Sunday, 13 September 2015

जितेंद्र रघुवंशीजी का स्मरण जन्मदिवस 13 सिंतबर पर





IPTA के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव कामरेड जितेंद्र रघुवंशी जी का लिखा  यह नोट शायद फेसबुक पर उनका 
अंतिम नोट है उसे ज्यों का त्यों  ही उनके जन्मदिन पर उनकी स्मृति में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ---
19 -02-2015  ·
आगरा में भाकपा का जिला सम्मलेन:18 फ़रवरी ---
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का २२वां जिला सम्मलेन सदर तहसील के सिरौली ग्राम में संपन्न हुआ.इसे संबोधित करते हुए पार्टी के राज्य सचिव डा.गिरीश ने कहा कि वर्तमान सरकारों से मोहभंग की शुरुआत हो चुकी है और आने वाले दिन जनता से जुड़े सवालों पर व्यापक संघर्ष के होंगे.आज खेती की ज़मीन छिनती जा रही है,रिश्वतखोरी खुले आम जारी है,महंगाई पर कोई अंकुश नहीं और विदेशियों द्वारा देश की लूट की खुली छूट दी जा रही है.भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का अध्यादेश और श्रम-कानूनों में कटौती किसानों-मजदूरों पर हमला है.उन्होंने दुःख प्रकट किया कि प्रदेश में किसानों का बकाया नहीं मिला और कहीं भी कोई सुनवाई नहीं है. ऊपर से सांप्रदायिक विद्वेष फैलाया जा रहा है.डा.गिरीश ने धर्म-जाति से ऊपर उठ कर जनता से एकजुट होने का आह्वान किया.
सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए आर.बी.एस.कालेज के पूर्व प्राचार्य डा.जवाहर सिंह ढाकरे ने कहा कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सवालों पर जागरूकता के साथ स्थानीय समस्याओं पर आन्दोलन चलाने की ज़रुरत है.इस दौर में नए ढंग से काम करना होगा,तभी हम जनहितों के लिए असरदार ढंग से लड़ सकेंगे.पार्टी की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य और पर्यवेक्षक का. गफ्फार अब्बास ने अपने संबोधन में जन-चेतना और जागरूकता के लिए निरंतर सक्रियता पर जोर दिया.संस्कृतिकर्मी डा.जितेन्द्र रघुवंशी ने अंधविश्वास और बाबागीरी से बचने और तर्कसम्मत नजरिया बनाने की बात कही.
सम्मलेन की अध्यक्षता तेजसिंह वर्मा,जगदीश प्रसाद और ओमप्रकाश नौहवार ने संयुक्त रूप से व सञ्चालन वरिष्ठ नेता रमेश मिश्रा ने किया.ताराचंद और हरविलास दीक्षित ने गत तीन वर्षों की राजनीतिक और सांगठनिक रिपोर्ट पेश की.इन्हें स्वीकार करते हुए प्रतिनिधियों ने अपनी सीमाओं को पहचानने,कमियां दूर करने और शिद्दत से काम करने का संकल्प व्यक्त किया.पार्टी का 22 वां राज्य सम्मलेन 28 फ़रवरी से 2 मार्च तक इलाहाबाद में होगा.इसके लिए आगरा से तेजसिंह वर्मा और ओमप्रकाश प्रधान प्रतिनिधि चुने गये.22 वीं राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस 25 से 29 मार्च को पुडुचेरी में आहूत की गयी है.
जिला सम्मेलन में ताराचंद सचिव और एस.के.खोसला कोषाद्यक्ष चुने गये.इनके अलावा जिला काउन्सिल सदस्यों के रूप में रमेश मिश्रा,हरविलास दीक्षित,रमेश गुप्ता,भानुप्रताप सिंह,पी.एस.विप्लवी,ओमप्रकाश प्रधान,तेजसिंह वर्मा,निरोतीलाल कुशवाहा,भीकम सिंह,जगदीश शर्मा,आर.एस.पाल,मोतीराम कुशवाहा,पूरनसिंह यादव,सुधीर कुमार,तारासिंह,जितेन्द्र रघुवंशी,श्रीमती सरला जैन चुनी गयीं.रामस्वरूप दीक्षित,सुमन चौहान,नेमीचंद,जगदीश प्रसाद,भगवत सिंह आमंत्रित सदस्य होंगे.
सम्मलेन की स्थानीय व्यवस्थाएं रामकिशन,तारासिंह,चंद्रपाल,श्रीकिशन,चन्द्रराम ने संभालीं.


***************************************************************************
आगरा में रहने के दौरान जब मैं भाकपा में शामिल हुआ तब से लखनऊ आने तक (1986 से 2009) तक आदरणीय कामरेड जितेंद्र रघुवंशी जी का सानिध्य प्राप्त रहा। इनके माता जी- पिताजी को भी सुनने व उनसे शिक्षा ग्रहण करने के कई अवसर मिले हैं। जितेंद्र जी को सदैव प्रसन्न मुद्रा में मुस्कराते हुये ही पाया है। उनको कोई कार्य कभी कठिन नहीं महसूस होता था। मेरे ज़िला काउंसिल में आने से पूर्व वही मिनट्स लिखते थे परंतु बाद में वह कार्य मुझको दिलवा दिया;जब-जब मैं काउंसिल में हुआ मिनट्स लिखने का कार्य मुझे मिला। पार्टी के बाहर भी जितेंद्र जी को श्रद्धा -सम्मान प्राप्त था। 2008 में एक बार जब मैं अकेले ही (ज़्यादातर जिलामंत्री रमेश मिश्रा जी के साथ गया था ) उनके घर गया तब इत्तिफ़ाक से वह भी अकेले ही एक पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। मेरे लेखन के संबंध में उनका कहना था कि मैं उनको कुछ लेख दूँ तो वह 'प्रगतिशील वसुधा' में प्रकाशित करा देंगे। परंतु मैं वहाँ से लखनऊ शिफ्ट करने की तैयारी में था इसलिए उनको कोई लेख दे न सका। ज्योतिष के संबंध में भी वह व्यक्तिगत रूप से मेरे दृष्टिकोण से सहमत थे किन्तु पार्टीगत दृष्टिकोण से कुछ कहने में उन्होने असमर्थता व्यक्त की थी। विस्तृत चर्चा के लिए उन्होने यूनिवर्सिटी में क्लास टाईम के बाद कक्षा में अकेले बैठ कर बात करने के लिए बुलाया था और जाने पर मुझसे खुल कर बातें की थीं। बाद में स्टाफ रूम में अपने साथी शिक्षकों (जर्मन व फ्रेंच भाषा के ) से परिचय भी कराया था। उन तीनों ने यह माना था कि पंडित चन्दन लाल पाराशर जो ज्योतिष शिक्षा दे रहे थे वह पोंगापंथ को बढ़ाने वाली थी । जबकि मैं उसके विरुद्ध था और जितेंद्र जी सहित उनके दोनों अन्य शिक्षक साथियों को मेरे तर्क उचित लगे थे जबकि जन-साधारण पोंगापंथ में ही उलझ कर अपना बिगाड़ कर लेता है। वह यह तो चाहते थे कि मैं अपने तर्कों का प्रचार करूँ परंतु कैसे इस संबंध में वह कुछ  सलाह नहीं दे सके। आगरा से लखनऊ आने के बाद से उनसे व्यक्तिगत भेंट न हो सकी किन्तु फोन व फेसबुक के माध्यम से उनसे सतत संपर्क बना रहा था। कुछ फोटो चित्र प्रस्तुत हैं :
(विजय राजबली माथुर )


