Wednesday, 6 January 2016

बर्धन: एक ईमानदार पुरोधा श्रद्धांजलि ------ अतुल अंजान


 दलितों, आदिवासियों मजदूरों, अंतराराष्ट्रीय राजनैतिक परिस्थितियों और आर्थिक विषयों पर कॉमरेड बर्धन की पकड़ थी और इन विषयों पर उन्होंने लगभग 20 किताबें लिखीं। मार्क्‍सवाद और विवेकानंद के दर्शन पर उनकी लिखी किताब आध्यात्मिक तर्कशास्त्रियों के बीच चर्चित रही। मंडल-कमंडल के विवाद में वो मंडल कमीशन की सिफारिशों के बड़े समर्थक थे। उन्होंने मंदिर-मस्जिद विवाद में, संप्रदायवादियों से विशेषकर संघ परिवार और भाजपा से वैचारिक स्तर पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया, आंदोलन किया और सन 2003 में देश में भाजपा की सरकार के खिलाफ ‘‘बचाओ भारत-बनाओ भारत’ को लेकर भाकपा का राष्ट्रीय अभियान चलाया, जिसमें लेखक ने भी (मणिपुर से दिल्ली) चार हजार किमी की यात्रा की। नाइंसाफी के खिलाफ एक बुलंद आवाज थे साथी बर्धन। आप हमेशा अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों के दिलों में रहेंगे। आपको भावभीनी श्रद्धांजलि।---- अतुल अंजान


