा कर बाबरी ढांचे का ध्वंस किया था। मामले के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद वे 2019 में हर हाल में मंदिर निर्माण की घोषणायेँ कर रहे हैं। वोट और सत्ता के लिये वे कानून हाथ में लेने, संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की प्रभुता को पैरों तले रौंदने से न वे पहले कभी चुके हैं न आगे चूकने वाले हैं। सभी लोकतान्त्रिक और लोकहितकारी ताकतों को यह साफ तौर पर समझना चाहिए।

प्राक्रतिक आपदाओं के समय किसी सुरक्षित से स्थान पर राहत कार्य करते हुये फोटो खिंचवा कर वाहवाही लूटना इनका एक और प्रमुख शगल है। हाल ही में केरल में आयी महाविपत्ति के बीच राहत कार्य में जुटे भाकपा के एक मंत्री की फोटो वायरल कर संघियों ने दाबा ठोका कि उसके लोग राहत कार्य में जुटे हैं। किसी कमजोर की मदद करते, किसी बलात्कारी या हत्यारे का सामाजिक बहिष्कार करते, किसी कर्ज में डूबे किसान की कर्ज से मुक्ति में मदद करते, किसी नौकरी से हठाए गये अथवा बेरोजगार युवक को नौकरी दिलवाते अथवा भारतीय संसक्रति के उदार पक्षों को उद्घाटित करते इस कथित सामाजिक- सान्स्क्रतिक संगठन को देखा नहीं गया। अलबत्ता इसके उलट तमाम कारगुजारियों में इसे हर रोज लिप्त पाया जाता है। मोब लिंचिंग के हर मामले में संघ गिरोह लिप्त पाया गया है।

व्यवस्था, लोकतन्त्र, संविधान और न्याय प्रणाली के लिये चुनौती बन चुके संघ परिवार को सामाजिक और कानूनी तौर पर नियंत्रित करने की जरूरत है। सभी लोकतान्त्रिक ताकतों को इस हकीकत को समझना चाहिये। इन सभी शक्तियों के सामूहिक और निजी प्रयासों से ही यह संभव है। कांग्रेस और मध्यमार्गी दलों को समझना होगा कि संघ के प्रति उनके ढुलमुल द्रष्टिकोण से देश और उसकी लोकतान्त्रिक प्रणाली को भारी हानि उठानी पड़ सकती है।

डा॰ गिरीश

Saturday, 6 October 2018

एक थीं अच्छी मौसी : कामरेड प्रेमलता तिवारी ------ रीना सैटिन

 कामरेड प्रेमलता तिवारी के शताब्दी अवसर पर उनकी सुयोग्य भांजी कामरेड रीना सैटिन द्वारा भाव - पूर्ण स्मरण ...............................................................
दो किस्से : 
एक थीं अच्छी मौसी ( अच्छी इसलिए कि बच्चों को सारी मस्तियों  की छूट यही दिलाती थीं ) ॰॰
आज होतीं तो सौ साल की होतीं ॰॰
पर अपने जीवन में कई सौ साल जी गईं ॰॰

मेरे परिवार में आधे क्रांतिकारी थे, आधे नरम दल के ॰॰
प्रेमा मौसी दोनों थीं ॰॰

लंबा लिखना - पढ्ना  मुश्किल होगा तो मेरी माँ के सुनाये दो किस्से पेश हैं ॰॰

1 घर का : 
घर , जो नरम और गरम दलों के स्वतन्त्रता सेनानियों का गढ़ था, के बाहर पुलिस आई थी ॰॰
पुलिस को किसी तरह रोक कर सभी मौजूद लोग - अंदर रखे पोस्टर्स्स, पैम्फलेट्स और कुछ किताबें नष्ट करने में लग गए, कि पुलिस के हाथ न लग जाएँ ॰॰
सब फाड़ा जा रहा था , जलाया जा रहा था ॰॰
पूरा नष्ट करना संभव न देख , प्रेमा मौसी ने बहुत सा सामान शरीर पर लपेटा और दूसरी मंजिल से पीछे की गली में कूद गईं ॰॰
रानी लक्ष्मी बाई तो घोड़े पर सवार होकर कूदी थीं, यह खुद ही कूद गईं ॰॰