Friday, 11 September 2015

'रक्त रंजित' संघर्ष की संभावनाएं : देश के लिए सुखद नहीं --- विजय राजबली माथुर




इस समाचार के अंतिम अनुच्छेद में प्रोफेसर साहब के लिए लिखा गया है-"शुरू से जनता परिवार की एका व पार्टी विलय के खिलाफ थे। "
बिहार में राजद/ज द यू /कांग्रेस गठबंधन के विरुद्ध भाजपा गठबंधन व वामपंथी गठबंधन चुनाव लड़ेंगे। इसका प्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिलता दीखता है इसीलिए सपा को RJC गठबंधन से अलग रखा गया है। जिससे चुनाव बाद जीतने वाले गठबंधन का हाथ थामने में सुविधा रहे। 
रही बात उत्तर प्रदेश के 2017 के चुनावों की तो वे भी 2012 के विधानसभा व 2014 के लोकसभा चुनावों की तर्ज़ पर 'गुप्त समझौते' के तहत ही लड़े जाएँगे और आर एस एस के गुप्त समर्थन से सत्तारूढ़ उसी प्रकार पुनर्वापिसी करेगा जिस प्रकार 1980 में इंदिरा कांग्रेस ने की थी।
पूर्व पी एम नरसिंघा राव जी ने निजी अनुभवों के आधार पर ही 'THE INSIDER' में लिखा है कि हम "स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं "।
लोकतन्त्र में मतदाता के हाथ में 'मत' है लेकिन उसका प्रयोग सुनिश्चित 'जाति','धर्म','संप्रदाय' के आधार पर ही होना है। वर्तमान केंद्र सरकार व उसकी प्रेरक शक्ति को इसी में सुविधा है कि दिखाने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें रहें लेकिन 'वक्त' पर वे केंद्र की फासिस्ट शक्तियों को 'मजबूत' करती जाएँ।
साम्यवाद और वामपंथ के अनुगामी 'नियंत्रक' इस सच्चाई पर 'गौर' किए बगैर जन समर्थन की आस लगाते हैं जो 'मृग-मरीचिका' सिद्ध होती रही है। जब तक जन-पक्षधर शक्तियाँ 'मनसा-वाचा-कर्मणा' संगठित होकर वंचित तबकों को 'दिल' से अपने साथ नहीं जोड़तीं तब तक ऐसा ही होता रहेगा। साम्य और समानता कागजी रहे और आंतरिक रूप से 'जाति','धर्म','संप्रदाय' की नीति पर ही चला जाये तो कैसे जनता का साथ मिले?
जनता को साम्यवाद/वामपंथ द्वारा अपने साथ न जोड़ पाने की दशा में निकट भविष्य में 'रक्त रंजित' संघर्ष की संभावनाएं बनती हैं जो देश के लिए सुखद नहीं होंगी।



Tuesday, 8 September 2015

: वाम असफल क्यो ? कौन दोषी है ? कहाँ चूक हुई ?,कमजोरियाँ किधर है ? ---विजय राजबली माथुर

07-09-2015 

ढ़ोंगी पोंगापंथी और एथीस्ट एक समान :

वेदों में निहित हैं साम्यवाद के सिद्धान्त :
 जिस प्रकार किसी भी संगठन या संस्था  के निर्माण के पूर्व उसके संचालन के लिए 'नियम' बनाए जाते हैं उसी प्रकार इस धरती के निर्माण के बाद जब 'मननशील प्राणी' = 'मनुष्य' की उत्पत्ति अब से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व  हुई तो इस नई सृष्टि के संचालन हेतु भी कुछ नियमों का निर्धारण किया गया । इन नियमों का संकलन 'वेदों' में है जो  श्रेष्ठ=आर्ष= आर्य  विद्वानों द्वारा संग्रहित किए गए थे। कालांतर में ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों द्वारा जिस हिंसक 'हिन्दू' संप्रदाय/मजहब/रिलीजन को खड़ा किया गया उसने वैदिक ज्ञान-विज्ञान को ध्वस्त करके पौराणिक कपोलकल्पित कहानियों की रचना की जो 'गर्व से हिन्दू' कहलाने वालों का आदर्श बनी हुई हैं। ये पौराणिक हिन्दू वैदिक ज्ञान को परिदृश्य में धकेलने हेतु उनको वेद-सम्मत बताते हैं और एथीस्ट उनके कथन को ब्रह्म-वाक्य मान कर चलते हैं। उपरोक्त फोटो टिप्पणियाँ ऐसे ही दो एथीस्टों द्वारा व्यक्त हैं जो उत्तर-प्रदेश भाकपा के कर्णधार भी हैं । ऐसी ही कारगुजारियों के कारण देश की जनता कम्यूनिज़्म को हिकारत की नज़र से देखती है।

 ये कर्णधार सवर्णवाद/ब्रहमनवाद से भी बुरी तरह से ग्रस्त हैं जिसका ज्वलंत उदाहरण यह टिप्पणी है ;



अभी हाल ही में भाकपा से लखनऊ की दो विधानसभा क्षेत्रों से पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी रहे( एक पिछड़े वर्ग से व दूसरे दलित वर्ग से संबन्धित ) पार्टी छोड़ कर एक ऐसी पार्टी में शामिल हुये हैं जो फासिस्ट संगठन की ही सहायक है। उन दोनों को धनिक होने के कारण पार्टी में शामिल करके प्रत्याशी बनाया गया था लेकिन उनके प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। उनको हारने पर संकेत दे दिया गया था कि अगले चुनावों में उनको प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा अतः गैर-कम्युनिस्ट प्रवृति के वे लोग उखड़ गए। कर्णधारों का यह व्यवहार उपरोक्त टिप्पणियों पर अवलंबित रहा है। 

ढोंगियों को जवाब देने या उनसे जवाब मांगने की क्या ज़रूरत ?:

एथीस्ट वादी भी ढोंगियों-पाखंडियों-आडंबरकारियों की ही तरह 'अधर्म' को धर्म कहते हैं व सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे भी उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ रहे हैं। इसी कारण खुद को उग्र क्रांतिकारी कहने वाले एथीस्टों ने चुनाव बहिष्कार करके अथवा 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थक दलों का विरोध करके केंद्र में सांप्रदायिकता के रुझान वाली सरकार गठित करवा दी है जिसका खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना होगा। 

धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।



अध्यात्म =अध्यन+ आत्मा = अपनी आत्मा का अध्यन। 
देवता= जो देता है और लेता नहीं है ,जैसे-नदी,वृक्ष,पर्वत,आकाश,अन्तरिक्ष,अग्नि,जल,वायु आदि न कि जड़ मूर्तियाँ/चित्र आदि। 

भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी)+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I (अनल-अग्नि )+न (नीर-जल )। 

खुदा = चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी भी प्राणी ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 