बर्धन: एक ईमानदार पुरोधा 
श्रद्धांजलि
अतुल अंजान
भारत की आजादी की लड़ाई से जुड़ी हुई विभूतियां एक-एक कर हमसे विदा हो रही हैं। सिर्फ वो हमारे बीच से ही नहीं जा रहे बल्कि संघर्षो की, कुर्बानियों की एक पूरी गाथा हमारी आंखों के सामने से इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है। 2016 के आगमन के साथ ही 2 जनवरी को महान वामपंथी नेता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव कॉमरेड ए बी बर्धन 27 दिनों तक जीवन से संघर्ष करते हुए दिल्ली के सरकारी जीबी पंत अस्पताल में (किसी र्नसंिग होम में नहीं) अपने जीवन की अंतिम सांसें साढ़े आठ बजे रात में लेकर कुर्सी की राजनीति से दूर, कुर्बानी का पाठ पढ़ाकर चले गए।उनका चले जाना इरादों के साथ, ईमानदारी का संग लेकर राजनीति करने वाले लोगों की जमात के एक पुरोधा का चले जाना है। 92 वर्षीय एबी बर्धन ने साठ वर्षो से अधिक के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में, विभिन्न क्षेत्रों में बेदाग छवि के साथ मजदूरों, किसानों, अधनंगे भूखों और बुनकरों की लड़ाई लड़कर अपनी जानदार आवाज से उनके संघर्षो को नई धार दी। बर्धन जिन्हें महाराष्ट्र के लोग साथी बर्धन-भाई बर्धन के नाम से पुकारते थे, का जन्म 25 सितम्बर 1925 को हुआ था। कामरेड बर्धन ने एम ए (अर्थशास्त्र) और वकालत की उच्च शिक्षा हासिल की। बीस वर्ष की अवस्था में वे नागपुर विश्विद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने उस समय के प्रमुख कांग्रेसी छात्रनेता-जो बाद में केंद्रीय मंत्री बने-स्वर्गीय बसंत साठे को पराजित किया था। छात्रसंघ अध्यक्ष बनने से पूर्व वह ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य बन चुके थे और बाद में उसके राष्ट्रीय सचिव चुने गए। बर्धन प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य ब्रिटिश काल में बने। पार्टी के होलटाइमर बनकर वो घर-बार छोड़कर पार्टी के विस्तार में नागपुर संभाग में जुट गए। उनका विशेष ध्यान मजदूर वर्ग की दुर्दशा पर था, इसीलिए वो मजदूरों को संभठित करने के लिए उनके ट्रेड यूनियनों को संगठित करने में जुट गए। बिजली कर्मचारियों, रेल मजदूरों, कपड़ा मिलों के मजदूरों, डिफेंस मजदूरों, समाचार पत्रों के प्रेस कर्मचारियों, इंजीनियर कर्मचारियों को संगठित करने में अपनी पूरी शक्ति लगाई। उन्होंने भारत के बुनकरों के शोषण को देखकर विशेष रूप से इस उद्योग में लगे विशाल अल्पसंख्यकों की संख्या और उन्हें नारकीय जीवन से निकालने के लिए राष्ट्र स्तर पर उनका संगठन तैयार किया, फलस्वरूप बुनकरों को उनके उत्पादित माल का संरक्षण और सरकारी बाजार मिल सका। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में हिस्सा लिया और करीब साढ़े चार साल जेल में बिताए। कॉमरेड बर्धन का नाम अत्यंत साहित्यिक नाम है- अध्रेदु भूषण बर्धन। वो उच्च मध्य परिवार में पैदा हुए थे। सिलहट (वर्तमान बांग्लादेश) में उनकी पैदाइश है। उनके पिता रेलवे में बड़े अधिकारी थे और रेल की सेवा के तहत वो नागपुर में ही बस गए थे। फलत: बर्धन का भी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकलाप का क्षेत्र नागपुर बन गया। लंबे दौर तक रायपुर-नागपुर मध्य भारत प्रदेश का बहुत बड़ा केंद्र था। दरअसल बर्धन का विशेष गुण यह था कि वो मार्क्‍सवादी दर्शन और वैज्ञानिक समाजवाद के उद्भट ज्ञाता थे। अर्थशास्त्र की शिक्षा और उनकी कुशाग्र बुद्धिता ने जटिल मार्क्‍सवादी दर्शन के विचारों को गहरी पकड़ के साथ समझने और औरों को समझाने की विलक्षण प्रतिभा विकासित की। श्रमिक आंदोलन में उनकी गहरी रुचि और योगदान दिन-रात उनकी पैरवी करते हुए मालिकों और अधिकारियों के सामने वैज्ञानिक तर्क रखकर मजदूरों के हितों के लिए कुछ हासिल करने का उनका अंदाज मजदूरों को हमेशा अच्छा लगता था, इसीलिए वह उनके प्रिय नेता बन गए। जीवनपर्यत वो महाराष्ट्र के बिजली कर्मचारियों के निद्र्वद्व नेता बने रहे। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी वकर्स फेडरेशन के पचास साल से भी अधिक वर्षो तक अध्यक्ष या महामंत्री चुने जाते रहे।वर्तमान में विभिन्न राज्यों के बिजली कर्मचारियों के राष्ट्रीय संगठन ऑल इंडिया इलेक्ट्रिसिटी इंप्लायर्स फेडरेशन के अध्यक्ष रहे। वो बीसियों वर्ष से ऑल इंडिया डिफेंस फेडरेशन (जो डिफेंस कर्मियों का एक मात्र संगठन है) के उपाध्यक्ष रहे। 1968 में कॉमरेड बर्धन भाकपा के शीर्षस्थ नीति निर्माता समिति-राष्ट्रीय परिषद-के सदस्य चुने गए और फिर 1978 में वो केंद्रीय कार्यसमिति के सदस्य चुने गए। वैचारिक प्रश्नों पर एवं मजदूरों में काम करने, पार्टी की राजनीतिक कार्यनीति के संबंध में भाकपा के एवं देश की कम्युनिस्ट और मजदूर आंदोलन के शीर्ष नेता कामरेड श्रीपाद अमृत डांगे से उनके गहरे मतभेद भी हुए। जो लोग ये कहते हैं कि भाकपा के संगठन में जनवाद नहीं है और वहां तानाशाही चलती है, उनके लिए यही जवाब है। आंख खोलकर देखने की बात है कि कॉमरेड डांगे से मतभेद के बाद भी कॉमरेड बर्धन संगठन में अपनी जगह बनाते रहे।जन आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए साथी बर्धन 1957 में नागपुर शहर से विधानसभा का चुनाव जीते और पांच सालों तक महाराष्ट्र विधानसभा में मजदूरों, कपड़ा मजदूरों, बुनकरों, कपास-मूंगफली-तिलहन पैदा करने वाले किसानों के सवालों को बड़े शानदार तरीके से उठाकर, तर्क के साथ इस समाज की समस्याओं को राजनैतिक और आर्थिक सुधार के एजेंडे में शामिल कर देते थे। 1994 में जब भारत के संसदीय जीवन के सर्वोच्च सांसद एवं ट्रेड यूनियन नेता स्व. कॉमरेड इंद्रजीत गुप्ता भाकपा के महासचिव बने तो देश के सबसे पुराने ट्रेड यूनियन-ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस-के महासचिव के पद पर साथी बर्धन को चुना गया। बाद में कॉमरेड गुप्ता ने 1996 में श्री देवेगौड़ा की सरकार में देश के गृहमंत्री बने तो कॉमरेड बर्धन को भाकपा राष्ट्रीय परिषद ने पार्टी का महासचिव चुना और इस पद को वह सन 2012 तक सुशोभित करते रहे। साथी बर्धन हिंदी, अंग्रेजी और मराठी भाषा के जानकार थे और इन तीनों भाषाओं में विशिष्ट वक्ता भी थे। बोलचाल में वो बांग्ला भाषा भी बहुत साफबोलते और पढ़ते थे। दलितों, आदिवासियों मजदूरों, अंतराराष्ट्रीय राजनैतिक परिस्थितियों और आर्थिक विषयों पर कॉमरेड बर्धन की पकड़ थी और इन विषयों पर उन्होंने लगभग 20 किताबें लिखीं। मार्क्‍सवाद और विवेकानंद के दर्शन पर उनकी लिखी किताब आध्यात्मिक तर्कशास्त्रियों के बीच चर्चित रही। मंडल-कमंडल के विवाद में वो मंडल कमीशन की सिफारिशों के बड़े समर्थक थे। उन्होंने मंदिर-मस्जिद विवाद में, संप्रदायवादियों से विशेषकर संघ परिवार और भाजपा से वैचारिक स्तर पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया, आंदोलन किया और सन 2003 में देश में भाजपा की सरकार के खिलाफ ‘‘बचाओ भारत-बनाओ भारत’ को लेकर भाकपा का राष्ट्रीय अभियान चलाया, जिसमें लेखक ने भी (मणिपुर से दिल्ली) चार हजार किमी की यात्रा की। नाइंसाफी के खिलाफ एक बुलंद आवाज थे साथी बर्धन। आप हमेशा अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों के दिलों में रहेंगे। आपको भावभीनी श्रद्धांजलि।