2 जेल का : 
जेल में बंद थीं - मेरी माँ भी वहीं थीं, और बहुत सी दूसरी महिला कामरेड्स भी वहीं थीं ॰॰
रात भर पोस्टर्स बनाए गए - और भोर होते ही जेल की दीवारों पर चिपकाए जाने लगे ॰॰
एक सिपाही आया और फाड़ने लगा ॰॰
इनहोने पकड़ा कालर , उसे फटका जमीन पर , छाती पर चढ़ बैठीं , और दे दना - दन ॰॰

जी , सजाएँ हर बार मिलीं - पर आजादी के दीवाने सजा की कब सोचते थे ? ॰॰

आजादी के बाद : 
आजाद भारत में सारी जिंदगी शिक्षिका रहीं, अपने स्कूल में भी और निजी जीवन में भी ॰॰

हम सब के चरित्र - केरेक्टर को बनाने में , और हमें न्याय के लिए डट कर खड़े होना सिखाने में उनकी भी बहुत बड़ी भूमिका रही ॰॰

आँखें नाम हैं, पर होठों पर मुस्कराहट है॰॰
अच्छी मौसी को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली ॰॰

( देवनागरी लिपिकरण का संदर्भ ) : 
https://www.facebook.com/reena.satin/posts/10215692606962023  




******                                                                  ******                                                      ******



सभी फोटो सौजन्य से : आलोक तिवारी 



Reena Satin 
06-10-2018 
2 Qisse
Ek theen Achchhee Mausee (achchhee is liye keh bachchon ko saaree mastiyon kee chhoot yahee dilaatee theen)..
Aaj hoteen to 100 saal kee hoteen..
Par apne jeevan mein kayee 100 saal jee gayeen..

Mere parivaar mein aadhe kraantikaaree the, aadhe naram dal ke..
Prema Mausee donon theen..

Lamba likha padhna mushkil hoga to meree maan ke sunaaye huye 2 qisse pesh hain..

1 Ghar, jo Naram aur Garam Dalon ke Swatantrata Senaanion ka gadh tha, ke baahar police aayee thee..
Police ko kisee tarah rok kar, sabhee maujood log - andar rakhe posters, pamphlets aur kuchh kitaaben nasht karne mein lag gaye, keh police ke haath na lag jaayen..
Sab phaada ja raha tha, jalaaya ja raha tha..
Poora nasht karna sambhav na dekh, Prema Mausee ne bahut sa material apne shareer par lapeta aur doosree manzil se peechhe kee galee mein kood gayeen.. 
Rani Lakshmi Bai to ghode par savaar ho kar koodee theen, yeh khud hee kood gayeen..

2 Jail mein band theen - meree maan bhee waheen theen, aur bahut sii doosree mahila comrades bhee waheen theen..
Raat bhar posters banaaye gaye - aur bhor hote hee jail kee deevaaron par chipkaaye jaane lage..
Ek sipaahee aaya aur phaadne laga..
Inhone pakda collar, usay patka zameen par, chhaatee par chadh baitheen, aur de dana dan..

Jee, sazaayen har baar mileen - par aazaadee ke deewaane saza kee kab sochte the..

Aazaad Bharat mein saaree zindagee shikshika raheen, apne school mein bhee aur nijee jeevan mein bhee..
Hum sab ke character ko banaane mein, aur humein nyaaye ke liye dat kar khade hona sikhaane mein inkee bhee bahut badee bhoomika rahee..