GOD = G (जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय )। उत्पत्ति,पालन व संहार करने के कारण ही इनको GOD भी कहते हैं। 
देखिये कैसे?:
वायु +अन्तरिक्ष =  वात 

अग्नि  =पित्त

 भूमि + जल = कफ 

इन तीनों का समन्वय ही शरीर को धारण करता है 

वात +पित्त + कफ =भगवान=खुदा=GOD 

शरीर को धारण करने व समाज को धारण करने हेतु
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। 

क्या महर्षि कार्ल मार्क्स अथवा शहीद भगत सिंह जी ने कहीं कहा है कि साम्यवाद के अनुयाइयों को झूठ बोलना चाहिये,हिंसा ही करनी चाहिए,चोरी करना चाहिए,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा करना चाहिए और अनियंत्रित सेक्स करना चाहिए। यदि इन विद्वानों ने  ऐसा नहीं कहा है तो इनका नाम बदनाम करने के लिए 'एथीस्ट वादी' ही जिम्मेदार हैं। और इसी कारण रूस से भी साम्यवाद उखड़ा है। 

"येभ्यो माता ................................................................आदित्यां अनुमदा स्वस्तये " (ऋग्वेद मंडल १० /सूक्त ६३ में वर्णित इस मन्त्र के भवानी दयाल सन्यासी जी द्वारा किये काव्यानुवाद  पंक्ति:

ऋतू अनुकूल मेंह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे.
सुजला सुफला मातृ भूमि हो,मधुमय क्षीर पिलावे..

अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है. दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है.जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है.

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यग्य रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं.

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न  इन्द्रावरुणा रातहव्या। 
शमिन्द्रासोमा सुविताय शं यो :शं न  इन्द्रा पूष्णा वाजसतौ । ।

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की.

सर्वे भवन्तु सुखिन: ,सर्वे सन्तु निरामय :। 
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुखभाग भवेत॥ 
ऋग्वेद के अंतिम सूक्त के पांचवें इस  श्लोक  का काव्यानुवाद यह है---
सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान । 
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण । । 
हे ईश सब सुखी हों कोई न हो  दुखारी। 
सब हों निरोग भगवन धनधान्य के भण्डारी। । 
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों। 
दुखिया न कोई होवे सृष्टि में प्राणधारी । । 

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव  ही नहीं जीव-निर्जीव सभी सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं। 
यदि हम जनता के समक्ष इन सच्चाईयों को लेकर जाएँ तो जनता हमारा न केवल स्वागत व समर्थन करेगी बल्कि संसद से ढ़ोंगी-साम्राज्यवादी/संप्रदायवादी  लोगों को भी उखाड़ फेंकेगी।





धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।



अध्यात्म =अध्यन+ आत्मा = अपनी आत्मा का अध्यन। 

देवता= जो देता है और लेता नहीं है ,जैसे-नदी,वृक्ष,पर्वत,आकाश,अन्तरिक्ष,अग्नि,जल,वायु आदि न कि जड़ मूर्तियाँ/चित्र आदि। 

भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी)+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I (अनल-अग्नि )+न (नीर-जल )। 

खुदा = चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी भी प्राणी ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 

GOD = G (जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय )। उत्पत्ति,पालन व संहार करने के कारण ही इनको GOD भी कहते हैं। 
देखिये कैसे?:
वायु +अन्तरिक्ष =  वात 
अग्नि  =पित्त
 भूमि + जल = कफ 
इन तीनों का समन्वय ही शरीर को धारण करता है 

वात +पित्त + कफ =भगवान=खुदा=GOD 

शरीर को धारण करने व समाज को धारण करने हेतु
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। 

क्या महर्षि कार्ल मार्क्स अथवा शहीद भगत सिंह जी ने कहीं कहा है कि साम्यवाद के अनुयाइयों को झूठ बोलना चाहिये,हिंसा ही करनी चाहिए,चोरी करना चाहिए,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा करना चाहिए और अनियंत्रित सेक्स करना चाहिए। यदि इन विद्वानों से ऐसा नहीं कहा है तो इनका नाम बदनाम करने के लिए 'एथीस्ट वादी' ही जिम्मेदार हैं। और इसी कारण रूस से भी साम्यवाद उखड़ा है। 

एथीस्ट वादी भी ढोंगियों-पाखंडियों-आडमबरकारियों की ही तरह 'अधर्म' को धर्म कहते हैं व सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे भी उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ रहे हैं। इसी कारण खुद को उग्र क्रांतिकारी कहने वाले एथीस्टों ने चुनाव बहिष्कार करके अथवा 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थक दलों का विरोध करके केंद्र में सांप्रदायिकता के रुझान वाली सरकार गठित करवा दी है जिसका खामियाजा पूरे देश की जनता को भुगतना होगा। 

ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी और एथीस्ट दोनों का ही हित तानाशाही में है दोनों की ही आस्था लोकतन्त्र में नहीं है और दोनों ही परस्पर अन्योनाश्रित हैं । एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही संभव नहीं है। दोनों ही 'सत्य ' उद्घाटित नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि अज्ञान ही उनका संबल है जागरूक जनता को वे दोनों ही उल्टे उस्तरे से मूढ़ नहीं सकेंगे। 
- See more at: http://communistvijai.blogspot.in/2014/08/blog-post_21.html#sthash.3GLNYIxb.dpuf


Sunday, 6 September 2015

जब फासिस्ट तानाशाही का खतरा सिर पर हो तब आपस मे लठठम लठठास ? --- विजय राजबली माथुर


State Council UP CPI को बाजारवादियों से आज़ाद करो। आज़ाद करो।--- Fakhrey Alam


वामपंथ और साम्यवाद के लिए इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उत्तर प्रदेश के बाजारवादी/ब्राह्मणवादी तत्व अपने ही  एक कर्मठ राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अनजान साहब पर जब तब तीखे प्रहार करते रहते हैं। फेसबुक पर एक बड़े पदाधिकारी को मुखौटा बना कर इन तत्वों ने अनर्गल बातें लिखवाई हैं। पहले भी कई-कई बार ये प्रदेश में पार्टी को विभाजित करा चुके हैं ,कर्मठ कार्यकर्ताओं को पार्टी से अलग होने पर मजबूर करते हैं ऐसे ही लोगों से उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल को मुक्त करने की फखरे आलम साहब की अपील पार्टी को मजबूत बनाने के लिए है।  बाजारवादी/ब्राह्मणवादी तत्व यदि इस बार फिर सफल होते हैं तो यह सिर्फ CPI के लिए ही नहीं सम्पूर्ण वामपंथ के विनाश का आगाज होगा। जनता मे आम चर्चा है कि ब्राह्मण वामपंथी फासिस्ट सरकार का समर्थन कर रहे हैं। फासिस्ट सरकार के अश्लील विज्ञापन का विरोध करने पर जिस प्रकार कॉमरेड अतुल अनजान साहब पर  बाजारवादी/ब्राह्मणवादी तत्वों ने  वाक -प्रहार करवाया है उससे तो उस जन-चर्चा को ही बल मिलता है। जब फासिस्ट तानाशाही का खतरा सिर पर हो तब उसका मुक़ाबला करने के बजाए अपने ही कर्मठ नेता पर लांछन लगाना निंदनीय कृत्य है। 
http://communistvijai.blogspot.in/2015/09/blog-post.html
************