https://www.facebook.com/atul.anjaan.9/posts/10201218870709679



साथ चलना ही आगे का रास्ता तय करेगा : कॉमरेड बर्धन ------ Hridayesh Joshi


‘अरे भाई ये दाल इतनी पतली है। कोई खा सकता है क्या इसे!’ किचन में बैठे बुज़ुर्ग ने रसोइये से शिकायत की।
‘जितने पैसे आप हमें देते हो उतने में ऐसा ही खाना बन सकता है।’ रसोइये ने पलट कर जवाब दिया।
कुछ देर तक बुज़ुर्ग उसे देखता रहा फिर चुपचाप वही खाना खाने लगा। चुपचाप।.............................
एक साधारण सा रसोइया भी किसी राष्ट्रीय पार्टी के मुखिया को इस तरह झिड़क सकता है......................बर्धन दादा मुस्कुराये और पास में पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठ गये। उन्होंने कहा कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आदमी पार्टी में राजनीति में कहां पहुंच गया है। सादगी को कभी नहीं छोड़ना चाहिये’। बर्धन के साथ लंबे वक्त तक पार्टी में काम कर चुकी नेता अमरजीत कौर कहती हैं।................................वह जाने जाते थे तो फक्कड़ अंदाज़ में सच बोलने के लिये। उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि उनके बयान अपने ही साथियों को नाराज़ कर सकते हैं।


 


जीवन में सादगी और आक्रामक राजनीति का मेल

Hridayesh Joshi : रविवार जनवरी 3, 2016 08:01 PM IST 











‘अरे भाई ये दाल इतनी पतली है। कोई खा सकता है क्या इसे!’ किचन में बैठे बुज़ुर्ग ने रसोइये से शिकायत की।

‘जितने पैसे आप हमें देते हो उतने में ऐसा ही खाना बन सकता है।’ रसोइये ने पलट कर जवाब दिया।

कुछ देर तक बुज़ुर्ग उसे देखता रहा फिर चुपचाप वही खाना खाने लगा। चुपचाप।

ये 2004 में गर्मी की एक उमस भरी दोपहर थी और मैं उस बुज़ुर्ग के साथ किचन में बैठा इंतज़ार कर रहा था कि ये नेता अपना खाना खत्म करे तो मैं साउंड बाइट लूं, अपनी टीवी की स्टोरी के लिये। उस दिन मुझे भरोसा नहीं हो रहा था कि एक साधारण सा रसोइया भी किसी राष्ट्रीय पार्टी के मुखिया को इस तरह झिड़क सकता है। वह बुज़ुर्ग वामपंथ के सबसे धाकड़ नेताओं में एक और सीपीआई के महासचिव ए बी बर्धन थे। नियमों के हिसाब से कॉमरेड बर्धन को दिल्ली के शानदार लुटियंस ज़ोन में बंगला दिया गया था, लेकिन वो खुद उसमें कभी नहीं रहे। ये जगह उन्होंने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के लिये छोड़ दी थी। बर्धन आखिरी दिनों तक पार्टी दफ्तर में ही एक छोटे से कमरे में रहे।

शनिवार को लंबी बीमारी के बाद ए बी बर्धन की दिल्ली के जी बी पंत अस्पताल में मृत्यु हो गई। जो लोग उन्हें करीब से जानते हैं वो आपको बतायेंगे कि उनकी राजनीति जितनी आक्रामक थी वह उतना ही सादगी भरा जीवन जीते थे। कट्टर कम्युनिस्ट नेता अक्सर टीवी पत्रकारों के उकसाऊ सवाल पूछने पर भड़क जाते थे। उन्हें नहीं पता था कि ये रिपोर्टर अक्सर उनसे बात करने इसीलिये आया करते क्योंकि उनका गुस्सैल बयान दिल से निकलता था और टीवी स्टोरी को हिट बना देता था, लेकिन पत्रकारों के उनके ‘मूर्खतापूर्ण’ सवालों के लिये फटकारने के बाद बर्धन का गुस्सा भी तुरंत उतर जाता था।