Aankhen nam hain, par hothon par muskuraahat hai..
Achchhee Mausee ko ashrupoorna shraddhaanjali..
https://www.facebook.com/reena.satin/posts/10215692606962023 
...............................................................
लेखिका ------

कामरेड रीना सैटिन 1967 की संविद सरकार में उत्तर - प्रदेश के गृह राज्यमंत्री कामरेड रुस्तम सैटिन साहब की सुपुत्री हैं । आपकी मौसी  कामरेड प्रेमलता तिवारी एवं मौसा जी कामरेड हरीश तिवारी तथा आपकी माताजी कामरेड मनोरमा सैटिन एवं एक अन्य मौसी कामरेड कृष्णा  श्रीवास्तव  एवं मौसजी  बालकृष्ण श्रीवास्तव सभी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। 

********************************************************************************
04 सितंबर 2014 को कामरेड हरीश तिवारी के जन्म शताब्दी वर्ष का एक समारोह राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह,क़ैसर बाग, लखनऊ में उनकी पुत्री अल्का तिवारी मिश्रा द्वारा आयोजित किया गया था जिसमें बिजली कर्मचारी यूनियन का भी सहयोग रहा था और इसमें कामरेड ए बी वर्द्धन की विशेष उपस्थिती रही थी।

इस अवसर पर एक पुस्तक ' मजदूर आंदोलन के सजग प्रहरी : कामरेड हरीश तिवारी ' जिसका सम्पादन उनके पुत्री - पुत्र द्वारा किया गया था जारी की गई थी। उस पुस्तक में यदा - कदा कामरेड प्रेमलता तिवारी का भी उल्लेख था।

 उस पुस्तक में दिये विवरण के अनुसार कामरेड प्रेमलता तिवारी का जन्म 06-10-1918 और मृत्यु 27 दिसंबर 1997 को हुई थी। उनका विवाह कामरेड हरीश तिवारी से 02 मई 1954 को बनारस में हुआ था ।बी एच यू से एम ए , हिन्दी थीं। काशी अनाथालय में वार्डन होते हुये भी दाइयों की हड़ताल में सक्रिय भागीदारी के कारण पद- त्याग करना पड़ा था।
दयानंद विद्या मंदिर, लखनऊ में तीन वर्ष प्रभारी का कार्य किया। बालिका विद्यालय इंटर कालेज, मोतीनगर, लखनऊ के हाई स्कूल खंड में कार्यरत रह कर 1982 में वहीं से अवकाश प्राप्त किया।
माध्यमिक शिक्षक संघ, महिला फेडरेशन की सक्रिय सदस्य रहीं और हड़ताल के समय अध्यापिकाओं का नेतृत्व किया। सक्रिय पार्टी कार्यकर्ता रहीं , देश की आजादी की लड़ाई में उनके योगदान की प्रमुख दो बातों का जिक्र  उनकी भांजी रीना जी ने अपने विवरण में भी किया है , वह बचपन से ही  ' वानर सेना '  का अनिवार्य अंग रही थीं।
पुस्तक के पृष्ठ- 344 पर प्रकाशित अपने संस्मरण में कामरेड सूरज लाल, पूर्व प्रांतीय कोषाध्यक्ष, उ प्र बिजली कर्मचारी संघ ने लिखा है कि, कामरेड हरीश तिवारी के पूरे परिवार का जीवन निर्वाह उनकी आदर्श पत्नी प्रेमा जी की आय पर ही निर्भर था। 

उसी पुस्तक के पृष्ठ 452 -453 पर कामरेड प्रेमलता तिवारी का एक आत्म - कथ्य भी प्रकाशित है जिसकी स्कैन कापी प्रस्तुत है ( इसे डबल क्लिक करके साफ पढ़ सकते हैं ) :