उपरोक्त संदर्भित पिछली पोस्ट के बाद फेसबुक पर और ज़्यादा ही ऊताचाल देखने को मिल रहा है जैसा कि इस फोटो से स्पष्ट है।
"Comrade Anjan was defended by AIDWA General Secretary Jagmati Sangwan, who said that he was objecting to the advertisement not to Leone as an individual, “Not only he, we too are offended when the ad is aired on TV, his remarks shouldn’t be taken personally, we demand that the company withdraw the ad because it instigates sexual violence.”   http://www.thenewsminute.com/article/atul-anjans-comment-sunny-leone-shows-left-not-free-gender-bias-insiders-critique-34018"

कुछ इस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है कि कामरेड अतुल अनजान साहब ने कोई भयंकर अपराध किया है जिसकी सजा उनको मिलनी ही चाहिए। यह कोई पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। दो वर्ष पूर्व भी अनजान साहब व बर्द्धन जी के विरुद्ध एक सुनियोजित अभियान चलवाया गया था अतुल जी के दूसरी पार्टी मेंजाने की गलत अफवाह भी उड़ाई गई थी । उसका खंडन उन्होने किया था :


यह एक अलग बात है जिसको मुखौटा बना कर कुत्सित- घृणित अभियान चलवाया गया था उसको पार्टी से केंद्रीय आदेश पर निकाला गया किन्तु वैधानिक प्रक्रिया से नहीं।  इस बार फिर अश्लील विज्ञापन के विरोध में उनके बयान को वीडियो में हेर-फेर करके पेश किया गया है हालांकि उसका भी स्पष्टीकरण उन्होने दे दिया है। उसके बाद भी माले नेत्री ने उन पर गंभीर प्रहार किया है जिस पर फेसबुक में उनको समर्थन भी मिल रहा है। 

उत्तर प्रदेश में बाजारवादी/ब्राह्मण वादी लोग भाकपा पर हावी हैं जो बार-बार अनजान साहब को निशाना बनवाते हैं।टी वी चेनल्स में एक के पुत्र के माध्यम से इंनका प्रभाव है  जिसका इस्तेमाल अनजान साहब के विरुद्ध दुष्प्रचार में किया जाता है। इनके नायक का कहना है कि अनजान साहब को केंद्र में उन्होने भेजा है और प्रदेश सचिव की पीठ पर भी उनका हाथ है। पिछली अफवाह के बाद उन नायक साहब ने अनजान साहब से लगभग आधा घंटे फोन वार्ता द्वारा आश्वासन दिया था कि इस बार वह प्रदेश सचिव बदल देंगे। किन्तु आश्वासन पूरा किया नहीं और जिनको विकल्प के रूप में पेश करने की बात कही थी उनको इस बार के दुष्प्रचार का मुखौटा बना दिया गया। इतने से भी बात नहीं बनी तो माले के संपर्को को आगे किया गया है। 

माले वाली लेखिका या फेसबुक पर कमेन्ट करने वाले अनजान साहब के विरुद्ध चलने वाले दुष्प्रचार की बात से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। उन बाजारवादी/ब्राह्मण वादी लोगों की निगाह '22-क़ैसर बाग' की बिल्डिंग पर लगी हुई है और वे इसके वारे-न्यारे करके मालामाल होना चाहते हैं। उनको लगता है कि 'अनजान' साहब उनके इस काले कारनामे में सबसे बड़ी बाधा हैं। अतः अनजान साहब को पार्टी से अलग कराने हेतु जब-तब अभियान चलवाते रहते हैं। ये तत्व पिछले 21 वर्षों में दो बार प्रदेश में पार्टी को विभाजित करा चुके हैं। इनके नायक की हिदायत है कि SC/OBC वर्ग के कार्यकर्ताओं से काम तो लो लेकिन उनको दायित्व न दो अर्थात पदाधिकारी न बनाओ। इसी वर्ष इन दो वर्गों से संबन्धित विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी रहे दो लोगों को अपने समर्थकों सहित पार्टी छोडने पर मजबूर होना पड़ा है। इन तथ्यों को जाने बगैर अनजान साहब पर प्रहार करने वाले लोग वस्तुतः बाजारवादी/ब्राह्मण वादी लोगों के मंसूबे पूरे कर रहे हैं बल्कि प्रकारान्तर से सत्तरूढ़ फासिस्ट सरकार को मजबूत बनाने में मदद कर रहे हैं। इसी लिए साम्यवाद को समर्पित कार्यकर्ता का कहना है ---
State Council UP CPI को बाजारवादियों से आज़ाद करो। आज़ाद करो।--- Fakhrey Alam
*********************************************************************
फेसबुक कमेंट्स ::


Thursday, 3 September 2015

लम्हे की खता की सजा सदियों मिलती है --- भावेश भारद्वाज








State Council UP CPI को बाजारवादियों से आज़ाद करो। आज़ाद करो।--- Fakhrey Alam

वामपंथ और साम्यवाद के लिए इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उत्तर प्रदेश के बाजारवादी/ब्राह्मणवादी तत्व अपने ही  एक कर्मठ राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अनजान साहब पर जब तब तीखे प्रहार करते रहते हैं। फेसबुक पर एक बड़े पदाधिकारी को मुखौटा बना कर इन तत्वों ने अनर्गल बातें लिखवाई हैं। पहले भी कई-कई बार ये प्रदेश में पार्टी को विभाजित करा चुके हैं ,कर्मठ कार्यकर्ताओं को पार्टी से अलग होने पर मजबूर करते हैं ऐसे ही लोगों से उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल को मुक्त करने की फखरे आलम साहब की अपील पार्टी को मजबूत बनाने के लिए है।  बाजारवादी/ब्राह्मणवादी तत्व यदि इस बार फिर सफल होते हैं तो यह सिर्फ CPI के लिए ही नहीं सम्पूर्ण वामपंथ के विनाश का आगाज होगा। जनता मे आम चर्चा है कि ब्राह्मण वामपंथी फासिस्ट सरकार का समर्थन कर रहे हैं। फासिस्ट सरकार के अश्लील विज्ञापन का विरोध करने पर जिस प्रकार कॉमरेड अतुल अनजान साहब पर  बाजारवादी/ब्राह्मणवादी तत्वों ने  वाक -प्रहार करवाया है उससे तो उस जन-चर्चा को ही बल मिलता है। जब फासिस्ट तानाशाही का खतरा सिर पर हो तब उसका मुक़ाबला करने के बजाए अपने ही कर्मठ नेता पर लांछन लगाना निंदनीय कृत्य है। 