 ‘एक बार हम एक चुनाव प्रचार के लिये एक दूरदराज़ के गांव में थे। कॉमरेड बर्धन चाहते थे कि सड़क के किनारे एक ढाबे पर चाय पी जाये। एक साथी ने कहा कि दादा आप हमारी पार्टी के महासचिव हो। यहां आपको बिठाने के लिये कुर्सी तक नहीं है। कहीं दूसरी ठीकठाक सी जगह पर चाय पीते हैं। इस पर बर्धन दादा मुस्कुराये और पास में पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठ गये। उन्होंने कहा कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आदमी पार्टी में राजनीति में कहां पहुंच गया है। सादगी को कभी नहीं छोड़ना चाहिये’। बर्धन के साथ लंबे वक्त तक पार्टी में काम कर चुकी नेता अमरजीत कौर कहती हैं।

बर्धन के साथ एक युग का अंत हो गया है। वह अपनी पीढ़ी के शायद आखिरी नेता थे। वामपंथ के धाकड़ नेताओं हरिकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु, भूपेश गुप्ता, इंद्रजीत गुप्ता, गीता मुकर्जी और अनिल विश्वास के बाद अब बर्धन भी जा चुके हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिन महाराष्ट्र में बिताये और उनका जीवन ग्रामीण भारत के लिये काम कर रहे सुदाम देशमुख जैसे नेताओं से प्रभावित रहा। वह अपनी पीढ़ी के साथियों के सहयोगी होने के बाद भी कुछ बातों में बिल्कुल अलग थे। न तो वह सुरजीत की तरह राजनीति के चाणक्य कहे जाते और न ज्योति बसु की तरह प्रशासनिक कुशलता का तमगा उनके पास था। वह जाने जाते थे तो फक्कड़ अंदाज़ में सच बोलने के लिये। उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि उनके बयान अपने ही साथियों को नाराज़ कर सकते हैं।

 


2004 के लोकसभा चुनावों में लेफ्ट फ्रंट ने करीब पांच दर्जन सीटें जीत लीं। ये वामपंथियों के लिये एतिहासिक जीत थी। फिर 2006 में केरल में जीत के साथ लेफ्ट को बंगाल में लगातार सातवीं बार एतिहासिक जीत मिली। वामपंथी राजनीतिक परिदृश्य में मज़बूती से टिके थे। अचानक 2007 में नंदीग्राम और फिर सिंगूर में भड़की हिंसा के बाद ‘किसान विरोधी नीतियों’ के कारण लाल झंडे वालों का सिंहासन डोलने लगा। ऐसे में बर्धन अपने कॉमरेड्स को बेबाकी से चेतावनी देने वाले पहले नेताओं में थे। इसी दौर में बर्धन ने अमेरिका के साथ हो रहे परमाणु करार के खिलाफ यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने की ज़ोरदार वकालत की। यूपीए की पूंजीवादी नीतियों से वह खफा थे ही औऱ सबसे पहले उन्होंने ही इस बात को कहा कि इस सरकार के साथ हमारा हनीमून खत्म हो चुका है। वह ममता बनर्जी की राजनीति से लड़ने में बुद्धदेव भट्टाचार्जी के तौर तरीकों और भाषा से खुश नहीं थे। जब 2009 में लेफ्ट को लोकसभा चुनावों में करारी हार मिली तो बर्धन ने एक इंटरव्यू में मुझसे कहा कि 2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भट्टाचार्जी को सीएम के पद से हटाया जाना चाहिये।

‘बर्धन दादा को किसी तरह का घमंड या घमंडी भाषा पसंद नहीं है... अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भी नहीं।’ सीपीआई के एक नेता ने उस वक्त मुझसे कहा जब बंगाल में वामपंथियों और ममता बनर्जी के बीच घमासान चल रहा था। सीपीआई के नेता बर्धन कुछ बहुत विवादित फैसलों के लिये भी याद रखे जायेंगे, जैसे उन्होंने 2005 के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव की आरजेडी के साथ गठबंधन किया, जबकि सीपीएम लालू की छवि को लेकर नाराज़ थी और उसने अलग लड़ने का फैसला किया।

इसके बावजूद ए बी बर्धन वामपंथी एकता के सबसे मुखर समर्थक रहे। अक्सर सीपीएम-सीपीआई के एकजुट होने की बात होती रही है। बर्धन खुलकर कहते कि दोनों पार्टियों में ऐसे नेता हैं जो नहीं चाहते कि सीपीएम और सीपीआई का विलय हो, लेकिन साथ चलना ही आगे का रास्ता तय करेगा।

आज जब लेफ्ट फ्रंट संसद में कमज़ोर है और सड़क पर उसकी आवाज़ कम सुनी जा रही है, उन लोगों के लिये कॉमरेड बर्धन के ये शब्द रास्ता दिखा सकते हैं जो वामपंथी राजनीति को प्रासंगिक बनाये रखना चाहते हैं।