कामरेड हरीश तिवारी व कामरेड प्रेमलता तिवारी का पार्टी के प्रति समर्पण व त्याग सराहनीय ही नहीं वरन अनुकरणीय भी है लेकिन प्रदेश पार्टी नेतृत्व का इस ओर ध्यान नहीं है कि वह अपने पूर्वजों का स्मरण कर सके, न ही पार्टी का ध्यान युवा वर्ग को आकर्षित करने की ओर है एक डिफ़ेक्टो कामरेड निर्वाचित डिजूरे कामरेड्स को निर्देशित करते रहते हैं जिस कारण उत्तर प्रदेश में पार्टी का विस्तार संभव ही नहीं है। तभी तो कामरेड हरीश तिवारी का शताब्दी  समारोह उनके पुत्र- पुत्री को यूनियन के सहयोग से आयोजित करना पड़ता है और कामरेड प्रेमलता तिवारी का स्मरण उनकी भांजी को करना पड़ता है। यदि भाकपा को देश में अपनी भूमिका कायम करनी है तो यू पी में इसके नेतृत्व को अपने पूर्वजों  का अनुकरणीय स्मरण प्रस्तुत करना तथा आज के नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित करना होगा न कि, लकीर का फकीर बन कर भाग्य के भरोसे बैठे रहना होगा। यह याद रखना होगा कि सोते हुये शेर के मुंह में हिरण नहीं घुसा करते।

------ विजय राजबली माथुर 

Wednesday, 26 September 2018

राफ़ेल घोटाला : फ्रांस के राष्‍ट्रपति ओलांदे ने खोल दी मोदी-अंबानी पार्टनरशिप की पोल ------ सत्‍यम वर्मा


*हिन्‍दुत्‍ववादी फासिस्‍टों की सत्‍ता के सभी अंगों पर पकड़ और समाज में उनकी जड़ें बहुत मज़बूत हो चुकी हैं।
** सत्‍ता से बाहर हो भी गए तो भी पूरे समाज में उनकी जकड़ बनी रहेगी, और नौकरशाही, न्‍यायपालिका, पुलिस, शिक्षा तंत्र, मीडिया आदि में उनकी घुसपैठ बनी रहेगी। 
*** मज़दूर वर्ग आधारित व्‍यापक फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चा खड़ा करने की कोशिशें और कैडर-आधारित प्रगतिशील सामाजिक आन्‍दोलन खड़ा कर देने की कोशिशें तेज़ करनी होंगी।
Meenakshy Dehlvi
2 6 -09-2018 
राफ़ेल घोटाला - फ्रांस के राष्‍ट्रपति ओलांदे ने खोल दी मोदी-अंबानी पार्टनरशिप की पोल

सत्‍यम वर्मा

राफ़ेल घोटाला भारत ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े घोटालों में से एक है। इससे कहीं कम बड़े मामलों में जापान, कोरिया सहित कई देशों में सरकारें गिर चुकी हैं और प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति को जेल जाना पड़ा है। इस मामले में भ्रष्‍टाचार के इतने सारे साक्ष्‍य पहले ही आ चुके थे कि शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी, और मोदी सरकार द्वारा किए सौदे के समय फ्रांस के राष्‍ट्रपति रहे ओलांदे का बयान आ जाने के बाद तो मोदी सरकार के झूठ को ढंक रही लंगोट की आख़िरी चिन्‍दी भी उड़ गई है। लेकिन गोयबेल्‍स को भी मात देने वाले अंदाज़ में टीवी चैनलों से इसकी चर्चा ग़ायब है, सरकार का कोई छुटभैया कह रहा है कि मामले की ‘’जाँच’’ कराई जाएगी, सरगना चुप साधे हुए है और सारे हंगामे को ढँक देने वाला कोई नया भावनात्‍मक मुद्दा उभारने की योजना बनाने में अपने सिपहसालारों के साथ व्‍यस्‍त है।