जस्ट इन: कॉमरेड अतुल अनजान दिल्ली पहुंचे, सन्नी लियोन पर मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया!ANI, 3 Sept,2015 11a.m. आज शामिल होंगे सचिव मंडल की बैठक में, अतुल अनजान पिछले दिनों मऊ में जहा उनकी कोशिशो से कॉमरेड झारखंड राय और कॉमरेड जयबहादुर की प्रतिमा का अनावरण राज्य सरकार ने किया, जिसमे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह मौजूद थे और इस उपलक्ष पर कम्युनिस्ट पार्टी के निवेदन पर १०० करोड़ के प्रोजेक्ट मऊ को तोहफे में मिला, सपा मुखिया ने २२ मिनट कॉमरेड अतुल अनजान पर बोला और कहा की इन्हे संसद कब भेजोगे? फिर उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर इशारा करते हुए कहा की कब भेजोगे इन्हे? इस पर मुख्यमंत्री मुस्कराते रहे और कॉमरेड अनजान गंभीर दिखे!कॉमरेड अतुल कुमार अनजान दिल्ली पहुंच कर अपने विवादित बयान पर बात करते हुए एएनआई को कहा"जिन्हे सनी लियोन पर हमले से तकलीफ हुए उनसे माफ़ी मांगता हुँ, महिला अधिकारों के लिए जेल काटी है लाठिया खाई है मेरे बयान को कॉन्डम के इशहर से रेप को मिलता है बढ़ावा यह सरासर छेड़छाड़ है यूपीए ने अश्लील कंडोम पर प्रतिबन्ध लगाये थे लेकिन संस्कृति के रक्षक आजकी सरकार पोर्नस्टार सनी लियोन के इश्तेहार को प्रोमोट कर रही है, क्या मतलब है जिसमे कहा जा रहा है "सुबह से शाम करे और करते जाये की जी ना भरे, उन्होंने सवाल उठाया की क्या इसे परिवार में एक साथ देखा जा सकता है? यह सेक्स की तरफ उकसाता है ना की सूचना जानकारी बढ़ाता है, भारत का इश्तेहार का एड दशक से चलता है जिसमे सूचना का प्रसार है"!
Posted by Tanzeem E Insaaf Delhi on Wednesday, September 2, 2015
************************************************************************
Facebook Comments : 



Saturday, 15 August 2015

'देश की तस्वीर' : एक चर्चा स्वतन्त्रता दिवस पर भाकपा,लखनऊ द्वारा --- विजय राजबली माथुर



 लखनऊ, 15 अगस्त 2015 : आज प्रातः 10,30 पर पार्टी कार्यालय, 22 क़ैसर बाग परिसर में राष्ट्र ध्वज का आरोहण वयोवृद्ध कामरेड मुख्तार साहब के कर कमलों से सम्पन्न हुआ। राष्ट्र गान के पश्चात जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ द्वारा उपस्थित सभी जनों को मिष्ठान्न वितरण किया गया। इसके उपरांत सभागार में एक गोष्ठी 'देश की तस्वीर' विषय पर आयोजित की गई जिसकी अध्यक्षता कामरेड कनहाई राम जी ने व संचालन कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ ने किया।गोष्ठी - सभा के प्रमुख वक्ताओं में सर्व कामरेड मधुकर मदुराम, परमानंद दिवेदी, बाल गोविंद, अमर, राम पाल गौतम, रामदेव तिवारी, मोहम्मद अकरम खान, राम इकबाल उपाध्याय, शकिर, कल्पना पांडे, एननूद्दीन, शिवानी, कांति मिश्रा, आशा मिश्रा, विजय माथुर, मोहम्मद ख़ालिक़ तथा कनहाई राम जी  एवं दो अन्य साथी रहे। 