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http://khabar.ndtv.com/news/blogs/blog-on-veteran-cpi-leader-ab-bardhan-1261710 


Tuesday, 5 January 2016

कम्‍युनिस्‍ट कार्यकर्ता का जीवन हर श्रेणी के आदमी से कहीं ज्‍यादा बड़ा होता है ------ अभिषेक श्रीवास्तव

Abhishek Srivastava
05-01-2016  New Delhi ·
बचपन में मैं तीन तरह के संगियों से घिरा था। पहले मेरे जैसे थे- तकरीबन सभी सवर्ण, निम्‍न-मध्‍यवर्गीय और कस्‍बाई- जो स्‍कूली पढ़ाई को आजीविका की सीढ़ी मानते थे। इनमें से अधिकतर आज नौकरीपेशा हैं। दूसरे किस्‍म के संगी मिश्रित जातियों से थे, पढ़ाई उनके लिए बोझ थी। इनमें से अधिकतर डिप्‍लोमा या तकनीकी प्रशिक्षण लेकर छोटे-मोटे कारोबारों में घुस गए। तीसरे थे यादव और मुसहर। ये सब सवेरे नियम से दौड़ते थे। इनमें अधिकतर फौजी हो गए। अब फर्ज कीजिए कि तीनों श्रेणियों में पहला मैं यानी पत्रकार कोई खबर करते हुए मारा जाऊं। दूसरा यानी मेरा बिजली मिस्‍त्री दोस्‍त ट्रांसफॉर्मर से जलकर मर जाए। तीसरा यानी मेरा फौजी दोस्‍त पठानकोट जैसे किसी कांड में मारा जाए। तीनों नौकरी के दौरान मारे गए हैं। तीनों परिवार चलाने के लिए अपना-अपना काम कर रहे थे।
चौथा उदाहरण लीजिए कॉमरेड ए.बी. बर्द्धन का। वे आजीवन कम्‍युनिस्‍ट रहे। ईमानदार रहे। सादा जीवन बिताए। अजय भवन में रहे। हमेशा दूसरे दरजे से चले। लोगों को शिक्षित करते रहे। चले गए। समाज में योगदान और निजी ईमानदारी को कसौटी रखें, तो एक अदद कम्‍युनिस्‍ट कार्यकर्ता का जीवन हर श्रेणी के आदमी से कहीं ज्‍यादा बड़ा होता है। वह संपत्ति नहीं बनाता, परिवार को सेटल नहीं करवाता, महत्‍वाकांक्षा नहीं पालता, लोगों के बीच लगा रहता है और एक दिन मर जाता है। आज अजय भवन के सामने से गुज़रने वाला आम आदमी ठहर कर देख भी नहीं रहा था कि वहां क्‍या हो रहा है जबकि नौकरी पर मारे गए फौजी को सब बराबर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। कामरेड बर्द्धन को सिर्फ वे ही श्रद्धांजलि दे रहे हैं जो उन्‍हें जानते हैं। ऐसा क्‍यों है? आखिर फौजी को ही शहीद क्‍यों कहा जाए? पूरा राष्‍ट्र उस पर आंसू क्‍यों बहाए? बाकी लोग उससे क्‍यों अलग हैं? कामरेड बर्द्धन सिर्फ कम्‍युनिस्‍टों के शहीद क्‍यों हों? उन्‍हें तो समाज का शहीद होना चाहिए था।
ये शहीद वाले कंसेप्‍ट में भारी दिक्‍कत है। इस व्‍यवस्‍था में जिंदगी की जद्दोजेहद करने वाला हर आदमी या तो शहीद है या फिर कोई नहीं। मौत को मौत की तरह सहज रूप से लें, तो लफड़ा ही न हो। दिक्‍कत है कि मौत में भी हम लोगों ने हाइरार्की बना दी है। पायदान बना दिया है। यहां नागरिकों की जिंदगी को 'राष्‍ट्रीय सुरक्षा' कर रहे फौजियों के अधीन बताकर अंडरएस्टिमेट किया जाता है और फौजियों की मौत को सबके मुकाबले ओवरएस्टिमेट किया जाता है। यानी जिंदगी और मौत के महत्‍व का पैमाना इस देश में फौज है। जिंदगी और मौत की अहमियत यहां फौज में होने से तय हो रही है। भारत को MILITARY STATE कहने में फिर क्‍या दिक्‍कत है? कोई शक?