विपक्षी बुर्जुआ पार्टियाँ ट्विटर पर व्‍यंग्‍यबाण छोड़ने से आगे बढ़ने की कूवत खो चुकी हैं। न तो उनके पास जुझारू कार्यकर्ता हैं, न ज़मीनी आधार, और न ही भ्रष्‍टाचार के सवाल पर सड़क पर उतरने का नैतिक साहस रह गया है। जिनका एक-एक विधायक तक ख़ुद भ्रष्‍टाचार के कीचड़ में सना हुआ है उनमें इस सवाल पर जुझारू आन्‍दोलन करने का दम कहाँ से आयेगा। माकपा, भाकपा जैसे संशोधनवादी पिलपिले और ठस हो चुके हैं। जिनकी पूँछ पकड़कर ये फ़ासीवाद को हराने (चुनाव में) का हसीन ख्‍वाब देख रहे हैं जब वे ही कुछ नहीं कर पा रहे तो भला ये क्‍या करेंगे। साल में 2-3 बार अपने कार्यकर्ताओं को जुटाकर कुछ आनुष्‍ठानिक हड़ताल व प्रदर्शन कर लेने में ही मगन होते रहते हैं और अपने समर्थकों को संतुष्‍ट होने का मसाला देते रहते हैं। पूरा विपक्ष और तमाम बुर्जुआ लिबरल और बहुतेरे वाम समर्थक बुद्धिजीवी भी इस मामले में ‘’जनता पर भरोसा’’ करके बैठा हुआ है कि पिछले साढ़े चार साल की बदहाली से तंग जनता ख़ुद ही फ़ासिस्‍टों के इस गिरोह को चुनाव में हराकर बाहर कर देगी और सत्‍ता का फल टप से उनकी झोली में आ गिरेगा।
अव्‍वलन तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है, फ़ासिस्‍ट चुनाव के पहले क्‍या गुल खिला सकते हैं कोई नहीं जानता। सत्‍ता में आने के बाद, फ़ासिस्‍ट दुनिया में कहीं भी आसानी से सत्‍ता छोड़ते नहीं हैं, और अब किसी को इस बात में तो संदेह नहीं रह जाना चाहिए कि हिन्‍दुत्‍ववादी फासिस्‍टों की सत्‍ता के सभी अंगों पर पकड़ और समाज में उनकी जड़ें बहुत मज़बूत हो चुकी हैं। दूसरे, अगर किसी करामात से वे चुनाव में सत्‍ता से बाहर हो भी गए तो भी पूरे समाज में उनकी जकड़ बनी रहेगी, और नौकरशाही, न्‍यायपालिका, पुलिस, शिक्षा तंत्र, मीडिया आदि में उनकी घुसपैठ बनी रहेगी। जो भी नई सरकार आएगी वह इन्‍हीं आर्थिक नीतियों को लागू करेगी और उससे पैदा होने वाले असन्‍तोष की आग पर अपनी रोटियाँ सेंकने में फासिस्‍ट फिर से जुट जायेंगे। इसलिए फासीवाद के ख़ि‍लाफ़ लड़ाई लम्‍बी है, किसी खु़शफ़हमी में रहना घातक है, मज़दूर वर्ग आधारित व्‍यापक फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चा खड़ा करने की कोशिशें और कैडर-आधारित प्रगतिशील सामाजिक आन्‍दोलन खड़ा कर देने की कोशिशें तेज़ करनी होंगी। कोई भी शॉर्टकट शॉर्ट समय के लिए थोड़ी राहत भले ही दे दे, बदले में नासूर को और गहरा ही कर जाएगा।
https://www.facebook.com/meenakshy.dehlvi/posts/1843310305757949?__xts__%5B0%5D=68.ARBIR_yTjuCJF0lFvYFJ8EKYzr6lysJjESlsLgX2jJqhbNcJ2psIkXG4-deUXTNNUnlxNM0PKN5LlIwSh-yFJR1EXv-kyNFGs4Szp1bj1AToeI9pUn0sAXjyadVtbvC_QauxhJgZLcTc19KJvvSZqe9OeHjSvmZSO-XlLGfToBV3IifcYoMfFg&__tn__=-R