प्रारम्भ में जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ ने बताया कि झन्डारोहण तो पार्टी कार्यालय में पहले भी होता रहा है किन्तु इस प्रकार की विचार गोष्ठी का आयोजन पहली बार किया जा रहा है और इसका कारण यह है कि हम जनता की इस निर्मूल धारणा को बदलना चाहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी विदेश से प्रेरित है । उन्होने ज़ोर दे कर कहा कि हमारे कार्यकर्ताओं को दृढ़तापूर्वक जनता को समझाना चाहिए कि हम कम्यूनिस्टो ने देश की आज़ादी के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियाँ दी हैं तथा जन सरोकार से जुड़े हर मुद्दे पर आज भी संघर्ष में सबसे आगे रहते हैं। बावजूद इसके अनेकों वक्ताओं ने विषय से हट कर केवल स्थानीय या व्यक्तिगत मुद्दों पर ही चर्चा की। सबसे पहले कामरेड राम इकबाल उपाध्याय ने ध्यान आकृष्ट किया कि कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक एम एन राय एक बड़े क्रांतिकारी भी थे।उनकी बात का समर्थन कांति मिश्रा जी ने भी किया और आशा मिश्रा जी ने तो विषय की विशद चर्चा करते हुये तमाम क्रांतिकारियों का नामोल्लेख करते हुये बताया कि उनका संबंध कम्युनिस्ट पार्टी से रहा है । इसी क्रम में  कुछ साहित्यकारों की भूमिका की चर्चा करते हुये उनको भी कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध बताया। उनका कहना था कि आज़ादी से पहले और आज भी कम्युनिस्टो का मुख्य संघर्ष सांप्रदायिक शक्तियों से रहा है। हम लोगों के कमजोर पड़ने से आज सांप्रदायिक शक्तियाँ सत्ता में हैं उन्होने आह्वान किया कि हमें एक जुट होकर उनको उखाड़ फेंकना होगा। 
विशेष उल्लेखनीय वक्तव्य युवा कामरेड शिवानी का रहा जो अपने पिता मधुकर मदुराम की तुलना में भी श्रेष्ठ बोलीं और जिलमंत्री महोदय को टिप्पणी करनी पड़ी कि बच्चा होकर 'दादी' की तरह बोली। मज़ाक-मज़ाक में जब आशा मिश्रा जी ने कहा कि आप 'दादी' शब्द को वापिस लें तो उनका कहना था कि यह शब्द इसलिए वापिस नहीं लिया जा सकता क्योंकि उनकी ओर से यह आशीर्वाद है  क्योंकि शिवानी ने पूरी परिक्वता का परिचय दिया है जबकि पुराने लोग भी उतना ध्यान नहीं दे पाते हैं । उन्होने नए लोगों से उम्मीद की कि वे शिवानी से प्रेरणा लेंगे। शिवानी के वक्तव्य में खास ज़ोर  इस बात पर था कि हमारे पूर्वजों ने जो कुर्बानी दी थी उसी का नतीजा है कि हम आज आज़ाद हैं और पूरी स्वतन्त्रता से अपनी बात रख पा रहे हैं। अतः आज़ादी को आधा-अधूरा न कह कर उसकी रक्षा की ओर सन्नद्ध होना चाहिए। पार्टी को कैसे मजबूत किया जाये इस विषय पर भी शिवानी ने अपनी बेबाक राय रखी। उनका खास तौर पर  कहना था हमें जनता के बीच जाकर उसकी बात सुनना चाहिए। 
कामरेड ख़ालिक़ ने अपनी इस टिप्पणी के साथ कि अब तक सबकी राय को लेखनीबद्ध कर रहे विजय माथुर को अब हम सुनना चाहते हैं बोलने को कहा। जबकि सुनने के उपरांत उनकी टिप्पणी थी कि बड़ी समझदारी के साथ विजय माथुर ने उत्तेजित कर दिया है हो सकता है उनका अंदाज़ सही हो कि जब हम सब विफल हो जाएँ तो युवा वर्ग क्रांति का मार्ग अपना ले और आगे बढ़ जाये। 
विजय माथुर ने अपनी बात की शुरुआत 15 अगस्त 1947 के भारत/पाक विभाजन से की और बताया कि इसे 'सांप्रदायिक विभाजन' की संज्ञा दी जाती है जबकि यह 'साम्राज्यवादी विभाजन' था। वस्तुतः सांप्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है। विभाजन का फार्मूला व्हाइट हाउस में तय किया गया था जिस पर अमल ब्रिटिश सरकार ने किया। क्योंकि अंग्रेजों ने सत्ता मुगलों से हासिल की थी इसलिए शुरू-शुरू में मुसलमानों को कुचला गया था किन्तु 1857 की क्रांति का नेतृत्व बहादुर शाह जफर ने किया था जिनको शिवाजी के वंशज मराठों का भी समर्थन हासिल था अतः क्रांति को निर्ममता से कुचल देने के बाद ब्रिटिश सरकार ने 'फूट डालो' की नीति चलाई जिसके अंतर्गत 1905 में पहले बंगाल का 'मुस्लिम' व 'हिन्दू' आधार पर विभाजन किया जिसे जनता की एकता के चलते रद्द करना पड़ा। अतः ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को भड़का कर 'मुस्लिम लीग' की स्थापना 1906 में मदन मोहन मालवीय की मार्फत 'हिंदूमहासभा' की स्थापना 1920 में तथा हेद्गेवार की मार्फत आर एस एस की स्थापना 1925 में अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती के लिए करवाई थी और इन संगठनों की मदद से ही देश विभाजन को अंजाम दिया गया था। आज़ादी के तुरंत बाद से ही पाकिस्तान तो अमेरिकी प्रभाव में चला गया था किन्तु भारत 'तटस्थ' नीति पर चल रहा था। 1975 की एमर्जेंसी के कारण 1977 की करारी हार के बाद 1980 में इंदिरा गांधी की वापिसी 'इन्दिरा-देवरस' गुप्त समझौते के अंतर्गत आर एस एस के समर्थन से हुई थी। 1989 में राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद/ राम जन्म भूमि का ताला खुलवा कर पूजा शुरू करवाई थी। 2012 के उत्तर प्रदेश के चुनावों में सपा को भाजपा का समर्थन था तो 2014 के लोकसभा चुनावों में सपा का समर्थन भाजपा को था।इसकी रूपरेखा व्हाईट हाउस में तय की गई थी और उस बैठक में भाग लेने वालों में एक प्रोफेसर लखनऊ के भी रहे थे।  2017 के चुनावों में 'मुलायम-मोदी' गुप्त समझौते के अंतर्गत भाजपा द्वारा सपा का फिर सपा द्वारा 2019 के चुनावों में भाजपा का समर्थन किया जाएगा जबकि माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश करात साहब मुलायम सिंह को तीसरे मोर्चे का पी एम प्रत्याशी बनाना चाहते थे।2019 में 'निष्पक्ष' चुनावों की संभावना क्षीण है और वर्तमान प्रवृति से सांप्रदायिकता का मुक़ाबला नहीं किया जा सकता है।  हमको अपनी नीतियाँ बदलनी चाहिए ड्राईङ्ग रूम में तय करके सड़कों पर प्रदर्शन करने और आर्थिक लड़ाइयों को लड़ने से ही हमें जनता का समर्थन नहीं मिल जाएगा।यदि लोकतान्त्रिक  तरीके से साम्राज्यवाद समर्थक सांप्रदायिक सरकार को हटाना संभव न हुआ तो दिल्ली की सड़कों पर कम्युनिस्टों व सांप्रदायिक शक्तियों में निर्णायक  रक्त-रंजित संघर्ष होगा  जिसके बाद ही तय होगा कि केंद्रीय सत्ता पर सांप्रदायिक शक्तियों का कब्जा बरकरार रहेगा या कि वामपंथियों के नेतृत्व में जन-हितैषी सरकार सत्ता में आएगी। 
जिलामंत्री ख़ालिक़ साहब ने  अपने उद्बोद्धन में बताया कि हम एक-एक मुद्दे को लेकर और एक स्थान का चयन करके अंजाम होने तक संघर्ष की रण-नीति पर चलेंगे। उन्होने 15 अगस्त, 02 अक्तूबर और 26 जनवरी पर पार्टी की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की श्रंखला में डॉ अंबेडकर, कबीर दास, स्वामी विवेकानंद आदि की जयंती को भी जोड़ा। उन्होने कुछ आगामी कार्यक्रमों को दृढ़ता पूर्वक सफल करने की अपील की जिसमें एक पहली सितंबर को 'बख्शी का तालाब' तहसील पर किसान समस्याओं पर प्रदर्शन करना भी है। 
सभापति कामरेड कनहाई राम जी ने सभी को धन्यवाद देने के साथ-साथ यह भी कहा कि हमें विधानसभा और संसद की सभी सीटों पर 'चुनाव' भी लड़ना चाहिए केवल सड़कों पर संघर्ष करने से ही जनता हमारे साथ नहीं जुड़ सकती । जनता को लगना चाहिए कि कम्युनिस्ट सरकार बना कर उसकी समस्याओं को हल कर सकते हैं तभी वह हमारा साथ देगी।  
 
        

Sunday, 9 August 2015

इतिहास को व्याख्यापित करता मानवीय चेहरा : भीष्म साहनी - -वीर विनोद छाबड़ा

**

10 अप्रैल 1986 को लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के स्वर्णजयंती समारोह के अवसर पर भीष्म साहनीजी और ज्ञानरंजन जी के साथ वीरेंद्र यादव जी .