Monday, 4 January 2016

वे कतार में सबसे अंत में खड़े थे : गंभीर आवाज़ में बोले -इतना बीमार भी नहीं हूँ कामरेड कि, ...........स्मरण का .ए बी बर्द्धन

***स्मरण का .ए बी बर्द्धन ***

कामरेड बर्धन को सभी दलों के नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

नई दिल्लीए एजेंसी First Published:04-01-2016 06:23:31 PMLast Updated:04-01-2016 06:23:31 PM

 

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 *** लेकिन जहां कामरेड बर्द्धन को इतना सम्मान साथियों व जनता की ओर से मिल रहा है वहीं अश्लीलता समर्थक बाजारवादी/ब्राह्मण वादी  वामपंथियों के प्रतिनिधि द्वारा (जो एक लम्बे समय तक वरिष्ठ नेताओं के विरुद्ध घृणित अभियान चलाने के कारण अब निष्कासित है ) आदरणीय बर्द्धन जी के दिवंगत होने के बावजूद उनके विरुद्ध निंदनीय टिप्पणियाँ की जा रही हैं जिनकी जितनी भर्तस्ना की जाये कम है। ***

एबी बर्धन: जो थे सब उतार-चढ़ावों के गवाह ------ अतुल अंजान

उनकी संगीत साहित्य में भी विशेष रुचि थी. वे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के गीतों के अलावा पुराने हिंदी फिल्मों के गाने उसी लय में गाते थे. सहगल से लेकर मुकेश तक की आवाज़ में वे गीतों को गाते थे और उसमें डूब जाते थे.

 

एबी बर्धन: जो थे सब उतार-चढ़ावों के गवाह

(अतुल अंजान और अमरजीत कौर से बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह की बातचीत पर आधारित)  

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई ) के पूर्व महासचिव अर्धेन्दु भूषण बर्धन ने शनिवार को दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में आख़िरी सांस ली.

उन्हें पिछले महीने पक्षाघात होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव अतुल अंजान ने बीबीसी को बताया कि एबी बर्धन ने कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम उतार चढ़ावों को देखा था क्योंकि वे उस वक्त से पार्टी में सक्रिय थे जब भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन नहीं हुआ था.
अपने छात्र जीवन में बर्धन ने भारत की आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया था. बर्धन चालीस के दशक में ही छात्र आंदोलन से जुड़ गए थे और उन्होंने ऑल इंडिया स्टुडे्ंट्स फ़ेडेरेशन के एक सक्रिय छात्र नेता के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था.

अतुल अंजान के मुताबिक़, बारिसाल में (अब बांग्लादेश में) जन्मे बर्धन के पिता नागपुर में रेलवे अधिकारी थे इसलिए उनका ज़्यादा समय वहीं बीता. उन्होंने 1957 में महाराष्ट्र के नागपुर से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत भी गए.
लेकिन इसके बाद 1967 और 1980 में वे नागपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव में उतरे लेकिन जीत दर्ज नहीं कर सके. इसके बाद वे संगठन की राजनीति में ज़्यादा सक्रिय हो गए.
वे अस्सी के दशक में राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य के तौर पर दिल्ली आए और 90 के दशक में पार्टी के उपमहासचिव बने.
1996 में पार्टी महासचिव इंद्रजीत गुप्ता के केंद्रीय गृह मंत्री बनने के बाद बर्धन ने पार्टी की बागडोर संभाली.
उनके शुरुआती जीवन के बारे में अतुल अंजान ने बताया कि 1941-42 में नागपुर विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति में सक्रिय होने के बाद वे छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे.
छात्र संघ चुनाव में उन्होंने उस वक्त की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के युवा नेता वसंत साठे को हराया जो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे.
छात्र राजनीति के बाद वे महाराष्ट्र में स्टेट बिजली कर्मचारी संगठन से जुड़े, उसके अध्यक्ष बने और मजदूर संगठनों को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई.
फिर बाद में वे ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन (एटक) के नेता भी बने.
अंजान बताते हैं कि वे हिंदी, अंग्रेजी, और मराठी धारा प्रवाह बोलते थे और एक अच्छे और बेबाक वक्ता होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था.
उनकी संगीत साहित्य में भी विशेष रुचि थी. वे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के गीतों के अलावा पुराने हिंदी फिल्मों के गाने उसी लय में गाते थे. सहगल से लेकर मुकेश तक की आवाज़ में वे गीतों को गाते थे और उसमें डूब जाते थे.
उन्होंने कई किताबे लिखीं, जिसमें मजदूर संगठनों का गठन क्यों होना चाहिए, उनके सामाजिक अधिकारों का राजनीतिकरण कैसे होना चाहिए इस पर लिखा है. इनके अलावा उन्होंने जातियो के संघर्ष, दलितों की समस्याओं पर दर्जन भर से ज्यादा किताबें लिखी हैं.
एटक की नेता और सीपीआई की राष्ट्रीय सचिव अमरजीत कौर एबी बर्धन के बारे में कहती हैं, "उन्होंने अपने जीवन में अलग-अलग मोर्चों पर काम किया है लेकिन सबसे बड़ा योगदान उनका देश के मजदूर आंदोलन में था. एक वक्त था जब उन्होंने वकालत की थी उस वक्त भी उन्होंने मजदूरों के मामलों को ही तरजीह दी."
वो बताती हैं, "वे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर बहुत संवेदनशील थे. जब बच्चों पर काम करने वाले देश के बहुत सारे समूहों ने मिलकर बाल श्रम विरोधी मुहिम शुरू की थी तो उन्हें इसके सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया था. वे हमेशा ट्रेड यूनियन को एक जूझारू ताकत बनाने और दूसरे ट्रेड यूनियनों को साथ लेकर चलने में यकीन रखते थे."
वो कहती हैं, "वे भारत के उस पीढ़ी के वामपंथी नेता थे जिस पीढ़ी के चंद ही लोग अब बचे रह गए हैं."