भीष्म साहनी - इतिहास को व्याख्यापित करता मानवीय चेहरा। :
-वीर विनोद छाबड़ा 

०८ अगस्त २०१५. इसी दिन सौ वर्ष पूर्व प्रख्यात कथाकार, नाट्य लेखक और अभिनेता दिवंगत भीष्म साहनी का जन्म हुआ था। इस सिलसिले में इप्टा के तत्वाधान में लखनऊ में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ - महत्व भीष्म साहनी।
अध्यक्षता दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और नाट्य लेखन से जुड़े और भीष्म साहनी के करीबी रहे विख्यात लेखक विलायत जाफ़री ने की।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय सचिव राकेश ने याद करते हुए बताया कि भीष्म १५ अगस्त १९४७ को बड़े उत्साह से रावलपिंडी से दिल्ली आये लालकिले पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को तिरंगा फहराते देखने और उन्हें सुनने। लेकिन विभाजन के फलस्वरूप उत्पन्न भीषण दंगों के रहते लौट नहीं पाये। उनका परिवार ही विभाजित हो। १९७० में जब महाराष्ट्र के भिवंडी सांप्रदायिक दंगो की विभीषिका को भीष्म ने बड़े करीब से देखा तो उनकी प्रतिक्रिया थी - मैंने ये सब पहले भी देखा है। विभाजन के ज़ख्म हरे हो गए। इसकी परिणीति हुई ऐतिहासिक 'तमस' की रचना के रूप में। गोविंद निहलानी ने टीवी फ़िल्म भी बनाई।उनकी संघटन क्षमता अद्भुत थी। पूर्णतया समर्पित। उनकी कहानियों के पात्र निर्धन और निर्भीक मिलते हैं।
सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव को भीष्म साहनी में एक बहुआयामी और विरल व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। 'तमस' और भीष्म साहनी एक-दूसरे का पर्याय हैं। विभाजन पर हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में कई दस्तावेज़ी उपन्यास और कहानियां लिखी गयीं हैं लेकिन 'तमस' उपन्यास उन सब में अलग दिखता है। यह उस उस दौर के क्रूर पहलू को उजागर करता है कि उपनिवेशवादी शक्तियां समाज को बांटने और स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए के सांप्रदायिकता का इस्तेमाल करती थीं। विभाजन की भयावहता आज भी मंडरा रही है। इसी को भीष्म ने भिवंडी के दंगों में देखा। वो सिर्फ लेखक नहीं थे। फ्रीडम फाईटर भी थे। उन्होंने पीड़ितों की वेदनाओं को सुना और दर्ज किया। सैकड़ों सफ़े भर गए। 'तमस' में उन्होंने इन सबका ज़िक्र करते हुए उस क्षेत्र की मिली-जुली संस्कृति को भी व्याख्यापित किया। उन्होंने 'तमस' में विभाजन की त्रासदी को सांप्रदायिकता की दृष्टि से नहीं देखा। उनके हिंदू-मुस्लिम पात्र एक-दूसरे की मदद करते हुए नज़र आते हैं। सांप्रदायिकता और विभाजनकारी शक्तियों से लड़ते हुए और मरते हुए दिखते हैं। इन घटनाओं को उन्होंने विश्वसनीय बना कर पेश किया। यह बात दूसरी है कि सांप्रदायिक शक्तियां असरदार हो गयीं। आज के समय की सांप्रदायिकता और बहुसंख्यकवाद के खतरे को समझने के लिए 'तमस. एक ज़रूरी पठनीय कथाकृति है।
युवा लेखन नलिन रंजन सिंह ने भीष्म के महत्व को उनकी कहानियां के कथानक और पात्रों में तलाश किया। 'अमृतसर आ गया' से विभाजन के दौर का पता चलता है। यह उस वक़्त की याद दिलाता है जब भीष्म आजादी का जश्न देखने रावलपिंडी से दिल्ली जा रहे होते हैं। मुस्लिम इलाकों से गुज़रते हुए डर लगना और अमृतसर आते-आते राहत की सांस का मिलना। 'चीफ़ की दावत' में मध्यवर्गीय पारिवारिक ढांचे और आडंबरों की बात करते हुए एक वृद्ध मां की मनोस्थिति का दर्शन। उस पर तंज करना। 'गंगो का दाया' में घर का खर्च चलाने के लिए छह साल का बच्चा काम पर निकलता है। वो लौट कर नहीं आता। ऐसी दुःख की घड़ी में भी पिता सोचता है अब तीन के जगह सिर्फ़ के दो के खाने का इंतज़ाम करना होगा। 'माता-विमाता' में संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। गरीब मां बच्चे का पालन-पोषण विमाता के ज़िम्मे डाल देती है। बच्चे के स्वस्थ होने पर माता उसे लेने आती है। विमाता में माता जाग उठती है। वो देने से मना करती है। लेकिन हक़ तो माता का है। बच्चा रोने लगता है। वो भूख से बिलख रहा है। माता विमाता को दूध पिलाते हुए देखती है। भीष्म की कहानियां पाठक को उस परिवेश से जोड़ देती हैं। समय को लेकर भी वो बड़े सजग रहे हैं। इसलिए भीष्म बड़े रचनाकार हैं।
वरिष्ठ कथाकार शकील सिद्दीकी ने भीष्म में शालीनता, विनम्रता और दूसरों की बात सुनने का धैर्य देखा। अपनी आलोचना को भी उन्होंने धैर्य से सुना। दूसरों को आगे आने का मौका दिया, दूसरों का दिल नहींदुखाया और खुद को कभी प्रचारित नहीं किया। प्रगतिशीलता उनके व्यक्तित्व की हिस्सा थी। जहां कहीं भी नाटक हुआ वो उससे जुड़ गए। उसकी हर गतिविधि का हिस्सा बने। दरी बिछाने से लेकर अख़बार में खबर बना कर उसे पहुंचाने तक का काम पूर्णतया समर्पित हो कर किया। प्रगतिशील लेखक आंदोलन का सर्वाधिक व्यापक प्रचार और प्रसार भीष्म के राष्ट्रीय महासचिव काल में ही हुआ। भीष्म का व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उनके समय में प्रगतिशील लेखक आंदोलन में कम्युनिस्ट पार्टी का हस्तक्षेप न्यूनतम रहा। उनका कथन था कि अच्छा लेखक किसी विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं बनता, अपनी मेघा से बनता है।
युवा लेखक सूर्य बहादुर थापा ने भीष्म को उनके नाटकों के ज़रिये याद किया। भीष्म ने मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखा लेकिन जो देखा उसे मार्क्सवादी खांचे में नहीं रखा। वो देखते हैं, आत्मसात करते हैं और फिर रचते हैं। समाज की पीड़ा और वेदना को प्राथमिकता दी। 'हानूश' का पात्र जनता को नया जीवन देने के लिए एक घड़ी का अविष्कार करने में सत्रह साल लगाता है। आर्थिक परेशानियों से जूझती उसकी पत्नी उसे कोसती है - यह कैसा आदमी है। जो दो वक़्त की रोटी नहीं कम सकता वो अविष्कार क्या करेगा? लेकिन वो दिल से उसके पीछे है। जब घड़ी का अविष्कार हो गया तो हानुश कहता है कि तुम जैसी स्त्री साथ न होती तो यह अविष्कार मुमकिन नहीं था। इस अविष्कार का ईनाम भी मिला। हानुश की आंखें निकाल दी गयीं ताकि वो दोबारा ऐसी घड़ी न बना सके। 'मुआवज़ा' भीष्म का दस्तावेज़ी नाटक है। यह उस काल में लिखा गया जब बाबरी मस्जिद का विध्वसं हो चुका था। यह दंगे की कहानी है। दंगे की पृष्ठभूमि में सफेदपोश, नेता, अफ़सर, व्यापारी, दलालों की मिली भगत और उसमें मारा जाता बेक़सूर आम आदमी। भीष्म ने इन सब पात्रों के अमानवीय चेहरे बेनकाब किये। भारतीय राजनीति और लोकतंत्र का कच्चा चिट्ठा खोल दिया। 'माधवी' और 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' में भीष्म नाटक लिखते हुए नहीं बल्कि अपना काम करते हुए दिखते हैं। लेखक की स्वीकार्यता तभी होती है जब जनता में उसे पढ़ा जाये। भीष्म जिस सहजता के साथ परिदृश्य पर छा जाते हैं वो अद्भुत है।
सुप्रसिद्ध अभिनेता और निर्देशक जुगल किशोर ने भीष्म साहनी के 'तमस' के अभिनेता भीष्म का ज़िक्र करते हुए कहते हैं भीष्म हरमिंदर सिंह के रूप में कोई पात्र नहीं और न ही अभिनेता हैं, बल्कि वो हरमिंदर को जी रहे नज़र आते हैं। सईद मिर्ज़ा ने 'मोहन जोशी हाज़िर हैं' में भीष्म का चयन इसलिए किया क्योंकि उनके चेहरे में उनको एक 'इतिहास' नज़र आया। भीष्म भीड़ में पात्र तलाशते हैं और फिर उसे गढ़ते हैं। भीष्म वो कलाकार हैं कि काम में इतना डूब जाते हैं कि अविलंब गंदे और बदबूदार पानी में पैंट ऊंची करके घुस जाते हैं और बड़ी सहजता से शॉट देकर चले आते हैं।
अंत में भीष्म और दूरदर्शन के नाट्य संसार से जुड़े और सभा के अध्यक्ष विलायत जाफ़री ने दिवंगत पंडित नेहरू को उद्धृत करते हुए बताया कि इंसान मर जाता है लेकिन किताबों में वो ज़िंदा रहता है। भीष्म भी हमेशा ज़िंदा रहेंगे। 'तमस' का असर इस मुल्क पर भी है और और उन पर भी रहेगा जिन पर और जिन के लिए लिखी गयी है। 'तमस' के टेलीकास्ट लेकर कई विवाद और टकराव हुए। सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया। उस दिन याद है। रात आखिरी एपिसोड टेलीकास्ट होना था। माननीय जज ने उसे देखा और इज़ाज़त दे दी। कोई भी कृति ईमानदारी से बनी हो और अच्छी हो तो ज़रूर लोगों तक पहुंचती है।
और अंत में मैं। एक वक्ता के रूप में नहीं बल्कि अपने दिवंगत पिता के पुत्र के रूप में जिनके सौजन्य से मैंने भीष्म साहनी को देखा और पढ़ा ही नहीं छुआ भी। और उन्हें समझा भी। और मैं स्वयं को सौभाग्शाली समझाता हूं कि इप्टा ने मुझे आज उनके जन्मशती के प्रोग्राम की रपट लिखने का मौका दिया।
कार्यक्रम के बीच-बीच में भीष्म साहनी और कृतियों से संबंधित कुछ वीडियो क्लिपिंग भी दिखाई गयी।
सभा में सुभाष राय, केके चतुर्वेदी, राजबली माथुर, अनिल वत्स, ऋषि श्रीवास्तव, कौशल किशोर, उर्मिल कुमार थपलियाल आदि अनेक गणमान्य लोग भी उपस्थित थे।
---
०९-०८-२०१५

https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1664213497145606?pnref=story 



तीनों फोटो वीर विनोद छाबड़ा जी के सौजन्य से 
***********************************************************************

आज साँय क़ैसर बाग स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह के जयशंकर प्रसाद सभागार में IPTA द्वारा 'महत्व  भीष्म साहनी ' विषयक एक गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता विलायत जाफरी साहब ने की व संचालन राकेश जी ने किया। मंचस्थ विद्वत जनों में वीरेंद्र यादव, शकील सिद्दीकी, नलिन रंजन सिंह, सूर्य बहादुर थापा थे। अन्य गण मान्य लोगों के अलावा सुभाष राय ( प्रधान संपादक- जन संदेश ), प्रदीप घोष, मुख्तार, ओ पी अवस्थी, रूप रेखा वर्मा, वीर विनोद छाबड़ा, कौशल किशोर, के के चतुर्वेदी आदि की उपस्थिती भी विशेष उल्लेखनीय है।

राकेश जी ने प्रारम्भ में भीष्म साहनी जी पर एक लघु वृत्त चित्र के माध्यम से विभाजन की त्रासदी और 'तमस' पर उनके विचारों का अवलोकन कराते हुये प्रकाश डाला। 08 अगस्त 1915 को  रावलपिंडी में जन्में भीष्म साहनी जी का यह शताब्दी वर्ष है और पूरे वर्ष उनकी कृतियों व साहित्य पर आधारित कार्यक्रमों का आयोजन करके उनकी यादगार मनाए जाने का ऐलान राकेश जी द्वारा किया गया।
 वीरेंद्र यादव जी ने 'तमस' की रचना से संबन्धित घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुये बताया कि 1947 के विभाजन के समय के दंगों के बाद 1970 में भिवंडी में हुये व्यापक दंगों का इस पर प्रभाव पड़ा है। 1974-75 तक यह उपन्यास पूर्ण हुआ और 1987 में गोविंद निहलानी ने इस पर इसी नाम से एक टी वी सीरियल बनाया जिसमे एक पात्र की भूमिका का अभिनय खुद भीष्म साहनी जी ने ही किया है।
नलिन रंजन सिंह जी ने भीष्म जी की चुनिन्दा कहानियों का ज़िक्र किया जिसमें 'मुआवजे' को उन्होने तमस के बाद के प्रभाव को समाहित किए जाने की ओर इंगित किया। शकील सिद्दीकी साहब ने भीष्म जी के सांगठनिक कौशल पर प्रकाश डालते हुये बताया कि IPTA से तो वह रावलपिंडी में रहते हुये 1943 में इसकी स्थापना के समय से ही जुड़े हुये थे। 1975 में 'गया' में सम्पन्न 'प्रलेस' के अधिवेन्शन में उनको इसका राष्ट्रीय महासचिव चुना गया जिस पद पर वह 1986 तक लगातार बने रहे। उनकी विशेष खासियत छोटे से छोटे कार्यकर्ता को भी महत्व देने व आलोचकों की बातों को भी धैर्य से सुनने की थी।
सूर्य बहादुर थापा जी ने भीष्म जी के लिखे नाटकों की व्यापक चर्चा करते हुये 'हानुष' की विशेषता पर प्रकाश डाला। इसके मुख्य पात्र हानुष और उसकी पत्नी के सहयोग की भी चर्चा उन्होने की। जबकि जुगल किशोर जी ने भीष्म जी के 'अभिनय' पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होने बताया कि बंबई की एक चाल के पास गंदे पानी में भी खड़े रह कर उन्होने फिल्म का शाट बे हिचक दे दिया और कोई शिकवा भी न किया।
अपने अध्यक्षीय भाषण में विलायत जाफरी साहब ने अपने दूरदर्शन के कार्यकाल में 'तमस' के प्रसारण से संबन्धित घटनाक्रम का उल्लेख करते हुये बताया कि तत्कालीन  डायरेक्टर भास्कर घोष साहब ने  इसके प्रसारण के बाद होने वाली किसी भी स्थिति की ज़िम्मेदारी उन पर डालते हुये अनुमति दे दी थी। जब इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका प्रस्तुत हुई तब संबन्धित जज साहब ने उनको अपने चैंबर में बुलाकर अंतिम कड़ी के प्रसारण की तारीख का पता किया और फिर खुद देखने के बाद फैसला देने की बात कही। जब जज साहब ने तमस को देखा तब तक प्रसारण समाप्त हो चुका था अतः प्रसारण पर रोक लगाने की बात ही खत्म हो गई थी। जाफरी साहब का कहना था कि हर समय अच्छे लोग भी रहते हैं और उनके कारण अच्छी बातों के पूरा होने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती है। धन्यवाद ज्ञापन ज्ञान शुक्ला जी ने किया। 
------ विजय राजबली माथुर 
08-08-2015 
 https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/922170021178308?pnref=story