साभार :



 

Sunday, 3 January 2016

कामरेड बर्धन ने खुद को मोमबत्ती की तरह जलाकर अँधेरे के गरूर को तोड़ा है ------ बादल सरोज

कामरेड ए बी बर्धन नहीं रहे।

बादल सरोज
फ़िराक गोरखपुरी से रियायत लेते हुए यह कहने का मन है कि ;
“आने वाली नस्लें तुम से रश्क़ करेंगी हमअसरो 
जब उनको मालूम पडेगा तुमने बर्धन को देखा था “
कामरेड बर्धन भारतीय राजनीति की उस पीढ़ी की ऐसी धारा के – संभवतः आख़िरी – बुजुर्ग थे, जिसने शब्दशः खुद को मोमबत्ती की तरह जलाकर अँधेरे के गरूर को तोड़ा है, उजाले की आमद के प्रति उम्मीद बनाये रखी है। ऐसी विरली शख्सियत – फिर भले वह कितनी भी पकी उम्र में क्यों न जाए- एक बड़ी रिक्ति , महाकाय शून्य पैदा करके जाती है।
बर्धन जिस दिशा के प्रति ताउम्र समर्पित रहे, उस दिशा में कुछ और मजबूत कदम आगे बढ़के ही उन्हें सच्ची श्रद्दांजलि दी जा सकती है।
हम सीपीआई(एम) राज्य समिति की ओर से अपने इस असाधारण नेता को याद करते हुए उन्हें श्रध्दासुमन अर्पित करते हैं और उनके परिजनों तथा साथियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं।
बर्धन साब के व्यक्तित्व में चमत्कारिक सरलता और चुम्बकीय आकर्षण दोनों थे। वे अथक प्रेरक थे। अमोघ वक्ता होना एक गुण है, मगर बोलते समय परिस्थितियों की कठिनता का हवाला देते हुए उनसे बाहर निकल आने का यकीन पैदा करना एक असाधारण योग्यता है। यह एकदम साफ़ समझ और अटूट समर्पण से पैदा होती है।
बर्धन साब के तमाम भाषण आन्दोलनकर्ता (agitator) और प्रचारकर्ता (propagandist) का मेल हुआ करते थे। वे बाँध लेने वाली शैली में बोलते थे किन्तु रिझाने या सहलाने वाली अदा से काम नहीं लेते थे। उनकी स्टाइल कुरेदने और झकझोरने वाली हुआ करती थी। मगर उसमे भी एक निराली निर्मलता होती थी।
वे उन कुछ नेताओं में से एक थे जो कम्युनिस्ट पार्टियों के विभाजन के बाद के दौर के तीखे क्लेशपूर्ण वातावरण के बावजूद दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच मकबूल थे। (राजेन्द्र शर्मा प्रलेस वालों से मिली कुछ आत्मकथाओं में से एक चिटनीस साब की आत्मकथा में बर्धन साब के बारे में लिखी बातों को पढ़कर महसूस हुआ कि उनकी इस स्वीकार्यता ने उन्हें डांगे साब के कुछ अति करीबियों की गुस्सा और आक्रोश तक का शिकार बना दिया था। सही रुख पर कायम रहने की जहमत जोखिम तो होती ही हैं।)
इस अवसर पर कामरेड बर्धन के साथ के दो अनुभव साझे करने के साथ उनके कुछ यादगार शिक्षाप्रद पहलू रखना उचित होगा।
एक :
2 अप्रैल 1995। चंडीगढ़ में हुयी पार्टी की 15 वीं कांग्रेस (महाधिवेशन) की शुरुआत की सुबह।
झंडारोहण की जगह पर विशिष्ट अतिथियों और वेटरन्स (वरिष्ठो) के लिए कोई एक डेढ़ दर्जन कुर्सियां रखी गयी थीं। हम लोग, अनधिकृत ही, इनकी सबसे पहली कतार में अपने दोनों बड़े वरिष्ठों -यमुना प्रसाद शास्त्री और सुधीर मुखर्जी को बिठा आये। सुधीर दादा सीपीआई के देश के प्रमुख और मप्र के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, कुछ ही समय पहले वे सीपीआई (एम) में शामिल हुए थे। (यूं इन दोनों स्थापित नेताओं का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होना, वह भी मध्यप्रदेश में, एक बड़ी और विरल राजनीतिक घटना थी। सुधीर दा के निर्णय के दोनों वाम पार्टियों के बीच अन्योन्यान्य असर भी हुए थे। बहरहाल यहां प्रसंग चंडीगढ़ है ।) जहां हम सुधीर दा को बिठा कर आये थे, थोड़ी ही देर में एकदम उनकी बगल की सीट पर सीपीआई के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव ( जो कामरेड बर्धन थे) आकर बैठ गये। कुछ AB Bardhanही समय पहले अपनी पार्टी छोड़कर जाने वाले कामरेड के एकदम पास बैठना, दोनों ही के लिए, एक असुविधाजनक स्थिति हो सकती थी। मगर, बजाय चिड़चिड़ाने या मुंह मोड़कर बैठने के उन्होंने सुधीर दा का हाथ थामा। बोले, तबियत कैसी है ? सुधीर दा ने कहा ठीक है। वे बोले, “बहुत अच्छे और फ्रेश लग रहे हैं।” इसी के साथ जोड़ा कि “जहां मन अच्छा रहे, वहीँ रहना चाहिए।”
इस वाक्य के बाद दोनों ने इतनी जोर का ठहाका लगाया कि ज्योति बसु, सुरजीत सहित नजदीक बैठे सभी नेता उन दोनों की ओर देखने लगे। ऐसे थे कामरेड ए बी बर्धन।
बर्फ पिघली तो सुधीर दा ने कामरेड शैली को बुलाया और बर्धन साब से परिचय कराते हुए बताया कि ये हैं हमारे यंग सेक्रेटरी। बर्धन साब शैली से बोले : टेक केअर ऑफ़ दिस ओल्ड यंग मैन !!
दो :
10-15 साल पहले कभी गांधी भवन भोपाल ।
ट्रेड यूनियनो का संयुक्त सम्मेलन। हर संयुक्त सम्मेलनों की तरह साझा भी, विभाजित भी। अपने-अपने वक्ता का नाम आने पर सभागार के अलग अलग कोनो से उठती ज़िंदाबाद की पुकारें। बर्धन साब का नाम आते ही जिस हिस्से में एटक का समूह बैठा था वहां से नारे शुरू हुए। जाहिर तौर पर झुंझलाए दिख रहे बर्धन साब ने अपने संगठन के कार्यकर्ताओं को फटकारने के बहाने सभी की जोरदार खिंचाई करते हुए कहा कि इस हॉल में गला फाड़ प्रतियोगिता में जीतने में ताकत खर्च करने की बजाय उसे बाहर मध्यप्रदेश के शहरों गाँवों मे जो करोड़ों मजदूर हैं, उन्हें संगठित करने में खर्च करो। जीत हार का फैसला उसी रणक्षेत्र में होना है। उनके कहे पर फिर नारे उठे, तालियां बजीं। मगर इस बार किसी एक समूह से नहीं, समूचे हॉल से, जिसकी गूँज बाहर तक सुनाई दी।
बर्धन होना एक बहुत मुश्किल काम है। सलाम कामरेड बर्धन।
आपके बाद की पीढ़ी आपके श्रम और कुर्बानी को व्यर्थ नहीं जाने देगी।
साभार :

About The Author

बादल सरोज, लेखक माकपा की मध्य प्रदेश इकाई के सचिव हैं।

सादा जीवन उच्च विचारों के महान बर्द्धन जी को लाल सलाम






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कामरेड ए बी बर्द्धन जी निस्संदेह सादा जीवन और उच्च विचारों के धनी रहे हैं । यों तो अनेकों बार बर्द्धन जी को जन सभाओं में भी सुना है और पार्टी के कार्यक्रमों मे भी जिनसे उनके गहन विचारवान होने का आभास मिलता है। परंतु मैं उन क्षणों का स्मरण करना चाहता हूँ जब कामरेड बर्द्धन जी सुंदर होटल, राजा-की-मंडी स्थित भाकपा, आगरा के ज़िला कार्यालय पर अकेले ही निर्धारित समय से बहुत पहले आ गए थे । मैं तब वहाँ ज़िला कोषाध्यक्ष था और बेंच पर बैठ कर काम कर रहा था उस समय चचे के नाम से प्रसिद्ध कामरेड हफीज़ साहब भी किसी काम से बाहर गए हुये थे , अकेला मैं ही वहाँ था बर्द्धन जी ने दरवाजे पर आते ही ज़ोर से प्रणाम का उद्बोधन किया तब मैंने खड़े होकर उनका अभिवादन किया और बैठने का आग्रह किया। बर्द्धन जी ने बैठने के बाद मुझसे  मेरा नाम, पिताजी का नाम, ज़िले के बारे में साधारण जानकारी भी ली और मुझसे काम करते रहने को कह कर खुद  कामरेड जिलामंत्री के आने तक अखबार पढ़ते रहे।   

उनके सदृश्य अन्य कामरेड्स का आभाव है। उनकी कमी निश्चय ही पार्टी की क्षति है। उनको लाल सलाम , उनका नाम और काम अमर रहेगा।